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Thursday, July 23, 2026

LESSON 1 GEOGRAPHY AS A DISCIPLINE (CLASS 11TH )

 

कक्षा -11वीं

भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय 1 भूगोल एक विषय के रूप में

भूगोल का अर्थ

भूगोल कों अंग्रेजी भाषा में ज्योग्राफी (Geography) कहा जाता है | जो दो शब्दों Geo + graphy से मिलकर बना है | यह ग्रीक भाषा के शब्द “Geographos” का रूपान्तरण है | जिसमें “Geo” का अर्थ है पृथ्वी और “Graphos” का अर्थ है वर्णन | अत: Geography का अर्थ है पृथ्वी का वर्णन | इस प्रकार भूगोल के विद्वान भूगोल कों मानव निवास के रूप में पृथ्वी का अध्ययन मानते है |

ज्योग्राफी (Geography) शब्द का सबसे पहले प्रयोग ग्रीक विद्वान इरेटोस्थेनीज ने किया था |

भूगोल की परिभाषा

भूगोल का अध्ययन एक विस्तृत अध्ययन है | इसे कुछ शब्दों के द्वारा और सीमाओं में रखकर परिभाषित नहीं किया जा सकता | फिर भी भूगोल के विभिन्न विद्वानों ने भूगोल कों अनेक प्रकार से परिभाषित किया है | उनमें से कुछ की परिभाषाएँ निम्नलिखित है |

अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि एक विषय के रूप में भूगोल मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है |  यह पृत्वी पर पायी जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन भी करता है |  साथ ही वह उन कारकों का भी अध्ययन करता है जिनके प्रभाव से मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों में  ये भिन्नताएँ  पायी जाती है |

स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत किस प्रकार की  जानकारी प्राप्त होती है

            स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत तीन मुख्य कारकों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ये निम्नलिखित है |

1.       भौतिक पर्यावरण

2.       मानवीय क्रियाएँ

3.       भौतिक पर्यावरण और मानवीय क्रियाओं के बीच अंतरप्रक्रियात्मक सम्बन्ध  

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल क्यों पढ़ना चहिये ?

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल निम्नलिखित कारणों से पढ़ना चाहिए |

1.       पृथ्वी हमारा घर है | अत: पृथ्वी के विभिन्न घटकों, उसके पर्यावरण और उसके विभिन्न संसाधनों के कारण हमारा जीवन प्रभावित होता है | इन घटकों, हमारे आसपास के पर्यावरण और हमारे लिए उपयोगी संसाधनों का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

2.       विभिन्न संसाधनों  जैसे भूमि, जल, खनिज, मृदा आदि का उपयोग करते हुए हम भोजन प्राप्त करतें है और विभिन्न क्रियाकलाप करते हुए जीवन यापन करते है |  विभिन्न क्षेत्रों में कौन –कौन से संसाधन है और कितनी मात्रा में है उनके क्या उपयोग है इन सभी का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

3.       हम विभिन्न प्रकार  की जलवायु में रहते है और इसी तरह विभिन्न मौसम हमारे जीवन कों प्रभावित करते है | जलवायु और मौसम के तत्वों, उनको प्रभावित करने वाले कारकों  का अध्ययन हम भूगोल के अध्ययन के रूप में करते है और जलवायु और मौसम के मानव जीवन के प्रभावों और उसके कारण उत्त्पन्न भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत ही करते है अत: हमें भूगोल पढ़ना चाहिए |

4.       मानव द्वारा किए जाने वाले  विभिन्न क्रियाकलाप और उनके पर्यावरण पर प्रभावों का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत करते है इसलिए भी भूगोल का अध्ययन जरुरी है |

5.       विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं के कारण, प्रभाव और उनका क्षेत्रीय अध्ययन हम भूगोल में मुख्य रूप से करते है | साथ ही उनसे निपटने के उपायों का भी अध्ययन इस विषय में प्रमुखता से किया जाता है |

6.       भूगोल विविधता कों समझने और ऐसी विविधताओं कों उत्त्पन्न करने वाले कारकों का अध्ययन करता है  अत: इसका अध्ययन आवश्यक है |

7.        समय और स्थान के साथ होने वाले परिवर्तनों का  अध्ययन भूगोल के अंतर्गत किया जाता है | जिससे इन्हें समझने में आसानी होती है |

8.       भूगोल के द्वारा हम मानचित्र में परिवर्तित ग्लोब कों समझने में सहायता मिलती है |

9.       इस विषय के अध्यन्न से मानचित्र में दिए गए दृश्य कों समझने की क्षमता विकसित होती है |

10.   भूगोल में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों जैसे भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS), कंप्यूटर आधारित मानचित्र कला आदि में आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है जिससे आप राष्ट्रीय स्तर पर अपना योगदान दे सकते है |

भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है          या        

भूगोल बहु-आयामी पृथ्वी का अध्ययन

भूगोल वास्तविकता या यथार्थता का अध्ययन करता है | पृथ्वी की वास्तविकता भी बहु-आयामी है | क्योंकि हम पृथ्वी के विभिन्न भौतिक पक्षों जैसे भौमिकी, मृदा, जलवायु, समुद्रों और वनों के साथ-साथ मानवीय पक्षों जैसे जनसँख्या संबंधी विशेषताएँ जैसे घनत्व, लिंग अनुपात, आर्थिक क्रियाकलाप आदि का अध्ययन करते है जो बहु आयामी हो जाता है | अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्र विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी की वास्तविक और बहु-आयामी प्रकृति का अध्यन्न भूगोल का मुख्य कार्य है इसलिए ही भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है |

भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन  

भूगोल पृथ्वी का अध्ययन है | भू-तल पर बहुत भिन्नताएँ देखने कों मिलती है | ये भिन्नताएँ प्राकृतिक और सांस्कृतिक वातावरण से सम्बन्धित होती है |  अनेक तत्वों में समानताओं के साथ-साथ असमानताएँ भी होती है इन्ही असमानताओं कों क्षेत्रीय विभिन्नता का नाम दिया जाता है |  इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल में करते है | अत: भूगोल कों भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन भी कहते है | क्षेत्रीय विभिन्न्ताओं का अध्ययन करना भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इस प्रकार भूगोल उन सभी तथ्यों का अध्ययन करता है जो क्षेत्रीय संदर्भ में भिन्नता लिए हुए है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए  रिचार्ड हार्टशोर्न  महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

 रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

            भूगोल में हम केवल धरातल में विभिन्नता का अध्ययन नहीं करते बल्कि उन कारकों का भी अध्ययन करते है जो इन विभिन्नताओं के कारण है | उदाहरण के लिए फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन्न होता है  किन्तु यह भिन्नता मिट्टी, जलवायु, बाज़ार कि माँग, किसानों की व्यय क्षमता और तकनीकी निवेश कि उपलब्धता  आदि में भिन्नता से प्रभावित होती है | अत: भूगोल किन्ही दो तत्वों के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध भी ज्ञात करता है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए अल्फेर्ड हेटनर महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

  अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

भूगोल एक गत्यात्मक अध्ययन       या   

भूगोल एक परिवर्तनशील अध्ययन

भूगोल में हम भौतिक और मानवीय तथ्यों का अध्ययन करते है |  भौतिक और मानवीय  दोनों ही प्रकार के तथ्य स्थैतिक नहीं है बल्कि गत्यात्मक है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी और अथक एवं निरंतर प्रयत्नशील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है |  परिवर्तनशील अथवा गत्यात्मक तथ्यों का अध्ययन भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इसी कारण ही भूगोल गत्यात्मक या परिवर्तनशील अध्ययन कहलाता है |

भूगोल एक समाकलनात्म्क और संश्लेषित विज्ञान       या 

भूगोल समाकलन और संश्लेषण का अध्ययन

 प्राकृतिक और सामाजिक  दोनों ही प्रकार के विज्ञानों का मूल उद्देश्य  वास्तविकता (यथार्थता) कों ज्ञात करना | इसलिए प्रत्येक विज्ञान सभी अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध स्थापित करता हुआ  वास्तविकता (यथार्थता) कों प्राप्त करना चाहता है | भूगोल भी अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्र विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी तल पर चल रही प्रत्येक घटना की वास्तविकता कों जानता है |  इनके सहयोग से भौगोलिक अध्ययन सरल हो जाता है | विभिन्न विज्ञानों के साथ मिलकर अध्ययन करने कों ही समाकलन कहते है अत: स्पष्ट है कि भूगोल एक समाकलनात्म्क विज्ञान है |

भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध स्थापित है | इन विज्ञानों के विभिन्न घटकों से प्राप्त ज्ञान कों संश्लेषित करके भूगोल में इनका अध्ययन होता है इसलिए ही भूगोल कों संश्लेषित विज्ञान कहा जाता है |

भूगोल प्रकृति तथा मानव के बीच अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन

भौगोलिक तथा मानवीय दोनों ही प्रकार के कारक स्थैतिक (स्थाई) ना होकर हमेशा गतिशील (गत्यात्मक) रहते है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी अथक एवं निरंतर प्रयत्न शील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है | आदिमानव समाज अपने पर्यावरण पर ही निर्भर रहता था और उसी के अनुसार व्यवहार करता था | समय के साथ-साथ तकनीक उपलब्ध होने पर अब ऐसा नहीं है वह अपने अनुसार वातावरण कों ढालने लगा है | इस तरह आदिम समाज से लेकर वर्तमान तक प्रकृति और मानव के बीच के विभिन्न अंत: प्रक्रियाएं होती रही | इन अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन  हम भूगोल में करते है इसलिए भूगोल कों अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन कहा जाता है |

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है | ये निम्नलिखित है |

1.       क्या- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के प्रतिरूप की पहचान से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  ये क्या है ? अत: ये प्रश्न “क्या” से सम्बन्धित होते  है |

2.       कहाँ- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के वितरण  से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  कोई वस्तु या तत्व कहाँ पर स्थित है ? अत: ये प्रश्न “कहाँ ” से सम्बन्धित होते  है |

3.       क्यों- तीसरे प्रकार के प्रश्न व्याख्या से सम्बन्धित होते है जो तत्वों और तथ्यों के किसी स्थान पर होने या ना होने के कारण से जुड़े होते है | ये  तत्वों और तथ्यों के बीच कार्य –कारण सम्बन्ध से जुड़े होते है | जिसका मतलब है कोई वस्तु या तत्व किसी स्थान पर “क्यों” है? अत: ये प्रश्न “क्यों ” से सम्बन्धित होते  है |

भूगोल के उपागम (क्रमबद्ध और प्रादेशिक उपागम में अन्तर)

भूगोल का अध्ययन एक अंतर्शिक्षण (Interdisciplinary) विषय है | प्रत्येक विषय का अध्ययन कुछ विशेष उपागमों के अनुसार किया जाता है | इस दृष्टि से भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम हैं | (1) विषय वस्तुगत (क्रमबद्ध) उपागम तथा (2) प्रादेशिक उपागम |

क्रमबद्ध उपागम (क्रमबद्ध भूगोल)

     (i)            भूगोल के क्रमबद्ध उपागम कों जर्मनी के प्रसिद्ध भूगोलवेता अलक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के द्वारा प्रवर्तित किया गया |

   (ii)            विषय वस्तुगत भूगोल या  सामान्य भूगोल का उपागम,  क्रमबद्ध उपागम ही हैं |

 (iii)            इस उपागम में एक तथ्य का पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है | उसके बाद क्षेत्रीय स्वरूप के वर्गीकृत प्रकारों की पहचान की जाती है |

  (iv)            उदाहरण के लिए यदि कोई प्राकृतिक वनस्पति के अध्ययन में रूचि रखता है, तो सर्वप्रथम विश्व स्तर पर उसका अध्ययन किया जाएगा, फिर वनस्पति के प्रकारों के आधार पर वर्गीकरण जैसे विषुवतरेखीय सदाबाहर वन, नरम लकड़ी वाले कोणधारी वन अथवा मानसूनी वन इत्यादि की पहचान, उनका विवेचन तथा सीमांकन करना होगा |

प्रादेशिक उपागम (प्रादेशिक भूगोल)

     (i)            प्रादेशिक भूगोल का विकास हम्बोल्ट के समकालीन जर्मन भूगोलवेत्ता कार्ल रिटर द्वारा किया गया |

   (ii)            प्रादेशिक उपागम में विश्व कों विभिन्न पदानुक्रमित स्तर के प्रदेशों में विभक्त किया जाता है और फिर एक विशेष प्रदेश में सभी भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है |

 (iii)            ये प्रदेश प्राकृतिक, राजनीतिक या निर्दिष्ट (नामित) प्रदेश हो सकते हैं | एक प्रदेश में तथ्यों का अध्ययन समग्रता से विविधता में एकता की खोज करते हुए किया जाता है |

विषय वस्तुगत या क्रमबद्ध उपागम के आधार पर भूगोल की शाखाएँ  

 क्रमबद्ध उपागम के आधार पर भूगोल की दो प्रमुख शाखाएँ हैं | भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल |

 (1) भौतिक भूगोल :

भूगोल की इस प्रमुख शाखा में निम्नलिखित उपशाखाएँ शामिल की जाती हैं | भू –आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान,  जल विज्ञान  तथा मृदा भूगोल | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न लिखित है |

 भू –आकृति विज्ञान:  

यह भू-आकृतियों, उनके क्रम विकास एवं संबंधित प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है |

 जलवायु विज्ञान:

इसके अंतर्गत वायुमंडल  की संरचना, मौसम तथा जलवायु के तत्व, जलवायु के प्रकार तथा जलवायु प्रदेश का अध्ययन किया जाता है |

जल विज्ञान:

यह धरातल के जल परिमंडल जिसमें समुद्र, नदी , झील तथा अन्य जलाशय सम्मिलित हैं तथा उसका मानव सहित विभिन्न प्रकार के जीवों एवं उनके कार्यों पर प्रभाव का अध्ययन है |

मृदा भूगोल:

यह मिट्टी के निर्माण की प्रक्रियाओं, मिट्टी के प्रकार, उनका उत्पादकता स्तर, वितरण एवं उपयोग आदि के अध्ययन से सम्बन्धित है | 

मानव भूगोल

यह भूगोल की दूसरी प्रमुख शाखा है इसके  अंतर्गत निम्नलिखित उपशाखाओं का अध्ययन किया जाता है | सामजिक /सांस्कृतिक भूगोल, जनसंख्या एवं अधिवास भूगोल, आर्थिक भूगोल. ऐतिहासिक भूगोल  राजनीतिक भूगोल आदि | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

सामाजिक /सांस्कृतिक भूगोल :

इसके अंतर्गत समाज तथा इसकी स्थानिक /प्रादेशिक गत्यात्मकता एवं समाज के योगदान से निर्मित सांस्कृतिक सांस्कृतिक तत्वों का अध्ययन किया जाता है |

जनसंख्या भूगोल :

यह ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि उसका वितरण, घनत्व, लिंग –अनुपात, प्रवास एवं व्यवसायिक संरचना आदि का अध्ययन करता है |

अधिवास भूगोल

अधिवास भूगोल में ग्रामीण तथा नगरीय अधिवासों के वितरण प्रारूप तथा अन्य विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है |

आर्थिक भूगोल:

यह मानव की आर्थिक क्रियाओं, जैसे –कृषि, उद्योग, पर्यटन, व्यापार एवं परिवहन, अवस्थापना तत्व एवं सेवाओं का अध्ययन है |

ऐतिहासिक भूगोल:

ऐतिहासिक भूगोल उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है जो क्षेत्र कों संगठित करती हैं | प्रत्येक प्रदेश वर्तमान स्थिति में आने से पूर्व ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरता है | भौगोलिक तत्वों में भी सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं और इसी की व्याख्या ऐतिहासिक भूगोल का उद्देश्य है |  

राजनीति भूगोल:

राजनीति भूगोल क्षेत्र कों राजनीतिक घटनाओं की दृष्टि से देखता है | यह सीमाओं, निकटस्थ पड़ोसी इकाइयों के मध्य भू –वैन्यासिक संबंध, निर्वाचन क्षेत्र का परिसीमन एवं चुनाव परिदृश्य का विश्लेषण करता है | साथ ही जनसंख्या के राजनीतिक व्यवहार कों समझने के लिए सैद्धांतिक रूप रेखा विकसित करता है |

जीव भूगोल :

भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल के अन्तरापृष्ठ (Interface) के फलस्वरूप जीव –भूगोल का अभ्युदय हुआ | इसके अंतर्गत निम्नलिखित शाखाएँ आती हैं | जीव भूगोल, वनस्पति भूगोल, पारिस्थैतिक विज्ञान तथा पर्यावरण भूगोल | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

जीव भूगोल:

भूगोल की इस शाखा में पशुओं एवं उनके निवास क्षेत्र के स्थानिक स्वरूप एवं भौगोलिक विशेषताओं का अध्ययन होता है |

वनस्पति भूगोल :

यह शाखा प्राकृतिक वनस्पति का उसके निवास क्षेत्र (Habitat) में स्थानिक प्रारूप का अध्ययन करती है |

पारिस्थैतिक विज्ञान:

जीव भूगोल की इस शाखा में प्रजातियों (Species) के निवास/स्थिति क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है |

पर्यावरण भूगोल:

सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण प्रतिबोधन के फलस्वरूप पर्यावरणीय समस्याओं, जैसे भूमि ह्रास (भूमि निम्नीकरण), प्रदूषण, संरक्षण की चिंता आदि का अनुभव किया गया | जिसके अध्ययन के लिए भूगोल की इस शाखा का विकास हुआ |  

 

प्रादेशिक उपागम पर आधारित भूगोल की शाखाएँ

प्रादेशिक अध्ययन पर आधारित भूगोल की निम्नलिखित शाखाएँ हैं |

     (i)            बृहद, मध्यम, लघु स्तरीय प्रादेशिक/क्षेत्रीय अध्ययन

   (ii)            ग्रामीण/इलाका नियोजन तथा शहर एवं नगर नियोजन सहित प्रादेशिक नियोजन |

 (iii)            प्रादेशिक विकास

  (iv)            प्रादेशिक विवेचना /विश्लेषण

 क्रमबद्ध और  प्रादेशिक उपागमों के अतिरिक्त दो उभयनिष्ठ पक्ष

क्रमबद्ध और  प्रादेशिक उपागमों के अतिरिक्त दो पक्ष ऐसे हैं जो सभी विषयों के लिए उभयनिष्ठ हैं |ये दो विषय हैं दर्शन तथा विधितंत्र एवं तकनीक

दर्शन :

दर्शन के अंतर्गत (i) भौगोलिक चिंतन और (ii)भूमि एवं मानव अंतर्प्रक्रिया/ मानव पारिस्थिकी शामिल किए जाते हैं |

विधितंत्र एवं तकनीक:

इनके  अंतर्गत निम्नलिखित शामिल है |

     (i)            सामान्य एवं संगणक आधारित मानचित्रण ,

   (ii)            परिमाणात्मक एवं सांख्यिकी

 (iii)            क्षेत्र सर्वेक्षण विधियाँ

  (iv)            भू –सूचना विज्ञान तकनीक (Geoinformatics) जैसे –दूर संवेदन तकनीक (Remote Sensing Technology), भौगोलिक सूचना तंत्र (Geographical Information System –G.I.S.), वैश्विक स्थितीय तंत्र (Global Positioning System-G.P.S.) |

 


Tuesday, July 21, 2026

LESSON 1 POPULATION DISTRIBUTION , DENSITY AND COMPOSITION (INDIA PEOPLE AND ECONOMY) CLASS 12TH GEOGRAPHY

 

अध्याय 1

जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

कक्षा- 12 (भूगोल)

भारत की जनसंख्या

            भारत विश्व के अधिकतम जनसंख्या वाले देशों में से एक है | भारत विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 2.4 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है जबकि यहाँ पर विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है |

            सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ है | जनसंख्या के हिसाब से भारत चीन के बाद दूसरा स्थान है | भारत की कुल जनसंख्या उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक है |

भारत की विशाल जनसंख्या का प्रभाव

विशाल जनसंख्या के कारण बहुत अधिक समस्याएँ सामने आती है | जो निम्नलिखित हैं |

1)      प्राय: यह तर्क दिया जाता है कि इतनी बड़ी जनसंख्या निश्चित तौर पर देश के सीमित संसाधनों पर दबाव डालती है |

2)      देश में अनेक सामाजिक आर्थिक समस्याओं के लिए उत्तरदायी है |

3)      जनसंख्या के अधिक बोझ के कारण गरीबी एक विकराल रूप धारण कर रही है |

4)      विशाल जनसंख्या ने पर्यावरण संबंधी कई समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं |

भारत में जनसंख्या की गणना (जनगणना)  या जनसंख्या के आँकड़ों के स्त्रोत

भारत में जनसंख्या से संबंधित आँकडों कों प्रति दस वर्ष के बाद होने वाली जनगणना के द्वारा एकत्रित किए जाते है | भारत में पहली जनगणना 1872 ई० में हुई थी | लेकिन यह पूर्ण नहीं थी | भारत की पहली सम्पूर्ण जनगणना  1881 ई० में हुई थी |  हमारे देश की अंतिम जनगणना सन् 2011 में हुई थी | अब तक कुल 14 संपूर्ण जनगणना हो चुकीं है | अगली (पंद्रहवी) जनगणना सन् 2021 में होनी है |  

भारत में जनसंख्या वितरण

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल  जनसंख्या 121.02 करोड़ है | भारत की इतनी विशाल जनसंख्या समान रूप से देश में वितरित नहीं है बल्कि असमान रूप से देश के विभिन्न भागों में वितरित है |

देश के विशाल आकार वाले राज्यों की जनसंख्या कों देखते है तो पता चलता है कि उत्तरप्रदेश भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है  यहाँ  सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 19.95 करोड़ लोग रहते हैं | 11.23 करोड़ जनसंख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है | बिहार में 10.38 करोड़ जनसंख्या निवास करती है | इसके बाद पश्चिम बंगाल में 9.13 करोड़ तथा आंध्रप्रदेश की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 8.46 करोड़ थी | ये पाँच बड़े राज्यों में देश की लगभग 50 % (आधी) जनसंख्या पाई जाती है | देश के दस राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र , बिहार,बंगाल पश्चिम बंगाल आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान कर्नाटक तथा गुजरात भारत की लगभग 76 प्रतिशत जनसंख्या रहती है |  

            जबकि विशाल आकार होते हुए भी कुछ राज्य ऐसे है जिनमें बहुत ही कम जनसंख्या रहती है | जैसे सन् 2011 की जनगणना के अनुसार ही जम्मूकश्मीर में देश की केवल 1.04 %, अरुणाचलप्रदेश  में देश की  0.84% तथा उत्तराखंड में  केवल 0.83 % जनसंख्या ही निवास करती है | क्षेत्रफल की हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में कुल जनसंख्या का केवल 5.67% हिस्सा ही रहता है |

            सिक्किम सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य है जहाँ लगभग 6 लाख लोग ही रहते है | जो देश की जनसंख्या का केवल 0.05% जनसंख्या ही है | इसके अलावा अधिकाशं उत्तरी पूर्वी राज्यों जैसे नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश राज्यों में देश की बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है |

 

केन्द्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में सबसे अधिक जनसंख्या मिलती है | जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप समूह में बहुत ही कम संख्या में लोग रहते हैं |

 

जनसंख्या का विषम स्थानिक वितरण जनसंख्या और देश के भौतिक, समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध  

या

भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के कारण

भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है | जनसंख्या का यह विषम स्थानिक वितरण देश की जनसंख्या और देश के भौतिक (भौगोलिक ), समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध प्रकट करता है |  ये कारक जनसंख्या के वितरण कों अत्यधिक प्रभावित करते है | इनका वर्णन निम्न प्रकार से है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक

भौतिक कारकों में धरातल, जलवायु तथा जल की उपलब्धता आदि प्रमुख है | ये कारक जनसंख्या के वितरण कों काफी प्रभावित करते हैं | जैसे भारत के उत्तरी मैदान, डेल्टाओं और तटीय मैदानों में जनसंख्या का अनुपात दक्षिणी तथा मध्य भारत के राज्यों के आंतरिक जिलों में अधिक है क्योंकि मैदानी भाग पर लोग अधिक रहना पसंद करते है |

            हिमालय, उत्तरी-पूर्वी राज्यों में विरल जनसंख्या पाई जाती है | जो की पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी विरल जनसंख्या मिलती है |

हिमालय पर्वतीय राज्यों में खास तौर पर हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर में विषम जलवायु के कारण बहुत ही कम लोग रहते है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी जलवायु की विषमता  तथा जल की कमी लोगों के रहने के उपयुक्त स्थान नहीं उपलब्ध होने देती है अत: वहाँ भी जनसंख्या विरल है |

कुछ पठारी क्षेत्रों में भी भौतिक कारकों के करण जैसे जल की की कमी से जनसंख्या अपेक्षाकृत कम मिलती है |

            इन क्षेत्रों में नहरों के विकास तथा आर्थिक विकास संबंधी कर उपलब्ध कराने के बाद जनसंख्या का अनुपात उच्च होता जा रहा है | जैसे राजस्थान में  इंदिरा गाँधी नहर से सिंचाई की व्यवस्था के बढ़ने और झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार में खनिजों एवं ऊर्जा के अपार भण्डारों के कारण इन राज्यों में मध्यम से उच्च जनसंख्या अनुपात मिलता है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारक

इन कारकों में स्थाई कृषि उद्भव और विकास, मानव बस्ती के प्रतिरूप, परिवहन जाल तंत्र का विकास, औद्योगिकरण और नगरी करण महत्वपूर्ण हैं |

समान्यत: नदी घाटियों के मैदानों, तथा तटीय क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है | क्योंकि इन इलाकों में मानव बस्तियों के आरम्भिक इतिहास और परिवहन जाल तंत्र के विकास के कारण जनसंख्या का सांद्रण  उच्च बना हुआ है |

दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलौर, पुणे, अहमदाबाद, चेन्नई और जयपुर के नगरीय क्षेत्र औद्योगि विकास तथा नगरीकरण के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों कों अपनी और आकृषित कर रहे है | इसलिए इन क्षेत्रों में जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है |  

भारत में जनसंख्या का घनत्व का राज्य स्तरीय वितरण

2011की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व  382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था | लेकिन राज्य स्तर पर देखते है तो जनसंख्या घनत्व में  बहुत अधिक विषमताएँ  पाई जाती है | क्योंकि धरातल, वर्षा, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, खनिज संसाधनों का वितरण, उद्योग तथा शहरीकरण आदि जनसंख्या के घनत्व कों बहुत अधिक प्रभावित करते है | अत: राज्य तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के स्तर पर जनसंख्या घनत्व कों समझना आनिवार्य  हो जाता है |

भारत के जनसंख्या घनत्व का वर्णन निम्न प्रकार से है |

जनसंख्या का घनत्व

जनसंख्या के घनत्व को प्रति इकाई क्षेत्र में व्यक्तियों की संख्या द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है | इससे भूमि के संदर्भ में जनसंख्या के स्थानिक वितरण को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलती है | 2011की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व  382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | 1951 में जनसंख्या का घनत्व 117 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमेटर होने से पिछले 50 वर्षों में 250 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक की उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है |  2011 की जनगणना के आँकड़ों से हमें देश की जनसंख्या घनत्वों की स्थानिक भिन्नता का आभास होता है | जो अरुणाचल प्रदेश में सबसे कम 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से लेकर दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 11297 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हैं |

उत्तरी भारत के राज्यों बिहार (1102), पश्चिम बंगाल (1029) तथा उत्तर प्रदेश (828) में जनसंख्या घनत्व उच्चतर है जबकि प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में केरल (859 ) और तमिलनाडु (555) में उच्चतर घनत्व पाया जाता है | असम, गुजरात, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, ओडिशा में मध्यम घनत्व पाया जाता है | हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय राज्यों और असम को छोड़कर भारत के उत्तरी –पूर्वी राज्यों में अपेक्षाकृत निम्न जनसंख्या घनत्व है | जबकि अंडमान और निकोबार द्वीपों को छोड़कर केन्द्र-शासित प्रदेशों में जनसंख्या के उच्च घनत्व पाए जाते हैं |

            जनसंख्या का घनत्व एक अशोधित माप है | कुल कृषित भूमि पर जनसंख्या के दबाव के संदर्भ में मानव भूमि अनुपात के बेहतर परिज्ञान के लिए कायिक और कृषीय घनत्वों का ज्ञात करना चाहिए जो भारत जैसे विशाल कृषि वाले देश के लिए सार्थक है    

 

नसंख्या घनत्व का माप

जनसंख्या का घनत्व जनसंख्या के वितरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने का महत्वपूर्ण माप है | इसे तीन प्रकार से मापा जा सकता है |  अंकगणितीय घनत्व ,  कायिक (पोषक घनत्व )  कृषि घनत्व | इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

1.       अंकगणितीय घनत्व : 

प्रति इकाई क्षेत्रफल में रहने वाले लोगों की संख्या कों उस क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व कहते है | यह जनसंख्या तथा भूमि के क्षेत्रफल के बीच एक साधारण अनुपात है |  इसे व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर में व्यक्त करते हैं | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |

जनसंख्या घनत्व = कुल जनसंख्या/ कुल क्षेत्रफल

उदाहरण के लिए एक प्रदेश का क्षेत्रफल 100 वर्ग किलोमीटर है | और उसकी 1,50,000 जनसंख्या है | तो जनसंख्या घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |

जनसंख्या घनत्व = 1,50,000 / 100     = 1500 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर

2.       कायिक या पोषक घनत्व )

किसी क्षेत्र की कुल जनसंख्या तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कायिक या पोषक घनत्व कहते है | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |

कायिक घनत्व = कुल जनसंख्या/ शुद्ध कृषि क्षेत्र

उदाहरण के लिए भारत की कुल जनसंख्या लगभग 121 करोड़ है तथा  शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्रफल 14.26 लाख वर्ग किलोमीटर है | तो कायिक घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |

 कायिक घनत्व = 121 करोड़ / 14.26 लाख वर्ग किलोमीटर     = 848 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर

3.       कृषीय  घनत्व

किसी क्षेत्र की कुल कृषीय जनसंख्या (कृषि कार्यों में लगे लोग) तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कृषीय  घनत्व कहते है | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |

कृषीय घनत्व = कुल कृषीय जनसंख्या जनसंख्या/ शुद्ध कृषि क्षेत्र

उदाहरण के लिए भारत की कुल जनसंख्या लगभग 150,000 है तथा शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्रफल 100 वर्ग किलोमीटर है | तो कृषीय घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |

कृषीय घनत्व = 150,000  / 100     = 1500 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर

जनसंख्या वृद्धि

जनसंख्या वृद्धि दो समय बिंदुओं के बीच किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की संख्या में परिवर्तन को कहते हैं | इसकी दर को प्रतिशत में अभिव्यक्त किया जाता है | जनसंख्या वृद्धि के दो घटक होते हैं |

जिनके नाम है | प्राकृतिक (Natural) जनसंख्या वृद्धि  और अभिप्रेरित (Induced) ) जनसंख्या वृद्धि  |

प्राकृतिक (Natural) जनसंख्या वृद्धि 

प्राकृतिक वृद्धि का विश्लेषण अशोधित जन्म और मृत्यु दरों से निर्धारित किया जाता है |

अभिप्रेरित (Induced) ) जनसंख्या वृद्धि 

अभिप्रेरित घटकों को किसी दिए गए क्षेत्रों में लोगों के अंतर्वर्ती और बहिर्वर्ती संचलन की प्रबलता (प्रवास की प्रबलता) द्वारा स्पष्ट किया जाता है | 

भारत में जनसंख्या वृद्धि की प्रावस्थाएँ (अवस्थाएँ)

भारत की जनसंख्या के दोनों दशकीय और वार्षिक वृद्धि दर बहुत ऊँचे हैं  और समय के साथ नित्य बढ़ रहे है | भारत की जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.64 प्रतिशत है | विगत एक शताब्दी में भारत में जनसंख्या की वृद्धि वार्षिक जन्म दर और मृत्यु दर तथा प्रवास की दर के कारण हुई है और इसलिए यह वृद्धि विभिन्न प्रवृतियों को दर्शाती है | इस अवधि में वृद्धि की चार सुस्पष्ट प्रावस्थाओं को पहचाना गया है |  जो निम्नलिखित हैं |

सन् 1901 से 1921बीच की अवधि (रूद्ध अथवा स्थिर प्रावस्था)

1)      सन् 1901 से 1921 के बीच की अवधि को भारत की जनसंख्या की वृद्धि की रूद्ध अथवा स्थिर प्रावस्था कहा जाता है |

2)      इस अवधि में जनसंख्या वृद्धि दर अत्यंत निम्न थी |

3)      1911 से 1921 के दौरान ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई |

4)      इस प्रावस्था में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ऊँचे थे | जिससे वृद्धि दर निम्न बनी रही |  

5)      स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं का निम्न स्तर, अधिकतर लोगों की निरक्षरता, भोजन और अन्य आधारभूत आवश्यकताओं का अपर्याप्त वितरण होना इस अवधि में उच्च जन्म और मृत्यु दरों के लिए उत्तरदायी थे |

सन् 1921 से 1951बीच की प्रावस्था (स्थिर वृद्धि की अवधि)

1)      1921  से 1951 के दशकों को जनसंख्या की स्थिर वृद्धि की अवधि के रूप मे जाना जाता है |

2)      इस अवधि मे देश भर में स्वास्थ्य और स्वच्छता में व्यापक सुधारों ने मृत्यु दर को नीचे ला दिया था |

3)      बेहतर परिवहन और संचार तंत्र से वितरण प्रणाली में सुधार हुआ | फलस्वरूप अशोधित जन्म दर ऊँची बनी रही जिससे पिछली प्रावस्था की तुलना में वृद्धि दर उच्चतर हुई | 

4)      1920 के दशक की महान आर्थिक मंदी और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में यह वृद्धि प्रभावशाली थी |

सन् 1951 से 1981बीच की प्रावस्था (जनसंख्या विस्फोट की अवधि)

1)      1951 से 1981 के दशकोण को भारत में जनसंख्या विस्फोट की अवधि के रूप में जाना जाता है |

2)      यह देश में मृत्यु दर में तीव्र ह्रास और जनसंख्या की उच्च प्रजनन दर के कारण हुआ |

3)      इस अवधि में औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत तक ऊँची बनी रही |

4)      स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यही वह अवधि जिसमें एक केन्द्रीकृत नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से विकसात्मक कार्यों को आरंभ किया गया | अर्थव्यवस्था सुधरने लगी | जिससे अधिकांश लोगों के जीवन की दशाओं से सुधार सुनिश्चित हुआ |

5)      परिणाम स्वरूप जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि उच्च  रही और वृद्धि दर उच्चतर बनी रही |

6)      इन सबके अतिरिक्त तिब्बतियों, बांगलदेशियों, नेपाल को देश में लाने वाले बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय प्रवास  और यहाँ तक कि पाकिस्तान से आने वाले लोगों ने भी उच्च वृद्धि दर में योगदान दिया |

 

सन् 1981से वर्तमान तक की अवधि (घटती जनसंख्या वृद्धि कि अवस्था )

1)      1981 के पश्चात से वर्तमान तक की जनसंख्या की वृद्धि दर यद्यपि ऊँची बनी रही|  परंतु इसमें धीरे –धीरे मंद गति से घटने की प्रवृति आने लगी थी |

2)      ऐसी जनसंख्या वृद्धि के लिए अशोधित जन्म दर की अधोमुखी (नीचे गिरती हुई) प्रवृति को उत्तरदायी माना जाता है |

3)      जनसंख्या वृद्धि की यह दर देश में विवाह के समय की औसत आयु में वृद्धि, जीवन की गुणवत्ता विशेष रूप से स्त्री शिक्षा में सुधार से प्रभावित हुई | 

देश में जनसंख्या की वृद्धि दर अभी भी ऊँची बनी हुई है और विश्व विकास रिपोर्ट द्वारा यह अनुमान किया गया है कि 2025 ई० तक भारत की जनसंख्या 135 करोड़ को स्पर्श करेगी |

जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय भिन्नताएँ

देश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में वृद्धि दर में विस्तृत  भिन्नताएँ पाई जाती हैं | 1991-2001 के दौरान भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनसंख्या की वृद्धि दर सुस्पष्ट प्रतिरूप दर्शाती है |

केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, पुदुच्चेरी और गोवा जैसे राज्यों में निम्न वृद्धि दर देखने को मिलती है | जो की 1991-2001 के दशक में 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हुई | केरल में 9% की वृद्धि दर देश में सबसे कम थी |

देश के उत्तरी –पश्चिमी, उत्तरी और उत्तर मध्य भागों में पश्चिम से पूर्व स्थित राज्यों की एक सतत पेटी में दक्षिण के राज्यों की अपेक्षा उच्च वृद्धि पाई गई थी | इस पेटी के राज्यों जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, सिक्किम, असम, पश्चिमी बंगाल, बिहार, छतीसगढ़ और झारखंड में औसत वृद्धि दर 20 -25 प्रतिशत रही थी |

वर्ष 2001से 2011 के दशक के दौरान सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पिछले दशक (1991-2001) की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर धीमी रही है | देश के छः सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिमी बंगाल, आंध्रप्रदेश और मध्य प्रदेश में भी 1991-2001 की तुलना में दशकीय वृद्धि दर कम रही है |

आंध्रप्रदेश में सबसे कम(3.5%) तक महाराष्ट्र में सर्वाधिक (6.7%)गिरावट थी |  जबकि तमिलनाडु (3.9%), तथा पुदुच्चेरी (7.1%) में पिछले दशक की तुलना में कुछ जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई है |

 

भारत में किशोर जनसंख्या                                                        

भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसके किशोरों की वृद्धि है | वर्तमान में किशोरों अर्थात 10-19 वर्ष का आयु वर्ग का अंश 20.9 प्रतिशत है, (2011), जिसमें 52.7 प्रतिशत किशोर और 47.3 प्रतिशत किशोरियाँ सम्मिलित हैं |

किशोरों की समस्याएं

किशोर जनसंख्या, यद्यपि उच्च संभावनाओं से युक्त युवा जनसंख्या समझी जाती है, यदि उन्हें समुचित ढंग से मार्गदर्शित और दिशा निर्देशित न किया जाए तो वे काफी सुभेद्य (Vulnerable) भी होते हैं | जहाँ तक इस किशोरों का संबंध है समाज के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं | जिनमें से कुछ विवाह की निम्न आयु, निरक्षरता, विशेषत: स्त्री निरक्षरता, विद्यालय विरत छात्र (School Dropout), पोषकों की निम्न ग्राह्यता, किशोरी माताओं में उच्च मातृ मृत्यु दर, एच० आई० वी० / एड्स के संक्रमण की उच्च दरें, शारीरिक और मानसिक अपंगता  अथवा मंदता, औषध दुरुपयोग और मदिरा सेवन किशोर अपचार और अपराध करना इत्यादि हैं | इन तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार ने किशोर वर्गों को उपयुक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए कुछ निश्चित नीतियाँ बनाई हैं ताकि उनके गुणों का बेहतर मार्गदर्शन और उपयुक्त उपयोग किया जा सके | राष्ट्रीय युवा नीति एक ऐसा उदाहरण है जिसे हमारी विशाल, युवा और किशोर जनसंख्या के समय समग्र विकास की देखरेख हो हेतु अभिकल्पित किया गया है |

भारत सरकार द्वारा किशोर जनसंख्या के लिए बनाई गई नीतियाँ

राष्ट्रीय युवा नीति (NYP-2014) फरवरी 2014 में आरंभ की गई है जो भारत के युवाओं के लिए एक समग्र दूरदर्शी प्रस्ताव रखती है | “देश के युवाओं  को अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए सक्षम बनाना और उनके द्वारा भारत को राष्ट्रों के समूह में अपना उचित स्थान प्राप्त करने में सक्षम बनाना है |” राष्ट्रीय युवा नीति 2014, 15-29 वर्ष के आयु समूह के व्यक्ति को ‘युवा’ के रूप में परिभाषित करती है |

भारत सरकार ने 2015 में कौशल विकास तथा उद्यमिता के लिए नीति बनाई है, जिसका उद्देश्य देश भर में हो रही कौशल से संबंधित गतिविधियों के लिए एक रूप रेखा प्रदान करना है, साथ ही साथ इन सभी गतिविधियों को एक मानक के साथ बाँधना तथा विभिन्न कौशलों को इनके भाग –केंद्रों के साथ जोड़ना है |

जनसंख्या संघटन

जनसंख्या संघटन, जनसंख्या भूगोल के अंतर्गत अध्ययन का एक सुस्पष्ट क्षेत्र है जिसमें आयु व  लिंग का विश्लेषण, निवास का स्थान, मानव जातीय लक्षण, जनजातियाँ, भाषा, धर्म, वैवाहिक स्थिति, ससखरता और शिक्षा,  व्यवसायिक विशेताएँ आदि का अध्ययन किया जाता है |

भारत में ग्रामीण-नगरीय संघटन  (भारत की जनसंख्या का ग्रामीण नगरीय संघटन)

अपने- अपने निवास स्थानों के अनुसार जनसंख्या का संघटन सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं का एक महत्वपूर्ण सूचक है | जब देश की कुल जनसंख्या का 68.8 (2011 की जनगणना के  अनुसार ) प्रतिशत भाग गावों में रहता हो तब यह और सार्थक हो जाता है |

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 6,40,867 गाँव हैं जिनमें से 5.97.608 (93.2 प्रतिशत) गाँव ही बसे हुए हैं | फिर भी पूरे देश में ग्रामीण जनसंख्या का वितरण समान नहीं है |

हिमाचल प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत बहुत अधिक है | गोवा और मिजोरम राज्यों की कुल जनसंख्या का आधे से कुछ अधिक भाग गाँवों में बसता है | दूसरी ओर दादरा और नगर हवेली (53.38 प्रतिशत) को छोड़कर केंद्र –शासित प्रदेशों का लघु अनुपात ही ग्रामीण जनसंख्या का है | गाँवों का आकार भी काफी हद तक भिन्न है |

उत्तर –पूर्वी भारत के पहाड़ी राज्यों, पश्चिमी राजस्थान और कच्छ के रन में यह 200 व्यक्तियों से कम और केरल व महाराष्ट्र के कुछ भागों में यह 17,000 व्यक्ति तक पाया जाता है |

भारत की ग्रामीण जनसंख्या के वितरण के प्रतिरूप का सम्पूर्ण परीक्षण उजागर करता है कि  अंतर –राज्य और अंत:राज्य दोनों स्तरों पर नगरीकरण का सापेक्षिक परिमाण और  ग्रामीण –नगरीय प्रवास का विस्तार ग्रामीण  जनसंख्या के सांद्रण को नियंत्रित करते हैं |

ग्रामीण जनसंख्या के विपरीत भारत में नगरीय जनसंख्या का अनुपात 31.16 प्रतिशत है जो काफी निम्न है | किन्तु पिछले दशकों में यह वृद्धि बहुत तीव्र दर को दर्शाती है | नगरीय जनसंख्या की वृद्धि दर संवृद्ध आर्थिक विकास, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी दशाओं में सुधार के कारण तेजी से बढ़ी है | कुल जनसंख्या की भाँति नगरीय जनसंख्या के वितरण में भी पूरे देश में  भिन्नताएँ पाई जाती हैं |  

फिर भी ऐसा देखा गया है कि लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नगरीय जनसंख्या काफी बढ़ी है | यह सामाजिक आर्थिक दशाओं के संदर्भ में नगरीय क्षेत्रों के विकास और ग्रामीण –नगरीय प्रवास की बढ़ी हुई दर दोनों को इंगित करता है |

उत्तरी भारत के मैदानों में मुख्य सड़कों के मिलन बिंदुओं और रेलमार्गों से सटे हुए नगरीय क्षेत्रों , कोलकाता, मुंबई, बैंगलूरू –मैसूर,  मदुरै –कोयंबटूर, अहमदाबाद-सूरत, दिल्ली , कानपुर और लुधियाना –जालंधर में ग्रामीण –नगरीय प्रवास सुस्पष्ट देखने को मिलता है |

कृषि की दृष्टि से प्रगतिरुद्ध मध्य और निम्न गंगा के मैदानों, तेलंगाना, असिंचित पश्चिमी राजस्थान, उत्तर –पूर्व के दूर –दराज के पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों, प्रायद्वीपीय भारत के बाढ़ संभावित क्षेत्रों और मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में नगरीकरण का स्तर निम्न रहा है | 

 

नगरीय जनसंख्या के अत्यंत उच्च और अत्यंत निम्न अनुपात वाले राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की पहचान कीजिए |

नगरीय जनसंख्या के अत्यंत उच्च अनुपात वाले राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश

दिल्ली, चंडीगढ़, दमन और दीव, लक्षद्वीप, पुदुच्चेरी,  तथा गोवा  

 

नगरीय जनसंख्या के अत्यंत निम्न अनुपात वाले राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश

हिमाचल प्रदेश, बिहार, असम, ओडिसा, मेघालय, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, झारखंड तथा छतीसगढ़ |

 

भारत की जनसंख्या का भाषाई संघटन

भारत एक भाषाई विविधता की भूमि है | ग्रियर्सन के अनुसार (भारत का भाषाई सर्वेक्षण, 1903-1928) देश में 179 भाषाएँ और 544 के लगभग बोलियाँ थी | आधुनिक भारत के संदर्भ में संविधान में 22 भाषाएँ अनुसूचित हैं और अनेक भाषाएँ गैर – अनुसूचित हैं | अनुसूचित भाषाओं में हिन्दी बोलने वाले लोगों का प्रतिशत सर्वाधिक है | जबकि 2011 के अनुसार लघुतम भाषा वर्ग संस्कृत, बोड़ो तथा मणिपुरी बोलने वालों के हैं | देश में भाषाई प्रदेशों की सीमाएँ सुनिश्चित और स्पष्ट नहीं हैं बल्कि इन भाषाओं का अपने – अपने सीमांत प्रदेशों में क्रमिक विलय और अध्यारोपण हो जाता है |

भारतीय भाषाओं का वर्गीकरण

भाषाई वर्गीकरण प्रमुख भारतीय भाषाओं के बोलने वाले चार भाषा परिवारों से जुड़े हुए हैं | जिनके उप-परिवार, शाखाएँ अथवा वर्ग हैं| इसे निम्न तालिका से बेहतर ढंग से समझा ज सकता है |

तालिका: आधुनिक भारतीय भाषाओँ का वर्गीकरण

परिबार

उप परिवार

शाखा/वर्ग

वाक् क्षेत्र

आस्ट्रिक

(निषाद)

1.38%

आस्ट्रो-एशियाई

 

 

आस्ट्रो-नेशियन

मॉन खमेर

मुंडा

 

--

मेघालय, निकोबार द्वीप समूह

पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा ,असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र

भारत से बाहर 

द्रविड़ (20%)

--

दक्षिण द्रविड़

मध्य द्रविड़

उत्तर द्रविड़

तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल

आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र

बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश 

चीनी –तिब्बती

(किरात)

(0.85 %)

तिब्बती – म्यांमारी

 

सियामी –चीनी

तिब्बती –हिमलायी

उत्तरी असम

असम –म्यांमारी

जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम

अरुणाचल प्रदेश

असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय

भारतीय –यूरोपीय

(आर्य)

(73%)

इंडो –आर्य

ईरानी (फारसी)

दरदी

भारतीय आर्य

भारत से बाहर

जम्मू और कश्मीर

जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात महाराष्ट्र और गोवा

स्त्रोत – एजाजुद्दीन अहमद (1999), सामाजिक भूगोल, रावत पब्लिकेशन, नई दिल्ली

                                     

भारत की जनसंख्या का धार्मिक संघटन

धर्म सर्वाधिक भारतीयों के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करने वाले प्रमुख बलों में से एक है | क्योंकी धर्म लोगों के परिवार और सामुदायिक जीवन के लगभग सभी पक्षों में आभासी रूप से व्याप्त होता है | भारत के धार्मिक समूह के वितरण को हम निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |

      (क.)      देश में धार्मिक समुदायों का स्थानिक वितरण दर्शाता है कि कुछ निश्चित राज्यों और जिलों में एक धर्म की संख्यात्मक प्रबलता विशाल है, जबकि उसी का दूसरे राज्यों में प्रतिनिधित्व नगण्य है |

      (ख.)      भारत बांग्लादेश सीमा व भारत पाक सीमा से संलग्न जिलों, जम्मू और कश्मीर, उत्तर पूर्व के पर्वतीय राज्यों और दक्कन पठार व गंगा के मैदान के प्रकीर्ण क्षेत्रों को छोड़कर हिन्दू अनेक राज्यों में एक प्रमुख समूह के रूप वितरित है | इन राज्यों में हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों का प्रतिशत 70 से 90 प्रतिशत तक और उससे अधिक  है |

       (ग.)       विशालतम धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिम जम्मू और कश्मीर, पश्चिम बंगाल और केरल के कुछ जिलों, उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों, दिल्ली में व उसके आस पास और लक्षद्वीप में सांद्रित है |

       (घ.)      ईसाई जनसंख्या अधिकांशत: देश के ग्रामीण क्षेत्रों में वितरित है | मुख्य सांद्रण पश्चिमी तट के साथ, गोआ एवं केरल और मेघालय, मिजोरम और नागालैंड के पहाड़ी क्षेत्रों, छोटा नागपुर क्षेत्र और मणिपुर की पहाड़ियों में भी देखा जाता है | 

       (ङ.)      अधिकांश सिक्ख देश के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में सकेंद्रित हैं |

      (च.)      भारत के सबसे छोटे धमिक समूह जैन और बौद्ध देश के गिने –चुने क्षेत्रों में सकेंद्रित हैं | जैनियों का प्रमुख सकेन्द्रण राजस्थान के नगरीय क्षेत्रों, गुजरात और महाराष्ट्र में हैं जबकि बौद्ध अधिकांशत: महाराष्ट्र में सकेंद्रित हैं | बौद्ध बाहुल्य अन्य क्षेत्र सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर में लद्दाख, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में लाहुल और स्पिती हैं |  

      (छ.)      भारत के अन्य धर्मों में जरतुश्त (पारसी), जनजातीय एवं अन्य देशज निष्ठाएँ और विश्वास सम्मिलित हैं | ये समूह छोटे समूह में सकेंद्रित हैं और देश भर में बिखरे हुए हैं |

भारत में धार्मिक समूहों के प्रतिशत को हम निम्नलिखित तालिका से समझ सकते हैं |

तालिका: भारत के धार्मिक समुदाय (2011)

धार्मिक

समुदाय

2011 की जनगणना के अनुसार प्रतिशत

जनसंख्या मिलियन में

जनसंख्या का प्रतिशत

हिंदू

966.3

79.8%

मुस्लिम

172.2

14.2

ईसाई

27.8

2.3

सिक्ख

20.8

1.7

बौद्ध

8.4

0.7

जैन

4.5

0.4

अन्य धर्म

7.9

0.7

धर्म ज्ञात नहीं

2.9

0.2

स्त्रोत : भारत की जनगणना  (2011)

धर्म और भू दृश्य

धर्म और भू दृश्य भू दृश्य पर धर्मों की औपचारिक अभिव्यक्ति पवित्र संरचनाओं, कब्रिस्तान के उपयोग और पौधों के समुच्चय , धार्मिक उद्देश्यों के लिए वृक्षों के निकुंजों के माध्यम से प्रकट होती है | पवित्र संरचनाएं पूरे देश में व्यापक रूप में वितरित हैं | ये अस्पष्ट ग्रामीण समाधियों से लेकर विशाल हिंदू मंदिरों, स्मरणार्थ मस्जिदों अथवा महानगरों में शोभायमान ढंग से अभिकल्पित (डिजाइन किया हुआ ) बड़े गिरिजाघर तक हो सकते हैं | क्षेत्र के संपूर्ण भू –दृश्य कों एक विशेष आयाम प्रदान करते हुए इन मंदिरों गुरुद्वारों मठों और गिरिजाघरों के आकार –प्रकार, स्थान- प्रयोग  और संख्या में भिन्नता पाई जाती हैं |

श्रमजीवी जनसंख्या का संघटन

जनसंख्या का व्यवसायिक संघटन का वास्तव में अर्थ किसी व्यक्ति के खेती, विनिर्माण, व्यापार , सेवाओं अथवा किसी भी प्रकार की व्यवसायिक क्रियाओं में लगे होने से है |  आर्थिक स्तर की दृष्टि से भारत की जनसंख्या कों तीन वर्गों में बाँटा जाता है | जिनके नाम है  | मुख्य श्रमिक, सीमांत श्रमिक और अश्रमिक |

श्रमिकों के प्रकार

मुख्य श्रमिक : मुख्य श्रमिक वह व्यक्ति है जो एक वर्ष में कम से कम 183 दिन या छ: महीनें काम करता है |

सीमांत श्रमिक  : सीमांत श्रमिक वह व्यक्ति है जो एक वर्ष में 183 दिनों या छ : महीने से कम दिन काम करता है |  

 

भारत में श्रमिकों कों मुख्य और सीमांत दोनों  का अनुपात 2011के अनुसार 39.8 प्रतिशत है जबकि  60 प्रतिशत की विशाल संख्या अश्रमिकों की है |  यह आर्थिक स्तर कों इंगित करता है जिसमें एक बड़ा अनुपात आश्रित जनसंख्या का है, जो आगे बेरोजगार और अल्प रोजगार प्राप्त लोगों की बड़ी संख्या के होने की संभावना की ओर इशारा करता है |

राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों श्रमजीवी जनसंख्या का अनुपात लक्षद्वीप में लगभग 29.1  प्रतिशत हिमाचल प्रदेश में लगभग 51.9  प्रतिशत सामान्य भिन्नता दर्शाता है |

श्रमिकों के अपेक्षाकृत अधिक प्रतिशत वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, छतीसगढ़, आंध्रपद्रेश, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय हैं |इसी प्रकार केन्द्र शासित प्रदेशों दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव की प्रतिभागिता दर ऊँची है | 

भारत जैसे देश के संदर्भ में ऐसा समझा जाता है कि आर्थिक विकास के निम्न स्तरों वाले क्षेत्रों में श्रम की सहभागिता दर ऊँची है क्योंकि निर्वाह अथवा लगभग निर्वाह की आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन के लिए अनेक कामगारों की जरूरत पडती है |

 

तालिका: भारत में श्रम –शक्ति का सेक्टर वार संघटन (2011)

संवर्ग

जनसंख्या

व्यक्ति

कुल श्रमिकों का प्रतिशत

पुरुष

स्त्री

प्राथमिक

26,30,22,473

54.6

16,54,47,075

9,75,75,398

द्वितीयक

1,83,36,307

3.8

97,75,635

85,60,672

तृतीयक

20,03,84,531

41.6

15,66,43,220

4,37,41,311

 

भारत की जनसंख्या का व्यवसायिक संघटन द्वितीयक और तृतीयक सेक्टरों की तुलना में प्राथमिक सेक्टर के श्रमिकों के बड़े अनुपात कों दर्शाता है | कुल श्रमजीवी जनसंख्या का लगभग 54.6 प्रतिशत कृषक और कृषि मजदूर हैं | जबकि 3.8 प्रतिशत लोग श्रमिक, घरेलू उद्योगों में लगे है | और  41.6 प्रतिशत अन्य श्रमिक हैं | जो गैर –घरेलू उद्योगों, व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण और मरम्मत तथा अन्य सेवाओं में कार्यरत हैं |  

जहाँ तक देश की पुरुष और स्त्री जनसंख्या के व्यवसाय का प्रश्न है | पुरुष श्रमिकों की संख्या स्त्री श्रमिकों की संख्या से तीनों सेक्टरों में अधिक है | महिला श्रमिकों की संख्या प्राथमिक सेक्टर में अपेक्षाकृत अधिक है यद्यपि विगत कुछ वर्षों में महिलाओं की द्वितीयक और तृतीयक सेक्टरों की सहभागिता में सुधार हुआ है |

पिछले कुछ दशकों में भारत में कृषि सेक्टर के श्रमिकों के अनुपात में उतार दिखाई दिया है | (2001 में 58.2 प्रतिशत से 2011में  54.6 प्रतिशत)| परिणाम स्वरूप, द्वितीयक और तृतीयक सेक्टर में सहभागिता दर बढ़ी है यह श्रमिकों की खेत –आधारित रोजगारों पर निर्भरता से गैर –खेत आधारित रोजगारों पर निर्भरता कों इंगित करता है | यह देश की अर्थव्यवस्था में सेक्टर स्थानांतरण है |  

देश के विभिन्न सेक्टरों में श्रम सहभागिता दर की स्थानिक भिन्नता है | उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्यों में कृषकों की संख्या बहुत अधिक है | दूसरी ओर बिहार, आंध्रप्रदेश, छतीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कृषि मजदूरों की संख्या अधिक है | दिल्ली, चंडीगढ़ और पुदुच्चेरी जैसे नगरी कृत क्षेत्रों में श्रमिकों का बहुत बड़ा अनुपात अन्य सेवाओं में लगा हुआ है | यह न केवल सीमित कृषि भूमि की उपलब्धता कों बल्कि बृहत स्तर पर होने वाले नगरीकरण और औद्योगिकरण द्वारा गैर –कृषि सेक्टरों में और अधिक श्रमिकों की आवश्यकता कों भी इंगित करता है | 

व्यवसायिक संवर्ग 

सन् 2011 कीजनगणना ने भारत की श्रमजीवी जनसंख्या कों चार प्रमुख संवर्गों में बाँटा है |

(1) कृषक , (2) कृषि मजदूर, (3) घरेलू औद्योगिक श्रमिक तथा (4S) अन्य श्रमिक

 

“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” सामाजिक अभियान के द्वारा जेंडर के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा

समाज का विभाजन पुरुष, महिला और ट्रांसजेडर में प्राकृतिक और जैविक रूप से माना जाता है | लेकिन वास्तव में समाज सब के लिएबलग-अलग भूमिका निर्धारित करता है और ये भूमिकाएँ फिर से सामाजिक संस्थाओं द्वारा सुदृढ़ कर दी जाती है | जिसके फलस्वरूप ये जैविक विभिनताएँ सामाजिक अलगाव तथा बहिष्कार का आधार बन जाती है | आधी से ज्यादा जनसंख्या का बहिष्करण किसी भी विकास शील और सभ्य समाज के लिए एक गंभीर समस्या है |यह एक वैश्विक चुनौती है | जिसको संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने संज्ञान में लिया है |

यू० एन० डी ० पी० के अनुसार यदि विकास में सभी जेंडर सम्मिलित नहीं हैं तो ऐसा विकास लुप्तप्राय है | (HDR UNDP 1995) | समान्य जन में किसी भी प्रकार का भेदभाव और विशेष रूप से जेंडर के आधार पर भेदभाव, मानवता के प्रति एक अपराध है | इसलिए सभी के लिए शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधत्व में समान अवसर, समान कार्य के लिए समान वेतन, स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का अवसर सभी को मिलें, इसके लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है | जो समाज इन सभी भेदभाव तथा बुराइयों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाता है, वह एक सभ्य समाज नहीं कहा ज सकता | भारत सरकार ने इन सभी को संज्ञान में लेते हुए तथा भेदभाव से होने वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” सामाजिक अभियान चलाया है |   

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