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Thursday, October 8, 2026

LESSON 3 Drainage System Indian Physical Environment Class 11th Geography

 

अध्याय -3  

अपवाह तंत्र

पुस्तक : भारत भौतिक पर्यावरण (भूगोल )

कक्षा 11

अपवाह

निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल प्रवाह कों ‘अपवाह’ कहते हैं |

अपवाह तन्त्र

निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल प्रवाह कों ‘अपवाह’कहते हैं | इन वाहिकाओं के जाल कों ‘अपवाह तन्त्र’ कहा जाता है |

किसी क्षेत्र के अपवाह तन्त्र कों प्रभावित करने वाले कारक

किसी क्षेत्र के अपवाह तन्त्र कों निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं |

भू वैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति, चट्टानों की संरचना, चट्टानों की स्थलाकृति, चट्टानों का ढाल, बहते हुए जल की मात्रा, जल के बहाव की अवधि |

जलग्रहण  क्षेत्र

एक नदी विशिष्ट क्षेत्र से अपना जल बहाकर लाती है जिसे जलग्रहण  क्षेत्र (Catchment Area) कहा जाता है |

अपवाह द्रोणी

एक नदी एवं उस की सहायक नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र कों ‘अपवाह द्रोणी’(Drainage Basin)  कहते है |

जल विभाजक

एक अपवाह द्रोणी कों दूसरी अपवाह द्रोणी से अलग करने वाली सीमा कों ‘जल विभाजक’ कहते हैं |

अपवाह द्रोणी और जल संभर में अन्तर

बड़ी नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र कों ‘नदी द्रोणी’कहते हैं |जबकि छोटी नदियों व नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र कों ‘जल संभर’ ही कहा जाता है | नदी द्रोणी का आकार बड़ा होता है जबकि जल संभर का आकार छोटा होता है | 

मुख्य अपवाह प्रतिरूप

(1) वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप (Dendritic Drainage Pattren)

            जो अपवाह प्रतिरूप पेड़ की शाखाओं के अनुरूप हो, उसे वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप कहा जाता है | उत्तर भारत के मैदान की नदियाँ इसी तरह का अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं |

(2) अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattren)

            जब नदियाँ किसी पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में बहती है, तो जिस प्रतिरूप का निर्माण होता है उसे अरीय अपवाह प्रतिरूप कहा जाता है | अमरकंटक पर्वत श्रंखला से निकलने वाली नदियाँ इसी तरह के अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं |

(3) जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप (Trellis Drainage Pattren)

जब नदियाँ एक –दूसरे के समानांतर बहती हों तथा सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हों, तो ऐसे प्रतिरूप कों जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप कहते हैं |

(4) अभिकेन्द्रीय अपवाह प्रतिरूप (Centripetal Drainage Pattren)

जब सभी दिशाओं से नदियाँ बहकर किसी झील या गर्त में विसर्जित होती हैं तो, ऐसे प्रतिरूप कों अभिकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप कहते हैं |

भारतीय अपवाह तंत्र का जल विसर्जन के आधार पर वर्गीकरण

भारतीय अपवाह तंत्र कों जल विसर्जन के आधार पर डो समूहों में बाँटा जा सकता है | अरब सागर का अपवाह तंत्र तथा बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र | ये दोनों अपवाह तंत्र दिल्ली कटक तथा अरावली और सह्याद्री द्वारा विलग किए गए है |

बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र

देश के कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 77  प्रतिशत भाग आता है | जिसमें गंगा , ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी आदि नदियाँ शामिल हैं | ये नदियाँ बंगाल की खाड़ी में अपना जल विसर्जित करती हैं |

अरब सागर का अपवाह तंत्र

देश के कुल अपवाह क्षेत्र का 23 प्रतिशत भाग इसमें आता है | जिसमें सिंधु, नर्मदा तापी माही व पेरियार आदि नदियाँ शामिल हैं | ये नदियाँ अपना जल अरब सागर में विसर्जित करती हैं |

जल संभर क्षेत्र के आधार पर भारतीय अपवाह द्रोणियों का वर्गीकरण

जल संभर क्षेत्र के आधार पर भारतीय अपवाह द्रोणियों कों तीन भागों में बाँटा गया है | जो निम्नलिखित हैं |

(1) प्रमुख नदी द्रोणी:

इनमें वे अपवाह द्रोणी शामिल की गई हैं जिनका अपवाह क्षेत्र 20,000  वर्ग किलोमीटर से अधिक है | इस वर्ग में 14 नदी द्रोणियाँ शामिल हैं, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, तापी, नर्मदा, माही, पेन्नार, साबरमती और बराक आदि |

(2) मध्यम नदी द्रोणी:

 इनमें वे अपवाह द्रोणी शामिल की गई हैं जिनका अपवाह क्षेत्र 2000 से 20,000  वर्ग किलोमीटर है | इस वर्ग में 44 नदी द्रोणियाँ शामिल हैं | जैसे –कालिंदी, पेरियार, मेघना आदि |

(3) लघु नदी द्रोणी:

 जिनका अपवाह क्षेत्र 2.000 वर्ग किलोमीटर से कम है इस वर्ग में शामिल की गई हैं | इसमें न्यून वर्षा के क्षेत्रों में बहने वाली बहुत-सी नदियाँ शामिल हैं | 

हिमालयी अपवाह तंत्र की विशेषताएँ

     (i)            हिमालयी अपवाह तंत्र भू गार्भिक इतिहास के एक लंबे दौर में विकसित हुआ है |

   (ii)            इसमें मुख्यत: गंगा, सिंधु व ब्रहमपुत्र नदी द्रोणियाँ शामिल हैं |

 (iii)            यहाँ की नदियाँ बारहमासी हैं, क्योंकि ये बर्फ पिघलने व वर्षण दोनों पर निर्भर हैं |

  (iv)            ये नदियाँ गहरे महाखड्डों (Gorges) से गुजरती हैं, जो हिमालय के उत्थान के साथ –साथ अपरदन क्रिया द्वारा निर्मित हैं |

    (v)            महाखड्डों के अतिरिक्त ये नदियाँ अपने पर्वतीय मार्ग में V- आकार की घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ व जल प्रपात भी बनाती हैं |

  (vi)            जब ये नदियाँ मैदान में प्रवेश करती हैं तो निक्षेपाणात्मक स्थलाकृतियाँ जैसे- समतल घाटियाँ, गोखुर झीलें, बाढ़ कृत मैदान, गुंफित वाहिकाएँ और नदी के मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं |

(vii)            हिमालय क्षेत्र में इन नदियों का रास्ता टेढा – मेढा है, परन्तु मैदानी क्षेत्र में इनमें सर्पाकार मार्ग में बहने की प्रवृति पाई जाती है  और अपना रास्ता बदलती रहती हैं | उदाहरण के लिए कोसी नदी अपना रास्ता बदलने के लिए कुख्यात रही है |

 

कोसी नदी बिहार का शोक

कोसी नदी अपना रास्ता बदलने के लिए कुख्यात रही है | यह नदी पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों से भारी मात्रा में अवसाद लाकर मैदानी भाग में जमा करती है | इससे नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है व परिणाम स्वरूप नदी अपना मार्ग बदल लेती है | इससे इस नदी में बाढ़ आती है | इसी कारण कोसी नदी कों बिहार का शोक (Sorrow of Bihar) कहा जाता है |

हिमालय पर्वतीय अपवाह तंत्र का विकास

हिमालय पर्वतीय नदियों के विकास के बारे में काफी मतभेद है | हिमालय पर्वतीय नदियों के विकास कों हम निम्नलिखित तथ्यों की सहायता से समझ सकते हैं |

1         भूवैज्ञानिक मानते हैं कि लगभग 2.4 करोड़ से 50 लाख वर्ष पहले मायोसीन कल्प में एक विशाल नदी जिसे शिवालिक या इंडो ब्रह्म कहा गया है, हिमालय के संपूर्ण अनुदैधर्य विस्तार के साथ असम से पंजाब तक बहती थी और अंत में निचले पंजाब के पास सिंध की खाड़ी में अपना जल विसर्जन करती थी |

2         शिवालिक पहाड़ियों की असाधारण निरंतरता, इनका सरोवरी उद्गम और इनका जलोढ़ निक्षेप से बना होना  जिसमें रेत, मृतिका, चिकनी मिट्टी, गोलाश्म व कोंग्लोमेरेट शामिल हैं, इस धारणा की पुष्टि करते हैं |

3         ऐसा माना जाता है कि कालांतर में इंडो ब्रह्म नदी तीन मुख्य अपवाह तंत्रों में बँट गई | जो निम्नलिखित हैं |

                             (i)            पश्चिम में सिंधु और इसकी पाँच सहायक नदियाँ

                           (ii)            मध्य में गंगा और हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ

                         (iii)            पूर्व में ब्रह्मपुत्र का भाग व हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ |

4         विशाल नदी का इस तरह विभाजन संभवत: प्लीस्टोसीन काल में हिमालय के पश्चिमी भाग में व पोटवार पठार (दिल्ली रिज) के उत्थान के कारण हुआ | यह क्षेत्र सिंधु व गंगा अपवाह तंत्रों के बीच जल विभाजक बन गया |

5         इसी प्रकार मध्य प्लीस्टोसीन काल में राजमहल पहाडियों और मेघालय पठार के मध्य स्थित मालदा गैप का अधेक्षेपण हुआ जिसमें गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों का दिक्परिवर्तन (दिशा परिवर्तन) हुआ और वे बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित हुई | 

हिमालय अपवाह तंत्र की नदियाँ

हिमालय अपवाह तंत्र में अनेक नदी तंत्र हैं, मगर तीन नदी तंत्र प्रमुख हैं | जो निम्नलिखित हैं |

सिंधु नदी तंत्र :

 इसमें सिंधु तथा इसकी सहायक नदियाँ जैसे झेलम, रावी, व्यास, चेनाब तथा सतलुज आदि प्रमुख नदियाँ शामिल हैं |

गंगा नदी तंत्र :

इसमें गंगा तथा इसकी सहायक नदियाँ जैसे : यमुना, गंडक, घाघरा, सरयू, कोसी आदि प्रमुख नदियाँ इस तंत्र में शामिल हैं |

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र :

इसमें ब्रह्मपुत्र तथा इसकी सहायक नदियाँ दिहांग, सिकांग, धनासिरी, सुबनसिरी लोहित, मानस तथा संकोश आदि नदियाँ शामिल हैं |

 

सिंधु नदी 

यह विश्व के सबसे बड़े नदी  द्रोणियों में से एक है | इसका क्षेत्रफल 11 लाख 65 हजार वर्ग किलोमीटर है | भारत में इसका क्षेत्रफल 321289 वर्ग किलोमीटर है | इसकी कुल लम्बाई 2880 किलोमीटर है और भारत में इसकी लम्बाई 1114  किलोमीटर है |

भारत में यह हिमालय की नदियों में से सबसे पश्चिमी नदी है | इसका उद्गम तिब्बत क्षेत्र में कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू (Bokhar Chu) के निकट एक हिमनद से होता है |  जो 4164 मीटर की ऊँचाई और 31० 15’ उत्तर अक्षांश तथा 80० 40’ पूर्व देशांतर पर स्थित है |   तिब्बत में सिंधु नदी कों सिंगी खम्बान (Singi Khamban) या शेर मुख कहते है | 

लद्दाख व जास्कर श्रेणियों के बीच से उत्तर –पश्चिमी दिशा में बहती हुई यह नदी लद्दाख और बालतिस्तान से गुजरती है | लद्दाख श्रेणी को काटते हुए यह नदी जम्मू और कश्मीर में गिलगित के समीप एक दर्शनीय महाखड्ड का निर्माण करती है |

पाकिस्तान में यह नदी चिल्लस के निकट दरदिस्तान प्रदेश में प्रवेश करती है | सिंधु नदी की बहुत-सी सहायक नदियाँ हिमालय पर्वत से निकलती है: जैसे श्योक, गिलगित, जास्कर, हुन्जा, नुबरा, शिगार, गास्टिंग व द्रास |

यह नदी पाकिस्तान में अटक के निकट पहाडियों से बाहर निकलती है | जहाँ इसके दाहिने तट पर काबुल नदी इसमें मिलती है |  सिंधु नदी के दाहिने तट पर मिलने वाली अन्य मुख्य सहायक नदियाँ खुर्रम, तोची, गोमल, विबोआ और संगर हैं | ये सभी नदियाँ सुलेमान श्रेणी से निकलती है |

यह नदी दक्षिण की ओर बहती हुई मीथनकोट के निकट पंचनद का जल प्राप्त करती है | पंचनद नाम पंजाब की पाँच मुख्य नदियों सतलुज, व्यास, रावी, चेनाब और झेलम कों दिया जाता है |  अंत में सिंधु नदी कराची के पूर्व में अरब सागर में जा गिरती है |  भारत में यह नदी जम्मू और कश्मीर में बहती है |

झेलम नदी

झेलम सिंधु की महत्वपूर्ण सहायक नदी है | यह कश्मीर घाटी के दक्षिण –पूर्वी भाग में पीर –पंजाल गिरिपद में स्थित वेरीनाग झरने से निकलती है | पाकिस्तान में प्रवेश करने से पहले यह नदी श्रीनगर और वूलर झील से बहते हुए एक तंग व गहरे महाखड्ड से गुजरती है |

पाकिस्तान में झंग के निकट यह नदी चेनाब नदी में मिलती है |

चेनाब नदी

चेनाब सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है | यह चन्द्र और भागा दो सरिताओं के मिलने से बनती है | ये सरिताएँ हिमाचल प्रदेश में केलाँग के निकट तांडी में आपस में मिलती हैं | इसलिए चेनाब नदी को चन्द्रभागा के नाम से भी जाना जाता है | पाकिस्तान में प्रवेश करने से पहले यह नदी भारत में 1180 किलोमीटर बहती है |

रावी नदी

रावी सिंधु की महत्वपूर्ण सहायक नदी है | यह हिमाचल प्रदेश की कुल्लू पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के पश्चिम से निकलती है |

यह हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध चम्बा घाटी से बहती है |  यह नदी पीर पंजाल के दक्षिण –पूर्वी भाग व धौलाधार श्रेणी के बीच प्रदेश से प्रवाहित होती है | पाकिस्तान में यह सराय के निकट प्रवेश करती है और चेनाब नदी में मिल जाती है |

व्यास नदी

व्यास नदी सिंधु नदी की अन्य महत्वपूर्ण सहायक नदी है | जो समुद्र तल से 4,000 मीटर की ऊँचाई पर रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुण्ड से निकलती है | यह नदी कुल्लू घाटी से गुजरती है और धौलाधार श्रेणी में काती और लारगी में महाखड्ड का निर्माण करती है | यह नदी पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है जहाँ हरिके के पास सतलुज नदी में जा मिलती है |

सतलुज नदी

सतलुज नदी सिंधु नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है |  सतलुज नदी तिब्बत में 4,555 मीटर की ऊँचाई पर मानसरोवर झील के निकट राक्षस ताल से निकलती है | तिब्बत में इसे लॉगचेन खंबाब के नाम से जाना जाता है | भारत में प्रवेश करने से पहले यह लगभग 400 किलोमीटर तक सिंधु नदी के समानान्तर बहती है | रोपड़ में एक महाखड्ड से निकलती है | यह हिमालय पर्वत श्रेणी में शिपकीला से बहती हुई पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है |  यह एक पूर्ववर्ती नदी है |  यह नदी भाखड़ा नांगल परियोजना के नहर तंत्र का पोषण करती है  |

 

गंगा नदी

अपनी द्रोणी और सांस्कृतिक महत्व दोनों के दृष्टिकोणों से गंगा भारत कि सबसे महत्वपूर्ण नदी है |  यह नदी उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से 3900 मीटर की ऊँचाई से निकलती है |  गंगोत्री में यह भागीरथी के नाम से जानी जाती है | यह मध्य एवं लघु हिमालय श्रेणियों को काट कर तंग महाखड्डों से होकर गुजरती है | देवप्रयाग में भागीरथी अलकनंदा से मिलती है  और इसके बाद गंगा कहलाती है |  अलकनंदा नदी का स्त्रोत बद्रीनाथ के ऊपर सतोपथ हिमनद है | अलकनंदा, धौली और विष्णु गंगा धाराओं से मिलकर बनती है, जो जोशीमठ या विष्णुप्रयाग में मिलती है | अलकनंदा की अन्य सहायक नदी पिंडार है जो इससे कर्ण प्रयाग में मिलती है जबकि मंदकिनी या काली गंगा इससे रुद्रप्रयाग में मिलती है |

गंगा नदी हरिद्वार में मैदान में प्रवेश करती है | यहाँ से यह पहले दक्षिण कि ओर फिर दक्षिण-पूर्व की ओर और फिर पूर्व की ओर बहती है | अंत में यह दक्षिणमुखी होकर दो जल वितरिकाओं (धाराओं) भागीरथी और पदमा में विभाजित हो जाती है

इस नदी की लम्बाई 2525 किलोमीटर है | यह उत्तराखण्ड में 110 किलोमीटर, उत्तरप्रदेश में 1450 किलोमीटर, बिहार में 445 किलोमीटर तथा पश्चिम बंगाल में 520 किलोमीटर मार्ग तय करती है |  गंगा द्रोणी केवल भारत में लगभग 8.6 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है | यह भारत का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है |

गंगा नदी के अपवाह तंत्र में उत्तर में हिमालय से निकलने वाली बारहमासी व अनित्यवाही नदियाँ और दक्षिण में प्रायद्वीपीय  से निकलने वाली  अनित्यवाही नदियाँ शामिल हैं |  यमुना इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी है जो दाहिने किनारे से मिलती है | सोन इसके दाहिने किनारे पर मिलने वाली प्रमुख नदी है | बाएँ तट से मिलने वाली महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी व महानंदा है | सागर द्वीप के निकट यह नदी अंतत: बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है |

यमुना नदी

यमुना, गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लम्बी सहायक नदी है |  इसका स्त्रोत यमुनोत्री हिमनद है, जो हिमालय में बंदरपूँछ श्रेणी की पश्चिमी ढाल पर 6,316  मीटर की ऊँचाई पर स्थित है | प्रयाग (इलाहाबाद) में युमना नदी का गंगा से संगम होता है |

प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली चम्बल, सिंध, बेतवा व केन नदियाँ इसके दाहिने तट पर मिलती हैं | जबकि हिंडन, रिंद, सेंगर, वरुणा आदि नदियाँ इसके बाएँ तट पर मिलती हैं |  इस नदी का अधिकाँश जल सिंचाई उद्देश्यों के लिए  पश्चिमी और पूर्वीयमुना नहरों तथा आगरा नहर में आता है |  यह नदी उत्तराखण्ड, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश राज्यों में बहती है |

चम्बल नदी

यह नदी यमुना की सहायक नदी है | चम्बल नदी मध्य प्रदेश के मालवा पठार में महु के निकट निकलती है |  उत्तरमुखी होकर एक महाखड्ड से बहती हुई यह नदी राजस्थान में कोटा पहुँचती है | कोटा में इस नदी पर गाँधी सागर बाँध बनाया गया है | कोटा से यह नदी बूंदी, सवाई माधोपुर और धौलपुर होती हुई यह नदी यमुना नदी में मिल जाती है | चम्बल नदी अपनी उत्खात भूमि वाली भू –आकृति के लिए प्रसिद्ध है | जिसे चम्बल खड्ड (Ravine) कहा जाता है |

गंडक नदी

गंडक नदी दो धाराओं काली गंडक और त्रिशूल गंगा के मिलने से बनती है |  यह नेपाल हिमालय में धौलागिरी व माउंट एवरेस्ट के बीच से निकलती है और मध्य नेपाल कों अपवाहित करती है |  बिहार के चम्पारण जिले में यह गंगा मैदान में प्रवेश करती है |  पटना के निकट सोनपुर में यह नदी गंगा नदी में मिल जाती है |

घाघरा नदी

घाघरा नदी मापचाचुंगों हिमनद से निकलती है |  तिला, सेती व बेरी नामक सहायक नदियों का जल ग्रहण करने के बाद यह शिशापानी में एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करते हुए पर्वत से बहार निकलती है | शारदा नदी इससे मैदान में मिलती है और अंतत: बिहार के छपरा में यह गंगा नदी में विलीन हो जाती है | 

कोसी नदी

कोसी एक पूर्ववर्ती नदी है |  इस नदी का उद्गम स्त्रोत तिब्बत में माउंट एवरेस्ट के उत्तर में है | जहाँ से इसकी मुख्य धारा अरुण निकलती है | नेपाल में मध्य हिमालय कों पार करने के बाद इसमें पश्चिम से सोन कोसी और पूर्व से तुमुर कोसी मिलती है | अरुण नदी में मिलाकर यह सप्त कोसी बनती है |

राम गंगा नदी

रामगंगा नदी गैरेसेन के निकट गढ़वाल की पहाड़ियों से निकलने वाली अपेक्षाकृत छोटी है | शिवालिक कों पार करने के बाद यह अपना मार्ग दक्षिण –पश्चिम दिशा की ओर बनाती है | उत्तर प्रदेश में नजीबाबाद के निकट यह नदी मैदान में प्रवेश करती है |  अंत में कन्नौज के निकट यह गंगा नदी में मिल जाती है |

दामोदर नदी

छोटा नागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर दामोदर नदी बहती है और भ्रंश घाटी में बहती हुई हुगली नदी में गिरती है |  बराकर इसकी एक मुख्य सहायक नदी है |  यह नदी पहले बंगाल का शोक (Sorrow of Bengal)  कहलाती थी |  इस नदी पर दामोदर घाटी परियोजना नामक बहुउद्देशीय परियोजना बनाई गई जिससे इस नदी की बाढ़ कों नियंत्रित किया गया है |

शारदा नदी

शारदा नदी कों सरयू नदी भी कहा जाता है | इस नदी का उद्गम नेपाल हिमालय में मिलाम हिमनद में है | जहाँ इस नदी कों गौरी गंगा के नाम से जाना जाता है | यह नदी भारत –नेपाल सीमा के साथ बहती हुई घाघरा नदी में मिल जाती है | भारत नेपाल सीमा के पास इस नदी कों काली  नदी तथा चाइक कहा जाता है |

महानंदा

गंगा नदी की एक अन्य महत्वपूर्ण सहायक नदी महानंदा है | यह नदी दार्जिलिंग की पहाड़ियों से निकलती है | यह नदी पश्चिमी बंगाल में गंगा के बाएँ तट पर मिनले वाली अंतिम सहायक नदी है |

सोन नदी

गंगा नदी के दक्षिणी तट अपर सोन एक बड़ी सहायक नदी है  जो अमरकंटक पठार से निकलती है | यह नदी प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी किनारे पर जल प्रपातों की श्रंखला बनाती | पटना के पश्चिम में आरा के पास गंगा नदी में विहीन हो जाती है | 

 

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

विश्व की सबसे बड़ी नदियों में से एक ब्रह्मपुत्र का उद्गम कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चेमायुँगडुंग (Chemayundung) हिमनद में है | यहाँ से पूर्व दिशा में अनुदैधर्य रूप में बहती हुई दक्षिणी तिब्बत के शुष्क व समतल मैदान में लगभग 1200 किलोमीटर की दूरी तय करती है   जहाँ इसे सांग्पो (Tsangpo) के नाम से जाना जाता है | जिसका अर्थ है ‘’शोधक |   तिब्बत की रांगोसांग्पो इसके दाहिने तट पर एक प्रमुख सहायक नदी है |

मध्य हिमालय में नमचा बरवा (7755मीटर) के निकट एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करती हुई  एक प्रक्षुब्ध व तेज बहाव वाली नदी के रूप में बाहर निकलती है | हिमालय के गिरिपद में यह सिशंग या दिशंग के नाम से निकलती है | अरुणाचल प्रदेश में सदिया कस्बे  के पश्चिम में यह नदी भारत में प्रवेश करती है |  दक्षिण –पश्चिम दिशा में बहते हुए इसके बाएँ तट पर इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग या सिकांग और लोहित मिलती हैं और इसके बाद यह नदी ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है |

असम घाटी में अपनी 750 किलोमीटर की यात्रा में ब्रह्मपुत्र में असंख्य सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं | इसके बाएँ तट की प्रमुख सहायक नदियाँ बूढी दिहांग और धनसरी  (दक्षिण) हैं , जबकि दाएँ  तट पर मिलने वाली महत्वपूर्ण सहायक नदियों में सुबनसिरी, कामेग, मानस व संकोश हैं | सुबनसिरी जिसका उद्गम तिब्बत में है, एक पूर्ववर्ती नदी है |

ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है और फिर दक्षिण दिशा में बहती है |  बांग्लादेश में यह जमुना कहलाती है और तिस्ता नदी इसके दाहिने किनारे पर मिलती है |  अंत में यह नदी पदमा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में  जा गिरती है |

ब्रह्मपुत्र नदी बाढ़, मार्ग परिवर्तन एवं तटीय अपरदन के लिए जानी जाती है | ऐसा इसलिए  है, क्योंकि इसकी अधिकतर सहायक नदियाँ बड़ी हैं और इनके जल ग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण इनमें अत्यधिक अवसाद बहकर आ जाता है |

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की मुख्य विशेषताएँ

     (i)            प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना है | यह तथ्य नदियों की प्रौढ़ावस्था और नदी घाटियों के चौड़ा व उथला होने से प्रमाणित होता है |

   (ii)            पश्चिमी तट के समीप स्थित पश्चिमी घाट बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियों और अरब सागर में गिरने वाली छोटी नदियों के बीच जल –विभाजक का कार्य करता है |

 (iii)            नर्मदा और तापी नदियों कों छोड़कर अधिकतर नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं |

  (iv)            प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में निकलने वाली चम्बल, सिंध केन व सोन नदियाँ गंगा नदी तंत्र का अंग है |

    (v)            प्रायद्वीप के अन्य प्रमुख नदी तंत्र गोदावरी, महानदी, कृष्णा और कावेरी हैं |

  (vi)            प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता है कि ये एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती हैं | ये नदियाँ विसर्प नहीं बनाती |

(vii)            ये बारहमासी नहीं है | यद्यपि भ्रंश घाटी में बहने वाली नर्मदा और तापी इसका अपवाद है |

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र का उद्-विकास

अति प्राचीन काल की तीन प्रमुख भू गार्भिक घटनाओं ने आज के प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र कों स्वरूप प्रदान किया है | ये तीन घटनाएँ निम्नलिखित हैं |

     (i)            आरम्भिक टर्शियरी काल के दौरान प्रायद्वीप के पश्चिमी पार्श्व का अवतलन या ध्साँव हुआ | जिससे यह भाग समुद्र तल से नीचे चला गया | इसके मूल जल संभर के दोनों ओर नदी की सामान्यत: सममित योजना में गडबडी हो गई |

   (ii)            हिमालय में होने वाले प्रोत्थान के कारण प्रायद्वीप खंड के उत्तरी भाग का अवतलन हुआ | जिसके परिणाम स्वरूप भ्रंश द्रोणियों का निर्माण हुआ | नर्मदा और तापी इन्हीं घाटियों में बह रही हैं और अपरद पदार्थ से मूल दरारों कों भर रही हैं | इसलिए इन नदियों में जलोढ़ व डेल्टा निक्षेप की कमी पाई जाती है |

 (iii)            इसी काल में प्रायद्वीप खंड उत्तर- पश्चिम दिशा से, दक्षिण – पूर्व दिशा में झुक गया | परिणाम स्वरूप इसका अपवाह बंगाल की खाड़ी ओर उन्मुख हो गया |

प्रायद्वीपीय नदी तंत्र

प्रायद्वीपीय अपवाह की नदियों में अधिकाँश नदियाँ अपना जल बंगाल की खाड़ी में विसर्जित करती है जैसे – गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, तथा महानदी आदि | जबकि नर्मदा और तापी दो बड़ी नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में अपना जल विसर्जित करती है | क्योंकि ये भ्रंश घाटी में बहती है |  इनके अलावा कुछ छोटी नदियाँ भी पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में अपना जल गिराती हैं |

महानदी

महानदी छतीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा के निकट निकलती है और ओडिशा से बहती हुई अपना जल बंगाल की खाड़ी में विसर्जित करती है | यह नदी 851किलोमीटर लम्बी हैं और इसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1.42 लाख वर्ग किलोमीटर है | इसके निचले मार्ग में नौका संचालन भी होता है |  इस नदी की अपवाह द्रोणी का 53 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में और 47 प्रतिशत भाग ओडिशा राज्य में विस्तृत है |

गोदावरी

गोदावरी सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय नदी तंत्र है | इसे ‘दक्षिण गंगा’ के नाम से जाना जाता है | यह महाराष्ट्र में नासिक जिले से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती है | इसकी सहायक नदियाँ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, ओडिशा और आंध्रप्रदेश राज्यों से गुजरती हैं |  यह 1465 किलोमीटर लम्बी नदी है, जिसका जल ग्रहण क्षेत्र 3.13 लाख वर्ग किलोमीटर है | इसके जल ग्रहण क्षेत्र का 49 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में 20 प्रतिशत और मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में और शेष भाग आंध्रप्रदेश में पड़ता है |

इसकी मुख्य सहायक नदिययों में पेनगंगा, इन्द्रावती, प्राणहिता और मंजरा हैं | पोलावरम के दक्षिण में जहाँ इसके मार्ग के निचले भागों में भारी बाढ़ें आती है | गोदावरी एक सदृश्य प्रपात की रचना करती है | इसके डेल्टाई भाग में ही नौका संचालन सम्भव है
 राजमुंदरी के बाद यह नदी कई धाराओं में विभक्त होकर एक बृहद डेल्टा का निर्माण करती है |

कृष्णा नदी

कृष्णा पूर्व दिशा में बहने वाली दूसरी सबसे बड़ी नदी है, जो सह्याद्री में महाबलेश्वर के निकट निकलती है | इसकी कुल लम्बाई 1401 किलोमीटर है | कोयना, तुंगभद्रा और भीमा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं | इस नदी के कुल जल ग्रहण क्षेत्र का 27 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में 44 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 29 प्रतिशत भाग आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में पड़ता है | 

कावेरी नदी

कावेरी नदी कर्नाटक के कोगाडु जिले में ब्रह्मगिरी पहाड़ियों से 1341मीटर की ऊँचाई से निकलती हैं | इसकी लम्बाई 800  किलोमीटर है | यह नदी  81,155 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कों अपवाहित करती है | प्रायद्वीप की अन्य नदियों की अपेक्षा कम उतार –चढ़ाव के साथ यह नदी लगभग सारा साल बहती है | क्योंकि इसके ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्र में दक्षिण –पश्चिम मानसून (गर्मी)  से और निम्न क्षेत्रों में उत्तर – पूर्वी मानसून (सर्दी) से वर्षा होती है | इस नदी द्रोणी का 3 प्रतिशत भाग केरल में, 41 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और  56 प्रतिशत भाग तमिलनाडु में पड़ता है | इसकी महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ काबीनी, भवानी और अमरावती है |

नर्मदा नदी

नर्मदा नदी अमरकंटक पठार के पश्चिमी पार्श्व (किनारे) से लगभग 1057मीटर की ऊँचाई से निकलती है | दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में विन्ध्याचल के मध्य यह नदी भ्रंश घाटी से बहती हुई संगमरमर की चट्टानों में खूबसूरत महाखड्ड और जबलपुर के निकट धुँआधार जल प्रपात बनाती है | लगभग 1312 किलोमीटर दूरी तक बहने के बाद यह भड़ौच के दक्षिण में अरब सागर में मिलती है और 27 किलोमीटर लम्बा ज्वारनदमुख बनाती है | सरदार सरोवर परियोजना इसी नदी पर बनाई गई है |

तापी नदी

तापी पश्चिम में बहने वाली एक अन्य महत्वपूर्ण प्रायद्वीपीय नदी है | यह मध्य प्रदेश में बेतूल जिले में मुलताई से निकलती है | यह 724 किलोमीटर लम्बी है और लगभग 65145 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कों अपवाहित करती है | इसके अपवाह क्षेत्र का 79 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 15 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश में और शेष 6 प्रतिशत भाग गुजरात में पड़ता है |

लूनी नदी

अरावली के पश्चिम में लूनी राजस्थान का सबसे बड़ा नदी तंत्र है | यह पुष्कर के समीप दो धाराओं सरस्वती और सगरमती के रूप में उत्पन्न होती है | ये दोनों नदियाँ गोविन्दगढ़ के निकट आपस में मिल जाती है | यहाँ से यह नदी अरावली पहाड़ियों से निकलती है और लूनी कहलाती है | तलवाडा तक यह पश्चिम दिशा में बहती है और उसके बाद दक्षिण –पश्चिम दिशा में बहती हुई कच्छ के रन में जा मिलती है | यह संपूर्ण नदी तंत्र अल्पकालिक है |

भारत में नदियाँ प्रदूषित होने के कारण

     (i)            शहरों के गंदे पानी कों नालों और शिविरों के माध्यम से नदियों में गिराया जाता है |

   (ii)            औद्योगिक कूड़ा -करकट नदियों में विसर्जित कर दिया जाता है |

 (iii)            बहुत से श्मशान घाट नदियों के किनारे बने हुए हैं | कई बार मृत शरीरों कों नदियों में डाल दिया जाता है |

  (iv)            त्योहारों पर फूलों और मूर्तियों कों नदियों में विसर्जन के नाम पर इन्हें प्रदूषित किया जाता है |

    (v)            बड़े पैमाने पर स्नान व कपड़ों का धोना भी नदियों के जल कों प्रदूषित करता है |