अध्याय
2 - मानव बस्ती
भारत
लोग और अर्थव्यवस्था
कक्षा
-12
मानव बस्ती
का अर्थ
मानव बस्ती का अर्थ
है, किसी भी प्रकार और आकार के घरों का संकुल जिसमें मनुष्य रहते हैं |
बस्ती की प्रक्रिया
के अंतगर्त रहने के उद्देश्य के लिए लोग मकानों और अन्य इमारतों का निर्माण करते
हैं और अपने आर्थिक पोषण –आधार के लिए कुछ क्षेत्र पर स्वामित्व रखते हैं | अत:
बस्ती की प्रक्रिया में मूल रूप से लोगों के समूहन और उनके संसाधन आधार के रूप में
क्षेत्र का आबंटन सम्मिलित होते हैं |
बस्तियाँ आकार और
प्रकार में भिन्न होती हैं | उनका परिसर
एक पल्ली से लेकर महानगर तक होता है |
आकार के साथ बस्तियों
के आर्थिक अभिलक्षण और सामाजिक संरचना बदल जाती है | इनके साथ साथ उनकी
पारिस्थितिकी और प्रौद्योगिकी में भी बदलाव देखने कों मिलता है |
बस्तियाँ छोटी और
विरल रूप से लेकर बड़ी और संकुलित अवस्थित हो सकती है |
ग्रामीण बस्तियाँ
विरल रूप से अवस्थित
छोटी बस्तियाँ, जो कृषि अथवा अन्य प्राथमिक क्रियाकलापों में विशिष्टता प्राप्त कर
लेती हैं, गाँव कहलाती है |
नगरीय बस्तियाँ
कम किन्तु बड़े अधिवास
द्वितीयक और तृतीयक क्रियाकलापों में विशेषीकृत होते है उन्हें नगरीय बस्तियाँ कहा
जाता है |
ग्रामीण और नगरीय
बस्तियों में निम्नलिखित अन्तर हैं |
(i)
ग्रामीण बस्तियाँ अपने जीवन का पोषण अथवा
आधारभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति भूमि आधारित प्राथमिक क्रियाओं से करती हैं |
जबकि नगरीय बस्तियाँ अपने जीवन का पोषण के
लिए एक ओर कच्चे माल के प्रक्रमण और तैयार माल के विनिर्माण तथा दूसरी ओर विभिन्न
प्रकार की सेवाओं पर निर्भर करती हैं |
(ii)
नगर आर्थिक वृद्धि के नोड (Node)
के रूप में कार्य करते हैं और न केवल नगर के निवासियों की बल्कि अपने पश्च भूमि की
ग्रामीण बस्तियों कों भी भोजन और कच्चे माल के बदले वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध
कराते हैं | नगरीय और ग्रामीण बस्तियों के बीच प्रकार्यात्म्क संबंध परिवहन और
संचार परिपथ के माध्यम से स्थापित होता है |
(iii)
ग्रामीण और नगरीय बस्तियाँ सामाजिक संबंधों
अभिवृति और दृष्टिकोण की दृष्टि से भी भिन्न होती हैं | ग्रामीण लोग कम गतिशील होते हैं और उनमें
सामाजिक संबंध घनिष्ठ होते है | दूसरी ओर नगरीय क्षेत्रों में जीवन का ढंग जटिल और
तीव्र होता है और उनमें सामाजिक संबंध
औपचारिक होते हैं |
ग्रामीण बस्तियों के
विभिन्न प्रकारों के लिए अनेक कारक और दशाएँ उत्तरदायी हैं | इनके अंतर्गत
निम्नलिखित कारक आते हैं |
(i)
भौतिक लक्षण : भू –भाग की प्रकृति, भू भाग की ऊँचाई, जलवायु
और जल की उपलब्धता आदि प्राकृतिक कारक शामिल हैं |
(ii)
सांस्कृतिक और मानव जातीय कारक : इनमें सामजिक संरचना, जाति और धर्म आदि शामिल
हैं |
(iii)
सुरक्षा संबंधी कारक : इनमें वे कारक शामिल है जो चोरियों और
डैकेतियों से सुरक्षा से सुरक्षा करते हैं |
बस्तियों के प्रकार निर्मित क्षेत्र के विस्तार और
अन्तर्वास दूरी द्वारा निर्धारित होता है |
भारत में कुछ सौ घरों से युक्त सहंत अथवा गुच्छित गाँव विशेष रूप से उत्तरी
मैदानों में एक सार्वत्रिक लक्षण है | फिर भी अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अन्य
प्रकार की ग्रामीण बस्तियाँ पाई जाती हैं |
बृहद तौर पर भारत की
ग्रामीण बस्तियों कों चार प्रकारों में रखा जा सकता है |
(1) गुच्छित, संकुलित अथवा आकेंद्रित बस्तियाँ, (2) अर्ध गुच्छित अथवा
विखंडित बस्तियाँ,
(3) पल्लीकृत बस्तियाँ, (4) परिक्षिप्त अथवा
एकाकी बस्तियाँ
(i)
गुच्छित ग्रामीण बस्ती घरों का एक सहंत अथवा
संकुलित रूप से निर्मित क्षेत्र होता है |
(ii)
इस प्रकार के गाँव में रहन –सहन का सामान्य
क्षेत्र स्पष्ट और चारों ओर फैले खेतों, खलिहानों और चरागाहों से अलग होता है |
(iii)
संकुलित क्षेत्र और इसकी मध्यवर्ती गलियाँ कुछ
जाने –पहचाने प्रारूप अथवा ज्यामितीय आकृतियाँ प्रस्तुत करती हैं जैसे कि आयताकार
प्रतिरूप, अरीय प्रतिरूप, रैखिक प्रतिरूप इत्यादि |
(iv)
ऐसी बस्तियाँ प्राय: उपजाऊ जलोढ़ मैदानों और
उत्तरी –पूर्वी राज्यों में पाई जाती है |
(v)
कई बार लोग सुरक्षा अथवा प्रतिरक्षा कारणों से
सहंत गाँवों में रहते हैं, जैसे कि मध्य भारत के बुदेंलखंड प्रदेश और नागालैंड में
|
(vi)
राजस्थान में जल के अभाव में उपलब्ध जल
संसाधनों के अधिकतम उपयोग ने सहंत बस्तियों कों अनिवार्य बना दिया है |
(i)
अर्ध गुच्छित अथवा विखंडित बस्तियाँ परिक्षिप्त बस्ती के किसी सीमित क्षेत्र में
गुच्छित होने की प्रवृति का परिणाम है |
(ii)
कई बार ऐसा प्रारूप किसी बड़े सहंत गाँव के
सम्पृथकन अथवा विखंडन के परिणामस्वरूप भी उत्पन्न हो सकता है |
(iii)
ऐसी स्थिति में ग्रामीण समाज के एक अथवा अधिक
वर्ग स्वेच्छा से अथवा बलपूर्वक मुख्य गुच्छ अथवा प्रमुख समुदाय से थोड़ी दूरी पर
रहने लगते हैं |
(iv)
इस प्रकार की बस्तियों में आमतौर पर ज़मींदार
और अन्य प्रमुख समुदाय मुख्य गाँव एक केन्द्रीय भाग पर अधिपत्य कर लेते हैं | जबकि
समाज के निचले तबके के लोग और निम्न कार्यों में संलग्न लोग गाँव के बाहरी हिस्सों
में बसते हैं |
(v)
ऐसी बस्तियाँ गुजरात के मैदान और राजस्थान के
कुछ भागों में व्यापक रूप से पाई जाती हैं |
(i)
कई बार बस्ती भौतिक रूप से एक दूसरे से
पृथक अनेक इकाइयों में बँट जाती है किन्तु
उन् सबका नाम एक रहता है | इस प्रकार की बस्तियों कों पल्ली बस्तियाँ कहते हैं |
(ii)
इन इकाइयों कों देश के विभिन्न भागों में
स्थानीय स्तर पर अनेक नामों से जाना जाता है जैसे पान्ना, पाड़ा, पाली, नंगला, नंगली
और ढाणी आदि |
(iii)
किसी विशाल गाँव का ऐसा खंडीभवन प्राय:
सामाजिक एवं मानवजातीय कारकों द्वारा अभिप्रेरित होता है |
(iv)
भारत में ऐसे गाँव मध्य और निम्न गंगा के
मैदान, छतीसगढ़ और हिमालय की निचली घाटियों में बहुतायत पाए जाते हैं |
(i)
भारत में परिक्षिप्त अथवा एकाकी बस्ती प्रारूप
सुदूर जंगलों में एकाकी झोपडियों अथवा कुछ झोपडियों की पल्ली अथवा छोटी पहाड़ियों
की ढलानों पर खेतों अथवा चरागाहों के रूप में दिखाई पड़ता है |
(ii)
इस प्रकार की बस्ती का चरम विक्षेपण प्राय: भू
–भाग और निवास योग्य क्षेत्रों के भूमि संसाधन आधार की अत्यधिक विखंडित प्रकृति के
कारण होता है |
(iii)
मेघालय, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और केरल के
अनेक भागों में परिक्षिप्त बस्तियाँ पाई जाती है |
ग्रामीण बस्तियों के
विपरीत नगरीय बस्तियाँ सामान्यत: संहत और विशाल आकार की होती है | ये बस्तियाँ
अनेक प्रकार के अकृषि, आर्थिक और प्रशासकीय प्रकार्यों में संलग्न होती हैं | नगरीय बस्ती अपने चारों ओर के क्षेत्रों से
प्रकार्यात्मक रूप से जुड़ी होती है | अत: वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय कई बार
प्रत्यक्ष रूप से और कई बार मंडी शहरों और नगरों की श्रंखला के माध्यम से सम्पन्न
होता है | इस प्रकार नगर गाँवों से प्रत्यक्ष दोनों प्रकार से जुड़े होते हैं और वे
एक दूसरे से भी जुड़े होते हैं |
1991 की भारतीय जनगणना
में नगरीय बस्ती कों इस प्रकार परिभाषित किया है | ऐसे स्थान या क्षेत्र कों नगरीय
बस्ती कहेंगें | जो -
(ii)
कम से कम 5000 व्यक्ति बवहाँ निवास करते
हों |
(iii)
75
प्रतिशत पुरुष श्रमिक गैर कृषि कार्यों में संलग्न हो |
(iv)
जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति
प्रतिवर्ग किलोमीटर हो |
भारत में
नगरों का विकास
भारत में नगरों
अभ्युदय प्रागैतिहासिक काल से हुआ है | यहाँ टक कि सिंधु घाटी सभ्यता के युग में
भी हडप्पा और मोहनजोदड़ों जैसे नगर अस्तित्व में थे | इसके बाद का समय नगरों के
विकास का साक्षी है | यह समय 18वीं शताब्दी में युरोपिओं के भारत में आने
टक आवधिक उतार –चढावों से भरा रहा | विभिन्न युगों में नगरों के विकास के आधार पर
भारतीय नगरों कों प्राचीन नगर, मध्यकालीन नगर और आधुनिक नगर के अंतर्गत वर्गीकृत
किया जा सकता है |
(i)
भारत में 2000 से अधिक वर्षों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले अनेक
नगर हैं |
(ii)
इनमें से अधिकाँश का विकास धार्मिक अथवा
सांस्कृतिक केन्द्रों के रूप में हुआ है |
(iii)
वाराणसी इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण नगर है
| प्रयाग (प्रयागराज) पाटलिपुत्र (पटना) मदुरई देश में प्राचीन नगरों के अन्य
उदाहरण हैं |
(i)
वर्तमान के लगभग 100 नगरों का इतिहास मध्यकाल से जुड़ा हुआ है |
(ii)
इनमें से अधिकाँश का विकास रजवाडों और राज्यों
के मुख्यालयों के रूप में हुआ था |
(iii)
ये किला नगर हैं जिनका निर्माण प्राचीन नगरों
के खंडहरों पर हुआ है |
(iv)
ऐसे नगरों में दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, लखनऊ,
आगरा और नागपुर महत्वपूर्ण हैं |
आधुनिक नगरों कों हम
दो भागों में विभाजित कर सकते है |
(1)स्वतंत्रता
प्राप्ति से पहले के आधुनिक नगर (2) स्वतंत्रता
प्राप्ति के बाद के आधुनिक नगर
(1)स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के आधुनिक नगर
अंग्रेजों और अन्य
यूरोपीयों ने भारत में अनेक नगरों का विकास किया | तटीय स्थानों पर अपने पैर जमाते
हुए उन्होंने सर्वप्रथम सूरत, दमन, गोवा, पांडिचेरी जैसे व्यापारिक पत्तन विकसित
किए |
भारत में प्रभुसत्ता
प्राप्त करने पर अंग्रेजों ने बाद में तीन मुख्य नोडों मुंबई (बम्बई), चेन्नई
(मद्रास) और कोलकाता (कलकत्ता) पर अपनी पकड़ मजबूत कि और उनका अंग्रेजी शैली में
निर्माण किया |
अपने प्रभाव कों
प्रत्यक्ष रूप से अथवा रजवाडों पर नियंत्रण के माध्यम से तेजी से बढ़ाते हुए
उन्होंने प्रशासनिक केन्द्रों, ग्रीष्मकालीन विश्राम स्थलों के रूप में पर्वतीय
नगरों कों स्थापित किया और उनमें सिविल, प्रशासनिक और सैन्य क्षेत्रों कों जोड़ा |
जैसे शिमला और डलहौजी आदि |
1850 के बाद आधुनिक
उद्योगों पर आधारित नगरों का भी जन्म हुआ | जैसे जमशेदपुर इसका एक उदाहरण है |
स्वतंत्रता प्राप्ति
के बाद के अनेक नगर प्रशासनिक केन्द्रोंजैसे –चंडीगढ़, भुवनेश्वर, गांधीनगर, दिसपुर
इत्यादि विकसित हुए |
इसी प्रकार औद्योगिक
केन्द्रों जैसे दुर्गापुर, भिलाई, सिंदरी, बरौनी के रूप में औद्योगिक नगर विकसित
हुए |
कुछ पुराने नगर
महानगरों के चारों ओर अनुषंगी नगरों के रूप में विकसित हुए जैसे दिल्ली के चारों ओर गाजियाबाद, रोहतक और
गुरुग्राम इत्यादि | ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते निवेश के साथ पूरे देश में बड़ी
संख्या में मध्यम और छोटे नगरों का विकास हुआ है |
नगरीकरण के स्तर का
माप कुल जनसंख्या में नगरीय जनसँख्या के प्रतिशत के रूप में किया जाता है | वर्ष 2011
में भारत में नगरीकरण का स्तर 31.16 प्रतिशत था जो विकसित देशों की तुलना में काफी
कम है | 20वीं शताब्दी के दौरान नगरीय जनसंख्या 11गुना बढ़ी है | नगरीय केन्द्रों के विवर्धन और नए नगरों के आविर्भाव ने देश
में नगरीय जनसंख्या की वृद्धि और नगरीकरण में सार्थक भूमिका निभाई है | जनसंख्या
संबंधी आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि पिछले तीन दशकों में नगरीकरण की वृद्धि दर
धीमी हुई है | जो निम्न तालिका से स्पष्ट
है |
|
तालिका : भारत –नगरीकरण की प्रवृतियाँ 1901-2011 |
||||
|
वर्ष |
नगरों/नगरीय संकुलों की संख्या |
नगरीय जनसँख्या (हजारों में) |
कुल नगरीय जनसँख्या का प्रतिशत |
दशकीय वृद्धि (%) |
|
1901 |
1827 |
25851.9 |
10.84 |
- |
|
1911 |
1815 |
25941.6 |
10.29 |
0.35 |
|
1921 |
1949 |
28086.2 |
11.18 |
8.27 |
|
1931 |
2072 |
33456.0 |
11.99 |
19.12 |
|
1941 |
2250 |
44153.3 |
13.86 |
31.97 |
|
1951 |
2843 |
62443.7 |
17.29 |
41.42 |
|
1961 |
2365 |
78936.6 |
17.97 |
26.41 |
|
1971 |
2590 |
109114 |
19.91 |
38.23 |
|
1981 |
3378 |
159463 |
23.34 |
46.14 |
|
1991 |
4689 |
217611 |
25.71 |
36.47 |
|
2001 |
5161 |
285355 |
27.78 |
31.13 |
|
2011 |
6171 |
377000 |
31.16 |
31.08 |
अपनी केन्द्रीय अथवा
नोडीय स्थान की भूमिका के अतिरिक्त अनेक शहर और नगर विशेषीकृत सेवाओं का निष्पादन
करते हैं | कुछ शहरों और नगरों कों कुछ निश्चित प्रकार्यों में विशिष्टता प्राप्त होती
हैं और उन्हें कुछ विशिष्ट क्रियाओं, उत्पादनों अथवा सेवाओं के लिए जाना जाता है |
फिर भी प्रत्येक शहर अनेक प्रकार के कार्य करता है | प्रमुख अथवा विशेषीकृत
प्रकार्यों के आधार पर भारतीय नगरों कों मौटे तौर पर निम्नलिखित प्रकार से
वर्गीकृत किया जाता है |
उच्चतर क्रम के प्रशासनिक मुख्यालयों वाले शहरों कों
प्रशासन नगर कहते हैं, जैसे कि चंडीगढ़, नई दिल्ली, भोपाल, शिलांग, गुवाहाटी.
इम्फाल,श्री नगर , गाँधी नगर, जयपुर, चेन्नई , लखनऊ इत्यादि |
जिन नगरों के विकास का प्रमुख अभिप्रेरक बल उद्योगों का
विकास रहा है उन्हें औद्योगिक नगर कहा जाता है | जैसे मुंबई, सेलम, कोयम्बटूर,
मोदीनगर, जमशेदपुर, हुगली, और भिलाई आदि |
ये पत्तन नगर है जो मुख्यत: आयात और निर्यात कार्यों में
संलग्न रहते हैं | जैसे कांडला, कोच्चि, कोझीकोड, विशाखापट्टनम, आदि | इनके अलावा
आंतरिक परिवहन की धुरी कहलाने वाले नगरों कों भी परिवहन नगर कहा जाता है | जैसे –
धुलिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगल सराय) इटारसी और कटनी आदि |
(4) वाणिज्य
नगर
व्यापार और वाणिज्य में विशिष्टता प्राप्त शहरों और नगरों
कों इस वर्ग में रखा जाता है | जैसे –कोलकाता, सहारनपुर, सतना आदि |
जो नगर खनिज समृद्ध क्षेत्रों में विकसित हुए है उन्हें
खनन नगर कहा जाता है | जैसे – रानीगंज, झरिया, डिगबोई, अंकलेश्वर, सिंगरौली
इत्यादि |
(6)गैरीसन अथवा छावनी नगर
इन नगरों का उदय
सैन्य छावनी के रूप में हुआ है | ये सैनिक महत्व के नगर है | जैसे-
अम्बाला, जालन्धर, महू , बबीना और उधमपुर आदि |
(7) धार्मिक
और सांस्कृतिक नगर
इस प्रकार के नगर अपने धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण प्रसिद्ध हुए है |
जैसे -वाराणसी, मथुरा, अमृतसर मदुरै, पूरी, अजमेर, पुष्कर, तिरुपति, कुरुक्षेत्र,
हरिद्वार, उज्जैन आदि |
(8) शैक्षिक
नगर
मुख्य परिसर नगरों में से कुछ नगर शिक्षा केन्द्रों के रूप
में विकसित हुए जैसे रुड़की, वाराणसी, अलीगढ़, पिलानी,प्रयागराज आदि |
(9) पर्यटन नगर
वे नगर जो लोगों कों पर्यटन के आकृषित करते है | उन्हें
पर्यटन नगर कहा जाता है | जैसे- नैनीताल, मसूरी, शिमला, पंचमढ़ी, जोधपुर, जैसलमेर,
उडगमंडलम (उटी), माउंट आबू कुछ पर्यटन के
लिए गंतव्य स्थान है |
नगर अपने प्रकार्यों में स्थिर नहीं है , उनके गतिशील स्वभाव के कारण प्रकार्यों में परिवर्तन हो जाता है | विशेषीकृत नगर भी महानगर बनने पर बहुप्रकार्यात्मक बन जाते है | जिनमें उद्योग, व्यवसाय, प्रशासन, परिवहन आदि महत्वपूर्ण हो जाते हैं | इन नगरों में प्रकार्य इतने अंतर्ग्रंथित हो जाते हैं कि नगर कों किसी विशेष प्रकार्य वर्ग में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता |
स्मार्ट सिटी मिशन
स्मार्ट सिटी मिशन के
महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं |
(i)
स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य शहरों कों
बढ़ावा देना है जो आधारभूत सुविधा, साफ़ तथा सतत पर्यावरण और अपने नागरिकों कों
बेहतर जीवन प्रदान करते हैं |
(ii)
स्मार्ट शहरों की एक विशेषता आधारभूत सुविधाओं
और सेवाओं के लिए स्मार्ट समाधानों कों लागू करना है | जिससे क्षेत्रों कों
प्राकृतिक आपदाओं के कम जोखिम वाले क्षेत्रों के रूप में बनाया जा सके , साथ ही
साथ कम संसाधनों का उपयोग तथा सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सके |
(iii)
इस योजना में सतत तथा समग्र विकास पर ध्यान
केंद्रित किया गया है |
(iv)
इस योजना का उद्देश्य एक ऐसे सघन क्षेत्र पर
ध्यान केंदित करना है जो एक मॉडल के रूप में अन्य बढ़ते हुए शहरों के लाईट हाउस का
काम करे |