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Saturday, August 8, 2026

Lesson 8 Solar Radiation Heat Bught and Temperature Class 11th Geography

 

अध्याय 8  सौर विकिरण, ऊष्मा बजट तथा तापमान

कक्षा -11

पुस्तक - भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

सूर्यातप (INSOLATION )

पृथ्वी के भू पृष्ठ पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम भाग सूर्य से आने  वाली लघु तरंगदैर्ध्य के रूप में प्राप्त होता है |   लघु तरंगदैर्ध्य  के रूप में पृथ्वी कों प्राप्त होने वाली इस ऊर्जा कों “आगामी सौर विकिरण” या “सूर्यातप” (INSOLATION) कहते है |

पृथ्वी की आकृति और सौर ऊर्जा

पृथ्वी की अपनी आकृति है जिसे भू-आभ या जियोड (GEOID)  कहा जाता है | इस आकृति के कारण सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल  के ऊपरी भाग पर तिरछी  पड़ती है | जिसके कारण पृथ्वी सौर ऊर्जा के बहुत ही कम अंश कों  प्राप्त कर पाती है | पृथ्वी औसत रूप से वायुमंडल की ऊपरी सतह पर  1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी के कारण सौर ताप में परिवर्तन   

वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा में प्रतिवर्ष थोडा परिवर्तन देखने कों मिलता है | यह परिवर्तन पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी में अन्तर के कारण होता है | जिन्हें हम निम्न प्रकार से समझ सकते है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच की अधिकतम दूरी  (अपसौर)

सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई कों सूर्य से सबसे दूर होती है | इस स्थिति में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर होती है | सूर्य के प्रति पृथ्वी की इस स्थिति कों अपसौर (Aphelion) कहा जाता है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच की न्यूनतम  दूरी  उपसौर)

सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 3 जनवरी कों सूर्य से सबसे नजदीक होती है | इस स्थिति में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर होती है | सूर्य के प्रति पृथ्वी की इस स्थिति कों उपसौर (Perihelion) कहा जाता है |

            पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप 3 जनवरी कों 4 जुलाई की अपेक्षा अधिक होता है | फिर भी सूर्यातप की भिन्नताका यह प्रभाव जैसे स्थल और समुद्र का वितरण तथा वायुमंडल परिसंचरण के द्वारा कम हो जाता है | यही कारण है कि सूर्यातप की यह भिन्नता पृथ्वी की सतह पर होने वाले प्रतिदिन के मौसम परिवर्तन पर अधिक प्रभाव नहीं डाल पाती है |  

पृथ्वी की सतह पर सूर्यातप में भिन्नता कों प्रभावित करने वाले कारक   

सूर्यातप की मात्रा में,प्रतिदिन, हर मौसम और प्रतिवर्ष परिवर्तन होता रहता है | पृथ्वी की सतह पर सूर्यातप में होने वाली विभिन्नता के निम्नलिखित कारक हैं | 

     (i)            पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना

   (ii)            सूर्य की किरणों का नति कोण (सूर्य की किरणों का तिरछापन)

 (iii)            दिन की अवधि

  (iv)            वायुमंडल की पारदर्शिता

    (v)            स्थल विन्यास

(i) पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना

पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर परिक्रमण की समतल कक्षा से  66  डिग्री (6630’) का कोण बनाता है, जो विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त होने वाले सूर्यातप की मात्रा कों प्रभावित करता है |

(ii) सूर्य की किरणों का नति कोण (सूर्य की किरणों का तिरछापन)

सूर्यातप की मात्रा कों प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण कारक सूर्य की किरणों  का नति कोण है | किरणों का नति कोण  किसी स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है | अक्षांश जितना उच्च होगा (अर्थात ध्रुवों की ओर जाते हुए ) किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा अर्थात सूर्य की किरणें तिरछी पड़ेगीं |

तिरछी किरणों की अपेक्षा सीधी किरणें कम स्थान पर पड़ती है | जिससे उस स्थान कों अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है | तिरछी किरणें अधिक स्थान पर पडती है किरणों के अधिक क्षेत्र पर पड़ने के कारण ऊर्जा वितरण बड़े क्षेत्र पर होता है  और प्रति इकाई क्षेत्र कों कम ऊर्जा मिलती है |

इसके अतिरिक्त तिरछी किरणों कों वायुमंडल की अधिक गहराई से गुजरना पड़ता है | अत: अधिक अवशोषण , प्रकीर्णन एवं विसरण के द्वारा ऊर्जा (सूर्यातप) का अधिक ह्रास होता है | 

(iv) दिन की अवधि

दिन की अवधि जितनी लम्बी होगी सूर्यातप उतना ही अधिक प्राप्त होता है | इसी कारण भूमध्य रेखीय क्षेत्रों से ध्रुवों की ओर जाते समय जैसे –जैसे दिन की अवधि कम होती जाती है सूर्यातप की मात्रा भी कम होती जाती है |

(v) वायुमंडल की पारदर्शिता (स्वच्छ आकाश)

वायुमंडल की पारदर्शिता से आशय है स्वच्छ आकाश का होना | यदि आकाश स्वच्छ है तो किसी स्थान पर आने वाले सूर्यातप की पूरी मात्रा उस स्थान कों प्राप्त होती है | इसके विपरीत यदि आकाश में मेघ छाए हुए है या प्रदूषण अधिक है तो सूर्यातप पूर्ण रूप से नहीं पहुँच पाता है |  भूमध्य रेखीय प्रदेशों में मेघों के छाए रहने से सूर्यातप की मात्रा का बहुत सा भाग इन क्षेत्रों कों नहीं मिल पाता है जबकि उष्ण कटिबंधीय  मरुस्थलीय भागों में आकाश साफ़ होने के कारण ये क्षेत्र अधिकतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं |

(vi) सौर विकिरण का वायुमंडल से होकर गुजरना

लघु तरंगदैधर्य वाले सौर विकिरण के लिए वायुमंडल अधिकांशतः पारदर्शी होता है | पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से पहले सूर्य की किरणें वायुमंडल से होकर गुजरती हैं | क्षोभ मण्डल में मौजूद जलवाष्प, ओजोन तथा अन्य किरणें अवरक्त विकिरण (Infrared radiation) कों अवशोषित कर लेती हैं |

क्षोभ मण्डल में छोटे निलम्बित कण दिखने वाले स्पेक्ट्रम कों अंतरिक्ष एवं पृथ्वी की सतह की ओर विकीर्ण कर देते हैं | यही प्रक्रिया आकाश में विभिन्न रंगों के लिए उत्तरदायी है |  इसी से उदय एवं अस्त होने के समय सूर्य लाल दिखाई देता है तथा आकाश का रंग नीला दिखाई पड़ता है | ऐसा वायुमंडल में प्रकाश के प्रकीर्णन द्वारा संभव होता है |

(vi) स्थल विन्यास

स्थल विन्यास के कारण भी सूर्यातप की मात्रा प्रभावित होती है | जैसे सूर्य के सामने वाले ढाल अधिक सूर्यातप प्राप्त करते है जबकि उसके विपरीत ढाल कम सूर्यातप प्राप्त करते है | इसी प्रकार हिम से ढके क्षेत्रों में सूर्यातप पहले ही परावर्तित हो जाता है जिससे इन क्षेत्रों कों कम सूर्यातप प्राप्त होता है जबकि दूसरी ओर मरुस्थलीय भागों में परावर्तन कम होने से अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है |

सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण

सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण कों निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            धरातल पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा में उष्ण कटिबंध में 320 वाट/ प्रति वर्ग मीटर से लेकर ध्रुवों पर 70 वाट/प्रति वर्ग मीटर तक भिन्नता पाई जाती है | 

   (ii)            सबसे अधिक सूर्यातप उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थलों से प्राप्त होता है, क्योंकि यहाँ मेघाच्छादन बहुत कम पाया जाता है |

 (iii)            उष्ण कटिबन्ध की अपेक्षा विषुवत वृत्त पर कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है |

  (iv)            सामान्यत: एक ही अक्षांश पर स्थित महाद्वीपीय भाग पर अधिक और महासागरीय भाग में अपेक्षतया कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है |

    (v)            शीत ऋतु में  मध्य एवं उच्च अक्षांशों पर ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा कम मात्रा में विकिरण प्राप्त होता है |

वायुमंडल का तापन और शीतलन की विधियाँ :

वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के अनेक विधियाँ है | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

प्रवेशी सौर विकिरण से वायुमंडल का गर्म होना

प्रवेशी सौर विकिरण लघु तरंगदैधर्य वाला होता है | जो पृथ्वी के वायुमंडल को प्रत्यक्ष रूप से गर्म करता है | लेकिन इस प्रक्रिया में पृथ्वी और उसका वायुमंडल अधिक गर्म ननहीं होता है |

चालन प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल का गर्म होना

पृथ्वी के सम्पर्क में आने वा;वाली वायु –धीरे –धीरे गर्म होती हैं | निचली परतों के सम्पर्क में आने वाली ऊपरी परतें भी गर्म हो जाती है | इस प्रक्रिया कों चालन (Conduction) कहा जाता है | चालन तभी होता है जब असमान ताप वाले दो पिंड एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं. और गर्म पिंड से ठंडे पिंड की ओर ऊर्जा का प्रवाह चलता है | ऊर्जा का स्थानांतरण तब तक होता रहता है जब तक कि दोनों पिंडों का  तापमान समान नहीं हो सकता अथवा, उनमें सम्पर्क टूट नहीं जाता | वायुमंडल की निचली परतों कों गर्म करने में चालन (Conduction) महत्वपूर्ण है |  

संवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल का गर्म होना

पृथ्वी के सम्पर्क में आई वायु गर्म होकर संवहन धाराओं के रूप में लम्बवतउठती है और वायुमंडल में  ताप का संचरण करती है | वायुमंडल के लम्बवत तापन की यह प्रक्रिया संवहन (Convection) कहलाती है | ऊर्जा के स्थानान्तरण की यह प्रक्रिया केवल क्षोभमंडल तक ही सीमित रहता है अर्थात संवहन प्रक्रिया द्वारा क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा तक ही वायुमंडल गर्म होता है |

अभिवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल का गर्म व ठंडा होना

वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला ताप का स्थानातरण अभिवहन (Advection) कहलाता है | लम्बवत संचलन की अपेक्षा वायु का क्षैतिज संचलन सापेक्षिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होता है | मध्य अक्षांशों में दैनिक मौसम में आने वाली भिन्नताएँ केवल अभिवहन के कारण होती हैं | उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में विशेषत रूप से उत्तरी भागों में गर्मियों में चलने वाली स्थानीय पवन लू इसी अभिवहन का ही परिणाम है |  इसी प्रकार साइबेरिया से आने वाली ठंडी पवनें जिस क्षेत्र में जाती हैं उस क्षेत्र कों ठंडा कर देती हैं |

पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमंडल का गर्म व ठंडा होना

पृथ्वी द्वारा प्राप्त प्रवेशी सौर विकिरण लघु तरंगों के रूप में होता है | यह पृथ्वी की सतह कों गर्म करता है | पृथ्वी स्वयं गर्म होने के बाद एक विकिरण पिंड बन जाती है  और वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगती है |  यह ऊर्जा वायुमंडल कों नीचे से गर्म करती है | इस प्रक्रिया कों पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमंडल का गर्म होना कहा जाता है |

पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगदैधर्य वाला होता है जो वायुमंडलीय गैसों, मुख्य रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है | इस प्रकार वायुमंडल पार्थिव विकिरण द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होता है न कि सीधे सूर्यातप से | उसके बाद वायुमंडल विकिरण प्रक्रिया द्वारा इस ताप कों अंतरिक्ष में संचारित कर देता है | जिससे पृथ्वी की सहत एवं वायुमंडल का तापमान स्थिर बना रहता है | 

पृथ्वी का उष्मा बजट

पृथ्वी ऊष्मा का  न तो संचय करती है और न ही ह्रास करती है  यह अपने तापमान कों स्थिर रखती है | ऐसा तभी सम्भव है, जब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्यातप के रूप में प्राप्त ऊष्माएवं पार्थिव विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में संचारित ऊष्मा (ताप) बराबर हो |

पृथ्वी के ऊष्मा बजट कों हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |

मान ले कि वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त सूर्यातप 100  प्रतिशत है | वायुमंडल से गुजरते हुए ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित, प्रकीर्णित एवं अवशोषित हो जाता है | केवल शेष भाग ही पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है | 100 इकाई में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है |  27 इकाइयाँ  बादलों के ऊपरी छोर से तथा  2 इकाइयाँ पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर लौट जाती है |  6 इकाइयाँ अंतरिक्ष में प्रकीर्णित हो जाती है |  सौर विकीररण की इस परावर्तित मात्रा कों पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं | पृथ्वी का एल्बिडो 35 इकाइयाँ है |

            प्रथम 35 इकाइयों कों छोड़कर बाकि 65 इकाइयाँ  अवशोषित हो जाती है | इन 65 इकाइयों में से  14 इकाइयाँ वायुमंडल के द्वारा और 51 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल के द्वारा अवशोषित कर ली जाती है |

पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाइयाँ पुन: पार्थिव विकिरण के रूप में वापस अंतरिक्ष में लौटा दी जाती हैं | जिनमें से 17 इकाइयाँ तो सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं | जिनमें से 6 इकाइयाँ स्वयं वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती हैं , 9 इकाइयाँ संवहन प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में पहुँचती है और 19 इकाइयाँ संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा वायुमंडल प्राप्त करता है |  वायुमंडल द्वारा कुल 48 इकाइयों का अवशोषण होता है | इनमें से 14 इकाइयाँ सूर्यातप से प्राप्त करता है और 34 इकाइयाँ पार्थिव विकिरण से प्राप्त करता है | वायुमंडल इन 48 इकाइयों कों भी अंतरिक्ष में वापस लौटा देता है |

अत: पृथ्वी के धरातल और वायुमंडल द्वारा अंतरिक्ष में वापस लौटने वाली विकिरण की इकाइयाँ क्रमश: 17 इकाइयाँ और  48 इकाइयाँ है जो कुल 65 इकाइयाँ होती है | वापस लौटने वाली ये 65  इकाइयाँ उन 65 इकाइयों का संतुलन कर देती हैं जो सूर्य से प्राप्त होती है | यही पृथ्वी का ऊष्मा बजट या ऊष्मा संतुलन है |

उपर दिए गए तथ्यों से स्पष्ट होता ही कि प्राप्त उष्मा के बराबर ऊष्मा कों वापस अंतरिक्ष में छोड़ देने से ऊष्मा का आदान –प्रदान का संतुलन रहता है | यही कारण है कि ऊष्मा के इतने बड़े स्थानांतरण के बावजूद भी पृथ्वी न तो बहुत गर्म होती है और न ही अधिक ठंडी होती है |    


पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्मा बजट में स्थानीय तौर पर भिन्नता

पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्मा बजट में स्थानीय तौर पर भिन्नता पाई जाती है | क्योंकि पृथ्वी की सतह पर प्राप्त विकिरण की मात्रा में बिन्नता पाई जाती है | पृथ्वी के कुछ भागों में विकिरण संतुलन में अधिशेष (Surplus) पाया जाता है परन्तु कुछ भागों में ऋणात्मक संतुलन होता है |

अक्षांशीय भिन्नता के कारण ही पृथ्वी के वायुमंडल तन्त्र की शुद्ध विकिरण में भिन्नता देखने कों मिलती है | अक्षांशीय भिन्नता के कारण 400 उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों में शुद्ध विकिरण में अधिशेष (Surplus)  अधिक होता है | जबकि ध्रुवों के पास शुद्ध विकिरण में कमी (Deficit) पाई जाती है |

उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों से ताप ऊर्जा ध्रुवों की ओर पुनर्वितरण होता है जिसके कारण उष्ण कटिबंध ताप संचयन के कारण अधिक गर्म नहीं हो पाते और न हीं उच्च अक्षांश अत्यधिक कमी के कारण पूरी तरह जमे हुए है |

तापमान की परिभाषा

वायुमंडल एवं भू-पृष्ठ के साथ सूर्यातप की अन्योन्यक्रिया द्वारा जनित ऊष्मा कों तापमान के रूप में मापा जाता है | जहाँ उष्मा किसी पदार्थ के कणों के अणुओं की गति दर्शाती है,वहीं तापमान किसी पदार्थ या स्थान के गर्म या ठंडा होने का माप है | इसे डिग्री सेल्सियस (C), या डिग्री फारेन्हाईट (0F) आदि में मापा जाता है |

तापमान के वितरण कों नियंत्रित करने वाले कारक

किसी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है |

(1) उस स्थान की अक्षांश रेखा (भूमध्य रेखा से दूरी),     (2) समुद्र तल से उस स्थान की ऊँचाई (उत्तुंगता),   (3) समुद्र तल से दूरी, (4) वायु सहंति (वायुराशि) का परिसंचरण,  (5) कोष्ण (उष्ण) तथा ठंडी महासागरीय धाराओं की उपस्थिति   तथा  (6) स्थानीय कारक |

इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

(1) उस स्थान की अक्षांश रेखा (भूमध्य रेखा से दूरी):

किसी स्थान का तापमान उस स्थान द्वारा प्राप्त सूर्यातप पर निर्भर करता है | यह स्पष्ट है कि सूर्यातप की मात्रा में अक्षांश के अनुसार भिन्नता पाई जाती है | अत: तदनुसार तापमान में भी भिन्नता पाई जाती है | यही कारण है कि भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए तापमान कम होने लगता है |

(2) समुद्र तल से उस स्थान की ऊँचाई (उत्तुंगता)

वायुमंडल पार्थिव विकिरण द्वारा नीचे की परतों में पहले गर्म होता है | यही कारण है कि धरातल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा ऊँचे भाग में स्थित पर तापमान कम होता है | अन्य शब्दों में सामान्यत: उत्तुंगता बढ़ने के साथ तापमान घटता है | उत्तुंगता बढ़ने के साथ तापमान के घटने की दर कों ‘सामान्य ह्रास दर (Normal Lapse Rate) कहते हैं | सामान्य ह्रास दर प्रति 165 मीटर बढ़ने पर 1o Cया 1000 मीटर की ऊँचाई बढ़ने पर 6.5oC  है |

समुद्र से दूरी

किसी भी स्थान के तापमान कों प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में से एक समुद्र से उस स्थान की दूरी है | स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे –धीरे गर्म और धीरे –धीरे ठंडा होता है |समुद्र की अपेक्षा स्थल जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है | इसलिए समुद्र के ऊपर स्थल की अपेक्षा तापमान में भिन्नता कम होती है | समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों पर समुद्र समीर एवं स्थलीय का सामान्य प्रभाव पड़ता है और तापमान सम बना रहता है | जबकि समुद्र से दूर स्थित क्षेत्रों में तापमान गर्मियों में अधिक व शीत ऋतु में कम होता है |

वायु राशियाँ

स्थलीय एवं समुद्री समीरों की तरह वायु संहतियाँ भी तापमान कों प्रभावित करती हैं | कोष्ण वायुराशियों (Warm airmasses)  से प्रभावित होने वाले स्थानों का तापमान अधिक एवं शीत वायुराशियों (Cold Airmasses) से प्रभावित स्थानों का तापमान कम होता है |

महासागरीय धाराएँ

जिस प्रकार वायुराशियाँ किसी स्थान के तापमान कों प्रभावित करती हैं | उसी तरह ठंडी महासागरीय धारा के प्रभाव में आने वाले तटों का तापमान कम होता है | जबकि गर्म महासागरीय धारा के प्रभाव में आने वाले तटों का तापमान अधिक होता है | 

तापमान का वितरण

मानचित्र पर तापमान वितरण सामान्यत: समताप रेखाओं की मदद से दर्शाया जाता है | समताप रेखा समताप रेखा वह रेखा है, जो मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों कों जोड़ती है | 

जनवरी और जुलाई के तापमान का वितरण  मानचित्रों की सहायता से हम पूरे विश्व के तापमान वितरण कों समझ सकते हैं |  

तापमान वितरण से सम्बन्धित कुछ तथ्य जानना आवश्यक है जो निम्नलिखित है |

     (i)            सामान्यत: तापमान पर अक्षांश के प्रभाव कों मानचित्र में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | क्योंकि समताप रेखाएँ प्राय: अक्षांश के समानांतर होती है | इस सामान्य प्रवृति में विचलन, विशेष रूप से उत्तरी गोलार्द्ध में जुलाई की अपेक्षा जनवरी में अधिक स्पष्ट होता है अर्थात समताप रेखाएँ जनवरी में अक्षांश रेखाओं के समानांतर न होकर उत्तर या दक्षिण में विचलित हो जाती है |

   (ii)            दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलीय भाग अधिक है | इसलिए भू –संहति और समुद्री धारा का प्रभाव वहाँ स्पष्ट होता है |

जनवरी में तापमान का विश्वव्यापी वितरण

जनवरी में तापमान का विश्वव्यापी वितरण  कों हम निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            जनवरी में समताप रेखाएँ महासागर के उत्तर और महाद्वीपों पर दक्षिण की ओर विचलित हो जाती है | इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर पर देखा जा सकता है |

   (ii)            कोष्ण महासागरीय धाराएँ गल्फ स्ट्रीम तथा उत्तरी अटलांटिक महासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अटलांटिक महासागर अधिक गर्म होता है तथा  समताप रेखाएँ उत्तर की तरफ मुड़ जाती है | 

 (iii)            सतह के ऊपर तापमान तेजी से कम हो जाता है और समताप रेखाएँ यूरोप में दक्षिण की ओर मुड़ जाती हैं | यह साइबेरिया के मैदान पर ज्यादा स्पष्ट होता है | 60o पूर्वी देशान्तर के साथ –साथ  80o उत्तरी एवं 50o उत्तरी दोनों ही अक्षांशों पर जनवरी का माध्य तापमान -200 सेल्सियस पाया जाता है |

  (iv)            इसी प्रकार जनवरी का माध्य मासिक तापमान विषुवत रेखीय महासागरों पर 27o  सेल्सियस से अधिक, उष्ण कटिबंधों में 24o सेल्सियस से अधिक , मध्य अक्षांशों पर 200 सेल्सियस से 00 सेल्सियस तक तथा यूरेशिया के आंतरिक भागों में -180 सेल्सियस से 480 सेल्सियस तक दर्ज होता है |

    (v)            दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान पर महासागरों का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है | यहाँ समताप रेखाएँ लगभग अक्षांशों के समानांतर चलती हैं  तथा उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा भिन्नता कम तीव्र होती है |

  (vi)            दक्षिणी गोलार्द्ध में  200 सेल्सियस की समताप रेखाएँ  350  दक्षिणी अक्षांश, 100 सेल्सियस की समताप रेखाएँ 450  दक्षिणी अक्षांश तथा  00 सेल्सियस की समताप रेखाएँ  की 600  दक्षिणी अक्षांश के समानांतर पाई जाती है |

जुलाई में तापमान का विश्वव्यापी वितरण

जुलाई  में तापमान का विश्वव्यापी वितरण  कों हम निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            जुलाई में समताप रेखाएँ प्राय: अक्षांशों के समानांतर चलती हैं |

   (ii)            विषुवत रेखीय महासागरों पर तापमान 27o  सेल्सियस  से अधिक होता है |

 (iii)            एशिया के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के स्थलीय भागों में 30o उत्तरी अक्षांशों के साथ –साथ तापमान 30o सेल्सियस से अधिक पाया जाता है |

  (iv)            40o उत्तरी एवं 40o दक्षिणी अक्षांशों पर तापमान 10o  सेल्सियस दर्ज किया जाता है  |

जनवरी एवं जुलाई के बीच तापान्तर  के  विश्व व्यापी तथ्य 

     (i)            सर्वाधिक तापान्तर यूरेशिया के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में पाया जाता है | जो लगभग 60o  सेल्सियस है | इसका मुख्य कारण महाद्वीपीयता’ (Continentality)  है |

   (ii)            सबसे कम तापान्तर 3o  सेल्सियस  का है जो 20o दक्षिणी अक्षांशों से  15o उत्तरी अक्षांशों के बीच पाया जाता है | 



 

तापमान का व्युत्क्रमण (Inversion of Temperature)

सामान्यत: तापमान ऊँचाई के साथ साथ घटता जाता है | जिसे तापमान की सामान्य ह्रास दर कहते है | परन्तु कई बार स्थिति बदल जाती है  और सामान्य ह्रास दर की स्थिति उलट जाती है | जब किसी स्थान के भू पृष्ठ  से कुछ ऊँचाई की वायु का तापमान अधिक हो जाता है और भू पृष्ठ के पास की वायु का तापमान कम हो जाता है | इस स्थिति कों तापमान का व्युतक्रमण कहते है | अक्सर व्युत्क्रमण बहुत थोड़े समय के लिए होता है , परन्तु यह सामान्य घटना है | 

सर्दियों की मेघ विहीन रात तथा शांत वायु व्युत्क्रमण के लिए आदर्श दशाएँ हैं |  दिन में प्राप्त ऊष्मा रात के समय विकिरित कर दी जाती है और सुबह तक भू –पृष्ठ अपने ऊपर की हवा से अधिक ठंडी हो जाती है |

 

ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान व्युत्क्रमण

हिम क्षेत्रों कि अधिकता के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों में वर्ष भर तापमान व्युत्क्रमण एक सामान्य घटना है |  यहाँ सतह के पास की वायु का तापमान कम होता है जबकि उसके ऊपर की वायु गर्म होती है |

 

भू पृष्ठीय व्युत्क्रमण

भू पृष्ठीय व्युत्क्रमण वायुमंडल के निचले स्तर में स्थिरता कों बढ़ावा देता है |  धुआँ तथा धूलकण व्युत्क्रमण स्तर से नीचे एकत्र होकर चारों ओर फैल जाते हैं | जिनसे वायुमंडल का निम्न स्तर भर जाता है | इससे सर्दियों में सुबह के समय घने कुहरे की रचना सामान्य घटना है | यह व्युत्क्रमण कुछ ही घंटों तक रहता है | सूर्य के ऊपर चढ़ने और पृथ्वी के गर्म होने के साथ यह समाप्त हो जाता है |

 

पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान का व्युत्क्रमण

पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में वायु अपवाह के कारण व्युत्क्रमण की उत्पत्ति होती है | पहाड़ियों तथा पर्वतों पर रात में ठंडी हुई हवा गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में भारी और धनी होने के कारण लगभग जल की तरह कार्य करती है  और ढाल के साथ ऊपर से नीचे उतरती है | यह घाटी की तली में गर्म हवा के नीचे एकत्र हो जाती है | इसे वायु अपवाह कहते है | यह पाले से पौधे की रक्षा करती है | 

 

प्लैंक का नियम

प्लैंक का नियम बताता है कि एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उत्तनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंगदैधर्य उतनी ही लघु होगी |

 

विशिष्ट ऊष्मा

एक ग्राम पदार्थ का तापमान एक अंश  बढ़ाने के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है वह विशिष्ट ऊष्मा कहलाती है |

Tuesday, August 4, 2026

LESSON 2 HUMAN SETTLEMENTS CLASS 12TH GEOGRAPHY (INDIA PEOPLE AND ECONOMY)

 

अध्याय 2 - मानव बस्ती

भारत लोग और अर्थव्यवस्था

कक्षा -12

 

मानव बस्ती का अर्थ

मानव बस्ती का अर्थ है, किसी भी प्रकार और आकार के घरों का संकुल जिसमें मनुष्य रहते हैं |

 बस्ती की प्रक्रिया

बस्ती की प्रक्रिया के अंतगर्त रहने के उद्देश्य के लिए लोग मकानों और अन्य इमारतों का निर्माण करते हैं और अपने आर्थिक पोषण –आधार के लिए कुछ क्षेत्र पर स्वामित्व रखते हैं | अत: बस्ती की प्रक्रिया में मूल रूप से लोगों के समूहन और उनके संसाधन आधार के रूप में क्षेत्र का आबंटन सम्मिलित होते हैं |

 बस्तियों के वर्गीकरण के आधार

बस्तियाँ आकार और प्रकार में भिन्न होती हैं |  उनका परिसर एक पल्ली से लेकर महानगर तक होता है |

आकार के साथ बस्तियों के आर्थिक अभिलक्षण और सामाजिक संरचना बदल जाती है | इनके साथ साथ उनकी पारिस्थितिकी और प्रौद्योगिकी में भी बदलाव देखने कों मिलता है | 

बस्तियाँ छोटी और विरल रूप से लेकर बड़ी और संकुलित अवस्थित हो सकती है |

 बस्तियों के प्रकार

ग्रामीण बस्तियाँ

विरल रूप से अवस्थित छोटी बस्तियाँ, जो कृषि अथवा अन्य प्राथमिक क्रियाकलापों में विशिष्टता प्राप्त कर लेती हैं, गाँव कहलाती है |

नगरीय बस्तियाँ

कम किन्तु बड़े अधिवास द्वितीयक और तृतीयक क्रियाकलापों में विशेषीकृत होते है उन्हें नगरीय बस्तियाँ कहा जाता है |

 ग्रामीण और नगरीय बस्तियों में अन्तर

ग्रामीण और नगरीय बस्तियों में निम्नलिखित अन्तर हैं |

     (i)            ग्रामीण बस्तियाँ अपने जीवन का पोषण अथवा आधारभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति भूमि आधारित प्राथमिक क्रियाओं से करती हैं | जबकि नगरीय बस्तियाँ अपने जीवन का पोषण  के लिए एक ओर कच्चे माल के प्रक्रमण और तैयार माल के विनिर्माण तथा दूसरी ओर विभिन्न प्रकार की सेवाओं पर निर्भर करती हैं |

   (ii)            नगर आर्थिक वृद्धि के नोड (Node) के रूप में कार्य करते हैं और न केवल नगर के निवासियों की बल्कि अपने पश्च भूमि की ग्रामीण बस्तियों कों भी भोजन और कच्चे माल के बदले वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं | नगरीय और ग्रामीण बस्तियों के बीच प्रकार्यात्म्क संबंध परिवहन और संचार परिपथ के माध्यम से स्थापित होता है |  

 (iii)            ग्रामीण और नगरीय बस्तियाँ सामाजिक संबंधों अभिवृति और दृष्टिकोण की दृष्टि से भी भिन्न होती हैं |  ग्रामीण लोग कम गतिशील होते हैं और उनमें सामाजिक संबंध घनिष्ठ होते है | दूसरी ओर नगरीय क्षेत्रों में जीवन का ढंग जटिल और तीव्र होता है  और उनमें सामाजिक संबंध औपचारिक होते हैं | 

 ग्रामीण बस्तियों के विभिन्न प्रकारों के लिए  कारक और दशाएँ

ग्रामीण बस्तियों के विभिन्न प्रकारों के लिए अनेक कारक और दशाएँ उत्तरदायी हैं | इनके अंतर्गत निम्नलिखित कारक आते हैं |

     (i)            भौतिक लक्षण :  भू –भाग की प्रकृति, भू भाग की ऊँचाई, जलवायु और जल की उपलब्धता आदि प्राकृतिक कारक शामिल हैं |

   (ii)            सांस्कृतिक और मानव जातीय कारक :  इनमें सामजिक संरचना, जाति और धर्म आदि शामिल हैं |

 (iii)            सुरक्षा संबंधी कारक :  इनमें वे कारक शामिल है जो चोरियों और डैकेतियों से सुरक्षा से सुरक्षा करते हैं |

 ग्रामीण बस्तियों के प्रकार

बस्तियों के प्रकार निर्मित क्षेत्र के विस्तार और अन्तर्वास दूरी द्वारा निर्धारित होता है |   भारत में कुछ सौ घरों से युक्त सहंत अथवा गुच्छित गाँव विशेष रूप से उत्तरी मैदानों में एक सार्वत्रिक लक्षण है | फिर भी अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अन्य प्रकार की ग्रामीण बस्तियाँ पाई जाती हैं | 

बृहद तौर पर भारत की ग्रामीण बस्तियों कों चार प्रकारों में रखा जा सकता है |

(1) गुच्छित, संकुलित अथवा आकेंद्रित बस्तियाँ,                         (2) अर्ध गुच्छित अथवा विखंडित बस्तियाँ, 

(3) पल्लीकृत बस्तियाँ,                                            (4) परिक्षिप्त अथवा एकाकी बस्तियाँ 

 गुच्छित, संकुलित अथवा आकेंद्रित बस्तियाँ (Clustered Settlements) : इन बस्तियों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं |

     (i)            गुच्छित ग्रामीण बस्ती घरों का एक सहंत अथवा संकुलित रूप से निर्मित क्षेत्र होता है |

   (ii)            इस प्रकार के गाँव में रहन –सहन का सामान्य क्षेत्र स्पष्ट और चारों ओर फैले खेतों, खलिहानों और चरागाहों से अलग होता है |

 (iii)            संकुलित क्षेत्र और इसकी मध्यवर्ती गलियाँ कुछ जाने –पहचाने प्रारूप अथवा ज्यामितीय आकृतियाँ प्रस्तुत करती हैं जैसे कि आयताकार प्रतिरूप, अरीय प्रतिरूप, रैखिक प्रतिरूप इत्यादि | 

  (iv)            ऐसी बस्तियाँ प्राय: उपजाऊ जलोढ़ मैदानों और उत्तरी –पूर्वी राज्यों में पाई जाती है |

    (v)            कई बार लोग सुरक्षा अथवा प्रतिरक्षा कारणों से सहंत गाँवों में रहते हैं, जैसे कि मध्य भारत के बुदेंलखंड प्रदेश और नागालैंड में |

  (vi)            राजस्थान में जल के अभाव में उपलब्ध जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग ने सहंत बस्तियों कों अनिवार्य बना दिया है | 

 अर्ध गुच्छित अथवा विखंडित बस्तियाँ  (Semi-clustered Settlements): इन बस्तियों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं |

     (i)            अर्ध गुच्छित अथवा विखंडित बस्तियाँ   परिक्षिप्त बस्ती के किसी सीमित क्षेत्र में गुच्छित होने की प्रवृति का परिणाम है |

   (ii)            कई बार ऐसा प्रारूप किसी बड़े सहंत गाँव के सम्पृथकन अथवा विखंडन के परिणामस्वरूप भी उत्पन्न हो सकता है |

 (iii)            ऐसी स्थिति में ग्रामीण समाज के एक अथवा अधिक वर्ग स्वेच्छा से अथवा बलपूर्वक मुख्य गुच्छ अथवा प्रमुख समुदाय से थोड़ी दूरी पर रहने लगते हैं |   

  (iv)            इस प्रकार की बस्तियों में आमतौर पर ज़मींदार और अन्य प्रमुख समुदाय मुख्य गाँव एक केन्द्रीय भाग पर अधिपत्य कर लेते हैं | जबकि समाज के निचले तबके के लोग और निम्न कार्यों में संलग्न लोग गाँव के बाहरी हिस्सों में बसते हैं |

   (v)            ऐसी बस्तियाँ गुजरात के मैदान और राजस्थान के कुछ भागों में व्यापक रूप से पाई जाती हैं | 

 पल्ली बस्तियाँ (Hamleted Settlements): इन बस्तियों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं |

     (i)            कई बार बस्ती भौतिक रूप से एक दूसरे से पृथक  अनेक इकाइयों में बँट जाती है किन्तु उन् सबका नाम एक रहता है | इस प्रकार की बस्तियों कों पल्ली बस्तियाँ कहते हैं |

   (ii)            इन इकाइयों कों देश के विभिन्न भागों में स्थानीय स्तर पर अनेक नामों से जाना जाता है जैसे पान्ना, पाड़ा, पाली, नंगला, नंगली और  ढाणी आदि |

 (iii)            किसी विशाल गाँव का ऐसा खंडीभवन प्राय: सामाजिक एवं मानवजातीय कारकों द्वारा अभिप्रेरित होता है | 

 (iv)            भारत में ऐसे गाँव मध्य और निम्न गंगा के मैदान, छतीसगढ़ और हिमालय की निचली घाटियों में बहुतायत पाए जाते हैं | 

 परिक्षिप्त अथवा एकाकी बस्तियाँ  (Dispersed Settlements): इन बस्तियों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं |

     (i)            भारत में परिक्षिप्त अथवा एकाकी बस्ती प्रारूप सुदूर जंगलों में एकाकी झोपडियों अथवा कुछ झोपडियों की पल्ली अथवा छोटी पहाड़ियों की ढलानों पर खेतों अथवा चरागाहों के रूप में दिखाई पड़ता है |

   (ii)            इस प्रकार की बस्ती का चरम विक्षेपण प्राय: भू –भाग और निवास योग्य क्षेत्रों के भूमि संसाधन आधार की अत्यधिक विखंडित प्रकृति के कारण होता है |

 (iii)            मेघालय, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और केरल के अनेक भागों में परिक्षिप्त बस्तियाँ पाई जाती है |

 नगरीय बस्तियाँ

ग्रामीण बस्तियों के विपरीत नगरीय बस्तियाँ सामान्यत: संहत और विशाल आकार की होती है | ये बस्तियाँ अनेक प्रकार के अकृषि, आर्थिक और प्रशासकीय प्रकार्यों में संलग्न होती हैं |  नगरीय बस्ती अपने चारों ओर के क्षेत्रों से प्रकार्यात्मक रूप से जुड़ी होती है | अत: वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय कई बार प्रत्यक्ष रूप से और कई बार मंडी शहरों और नगरों की श्रंखला के माध्यम से सम्पन्न होता है | इस प्रकार नगर गाँवों से प्रत्यक्ष दोनों प्रकार से जुड़े होते हैं और वे एक दूसरे से भी जुड़े होते हैं | 

 1991 की भारतीय जनगणना के अनुसार नगर की परिभाषा

1991 की भारतीय जनगणना में नगरीय बस्ती कों इस प्रकार परिभाषित किया है | ऐसे स्थान या क्षेत्र कों नगरीय बस्ती कहेंगें |  जो -

      (i)            ‘सभी स्थान जहाँ नगरपालिका, निगम, छावनी बोर्ड (कैंटोनमेंट बोर्ड) या अधिसूचित नगरीय क्षेत्र समिति (नोटिफाइड टाउन एरिया कमेटी) हो |

   (ii)            कम से कम 5000 व्यक्ति बवहाँ निवास करते हों |

 (iii)            75 प्रतिशत पुरुष श्रमिक गैर कृषि कार्यों में संलग्न हो |

  (iv)            जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर हो |

 

भारत में नगरों का विकास

भारत में नगरों अभ्युदय प्रागैतिहासिक काल से हुआ है | यहाँ टक कि सिंधु घाटी सभ्यता के युग में भी हडप्पा और मोहनजोदड़ों जैसे नगर अस्तित्व में थे | इसके बाद का समय नगरों के विकास का साक्षी है | यह समय 18वीं शताब्दी में युरोपिओं के भारत में आने टक आवधिक उतार –चढावों से भरा रहा | विभिन्न युगों में नगरों के विकास के आधार पर भारतीय नगरों कों प्राचीन नगर, मध्यकालीन नगर और आधुनिक नगर के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है |

 प्राचीन नगर

     (i)            भारत में 2000  से अधिक वर्षों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले अनेक नगर हैं |

   (ii)            इनमें से अधिकाँश का विकास धार्मिक अथवा सांस्कृतिक केन्द्रों के रूप में हुआ है |

 (iii)            वाराणसी इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण नगर है | प्रयाग (प्रयागराज) पाटलिपुत्र (पटना) मदुरई देश में प्राचीन नगरों के अन्य उदाहरण हैं |

 मध्यकालीन नगर

     (i)            वर्तमान के लगभग 100  नगरों का इतिहास मध्यकाल से जुड़ा हुआ है |

   (ii)            इनमें से अधिकाँश का विकास रजवाडों और राज्यों के मुख्यालयों के रूप में हुआ था |

 (iii)            ये किला नगर हैं जिनका निर्माण प्राचीन नगरों के खंडहरों पर हुआ है |

  (iv)            ऐसे नगरों में दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, लखनऊ, आगरा और नागपुर महत्वपूर्ण हैं |

 आधुनिक नगर

आधुनिक नगरों कों हम दो भागों में विभाजित कर सकते है |

(1)स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के आधुनिक नगर       (2) स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के आधुनिक नगर  

(1)स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के आधुनिक नगर

अंग्रेजों और अन्य यूरोपीयों ने भारत में अनेक नगरों का विकास किया | तटीय स्थानों पर अपने पैर जमाते हुए उन्होंने सर्वप्रथम सूरत, दमन, गोवा, पांडिचेरी जैसे व्यापारिक पत्तन विकसित किए |

भारत में प्रभुसत्ता प्राप्त करने पर अंग्रेजों ने बाद में तीन मुख्य नोडों मुंबई (बम्बई), चेन्नई (मद्रास) और कोलकाता (कलकत्ता) पर अपनी पकड़ मजबूत कि और उनका अंग्रेजी शैली में निर्माण किया |

अपने प्रभाव कों प्रत्यक्ष रूप से अथवा रजवाडों पर नियंत्रण के माध्यम से तेजी से बढ़ाते हुए उन्होंने प्रशासनिक केन्द्रों, ग्रीष्मकालीन विश्राम स्थलों के रूप में पर्वतीय नगरों कों स्थापित किया और उनमें सिविल, प्रशासनिक और सैन्य क्षेत्रों कों जोड़ा | जैसे शिमला और डलहौजी आदि |

1850 के बाद आधुनिक उद्योगों पर आधारित नगरों का भी जन्म हुआ | जैसे जमशेदपुर इसका एक उदाहरण है |

 (2) स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के आधुनिक नगर

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के अनेक नगर प्रशासनिक केन्द्रोंजैसे –चंडीगढ़, भुवनेश्वर, गांधीनगर, दिसपुर इत्यादि विकसित हुए |

इसी प्रकार औद्योगिक केन्द्रों जैसे दुर्गापुर, भिलाई, सिंदरी, बरौनी के रूप में औद्योगिक नगर विकसित हुए |

कुछ पुराने नगर महानगरों के चारों ओर अनुषंगी नगरों के रूप में विकसित हुए  जैसे दिल्ली के चारों ओर गाजियाबाद, रोहतक और गुरुग्राम इत्यादि | ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते निवेश के साथ पूरे देश में बड़ी संख्या में मध्यम और छोटे नगरों का विकास हुआ है |

 भारत में नगरीकरण

नगरीकरण के स्तर का माप कुल जनसंख्या में नगरीय जनसँख्या के प्रतिशत के रूप में किया जाता है | वर्ष 2011 में भारत में नगरीकरण का स्तर 31.16  प्रतिशत था जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है | 20वीं शताब्दी के दौरान नगरीय जनसंख्या 11गुना बढ़ी है | नगरीय केन्द्रों के विवर्धन और नए नगरों के आविर्भाव ने देश में नगरीय जनसंख्या की वृद्धि और नगरीकरण में सार्थक भूमिका निभाई है | जनसंख्या संबंधी आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि पिछले तीन दशकों में नगरीकरण की वृद्धि दर धीमी हुई है |  जो निम्न तालिका से स्पष्ट है |

 

                 तालिका : भारत नगरीकरण की प्रवृतियाँ 1901-2011

वर्ष   

नगरों/नगरीय संकुलों की संख्या

नगरीय जनसँख्या (हजारों में)

कुल नगरीय जनसँख्या का प्रतिशत

दशकीय वृद्धि (%)

1901

1827

25851.9

10.84

-

1911

1815

25941.6

10.29

0.35

1921

1949

28086.2

11.18

8.27

1931

2072

33456.0

11.99

19.12

1941

2250

44153.3

13.86

31.97

1951

2843

62443.7

17.29

41.42

1961

2365

78936.6

17.97

26.41

1971

2590

109114

19.91

38.23

1981

3378

159463

23.34

46.14

1991

4689

217611

25.71

36.47

2001

5161

285355

27.78

31.13

2011

6171

377000

31.16

31.08

 नगरों का प्रकार्यात्मकत वर्गीकरण

अपनी केन्द्रीय अथवा नोडीय स्थान की भूमिका के अतिरिक्त अनेक शहर और नगर विशेषीकृत सेवाओं का निष्पादन करते हैं | कुछ शहरों और नगरों कों कुछ निश्चित प्रकार्यों में विशिष्टता प्राप्त होती हैं और उन्हें कुछ विशिष्ट क्रियाओं, उत्पादनों अथवा सेवाओं के लिए जाना जाता है | फिर भी प्रत्येक शहर अनेक प्रकार के कार्य करता है | प्रमुख अथवा विशेषीकृत प्रकार्यों के आधार पर भारतीय नगरों कों मौटे तौर पर निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है |

 (1 )प्रशासनिक शहर या नगर

उच्चतर क्रम के प्रशासनिक मुख्यालयों वाले शहरों कों प्रशासन नगर कहते हैं, जैसे कि चंडीगढ़, नई दिल्ली, भोपाल, शिलांग, गुवाहाटी. इम्फाल,श्री नगर , गाँधी नगर, जयपुर, चेन्नई , लखनऊ इत्यादि |

 (2) औद्योगिक नगर

जिन नगरों के विकास का प्रमुख अभिप्रेरक बल उद्योगों का विकास रहा है उन्हें औद्योगिक नगर कहा जाता है | जैसे मुंबई, सेलम, कोयम्बटूर, मोदीनगर, जमशेदपुर, हुगली, और  भिलाई आदि |

 (3) परिवहन नगर

ये पत्तन नगर है जो मुख्यत: आयात और निर्यात कार्यों में संलग्न रहते हैं | जैसे कांडला, कोच्चि, कोझीकोड, विशाखापट्टनम, आदि | इनके अलावा आंतरिक परिवहन की धुरी कहलाने वाले नगरों कों भी परिवहन नगर कहा जाता है | जैसे – धुलिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगल सराय) इटारसी और कटनी आदि |

(4) वाणिज्य नगर  

व्यापार और वाणिज्य में विशिष्टता प्राप्त शहरों और नगरों कों इस वर्ग में रखा जाता है | जैसे –कोलकाता, सहारनपुर, सतना आदि |

 (5) खनन नगर

जो नगर खनिज समृद्ध क्षेत्रों में विकसित हुए है उन्हें खनन नगर कहा जाता है | जैसे – रानीगंज, झरिया, डिगबोई, अंकलेश्वर, सिंगरौली इत्यादि |

(6)गैरीसन अथवा छावनी नगर

इन नगरों का उदय  सैन्य छावनी के रूप में हुआ है | ये सैनिक महत्व के नगर है | जैसे- अम्बाला, जालन्धर, महू , बबीना और उधमपुर आदि |

(7) धार्मिक और सांस्कृतिक नगर

इस प्रकार के नगर अपने धार्मिक या  सांस्कृतिक महत्व के कारण प्रसिद्ध हुए है | जैसे -वाराणसी, मथुरा, अमृतसर मदुरै, पूरी, अजमेर, पुष्कर, तिरुपति, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, उज्जैन  आदि |

(8) शैक्षिक नगर

मुख्य परिसर नगरों में से कुछ नगर शिक्षा केन्द्रों के रूप में विकसित हुए जैसे रुड़की, वाराणसी, अलीगढ़, पिलानी,प्रयागराज आदि |

(9) पर्यटन नगर

वे नगर जो लोगों कों पर्यटन के आकृषित करते है | उन्हें पर्यटन नगर कहा जाता है | जैसे- नैनीताल, मसूरी, शिमला, पंचमढ़ी, जोधपुर, जैसलमेर, उडगमंडलम (उटी), माउंट आबू  कुछ पर्यटन के लिए गंतव्य स्थान है | 

 नगर बहुप्रकार्यात्मक  होते है न कि एक प्रकार्यात्मक

नगर अपने प्रकार्यों में स्थिर नहीं है , उनके गतिशील स्वभाव के कारण प्रकार्यों में परिवर्तन हो जाता है | विशेषीकृत नगर भी महानगर बनने पर बहुप्रकार्यात्मक बन जाते है | जिनमें उद्योग, व्यवसाय, प्रशासन, परिवहन आदि महत्वपूर्ण हो जाते हैं | इन नगरों में प्रकार्य इतने अंतर्ग्रंथित हो जाते हैं कि नगर कों किसी विशेष प्रकार्य वर्ग में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता | 

स्मार्ट सिटी मिशन

स्मार्ट सिटी मिशन के महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं |  

     (i)            स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य शहरों कों बढ़ावा देना है जो आधारभूत सुविधा, साफ़ तथा सतत पर्यावरण और अपने नागरिकों कों बेहतर जीवन प्रदान करते हैं |

   (ii)            स्मार्ट शहरों की एक विशेषता आधारभूत सुविधाओं और सेवाओं के लिए स्मार्ट समाधानों कों लागू करना है | जिससे क्षेत्रों कों प्राकृतिक आपदाओं के कम जोखिम वाले क्षेत्रों के रूप में बनाया जा सके , साथ ही साथ कम संसाधनों का उपयोग तथा सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सके |

 (iii)            इस योजना में सतत तथा समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया है |

  (iv)            इस योजना का उद्देश्य एक ऐसे सघन क्षेत्र पर ध्यान केंदित करना है जो एक मॉडल के रूप में अन्य बढ़ते हुए शहरों के लाईट हाउस का काम करे |