अध्याय 3
पृथ्वी
की आंतरिक संरचना
भौतिक
भूगोल के मूल सिद्धांत
प्रश्न : पृथ्वी के आंतरिक भाग
(भू गर्भ )की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर अधिक
निर्भर होने के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह से केन्द्र की दूरी 6370 किलोमीटर
है | पृथ्वी की आंतरिक परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं है की पृथ्वी के केन्द्र
तक जाकर उसके आंतरिक भाग का निरीक्षण कर सके | अभी तक ज्ञात प्रमाणों से पता चलता
है कि अभी तक सतह से 4 किलोमीटर तक ही खादाने खोदी गयी है जो
दक्षिणी अफ्रीका में स्थित है | प्रवेधन परियोजनाओं के द्वारा भी अधिकतम 12
किलोमीटर तक ही खुदाई की गई है | जो केन्द्र की गहराई के अनुपात में
बहुत ही कम है | ज्वालामुखी उद्गारों से प्राप्त पदार्थ से हम यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि यह
मैग्मा पृथ्वी के अंदर कितनी गहराई से निकला है | अत:
पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर ही
अधिक निर्भर है |
प्रश्न : भूगर्भ की जानकारी के स्त्रोत कौन –कौन से हैं ?
उत्तर
: पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर
निर्भर है | फिर भी कुछ जानकारी प्रत्यक्ष प्रेक्षणों से भी प्राप्त होती है |
जानकारी के इन स्त्रोतों कों हम दो मुख्य भागों में बाँटते है |
1. प्रत्यक्ष स्त्रोत:
पृथ्वी
के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्न लिखित स्त्रोत
शामिल किए जाते है |
धरातलीय
चट्टानें,
खनन, प्रवेधन परियोजनाएँ और ज्वालामुखी उदगार
2. अप्रत्यक्ष स्त्रोत:
पृथ्वी
के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए अप्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्नलिखित स्त्रोत
शामिल किए जाते है |
तापमान,
दबाव, घनत्व, गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय क्षेत्र
उल्काएँ, और भूकम्प संबंधी क्रियाएँ |
प्रश्न : भूगर्भ की जानकारी के प्रत्यक्ष स्त्रोतों का वर्णन कीजिए |
पृथ्वी
के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्न लिखित स्त्रोत
शामिल किए जाते है |
|
1. धरातलीय
चट्टानें |
2. खनन
, |
|
3. प्रवेधन
परियोजनायें |
4. ज्वालामुखी
उदगार |
इनका
संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
धरातलीय
चट्टानें
धरातलीय
चट्टानें पृथ्वी के भूगर्भ की जानकारी के लिए
सबसे आसानी से प्राप्त होने वाले स्रोतों में है | जिनसे हमें पृथ्वी के
अंदर पाए आने वाले खनिजों की रासायनिक तथा भौतिक विशेषताओं का पता चलता है |
खनन
खनन
के द्वारा पृथ्वी की सतह पर कुछ गहराई में मौजूद चट्टानों के बारे में हम उनकी
संरचना तथा उस स्थान के तापमान आदि का पता लगा सकते है | उदाहरण के लिए
दक्षिणी अफ्रीका की सोने की खाने 3 से 4
किलोमीटर गहरी है | इससे अधिक गहराई में जाना असंभव है क्योंकि इससे
अधिक गहराई में तापमान बहुत अधिक होता
है |
प्रवेधन
परियोजनायें
खनन
के अतिरिक्त वैज्ञानिक पृथ्वी की आंतरिक स्थिति कों जानने के लिए दो मुख्य
परियोजनायों पर कार्य कर रहे है | जिनमें गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना (Deep
Ocean Drilling Project) तथा समन्वित महासागरीय प्रवेधन परियोजना (Integrated
Ocean Drilling Project) मुख्य
हैं | उदाहरण के लिए आजतक का सबसे गहरा प्रवेधन (Drill)
आर्कटिक महासागर में कोला (Kola) नामक क्षेत्र में किया गया
है | इन परियोजनाओं के अतिरिक्त बहुत सी अन्य गहरी परियोजनाओं के अंर्तगत गहराई तक
खुदाई करके पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में असाधारण जानकारी प्राप्त हुई है |
ज्वालामुखी
उद्गार
ज्वालामुखी उद्गार
प्रत्यक्ष जानकारी के महत्वपूर्ण
स्त्रोत है | जब कभी पर ज्वालामुखी विस्फोट होता है तो उससे निकलने वाले लावा कों
प्रयोगशाला में अन्वेषण के लिए ले जाया
जाता है | लेकिन हम यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि यह मैग्मा पृथ्वी के अंदर कितनी
गहराई से निकला है |
प्रश्न : भूगर्भ की जानकारी के अप्रत्यक्ष स्त्रोतों का संक्षिप्त
वर्णन कीजिए ?
पृथ्वी
के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए अप्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्नलिखित स्त्रोत
शामिल किए जाते है | तापमान, दबाव, घनत्व, गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय
क्षेत्र उल्काएँ, और भूकम्प संबंधी
क्रियाएँ | इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
घनत्व
पृथ्वी
का औसत घनत्व 5.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है | लेकिन
हम परतों के अनुसार देखतें है तो पाते है कि भू पर्पटी का घनत्व केवल 2.7 ग्राम प्रति घन
सेंटीमीटर है | ये परत अवसादी चट्टानों से बनी है | इसके नीचे की परत आग्नेय शैलों
से बनी है लेकिन इस परत का घनत्व भी 3 से 3.5 ग्राम प्रति घन
सेंटीमीटर तक ही है | इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी के आंतरिक भाग अर्थात क्रोड का
घनत्व अधिक होना चाहिए |वैज्ञानिक मानते है कि पृथ्वी के बाह्य क्रोड पर घनत्व 5 से बढकर 10 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर हो जाता
है और आंतरिक क्रोड पर यह 11 से 12 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर तक पहुँच जाता है
| जिससे यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी का
आंतरिक भाग भारी तथा अधिक घनत्व वाली चट्टानों से बना है |
तापमान
पृथ्वी के विभिन्न स्थानों
पर खानें खोदने पर हम देखते है कि जैसे- जैसे हम पृथ्वी के धरातल से केन्द्र की ओर
जाते है वैसे-वैसे तापमान में वृद्धि होती
जाती है | वैज्ञानिक मानते है कि सामान्य रूप से प्रत्येक 32 मीटर की गहराई पर 10 C तापमान बढ़ जाता है | इस हिसाब से 50
किलोमीटर की गहराई पर तापमान 1200 0 C से 18000 C होना चाहिए और पृथ्वी के
क्रोड में लगभग 2000000C (2 लाख डिग्री सेल्सियस)
होना चाहिए | लेकिन जब हम भूकम्पीय तंरगों के व्यवहार कों समझते है तो पता चलता है
कि यह सत्य नहीं है |
दबाव
वैज्ञानिकों
का मत है कि पृथ्वी के आंतरिक भागों में तामपान तथा घनत्व की तरह दबाव में भी
वृद्धि होती है | स्पष्ट है कि पृथ्वी कि भू पर्पटी पर दबाव बहुत ही कम है लेकिन
जैसे-जैसे गहराई में जाते है दबाव में वृद्धि होती जाती है | वैज्ञानिकों के
अनुसार दबाव बढ़ने पर घनत्व भी बढता है
लेकिन एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ सकता | प्रत्येक चट्टान में दबाव के कारण
घनत्व में वृद्धि एक सीमा तक ही हो सकती है चाहे दबाव कितना ही बढा दिया जाए |
उल्काएँ
पृथ्वी
के आंतरिक संरचना के बारे में जानने का एक और महत्वपूर्ण स्त्रोत उल्काएँ है | इसका कारण यह है कि उल्काओं के
अध्ययन से पता चला है कि उल्काओं से प्राप्त पदार्थ और उनकी संरचना भी पृथ्वी
से मिलती जुलती है | ये उल्काएँ वैसे ही
ठोस पिंड है जिस प्रकार हमारी पृथ्वी है |
गुरुत्वाकर्षण
बल
पृथ्वी
के धरातल पर विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं है | यह बल
धुर्वों पर अधिक तथा भूमध्य रेखा पर कम होता है | पृथ्वी के केन्द्र से धुर्वों की
दूरी भूमध्य रेखा की अपेक्षा कम होने के कारण ऐसा है | लेकिन हम जानते है कि
गुरुत्व बल का मान पदार्थ के द्रव्यमान (भार) के अनुसार भी बदलता है | पृथ्वी के
भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस विभिन्नता कों प्रभावित करता है | इसके अलावा
अन्य कारण से भी पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल में भिन्नता पायी जाती है |
पृथ्वी
पर पायी जाने वाली गुरुत्वाकर्षण बल की भिन्नता कों गुरुत्व विसंगति कहते है | इसी
गुरुत्व विसंगति के करण हमें भू पर्पटी में पदार्थ के द्रव्यमान के वितरण की
जानकारी प्राप्त होती है |
चुम्बकीय
क्षेत्र
चुम्बकीय
सर्वेक्षण से हमें भू पर्पटी में चुम्बकीय पदार्थों के वितरण की जानकारी प्राप्त
होती है | इससे हमें चुम्बकीय गुणों वाले
पदार्थों के वितरण पता चलता है |
भूकम्प
संबंधी क्रियाएँ (भूकम्पीय गतिविधियाँ)
भूकम्पीय
गतिविधियाँ भी पृथ्वी की आंतरिक भाग की जानकारी का मुख्य स्त्रोत है | भूकंप के
दौरान विभिन्न प्रकार की भूकम्पीय तरंगें उत्पन्न होतीं है | इन तरंगों के व्यवहार
के द्वारा हम पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में अत्यधिक जानकारी प्राप्त कर सकते
है | जो निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i)
केवल प्राथमिक तरंगें ही
पृथ्वी के केन्द्रीय भाग से गुजर सकती है | लेकिन इस भाग से गुजरने पर इन तरंगों
के वेग में काफी कमी आ जाती है |
(ii)
गौण तरंगे द्रव पदार्थों में
से नहीं गुजर सकती | केवल ठोस माध्यम से
ही गुजर सकती है |
(iii)
धरातलीय तरंगे (L-WAVES)
धरातल पर ही चलती हैं |
प्रश्न : भूकम्पीय तरंगों की
सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ?
इन
तीनों प्रकार की भूकम्पीय तरंगों कों
भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) के द्वारा रेखांकित किया जाता है | इन तरंगों के
व्यवहार की मुख्य बातें निम्न लिखित है |
a. सभी
भूकम्पीय तरंगों का वेग (गति ) अधिक घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर बढ़ जाता
है और कम घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर कम हो जाता है |
b. केवल
प्राथमिक तरंगें ही पृथ्वी के केन्द्रीय भाग से गुजर सकती है | लेकिन इस भाग से
गुजरने पर इन तरंगों के वेग में काफी कमी आ जाती है |
c. गौण
तरंगे द्रव पदार्थों में से नहीं गुजर सकती |
केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती है |
d. धरातलीय
तरंगे (L-WAVES)
धरातल पर ही चलती हैं |
e. विभिन्न
माध्यमों में से गुजरते हुए सभी प्रकार की तरंगें परावर्तित तथा आवर्तित होती है |
प्रश्न : भूकम्पीय तरंगों से हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में
जानने में किस प्रकार की सहायता मिलती है ?
उत्तर
: भूकम्पीय तरंगों का व्यहवार से हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में जानकारी
मिलती है | जो निम्नलिखित है |
A. भूकंप
के केन्द्र के निकट ये तीनों ही तरंगे पहुँचती है |
B. पृथ्वी
के आंतरिक भागों में ये तरंगें अपना मार्ग बदल लेती है और अवतल मार्ग आपनाती है | इससे इस बात की पुष्टि होती है कि पृथ्वी
के आंतरिक भाग में चट्टानों का घनत्व अधिक है |
C. प्राथमिक
तथा गौण तरंगों कि गति भूकंप के केन्द्र से धरालत के साथ पृथ्वी के क्रोड की
सीमा तक (2900
किलोमीटर तक) गहराई में तक जाते समय बढती
जाती है | लेकिन इसके बाद बाद गौण तरंगें लुप्त हो जाती है और प्राथमिक तरंगों की
गति में काफी कमी आती है | इससे यह पता चलता है कि 2900
किलोमीटर तक क्रोड की बाह्य सीमा तक पृथ्वी ठोस अवस्था में होने का अनुमान है |
क्रोड का आंतरिक भाग जो 2900 किलोमीटर से केन्द्र तक जाता है ठोस अवस्था में नहीं
बल्कि तरल अवस्था में है |
D. भूकंप के केन्द्र से 1050 तक भूकम्पीय तरंगे जाती है | लेकिन उसके बाद 1050 किलोमीटर से 1450
के बीच कोई भी तरंग नहीं जाती | इस क्षेत्र कों भूकम्पीय छाया
क्षेत्र कहते है | इस क्षेत्र होना यह बताता है कि भूकम्पीय तरंगे आवर्तित हो जाती
है और यह आवर्तन अधिक घनत्व वाले पदार्थों के कारण होता है | जिससे पता पता चलता
है कि पृथ्वी का केन्द्रीय भाग अधिक घनत्व वाले पदार्थों का बना है | इस भाग में
लोहा तथा निकिल जैसे भारी पदार्थों की अधिकता है |
प्रश्न:भूकंप किसे कहते हैं?
उत्तर
: साधारण भाषा में भूकंप का अर्थ है - पृथ्वी का कांपना |
प्रश्न: भूकंप के उद्गम केन्द्र (फोकस) को परिभाषित कीजिए |
उत्तर
: पृथ्वी के अंदर वह स्थान जहाँ से ऊर्जा
निकलती है उसे भूकंप का उद्गम केन्द्र भूकंप मूल (Focus) कहते है | इसे अवकेन्द्र (Hypocentre) भी कहते है | यही से भूकम्पीय तरंगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई
पृथ्वी की सतह तक पहुँचती है |
प्रश्न: भूकंप अधिकेंद्र किसे कहते हैं ?
उत्तर
: भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम
केन्द्र के सबसे निकट होता है | उस पर भूकम्पीय तरंगें
सबसे पहले पहुँचती है | इस बिंदु कों ही भूकंप अधिकेंद्र (Epicenter)
कहते है | यह बिंदु उद्गम केन्द्र के
ठीक ऊपर समकोण (90 0) पर
होता है |
चित्र: भूकम्प मूल तथा भूकम्प अधिकेंद्र
प्रश्न : भूकंप को मापने के लिए किस यंत्र का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर
: भूकंप के दौरान पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली भूकम्पीय तरंगों कों मापने के
लिए जिस यंत्र का प्रयोग किया जाता है उसे
भूकंप लेखी (भूकंप मापी) यंत्र या सिस्मोग्राफ (Seismograph) कहते है |
प्रश्न: भूकम्पीय तरंगों कितने प्रकार की होती है ? सभी प्रकार की
भूकम्पीय तरंगों का संक्षेप में वर्णन करो |
उत्तर
: उत्पत्ति के आधार पर भूकम्पीय तरंगें दो प्रकार की होती है | भूगर्भिक तरंगें
तथा धरातलीय तरंगें |
इनका
संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
1. भूगर्भिक
तरंगें
वे तरंगे जो भूकम्प के केन्द्र से ऊर्जा के
मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती तथा पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं
में आगे बढती है | उन्हें भूगर्भिक तरंगें कहते है |
ये तरंगे भी दो प्रकार की होती है | प्राथमिक
तथा गौण तरंगे |
अ. प्राथमिक
तरंगे (P-WAVES)
ये तरंगे ध्वनि तरंगों की तरह होती है | इन्हें अनुदैर्ध्य तरंगें भी कहते है
| क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक ही दिशा में
होती है | ये सबसे तेज होती है जिसके कारण ये पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर सबसे
पहले पहुँचती है | ये सभी तरह ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती
हैं |
आ. गौण
तरंगे (S- WAVES)
ये जल तरंगों की तरह होती है |इन्हें
अनुप्रस्थ तरंगें भी कहते है | क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के
दोलन की दिशा एक दूसरे समकोण पर होती है | इनकी औसत गति 4 किलोमीटर प्रति सैकेंड होती है | ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर
सकती है और तरल माध्यम में आने पर लुप्त हो जाती है | इसी विशेषता के कारण इन
तरंगों से वैज्ञानिकों कों भूगर्भीय
संरचना कों समझने में काफी सहायता मिली है |
2. धरातलीय
तरंगें
भूगर्भिक
तरंगों और धरातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य क्रिया होने के कारण नई प्रकार की
तरंगें उत्पन्न होती है | जिन्हें धरातलीय तरंगें कहते है | ये तरंगे धरातल के
साथ- साथ चलती है | ये तरंगे भूकंप लेखी यंत्र पर अंत में अभिलेखित होती है अर्थात
ये सबसे अंत में आती है | ये तरंगें लंबी तरंगों के नाम से भी जानी जाती है | ये
धरातल तक ही सीमित रहती हैं | इनकी औसत गति 3 किलोमीटर
प्रति सैकेंड होती है | ये भी प्राथमिक तरंगों की तरह ठोस, तरल और गैस तीनों
माध्यमों में से गुजर सकती हैं | ये तरंगे
सबसे अधिक विनाशकारी होती है | इनसे शैले
विस्थापित होती है | इमारते गिर जाती है |
प्रश्न : विभिन्न प्रकार की भूकम्पीय तरंगों के संचरण के कारण शैलों (चट्टानों) पर पड़ने वाले प्रभावों का
वर्णन कीजिए ?
उत्तर
: भिन्न –भिन्न प्रकार की भूकम्पीय तरंगों के संचारित होने की प्रणाली भी अलग-अलग
होती है | जैसे ही ये संचारित होती है | तो शैलों में कंपन पैदा होती है | भिन्न –भिन्न
प्रकार की तरंगे शैलों पर अपना अलग –अलग प्रभाव छोडती है | उनके प्रभाव कों निम्न
प्रकार से समझा जा सकता है |
प्राथमिक
या P तरंगों के कारण शैलों पर
पड़ने वाले प्रभाव
P तरंगों के कम्पन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर होती है | तरंगों का
यह संचरण उनकी गति की दिशा में ही पदार्थों पर दबाव डालती है | इस दबाव के कारण
शैलों के पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन तथा फैलाव की
प्रक्रिया पैदा होती है |
गौण
(द्वितीयक) या S तरंगों के कारण शैलों पर
पड़ने वाले प्रभाव
S तरंगों के कम्पन की दिशा तरंगों की दिशा के समकोण पर होती है | इस कारण ये
तरंगें जिन शैलों से गुजरती है उनमें उभार और गर्त बनाती है |
धरातलीय
या L तरंगों के कारण शैलों पर
पड़ने वाले प्रभाव
ये
तरंगे सबसे अधिक विनाशकारी होती है | इनसे
शैले विस्थापित होती है अर्थात शैलें अपने
स्थान से खिसक जाती है |
प्रश्न: भूकम्पीय छाया क्षेत्र (Earthquake Shadow
Zone) किसे कहते है ? प्राथमिक (P) तथा गौण (S) तंरगों के भूकम्पीय छाया
क्षेत्रों का उल्लेख चित्र सहित कीजिए |
उत्तर: भूकंपलेखी पर दूरस्थ सथानों
से आने भूकम्पीय तरंगें अभिलेखित होती है | लेकिन कुछ स्थान ऐसे भी होते है जहाँ कोई भी
भूकम्पीय तरंग अभिलेखित नहीं होती है | ऐसे स्थानों कों जहाँ जहाँ कोई भी भूकम्पीय
तरंग अभिलेखित नहीं होती भूकम्पीय छाया क्षेत्र कहते है |
प्राय: देखा जाता है कि भूकंपलेखी अधिकेंद्र
से 1050 भीतर किसी भी दूरी
पर प्राथमिक (P) तथा
गौण (S) तरंगों का अभिलेखन करते है | लेकिन अधिकेंद्र से 1450 से दूर केवल प्राथमिक (P) तरंगों कों ही दर्ज करते है और
गौण (S) तरंगों का
अभिलेखन नहीं करते | वैज्ञानिक मानते है कि 1050 से 1450 के बीच का
क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर कोई भी भूकम्पीय तरंग नहीं जाती है | अत : यह
क्षेत्र दोनों ही प्रकार की तरंगों का छाया क्षेत्र है |
भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से 1450 के
बीच के क्षेत्र में प्राथमिक (P) तरंगे नहीं पहुँच पाती है | अत: भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से 1450 बीच का क्षेत्र
प्राथमिक (P) तरंगों के लिए भूकम्पीय छाया क्षेत्र
होता है | यह एक पट्टी के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है |
भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से
दूर गौण (S) तरंगें नहीं पहुँच पाती है | अत: बाकी सारा
क्षेत्र इन तरंगों के लिए भूकम्पीय छाया क्षेत्र होता है | इन तरंगों का छाया
क्षेत्र प्राथमिक (P) तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक
विस्तृत होता है | गौण (S) का तरंगों के छाया क्षेत्र
विस्तार में बड़ा होने के साथ-साथ पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग पर होता
है |
प्रश्न : उत्पत्ति के आधार पर भूकंप
के प्रकारों का वर्णन करो |
उत्तर : भूकम्प के वर्गीकरण के कई आधार है |
भूकंप की उत्पत्ति के कारणों के आधार पर भूकंप के प्रकारों का वर्णन निम्नलिखित है
|
A. सामान्यतः
विवर्तनिक भूकंप
वे भूकंप जो भ्रंश तल के
किनारे चट्टानों के सरकने के कारण उत्पन्न होते है उन्हें सामान्यतः विवर्तनिक
भूकंप कहते है | इस प्रकार के भूकंप ही सबसे अधिक आते है |
B. ज्वालामुखी
जन्य भूकंप
ऐसे भूकंप जो ज्वालामुखी उद्गार
के
कारण उत्पन्न होते है उन्हें ज्वालामुखी जनित भूकंप कहते है | ये
भी एक प्रकार के विवर्तनिक भूकंप ही होते है| ये भूकंप अधिकांशतः सक्रीय
ज्वालामुखी के क्षेत्रों में तक ही सीमित रहते है |
C. नियात
भूकंप
खनन क्षेक्षेत्रों में कभी-कभी भूमिगत खादानों की छतें ढह जाती है | इस प्रकार के भूकंप कों नियात (collapse) भूकंप कहते है | इस प्रकार के भूकंप के हल्के झटके महसूस होते है |
D. विस्फोट भूकंप
जब कभी भूमि में परमाणु
विस्फोट या रासायनिक विस्फोट किया जाता है तो भूमि में कंपन होती है | इस तरह से
उत्पन्न भूकंप कों विस्फोट भूकंप कहते है |
E. बाँध
जनित भूकंप
बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण बड़ी मात्रा में जल
कों संचित करने के लिए किया जाता है | विशाल जल राशि के भार के कारण उस स्थान की भूमि का संतुलन बिगड जाता है
| जिससे भूकंप उत्पन्न होते है | इस प्रकार के भूकम्प कों बाँध जनित भूकंप कहते है
|
प्रश्न : भूकंप की माप कितने तरीकों
से की जाती है ? वर्णन करे |
उत्तर : भूकंप कों उसकी तीव्रता तथा
गहनता (आघात की तीव्रता )के संदर्भ में
मापा जाता है | इन दोनों कों निम्नप्रकार
से समझ सकते है |
अ. भूकंप की तीव्रता
भूकंप की तीव्रता भूकंप के समय मुक्त होने
वाली ऊर्जा से सम्बन्धित है | इसे रिक्टर स्केल (Richter
scale) मापा जाता है | इस मापनी के अनुसार भूकंप की तीव्रता 0
से 10 तक होती है | इस मापनी का कों चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर के द्वारा विकसित किया गया था |
ब. भूकंप की गहनता (आघात की तीव्रता )
भूकंप की गहनता के अंतर्गत किसी स्थान परभूमि में होने वाले
कंपन मापा जाता है | इसे मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव के संदर्भ में देखा जाता है
कि इन कम्पन या झटकों से कितनी हानि हुई है | इस मापनी कों इटली के भूकंप
वैज्ञानिक मरकैली (Mercelli) के द्वारा विकसित किया
गया था | इस मापनी में भूकंप की गहनता कों 1 से 12 तक मापा जाता है |
प्रश्न : भूकंप के प्रभावों का
उल्लेख कीजिए ?
उत्तर : भूकम्प एक प्राकृतिक
आपदा है | इस आपदा से निम्नलिखित प्रभाव
पड़ते है |
1. भूमि
के हिलने से भूकंप अधिकेंद्र के पास अत्यधिक कंपन होता है | जिससे लोगों में डर बना रहता है |
2. भूकम्प
के कारण जन-धन की आपार हानि होती है |
3. भूकंप
के कारण बहुत अधिक मात्रा में इमारतें टूट जाती है या ध्वस्त हो जाती है |
4. भूकंप
के कारण धरातल में मोड या वलन पड़ते है | जिससे धरातलीय विसंगति उत्पन्न होती है |
5. भूकंप
के कारण कई बार पर्वतीय क्षेत्रों में भू स्खलन या पंक स्खलन होता है जिससे जीवन
अस्त-व्यस्त हो जाता है |
6. भूकंप
के कारण कई बार दरार पड जाने से वस दरार
में से जल, कीचड़ निकलता है जिससे मृदा
द्रवण होने लगता है |
7. भूकम्प
के कारण धरातल का एक तरफ झुक जाता है |
8. इसके
कारण सड़कें टूट जाती है |
9. भूकंप
से नदियाँ अपना मार्ग भी बदल लेती है | जिसके कारण भयंकर बाढ़ें आती है |
10. भूकंप
से धरातल एक स्थान से खिसक जाता है अर्थात धरातल का विस्थापन होता है |
11. भूकंप
यदि बाँध या तटबंध वाले क्षेत्रों में आ जाये तो ये टूट जाते है परिणाम स्वरूप
भयंकर बाढ़ें आती है |
12. यदि
भूकम्प केंद्र समुद्र में हो तो समुद्र में भूकम्पीय लहरों के कारण एक विशेष
प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती है जिन्हें सुनामी कहते है | ये तरंगें अत्यधिक
विनाशकारी होती है |
प्रश्न : पृथ्वी की संरचना का वर्णन करे |
अथवा
प्रश्न : पृथ्वी की विभिन्न
परतों का वर्णन कीजिए |
उत्तर
: भूकम्पीय तरंगों के व्यवहार कों समझनें के बाद हम पृथ्वी की आंतरिक संरचना कों
समझ कर पृथ्वी कों तीन परतों में बाँट सकते है | इन तीन परतों कों हम भू पर्पटी,
मैंटल तथा क्रोड कहते है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
भू पर्पटी
ठोस पृथ्वी का सबसे ऊपरी भाग कों भू पर्पटी
कहते है | यह बहुत भंगुर (कमजोर) भाग है | इस भाग में जल्दी टूटने की प्रवृति पाई
जाती है | इस परत की मोटाई महाद्वीपों तथा महासागरों के नीचे अलग-अलग है |
महासागरों के नीचे इसकी मोटाई 5 किलोमीटर तक है जबकि
महाद्वीपों के नीचे इसकी औसत मोटाई 30 किलोमीटर है | अर्थात
यह महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों के नीचे अधिक गहराई तक स्तिथ है | बड़ी और ऊँची
पर्वत श्रृंखलाओं के नीचे ये और भी अधिक गहराई तक है | उदाहरण के लिए हिमालय पर्वत
के नीचे इसकी मोटाई 70 किलोमीटर तक है | यह
परत हल्की चट्टानों से बनी है | इसका औसत घनत्व 3 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (3g/cm3)है |
महासागरों के नीचे इसका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन
सेंटीमीटर (2.7g/cm3) है | महासागरों के नीचे ए परत बेसाल्ट से निर्मित है |
मैंटल
भू पर्पटी के नीचे कि परत कों मैंटल के नाम से
जाना जाता है | मोहो असांतत्य (Moho Discontinuity) से
लेकर 2900 किलोमीटर की गहराई तक इस परत कों माना गया है |
इस परत के ऊपरी भाग कों दुर्बलता मंडल (Asthenosphere) या ऐस्थेनोस्फेयर
भी कहते है | ऐस्थेनो शब्द का अभिप्राय दुर्बलता से है | इस दुर्बलता मंडल
कों 400 किलोमीटर का गहराई तक माना जाता है | ज्वालामुखी विस्फोट के समय जो लावा
धरातल पर निकलता है उसका स्त्रोत दुर्बलता मंडल कों ही माना जाता है | निचले मैंटल
का विस्तार दुर्बलता मंडल के समाप्त होने के बाद शुरू होता है | निचला मैंटल ठोस
अवस्था में है |
भू पर्पटी तथा मैंटल का ऊपरी भाग (दुर्बलता
मंडल) मिलकर स्थल मंडल (Lithosphere)का निर्माण करते है | स्थल
मंडल की मोटाई किलोमीटर से किलोमीटर के बीच पाई जाती है |
इस परत का घनत्व भू पर्पटी से अधिक है | इसका
औसत घनत्व 3.4 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (3.4g/cm3)है
|
क्रोड
मैंटल परत 2900 किलोमीटर
तक ही पाई जाती है | इस गहराई के बाद की परत कों
क्रोड (Core) कहते है | इस परत के भी दो भाग है |
बाह्य क्रोड (Outer Core) तथा आंतरिक क्रोड (Inner
Core) | वैज्ञानिकों के अनुसार बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है |
जबकि आंतरिक क्रोड ठोस अवस्था में है | भूकम्पीय तरंगों के व्यवहार तथा उनके वेग ने क्रोड कों समझने में
बहुत अधिक सहायता प्रदान की है |
मैंटल तथा क्रोड की सीमा पर घनत्व 5 ग्राम प्रति
घन सेंटीमीटर है | जबकि केन्द्र में 6300 किलोमीटर की गहराई
पर यह लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर हो जाता है | इससे
यह स्पष्ट होता है कि क्रोड भारी पदार्थों का बना है | जिसमें निकिल (Nikile) तथा लौह (Ferrum) अधिक मात्रा में विद्यमान है |
इसलिए इस परत कों निफे (Nife) भी कहते है |
ज्वालामुखी (Volcano) किसे कहते हैं ?
ज्वालामुखी वह स्थान है जहाँ से निकलकर गैसें, राख और तरल चट्टानी पदार्थ (लावा) पृथ्वी के आंतरिक
भाग से निकल कर धरातल तक पहुँचता है |
ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) से आप क्या समझते हैं ?
वह प्राकृतिक क्रिया जिसके द्वारा गैसें, राख
और तरल चट्टानी पदार्थ (लावा) पृथ्वी
के आंतरिक भाग से निकल कर धरातल तक
पहुँचता है | ज्वालामुखी क्रिया कहलाती है | यह पृथ्वी पर होने वाली आकस्मिक घटना
है | इससे भू पटल पर अचानक विस्फोट होता है |
प्रश्न : मैग्मा किसे कहते हैं ?
उत्तर: पृथ्वी के आंतरिक भाग में पिघली हुई
अवस्था में जो पदार्थ होता है उसे मैग्मा कहते हैं |
प्रश्न : लावा किसे कहते हैं ?
उत्तर : पृथ्वी के आंतरिक भाग में पिघली हुई
अवस्था में विद्यमान मैग्मा जब ज्वालामुखी उद्गार के बाद पृथ्वी के धरातल पर आता
है तो उसे लावा कहते हैं |
प्रश्न : निकास नलिका को परिभाषित
कीजिए |
उत्तर: ज्वालामुखी क्रिया के दौरान सभी पृथ्वी
के आंतरिक भाग के पदार्थ एक प्राकृतिक नली द्वारा बाहर निकलते हैं इस नली को निकास
नलिका कहते है |
प्रश्न : विवर या क्रेटर या शंकु क्या
है ?
उत्तर : पृथ्वी के आंतरिक भाग का मैग्मा
पृथ्वी के धरातल पर आने के लिए एक छिद्र बनाता है जिसे विवर या क्रेटर या शंकु कहते
है |
प्रश्न : गौण शंकु या परजीवी शंकु किसे कहते हैं ?
उत्तर : कई बार मैग्मा मुख्य नली के दोनों ओर
रंध्रों से होकर बाहर निकलने लगता है और
छोटे –छोटे शंकुओं का निर्माण करता है | जिन्हें गौण शंकु या परजीवी शंकु कहते है|
प्रश्न : सक्रियता के आधार पर
ज्वालामुखी के प्रकारों का वर्णन कीजिए ?
उत्तर : सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखी के
तीन प्रकार हैं | सक्रिय, प्रसुप्त और मृत ज्वालामुखी | इनका वर्णन निम्नलिखित है
|
सक्रिय ज्वालामुखी
वे ज्वालामुखी जिनमें
से लगातार विस्फोट होता ही रहता है | समय- समय पर इसमें से धुआं, लावा तथा अन्य
चट्टानी पदार्थ निकलते रहते है उन ज्वालामुखियों कों सक्रिय ज्वालामुखी कहते है |
दूसरे शब्दों में ऐसा ज्वालामुखी जिसमें से कुछ समय पहले ही चट्टानी पदार्थ बहार
निकला हो या निकल रहा हो सक्रिय ज्वालामुखी कहलाता है | जैसे :-इटली का माउंट एटना का ज्वालामुखी इस
तरह के ज्वालामुखी पिछले 2500 वर्षों से सक्रिय है
| सिसली द्वीप समूह का स्ट्राम्बोली का
ज्वालामुखी भी एक सक्रिय ज्वालामुखी है, जिसमें प्रत्येक 15 मिनट के बाद विस्फोट
होता है |
प्रसुप्त ज्वालामुखी
वे ज्वालामुखी जिनमें लंबे समय से कोई विस्फोट
नहीं हुआ होता लेकिन ऐसी संभावनाएँ होती है की ये कभी भी अचानक क्रियाशील हो सकते
है तो ऐसे ज्वालामुखी कों प्रसुप्त ज्वालामुखी कहते है | इस प्रकार के ज्वालामुखी
में जब भी विस्फोट होता है तो जान-माल की बहुत अधिक हानि होती है | इनओटी के
विस्फोट से जन-धन की बहुत अधिक हानि है | इटली का माउंट विसुवियस , जापान का
फ्यूजीयामा, इंडोनेशिया का क्राकाटाओ तथा भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप
समूह के नार्कोंडम द्वीप में स्थित दो
ज्वालामुखी प्रसुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण हैं |
मृत ज्वालामुखी
वे ज्वालामुखी जिनमें हजारों वर्षों से कोई विस्फोट
नहीं हुआ है और भविष्य में भी इनमें उद्भेदन होने की कोई सम्भावना है मृत
ज्वालामुखी कहलाते हैं | इनका मुख मिट्टी, लावा आदि से भर जाने से बंद हो जाता है
| मुख का गहरा क्षेत्र झील का रूप ले लेता है | म्यांमार का पोपा, इक्वेडोर का
चिम्बराजो, ईरान का देमबन्द तथा एंडीज पर्वतश्रेणी का एकांकागुआ का ज्वालामुखी आदि
मृत ज्वालामुखी के उदाहरण हैं |
प्रश्न : ज्वालामुखी उद्गार की
प्रवृति और धरातल पर विकसित आकृतियों के आधार पर ज्वालामुखियों को वर्गीकृत कीजिए
|
ज्वालामुखी उद्गार की प्रवृति और धरातल पर
विकसित आकृतियों के आधार पर ज्वालामुखियों को वर्गीकृत किया जाता है | उनमें से
मुख्य ज्वालामुखी निम्न प्रकार से हैं |
शील्ड ज्वालामुखी (Shield
Volcanoe)
(i)
बेसाल्ट प्रवाह को छोडकर, पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी
ज्वालामुखियों में शील्ड ज्वालामुखी सबसे विशाल है |
(ii)
ये ज्वालामुखी मुख्यत:
बेसाल्ट से निर्मित होते है जो तरल लावा के ठंडे होने से बनते है |
(iii)
यह लावा उद्गार के समय बहुत
तरल होता है | इसी कारण इन ज्वाला मुखियों का ढाल तीव्र नहीं होता |
(iv)
यदि किसी तरह निकास नलिका से
पानी इनके अन्दर चला जाता है तो ये ज्वालामुखी विस्फोटक भी हो जाते हैं | अन्यथा ये कम विस्फोटक ही होते हैं |
(v)
इन ज्वालामुखियों से लावा
फव्वारे के रूप में बहार आता है और निकास पर एक शंकु (Cone)
बनता है जो सिंडर शंकु (Cindar Cone) के रूप
में विकसित होता है |
(vi)
हवाई द्वीप के ज्वालामुखी
शील्ड ज्वालामुखी के सबसे अच्छे उदाहरण है |
मिश्रित ज्वालामुखी (Composite
Volcanoes)
(i)
इन ज्वालामुखियों से बेसाल्ट
की अपेक्षा अधिक ठंडे व श्यान (गाढ़ा या चिपचिपा) लावा बाहर निकलता है |
(ii)
प्राय: ये ज्वालामुखी भीषण
विस्फोटक होते हैं |
(iii)
इनसे लावा के साथ भारी
मात्रा में ज्वलखंड़ाश्मि (Pyroclastic) पदार्थ व राख भी
धरातल पर पहुँचती है |
(iv)
यह पदार्थ निकास नली के आस –पास
परतों के रूप में जमा हो जाते हैं | जिनके जमाव मिश्रित ज्वालामुखियों के रूप में
दिखते हैं |
ज्वालामुखी कुण्ड (Caldedra)
(i)
ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले
सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी हैं |
(ii)
आमतौर पर ये इतने विस्फोटक
होते हैं कि जब इनमें विस्फोट होता है तब वे ऊँचा ढाँचा बनाने के बजाय स्वयं नीचे
धँस जाते हैं |
(iii)
धंसे हुए विध्वंस गर्त (लावा
के गिरने से जो गड्डे बनते है ) उन्हें ही ज्वालामुखी कुण्ड कहा जाता है |
(iv)
इन ज्वालामुखियों का
विस्फोटक रूप बताता है कि इन्हें लावा प्रदान करने वाले मैग्मा के भण्डार न केवल
विशाल हैं, बल्कि इनके बहुत पास भी स्थित
हैं |
(v)
इनके द्वारा निर्मित पहाड़ी
मिश्रित ज्वालामुखी की तरह प्रतीत होती है |
बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र (Flood
Basalt Provinces)
(i)
ये ज्वालामुखी अत्यधिक तरल
लावा का उद्गार करते हैं | जो बहुत दूर तक बह निकलता है |
(ii)
संसार के कुछ भाग हजारों
वर्ग किलोमीटर घने लावा प्रवाह से ढके हैं |
(iii)
इनमें लावा प्रवाह
क्रमानुसार होता है | जिनमें कुछ प्रवाह 50 मीटर से भी
अधिक मोटे हो जाते हैं |
(iv)
कई बार अकेला प्रवाह सकड़ों
किलोमीटर दूर तक फ़ैल जाते हैं |
(v)
भारत का दक्कन ट्रैप, जिस पर
वर्तमान महाराष्ट्र का पठार का अधिकतर भाग पाया जाता है, बृहत बेसाल्ट लावा प्रवाह
क्षेत्र है | ऐसा विश्वास किया जाता है कि आज की अपेक्षा, आरम्भ में एक अधिक बृहत
क्षेत्र इस प्रवाह से ढका हुआ था |
मध्य महासागरीय कटक ज्वालामुखी (Mid-Ocean
Ridge Volcanoes)
(i)
इन ज्वालामुखियों का उद्गार
महासागरों में होता है |
(ii)
मध्य महासागरीय कटक एक
श्रंखला है जो 70000 किलोमीटर से अधिक लम्बी है और जो सभी महासागरीय
बेसिनों में फैली है |
(iii)
इस कटक के मध्यवर्ती भाग में
लगातार उद्गार होता रहता है |
प्रश्न : ज्वालामुखी उद्गार से निर्मित शैलो के प्रकारों का उल्लेख कीजिए ?
उत्तर : ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है
उसके ठंडा होने पर आग्नेय शैलों का निर्माण होता है | लावा का यह जमाव धरातल के
नीचे तथा धरातल पर पहुँच कर दोनों ही प्रकार से होता है | इस प्रकार लावा के ठंडे
होने के स्थान के आधार पर आग्नेय शैलें दो प्रकार की होती है | ज्वालामुखी
शैल तथा पतालीय शैल | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित लिखित है |
ज्वालामुखी शैल
जब
लावा धरातल पर पहुँच कर ठंडा होता है तो उससे बनी शैलों कों ज्वालामुखी शैल कहते
है | इन्हें शैलों में बनी आकृतियों कों बहिर्वेधी ज्वालामुखीय आकृतियों के नाम से
जाना जाता है |
पातालीय शैल
जब लावा धरातल पर पहुँचने से पहले ही ठंडा
होकर जम जाता है तो उससे बनी शैलों कों पातालीय
शैल कहते है | इन शैलों में कई प्रकार की आकृतियाँ बनती है जिन्हें
अंतर्वेधी ज्वालामुखीय आकृतियों के नाम से भी जाना जाता है | जिनमें बैथोलिथ,
लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ सिल, शीट तथा डाईक आदि प्रमुख है | इनका संक्षिप्त
वर्णन निम्नलिखित है |
प्रश्न : अंतर्वेधी आकृतियों से आप
क्या समझते हैं ? ज्वालामुखी द्वारा निर्मित विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियों का
संक्षेप में वर्णन कीजिए ?
जब लावा धरातल पर पहुँचने से पहले ही ठंडा
होकर जम जाता है तो उससे बनी शैलों कों पातालीय
शैल कहते है | इन शैलों में कई प्रकार की आकृतियाँ बनती है जिन्हें
अंतर्वेधी ज्वालामुखीय आकृतियों के नाम से भी जाना जाता है | जिनमें बैथोलिथ,
लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ सिल, शीट तथा डाईक आदि प्रमुख है | इनका संक्षिप्त
वर्णन निम्नलिखित है |
(i)
बैथोलिथ
यदि
मैग्मा का बड़ा पिंड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह गुम्बद के आकार
में विकसित हो जाता है तो उसे बैथोलिथ
कहते है | ये ग्रेनाईट के बने होते हैं | अनाच्छादन प्रक्रियाओं के द्वारा जब ऊपरी
चट्टानी पदार्थ अपरदित हो जाता है तो ये धरातल पट प्रकट हो जाते है | ये विशाल
क्षेत्र में फैले होते हैं | कभी –कभी इनकी गहराई कई किलोमीटर तक होती है |
(ii)
लैकोलिथ
ये गुम्बदनुमा अंतर्वेधी चट्टानें हैं जिनका
तल समतल व एक पाईपरूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है | इनकी ढाल उत्तल होती है
| इनकी आकृति धरातल पर पाए जाने वाले मिश्रित
ज्वालामुखी के गुम्बद से मिलती है | ये सिर्फ अवसादी चट्टानों में मैग्मा के जमाव
से बनता है | अन्तर केवल इतना ही है कि मिश्रित ज्वालामुखी धरातल पर बनता है जबकि
लैकोलिथ धरातल के नीचे गहराई में बनता है |
(iii)
लैपोलिथ
जब मैग्मा का जमाव धरातल के नीचे अवतल ढाल
वाली छिछली बेसिन में होता है तब उसे लैपोलिथ कहते है | यह तश्तरी के आकार का होता
है |
(iv)
फैकोलिथ
ज्वालामुखी उद्गार से प्राप्त मैग्मा मोड़दार
पर्वतों के अपनति तथा अभिनति में जमा हो जाता है तो एक लहर युक्त आकृति का निर्माण
होता है जिसे फैकोलिथ कहते है |
(v)
सिल तथा शीट
जब मैग्मा अवसादी या रूपांतरित चट्टानों में
ठंडा होकर लगभग क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में जमा हो जाता है और मोटाई अधिक
होती है तो इस आकृति कों सिल कहते है | इस
तरह के जमाव वाली आकृति जो कम मोटाई वाली होती है तो उसे शीट कहते है |
(vi)
डाईक
जब मैग्मा का प्रवाह दरारों में धरातल के लगभग
समकोण की ओर होता है और इसी अवस्था में यह ठंडा हो जाता है तो एक दीवार की तरह की
आकृति बनाता है जिसे डाईक कहते है |
प्रश्न 1: निम्नलिखित
में से कौन भूगर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधन है ?
|
क).
भूकम्पीय तरंगे |
ख).
गुरुत्वाकर्षण बल |
|
ग).
ज्वालामुखी |
घ).
पृथ्वी का चुम्बकत्व |
उत्तर:
ज्वालामुखी
प्रश्न 2 :दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है ?
|
क).
शील्ड |
ख).
मिश्र |
|
ग).
प्रवाह |
घ).
कुंड |
उत्तर : प्रवाह
प्रश्न 3: निम्नलिखित
में से कौन सा स्थलमंडल कों वर्णित करता है ?
|
क).
ऊपरी व निचली मैंटल |
ख).
भूपटल व क्रोड |
|
ग).
भूपटल व ऊपरी मैंटल |
घ).
मैटल व क्रोड |
उत्तर : भूपटल व ऊपरी मैंटल
प्रश्न 4: निम्न में
से कौन सी भूकम्पीय तरंगे चट्टानों में संकुचन तथा फैलाव लाती है ?
|
क).
P या प्राथमिक तरंगे |
ख).
S या गौण तरंगे |
|
ग).
धरातलीय तरंगें |
घ).
उपर्युक्त में से कोई नहीं |
उत्तर : P या प्राथमिक
तरंगे
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