अध्याय 4 प्राथमिक क्रियाएँ
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अध्याय 4 प्राथमिक क्रियाएँ
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मानव भूगोल के मूल
सिद्धांत
अध्याय
4
प्राथमिक क्रियाएँ
आर्थिक क्रिया
मानव
के वे सभी क्रियाकलाप जिनसे आय प्राप्त होती है उन्हे आर्थिक क्रिया कहते है | जैसे
खेती करना, अध्यापक द्वारा स्कूल में बच्चों को पढ़ाना , फ़र्निचर उद्योग , चीनी उद्योग आदि |
आर्थिक क्रियाओं के प्रकार
आर्थिक
क्रियाओं को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जाता है |
प्राथमिक,
द्वितीयक , तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाएँ | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
प्राथमिक क्रियाएँ
जिन
क्रियाओं में मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त संसाधनों का सीधा प्रयोग करके अपनी
आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की पूर्ति करता है | उन्हे प्राथमिक क्रियाएँ कहते
है | ये वे
क्रियाएँ है जो प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर निर्भर है | इनका
सीधा संबंध प्राकृतिक पर्यावरण की दशाओं से होता है |
इन
आर्थिक क्रियाओं के अंतर्गत आखेट (शिकार करना), भोजन संग्रह, पशुचारण, मछ्ली पकड़ना (मत्स्य पालन), वनों से लकड़ी काटना , कृषि तथा खनन कार्य शामिल किए
जाते है |
द्वितीयक क्रियाएँ
वे क्रियाएँ जिनमें मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त संसाधनों का
सीधा प्रयोग न करके उन्हे साफ,
परिष्कृत तथा परिवर्तित किया जाता है | इस प्रकार की
क्रियाओं में प्रकृति से प्राप्त पदार्थों का उपयोग करके नयी वस्तुओं का निर्माण
किया जाता है | इसलिए इन्हे विनिर्माण प्रक्रिया भी कहते है |
इन आर्थिक क्रियाओं में सभीप्रकार के
निर्माण उद्योग के कार्य जैसे लौह अयस्क से लौह इस्पात बनाना, कपास
से सूती वस्त्र बनाना, गन्ने से चीनी तथा गुड़ बनाना आदि
शामिल किए जाते है |
तृतीयक
क्रियाएँ
वे क्रियाएँ
जिनमे समुदाय या समाज कों व्यक्तिगत या व्यवसायिक सेवाएं प्रदान की जाती है उन्हें
तृतीयक सेवाएं कहते है | इस प्रकार की क्रियाओं में लगे लोग प्रत्यक्ष रूप से किसी
वस्तु का उत्पादन नहीं करते बल्कि अपनी कार्य कुशलता तथा तकनीकी क्षमता से समाज की
सेवा करते है | इसलिए इन क्रियाओं कों सेवा क्षेत्रक में शामिल किया जाता है|
इस
प्रकार की क्रियाओं में यातायात, चिकित्सा, स्वास्थ्य, व्यापार, संचार, परिवहन तथा
प्रशासनिक सेवाएं शामिल की जाती है |
चतुर्थक क्रियाएँ
जीन गॉटमैन के अनुसार वे सेवाएं जो
अप्रत्यक्ष रूप से समाज कों सेवाएं प्रदान करती है उन्हें चतुर्थक सेवाओं में
शामिल किया जाता है | ये अनुसंधान और विकास पर केंद्रित होती है |
उच्च शिक्षण,प्रबंधन, लेखा कार्य, सूचना का
संग्रहण आदि क्रियाएँ इस प्रकार की क्रियाओं में शामिल की जाती है |
आखेट और संग्रहण
मानव सभ्यता के आरम्भिक युग में आदिमकालीन
मानव अपने जीवन निर्वाह के लिए अपने समीप के वातावरण पर निर्भर रहता था | उसका जीवन
निर्वाह दो कार्यों द्वारा होता था |
a.
आखेट (पशुओं का आखेट)
b.
संग्रहण (अपने समीप के जंगलो से खाने योग्य जंगली
पौधे एवं कंदमूल आदि कों एकत्रित करना)
इन
क्रियाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
आखेट
आदिमकालीन मानव अपने भोजन के लिए जंगली
जानवरों पर निर्भर रहता था | अतिशीत तथा
अत्यधिक गर्म प्रदेशों के लोग आखेट द्वारा ही जीवन यापन करतें थे और आज भी इन
क्षेत्रों में यही क्रिया प्रचलित है | इसी प्रकार तटीय भागों में रहने वाले लोग
मछली पकड़ने का कार्य करतें है | वर्तमान समय में तकनीकी विकास के कारण मत्स्य-ग्रहण
व्यवसाय का आधुनिकीकरण हो गया है |
प्राचीन काल में शिकारी (आखेटक) पत्थर या लकड़ी
के बने औजारों एवं तीर आदि से शिकार करते थे | जिससे मारे जाने वाले पशुओं की
संख्या सीमित रहती थी | परन्तु वर्तमान समय में पशुओं का अवैध शिकार किया जाता है
| जिसके कारण जीवों की कई जातियां लुप्त हो गई है या संकटापन्न जातियों की श्रेणी
में आ गई है |
संग्रहण
संग्रहण के अंतर्गत अपने समीप के जंगलो से
खाने योग्य जंगली पौधे एवं कंदमूल आदि कों एकत्रित करना शामिल किया जाता है | यह
कार्य भी कठोर जलवायु वाली दशाओं में किए जाते है | इस प्रकार का कार्य अधिकतर
आदिमकालीन समाज के लोग करतें है | ये लोग अपने भोजन, वस्त्र और आवास (शरण) की
आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए पशुओं और वनस्पति से प्राप्त उत्पादों का संग्रह
करते है | इस कार्य के लिय बहुत कम पूंजी और निम्न स्तरीय तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता
होती है | इस क्रिया की मुख्य बात यह है की इसमें भोजन अधिशेष नहीं रहता है | इन
क्रियाओं में प्रति व्यक्ति उत्पादकता भी कम होती है
विश्व
में भोजन संग्रहण के मुख्य क्षेत्र
भोजन संग्रहण के क्षेत्र विश्व के दो भागो में
पाए जाते है |
1.
उच्च अक्षांशीय क्षेत्र: इन क्षेत्रों के
अंतर्गत उतरी कनाडा, उतरी यूरेशिया और दक्षिणी चिली शामिल है |
2.
निम्न अक्षांशीय क्षेत्र: इन क्षेत्रों के
अंतर्गत अमेजन बेसिन, उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिणी पूर्वी
एशिया का आंतरिक क्षेत्र शामिल है |
आधुनिक
समय में भोजन संग्रहण व्यवसाय का
व्यापारीकरण
आधुनिक समय में भोजन संग्रहण व्यवसाय में काफी
परिवर्तन आ गए है | विश्व के कुछ क्षेत्रों में इसका व्यापारीकरण हो गया है | इस
कार्य कों करने वाले लोग कीमती पौधों की पत्तियाँ, छाल एवं औषधीय पौधों कों
सामान्य रूप से संशोधित करके बाजार में बेचते है | ये पौधों के विभिन्न भागों का
उपयोग करते है | उदाहरण के लिए छाल का उपयोग कुनैन बनाने, चमड़ा तैयार करने, कार्क
बनाने लिए किया जाता है और इसी तरह पत्तियों का उपयोग पेय पदार्थ बनाने, दवाईयां
एवं कांतिवर्धक (सौंदर्य प्रसाधन) की वस्तुएं बनाने के लिए, रेशे का प्रयोग कपडे
बनाने, ढृढफल का प्रयोग भोजन और तेल के लिए किया जाता है | पेड़ के तने का प्रयोग
रबड़,बलाटा, गोंद और राल बनाने के लिए किया जाता है |
एक
विशेष प्रकार के जपोटा नामक वृक्ष के दूध का प्रयोग चिकल बनाने के लिए किया जाता
है | इस चिकल का उपयोग चुविंगम बनाने में होता है |
भोजन
संग्रहण व्यवसाय का महत्व कम होने के कारण
भोजन संग्रहण व्यवसाय विश्व
स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण नहीं है | क्योंकि इन क्रियाओं द्वारा प्राप्त उत्पाद
विश्व बाज़ार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते | कई प्रकार की अच्छी किस्म एवं कम दाम
वाले कृत्रिम उत्पादों ने उष्ण कटिबंधीय वनों के लोगो द्वारा संग्रहण के उत्पादों
का स्थान ले लिया है |
पशुचारण
जब आखेट पर निर्भर रहने वाले समुदायों
ने यह महसूस किया की अब केवल आखेट से हमारा जीवन यापन नहीं हो सकता तब उन्होने
पशुओं को पालने की सोची | इस प्रकार मानव के क्रियाकलापों में पशुपालन या पशुचारण की शुरुआत हुई |
पशुचारण
मानव के प्रारम्भिक क्रियाकलापों में से एक है | विभिन्न प्रकार की जलवायु
प्रदेशों में रहने वाले लोगों ने उन क्षेत्रों में पाएँ जाने वाले पशुओं का चयन
करके उन्हे पालतू बनाया | जिसका उपयोग वह विभिन्न प्रकार के
कार्यों में करने लगा | जैसे इन पशुओं से माँस, चमड़ा तथा दूध प्राप्त करना, कृषि कार्यों में
प्रयोग करना आदि |
पशुचारण
(पशुपालन व्यवसाय) के
प्रकार
भौगोलिक
कारकों तथा तकनीकी विकास के आधार पर वर्तमान में पशुपालन व्यवसाय निर्वहन एवं
व्यापारिक स्तर पर होता है | निर्वहन एवं व्यापारिक स्तर के अनुसार
पशुपालन दो प्रकार का होता है |
1.
चलवासी पशुचारण
2.
वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु पालन)
इनका
संक्षिप्त वर्णन इस निम्न प्रकार से है |
1.
चलवासी पशुचारण
(i)
चलवासी पशुचारण एक प्राचीन जीवन –निर्वाह व्यवसाय रहा है |
(ii)
इसमें पशुचारक अपनी दैनिक आवश्यकताओं भोजन,
वस्त्र, आवास, औज़ार एवं यातायात के लिए
पशुओं पर ही निर्भर रहता है |
(iii)
पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की
तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते है |
(iv)
जब एक स्थान पर पशुओं के लिए चारा कम होने
लगता है तो ये लोग दूसरे स्थान पर चले जाते है | इस तरह एक स्थान से
दूसरे स्थान पर चलते रहने के कारण इन लोगो को चलवासी कहा जाता है |
चलवासी पशुचारण के अंतर्गत पाले जाने वाले प्रमुख पशु
चलवासी
पशुचारण के अंतर्गत विश्व के अलग–अलग
क्षेत्रों में अलग–अलग प्रकार के पशु पाले जाते है | जैसे
a)
उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में गाय तथा बैल प्रमुख
पालतू पशु है |
b)
अफ्रीका के सहारा मरुस्थल और एशिया के
मरुस्थलीय क्षेत्रों में भेड़, बकरी एवं ऊँट मुख्य पालतू पशु है |
c)
तिब्बत और एंडीज के पर्वतीय भागों में याक और
लामा पाले जाते है |
d)
आर्कटिक और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में
रेंडियर पाला जाता है |
चलवासी पशुचारण के क्षेत्र (चलवासी पशुचारण का विश्व वितरण
)
चलवासी
पशुचारण के विश्व में तीन प्रमुख क्षेत्र हैं | जो निम्न लिखित है |
a.
चलवासी पशुचारण का सबसे प्रमुख क्षेत्र उत्तरी
अफ्रीका के अटलांटिक (अंध महासागर ) के तट से अरब प्रायद्वीप होता हुआ मंगोलिया
एवं मध्य चीन तक फैला है |
b.
दूसरा क्षेत्र यूरोप तथा एशिया के टुंड्रा
प्रदेश में फैला है |
c.
तीसरा क्षेत्र दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी
पश्चिमी अफ्रीका एवं मेडागास्कर द्वीप पर है |
चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी
पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के कारण
चलवासी
पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के कारण
दो मुख्य कारण है |
a)
राजनीतिक सीमाओं का अधिरोपण
b)
कई देशों द्वारा चरागाह क्षेत्रों में नई
बस्तियों की योजना बनाना
चलवासी पशुचारकों का ऋतु प्रवास
चलवासी
पशुचारण की मुख्य विशेषता यह है की पशु पूर्ण रूप से प्राकृतिक रूप से प्राप्त
चारे पर ही निर्भर रहते है | पशुचारक किसी भी प्रकार की चारे की फसल
नहीं उगाते है | इस कारण पशुचारक चारे और जल की तलाश में एक
स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करतें है | नए चरागाह की खोज में ये पशुचारक सर्दियों में पर्वतीय भागों से समतल
मैदानी भागों में एवं ग्रीष्म ऋतु में समतल मैदानी से पर्वतीय भागों की और प्रवास करते है | ये प्रवास ऋतु के अनुसार होता है इसलिए इसे ऋतु प्रवास कहते है |
उदाहरण
के लिए भारत में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में गुज्जर,बकरवाल, गद्दी एवं भूटिया लोगों के समूह ग्रीष्म काल में मैदानी क्षेत्रों से
पर्वतीय क्षेत्रों में चले जाते है एवं सर्दियों में पर्वतीय भागों से समतल
मैदानी भागों में आ जाते है |
इसी
प्रकार टुंड्रा प्रदेश में ग्रीष्म काल में दक्षिण से उत्तर की ओर एवं शीत काल में
उत्तर से दक्षिण की ओर चलवासी पशुचारकों का पशुओं के साथ प्रवास होता है |
2.
वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु
पालन)
(i)
वाणिज्य पशुधन पालन चलवासी पशुचारण की अपेक्षा
अधिक पूंजी प्रधान एवं व्यवस्थित है | यह क्रिया पश्चिमी संस्कृति
से प्रभावित है |
(ii)
इस प्रकार के पशुपालन में पशु चारे और जल की
तलाश में घूमते नहीं है बल्कि पशुओं के लिए स्थायी फार्म होते है | ये
फार्म विशाल क्षेत्र में फैले होते है | इन विशाल फार्मों को
छोटी- छोटी इकाइयों में बाँट दिया जाता है |
(iii)
चराई को नियंत्रित करने के लिए इन इकाइयों को
बाड़ लगाकर एक दूसरे से अलग किया जाता है | जब एक छोटी इकाई की घास चराई
के बाद समाप्त हो जाती है तब पशुओं को दूसरी इकाई (क्षेत्र ) में ले जाया जाता है |
(iv)
इस प्रकार के पशुपालन में पशुओं की संख्या
चरागाह की वहन क्षमता पर निर्भर करती है की चरागाह में कितने पशु एक साथ चारा
प्राप्त कर सकते हैं|
(v)
वाणिज्य पशुधन पालन एक विशेष प्रकार की गतिविधि
है जिसमें केवल एक ही प्रकार के पशु पाले जाते है | इस प्रकार के पशुपालन
में मुख्य रूप से भेड़, बकरी, गाय, बैल एवं घोड़े पाले जाते है |
(vi)
इन पशुओं से दूध,माँस, खालें, और ऊन जैसे पदार्थ प्राप्त किए जाते है और
इन्हें वैज्ञानिक ढंग से संसाधित करके डिब्बा बंद पैकेटों के द्वारा विश्व के
बाजारों में निर्यात कर दिया जाता है |
(vii)
वाणिज्य पशुधन पालन वैज्ञानिक आधार पर होता
व्यवस्थित होता है इस प्रकार के पशुपालन में
पशुओं के प्रजनन, जननिक सुधार, बीमारियों पर नियंत्रण एवं पशुओं के
स्वास्थ्य पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है |
वाणिज्य पशुधन पालन
के प्रमुख क्षेत्र (वाणिज्य पशुधन पालन
का विश्व वितरण)
विश्व
के विस्तृत घास के मैदानों में वाणिज्य पशुधन पालन मुख्य रूप से किया जाता है | जो
निम्नलिखित है |
(a)
उत्तरी अमरीका का प्रेयरीज घास के मैदानी
क्षेत्र जो इस महाद्वीप में उत्तर से दक्षिण की ओर पश्चिमी कनाडा,
पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका तथा मैक्सिको में फैला है |
(b)
दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में पम्पास के घास
के मैदानी क्षेत्र जो ब्राज़ील के पठारी भाग तथा अर्जेंटइना में फैले है |
(c)
वेनेजुएला के लनोस के घास के मैदान
(d)
अफ्रीका महाद्वीप में वेल्ड नामक घास के मैदान
जो दक्षिणी अफ्रीका में स्थित है |
(e)
ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलंड के घास के मैदान
(f)
यूरोप तथा एशिया महाद्वीप में स्टेपीज़ घास के
मैदान |
चलवासी पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में अंतर
चलवासी
पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में निम्नलिखित अंतर है |
|
चलवासी पशुचारण |
वाणिज्य पशुधन पालन |
|
a.
चलवासी पशुचारण एक प्राचीन जीवन –निर्वाह व्यवसाय रहा है |
b.
इसमें पशुचारक अपनी दैनिक आवश्यकताओं भोजन,
वस्त्र, आवास, औज़ार एवं यातायात के
लिए पशुओं पर ही निर्भर रहता है |
c.
पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की
तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते है | d.
इस प्रकार के पशुपालन में पशु अपने आप बड़े
होते हैं | उनकी विशेष देखभाल नहीं की जाती है |
e.
चलवासी पशुचारण एक प्राचीन व्यवसाय है | जिसमें एक साथ कई
प्रकार के पशु पाले जाते है |
f.
पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे के लिए किसी
प्रकार की फसल नहीं उगाते | चारे के लिए पशु प्राकृतिक चरागाहों पर
ही निर्भर रहते है |
|
a.
वाणिज्य पशुधन पालन चलवासी पशुचारण की
अपेक्षा अधिक पूंजी प्रधान एवं व्यवस्थित है |
b.
इसमें पशुचारक व्यापार के लिए तथा पूंजी
प्राप्त करने के लिए पशुओं को पालता है |
c.
पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की
की व्यवस्था एक स्थान पर करता है | पशु एक ही स्थान पर बाड़े
में रहते है | d.
इस प्रकार के पशुपालन में पशुओं का पालन
वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है | उनकी विशेष देखभाल की जाती
है |
e.
वाणिज्य पशुधन पालन एक विशेष प्रकार की
गतिविधि है जिसमें केवल एक ही प्रकार के पशु पाले जाते है |
f.
पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे के लिए फसल उगाते हैं | |
कृषि
यह मानव की प्राथमिक
क्रियाओं में से सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक क्रिया है | कृषि फसलों का बोया जाना तथा
पशुपालन पर आधारित क्रिया है | विश्व की लगभग आधी जनसँख्या कृषि पर ही निर्भर है |
विश्व के विभिन्न क्षेत्रों
में विभिन्न प्रकार की भौतिक,आर्थिक और सामाजिक दशाएँ पायी जाती है | जो कृषि कार्य कों
प्रभावित करती है | इन्हीं दशाओं के परिणाम स्वरूप विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में
अलग अलग प्रकार की कृषि प्रणालियाँ पायी जाती है | जो निम्नलिखित है |
1) निर्वाह
कृषि
2)
रोपण कृषि
3)
विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि
4)
मिश्रित कृषि
5)
डेरी कृषि
6)
भूमध्यसागरीय कृषि
7) बाजार
के लिए खेती एवं उद्यान कृषि
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है |
निर्वाह कृषि
इस प्रकार की कृषि में कृषि क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय
लोग कृषि से प्राप्त उत्पादों का संपूर्ण या अधिकाँश भाग अपने लिए उपयोग करते
है | अर्थात वह कृषि जिसमें किसान कृषि से प्राप्त उत्पादों का इन्तेमाल अपने जीवन
निर्वाह के लिए करता है उसे निर्वाह कृषि कहते है |
ये कृषि दो प्रकार की होती है |
A. आदिकालीन
निर्वाह कृषि (स्थानांतरित कृषि)
B. गहन
निर्वाह कृषि
इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
A. आदिकालीन
निर्वाह कृषि (स्थानांतरित कृषि)
(i)
आदिकालीन निर्वाह कृषि कों
स्थानांतरित कृषि भी कहते है |
(ii)
इस प्रकार की कृषि उष्णकटिबंधीय
क्षेत्रों में की जाती है |
(iii)
इन क्षेत्रों में रहने वाली
आदिम जातियों के लोग इस प्रकार की कृषि करते है |
(iv)
स्थांनातरित कृषि की
पद्धति में वन के एक छोटे टुकड़े के पेड़ तथा झाड़ियों कों काटकर जला दिया
जाता है और भूमि कों साफ़ किया जाता है |
(v)
जली हुई वनस्पति की राख कों
उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जाता है |
(vi)
वनस्पति के काटने और जलाने
के कारण इस कृषि प्रणाली कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न) कृषि भी कहते है |
(vii)
इस प्रकार की कृषि में बोये
गए खेत बहुत छोटे होते है |
(viii)
खेती का कार्य पुराने औजारों
जैसे लकड़ी, कुदाली एवं फावड़े द्वारा की जाती है |
(ix)
कुछ समय बाद (3 से 5 वर्ष) जब उस खेत की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होने
लगती है तो कृषक नए क्षेत्र में वन जलाकर कृषि के लिए भूमि तैयार करता है | कुछ
वर्षों बाद कृषक वापस अपने पहले वाले स्थान पर आकर खेती करने आ जाता है | इस
प्रकार एक चक्र पूरा होता है जिसे झूम का चक्र कहते है |
स्थानांतरित कृषि की
समस्याएं (दोष)
या
स्थानांतरित कृषि का भविष्य
उज्जवल नहीं है
इस
प्रकार की कृषि की निम्नलिखित समस्याएं है |
a) बार
बार आग लगाने से कृषि क्षेत्र छोटा होता जाता है |
b)
इससे वनों का ह्रास हो रहा
है जिससे पर्यावरण कों हानि हो रही है |
c) वन
क्षेत्र के समाप्त हो जाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती जाती है साथ ही मृदा
अपरदन अधिक होता है |
इन
दोषों के कारण ही स्थानांतरित कृषि की आलोचना होने लगी है | परिणाम स्वरूप कई
भागों में जहाँ स्थानांतरित कृषि होती थी अब स्थानबद्ध कृषि होने लगी है | यही
कारण है की स्थानांतरित कृषि का भविष्य उज्जवल नहीं है
स्थानांतरित कृषि के क्षेत्र
यह कृषि अफ्रीका, दक्षिणी
एवं मध्य अमेरिका का उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र, एवं दक्षिणी एशिया के पूर्वी भाग में
की जाती है |
स्थानांतरित कृषि के
विभिन्नक्षेत्रों में स्थानीय नाम
|
देश का नाम |
स्थांनातरित कृषि
का नाम |
|
भारत के उत्तरी
पूर्वी राज्य (असम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड व मिजोरम ) |
झूमिंग (Jhuming) |
|
मध्य अमेरिका और
मैक्सिको |
मिल्पा (Milpa) |
|
मलेशिया और
इंडोनेशिया |
लादांग (Ladan) |
|
वियतनाम |
रे (Ray) |
|
वेनेजुएला |
कोनुको (Conuco) |
|
ब्राजील |
रोका (Roca) |
|
जायरे नदी की घाटी
तथा मध्य अफ्रीका |
मसोले (Masole) |
B. गहन निर्वाह कृषि
वह
कृषि जिसमें अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रति इकाई क्षेत्र में पूंजी
और श्रम का अधिक प्रयोग किया जाता है |
उसे गहन निर्वाह कृषि कहतें है | इस प्रकार की कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है
जहाँ पर जनसँख्या घनत्व अधिक होता है और कृषि भूमि पर अधिक जनसँख्या के भरण पोषण
का दबाब होता है |
गहन निर्वाह कृषि के प्रकार
गहन
निर्वाह कृषि दो प्रकार की होती है|
1. चावल
प्रधान गहन निर्वाह कृषि
2. चावल
रहित गहन निर्वाह कृषि
इनका संक्षिप्त वर्णन इस
प्रकार है|
1. चावल
प्रधान गहन निर्वाह कृषि
इसमें चावल प्रमुख फसल होती है| इस प्रकार की कृषि की
मुख्य विशेषताएं (लक्षण) निम्नलिखित है|
(i)
अधिक जनसँख्या घनत्व के कारण
खेतों का आकार छोटा होता है|
(ii)
भूमि का गहन उपयोग किया जाता
है|
(iii)
कृषि कार्य में कृषक का पूरा
परिवार लगा रहता है|
(iv)
मशीनों (यंत्रों) का प्रयोग
कम किया जाता है| अत: इस प्रकार की कृषि में मानव श्रम का अधिक महत्व है|
(v)
मृदा की उर्वरता बनाये रखने
के लिए पशुओं के गोबर की खाद तथा हरी खाद का प्रयोग किया जाता है|
(vi)
इस कृषि में प्रति इकाई (प्रति
एकड) उत्पादन अधिक होता है| जबकि कृषक उत्पादन कम होता है|
2.
चावल रहित गहन निर्वाह कृषि
इस
प्रकार की गहन निर्वाह कृषि में चावल मुख्य फसल नहीं होती और इसके स्थान पर गेहूँ,
सोयाबीन, जौं तथा सोरपम मुख्य फसलें होती हैं |
यह
कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा पर्याप्त मात्रा में नहीं होती |
इसके
अलावा उच्चावच, जलवायु तथा मृदा का प्रकार अगर चावल की खेती के अनुकूल नहीं होते
वहाँ भी इसी प्रकार की गहन कृषि की जाती है |
(i)
उत्तरी चीन, मंचुरिया,उत्तरी
कोरिया तथा उत्तरी जापान में इसी तरह की कृषि की जाती है जहाँ पर गेहूँ, सोयाबीन
तथा सोरपम बोया जाता है |
(ii)
भारत में सिंधु-गंगा के
मैदान के पश्चिमी में गेहूँ भाग तथा दक्षिणी तथा दक्षिणी - पश्चिमी शुष्क प्रदेश
में ज्वार और बाजरा मुख्य रूप से उगाया जाता है|
(iii)
इस कृषि की अधिकांश
विशेषताएँ वे ही है जो चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि की है| अंतर केवल इतना ही है
की इस कृषि के क्षेत्रों में वर्षा कम होती है और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए
सिंचाई की जाती है|
रोपण कृषि
रोपण
कृषि एक प्रकार की व्यापारिक कृषि है | यह वृहद स्तर पर लाभ प्राप्त करने के लिए
एक उत्पादन प्रणाली है | जिसके अन्तर्गत बाज़ार में बेचने के लिए चाय, कहवा, कोको,
रबड़, कपास, गन्ना, केला तथा अनन्नास आदि फसलें उगाई जाती है|
यूरोपीय
लोगों ने विश्व के अनेक भागों में अपने उपनिवेश स्थापित किए और अपने अधीन
उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों पर इस तरह की कृषि की शुरुआत की थी | इन देशों के लोगों ने
अपने उपनिवेशों में चाय, कहवा, कोको, रबड़, कपास, गन्ना, केला तथा अनन्नास आदि
फसलें लगायी जिसका मुख्य उद्देश्य लाभ प्राप्त करना ही था |
रोपण कृषि के लक्षण
(विशेषताएँ)
रोपण कृषि के लक्षण
(विशेषताएँ) निम्नलिखित है |
1) यूरोपीय
लोगों ने अपने अधीन उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों
पर इस तरह की कृषि की शुरुआत की थी |
2)
इसमें कृषि क्षेत्र का आकार
बहुत बड़ा होता है | कुछ बागानों का आकार तो हज़ारों हेक्टेयर होता है |
3)
इसमें अधिक पूंजी निवेश,
उच्च प्रबंध तथा तकनीकी आधार एवं वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है |
4)
यह एक फसली कृषि है जिसमें
किसी एक फसल के उत्पादन पर ही ध्यान दिया जाता है |
5)
इस प्रकार की कृषि में सस्ता
श्रम स्थानीय लोगों द्वारा मिल जाता है |
6) यह
कृषि उन्ही क्षेत्रों में विकसित होती है जहाँ पर यातायात विकसित होता है | जिसके
द्वारा बागान तथा बाजार सुचारू रूप से जुड़े होतें है |
यूरोपीय
और अमेरिकी लोगों द्वारा रोपण कृषि के विकास में योगदान
यूरोपीय
और अमेरिकी लोगों द्वारा रोपण कृषि के विकास में योगदान कों निम्नलिखित तथ्यों
द्वारा समझा जा सकता है |
a) फ्रांसीसियों
ने पश्चिमी अफ्रीका में कॉफी और कोकोआ की पौध लगायी थी |
b)
ब्रिटेनवासियों ने भारत एवं
श्रीलंका में चाय के बाग लगाये थे |
c)
ब्रिटेनवासियों के द्वारा
ही मलेशिया में रबड़ के बाग लगाये गए थे |
d)
ब्रिटेनवासियों ने ही पश्चिमी द्वीपसमूह में गन्ने और केले के बाग
विकसित किए थे |
e)
स्पेन तथा अमेरिका के
निवासियों ने फिलीपाइन्स में नारियल व
गन्ने के बाग लगाये |
f)
डच (हॉलैंड निवासी) लोगों ने
इंडोनेशिया में गन्ने की खेती शुरू की थी | उनका गन्ने की कृषि में एक समय तक एकाधिकार था |
g)
ब्राजील में कॉफी के बागानों
पर यूरोपीय देशों के लोगों का अधिकार अभी तक है | ब्राजील के इन कॉफी के बागानों
कों फेजेंडा कहा जाता है |
यूरोपीय
और अमेरिकी लोगों द्वारा विकसित अधिकतर बागानों का स्वामित्व अब उन देशों की
सरकारों के नियंत्रण में है |
विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि
यह
कृषि भी एक प्रकार की व्यापारिक कृषि है | इस प्रकार की कृषि में खेतों का आकार बड़ा
होता है | जिनमें एक ही प्रकार के अनाज की कृषि की जाती है|
विस्तृत
वाणिज्य अनाज कृषि की विशेषताएँ
इस कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ है |
1) इस
कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है | इसके अलावा मक्का, जौं, राई एवं जई भी बोई जाती है |
2) इसमें
कृषि में खेतों का आकार बहुत बड़ा होता है | आमतौर पर खेत सैकड़ों हेक्टेयर से अधिक
क्षेत्र में विस्तृत होते है |
3) यह
एक यंत्रीकृत कृषि है | इसमें खेत जोतने से लेकर फसल काटने तक के सभी कार्य मशीनों
द्वारा किए जाते है |
4) इस
प्रकार की कृषि यंत्रीकृत है और जिन क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि होती है वे
विरल जनसँख्या वाले क्षेत्र है | इसलिए इस कृषि में प्रति एकड (हेक्टेयर) उत्पादन
कम होता है लेकिन प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिक होता है|
विस्तृत
वाणिज्य अनाज कृषि के क्षेत्र
इस
प्रकार की कृषि मध्य अक्षांशों के आंतरिक अर्धशुष्क प्रदेशों में की जाती है | इस
प्रकार की कृषि घास के मैदानों में की जाती है | जो निम्न लिखित है |
1) यूरेशिया
के स्टेपीज
2) उत्तरी
अमेरिका के प्रेयरिज
3) अर्जेंटाइना
के पम्पास
4) दक्षिणी
अफ्रीका के वेल्डस
5) ऑस्ट्रेलिया
के डाउन्स
6) न्यूजीलैंड
के केंटबरी
मिश्रित कृषि
ऐसी
कृषि जिसमें फसलों कों उगाने के साथ-साथ पशुओं कों भी पाला जाता है मिश्रित कृषि
कहलाती है|
मिश्रित
कृषि की विशेषताएँ
1)
इस कृषि में फसल उत्पादन और पशुपालन
कों समान महत्व दिया जाता है|
2)
इस कृषि में खेतों का आकार
मध्यम होता है|
3)
इस कृषि में मुख्य फसलें गेहूँ,
जौं, राई, जई, मक्का, चारे की फसलें और कंदमूल है|
4)
चारे की फसलें इस कृषि का
मुख्य घटक है|
5)
फसलों के साथ जैसे मवेशी,
भेड़, सूअर एवं कुक्कुर(कुत्तें) पाले जाते है जो आय का मुख्य स्त्रोत है|
6)
श्स्यवर्तन और अंत: फसली
कृषि के द्वारा मृदा की उर्वरता कों बनाए रखा जाता है|
7)
इस कृषि में यंत्रों, भवनों,
रासायनिक और वनस्पति खाद(हरी खाद) का अधिक उपयोग होता है| इसलिए इसमें अधिक पूंजी
की आवश्यकता होती है|
8)
कृषकों की कुशलता और योग्यता
मिश्रित कृषि की सफलता के लिए अनिवार्य मानी जाती है|
विश्व
में मिश्रित कृषि के क्षेत्र
इस
प्रकार की कृषि विश्व के अत्यधिक विकसित भागों में की जाती है| उदहारण के लिए
उत्तरी पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिक का पूर्वी भाग, यूरेशिया के कुछ भाग और
दक्षिणी महाद्वीपों के समशीतोष्ण अक्षांश वाले भागों में यह कृषि की जाती है|
डेरी कृषि (डेरी फार्मिंग)
ऐसी
कृषि जिसमें मुख्य ध्यान दुधारू पशुओं के पालन -पोषण, चिकित्सा तथा प्रजनन पर दिया
जाता डेरी कृषि कहलाती है | कृषि फसलें केवल इन पशुओं के खिलने के लिए ही उगाई
जाती है |
डेरी
कृषि की विशेषताएँ
1)
डेरी व्यवसाय दुधारू पशुओं
के पालन-पोषण का सबसे उन्नत और दक्ष
प्रकार है|
2)
पशुओं के लिए छप्पर, घास
संचित करने के भंडार और दुग्ध उत्पादन में अधिक यंत्रों की आवश्यकता होती है जिसके
लिए इस व्यवसाय में अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है|
3)
पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजजन
और पशु चिकित्सा पर अधिक ध्यान दिया जाता है |
4)
इसमें पशुओं कों चराने और
दूध निकालने आदि कार्यों के लिए श्रम की आवश्यकता होती है | अत: पर्याप्त श्रम
होना अनिवार्य है| क्योंकि फसलों की तरह इस व्यवसाय में कोई अंतराल नहीं होता
इसलिए वर्षभर श्रम की आवश्यकता होती है |
5)
डेरी कृषि का कार्य नगरीय
एवं औद्योगिक केन्द्रों के समीप किया जाता है
क्योंकि ये क्षेत्र दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए अच्छे बाज़ार होते है|
6)
वर्तमान समय में विकसित
यातायात के साधनों के द्वारा दूध और दुग्ध उत्पादों कों इनके खपत क्षेत्रों तक
आसानी से और जल्दी पहुँचाया जाने लगा है जिससे इस व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है
|
7)
प्रतिशितकों (रेफ्रिजेटर) के
उपयोग और पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन ) के कारण विभिन्न डेरी उत्पादों कों अधिक समय
तक सुरक्षित रखा जा सकता है जिससे भी इस
व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |
विश्व में डेरी कृषि के क्षेत्र
विश्व में डेरी कृषि के तीन प्रमुख क्षेत्र है
|
A. उत्तरी
पश्चिमी यूरोप का क्षेत्र ,
B. कनाडा
C. न्यूजीलैंड,
दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया का सम्मिलित
विस्तृत पैमाने पर डेरी कृषि के विकास में
यातायात के साधनों और प्रतिशितकों का महत्व
दूध और दुग्ध उत्पाद जल्दी खराब होने वाली
वस्तुएँ है| वर्तमान समय में विकसित यातायात के साधनों के द्वारा दूध और दुग्ध
उत्पादों कों इनके खपत क्षेत्रों तक आसानी से और जल्दी पहुँचाया जाने लगा है| इसके
अलावा प्रतिशितकों (रेफ्रिजेटर) के उपयोग और पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन ) के कारण
विभिन्न डेरी उत्पादों कों अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है जिससे भी इस व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |
भूमध्यसागरीय कृषि
भूमध्यसागरीय
कृषि एक विशेष पकार की कृषि है जो की भूमध्यसागरीय जलवायु में की जाती है | इसमें
मुख्य रूप से खट्टे फलों की खेती की जाती है |
भूमध्यसागरीय
कृषि के क्षेत्र
इस
कृषि का विस्तार भूमध्यसागर के समीपवर्ती
क्षेत्रों में है | यह क्षेत्र दक्षिणी
यूरोप, उत्तरी अफ्रीका में ट्यूनीशिया
से अटलांटिक महासागर के तट के फैला है | इसके अलावा दक्षिणी कैलीफोर्निया, मध्यवर्ती चिली,
दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी पश्चिमी भाग तथा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी और दक्षिणी
पश्चिमी में इस कृषि का विस्तार है|
भूमध्यसागरीय
कृषि की मुख्य फसलें
अंगूर
की कृषि भूमध्यसागरीय क्षेत्र की विशेषता है | अंगूर के अलावा अंजीर और जैतून की
खेती भी इन क्षेत्रों में की जाती है | शीत ऋतु में जब यूरोप एवं संयुक्त राज्य
अमेरिका में फलों और सब्जियों की मांग रहती है तो भूमध्यसागरीय क्षेत्र से ही
उनकों फलों और सब्जियों की आपूर्ति की
जाती है |
भूमध्यसागरीय
क्षेत्र की मुख्य विशेषता अंगूर की कृषि
अंगूर
की कृषि भूमध्यसागरीय क्षेत्र की विशेषता है | इस क्षेत्र के कई देशों में अच्छे
किस्म के अंगूर की खेती होती है | इन अच्छे किस्म वाले अंगूरों से उच्च गुणवता
वाली मदिरा का उत्पादन किया जाता है |निम्न किस्म के अंगूरों कों सुखाकर मुन्नका
और किशमिश बनायीं जाती है |
बाजार के लिए सब्जी कृषि एवं उद्यान कृषि
खेतों
में फसलें उगने की बजाये छोटे छोटे भू खण्डों पर सब्जियों और फलों की खेती करण
उद्यान कृषि या बागवानी कृषि कहलाती है| यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें
अधिक मुद्रा मिलने वाले फसलें जैसे सब्जियाँ, फल तथा पुष्प उगाए जातें है जिनकी
माँग नगरीय क्षेत्रों में अधिक होती है| जहाँ इन उत्पादों कों बेचकर धन कमाया जाता है| इसी कारण से यह कृषि नगरीय
क्षेत्रों के समीप की जाती है |
बाजार
के लिए सब्जी कृषि एवं उद्यान कृषि की विशेषताएँ
1)
इस कृषि में खेतों का आकार
छोटा होता है|
2)
इस कृषि में खेत यातायात के
साधनों की सहायता से नगरीय क्षेत्रों जहाँ उच्च आय वाले उपभोक्ता रहते है उनसे से
जुड़े रहतें है|
3)
इसमें गहन श्रम और पूंजी की
आवश्यकता होती है|
4)
इस कृषि में अतिरिक्त
सिंचाई, उर्वरकों का अधिक प्रयोग, अच्छी किस्म के बीजों, कीटनाशकों का प्रयोग होता
है|
5)
इस कृषि में हरित गृह और शीत
क्षेत्रों में कृत्रिम ताप का भी प्रयोग किया जाता है|
6)
इस प्रकार की कृषि उत्तरी
पश्चिमी यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी पूर्वी भाग एवं भूमध्यसागरीय
क्षेत्रों में अधिक विकसित है| क्योंकि इन क्षेत्रों में जनसँख्या घनत्व अधिक है|
7)
इस प्रकार की कृषि से ही
नीदरलैंड पुष्प उत्पादन में विशिष्टीकरण रखता है| यहाँ पर बागवानी में विशेष फूल
ट्यूलिप उगाया जाता है और पुरे यूरोप में इसे भेजा जाता है|
8)
इस प्रकार की कृषि में जिन
प्रदेशों में किसान केवल सब्जियाँ पैदा करता है तो इसे ट्रक कृषि कहाँ जाता है|
ट्रक
फार्मिंग या ट्रक कृषि
नगरीय
केन्द्रों के चारों ओर लोगों की दैनिक मांगों कों पुरा करने के लिए सब्जियों कों
उगाना ट्रक कृषि या ट्रक फार्मिंग कहलाता है| यह बाजार ओर फार्म (खेत) के बीच एक
ट्रक द्वारा एक रात में तय की गई दूरी द्वारा नियंत्रित होती है|
कारखाना कृषि
कारखाना
कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है |
(i)
यह एक विशेष प्रकार कृषि है
जिसमें गाय-बैल तथा कुक्कुर कों पाला जाता है | इन्हें बाड़ों में रखा जाता है ओर
कारखानों में निर्मित चारा खिलाया जाता है | पशुओं की बीमारियों का विशेष ध्यान
रखा जाता है |
(ii)
अन्य व्यापारिक कृषि
प्रणालियों की तरह इस कृषि में भी भवन
निर्माण, यंत्र खरीदने, प्रकाश ओर ताप की व्य्वस्था करने के लिए और पशुओं की
चिकित्सा के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है |
(iii)
अच्छी नस्ल के पशुओं का
चुनाव और प्रजजन की वैज्ञानिक विधियों का
प्रयोग कुक्कुर और पशुपालन के लिए
महत्वपूर्ण है |
(iv)
यह कृषि मुख्य रूप से
पश्चिमी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के औद्योगिक क्षेत्रों में की जाती है|
संगठन के आधार पर कृषि के प्रकार
कृषि
विधियों के अतिरिक्त कृषि का वर्गीकरण कृषि संगठन के आधार पर भी किया जा सकता है |
क्योंकि कृषि संगठन कृषक का खेतों पर अपना अधिकार और सरकारी नीतियों द्वारा
प्रभावित होता है इसलिए संगठन के आधार पर कृषि दो प्रकार की होती है, सहकारी कृषि और सामूहिक
कृषि |
इनका
संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
सहकारी कृषि
(i)
सहकारी एक ऐसी कृषि है
जिसमें कृषकों का एक समूह अपनी कृषि से अधिक लाभ कमाने के लिए अपनी इच्छा से एक
सहकारी संस्था बनाकर कृषि कार्यों कों संपन्न करतें है |
(ii)
इसमें किसान अपनी इच्छा से
अपनी भूमि और अन्य संसाधन एकत्रित करके मिलजुल कर फसलें उगते है |
(iii)
इसमें व्यक्तिगत (निजी)
फार्म या खेत अक्षुण्ण रहते हुए सहकारी
रूप में कृषि की जाती है |
(iv)
इस प्रकार की कृषि में सहकारी
संस्था कृषकों कों हर प्रकार की सहायता करती है | यह सहायता कृषि कार्य में काम
आने वाली सभी चीजों की खरीद करने,कृषि उत्पाद कों उचित मूल्य पर बेचने एवं सस्ती
दरों पर प्रसंस्कृत साधनों कों जुटाने के लिए होती है |
सहकारी
कृषि का विकास (सहकारी आंदोलन)
सहकारी
आंदोलन एक शताब्दी पहले शुरू हुआ था | इस आंदोलन कों सर्वाधिक सफलता पश्चिमी यूरोप
के देशों में मिली | डेनमार्क, नीदरलैंड,
बेल्जियम, स्वीडन और इटली जैसे देशों में यह सफलतापूर्वक चल रहा है | डेनमार्क में
इस कृषि कों सबसे अधिक सफलता मिली है | यहाँ का प्रत्येक किसान व्यवहारिक रूप से
इस आंदोंलन का सदस्य है |
सामूहिक कृषि
सामूहिक कृषि का आधारभूत सिद्धांत यह है की
इसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व संपूर्ण समाज का होता है| और सामूहिक श्रम
के द्वारा फसल उत्पादन किया जाता है|
कृषि
का यह प्रकार साम्यवादी क्रान्ति के फलस्वरूप वर्ष 1917 में
पूर्व सोवियत संघ शुरू हुई| पूर्व सोवियत संघ (रूस) में कृषि की दशा सुधारने एवं
उत्पादन में वृद्धि करने और आत्मनिर्भरता की प्राप्ति के लिए सामूहिक कृषि
प्रारम्भ की गई थी| इस कृषि कों सोवियत संघ में कोलखहोज का नाम दिया गया | कोलखहोज
से अभिप्राय सामूहिक खेत से है जिसमें गांव की समस्त कृषि भूमि कों शामिल किया
जाता है और इस पर गांव के सभी लोगों का अधिकार होता है|
पूर्व
सोवियत संघ में सामूहिक कृषि की विशेषताएं
1) सभी
कृषक अपने संसाधन जैसे भूमि, पशुधन कों मिलाकर कृषि करते थे|
2) सभी
कृषक सामूहिक श्रम द्वारा कृषि का समस्त कार्य निपटाते थे|
3) अपनी
दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसान भूमि का छोटा टुकड़ा अपने अधिकार में रखते
थे|
4) सरकार
उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित करती थी और उसे निर्धारित मूल्य पर सरकार ही खरीदती
थी|
5) निर्धारित
लक्ष्य से अधिक उत्पन्न होने वाले भाग कों सभी सदस्यों में बाँट दिया जाता था या
बाज़ार में बेच दिया जाता था |
6) उत्पादन
और किराये पर लि गई मशीनों पर कृषकों कों कर (टैक्स) देना पड़ता था |
7) सभी
सदस्यों कों उनके द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति के आधार पर उन्हें वेतन मिलता
था|
8) असाधारण
कार्य करने वाले सदस्य कों नकद भुगतान या माल (फसल का कुछ हिस्सा) के रूप में पुरस्कृत किया जाता था|
सोवियत संघ की समाजवादी सरकार ने इसे शुरू किया
था | विभिन्न देशों की समाजवादी सरकारों ने इस कृषि मॉडल कों अपनाया है | जिनमें
हंगरी, पौलैंड, रोमानिया तथा बुल्गारिया शामिल है| 1991 में
रूस के टुकड़े होने (विघटन) के बाद इस प्रकार की कृषि में संसोधन किए गए |
खनन
खनन कार्य से अभिप्राय खनिज पदार्थों के
उत्खनन से है अर्थात खनन एक ऐसा प्राथमिक क्रियाकलाप है जो खदानों से खनिज पदार्थों के निकालने से
सम्बन्धित है| यह व्यवसाय मानव के प्राचीनतम व्यवसायों में से एक है|
खनिजों
का महत्व
खनिज संसाधन मानव की भौतिक सभ्यता का मूल आधार
है | खनिजों का सभ्यता के विकास में इतना
महत्व है की इतिहास के कई युगों का नामकरण भी खनिजों के प्रयोग के अनुसार ही हुआ
है| प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य औजारों तथा हथियारों के निर्माण में केवल
पत्थरों का प्रयोग करता था इसलिए उसे पाषाण युग (Stone
age) कहते है| जैसे-जैसे मनुष्य ने धातुओं का प्रयोग करण शुरू किया
उसी अनुसार उन युगों के नाम भी उन धातुओं के नाम के अनुरूप हो गए| जैसे सबसे पहले
तांबा प्रयोग में लाया गया तो ताम्र युग (Copper age), काँसा
प्रयोग में लाया गया तो काँस्य युग (Bronze age) और उसके बाद
लौह प्रयोग में आया तो लौह युग (Iron age) कहा गया| वर्तमान में हम इस्पात
युग (Steel age) में रह रहे
है |
प्राचीन
काल में खनिजों का उपयोग औजार बनाने, बर्तन बनाने एवं हथियार बनाने तक ही सीमित था
| इनका वास्तविक विकास औद्यौगिक क्रांति के बाद ही संभव हुआ है जिससे इनका महत्व
लगातार बढ़ता जा रहा है की खनिजों के बिना उद्योगों की कल्पना भी नहीं की जा सकती |
वर्तमान स्तिथि में हम ये भी कह सकतें है की खनिजों के बिना हमारा जीवन अधूरा है |
खनन कार्य कों प्रभावित करने वाले कारक
खनन
कार्य की लाभप्रदता कों निम्नलिखित दो प्रकार कारक प्रभावित करते है|
a) भौतिक
कारक
इनमें निक्षेपों के आकार, श्रेणी और उनकी उपस्थिति की अवस्था कों शामिल किया
जाता है |
b) आर्थिक
कारक
इन कारकों में खनिज की माँग, विद्यमान तकनीकी
ज्ञान एवं उसका उपयोग, अवसंरचना के विकास के लिए उपलब्ध पूंजी तथा यातायात एवं
श्रम पर होने वाले व्यय कों शामिल किया जाता है |
खनन की विधियाँ
उपस्थिति
की अवस्था तथा अयस्क की प्रकृति के आधार पर खनन की दो विधियाँ है |
a) धरातलीय
या विवृत खनन
b) कूपकी
या भूमिगत खनन
इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है|
a)
धरातलीय या विवृत खनन
धरातलीय
खनन कों विवृत खनन भी कहा जाता है | इस विधि कों उन खनिजों के खनन के लिए प्रयोग
किया जाता है जो भूतल के निकट ही कम गहराई में पाए जाते है | यह खनिजों के खनन की
सबसे सस्ती विधि है | क्योंकि इस विधि में सुरक्षात्मक पूर्व उपायों एवं उपकरणों
पर अतिरिक्त खर्च नहीं अपेक्षाकृत कम होता है एवं उत्पादन शीघ्र और अधिक होता है |
b)
भूमिगत खनन या कूपकी खनन
भूमिगत
खनन कों कूपकी खनन भी कहते है| यह विधि उन अयस्कों के खनन के लिए प्रयोग की जाती
है जो अधिक गहराई पर पाए जाते है| इस विधि में लम्बवत कूपक गहराई तक स्थित होते है
जहाँ से भूमिगत गैलरियाँ खनिजों तक पहुँचने के लिए बनी फैली होती है| इन मार्गों
से होकर खनिजों का निष्कर्षण एवं परिवहन धरातल तक किया जाता है|
इस विधि में खादान में काम करने वाले श्रमिकों
तथा निकाले जाने वाले खनिजों के सुरक्षित और प्रभावी आवागमन हेतु इसमें कई प्रकार
की लिफ्ट भेदक (बरमा), माल धोने की गाडियाँ तथा वायु संचार प्रणाली की आवश्यकता
होती है|
भूमिगत
खनन जोखिम भरा होने के कारण
खनन का यह तरिका जोखिम भरा है| क्योंकि जहरीली
गैसें, आग व बाढ के कारण कई बार दुर्घटनाएं होने का डर रहता है|
विकसित
अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और शोधन कार्य से पीछे हटने का कारण
विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और
शोधन कार्य से पीछे हट रहें है| क्योंकि इसमें श्रमिक लागत अधिक आने लगी है|
विकासशील
अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और शोधन कार्य कों महत्व देने का कारण
विकासशील
देश अपनी विशाल श्रम शक्ति के बल पर अपने देशवासियों के ऊँचे रहन-सहन को बनाये
रखने के लिए खनन कार्य कों महत्व दे रहे है| अफ्रीका के कई देश, दक्षिणी अमेरिका
के कुछ देश और एशिया के दशों में आय के साधनों का पचास प्रतिशत तक खनन कार्यों से
ही प्राप्त होता है|
प्रश्न 1. आर्थिक क्रिया
किसे कहते है?
उत्तर:
मानव के वे सभी क्रियाकलाप जिनसे आय प्राप्त होती है उन्हे आर्थिक क्रिया कहते है | जैसे
खेती करना, अध्यापक द्वारा स्कूल में बच्चों को पढ़ाना , फ़र्निचर उद्योग , चीनी उद्योग आदि |
प्रश्न 2. आर्थिक क्रियाओं के प्रकार बताये ?
उत्तर: प्राथमिक, द्वितीयक , तृतीयक
तथा चतुर्थक क्रियाएँ |
प्रश्न 3. चिकल का उपयोग
चुविंगम बनाने में होता है, ये चिकल किस वृक्ष से प्राप्त किया जाता है?
उत्तर: जपोटा नामक वृक्ष
प्रश्न 4. निर्वहन एवं व्यापारिक स्तर के अनुसार पशुपालन कितने
प्रकार का होता है ?
अथवा
पशुपालन कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर:
पशुपालन दो प्रकार का होता है |
1.
चलवासी पशुचारण
2.
वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु पालन)
प्रश्न 5. किस प्रकार की
कृषि कों कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न) कृषि भी कहते है और क्यों ?
उत्तर:
जीवन निर्वाह कृषि या स्थानांतरित कृषि कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न)
कृषि भी कहते है क्योंकि इसमें वनस्पति के
काट और जलाकर कृषि योग्य भूमि तैयार की जाती है|
प्रश्न 6.चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी
पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के दो कारण बताओ |
उत्तर:
चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने
के कारण दो मुख्य कारण है |
1.
राजनीतिक सीमाओं का अधिरोपण
2.
कई देशों द्वारा चरागाह क्षेत्रों में नई
बस्तियों की योजना बनाना
प्रश्न 7. अंगूर की कृषि किस
क्षेत्र की विशेषता है
उत्तर:
भूमध्यसागरीय क्षेत्र
प्रश्न 8. मिश्रित कृषि किसे
कहते है?
उत्तर:
ऐसी कृषि जिसमें फसलों कों उगाने के साथ-साथ पशुओं कों भी पाला जाता है मिश्रित
कृषि कहलाती है|
प्रश्न 9. कोलखहोज से क्या
अभिप्राय है ?
उत्तर:
कोलखहोज से अभिप्राय सामूहिक खेत से है जिसमें गांव की समस्त कृषि भूमि कों शामिल
किया जाता है और इस पर गांव के सभी लोगों का अधिकार होता है|
प्रश्न 10. सहकारी आंदोलन
सर्वाधिक सफलता किस देश में मिली ?
उत्तर: डेनमार्क
प्रश्न 11. जो खनिज भूतल के निकट ही कम गहराई में पाए जाते है
उनके खनन के लिए किस खनन विधि का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर:
धरातलीय या विवृत खनन
प्रश्न 12. भूमिगत खनन कों
अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
कूपकी खनन
प्रश्न 13 निम्न में से
कौनसी रोपण फसल नहीं है ?
|
1.
कॉफी |
2.
गन्ना |
|
3.
गेंहूँ |
4.
रबड़ |
उत्तर:
गेहूँ
प्रश्न 14. निम्न देशों में
से किस देश में सहकारी कृषि का सफल परीक्षण किया गया है ?
|
1.
रूस |
2.
डेनमार्क |
|
3.
भारत |
4.
नीदरलैंड |
उत्तर:
डेनमार्क
प्रश्न 15. फूलों की
कृषि कहलाती है ?
|
1.
ट्रक फार्मिंग |
2.
कारखाना कृषि |
|
3.
मिश्रित कृषि |
4.
पुष्पोत्पादन (फ्लोरीकल्चर) |
उत्तर
: पुष्पोत्पादन (फ्लोरीकल्चर)
प्रश्न 16. निम्न में से
कौनसी कृषि के प्रकार का विकास यूरोपीय औपनिवेशिक समूहों द्वारा किया गया ?
|
1.
कोलखोज |
2.
अंगूरोत्पादन (अंगूर उत्पादन) |
|
3.
मिश्रित कृषि |
4.
रोपण कृषि |
उत्तर: रोपण कृषि
प्रश्न 17. निम्न प्रदेशों
में से किसमे विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि नहीं की जाती है ?
|
1)
उत्तरी अमेरिका और कनाडा के
प्रेयरिज क्षेत्र |
2)
अर्जेंटाइना के पम्पास क्षेत्र |
|
3)
यूरोपीय स्टैपीज क्षेत्र |
4)
अमेजन बेसिन क्षेत्र |
उत्तर: अमेजन बेसिन क्षेत्र
प्रश्न
18. निम्न कृषि के प्रकारों में से कौनसा प्रकार कर्तन दहन
कृषि का प्रकार है?
|
1.
गहन जीवन निर्वाह कृषि |
2.
विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि |
|
3.
आदिकालीन निर्वाह कृषि |
4.
मिश्रित कृषि |
उत्तर:
आदिकालीन निर्वाह कृषि
प्रश्न 19. निम्न में से कौन- सी एकल कृषि नहीं है?
|
1.
डेरी कृषि |
2.
मिश्रित कृषि |
|
3.
विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि |
4.
रोपण कृषि |
उत्तर:
मिश्रित कृषि
प्रश्न 20. निम्न में से किस
प्रकार की कृषि में खट्टे रसदार फलों की कृषि की जाती है?
|
1.
बाजारीय सब्जी कृषि |
2.
भूमध्यसागरीय कृषि |
|
3.
रोपण कृषि |
4.
कारखाना कृषि |
उत्तर:
भूमध्यसागरीय कृषि
प्रश्न 21. उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में प्रमुख पालतू पशु कौन-से
है ?
उत्तर:
गाय तथा बैल |
प्रश्न 22. अफ्रीका के सहारा मरुस्थल और एशिया के मरुस्थलीय
क्षेत्रों में मुख्य पालतू पशु कौन-से है ?
उत्तर:
भेड़, बकरी एवं ऊँट
प्रश्न 23. तिब्बत और एंडीज के पर्वतीय भागों में कौन-से पशु
मुख्य रूप पाले जाते है ?
उत्तर:
याक और लामा
प्रश्न 24. रेंडियर किन क्षेत्रों में पाला जाता है ?
उत्तर:
आर्कटिक और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में
प्रश्न 25. डेरी कृषि के
विकास किस कारण तेजी से हुआ है ?
उत्तर: निम्नलिखित साधनों के कारण डेरी व्यवसाय का
विकास तेजी से हुआ है |
|
1.
यातायात के साधनों |
2.
प्रतिशितकों |
3.
पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन ) |
प्रश्न 26. प्राथमिक क्रियाकलाप करने वाले लोगों कों किस प्रकार की कॉलर के श्रमिक
कहा जाता है और क्यों ?