ONLINE TEST OF LESSON 6 10TH GEOGRAPHY
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Online test of lesson 1 ( Resources and Development)10th geography
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विकास
कक्षा –दसवीं
भूगोल
संसाधन का अर्थ
हमारे
पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं कों पूरा करने में
प्रयुक्त की जा सकती है और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक
रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है वह संसाधन है |
संसाधन प्राकृतिक उपहार नहीं है (मानवीय क्रियाकलापों का परिणाम है )
संसाधन प्राकृतिक उपहार है यह तथ्य सही नहीं
है | मानव स्वयं एक महत्वपूर्ण संसाधन है | वह पर्यावरण में पाए जाने वाले
पदार्थों कों परिवर्तित करता है तथा उन्हें हमारी आवश्यकताओं कों पूरा करने में
प्रयोग करने के योग्य बनाता है | इसलिए ये
सही है की संसाधन मानवीय क्रियाकलापों का परिणाम है |
संसाधनों के वर्गीकरण के आधार
संसाधनों
का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया जा सकता है |
क).
उत्पत्ति के आधार पर :- जैव
तथा अजैव संसाधन
ख).
समाप्यता के आधार पर :-
नवीकरण योग्य तथा अनवीकरण योग्य संसाधन
ग).
स्वामित्व के आधार पर :-
निजी (व्यक्तिगत,) सामुदायिक ,राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संसाधन
घ).
विकास के स्तर के आधार पर :-
संभावी, विकसित, भंडार तथा संचित कोष
उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
उत्पत्ति के आधार पर संसाधन दो प्रकार के होते
है | जैव तथा अजैव | इनका संक्षिप्त वर्णन
निम्नलिखित है |
जैव संसाधन :- वे संसाधन जिनकी
प्राप्ति सजीव वस्तुओं से होती है उन्हें जैव संसाधन कहते है | इन ससाधनों में
जीवन पाया जाता है | जैसे मनुष्य, पेड़ पौधे, वन्य जीव जंतु तथा मछलियाँ आदि |
अजैव संसाधन :- वे संसाधन जिनकी
प्राप्ति निर्जीव वस्तुओं से होती है उन्हें अजैव संसाधन कहते है | इन ससाधनों में
जीवन नहीं पाया जाता है | जैसे चट्टानें तथा धातुएँ आदि |
समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
समाप्यता के आधार पर संसाधन दो प्रकार के होते
है | नवीकरण योग्य संसाधन तथा अनवीकरण
योग्य संसाधन | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
नवीकरण योग्य संसाधन :-
वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः
उत्पन्न किया जा सकता है, उन संसाधनों कों नवीकरण योग्य या पुनः पूर्ति योग्य
संसाधन कहते है | जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा ,जल, वन तथा वन्य जीवन आदि | नवीकरण
योग्य संसाधनों के भी दो प्रकार है | सतत
तथा प्रवाह |
सतत :- वे संसाधन जो निरंतर उपलब्ध रहते है उन्हें
सतत नवीकरण योग्य संसाधन कहते हैं | जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा ,जल, आदि |
प्रवाह
:- वे संसाधन जो कुछ समय के अंतराल के बाद प्राप्त होते रहते है उन्हें प्रवाह सतत
नवीकरण योग्य संसाधन कहते हैं | जैसे वन तथा वन्य जीवन आदि |
अनवीकरण योग्य संसाधन :-
वे संसाधन जिन्हें नवीकृत या पुनः उत्पन्न नहीं
किया जा सकता है, उन संसाधनों कों अनवीकरण योग्य संसाधन कहते है | इन
ससाधनों का विकास एक लम्बे भू-वैज्ञानिक समय अतंराल में होता है | इनके बनने में
लाखों वर्ष लग जाते है | जैसे खनिज और
जीवाश्म ईंधन आदि | अनवीकरण योग्य संसाधनों के भी दो प्रकार है | चक्रीय और अचक्रीय |
चक्रीय
संसाधन: - वे संसाधन जिनका उपयोग बार-बार किया जा सकता है उन्हें चक्रीय संसाधन
कहते है | अधिकाँश धातुएँ चक्रीय संसाधन है | जैसे लौहा, चांदी, सोना, आदि |
अचक्रीय
संसाधन: - वे संसाधन जिनका उपयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है उसके बाद वे समाप्त हो जाते है | उन्हें
अचक्रीय संसाधन कहते है | सभी प्रकार के जीवाश्म ईंधन अचक्रीय संसाधन है |
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के
होते है | निजी (व्यक्तिगत) संसाधन, सामुदायिक संसाधन, राष्ट्रीय संसाधन तथा
अंतर्राष्ट्रीय संसाधन | इनका संक्षिप्त
वर्णन निम्नलिखित है |
निजी (व्यक्तिगत) संसाधन :- वे संसाधन जिन पर
निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है उन्हें निजी या व्यक्तिगत संसाधन कहते है
| गांव में बहुत से लोगों के पास अपनी
कृषि भूमि होती है | ये भूमि उन किसानों का निजी संसाधन है | इसी प्रकार शहरों में
भूखंड (प्लाट) घर तथा अन्य जायदाद होती है जो लोगों के निजी संसाधन है | इसी
प्रकार कुएँ, बाग, चरागाह, तालाब , कार, फ्रिज, टीवी जिन के मालिक होते है निजी
संसाधन कहलाते है |
सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन
:- वे संसाधन जिन पर समाज (समुदाय ) के
सभी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है उन्हें सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन हते है | समुदाय का
प्रत्येक व्यक्ति इन संसाधनों का प्रयोग कर सकता है | जैसे
गाँव की शामिलात (पंचायत) भूमि जिसमें चारण भूमि (पशुचारण की भूमि ), शमशान
भूमि, तालाब या जोहड आदि शामिल है | सामुदायिक संसाधन है | इसी प्रकार नगरों में
सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल का मैदान वहाँ के सभी लोगों के लिए होते है |
ये भी सामुदायिक संसाधन है |
राष्ट्रीय संसाधन :- तकनीकी तौर पर समझे तो पायेंगे की एक देश की
सीमा में पाए जाने वाले संसाधन राष्ट्रीय संसाधन ही होते है | क्योंकि देश की
सरकार कों ये कानूनी अधिकार है की वह आम जनता के फायदे के लिए व्यक्तिगत संसाधनों
कों भी अधिकृत कर सकती है | जैसे हम देखते है की रेलें, सडकें और नहरें आदि किसी
ना किसी की जमीन पर बनी हुई है जिसे सरकार
ने आम लोगों के लाभ के लिए उन लोगों के पास से जमीन कों लेकर अपने अधिकार में
कर लिया है और उस पर कार्य कर रही है |
इसी प्रकार शहरों में भी शहरी विकास प्राधिकरण कों भी सरकार द्वारा अधिकार दिए गए
है कि वह लोगों की निजी सम्पति अपने अधिकार में लेकर उस पर लोगों के लिए घरों की व्यवस्था करे |
देश
की राजनैतिक सीमा के अंदर की सारी भूमि, वन, जल संसाधन , खनिज संसाधन तथा वन्य
जीवन देश के राष्ट्रीय संसाधन होते है |
महासागरीय क्षेत्र
(भू-भागीय समुद्र ) जो की देश की
सीमा से 12 समुद्री मील (19.2 किलोमीटर) तक समुद्री क्षेत्र में होता है वह क्षेत्र और उसमे पाए जाने वाले खनिज संसाधन भी राष्ट्रीय संसाधन होते है |
अंतर्राष्ट्रीय संसाधन :- किसी भी देश की समुदी तट रेखा से 200
किलोमीटर तक उस देश का अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र होता है | इसके दूर
किसी का कोई आधिकार नहीं होता | ये अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाते है | कुछ
अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ इन संसाधनों पर नियंत्रण रखती है | इन संसाधनों कों अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की
सहमति के बिना प्रयोग नहीं किया जा सकता |
जैसे
भारत के पास अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र से दूर
हिंद महासागर की तलहटी में मैंगनीज ग्रंथियों के खनन करने का अधिकार मिला
हुआ है जो उसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति के बाद ही मिला है |
विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
विकास के स्तर के
आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है | संभावी संसाधन, विकसित संसाधन, भंडार तथा
संचित कोष | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
संभावी संसाधन :- वे
संसाधन जो किसी क्षेत्र में विद्यमान तो
है | उनके प्राप्त करने और उनके प्रयोग के तरीके भी हमें पता है | लेकिन उनका
उपयोग अभि शुरू नहीं किया गया है | ऐसे संसाधन संभावी संसाधन कहलाते है |
जैसे
भारत के पश्चिमी भाग विशेषकर राजस्थान और गुजरात में सूर्य तेजी से चमकता है जिससे
वहाँ पर सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ है | परन्तु अभि तक उनका सही उपयोग शुरू नहीं
हुआ है |
विकसित संसाधन :- वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है
और उनके उपयोग की गुणवत्ता तथा मात्रा भी निर्धारित की जा चुकी है | अर्थात वे संसाधन बन चुके है | विकसित संसाधन कहलाते है | संसाधनों का विकास प्रौद्योगिकी तथा उनकी
संभाव्यता के स्तर पर निर्भर करता है |
भंडार :-
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकते
है लेकिन उनके प्रयोग करने के लिए उपयुक्त तकनीक (प्रौद्योगिकी) नहीं होने के
कारण ये पदार्थ संसाधन नहीं बन सके है | भंडार कहलाते है |
जैसे
हमें पता है की जल दो ज्वलनशील गैसों
ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के मिश्रण से बना
है | ये दोंनों ही गैसे ऊर्जा का प्रमुख
स्त्रोत है | परन्तु ऊर्जा की प्राप्ति करने के लिए हमारे पास पर्याप्त तकनीक नहीं
है | भविष्य में तकनीक आने पर ये भंडार प्रयोग में लाए जा सकते है |
संचित कोष :- वे पदार्थ जिनके उपयोग का तकनीकी ज्ञान हमें प्राप्त है जिसकी सहायता से हम उसे प्रयोग
में ला सकते है | इनका उपयोग भविष्य में
पूर्ति के लिए किया जा सकता है | संसाधनों का संचित कोष कहलाता है | जैसे नदियों के जल कों विद्युत उत्पन्न की जा
सकती है | परन्तु वर्तमान में अधिकाँश
नदियों के जल का सीमित प्रयोग किया जा रहा है |
इसी प्रकार बांधों के जल, तथा वन आदि का उपयोग भविष्य में किया जा सकता है
|
संसाधन विकास
संसाधनों
का समझ के साथ उचित प्रयोग करना ही संसाधन विकास कहलाता है |
संसाधनों के विकास संबंधी समस्याओं के कारण
हमें पता है कि संसाधन मनुष्य जीवन के लिए अति
आवश्यक है | ये हमारे जीवन की गुणवत्ता को भी बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है | ये
भी विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है और कभी खत्म नहीं होंगें | इसी कारण इनका
अंधाधुंध प्रयोग करना शुरू कर दिया | जिससे
संसाधनों की कमी होने की समस्या दिखाई देने लगी | जो समस्याएँ पैदा हुई उनके
निम्नलिखित कारण है |
1. कुछ
व्यक्तियों के लालच के कारण संसाधनों का तेजी से दोहन हुआ और ये तेजी से घटते चले
गए |
2. संसाधन
कुछ ही लोगों के हाथों में आ गए है, जिससे
संसाधनों के हिसाब से हमारा समाज दो भागों में
बँट गया है | एक संसाधन संपन्न (अमीर) समाज तथा दूसरा संसाधन विहीन (गरीब)
समाज |
3. संसाधनों
के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गए है | जैसे भू मंडलीय
तापन (ग्लोबल वार्मिंग), ओजोन परत अवक्षय (ओजोन परत का घटना ), पर्यावरण प्रदूषण
तथा भूमि निम्नीकरण आदि |
संसाधनों के उपयोग की योजना बनना अति आवश्यक
हम जानते है की संसाधन मनुष्य जीवन के लिए अति
आवश्यक है | ये सीमित भी है | यदि कुछ व्यक्तियों के द्वारा संसाधनों का दोहन इसी
गति से होता रहा तो आने वाली पीढ़ियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा | क्योंकि हम उनके
हिस्से के संसाधन भी प्रयोग कर रहे है और बर्बाद कर रहे है |
मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व में शांति
बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्याय संगत बँटवारा जरूरी हो जाता है | इसी
तरह हर प्रकार के जीवों की सुरक्षा और
उनके जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए संसाधनों के सही उपयोग की योजना बनानी
आवश्यक हो जाती है | सतत पोषणीय विकास की धारणा के अनुसार कार्य करके हम संसाधनों
का योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग कर सकते है |
सतत पोषणीय विकास
सतत
पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण कों बिना नुक्सान पहुँचाए हो |
वर्तमान विकास भी होता रहे तथा भविष्य में
आने वाली पीढियों की भी अवहेलना ना
हो अर्थात उनके लिए भी पर्याप्त संसाधन
बने रहे |
पृथ्वी सम्मलेन 1992 (रियो –डी-जेनेरो सम्मलेन )
जून 1992 में
ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो में विश्व के 100 से अधिक
देशों के राष्ट्र अध्यक्षों का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ | जो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास सम्मलेन के
तत्वाधान में किया गया था | यह सम्मेलन विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण तथा
सामाजिक – आर्थिक विकास के कार्यों के बीच
में आने वाली समस्यायों के हल निकालने के लिए किया गया था | इसे प्रथम पृथ्वी
सम्मलेन कहा जाता है |
इस
सम्मलेन में शामिल हुए नेताओं ने भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता पर
तैयार एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए |
इस
सम्मलेन में नेताओं ने भू मंडलीय वन सिद्धांतों पर सहमति जताई |
इस सम्मलेन में 21वीं शताब्दी
में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने के लिए एजेंडा –21 पर
स्वीकृति प्रदान की |
एजेंडा – 21
जून
1992 में ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो में विश्व के 100 से अधिक देशों के राष्ट्र अध्यक्षों द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ
था | जिसमें एक एक घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास सम्मलेन के तत्वाधान
में स्वीकृत किया गया था | जिसका उद्देश्य भूमंडलीय सतत पोषणीय विकास हासिल करना
है | जिसे एजेंडा –21
कहा गया |
एजेंडा –21 एक घोषणा पत्र की कार्य सूची है | जिसका उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक
आवश्यकताओं एवं सम्मलित जिम्मेदारियों के
अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय क्षति कों रोकना, गरीबी और रोगों कों
मिटाना है |
एजेंडा
–21 का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना खुद का एजेंडा
–21 तैयार करे | जिससे सतत पोषणीय विकास कों हासिल किया जा
सके |
भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता
संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन
एक सर्वमान्य रणनीति है | भारत में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है
| यहाँ के कुछ प्रदेशों में संसाधनों की प्रचुरता है तो कुछ प्रदेश ऐसे भी है जहाँ
संसाधनों की कमी है | अर्थात भारत में संसाधनों का वितरण असमान है | उदाहरण के लिए झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़
आदि राज्यों में कोयले तथा अन्य खनिजों के प्रचुर भंडार है | अरूणाचल प्रदेश में
जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है | लेकिन इन सभी राज्यों में मूल विकास
(आधारभूत विकास) की कमी है | राजस्थान में पवन तथा सौर ऊर्जा संसाधनों बहुत अधिक है | लेकिन जल संसाधन की कमी है |
लद्दाख सांस्कृतिक विरासत का धनी प्रदेश है | लेकिन यह देश से बिल्कुल अलग एक शीत
मरुस्थलीय क्षेत्र है जहाँ पर जल, आधारभूत संरचना तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की
भी कमी है | इसलिए हम कह सकते है की भारत में संसाधनों का वितरण असमान है | इसलिए
संतुलित विकास के लिए राष्ट्रीय, प्रांतीय , प्रादेशिक (क्षेत्रीय) और स्थानीय
स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की
आवश्यकता है |
भारत में संसाधन नियोजन की प्रकिया के सोपान (भारत में संसाधन नियोजन )
संसाधन
नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है | भारत में संसाधन नियोजन के कुछ सोपान (steps) निम्नलिखित है |
क).
देश के विभिन्न प्रदेशों में
संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना | इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण,
मानचित्र बनाना, संसाधनों का गुणात्मक और मात्रात्मक अनुमान लगाना तथा उनका मापन
करना शामिल है |
ख).
संसाधन विकास योजनाएँ लागू
करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल तथा संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना |
ग).
संसाधन विकास योजनाओं और
राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना |
किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों के साथ साथ प्रौद्योगिकी भी
आवश्यक
किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की
उपलब्धता एक अनिवार्य शर्त है | लेकिन प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के अनुसार
परिवर्तन विकास के लिए जरूरी है क्योंकि अगर प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के
अनुसार परिवर्तन नहीं होते तो विकास संभव नहीं है | भारत में ही हम देखते है कि
बहुत से ऐसे क्षेत्र है जो संसाधनों से समृद्ध है लेकिन आर्थिक विकास में बहुत
पीछे रह गए है क्योंकि वहाँ समय के अनुरूप प्रौद्योगिकी का प्रयोग नहीं हो रहा है
| जैसे ओडिसा, बिहार, छतीसगढ आदि | इसके
विपरीत जहाँ पर अच्छी और विकसित प्रौद्योगिकी है वे क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की
कमी के बावजूद आर्थिक रूप से विकसित है | जैसे हरियाणा, पंजाब आदि | इसलिए किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों के साथ
साथ प्रौद्योगिकी भी आवश्यक है |
प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के अनुसार परिवर्तन उपनिवेशी शासन के
दौरान भारत में संसाधनों का दोहन
अथवा
भारत में उपनिवेशी शासन के
दौरान विकास
उपनिवेशन
इतिहास हमें बताता है की उपनिवेशों के संसाधन सम्पन्न प्रदेश, विदेशी
आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे है | क्योंकि इन आक्रमणकारी (उपनिवेशकारी )
देशों के पास अच्छी प्रौद्योगिकी थी जिसके दम पर उन्होंने इन प्रदेशों के संसाधनों
का जमकर शोषण किया और उन पर अपना अधिकार स्थापित किया |
इससे स्पष्ट होता है कि संसाधन किसी प्रदेश
के विकास में तभी योगदान दे सकते है | जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास तथा
संस्थागत परिवर्तन किए जाए | उपनिवेशन के इतिहास के विभिन्न चरणों में भारत ने
इसका अनुभव किया है | अत: भारत में समान्य तथा संसाधन विकास लोगों के पास उपलब्ध
संसाधनों पर ही मुख्य रूप से आधारित नहीं था | बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव
संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है |
संरक्षण की आवश्यकता
संसाधनों के विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के
कारण कई प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है | बढती हुई जनसँख्या और
औद्योगिक विकास के कारण संसाधनों का दोहन तेजी से हो रहा है | इसी तरह से संसाधनों
का ह्रास होता रहा तो आने वाली पीढ़ी के लिए संसाधन नहीं रहेंगें | साथ ही संसाधनों
के विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई प्रकार की सामाजिक –आर्थिक और
पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है | इन समस्याओं से बचाव के लिए और आने वाली
पीढ़ी के के लिए संसाधनों का संरक्षण बहुत आवश्यक है |
गाँधी जी के अनुसार संसाधनों के संरक्षण की अवधारणा (संसाधनों के संरक्षण पर गाँधी जी चिंता )
गाँधी जी ने संसाधनों के संरक्षण पर अपनी
चिंता व्यक्त करते हुए कहा की – “हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकत की पूर्ति के
लिए बहुत कुछ है | लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं अर्थात हमारे पास
पेट भरने के लिए बहुत कुछ है पेटी भरने के लिए नहीं |”
उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधनों की कमी के
लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृति
जिम्मेवार है | वे एक या कुछ व्यक्तियों
द्वारा अधिक उत्पादन के विरुद्ध थे |
जबकि एक स्थान पर बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे |
अतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण के लिए उठाए गए कदम
क्लब ऑफ रोम :- क्लब ऑफ रोम (Club
of Rome) ने 1968 में सबसे पहले अतर्राष्ट्रीय
स्तर पर संसाधन संरक्षण की वकालत शुरू की |
स्माल इज ब्यूटीफुल :- 1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक “स्माल इज ब्यूटीफुल” में संसाधन संरक्षण
के गाँधी जी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृति की |
ब्रुटलैंड आयोग 1987 तथा ब्रुटलैंड आयोग रिपोर्ट :- 1987 में ब्रुटलैंड आयोग ने एक रिपोर्ट
प्रकाशित की जिसमें वैश्विक स्तर पर संसाधनों के संरक्षण पर मूलाधार योगदान दिया |
इस रिपोर्ट ने सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development)
की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की | बाद में यह रिपोर्ट “हमारा साँझा भविष्य” (Our Common
Future) के शीर्षक से प्रकाशित हुई |
पृथ्वी सम्मेलन (1992)
:- अतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण के लिए
योगदान 1992 में ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो
में हुए पृथ्वी सम्मेलन के द्वारा भी दिया गया |
भूमि एक महत्वपूर्ण संसाधन
हम
भूमि पर रहते है | भूमि एक ऐसा संसाधन है
जिसका उपयोग हमारे पूर्वज करते आये है हमभी इसका प्रयोग विभिन्न कार्यों में करते
है और भावी पीढ़ी कों भी इसकी आवश्यकता होगी | क्योंकि हम अपने भोजन, मकान और कपडे
की मूलभूत आवश्यकताओं का 95 प्रतिशत भाग भूमि के द्वारा
ही प्राप्त करते है | अनेक प्रकार के क्रियाकलाप
करते हुए हम भूमि का उपयोग करते है | प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव
जीवन, विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ , परिवहन तथा संचार व्यवस्थायें आदि सभी
भूमि पर ही आधारित है | इसलिए भूमि एक
महत्वपूर्ण संसाधन है |
भूमि का उपयोग सावधानी से और योजनाबद्ध तरीके से करने की आवश्यकता
प्राकृतिक
वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ , परिवहन तथा
संचार व्यवस्थायें आदि सभी भूमि पर ही आधारित है | इसलिए भूमि एक महत्वपूर्ण
संसाधन है | लेकिन भूमि एक सीमित संसाधन भी है | इसलिए उपलब्ध भूमि का उपयोग
विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है | इसलिए जरुरी है कि भूमि का
उपयोग सावधानी से तथा योजनाबद्ध तरीके से किया जाए |
आकृति के आधार पर भारत की भूमि
भारत
की भूमि पर विभिन्न प्रकार की भू आकृतियाँ पाई जाती है जिन्हें मोटे तौर पर मैदान,
पर्वत तथा पठार के रूप में विभाजित किया जाता है |
मैदान
: भारत के क्षेत्रफल का 43 प्रतिशत हिस्सा मैदानी है |
जो कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधा जनक है |
पर्वत
: भारत का लगभग 30 प्रतिशत भू क्षेत्र पर्वतीय
है | इनमे से कुछ में से बारह मासी नदियाँ निकलती है जो पुरे भारत में जल की आपूर्ति
करती हैं | ये पर्वतीय क्षेत्र पर्यटन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है |
ये पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण है |
पठार
: देश के लगभग 27 प्रतिशत भू भाग पर पठार है | इस क्षेत्र
में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों के अपार
भंडार है |
उद्देश्य के आधार पर भारत में भू उपयोग (भूमि –उपयोग )
भारत
में भू संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए किया जाता है |
1. वन
इसमें सभी प्रकार के वनों के अंतर्गत आने वाली
भूमि कों शामिल किया जाता है |
2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि
वह भूमि जो कृषि के लिए उपलब्ध नहीं हो सकती
है | यह दो भागों में बाँटी जाती है |
क).
बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि
ख).
गैर कृषि कार्यों में लगाई
गई भूमि जैसे इमारते, सड़क उद्योग बनाने में प्रयुक्त भूमि |
3. परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि
इस तरह की भूमि में निम्नलिखित प्रकार की
भूमि शामिल की जाती है |
क).
स्थाई चरागाहें तथा अन्य
गोचर भूमि
ख).
विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों
तथा उपवनों के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोये
गए क्षेत्र में शामिल नहीं है |)
ग).
कृषि योग्य बंजर भूमि जहाँ
पाँच से अधिक वर्षों तक खेती ना की गई हो |
4. परती भूमि
वह भूमि जिस पर खेती की जाती है उसे कुछ समय
के लिए खाली छोड दिया जाता है परती भूमि कहलाती है | इसमें दो प्रकार की भूमि
शामिल की जाती है |
क).
वर्तमान परती भूमि
वह
भूमि जिस पर एक वर्ष या उससे कम समय से खेती ना की गई हो उसे वर्तमान परती भूमि
कहते है |
ख).
पुरातन परती भूमि
वर्तमान
परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि जिस पर एक से पाँच वर्ष तक खेती ना की गई हो
उसे पुरातन परती भूमि या अन्य परती भूमि कहते है |
5. शुद्ध बोया गया क्षेत्र
वह भूमि जिस पर वर्ष में कम से कम एक बार खेती
की गई हो उसे शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहते है | इसे निवल बोया गया क्षेत्र भी कहते
है |
जब
शुद्ध बोया गया क्षेत्र में उसे क्षेत्र कों भी जोड़ दिया जाता है जिस पर एक से
अधिक बार फसल उगाई गई हो तो उसे सकल बोया गया क्षेत्र कहते है |
भू उपयोग कों निर्धारित करने वाले कारक
भू
उपयोग कों निर्धारित करने वाले कारकों में दो प्रकार के कारक महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते है | भौतिक कारक तथा मानवीय कारक
भौतिक
कारक : भू आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार
मुख्य भौतिक कारक है |
मानवीय
कारक : जनसँख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता , संस्कृति और परम्पराएँ आदि
महत्वपूर्ण कारक हैं जो भू उपयोग कों प्रभावित करते है |
भारत में भू उपयोग प्रारूप
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है | इसके 93 प्रतिशत भाग के ही
भू उपयोग के आँकड़े उपलब्ध है |इसके निम्नलिखित कारण है |
1. पूर्वोतर
प्रान्तों में असम कों छोडकर अन्य किसी भी राज्य के सूचित क्षेत्र के बारे जानकारी
उपलब्ध नहीं है |
2. जम्मू
और कश्मीर में चीन और पकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों का अभी तक सर्वेक्षण नहीं हुआ है
|
भारत में भू उपयोग प्रारूप कों निम्न प्रकार
से समझ सकते है |
वन
इसमें सभी प्रकार के वनों के अंतर्गत आने वाली
भूमि कों शामिल किया जाता है | सन् 1960-61में
भारत में वन क्षेत्र 18.11 प्रतिशत था | जो 2002-03 में यह 22.57 प्रतिशत हो गया और 2011 में 21.05 प्रतिशत हो गया | भारत की राष्ट्रीय वन नीति (1952)
के अनुसार भारत के कुल क्षेत्रफल के 33 प्रतिशत भाग पर वन
होने आवश्यक है | वन नीति के अनुसार के
33 प्रतिशत वन पारिस्थितिक संतुलन कों बनाए रखने के लिए जरुरी है | अत
: इस क्षेत्र कों बढ़ाने की जरूरत है |
कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि
वह
भूमि जो कृषि के लिए उपलब्ध नहीं हो सकती है | यह दो भागों में बाँटी जाती है |
1. बंजर
तथा कृषि अयोग्य भूमि :
बंजर भूमि में पहाड़ी चट्टानें, सूखी तथा
मरुस्थलीय भूमि शामिल की जाती है | सन् 1960-61में इस
तरह की भूमि का प्रतिशत 12.01 था | जो 2002-03 में 6.29 प्रतिशत रह गया | भूमि सुधार कर कृषि भूमि
में प्रयोग कर ली गयी या इस भूमि का प्रयोग गैर कृषि कार्यों में किया गया | जिससे
इस तरह की भूमि का प्रतिशत कम हुआ है |
2. गैर
कृषि कार्यों में लगाई गई भूमि
वह भूमि जो कृषि के अलावा अन्य कार्यों में
किया गया है जैसे इमारते, सड़क उद्योग बनाने में प्रयुक्त भूमि कों गैर कृषि कार्यों में लगाई गई भूमि कहा
जाता है | सन् 1960-61में इस तरह की भूमि का प्रतिशत 4.95
था | जो 2002-03 में 7.92 प्रतिशत हो गया | इसका मुख्य कारण बढती जनसँख्या के लिए आवास, उद्योग,
सड़कें तथा अन्य आधारभूत अवसंरचना के लिए अन्य प्रकार की भूमि इस उपयोग में लायी
गयी |
परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि
सन्
1960-61में इस तरह की भूमि का 12.44
प्रतिशत तथा जो 2002-03 में घटकर 8.96 प्रतिशत हो गया | इस तरह की भूमि में निम्नलिखित प्रकार की भूमि शामिल की जाती है |
1. स्थाई
चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि :
सन् 1960-61में इस प्रकार की भूमि 4.71 प्रतिशत जो 2002-03 में घटकर 3.45 प्रतिशत हो गई |
2. विविध
वृक्षों, वृक्ष फसलों तथा उपवनों के अधीन भूमि
(जो शुद्ध बोये गए क्षेत्र में शामिल नहीं है ) :
सन् 1960-61में इस प्रकार की भूमि 1.50 प्रतिशत थी जो थोडा घटकर
2002-03 में
1.10 प्रतिशत हो गई |
3. कृषि
योग्य बंजर भूमि जहाँ पाँच से अधिक वर्षों तक खेती ना की गई हो :
सन् 1960-61में इस
प्रकार की भूमि 6.23 प्रतिशत थी जो थोडा घटकर 2002-03 में 4.41 प्रतिशत हो गई |
परती
भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि के कम होने का कारण यह है की इन भूमियों
कों सुधार करके कृषि योग्य क्षेत्र में बदल लिया गया है | इससे स्थाई चरगाह भूमि
कम होने से पशुओं के चराने के प्राकृतिक क्षेत्रों में कमी हुई है | जिससे उनके
चारे की समस्या होने लगी है |
परती भूमि
वह भूमि जिस पर खेती की जाती है उसे कुछ समय
के लिए खाली छोड दिया जाता है परती भूमि कहलाती है | इसमें दो प्रकार की भूमि
शामिल की जाती है |
वर्तमान
परती भूमि
वह भूमि जिस पर एक वर्ष या उससे कम समय से
खेती ना की गई हो उसे वर्तमान परती भूमि कहते है | भूमि की उपजाऊ शक्ति कों बनाए रखने के लिए किसान
कृषि भूमि कों खाली छोड देता है | सन् 1960-61में इस तरह की भूमि का प्रतिशत 3.73 था | जो 2002-03 में 7.03 प्रतिशत था |
पुरातन
परती भूमि
वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि
जिस पर एक से पाँच वर्ष तक खेती ना की गई हो उसे पुरातन परती भूमि या अन्य परती
भूमि कहते है | यह भूमि अनुपजाऊ होती है और इस पर खेती करने पर लागत अधिक आती है |
सन् 1960-61में इस
तरह की भूमि का प्रतिशत 3.82 था | जो 2002-03 में 3.50 प्रतिशत था |
शुद्ध बोया गया क्षेत्र
वह भूमि जिस पर वर्ष में कम से कम एक बार खेती
की गई हो उसे शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहते है | इसे निवल बोया गया क्षेत्र भी कहते
है |
सन् 1960-61में शुद्ध
बोया गया क्षेत्र का प्रतिशत 45.26 और 2002-03 में 43.41 प्रतिशत था | शुद्ध बोया गया क्षेत्र कों हम राज्यों के अनुसार देखते है
तो पातें है कि राज्यों में इसका अनुपात भिन्न-भिन्न है | जैसे पंजाब और हरियाणा के
मैदान में यह 80 प्रतिशत है तो अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम,
,मणिपुर तथा अंडमान निकोबार द्वीप समूह में यह 10 भी कम है |
क्योंकि ये राज्य पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है
और अधिकाशं भूमि पर वन पाए जाते है |
सकल बोया गया क्षेत्र
जब शुद्ध बोया गया क्षेत्र में उसे क्षेत्र
कों भी जोड़ दिया जाता है जिस पर एक से अधिक बार फसल उगाई गई हो तो उसे सकल बोया
गया क्षेत्र कहते है | सिंचाई की सुविधा
के साथ साथ सकल बोया गया क्षेत्र में भी वृद्धि होती जाती है |
कुल कृषि योग्य क्षेत्र
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र के साथ परती
भूमि भी शामिल कर डी जाए तो उसे कुल कृषि योग्य क्षेत्र कहते है | भारत में 2002-03 के आंकड़ों के अनुसार कुल भू क्षेत्र के
लगभग 54 प्रतिशत भाग पर ही खेती की जा सकती है |
भारत में भूमि निम्नीकरण के कारण
भूमि निम्नीकरण से अभिप्राय भूमि के गुणों में
कमी होना है | विभिन्न प्रकार के मानवीय क्रियाकलापों के कारण भूमि का तेजी से
निम्नीकरण हो रहा है | इन्हीं कार्यों से कुछ प्राकृतिक कारक जो भूमि निम्नीकरण
करते है वे भी अधिक ताकतवर हो गए हैं और भूमि निम्नीकरण कर रहे हैं |
भारत में लगभग 13करोड़
हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है | कुल
निम्नीकृत भूमिमें का लगभग 28 प्रतिशत वनों के अंतर्गत आती
है | 56 प्रतिशत निम्नीकृत भूमि जल अपरदित है | शेष लगभग 16
प्रतिशत भूमि लवणीय और क्षारीय है | मानवीय क्रियाकलापों जैसे
वनोन्मूलन (वनों की कटाई ), अति पशुचारण तथा खनन आदि ने भी भूमि निम्नीकरण में
मुख्य भूमिका निभाई है | भारत में भूमि निम्नीकरण के कारण निम्नलिखित है |
1. खनन
के कारण
खनन के बाद खदानों वाले स्थानों कों गहरी खाइयों और मलबों के साथ
खुला छोड दिया जाता है | जिससे भूमि निम्नीकरण होता है | भारत के झारखण्ड, छतीसगढ़,
मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा जैसे राज्यों में भूमि निम्नीकरण मुख्य कारण है |
2. वनोन्मूलन
के कारण
खनन क्रिया तथा अन्य कारणों
से वनों की कटाई तेजी से होती है | जिससे भूमि अपरदन अधिक होता है और भूमि
निम्नीकरण होता है | झारखण्ड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा में इस तरह भूमि
निम्नीकरण होता है |
3. अति
चराई के कारण
अति पशुचारण के कारण भूमि की
ऊपरी परत कमजोर हो जाती है और मृदा अपरदन
होने से भूमि का निम्नीकरण होता है | गुजरात, राजस्थान ,मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र
में अति पशुचारण के भूमि निम्निकरण का मुख्य कारण है |
4. अधिक
सिंचाई के कारण
अति सिंचाई से उत्पन्न
जलाक्रांता (भूमि में जल की मात्रा अधिक हो जाना ) भी भूमि निम्नीकरण के लिए
उतरदायी है | क्योंकि इससे मृदा में क्षारीयता (अम्लीयता) और लवणता बढ़ जाती है |
पंजाब , हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए
उतरदायी है |
5. उद्योगों
में खनिज प्रक्रिया
उद्योगों में खनिज प्रक्रिया
जैसे सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर कों पीसना तथा मृदा बर्तन उद्योग में चूने
(खडिया मृदा ) और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धुल
विसर्जित होती है | जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की
प्रक्रिया रुक हो जाती है | अत: उद्योगों में खनिज प्रक्रिया भी भूमि
निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है |
6. औद्योगिक
जल निकासी से भूमि निम्नीकरण
पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में
औद्योगिकी जल की निकासी हो रही है | इस
औद्योगिक जल निकास के साथ उद्योगों से बहार आने वाला अपशिष्ट पदार्थ जल प्रदूषण के
साथ साथ भूमि प्रदूषण भी करता है | जिससे भूमि निम्नीकरण हो रहा है |
भूमि निम्नीकरण कों रोकने के उपाय
भूमि
निम्नीकरण की समस्या कों सुलझाने के निम्नलिखित उपाय किए जा सकते है |
क).
वनरोपण करके
पर्वतीय ढालों, मरुस्थलीय
क्षेत्रों और बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में
वृक्षारोपण करके मृदा के अपरदन में कमी
करके कुछ हद तक भूमि निम्नीकरण कों किया जा सकता है |
ख).
पेड़ों की रक्षक मेखला बनाकर
शुष्क क्षेत्रों में पेड़ों
की रक्षक मेखला बनाकर मृदा अपरदन में कमी करके भूमि के निम्नीकरण कों कम किया जा
सकता है |
ग).
रेतीले टीलों में काँटेदार
झाडियाँ लगाकर
रेतीले टीलों में काँटेदार
झाडियाँ लगाकर इन्हें स्थिर बनाने की प्रक्रिया के द्वारा भी भूमि कटाव नियंत्रित
करके और मरुस्थली करण कों रोककर भी भूमि निम्नीकरण कम किया जा सकता है |
घ).
चरागाहों के उचित प्रबंधन के
द्वारा
पशु चरते समय कृषि भूमि को
ढीला करते जिससे मृदा अपरदन की क्रिया कों
बढ़ावा मिलता है | अत: पशुचारण कों नियंत्रित करके और चरागाहों के उचित प्रबंधन
द्वारा भी भूमि निम्नीकरण कम किया जा सकता है |
ङ).
बंजर भूमि का उचित प्रबंधन
बंजर भूमि कों सुधार कर कृषि
योग्य बनाने या गैर कृषि कार्यों में प्रयोग किया जा सकता है जिससे उपजाऊ भूमि का
निम्नीकरण कम किया जा सकता है |
च).
खनन क्रियाओं पर नियंत्रण
तथा प्रबंधन
खनन क्रियाओं को नियंत्रित
करके और खनन के बाद खादानों कों सही तरीके से भरने से भूमि निम्नीकरण कों का किया
जा सका है |
छ).
औद्योगिक अपशिष्ट जल का उचित प्रबंधन
औद्योगिक जल कों परिष्करण के
बाद ही विसर्जित किया जाए | जिससे जल प्रदूषण के साथ साथ भूमि प्रदूषण में भी कमी
आएगी |
मृदा
भू
पर्पटी की सबसे ऊपरी परत जो विखण्डित शैल चूर्ण, पेड़ पौधों के अवशेषों आदि के गले-
सडे पदार्थों के मिश्रण से बनी है, मृदा
कहलाती है |
मृदा संसाधन का महत्व
मृदा
अथवा मिट्टी सबसे महत्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है | मृदा एक जीवित तंत्र है | यह पौधों के विकास के
लिए अनिवार्य है | मृदा के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण होता है |
मृदा निर्माण कों प्रभावित करने वाले कारक (मृदा बनने की प्रक्रिया में
सहायक कारक )
मृदा
एक जीवित तंत्र है | यह जैव (ह्यूमस) तथा अजैव दोनों ही प्रकार के पदार्थों के
मिश्रण से बनती है | मृदा की कुछ सेंटीमीटर गहरी परत बनने में ही लाखों वर्ष लग
जाते है | मृदा निर्माण की प्रक्रिया में निम्नलिखित कारक सहायक होते है |
जलवायु
,उच्चावच , जनक शैल (मूल चट्टान) या संस्तर शैल , वनस्पति तथा अन्य जैव पदार्थ और
समय मुख्य कारक है | प्रकृति के अनेक कारक जैसे तापमान परिवर्तन, बहते जल की
क्रिया,हिमनदी और पवन की अपरदन क्रिया, अपघटन क्रियाएँ आदि प्रक्रियाएँ भी मृदा
निर्माण में अपना योगदान देती है |मृदा
में होने वाले विभिन्न प्रकार के जैविकऔर
रासायनिक परिवर्तन भी इसके विकास के लिए
महत्वपूर्ण हैं |
भारत की मृदाओं का वर्गीकरण
भारत
के अनेक प्रकार की भू –आकृतियाँ, उच्चावच, जलवायु और वनस्पति पाई जाती है | जिससे
भारत में अनेक प्रकार की मृदाएँ विकसित हुई है | भारत में पाई जाने वाली मृदाओं का
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
जलोढ़ मृदा
यह
मृदा देश में सबसे अधिक क्षेत्र में फैली हुई है | संपूर्ण उत्तर-भारतीय मैदान
जलोढ़ मृदा से बना हुआ है | हिमालय से निकलने वाली तीन महत्वपूर्ण नदी तंत्रों की
नदियों द्वारा लाए गए अवसाद (जलोढ़) के निक्षेप के कारण इस मृदा का विकास यहाँ हुआ
है | इसके अलावा एक संकरे गलियारे के द्वारा ये मृदाएँ राजस्थान और
गुजरात में फैली हैं | पूर्वी तटीय मैदान, विशेष रूप से गोदावरी, महानदी, कृष्णा
तथा कावेरी नदियों के डेल्टाई भाग जलोढ़ मृदा से बने हुए है |
जलोढ़
मृदा की विशेषताएँ
1)
इस मृदा में रेत, मृतिका और
सिल्ट विभिन्न अनुपात में पाए जाते है |
2)
नदी के मुहाने (डेल्टा) से
घाटी में ऊपर की ओर जाते हुए इस मृदा के कणों का आकार बढता चला जाता है | नदी घाटी
के ऊपरी भाग में जैसे ढाल भंग के पास मोटे कणों वाली मृदाएँ पाई जाती है | मोटे कणों वाली पर्वतों की तलहटी में बने
मैदानों जैसे द्वार, चो तथा तराई क्षेत्र में आमतौर पर पाई जाती है | इसके बाद
मिट्टी के कण महीन होने लगते है |
3)
आयु के आधार पर ये मृदाएँ दो
प्रकार की होती है | खादर और बांगर | नई जलोढ़ मिट्टी कों खादर कहते है | इसमें
मृदा के कण महीन होते है | खादर मृदा अधिक
उपजाऊ होती है | जबकि पुरानी जलोढ़ मिट्टी कों बांगर कहते है | इस मृदा के कण मोटे
होते है | इस मृदा में ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा अधिक होती है | बांगर मृदा से कम उपजाऊ होती है |
4)
ये मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती
है |
5)
अधिकतर जलोढ़ मृदाएँ
फास्फोरस, पोटाश और चूनायुक्त होती है |
6)
यह मृदा गन्ने, चावल, और
अन्य फसलों की खेती के लिए उपयुक्त होती है |
7)
अधिक उपजाऊ होने के कारण
यहाँ गहन खेती होती है |
8)
सूखे क्षेत्रों की जलोढ़
मृदाएँ अधिक क्षारीय होती है | जिन्हें सही उपचार और सिंचाई द्वारा ठीक करके इनसे
अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है |
काली मृदा
इन
मृदाओं कों रेगुर मृदा भी कहते है | भारत में इस प्रकार की मृदा दक्कन के पठार
(बेसाल्ट क्षेत्र) के उत्तरी पश्चिमी भागों में पाई जाती है | ये मृदाएं महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा
छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश के पठारी क्षेत्र में पाई जाती है | इसके अलावा दक्षिणी
पूर्वी दिशा में कृष्णा और गोदावरी नदियों की घाटियों तक फैली है |
काली
मृदा की विशेषताएँ
1)
इन मृदाओं का रंग काला होता
है |
2)
इन मृदाओं के विकास में
जलवायु और जनक शैलों का महत्वपूर्ण योगदान होता है |
3)
यह मृदा कपास की खेती अच्छी
होती है इसलिए इस मृदा कों काली कपास मृदा भी कहते है |
4)
यह मृदा बहुत अधिक महीन कणों
वाली होती है | यह मृतिका से बनी होती है |
5)
इस मृदा में नमी धारण करने
की क्षमता बहुत अधिक होती है |
6)
गर्म और शुष्क मौसम में इन
मृदाओं में गहरी दरारे पड़ जाती है | जिससे इनमे वायु का अच्छी तरह मिश्रण हो जाता
है |
7)
गीली होने पर ये मृदा
चिपचिपी हो जाती है | जिससे इनको जोतना मुश्किल हो जाता है | इसलिए इन्हें मानसून
प्रारम्भ होने पर पहली बारिश होने पर ही इनकी जुताई कर दी जाती है |
8)
ये मृदाएं कैल्शियम कार्बोनेट,
पोटाश, मैग्नीशियम और चूने जैसे तत्वों से परिपूर्ण होती है | इनमें फास्फोरस की
मात्रा कम पाई जाती है |
लाल और पीली मृदा
यह
मृदा रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है |
भारत में यह मिट्टी दक्कन के पठार के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में मुख्य रूप से
पाई जाती है | ये पीली और लाल मृदाएं उड़ीसा, छतीसगढ़, मध्य गंगा के मैदान के
दक्षिणी छोर पर विकसित हुई है | इनके अलावापश्चिमी घाट के गिरीपद के क्षेत्रों में
भी ये मृदाएं पाई जाती है |
लाल
मृदा की विशेषताएँ
1) रवेदार
आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह
धातु के प्रसार के कारण इन मृदाओं का रंग
लाल हो जाता है |
2) इन
लौह युक्त मृदाओं में जल योजन की क्रियाओं के परिणाम स्वरूप इन मृदाओं का रंग पीला
हो जाता है |
3) इस
प्रकार की मिट्टियों में जैव पदार्थों की कमी होती है |
4) ये
मृदाएं कम उपजाऊ होती है |
लेटराइट मृदा
लेटराइट
शब्द ग्रीक भाषा के शब्द लेटर (Later) से लिया गया है
जिसका अर्थ ईंट होता है | इस मृदा का ईंट
के जैसा होता है | यह मृदा उच्च तापमान तथा अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में
विकसित होती है | भारी वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण मृदा में अत्यधिक निक्षालन
प्रक्रिया के कारण इस मृदा का निर्माण होता है |
भारत में ये मृदाएं मुख्य तौर पर कर्नाटक,
तमिलनाडु, केरल, मध्य प्रदेश,असम के पहाड़ी भागों में पाई जाती है | कर्नाटक,
तमिलनाडु और केरल राज्यों में मृदा संरक्षण की उचित तकनीक अपनाकर इन मृदाओं में
चाय तथा कॉफी की खेती की जाती है | तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में इस मृदा में काजू
की खेती की जाती है |
लेटराइट
मृदा की विशेषताएँ
1) यह
मृदा अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में होने
के कारण इसके जैविक पदार्थों कों अपघटित करने वाले बैक्टीरिया नष्ट हो जाते है |
जिससे इन मृदाओं में जैविक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा न के बराबर होती है |
2) इस
मिट्टी में चूना, पोटाश, फॉस्फोरस तथा
नाइट्रोजन की कमी होती है |
3) इन
मृदाओं में एल्यूमिनियम तथा लौहे के ऑक्साइड पाए जाते है |जिससे इनका रंग लाल-भूरा
या ईंट के जैसा हो जाता है |
4) यह
मृदा कम उपजाऊ होती है | इसमें इनमें अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक और खाद
डालकर खेती की जा सकती है |
मरूस्थलीय मृदा (रेतीली मृदा)
उच्च
तापमान तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इस तरह की मृदा पाई जाती है | भारत में ये
मृदा राजस्थान में पश्चिमी भागों में पाई जाती है |
मरुस्थलीय
मृदा की विशेषताएँ
1) इन
मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है |
2) समान्यतः
ये मिट्टियाँ लवणीय और रेतीली होती है |
3) कुछ
क्षेत्रों में जहाँ की मृदा अधिक लवणीय होती है | वहाँ नमक की मात्रा इतनी अधिक
होती है की झीलों के जल कों वाष्पीकृत करके नमक बनाया जाता है |
4) उच्च
तापमान तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वाष्पन की क्रिया अधिक होने के कारण मृदा
में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है |
5) इन
मृदाओं की ऊपरी सतह से नीचे की ओर जाने पर कैल्सियम की मात्रा बढती जाती है |
6) इनकी
नीचे की परतों में चूने के कंकड की सतह पाई जाती है | जिसके कारण मृदा में अंत:
स्पंदन अवरुद्ध हो जाता है |
7) सही
तरीके से सिंचित करके इन मृदाओं कों कृषि योग्य बनाया जा सकता है | जैसे पश्चिमी राजस्थान में रेतीली भूमि कों सिंचित
करके उसे कृषि योग्य बनाया गया है |
वन या पर्वतीय मृदा
ये
मृदाएं आमतौर पर उन पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ पर पर्याप्त
वर्षा वन उपलब्ध होते है | भारत में ये मृदाएं हिमालय पर्वत के क्षेत्रों में
मुख्य रूप से पाई जाती है | ये जम्मू –कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड , सिक्किम
तथा अरुणाचलप्रदेश राज्यों में पाई जाती है |
वन
मृदा की विशेषताएँ
1) इन
मृदाओं के गठन में पर्वतीय पर्यावरण के बदलाव के साथ परिवर्तन आता है | अर्थात वनस्पति
के प्रकार और जीवों की प्रकृति मृदा के गुणों कों प्रभावित करती है |
2) नदी
घाटियों में ये मृदाएं सिल्टदार और दोमट होती है | जबकी ऊपरी भागों में मृदा के कण
मोटे होते है |
3) हिमालय
के हिम से ढके क्षेत्रों में इन मृदाओं का अपरदन अधिक होता है | और ये अधिसिलिक या
अम्लीय (ACIDIC)
होती है | इनमें ह्यूमस की मात्रा कम होती है |
4) नदी
घाटियों के निचले क्षेत्रों में विशेषकर जलोढ़ पंखों और नदी सोपानों के क्षेत्रों
में ये मृदाएं अधिक उपजाऊ होती है |
मृदा अपरदन
मृदा
के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया कों
मृदा अपरदन कहते है |
मृदा अपरदन के कारण
मृदा
के निर्माण तथा इसके अपरदन की प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती है | अगर अपरदन की क्रिया
प्राकृतिक रूप से हो तो इन दोनों मृदा निर्माण तथा अपरदन की क्रियाओं में संतुलन
बना रहता है और मृदा कि परत कों अधिक हानि नहीं होती | लेकिन विभिन्न प्रकार की
मानवीय क्रियाएँ मृदा अपरदन की दर कों बढा देती है जिससे संतुलन बिगड जाता है |
मृदा अपरदन के लिए जरुरी मानवीय तथा प्राकृतिक कारण निम्नलिखित है |
मानवीय
कारण
1) हम
जानते है कि वृक्ष अपनी जड़ों के साथ मृदा कों जकड़े रखते है वनोन्मूलन (वनों की
कटाई) के कारण मृदा के कण ढीले पड़ जाते है जो जल के साथ आसानी से बहाकर ले जाए
जाने से मृदा अपरदन की दर बढ़ जाती है |
2) अति
पशुचारण के कारण पशुओं के पैरों से मृदा की ऊपरी परत कमजोर हो जाती है जिससे
आसानी से मृदा अपरदन होने लगता है |
3) खनन
कार्यों के द्वारा भी मृदा की ऊपरी परत कों हटा दिया जाता है जो पवन तथा जल की
सहायता से अपरदित हो जाती है
4) निर्माण
कार्य के लिए मृदा का प्रयोग किया जाता है जिससे मृदा कि ऊपरी परत कों खोदा जाता
है | जिससे बड़ी मात्रा में मृदा अपरदन होता है |
5) ढलवा
भूमि पर गलत तरीके से हल चलाने (ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने) के कारण वाहिकाएँ बन
जाती है | जिनके अंदर पानी बहकर आसानी से
मृदा का अपरदन करने लगता है |
अपरदन
के प्रकार
1) पवन
द्वारा अपरदन
पवन के द्वारा रेतीले मैदानों तथा ढालू क्षेत्रों से मृदा कों उड़ा कर ले जाने
की प्रक्रिया कों पवन अपरदन कहते है |
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन द्वारा अपरदन अधिक मात्रा में होता है |
2) बहते
जल (नदी) द्वारा अपरदन
बहते हुए जल के द्वारा मृदा कों काटकर अपने
साथ बहाकर ले जाना नदी अपरदन कहलाता है |
यह दो प्रकार का होता है |
क).
अवनालिका अपरदन
बहता हुआ जल मृतिका युक्त मृदाओं कों काटते
हुए नालियाँ बना देता है | धीरे-धीरे ये नालियाँ गहरी होती जाती है | इन नालिओं
कों वाहिकाएँ या अवनालिकायें कहते है | इस प्रकार के अपरदन कों अवनालिका अपरदन
कहते है | ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रह जाती | इस तरह अवनालिकाओं से युक्त की भूमि कों उत्खात भूमि (BAD LAND) कहते
है | भारत में चम्बल नदी के बेसिन में ऐसी भूमि पाई जाती है | जिसे खड्ड भूमि (RAVINE) कहा जाता है |
ख).
चादरी अपरदन
कई बार जल विस्तृत क्षेत्र की मृदा की ऊपरी
परत कों ढाल के साथ नीचे की ओर बहा कर ले
जाता है तो इस प्रकार के अपरदन कों परतदार अपरदन या चादरी अपरदन कहते है | इससे
मृदा की उपजाऊ परत बहकर चली जाती है |
3) हिमनदी
द्वारा अपरदन
हिमानी
क्षेत्रों में हिमनदी अपनी तलहटी में मृदा की ऊपरी परत कों काट कर अपने साथ बहा कर
ले जाती है जिसे हिमानी द्वारा अपरदन कहते है |
मृदा अपरदन रोकने के उपाय
मृदा
अपरदन को रोकने के निम्नलिखित उपाय किए ज सकते है |
क).
सम्मोच रेखीय जुताई करना
पहाड़ी
क्षेत्रों में समोच्च रेखा के साथ - साथ जुताई करके खेती करना समोच्च रेखीय कृषि
कहलाती है | ढलवाँ भूमि पर सम्मोच रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल
बहाव की गति कम होती है जिससे मृदा अपरदन
कम होता है |
ख).
सोपानी कृषि करना (सीढ़ीदार
खेती करना)
ढाल
वाली भूमि पर सोपान (सीढियाँ ) बनाकर कृषि करनी चाहिए | इससे भी मृदा अपरदन पर रोक
लगती है | भारत में पश्चिमी और मध्य हिमालय में इस तरह की खेती काफी विकसित है |
जिससे इन क्षेत्रों में मृदा अपरदन पर रोक
लगी है |
ग).
पट्टी कृषि करके (घास की
पट्टी लगाकर )
बड़े
खेतों कों पट्टियों में बाँटकर फसलों के बीच घास की पट्टियाँ लगाई जाती है | इस
तरह की कृषि कों पट्टी कृषि कहते है | खेतों में
घास की ये पट्टियाँ पवनों द्वारा जनित बल कों कमजोर कर देती है | जिससे मृदा अपरदन कम होता है |
घ).
रक्षक मेखला लगाना
पेड़ों
कों कतारों में लगाकर उनकी रक्षक मेखला बनाई जाती है | जो पवनों की गति कम करने
में सहायक होते है | इस प्रकार की रक्षक पट्टियों (रक्षक मेखलाओं ) की सहायता से
पश्चिमी भारत में रेत के टीलों का स्थायीकरण किया ज रहा है इसके साथ ही मरुस्थलीकरण कों रोका जा रहा है |
ङ).
वनरोपण करके
हम
हम जानते है कि वृक्ष अपनी जड़ों के साथ मृदा कों जकड़े रखते है | ये बाढ़ के समय जल
बहाव की गति भी कम करते है | इसलिए अधिक से अधिक वन लगाकर भी मृदा अपरदन कों कम
किया ज सकता है |
च).
नियंत्रित पशुचारण करना
अति
पशुचारण के कारण पशुओं के पैरों से मृदा की ऊपरी परत कमजोर हो जाती है जिससे
आसानी से मृदा अपरदन होने लगता है | अत:
पशुओं की चराई कों नियंत्रित करके भी मृदा अपरदन की गति कम की जा सकती है |