अध्याय 3 भू
संसाधन तथा कृषि
कक्षा 12वीं
(भूगोल)
पुस्तक: भारत
अर्थव्यवस्था तथा लोग
भारत में भू उपयोग वर्गीकरण के महत्वपूर्ण तथ्य
1. भू
राजस्व विभाग भू –उपयोग संबंधी अभिलेख रखता है |
2. भू
–उपयोग संवर्गों का योग कुल प्रतिवेदन (रिपोर्टिंग) क्षेत्र के बराबर होता है | जो
कि भौगोलिक क्षेत्रों से भिन्न है |
3. भारत
की प्रशासकीय इकाइयों के भौगोलिक क्षेत्र की सही जानकारी देने का दायित्व भारतीय
सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) पर है | इसके लिए भारत का भू सर्वेक्षण विभाग
विशेष तरह के मानचित्र बनाता है जिन्हें स्थलाकृतिक मानचित्र कहते हैं |
4. भूराजस्व
तथा सर्वेक्षण विभाग दोनों में मूलभूत अन्तर यह है कि भूराजस्व द्वारा प्रस्तुत
क्षेत्रफल पत्रों के अनुसार रिपोर्टिग क्षेत्र पर आधारित है | जो कि कम या अधिक हो
सकती है | जबकि कुल भौगोलिक क्षेत्र भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सर्वेक्षण पर
आधारित है तथा यह स्थाई है |
प्रश्न: भारत में भू राजस्व विभाग द्वारा भू-उपयोग वर्गीकरण कों वर्णन करें |
उत्तर:
भू राजस्व विभाग द्वारा अभिलेख किया गया भू –उपयोग वर्गीकरण का उल्लेख निम्न प्रकार से है |
वनों के अधीन क्षेत्र (Area
under Forest ) :
यह
जानना आवश्यक है कि वर्गीकृत वन क्षेत्र तथा वनों के अंतर्गत वास्तविक क्षेत्र
क्षेत्र दोनों अलग हैं | सरकार द्वारा वर्गीकृत वन क्षेत्र का सीमांकन इस प्रकार
किया कि जहाँ वन विकसित हो सकते हैं वह वन के अधीन क्षेत्र हैं | भू –राजस्व
अभिलेखों में इसी परिभाषा कों सतत अपनाया गया है | इस प्रकार इस संवर्ग के
क्षेत्रफल में वृद्धि दर्ज हो सकती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वहाँ
वास्तविक रूप से वन पाए जायेंगे |
बंजर
व व्यर्थ –भूमि (Barren and wastelands) :
वह
भूमि जो प्रचलित प्रौद्योगिकी मदद से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती, जैसे –बंजर
पहाड़ी भू भाग, मरुस्थल, खड्ड आदि कों कृषि
अयोग्य व्यर्थ –भूमि में वर्गीकृत किया गया है |
गैर
कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि (Land put to
Non-agricultural uses) :
इस संवर्ग में बस्तियाँ (ग्रामीण व शहरी)
अवसंरचना, (सडकें, नहरे आदि ) उद्योगों, दुकानों आदि हेतु भू –उपयोग सम्मलित हैं | द्वितीयक व तृतीयक कार्यकलापों
में वृद्धि से इस संवर्ग के भू –उपयोग में वृद्धि होती है |
स्थाई
चरागाह क्षेत्र (Permanent pastures) :
इस
प्रकार की अधिकतर भूमि पर ग्राम पंचायत या सरकार का स्वामित्व होता है | इस भूमि
का केवल एक छोटा भाग निजी स्वामित्व में होता है | ग्राम पंचायत के स्वामित्व वाली
भूमि कों ‘साझा संपत्ति संसाधन’ कहा जाता है |
विवध
तरु –फसलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र (Area
under miscellaneous tree crops and groves) :
इस
संवर्ग में वह भूमि सम्मिलित है जिस पर उद्यान व फलदार वृक्ष हैं | यह भूमि बोये
गए निवल क्षेत्र में सम्मिलित नहीं की जाती है |
इस प्रकार की अधिकतर भूमि व्यक्तियों के निजी स्वामित्व में हैं |
कृषि
योग्य व्यर्थ भूमि (Culturable waste land) :
वह
भूमि जो पिछले पाँच वर्षों तक या अधिक समय
तक परती या कृषि रहित है, इस संवर्ग में सम्मिलित की जाती है | भूमि उद्धार तकनीक
द्वारा इसे सुधार कर कृषि योग्य बनाया जा सकता है |
वर्तमान
परती भूमि (Current Fallow):
वह
भूमि जो एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित रहती है, वर्तमान परती भूमि
कहलाती है | भूमि की गुणवत्ता बनाए रखने हेतु भूमि का परती रखना एक सांस्कृतिक चलन
है | इस विधि से भूमि की क्षीण हुई उर्वरता या पौष्टिकता प्राकृतिक रूप से वापस आ
जाती है |
पुरातन
परती भूमि (Fallow land other than current fallow)
यह
भी कृषि योग्य भूमि है जो एक वर्ष से अधिक लेकिन पाँच वर्षों से कम समय तक कृषि
रहित रहती है | अगर कोई भू भाग पाँच वर्ष से अधिक समय तक कृषि रहित रहता है तो इसे
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में शामिल कर दिया जाता है |
निवल
(शुद्ध) बोया गया क्षेत्र (Net Area Sown):
वह
भूमि जिस पर वर्ष में कम से कम एक बार खेती की गई हो उसे निवल (शुद्ध) बोया गया
क्षेत्र कहते है |
प्रश्न : सकल बोया गया क्षेत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब शुद्ध बोया गया क्षेत्र में उसे क्षेत्र कों भी जोड़ दिया जाता है जिस पर एक से
अधिक बार फसल उगाई गई हो तो उसे सकल बोया गया क्षेत्र कहते है |
प्रश्न: किसी भी क्षेत्र में भू –उपयोग किस पर निर्भर है ? भू –उपयोग
कों प्रभावित करने वाले अर्थव्यवस्था के तीन परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए |
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में भू –उपयोग, अधिकतर वहाँ की आर्थिक क्रियाओं की प्रवृति पर
निर्भर है | यद्यपि समय के साथ आर्थिक क्रियाओं में बदलाव आता रहता है | लेकिन
भूमि अन्य बहुत से संसाधनों की भाँति, क्षेत्रफल की दृष्टि से स्थायी है | इसलिए हमें
भू –उपयोग कों प्रभावित करने वाले अर्थव्यवस्था के तीन परिवर्तनों कों समझना चाहिए
| ये परिवर्तन निम्न प्रकार से हैं |
1. अर्थव्यवस्था
के आकार कों उत्पादित वस्तुओं तथा मूल्य के संदर्भ में समझा जाता है |
अर्थव्यवस्था का आकार समय के साथ बढ़ता है जो बढ़ती जनसँख्या बदलते आय –स्तर, उपलब्ध
प्रौद्योगिकी व इसी से मिलते –जुलते कारकों पर निर्भर है | परिणामस्वरूप समय के
साथ भूमि पर दबाव बढ़ता है तथा सीमांत भूमि कों भी प्रयोग में लाया जाता है |
2. दूसरा,
समय के साथ अर्थव्यवस्था की संरचना में भी बदलाव होता है | दूसरे शब्दों में,
द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रकों में,
प्राथमिक क्षेत्रक की अपेक्षा अधिक
तीव्रता से वृद्धि होती है | इस प्रकार के परिवर्तन भारत जैसे विकासशील देश में एक
सामान्य बात है | इस प्रक्रिया में धीरे –धीरे कृषि भूमि गैर –कृषि संबंधित
कार्यों में प्रयुक्त होती है | इस प्रकार के परिवर्तन शहरों के चारों तरफ अधिक तीव्र
हो रहे हैं जहाँ कृषि भूमि कों इमारतों के
लिए उपयोग किया जा रहा है |
3. तीसरा,
यद्यपि समय के साथ, कृषि क्रियाकलापों का अर्थव्यवस्था में योगदान कम होता जाता है
| भूमि पर कृषि क्रियाकलापों का दबाव कम नहीं होता | कृषि –भूमि पर बढ़ते दबाव के
निम्नलिखित दो कारण हैं |
(अ) प्राय: विकासशील
देशों में कृषि पर निर्भर व्यक्तियों का अनुपात अपेक्षाकृत धीरे-धीरे घटता है जबकि
कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तीव्रता से कम होता है |
(ब) वह जनसंख्या जो कृषि क्षेत्रक पर निर्भर
होती है | प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है |
प्रश्न : भारत में
वर्ष 1950-51तथा 2019-20 के आँकड़ों के आधार भू उपयोग के संवर्गों में आए परिवर्तनों का उल्लेख
कीजिए |
उत्तर: पिछले चार या पाँच
दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रमुख बदलाव आए हैं | जिससे भारत के भू –उपयोग
परिवर्तन कों प्रभावित किया है | वर्ष 1950-51 तथा 2019-20 के आँकड़ों के
आधार पर इस परिवर्तन कों हम समझ सकते है | इन आँकड़ों से पता चलता है कि भू उपयोग
के पाँच संवर्गों में वृद्धि व चार संवर्गों के अनुपात में कमी दर्ज की गई है |
भू
उपयोग के पाँच संवर्ग जिनमें में वृद्धि दर्ज की गई
वन
क्षेत्र, गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि, स्थायी चरागाहें, वर्तमान परती भूमि
तथा निवल बोया गया क्षेत्र के इन पाँच संवर्गों के अनुपात में वृद्धि हुई है |
इनमें वृद्धि ने निम्न कारण हो सकते हैं |
(i)
गैर कृषि कार्यों में
प्रयुक्त क्षेत्र में वृद्धि दर अधिकतम है | इसका कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की
बदलती संरचना है, जिसकी निर्भरता औद्योगिक व सेवा सेक्टरों तथा अवसंरचना संबंधी
विस्तार पर उत्तरोत्तर बढ़ रही है | इसके अतिरिक्त गाँवों व शहरों में बस्तियों के
अंतर्गत क्षेत्रफल में विस्तार से भी इसमें वृद्धि हुई है | अत: गैर कृषि कार्यों
में प्रयुक्त भूमि का प्रसार कृषि योग्य व्यर्थ भूमि तथा कृषि भूमि की हानि पर हुआ
है |
(ii)
भू राजस्व विभाग के आँकड़ों
के अनुसार वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है परन्तु देश के वन क्षेत्र में यह वृद्धि
सीमांकन के कारण हुई है न कि देश में वास्तविक वन आच्छादित क्षेत्र के कारण |
(iii)
वर्तमान परती भूमि में
वृद्धि कों दो कारणों से समझा जा सकता है | वर्तमान परती भूमि क्षेत्र में समय
अनुसार काफी उतार –चढ़ाव की प्रवृति रही है तथा परती भूमि काफी हद तक वर्षा की
अनियमितता तथा फसल चक्र पर निर्भर है |
(iv)
कृषि हेतु कृषि योग्य व्यर्थ
भूमि के उपयोग के कारण निवल बोए गए क्षेत्र में वृद्धि एक वर्तमान घटना है | इससे
पहले निवल बोए गए क्षेत्र में धीमी गति से ह्रास दर्ज किया जाता रहा | ऐसे संकेत
हैं कि निवल बोए गए क्षेत्र कमी होने का कारण गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि
के अनुपात में वृद्धि थी |
भू
उपयोग के चार संवर्ग जिनमें में गिरावट दर्ज की गई
वे चार भू –उपयोग संवर्ग जिनमें क्षेत्रीय
अनुपात में गिरावट आई है उनमें बंजर व व्यर्थ भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, तथा
फसल वृक्षों के अंतर्गत क्षेत्र तथा पुरातन परती भूमि शामिल हैं | इनके अनुपात के
घटने की व्याख्या निम्न कारणों द्वारा की जा सकती है |
(i)
समय के साथ जैसे –जैसे कृषि
तथा गैर –कृषि कार्यों हेतु भूमि पर दबाव बढ़ा,वैसे –वैसे बंजर एवं व्यर्थ भूमि एवं
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में समय अनुसार कमी इसकी साक्षी है |
(ii)
फसल वृक्षों के अधीन क्षेत्र
में कमी का मुख्य कारण कृषि भूमि पर बढ़ता दबाव
है |
प्रश्न: साझा संपत्ति संसाधन (Common
Property Resources) किस प्रकार निजी भू सम्पत्ति से भिन्न है ?
साझा संपत्ति संसाधनों का ग्रामीण
क्षेत्रों में भूमिहीन छोटे किसानों तथा महिलाओं के लिए क्या महत्व है ?
उत्तर:
भूमि के स्वामित्व के आधार पर इसे मौटे तौर पर दो वर्गों में बाँटा जाता है | निजी
भू संपत्ति तथा साझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources -
CPRs) |
(i)
पहले वर्ग की भूमि अर्थात
निजी भू सम्पत्ति पर व्यक्तियों का निजी स्वामित्व अथवा कुछ व्यक्तियों का
सम्मिलित निजी स्वामित्व होता है |
(ii)
दूसरे वर्ग की भूमियाँ
अर्थात साझा संपत्ति संसाधन सामुदायिक उपयोग हेतु राज्यों के स्वामित्व में होती
हैं |
साझा
संपत्ति संसाधनों का महत्व
(i)
साझा संपत्ति संसाधन –पशुओं
के लिए चारा, घरेलु उपयोग हेतु ईंधन, लकड़ी तथा साथ ही अन्य वन उत्पाद जैसे- फल,
रेशे, गिरी,औषधीय पौधे आदि उपलब्ध कराती है |
(ii)
ग्रामीण क्षेत्रों में
भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के जीवन
यापन में इन भूमियों का विशेष महत्व है | क्योंकि इनमें से अधिकतर भूमिहीन होने के
कारण पशुपालन से प्राप्त आजीविका पर निर्भर हैं |
(iii)
महिलाओं के लिए भी इन भूमियों का विशेष महत्व है क्योंकि ग्रामीण
इलाकों में चारा व ईंधन की लकड़ी एकत्रीकरण की जिम्मेदारी महिलाओं की होती है | इन
भूमियों की कमी से उन्हें चारे तथा ईंधन की तलाश मन दूर तक भटकना पड़ता है |
(iv)
साझा संपत्ति संसाधनों कों
सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन भी कहा जा सकता है | जहाँ सभी सदस्यों कों इसके उपयोग
का अधिकार होता है | तथा इन संसाधनों पर किसी विशेष के संपत्ति अधिकार न होता
बल्कि सभी सदस्यों के कुछ विशेष कर्तव्य भी होते हैं |
(v)
सामुदायिक वन, चरागाहों,
ग्रामीण जलीय क्षेत्र तथा अन्य सार्वजनिक स्थान साझा संपत्ति संसाधन के ऐसे उदाहरण
हैं जिसका उपयोग एक परिवार से बड़ी इकाई करती है तथा यही उसके प्रबंधन के दायित्वों
का निर्वहन करती हैं |
प्रश्न: भारत में
कृषि भूमि अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं ?
उत्तर: भारत में कृषि भूमि
का महत्व बहुत अधिक है जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है |
(i)
भू –संसाधनों का महत्व उन
लोगों के लिए अधिक है जिनकी आजीविका कृषि पर निर्भर है |
(ii)
द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक
क्रियाओं की अपेक्षा कृषि पूर्णतया भूमि पर आधारित है | अन्य शब्दों में, कृषि
उत्पादन में भूमि का योगदान अन्य सेक्टरों में इसके योगदान से अधिक है | अत:
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीनता प्रत्यक्ष रूप से वहाँ की गरीबी से सम्बन्धित है |
(iii)
भूमि की गुणवत्ता कृषि
उत्पादकता कों प्रभावित करती है जो अन्य कार्यों में नहीं हैं |
(iv)
ग्रामीण क्षेत्रों में भू –स्वामित्व
का आर्थिक मूल्य के अतिरिक्त सामाजिक मूल्य भी है तथा प्राकृतिक आपदाओं या निजी
विपत्ति में एक सुरक्षा की भाँती है | यह समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाता है |
प्रश्न: भारत में कृषि भू –उपयोग के अंतर्गत किस संवर्ग की भूमि कों
शामिल किया जाता है ? भारत में भूमि बचत प्रौद्योगिकी विकसित करना आज अत्यंत
आवश्यक है क्यों ? भूमि बचत प्रौद्योगिकी
के तरीकों कों उल्लेख कीजिए |
उत्तर:
समस्त कृषि भूमि संसाधनों का अनुमान (अर्थात समस्त कृषि योग्य भूमि), निवल बोया
गया क्षेत्र तथा सभी प्रकार की परती भूमि और कृषि योग्य व्यर्थ भूमियों के योग से
लगाया जा सकता है | नीचे दी गई तालिका से हम कृषि भू उपयोग कों समझ सकते हैं |
तालिका:
भारत में समस्त कृषि योग्य भूमि की संरचना
|
कृषि योग्य भू
उपयोग |
रिपोर्टिंग क्षेत्रफल का प्रतिशत |
समस्त कृषि योग्य भूमि का प्रतिशत |
||
|
वर्ग |
1950 -51` |
2019 -20 |
1950 -51` |
2019 -20 |
|
कृषि योग्य व्यर्थ
भूमि |
8.0 |
3.9 |
13.4 |
6.8 |
|
पुरातन परती भूमि |
6.1 |
3.7 |
10.2 |
6.4 |
|
वर्तमान परती भूमि |
3.7 |
4.5 |
6.2 |
7.8 |
|
निवल बोया गया
क्षेत्र |
41.7 |
45.6 |
70.0 |
79.0 |
|
सकल कृषि योग्य
भूमि |
59.5 |
57.7 |
100.00 |
100.00 |
ऊपर
दी गई तालिका से निष्कर्ष निकलता है कि पिछले वर्षों में समस्त रिपोर्टिंग क्षेत्र
से कृषि भूमि का प्रतिशत कम हुआ है | कृषि योग्य व्यर्थ भूमि संवर्ग में कमी के
बावजूद कृषि योग्य भूमि में कमी आई है | तालिका से स्पष्ट होता है कि भारत में
निवल बोए गए क्षेत्र में बढ़ोतरी की सम्भावनाएँ सीमित हैं | अत: भूमि बचत
प्रौद्योगिकी विकसित करना आज अत्यंत आवश्यक है |
भूमि
बचत प्रौद्योगिकी दो भागों में बाँटी जा सकती है |
पहली
वह जो प्रति इकाई भूमि में फसल विशेष की उत्पादकता बढ़ाएँ तथा दूसरी वह
प्रौद्योगिकी जो एक कृषि वर्ष में गहन भू –उपयोग से सभी फसलों का उत्पादन बढ़ाएँ |
दूसरी प्रौद्योगिकी का लाभ यह है कि इसमें सीमित भूमि से भी कुल उत्पादन बढ़ने के
साथ श्रमिकों कि माँग भी पर्याप्त रूप से बढ़ती है |
भारत
जैसे देश में भूमि की कमी तथा श्रम की अधिकता है, ऐसी स्थिति में फसल सघनता की
आवश्यकता केवल भू –उपयोग हेतु वांछित है अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी
जैसी आर्थिक समस्या कों भी कम करने के लिए आवश्यक है |
प्रश्न: फसल या
शस्य गहनता कों कैसे ज्ञात किया जाता है ?
उत्तर : फसल गहनता की गणना
निम्न प्रकार से की जाती है |
कृषि
(फसल) गहनता = सकल बोया गया क्षेत्र x100/ निवल
बोया गया क्षेत्र
प्रश्न: भारत में फसली ऋतुओं का वर्णन कीजिए ?
क्या दक्षिणी भारत में भी ये सभी ऋतुएँ पाई जाती है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क
दें |
उत्तर: हमारे देश के उत्तरी व आंतरिक भागों में तीन प्रमुख
फसल ऋतुएँ पाई जाती है| जो खरीफ,रबी व जायद के नाम से जानी जाती है |
(i)
खरीफ ऋतु जून से सितम्बर तक होती है | इस ऋतु
की फसलें अधिकतर दक्षिण –पश्चिम मानसून के साथ बोई जाती हैं | जिसमें उष्ण
कटिबंधीय फसलें सम्मिलित हैं, जैसे चावल, कपास, जूट , ज्वार, बाजरा तथा अरहर शामिल
हैं |
(ii)
रबी ऋतु की अक्टूबर –नवम्बर में शरद ऋतु से
प्रारम्भ होकर मार्च –अप्रैल में समाप्त होती हैं | इस समय तापमान शीतोष्ण तथा
उपोष्ण कटिबंधीय फसलों जैसे गेहूँ , चना तथा सरसों आदि फसलों की बुवाई में सहायक
है |
(iii)
जायद एक अल्पकालिक ग्रीष्मकालीन फसली ऋतु है |
जो रबी की फसल की कटाई के बाद प्रारम्भ होती है | इस ऋतु में तरबूज, खीरा, ककड़ी,
सब्जियाँ व चारे की फसलों की कृषि सिंचित भूमि पर की जाती है |
(iv)
भारत के दक्षिणी भागों में इस प्रकार की अलग –अलग
ऋतुएँ नहीं पाई जाती | यहाँ का अधिकतम तापमान वर्षभर किसी भी उष्णकटिबंधीय फसल की
बुवाई में सहायक है, इसके लिए पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध होनी चाहिए | इसलिए देश के
इस भाग में जहाँ भी पर्याप्त मात्रा में सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हैं वहाँ एक वर्ष
में एक ही फसल तीन बार उगाई जा सकती है |
तालिका :
भारतीय कृषि ऋतु और उनकी फसलें
|
कृषि
ऋतु |
उत्तरी
भारत के राज्यों की प्रमुख फसलें |
दक्षिणी
भारत के राज्यों की प्रमुख फसलें |
|
खरीफ
(जून से सितम्बर) |
चावल,
कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, तथा अरहर (तुर) |
चावल,
मक्का, रागी, ज्वार तथा मूँगफली |
|
रबी
(अक्टूबर से मार्च) |
गेंहूँ,
चना, तोरई, सरसों तथा जौ |
चावल
तथा मक्का रागी, तथा मूँगफली |
|
जायद
(अप्रैल से जून)
|
वनस्पति,
सब्जियाँ, फल तथा चारा फसलें |
चावल,
सब्जियाँ तथा चारा फसलें |
प्रश्न: आर्द्रता के प्रमुख उपलब्ध स्त्रोत के
आधार पर कृषि भारत में कृषि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए ?
उत्तर: आर्द्रता के प्रमुख उपलब्ध स्त्रोत के आधार पर कृषि
कों सिंचित कृषि तथा वर्षा निर्भर (बारानी कृषि) में वर्गीकृत किया जाता है |
सिंचित कृषि
सिंचित कृषि में भी सिंचाई के उद्देश्य के आधार पर अन्तर
पाया जाता है | जिससे इसे दो भागों में
बाँटा जाता है | –रक्षित सिंचाई कृषि तथा उत्पादक सिंचाई कृषि |
रक्षित सिंचाई कृषि
रक्षित सिंचाई कृषि का मुख्य उद्देश्य आर्द्रता की कमी के
कारण फसलों कों नष्ट होने से बचाना है | जिसका अभिप्राय यह है कि वर्षा के
अतिरिक्त जल की कमी कों सिंचाई द्वारा पूरा किया जाता है | इस प्रकार की सिंचाई का
उद्देश्य अधिकतम क्षेत्र कों पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध कराना है |
उत्पादक सिंचाई कृषि
उत्पादक सिंचाई कृषि का उद्देश्य फसलों कों पर्याप्त
मात्रा में पानी उपलब्ध कराकर अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करना है | उत्पादक सिंचाई
में जल निवेश की मात्रा रक्षित सिंचाई की अपेक्षा अधिक होती है |
वर्षा निर्भर कृषि
वर्षा निर्भर कृषि या
बरानी कृषि भी कृषि ऋतु में आर्द्रता की मात्रा के आधार पर दो वर्गों में
बाँटी जाती है | शुष्क भूमि कृषि तथा आर्द्र भूमि कृषि |
शुष्क भूमि
कृषि
भारत में शुष्क भूमि कृषि मुख्यत: उन प्रदेशों तक सीमित है
जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर से कम है | इन क्षेत्रों में शुष्कता कों सहने में सक्षम फसलें
जैसे –रागी, बाजरा, मूँग, चना तथा ग्वार (चारा फसलें) आदि उगाई जाती है | इन
क्षेत्रों में आर्द्रता संरक्षण तथा वर्षा जल के प्रयोग की अनेक विधियाँ अपनाई
जाती हैं |
आर्द्र भूमि कृषि
आर्द्र भूमि कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा
ऋतु के समय वर्षा जल पौधों की जरूरत से अधिक होता है | ये प्रदेश बाढ़ तथा मृदा
अपरदन का सामना करते हैं | इन क्षेत्रों में वे फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें पानी
की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है| जैसे –चावल, जूट, गन्ना आदि | इनके अलावा
ताजा पानी की जल कृषि भी की जाती है |
प्रश्न: भारत में खाद्यान्न फसलों के का क्या महत्व है ?
उत्तर : भारतीय अर्थव्यवस्था में खाद्यान्नों के महत्व कों
इस तथ्य से मापा जा सकता है कि देश के समस्त बोये गए क्षेत्र के दो –तिहाई भाग पर
खाद्यान्न फसलें उगाई जाती हैं | देश के सभी भागों में खाद्यान्न फसलें प्रमुख
हैं, भले ही वहाँ जीविका –निर्वाह अर्थव्यवस्था हो या व्यापारिक कृषि अर्थव्यवस्था
हो |
अनाज की संरचना के आधार पर खाद्यान्नों कों अनाज तथा दालों
में वर्गीकृत किया जाता है |
प्रश्न : भारत में अनाज के उत्पादन के महत्वपूर्ण तथ्य बताएँ |
उत्तर : भारत में कुल बोये क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत
भाग पर अनाज बोये जाते हैं |
भारत विश्व का लगभग 11 प्रतिशत अनाज उत्पन्न करके
अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर है |
भारत विविध प्रकार के अनाजों का उत्पादन करता है | जिन्हें
उत्तम अनाजों (चावल तथा गेहूँ ) तथा मोटे अनाजों (ज्वार,
बाजरा, मक्का, तथा रागी) आदि में
वर्गीकृत किया जाता है |
मुख्य अनाजों का विवरण निम्न प्रकार है |
प्रश्न: भारत में चावल के उत्पादन का विस्तार से
वर्णन कीजिए |
उत्तर: भारत की अधिकतर जनसंख्या का प्रमुख भोजन चावल है |
(i)
यह एक उष्ण आर्द्र कटिबंधीय फसल है, इसकी अनेक
किस्में हैं जो विभिन्न कृषि जो विभिन्न कृषि जलवायु प्रदेशों में उगाई जाती है |
(ii)
इसकी कृषि समुद्र तल से 2000
मीटर तक की ऊँचाई तक एवं पूर्वी भारत के आर्द्र भागों से लेकर उत्तर –पश्चिमी भारत
के शुष्क परन्तु सिंचित क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व उत्तरी
राजस्थान में सफलतापूर्वक की जाती है |
(iii)
दक्षिणी राज्यों तथा पश्चिमी बंगाल में जलवायु
अनुकूलता के कारण एक कृषि वर्ष में चावल की दो या तीन फसलें बोई जाती है |
(iv)
पश्चिम बंगाल के किसान चावल की तीन फसलें लेते
हैं | जिन्हें - औस, अमन तथा बोरो कहा जाता है |
(v)
हिमालय तथा देश के उत्तर –पश्चिमी भागों में
यह दक्षिण-पश्चिन मानसून ऋतु में खरीफ की फसल के रूप में उगाई जाती है |
(vi)
भारत विश्व का 22.O7 प्रतिशत चावल
उत्पादन करता है |
(vii)
2018 के आँकड़ों के अनुसार चावल उत्पादन में चीन के बाद भारत का विश्व में
दूसरा स्थान है |
(viii)
देश के कुल बोये गए क्षेत्र के एक –चौथाई भाग
पर चावल बोया जाता है |
(ix)
देश के प्रमुख चावल उत्पादक राज्य पश्चिम
बंगाल, उत्तर प्रदेश,पंजाब हैं |
(x)
चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार
पंजाब,तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल तथा केरल राज्यों
में अधिक है | इसमें चार राज्यों पंजाब,तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, में
लगभग संपूर्ण चावल क्षेत्र सिंचित है |
(xi)
पंजाब व हरियाणा पारम्परिक रूप से चावल
उत्पादक राज्य नहीं हैं | हरित क्रांति के अंतर्गत हरियाणा, पंजाब के सिंचित
क्षेत्रों में चावल की कृषि 1970 से से प्रारम्भ की गई |
(xii)
उत्तम किस्म के बीजों, अपेक्षाकृत अधिक खाद
तथा कीटनाशकों का प्रयोग एवं शुष्क जलवायु के कारण फसलों में रोग प्रतिरोधकता आदि
कारक इस प्रदेश में चावल की अधिक पैदावार के लिए उत्तरदायी है |
(xiii) चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ व ओडिशा के वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में बहुत कम है |
प्रश्न: भारत में गेहूँ के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर: भारत में चावल के पश्चात गेहूँ दूसरा प्रमुख अनाज
है |
(i)
2017
के आँकड़ों के अनुसार भारत विश्व का 12.8
प्रतिशत गेहूँ उत्पादन करता है |
(ii)
यह मुख्यतः शीतोष्ण कटिबंधीय फसल है | अत: इसे
शरद ऋतु अर्थात रबी की ऋतु में बोया जाता है |
(iii)
इस फसल का 85 प्रतिशत क्षेत्र भारत
के उत्तरी मध्य भाग तक केंद्रित है अर्थात उत्तर गंगा का मैदान, मालवा का पठार तथा
हिमालय पर्वतीय श्रेणी में 2700 मीटर की ऊँचाई तक का क्षेत्र
इसमें शामिल है |
(iv)
रबी फसल होने के कारण यह सिंचाई की सुविधा
वाले क्षेत्रों में ही उगाया जाता है | लेकिन हिमालय के उच्च भागों में तथा मध्य
प्रदेश के मालवा के पठारी क्षेत्र में यह वर्षा पर निर्भर फसल है |
(v)
देश के कुल बोये गए क्षेत्र का लगभग 14 प्रतिशत
भाग पर गेहूँ की खेती की जाती है |
(vi)
गेहूँ के प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य
प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान हैं |
(vii)
पंजाब तथा हरियाणा में गेहूँ कि उत्पादकता
अधिक है जो कि लगभग 4000 किलोग्राम
प्रति हेक्टेयर है | जबकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान व बिहार में प्रति हेक्टेयर पैदावार
मध्यम स्तर की है |
मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू कश्मीर में गेहूँ की
कृषि वर्षा आधारित है तथा इन क्षेत्रों में उत्पादकता कम है |
प्रश्न: मोटे अनाज की फसलों से आप क्या समझते हैं ?भारत में ज्वार के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर: ज्वार,
बाजरा मक्का तथा रागी प्रमुख मोटे अनाज हैं | देश के कुल बोये गए
क्षेत्र के 16.5
प्रतिशत भाग पर मोटे अनाज
बोये जाते हैं | भारत में ज्वार के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i)
ज्वार मोटे अनाज की प्रमुख फसल है जो कुल बोये
गए क्षेत्र के 5.3 प्रतिशत भाग पर बोया जाता है |
(ii)
यह दक्षिण व मध्य भारत के अर्ध –शुष्क
क्षेत्रों की प्रमुख खाद्य फसल है |
(iii)
महाराष्ट्र राज्य अकेला देश की आधे से अधिक
ज्वार का उत्पादन करता है | अन्य प्रमुख ज्वार उत्पादक राज्यों में कर्नाटक, मध्य
प्रदेश आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना है |
(iv)
दक्षिण के राज्यों में यह खरीफ तथा रबी दोनों
ऋतुओं में बोया जाता है | परन्तु उत्तर भारत में यह खरीफ की फसल है तथा मुख्यत:
चारा फसल के रूप में उगाई जाती है |
(v)
विन्ध्याचल के दक्षिण में यह वर्षा आधारित फसल
है तथा यहाँ इसकी उत्पादकता कम है |
प्रश्न: मोटे अनाज की फसलों से आप क्या समझते हैं ? भारत में बाजरा के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर: ज्वार,
बाजरा मक्का तथा रागी प्रमुख मोटे अनाज हैं | देश के कुल बोये गए
क्षेत्र के 16.5
प्रतिशत भाग पर मोटे अनाज
बोये जाते हैं | भारत में बाजरा के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i) भारत के पश्चिम तथा उत्तर – पश्चिम भागों में गर्म तथा शुष्क जलवायु में बाजरा बोया जाता है | यह फसल इस क्षेत्र के शुष्क दौर तथा सूखा सहन करने में समर्थ है |
(ii)
यह एकल तथा मिश्रित फसल के रूप में बोया जाता
है |
(iii)
यह फसल देश के कुल बोये गए क्षेत्र के लगभग 5.2
प्रतिशत भाग पर बोई जाती है |
(iv)
बाजरा उत्पादक प्रमुख राज्य – महाराष्ट्र,
गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा है |
(v)
कुछ वर्षों से सूखा प्रतिरोधक किस्मों के आगमन
से तथा राजस्थान, गुजरात व हरियाणा में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से इस फसल की
पैदावार में वृद्दि हुई है |
प्रश्न: मोटे अनाज की फसलों से आप क्या समझते
हैं ? भारत में मक्का के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर: ज्वार,
बाजरा मक्का तथा रागी प्रमुख मोटे अनाज हैं | देश के कुल बोये गए
क्षेत्र के 16.5
प्रतिशत भाग पर मोटे अनाज
बोये जाते हैं | भारत में मक्का के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i) मक्का एक खाद्य तथा चारा फसल है | जो निम्न कोटि की मिट्टी व अर्ध शुष्क जलवायवी परिस्थितियों में उगाई जाती है |
(ii)
यह फसल कुल बोये गए क्षेत्र के 3.6 प्रतिशत भाग में बोई जाती है
|
(iii)
मक्का की कृषि किसी विशेष क्षेत्र में
केंद्रित नहीं है | यह पूर्वी तथा उत्तरी पूर्वी भारत कों छोडकर देश के लगभग सभी
हिस्सों में बोई जाती है |
(iv)
मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक, मध्य
प्रदेश,बिहार, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान व उत्तर प्रदेश हैं |
(v)
अन्य मोटे अनाजों की अपेक्षा मक्का की पैदावार
अधिक है |
(vi)
इसकी पैदावार दक्षिण के राज्यों में अधिक है
जो मध्य भागों की ओर कम होती जाती है |
प्रश्न: दलहन फसलों (दालों) से आप क्या समझते हैं ?भारत में दालों के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर : प्रचुर मात्रा में प्रोटीन के स्त्रोत होने के
कारण दालें शाकाहारी भोजन के प्रमुख संघटक हैं |
ये फलीदार फसलें है जो नाइट्रोजन योगीकरण के द्वारा मिट्टी
की प्राकृतिक उर्वरता कों बढ़ाती है |
भारत दालों का प्रमुख उत्पादक देश हैं |
देश में दालों की खेती अधिकतर दक्कन के पठार, मध्य पठारी
भागों तथा उत्तर – पश्चिम के शुष्क भागों में की जाती है |
देश के कुल बोये गए क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत
भाग दालों के अधीन है |
शुष्क क्षेत्रों में वर्षा आधारित फसल होने के कारण दालों
की उत्पादकता कम है तथा इसमें वार्षिक उतार –चढ़ाव पाया जाता है | चना तथा अरहर
भारत की प्रमुख दालें हैं | इनके अलावा मूंग, मसूर तथा उडद आदि दालें भी भारत में
उगाई जाती है |
चना
(i)
चना उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों की फसल है |
(ii)
यह मुख्यतः वर्षा आधारित फसल है जो देश के
मध्य, पश्चिमी तथा उत्तर –पश्चिमी भागों में रबी की ऋतु में बोई जाती है |
(iii)
इस फसल कों सफलतापूर्वक उगाने के लिए वर्षा की
केवल एक या दो बौछारों या एक या दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है |
(iv)
हरियाणा, पंजाब तथा उत्तरी राजस्थान में हरित
क्रांति की शुरुआत से चने के फसल क्षेत्रों में कमी आई है तथा इसके स्थान पर गेहूँ
की फसल बोई जाती है |
(v)
अब देश के कुल बोये क्षेत्र के केवल 2.8
प्रतिशत भाग पर ही चने की खेती की जाती है |
(vi)
इस फसल के प्रमुख उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश,
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तेलंगाना तथा राजस्थान हैं |
(vii)
इस फसल की उत्पादकता कम है तथा सिंचित
क्षेत्रों में भी इसकी उत्पादकता में एक वर्ष से दूसरे वर्ष के बीच उतार –चढ़ाव
पाया जाता है |
अरहर (तुर)
(i)
अरहर (तुर) देश की दूसरी प्रमुख दलहन फसल है |
इसे लाल चना तथा पिजन पी. (Pigeon Pea) के नाम से
भी जाना जाता है |
(ii)
यह देश के मध्य तथा दक्षिणी राज्यों के शुष्क
भागों में वर्षा-आधारित परिस्थितियों तथा सीमांत भूक्षेत्रों पर बोई जाती है |
(iii)
भारत के कुल बोए गए क्षेत्र के लगभग 2 प्रतिशत
भाग पर इसकी खेती की जाती है |
(iv)
देश के अरहर के कुल उत्पादन का लगभग एक तिहाई
भाग अकेले महाराष्ट्र से आता है | अन्य प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश, कर्नाटक,
गुजरात तथा मध्य प्रदेश हैं |
(v)
इस फसल की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता कम तथा
अनियमित है |
प्रश्न: तिलहन फसलों से आप क्या समझते हैं ?भारत में तिलहन फसलों के उत्पादन का विस्तार से वर्णन कीजिए |
उत्तर : जिन फसलों से हमें खाद्य तेल प्राप्त होता है
उन्हें तिलहन फसलें कहते हैं |
भारत में तिलहन फसलों के मुख्य
मालवा पठार, मराठावाड़ा, गुजरात, राजस्थान के शुष्क भागों,
तेलंगाना व आंध्रप्रदेश के रायलसीमा प्रदेश भारत के प्रमुख तिलहन उत्पादक क्षेत्र
हैं |
देश के कुल शस्य क्षेत्र के लगभग 14
प्रतिशत भाग पर तिलहन फसलें बोई जाती हैं |
भारत की प्रमुख तिलहन फसलों में मूँगफली, तोरिया, सरसों,
सोयाबीन तथा सूरजमुखी हैं | इनका वर्णन निम्नलिखित है |
मूँगफली
2018 के आँकड़ों के अनुसार भारत विश्व में 18.8 प्रतिशत
उत्पादन करता है | यह मुख्यत: शुष्क प्रदेशों की वर्षा –आधारित खरीफ ऋतु की फसल है
| परन्तु दक्षिणी भारत में यह रबी की ऋतु में बोई जाती है | यह देश के कुल शस्य
क्षेत्र के 3.6 प्रतिशत क्षेत्र पर उगाई जाती है | गुजरात,
राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश इसके अग्रणी उत्पादक राज्य हैं | तमिलनाडु में
जहाँ भी यह फसल आंशिक रूप से सिंचित है वहाँ इसकी पैदावार अपेक्षाकृत अधिक है |
परन्तु आंध्रप्रदेश तथा कर्नाटक में इसकी पैदावार कम है |
तोरिया व सरसों
(i)
तोरिया व सरसों में बहुत से तिलहन सम्मिलित
हैं | जैसे –राई, सरसों तोरिया व तारामीरा आदि |
(ii)
ये उपोष्ण कटिबंधीय फसलें है तथा भारत के मध्य
व उत्तर –पश्चिमी भाग में रबी की ऋतु में
बोई जाती है |
(iii)
ये फसलें पाला सहन नहीं कर सकतीं | इनके
उत्पादन में वार्षिक उतार-चढ़ाव रहते है | परन्तु सिंचाई के प्रसार, बीज सुधार तथा
प्रौद्योगिकी के साथ इनके उत्पादन में वृद्धि हुई है |
(iv)
इन फसलों के अंतर्गत क्षेत्र का लगभग दो –तिहाई
भाग सिंचित है | तिलहन देश के कुल शस्य क्षेत्र केवल लगभग 2.5
प्रतिशत भाग ही बोये जाते हैं |
(v)
इनके उत्पादन का एक –तिहाई भाग राजस्थान से
आता है | अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हरियाणा तथा मध्य प्रदेश हैं |
(vi)
इन फसलों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता हरियाणा
तथा पंजाब में अपेक्षाकृत अधिक है |
सोयाबीन
सोयाबीन अधिकतर मध्य प्रदेश व
महाराष्ट्र में बोया जाता है |
दोनों राज्य मिलकर देश का लगभग 90
प्रतिशत सोयाबीन पैदा करते हैं |
सूरजमुखी
सूरजमुखी की फसल का सांद्रण राजस्थान,
कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना तथा इससे जुड़े हुए महाराष्ट्र के भागों में
है |
देश के उत्तरी भागों मने यह एक गौण फसल
है लेकिन सिंचित क्षेत्रों में इनका उत्पादन अधिक हैं |
प्रश्न: रेशेदार फसलें कौन सी है ?
उत्तर: जो फसलें हमें कपड़ा, थैला, बोरा व अन्य कई प्रकार
का सामान बनाने के लिए रेशा प्रदान करती हैं | कपास तथा जूट भारत की दो प्रमुख
रेशेदार फसलें हैं |
भारत में कपास उत्पादन का उल्लेख कीजिए |
उत्तर: भारत में कपास के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से
समझ सकते हैं |
(i)
कपास एक उष्ण कटिबंधीय फसल है जो देश के अर्ध –शुष्क
भागों में खरीफ ऋतु में बोई जाती है |
(ii)
देश विभाजन के समय भारत का बहुत बड़ा कपास
उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया |
(iii)
यद्यपि पिछले 50 वर्षों में भारत में
इसके क्षेत्रफल में लगातार वृद्धि हुई है |
(iv)
भारत, छोटे रेशे वाली भारतीय (देशी) कपास व
लंबे रेशे वाली अमेरिकन कपास दोनों प्रकार की कपास का उत्पादन करता है |
(v)
अमेरिकन कपास कों देश के उत्तर –पश्चिमी भाग
में ‘नरमा’ कहा जाता है |
(vi)
कपास पर फूल आने के समय आकाश बादल रहित होना
चाहिए |
(vii)
काली मिट्टी इसकी फसल के लिए उत्तम मानी जाती
है |
(viii)
भारत का कपास के उत्पादन में विश्व में चीन के
बाद दूसरा स्थान है |
(ix)
देश के समस्त बोए गए क्षेत्र के लगभग 4.7
प्रतिशत क्षेत्र पर कपास बोया जाता है |
(x)
कपास के तीन मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं |
इसमें उत्तर –पश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा तथा उत्तरी राजस्थान | पश्चिमी भारत
में गुजरात तथा महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में तेलंगाना, कर्नाटक व तमिलनाडु के
पठारी भाग सम्मिलित हैं |
(xi)
कपास के अग्रणी उत्पादक राज्य –गुजरात,
महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा हैं |
(xii)
देश के उत्तरी –पश्चिमी सिंचाई की सुविधा वाले
भागों में कपास का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है | इसका उत्पादन महाराष्ट्र के
वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में बहुत कम है |
प्रश्न: भारत में जूट (पटसन ) उत्पादन पर नोट
लिखें |
उत्तर: भारत में जूट के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से
समझ सकते हैं |
(i)
जूट कों पटसन तथा सुनहरा रेशा के नाम से भी
जाना जाता है |
(ii)
जूट का प्रयोग मोटे वस्त्र, थैला, बोरे व अन्य
सजावटी सामान बनाने में किया जाता है |
(iii)
यह पश्चिम बंगाल तथा इससे संस्पर्शी पूर्वी
भागों की एक व्यापारिक फसल है |
(iv)
विभाजन के दौरान देश का विशाल जूट उत्पादक
क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में चला गया |
(v)
आज भारत विश्व का लगभग 60
प्रतिशत जूट का उत्पादन करता है |
(vi)
बिहार व आसाम अन्य जूट उत्पादक राज्य हैं |
(vii)
जूट भारत के कुल शस्य (फसली) क्षेत्र के 0.5 प्रतिशत भाग पर ही बोया जाता है |
प्रश्न : भारत में गन्ना उत्पादन
पर नोट लिखें |
उत्तर: भारत में गन्ने के उत्पादन कों हम निम्न तथ्यों से
समझ सकते हैं |
(i)
गन्ना एक उष्णकटिबन्धीय फसल है वर्षा पर निर्भर परिस्थितियों में यह केवल
आर्द्र व उपार्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में
बोई जा सकती है |
(ii)
परन्तु भारत में इसकी खेती अधिकतर सिंचित
क्षेत्रों में की जाती है |
(iii)
गंगा –सिंधु के मैदानी भाग में इसकी अधिकतर
बुवाई उत्तर –प्रदेश तक सीमित है |
(iv)
पश्चिम में गन्ना उत्पादक प्रदेश महाराष्ट्र व
गुजरात तक विस्तृत है |
(v)
दक्षिणी भारत में इसकी कृषि कर्नाटक,
तमिलनाडु, तेलंगाना व आन्ध्रप्रदेश के सिंचाई वाले भागों में की जाती है |
(vi)
2018
के अनुसार ब्राजील के बाद भारत दूसरा बड़ा गन्ना उत्पादक देश था |
यहाँ विश्व के 19.76 प्रतिशत गन्ने का उत्पादन होता है |
(vii)
देश के कुल शस्य क्षेत्र (फसली क्षेत्र) के 2.4
प्रतिशत भाग पर ही इसकी खेती की जाती है |
(viii)
उत्तर प्रदेश देश का 40 प्रतिशत
गन्ना उत्पादन करता है | इसके अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक
तमिलनाडु तथा आन्ध्रप्रदेश हैं | जहाँ इसका उत्पादन स्तर अधिक है | उत्तरी भारत
में इसका उत्पादन कम है |
प्रश्न :भारत में चाय उत्पादन
का वर्णन कीजिए |
उत्तर: भारत में चाय के उत्पादन कों हम निम्न
तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i)
चाय एक रोपण कृषि की फसल है | जो पेय पदार्थ
के रूप में प्रयोग की जाती है |
(ii)
काली चाय की पत्तियाँ किण्वित होती हैं | जबकि
चाय की हरी पत्तियाँ अकिण्वित होती हैं |
(iii)
चाय की पत्तियों में कैफीन तथा टैनिन की
प्रचुर मात्रा पाई जाती है |
(iv)
चाय उत्तरी चीन के पहाड़ी क्षेत्रों की देशज फसल है |
यह उष्ण आर्द्र तथा उपोष्ण आर्द्र कटिबंधीय जलवायु वाले तरंगित भागों पर अच्छे
अपवाह वाली मिट्टी में बोई जाती है |
(v)
भारत में चाय की खेती 1840
में असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में प्रारम्भ हुई जो आज भी देश का प्रमुख चाय उत्पादन
क्षेत्र है | बाद में इसकी कृषि पश्चिमी बंगाल के उप हिमालयी भागों (दार्जिलिंग,
जलपाईगुडी तथा कूच बिहार जिलों ) में प्रारम्भ की गई |
(vi)
दक्षिणी भारत में चाय की खेती पश्चिमी घाट की
नीलगिरी तथा इलायची की पहाड़ियों के निचले ढालों पर की जाती है |
(vii)
भारत चाय का अग्रणी उत्पादक देश है | यह विश्व
का 21.22
प्रतिशत चाय का उत्पादन
करता है | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय चाय का भाग घटा है | 2018 आँकड़ों के अनुसार चाय निर्यातक देशों में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान
है |
(viii)
असम के कुल क्षेत्र के 53.2 प्रतिशत
भाग पर चाय की कृषि की जाती है | देश के कुल उत्पादन में आधे से अधिक भाग असम में
पैदा होता है | चाय के अन्य महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य पश्चिमी बंगाल व तमिलनाडु है
|
प्रश्न : भारत में कॉफी उत्पादन
पर नोट लिखें |
उत्तर: भारत में कॉफी के उत्पादन कों हम निम्न
तथ्यों से समझ सकते हैं |
(i)
कॉफी एक उष्ण कटिबंधीय रोपण कृषि की फसल है |
(ii)
इसके बीजों कों भून कर पीसा जाता है तथा एक
पेय के रूप में प्रयोग किया जाता है |
(iii)
कॉफी की तीन किस्में हैं | जो अरेबिका,
रोबस्ता व लिबेरिका है |
(iv)
भारत अधिकतर उत्तम किस्म की ‘अरेबिका’ कॉफी का
उत्पादन करता है | जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत माँग है |
(v)
भारत में विश्व का केवल 3.17 प्रतिशत
कॉफी का उत्पादन होता है |
(vi)
2018
के आँकड़ों में अनुसार कॉफी के उत्पादन में ब्राजील, वियतनाम,
इन्डोनेशिया, कोलंबिया, होंडुरास, इथोपिया तथा पेरू के बाद भारत का विश्व में
आँठवा स्थान है |
(vii)
भारत में कर्नाटक, केरल व तमिलनाडु में
पश्चिमी घाट की उच्च भूमि पर कॉफी की खेती की जाती है |
(viii)
देश के समस्त कॉफी उत्पादन का दो – तिहाई से
अधिक भाग अकेले कर्नाटक राज्य होता है |
प्रश्न : भारत में कृषि विकास कों समझायें |
उत्तर: भारतीय कृषि के विकास कों हम विभिन्न काल खण्डों
में विभाजित करके समझ सकते है | जो निम्न लिखित हैं |
(i)
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले का समय
स्वतंत्रता
प्राप्ति से पहले भारतीय कृषि एक जीविकोपार्जी अर्थव्यवस्था जैसी थी | बीसवीं
शताब्दी के मध्य तक इसका प्रदर्शन बड़ा दयनीय था | यह समय भयंकर अकाल व सूखे का
साक्षी है | देश के विभाजन के दौरान लगभग एक –तिहाई सिंचित भूमि पाकिस्तान में चली
गई | परिणाम स्वरूप स्वतंत्र भारत में सिंचित क्षेत्र का अनुपात कम रह गया |
(ii)
स्वतंत्रता प्राप्ति से हरित क्रांति के बीच
का समय
स्वतंत्रता
प्राप्ति के बाद सरकार का तात्कालिक उद्देश्य खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाना था,
जिसमें निम्न उपाय अपनाए गए | (i) व्यापारिक फसलों की जगह
खाद्यान्नों का उगाया जाना | (ii) कृषि गहनता कों बढ़ाना तथा (iii) कृषि योग्य बंजर
तथा परती भूमि कों कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित करना | प्रारम्भ में इस नीति से
खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ा, लेकिन 1950 के दशक के अंत तक कृषि उत्पादन स्थिर हो गया |
इस
समस्या से उभरने के लिए सरकार ने गहन कृषि
जिला कार्यक्रम (IADP) तथा गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) नाम से दो
कार्यक्रम प्रारम्भ किए | परन्तु 1960 के दशक के मध्य में
लगातार दो अकालों से देश में अन्न का संकट उत्पन्न हो गया | परिणाम स्वरूप दूसरे
देशों से खाद्यान्नों का आयात करना पड़ा |
(iii)
हरित क्रांति का समय
1960 के दशक के मध्य में मैक्सिको से गेहूँ
तथा फिलीपिंस से चावल की बीज की किस्में उपलब्ध करवाई गई | ये अधिक उत्पादन
देने वाली बीजों की किस्में थी | भारत ने
इसका लाभ उठाया तथा पैकेज प्रौद्योगिकी (पैकेज टेक्नोलोजी) के रूप में पंजाब,
हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश तथा गुजरात के सिंचाई की सुविधा वाले
क्षेत्रों में, रासायनिक उर्वरक के साथ इन उच्च उत्पादकता की किस्मों (HYV) कों अपनाया | नई कृषि प्रौद्योगिकी की सफलता हेतु सिंचाई से निश्चित जल
आपूर्ति आपेक्षित थी | कृषि विकास की इस नीति से खाद्यान्नों के उत्पादन में
अभूतपूर्व वृद्धि हुई जो ‘हरित क्रान्ति’ के नाम से जानी जाती है |
हरित
क्रांति ने कृषि में प्रयुक्त कृषि निवेश , जैसे –उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र
आदि, कृषि आधारित उद्योगों तथा छोटे पैमाने के उद्योगों के विकास कों प्रोत्साहन
दिया | कृषि विकास की इस नीति से देश खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्म-निर्भर हुआ
| लेकिन प्रारम्भ में ‘हरित क्रान्ति’ देश के सिंचित भागों तक ही सीमित थी |
फलस्वरूप कृषि विकास में प्रादेशिक असमानता बढ़ी | ऐसा 1970 दशक
के अंत तक रहा | 1980 के आरम्भ व इसके बाद यह प्रौद्योगिकी
मध्य भारत तथा पूर्वी भारत के भागों में फैली |
(iv)
हरित क्रान्ति और उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के
बीच का समय
1980 के दशक में भारतीय योजना आयोग ने वर्षा आधारित क्षेत्रों की कृषि
समस्याओं पर ध्यान दिया | योजना आयोग ने 1988 में कृषि विकास
में प्रादेशिक संतुलन कों प्रोत्साहित करने हेतु कृषि जलवायु नियोजन प्रारम्भ किया
| इसने कृषि, पशुपालन तथा जल कृषि के विकास हेतु संसाधनों के विकास पर भी बल दिया
|
(v)
उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के बीच का समय
1990 के दशक की उदारीकरण नीति तथा उन्मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था (वैश्वीकरण की
अर्थव्यवस्था) ने भारतीय कृषि विकास कों भी प्रभावित किया है |
प्रश्न: भारत में कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा प्रौद्योगिकी का
विकास एक साथ हुआ है ? इस तथ्य कों स्पष्ट करने लिए तर्क दीजिए |
उत्तर:
(i)
पिछले पचास वर्षों में कृषि उत्पादन तथा
प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय बढोतरी हुई है |
(ii)
बहुत- सी फसलों जैसे –चावल तथा गेहूँ के
उत्पादन तथा पैदावार में प्रभावशाली वृद्धि हुई है | अन्य फसलों मुख्यत: गन्ना,
तिलहन तथा कपास के उत्पादन में प्रशंसनीय वृद्धि हुई है |
(iii)
सिंचाई के प्रसार ने देश में कृषि उत्पादन
बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | इसने आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी जैसे बीजों
की उत्तम किस्में, रासायनिक खादों, कीटनाशकों तथा मशीनरी के प्रयोग के लिए आधार
प्रदान किया है |
(iv)
देश के विभिन्न क्षेत्रों में आधुनिक कृषि
प्रौद्योगिकी का प्रसार तीव्रता से हुआ है |
(v)
पिछले 40 वर्षों में रासायनिक
उर्वरकों की खपत में भी 15 गुना वृद्धि हुई है |
(vi)
चूँकि उत्तम बीजों के किस्मों में कीट
प्रतिरोधकता कम है, अत: देश में 1960 के दशक से कीटनाशकों की खपत में भी
महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है |
प्रश्न: भारतीय कृषि की समस्याओं का का विवरण
प्रस्तुत करें |
उत्तर: कृषि
पारिस्थितिकी तथा विभिन्न प्रदेशों के ऐतिहासिक अनुभवों के अनुसार भारतीय कृषि की
समस्याएँ भी विभिन्न प्रकार की हैं | अत: देश की अधिकतर कृषि समस्याएँ प्रादेशिक
हैं | फिर भी कुछ समस्याएँ सर्वव्यापी हैं जिसमें भौतिक बाधाओं से लेकर संस्थागत
अवरोध भी शामिल हैं | इस समस्याओं का विवरण निम्न प्रकार से है |
(i) अनियमित मानसून पर निर्भरता
क).
भारत में कृषि क्षेत्र का केवल एक –तिहाई भाग
ही सिंचित हैं | शेष कृषि क्षेत्र में फसलों का उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से वर्षा पर
निर्भर है |
ख).
दक्षिण –पश्चिम मानसून की अनिश्चितता व
अनियमितता से सिंचाई हेतु नहरी जल आपूर्ति प्रभावित होती है |
ग).
दूसरी तरफ राजस्थान तथा अन्य क्षेत्रों में
वर्षा बहुत कम तथा अत्यधिक अविश्वसनीय है |
घ).
अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी काफी उतार -
चढ़ाव पाया जाता है | फलस्वरूप यह क्षेत्र सूखा व बाढ़ दोनों के लिए सुभेद्य हैं
|
ङ).
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सूखा एक सामान्य
परिघटना है लेकिन इन क्षेत्रों में भी कभी –कभी बाढ़ आ जाती है | वर्ष 2006 और 2017 में महाराष्ट्र, गुजरात तथा राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में आई आकस्मिक
बाढ़ इस परिघटना का उदाहरण है |
च).
सूखा तथा बाढ़ भारतीय कृषि के जुड़वाँ संकट बने
हुए हैं |
(ii) निम्न उत्पादकता
क).
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अपेक्षा भारत में
फसलों की उत्पादकताकम है |
ख).
भारत में अधिकतर फसलों जैसे –चावल, गेहूँ,
कपास व तिलहन की प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका, रूस तथा जापान से कम है |
भूसंसाधनों पर अधिक दबाव के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तुलना में भारत में श्रम
उत्पादकता भी बहुत कम है |
ग).
देश के विस्तृत वर्षा निर्भर विशेषकर शुष्क
क्षेत्रों में अधिकतर मोटे अनाज, दालें तथा तिलहन की खेती की जाती है तथा यहाँ
इनकी उत्पादकता बहुत कम है |
(iii) वित्तीय संसाधनों की बाध्यताएँ तथा ऋण ग्रस्तता
क).
आधुनिक कृषि में लागत बहुत आती है | सीमांत और छोटे
किसानों की कृषि बचत बहुत कम या न के बराबर है | अत: वे सघन संसाधन दृष्टिकोण से
की जाने वाली कृषि में निवेश करने में असमर्थ हैं |
ख).
इन समस्याओं से उबरने के लिए, बहुत से किसान
विविध संस्थाओं तथा महाजनों से ऋण लेते हैं |
ग).
कृषि से कम होती आय तथा फसलों के खराब होने से
वे कर्ज के जाल में फसतें जा रहे हैं |
(iv) भूमि सुधारों की कमी
क).
भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान
लंबे समय से शोषित हैं |
ख).
अंग्रेजी शासन के दौरान, तीन भू राजस्व
प्रणालियों –महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा जमींदारी में से जमींदारी प्रथा किसानों के
लिए सबसे ज्यादा शोषणकारी रही है |
ग).
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, भूमि सुधारों
कों प्राथमिकता दी गई | लेकिन ये सुधार कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण पूर्णत:
फलीभूत नहीं हुए |
घ).
अधिकतर राज्य सरकारों ने राजनीतिक रूप से शक्तिशाली
जमींदारों के खिलाफ कठोर राजनीतिक निर्णय लेने में टालमटोल किया | भूमि सुधार के
लागू न होने के परिणाम स्वरूप कृषि योग्य भूमि का असमान वितरण जारी रहा जिससे कृषि
विकास में बाधा रही है |
(v) छोटे खेत तथा विखंडित जोत
क).
भारत में सीमांत तथा छोटे किसानों की संख्या
अधिक है |
ख).
60
प्रतिशत से अधिक किसानों के पास एक हेक्टेयर से छोटे भूजोत (कृषि
भूमि) हैं और लगभग 40 प्रतिशत किसानों की जोतों का आकार तो 0.5 हेक्टेयर से भी कम है |
ग).
बढ़ती जनसंख्या के कारण इन जोतों का औसत आकार
और भी सिकुड़ता जा रहा है |
घ).
इसके अतिरिक्त भारत में अधिकतर भूजोत बिखरे
हुए हैं | कुछ राज्यों में तो एक बार भी चकबंदी नहीं हुई है |
ङ).
वे राज्य जहाँ एक बार चकबंदी हो चुकी है, वहाँ
पुन: चकबंदी की आवश्यकता है क्योंकि अगली पीढ़ी में भूमि बँटवारे की प्रक्रिया से
भूजोतों का दोबारा विखंडन हो गया है |
च).
विखंडन व छोटे भूजोत आर्थिक रूप से अलाभकारी
हैं |
(vi) वाणिज्यीकरण का अभाव
क).
अधिकतर किसान अपनी जरूरत या स्वयं उपभोग हेतु
फफसलें उगाते हैं |
ख).
इन किसानों के पास अपनी जरूरत से अधिक उत्पादन
के लिए पर्याप्त भू –संसाधन नहीं है |
ग).
अधिकतर सीमांत तथा छोटे किसान खाद्यान्नों की
कृषि करते हैं, जो उनकी पारिवारिक जरूरतों कों पूरी करती है |
घ).
यद्यपि सिंचित क्षेत्रों में कृषि का
आधुनिकीकरण तथा वाणिज्यीकरण हो रहा है |
(vii) व्यापक अल्प बेरोजगारी
क).
भारतीय कृषि में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों
में बड़े पैमाने अपर अल्प बेरोजगारी पाई जाती है |
ख).
इन क्षेत्रों में ऋत्विक (मौसमी) बेरोजगारी है
जो 4 से 8 महीने तक रहती है |
ग).
फसल ऋतु में भी पूरे समय के लिए रोजगार उपलब्ध
नहीं होता, क्योंकि कृषि कार्य लगातार गहन श्रम वाले नहीं है | अत: कृषि में
कार्यरत लोगों कों वर्ष –भर कार्य करने के अवसर प्राप्त नहीं होते |
(viii) कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण
क).
भूमि संसाधनों का निम्नीकरण होना सिंचाई और
कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों से उत्पन्न समस्याओं में से एक गम्भीर समस्या है |
यह गम्भीर समस्या इसलिए है क्योंकि इससे मृदा उर्वरता क्षीण हो सकती है |
ख).
कृषि भूमि का एक बड़ा भाग जलाक्रान्तता, मृदा
लवणता तथा मृदा क्षारीयता के कारण बंजर हो चुका है |
ग).
कीटनाशक, रासायनों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा
परिच्छेदिका में जहरीले तत्वों का सांद्रण हो गया है |
घ).
सिंचित क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप से दलहन
(लेग्यूम) फसलें विस्थापित हो गई है अर्थात किसान मुनाफे के लिए दालों कि जगह
दूसरी फसलें उगाते हैं |
ङ).
बहुफसली करण में बढ़ोतरी से परती भूमि में काफी
मात्रा कमी आई है | इससे भूमि में पुन: उर्वरता पाने की प्राकृतिक प्रक्रिया
अवरुद्ध हुई है जैसे नाइट्रोजन योगीकरण |
च).
उष्ण कटिबंधीय आर्द्र व अर्ध शुष्क
क्षेत्र भी कई प्रकार के भूमि निम्नीकरण
से प्रभावित हुए हैं , जैसे जल द्वारा मृदा अपरदन तथा वायु अपरदन जो प्राय:
मानवकृत हैं |
प्रश्न : सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA) पर नोट लिखें |
उत्तर
: सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन कृषि को अधिक विशिष्ट, स्थाई, पारिश्रमिक और
जलवायु के अनुकूल बनाने के लिए स्थान विशिष्ट एकीकृत /समग्र कृषि प्रणालियों को
बढ़ावा देकर और उपयुक्त मिट्टी और नमी संरक्षण उपायों के माध्यम से प्राकृतिक
संसाधनों का संरक्षण करना है | सरकार परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) जैसी
योजनाओं के माध्यम से देश में जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है |
प्रश्न : भारत का किसान पोर्टल पर संक्षिप्त नोट लिखों |
उत्तर
: कृषि से संबंधित किसी भी जानकारी की तलाश के लिए किसान पोर्टल किसानों के लिए एक
मंच है | किसानों के बीमा, कृषि भंडारण , फसलों, विस्तार गतिविधियों, बीजों,
कीटनाशकों, कृषि मशीनरी आदि पर विस्तृत जानकारी प्रदान की जाती है | उर्वरकों,
बाज़ार मूल्य, पैकेज और प्रथाओं, कार्यक्रमों, कल्याणकारी योजनाओं के विवरण भी दिए
गए हैं | मिट्टी की उर्वरता, भंडारण, बीमा से संबंधित ब्लॉक स्तर का विवरण,
प्रशिक्षण आदि एक इंटरएक्टिव मानचित्र में उपलब्ध है | उपयोगकर्ता फार्म फ्रैंडली
हैण्डबुक, योजना दिशा –निर्देश आदि भी डाउनलोड कर सकते हैं |
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