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Saturday, August 8, 2026

Lesson 8 Solar Radiation Heat Bught and Temperature Class 11th Geography

 

अध्याय 8  सौर विकिरण, ऊष्मा बजट तथा तापमान

कक्षा -11

पुस्तक - भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

सूर्यातप (INSOLATION )

पृथ्वी के भू पृष्ठ पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम भाग सूर्य से आने  वाली लघु तरंगदैर्ध्य के रूप में प्राप्त होता है |   लघु तरंगदैर्ध्य  के रूप में पृथ्वी कों प्राप्त होने वाली इस ऊर्जा कों “आगामी सौर विकिरण” या “सूर्यातप” (INSOLATION) कहते है |

पृथ्वी की आकृति और सौर ऊर्जा

पृथ्वी की अपनी आकृति है जिसे भू-आभ या जियोड (GEOID)  कहा जाता है | इस आकृति के कारण सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल  के ऊपरी भाग पर तिरछी  पड़ती है | जिसके कारण पृथ्वी सौर ऊर्जा के बहुत ही कम अंश कों  प्राप्त कर पाती है | पृथ्वी औसत रूप से वायुमंडल की ऊपरी सतह पर  1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी के कारण सौर ताप में परिवर्तन   

वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा में प्रतिवर्ष थोडा परिवर्तन देखने कों मिलता है | यह परिवर्तन पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी में अन्तर के कारण होता है | जिन्हें हम निम्न प्रकार से समझ सकते है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच की अधिकतम दूरी  (अपसौर)

सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई कों सूर्य से सबसे दूर होती है | इस स्थिति में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर होती है | सूर्य के प्रति पृथ्वी की इस स्थिति कों अपसौर (Aphelion) कहा जाता है |

पृथ्वी और सूर्य के बीच की न्यूनतम  दूरी  उपसौर)

सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 3 जनवरी कों सूर्य से सबसे नजदीक होती है | इस स्थिति में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर होती है | सूर्य के प्रति पृथ्वी की इस स्थिति कों उपसौर (Perihelion) कहा जाता है |

            पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप 3 जनवरी कों 4 जुलाई की अपेक्षा अधिक होता है | फिर भी सूर्यातप की भिन्नताका यह प्रभाव जैसे स्थल और समुद्र का वितरण तथा वायुमंडल परिसंचरण के द्वारा कम हो जाता है | यही कारण है कि सूर्यातप की यह भिन्नता पृथ्वी की सतह पर होने वाले प्रतिदिन के मौसम परिवर्तन पर अधिक प्रभाव नहीं डाल पाती है |  

पृथ्वी की सतह पर सूर्यातप में भिन्नता कों प्रभावित करने वाले कारक   

सूर्यातप की मात्रा में,प्रतिदिन, हर मौसम और प्रतिवर्ष परिवर्तन होता रहता है | पृथ्वी की सतह पर सूर्यातप में होने वाली विभिन्नता के निम्नलिखित कारक हैं | 

     (i)            पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना

   (ii)            सूर्य की किरणों का नति कोण (सूर्य की किरणों का तिरछापन)

 (iii)            दिन की अवधि

  (iv)            वायुमंडल की पारदर्शिता

    (v)            स्थल विन्यास

(i) पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना

पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर परिक्रमण की समतल कक्षा से  66  डिग्री (6630’) का कोण बनाता है, जो विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त होने वाले सूर्यातप की मात्रा कों प्रभावित करता है |

(ii) सूर्य की किरणों का नति कोण (सूर्य की किरणों का तिरछापन)

सूर्यातप की मात्रा कों प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण कारक सूर्य की किरणों  का नति कोण है | किरणों का नति कोण  किसी स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है | अक्षांश जितना उच्च होगा (अर्थात ध्रुवों की ओर जाते हुए ) किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा अर्थात सूर्य की किरणें तिरछी पड़ेगीं |

तिरछी किरणों की अपेक्षा सीधी किरणें कम स्थान पर पड़ती है | जिससे उस स्थान कों अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है | तिरछी किरणें अधिक स्थान पर पडती है किरणों के अधिक क्षेत्र पर पड़ने के कारण ऊर्जा वितरण बड़े क्षेत्र पर होता है  और प्रति इकाई क्षेत्र कों कम ऊर्जा मिलती है |

इसके अतिरिक्त तिरछी किरणों कों वायुमंडल की अधिक गहराई से गुजरना पड़ता है | अत: अधिक अवशोषण , प्रकीर्णन एवं विसरण के द्वारा ऊर्जा (सूर्यातप) का अधिक ह्रास होता है | 

(iv) दिन की अवधि

दिन की अवधि जितनी लम्बी होगी सूर्यातप उतना ही अधिक प्राप्त होता है | इसी कारण भूमध्य रेखीय क्षेत्रों से ध्रुवों की ओर जाते समय जैसे –जैसे दिन की अवधि कम होती जाती है सूर्यातप की मात्रा भी कम होती जाती है |

(v) वायुमंडल की पारदर्शिता (स्वच्छ आकाश)

वायुमंडल की पारदर्शिता से आशय है स्वच्छ आकाश का होना | यदि आकाश स्वच्छ है तो किसी स्थान पर आने वाले सूर्यातप की पूरी मात्रा उस स्थान कों प्राप्त होती है | इसके विपरीत यदि आकाश में मेघ छाए हुए है या प्रदूषण अधिक है तो सूर्यातप पूर्ण रूप से नहीं पहुँच पाता है |  भूमध्य रेखीय प्रदेशों में मेघों के छाए रहने से सूर्यातप की मात्रा का बहुत सा भाग इन क्षेत्रों कों नहीं मिल पाता है जबकि उष्ण कटिबंधीय  मरुस्थलीय भागों में आकाश साफ़ होने के कारण ये क्षेत्र अधिकतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं |

(vi) सौर विकिरण का वायुमंडल से होकर गुजरना

लघु तरंगदैधर्य वाले सौर विकिरण के लिए वायुमंडल अधिकांशतः पारदर्शी होता है | पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से पहले सूर्य की किरणें वायुमंडल से होकर गुजरती हैं | क्षोभ मण्डल में मौजूद जलवाष्प, ओजोन तथा अन्य किरणें अवरक्त विकिरण (Infrared radiation) कों अवशोषित कर लेती हैं |

क्षोभ मण्डल में छोटे निलम्बित कण दिखने वाले स्पेक्ट्रम कों अंतरिक्ष एवं पृथ्वी की सतह की ओर विकीर्ण कर देते हैं | यही प्रक्रिया आकाश में विभिन्न रंगों के लिए उत्तरदायी है |  इसी से उदय एवं अस्त होने के समय सूर्य लाल दिखाई देता है तथा आकाश का रंग नीला दिखाई पड़ता है | ऐसा वायुमंडल में प्रकाश के प्रकीर्णन द्वारा संभव होता है |

(vi) स्थल विन्यास

स्थल विन्यास के कारण भी सूर्यातप की मात्रा प्रभावित होती है | जैसे सूर्य के सामने वाले ढाल अधिक सूर्यातप प्राप्त करते है जबकि उसके विपरीत ढाल कम सूर्यातप प्राप्त करते है | इसी प्रकार हिम से ढके क्षेत्रों में सूर्यातप पहले ही परावर्तित हो जाता है जिससे इन क्षेत्रों कों कम सूर्यातप प्राप्त होता है जबकि दूसरी ओर मरुस्थलीय भागों में परावर्तन कम होने से अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है |

सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण

सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण कों निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            धरातल पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा में उष्ण कटिबंध में 320 वाट/ प्रति वर्ग मीटर से लेकर ध्रुवों पर 70 वाट/प्रति वर्ग मीटर तक भिन्नता पाई जाती है | 

   (ii)            सबसे अधिक सूर्यातप उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थलों से प्राप्त होता है, क्योंकि यहाँ मेघाच्छादन बहुत कम पाया जाता है |

 (iii)            उष्ण कटिबन्ध की अपेक्षा विषुवत वृत्त पर कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है |

  (iv)            सामान्यत: एक ही अक्षांश पर स्थित महाद्वीपीय भाग पर अधिक और महासागरीय भाग में अपेक्षतया कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है |

    (v)            शीत ऋतु में  मध्य एवं उच्च अक्षांशों पर ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा कम मात्रा में विकिरण प्राप्त होता है |

वायुमंडल का तापन और शीतलन की विधियाँ :

वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के अनेक विधियाँ है | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

प्रवेशी सौर विकिरण से वायुमंडल का गर्म होना

प्रवेशी सौर विकिरण लघु तरंगदैधर्य वाला होता है | जो पृथ्वी के वायुमंडल को प्रत्यक्ष रूप से गर्म करता है | लेकिन इस प्रक्रिया में पृथ्वी और उसका वायुमंडल अधिक गर्म ननहीं होता है |

चालन प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल का गर्म होना

पृथ्वी के सम्पर्क में आने वा;वाली वायु –धीरे –धीरे गर्म होती हैं | निचली परतों के सम्पर्क में आने वाली ऊपरी परतें भी गर्म हो जाती है | इस प्रक्रिया कों चालन (Conduction) कहा जाता है | चालन तभी होता है जब असमान ताप वाले दो पिंड एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं. और गर्म पिंड से ठंडे पिंड की ओर ऊर्जा का प्रवाह चलता है | ऊर्जा का स्थानांतरण तब तक होता रहता है जब तक कि दोनों पिंडों का  तापमान समान नहीं हो सकता अथवा, उनमें सम्पर्क टूट नहीं जाता | वायुमंडल की निचली परतों कों गर्म करने में चालन (Conduction) महत्वपूर्ण है |  

संवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल का गर्म होना

पृथ्वी के सम्पर्क में आई वायु गर्म होकर संवहन धाराओं के रूप में लम्बवतउठती है और वायुमंडल में  ताप का संचरण करती है | वायुमंडल के लम्बवत तापन की यह प्रक्रिया संवहन (Convection) कहलाती है | ऊर्जा के स्थानान्तरण की यह प्रक्रिया केवल क्षोभमंडल तक ही सीमित रहता है अर्थात संवहन प्रक्रिया द्वारा क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा तक ही वायुमंडल गर्म होता है |

अभिवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल का गर्म व ठंडा होना

वायु के क्षैतिज संचलन से होने वाला ताप का स्थानातरण अभिवहन (Advection) कहलाता है | लम्बवत संचलन की अपेक्षा वायु का क्षैतिज संचलन सापेक्षिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होता है | मध्य अक्षांशों में दैनिक मौसम में आने वाली भिन्नताएँ केवल अभिवहन के कारण होती हैं | उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में विशेषत रूप से उत्तरी भागों में गर्मियों में चलने वाली स्थानीय पवन लू इसी अभिवहन का ही परिणाम है |  इसी प्रकार साइबेरिया से आने वाली ठंडी पवनें जिस क्षेत्र में जाती हैं उस क्षेत्र कों ठंडा कर देती हैं |

पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमंडल का गर्म व ठंडा होना

पृथ्वी द्वारा प्राप्त प्रवेशी सौर विकिरण लघु तरंगों के रूप में होता है | यह पृथ्वी की सतह कों गर्म करता है | पृथ्वी स्वयं गर्म होने के बाद एक विकिरण पिंड बन जाती है  और वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगती है |  यह ऊर्जा वायुमंडल कों नीचे से गर्म करती है | इस प्रक्रिया कों पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमंडल का गर्म होना कहा जाता है |

पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगदैधर्य वाला होता है जो वायुमंडलीय गैसों, मुख्य रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है | इस प्रकार वायुमंडल पार्थिव विकिरण द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होता है न कि सीधे सूर्यातप से | उसके बाद वायुमंडल विकिरण प्रक्रिया द्वारा इस ताप कों अंतरिक्ष में संचारित कर देता है | जिससे पृथ्वी की सहत एवं वायुमंडल का तापमान स्थिर बना रहता है | 

पृथ्वी का उष्मा बजट

पृथ्वी ऊष्मा का  न तो संचय करती है और न ही ह्रास करती है  यह अपने तापमान कों स्थिर रखती है | ऐसा तभी सम्भव है, जब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्यातप के रूप में प्राप्त ऊष्माएवं पार्थिव विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में संचारित ऊष्मा (ताप) बराबर हो |

पृथ्वी के ऊष्मा बजट कों हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |

मान ले कि वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त सूर्यातप 100  प्रतिशत है | वायुमंडल से गुजरते हुए ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित, प्रकीर्णित एवं अवशोषित हो जाता है | केवल शेष भाग ही पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है | 100 इकाई में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है |  27 इकाइयाँ  बादलों के ऊपरी छोर से तथा  2 इकाइयाँ पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर लौट जाती है |  6 इकाइयाँ अंतरिक्ष में प्रकीर्णित हो जाती है |  सौर विकीररण की इस परावर्तित मात्रा कों पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं | पृथ्वी का एल्बिडो 35 इकाइयाँ है |

            प्रथम 35 इकाइयों कों छोड़कर बाकि 65 इकाइयाँ  अवशोषित हो जाती है | इन 65 इकाइयों में से  14 इकाइयाँ वायुमंडल के द्वारा और 51 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल के द्वारा अवशोषित कर ली जाती है |

पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाइयाँ पुन: पार्थिव विकिरण के रूप में वापस अंतरिक्ष में लौटा दी जाती हैं | जिनमें से 17 इकाइयाँ तो सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं | जिनमें से 6 इकाइयाँ स्वयं वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती हैं , 9 इकाइयाँ संवहन प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में पहुँचती है और 19 इकाइयाँ संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा वायुमंडल प्राप्त करता है |  वायुमंडल द्वारा कुल 48 इकाइयों का अवशोषण होता है | इनमें से 14 इकाइयाँ सूर्यातप से प्राप्त करता है और 34 इकाइयाँ पार्थिव विकिरण से प्राप्त करता है | वायुमंडल इन 48 इकाइयों कों भी अंतरिक्ष में वापस लौटा देता है |

अत: पृथ्वी के धरातल और वायुमंडल द्वारा अंतरिक्ष में वापस लौटने वाली विकिरण की इकाइयाँ क्रमश: 17 इकाइयाँ और  48 इकाइयाँ है जो कुल 65 इकाइयाँ होती है | वापस लौटने वाली ये 65  इकाइयाँ उन 65 इकाइयों का संतुलन कर देती हैं जो सूर्य से प्राप्त होती है | यही पृथ्वी का ऊष्मा बजट या ऊष्मा संतुलन है |

उपर दिए गए तथ्यों से स्पष्ट होता ही कि प्राप्त उष्मा के बराबर ऊष्मा कों वापस अंतरिक्ष में छोड़ देने से ऊष्मा का आदान –प्रदान का संतुलन रहता है | यही कारण है कि ऊष्मा के इतने बड़े स्थानांतरण के बावजूद भी पृथ्वी न तो बहुत गर्म होती है और न ही अधिक ठंडी होती है |    


पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्मा बजट में स्थानीय तौर पर भिन्नता

पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्मा बजट में स्थानीय तौर पर भिन्नता पाई जाती है | क्योंकि पृथ्वी की सतह पर प्राप्त विकिरण की मात्रा में बिन्नता पाई जाती है | पृथ्वी के कुछ भागों में विकिरण संतुलन में अधिशेष (Surplus) पाया जाता है परन्तु कुछ भागों में ऋणात्मक संतुलन होता है |

अक्षांशीय भिन्नता के कारण ही पृथ्वी के वायुमंडल तन्त्र की शुद्ध विकिरण में भिन्नता देखने कों मिलती है | अक्षांशीय भिन्नता के कारण 400 उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों में शुद्ध विकिरण में अधिशेष (Surplus)  अधिक होता है | जबकि ध्रुवों के पास शुद्ध विकिरण में कमी (Deficit) पाई जाती है |

उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों से ताप ऊर्जा ध्रुवों की ओर पुनर्वितरण होता है जिसके कारण उष्ण कटिबंध ताप संचयन के कारण अधिक गर्म नहीं हो पाते और न हीं उच्च अक्षांश अत्यधिक कमी के कारण पूरी तरह जमे हुए है |

तापमान की परिभाषा

वायुमंडल एवं भू-पृष्ठ के साथ सूर्यातप की अन्योन्यक्रिया द्वारा जनित ऊष्मा कों तापमान के रूप में मापा जाता है | जहाँ उष्मा किसी पदार्थ के कणों के अणुओं की गति दर्शाती है,वहीं तापमान किसी पदार्थ या स्थान के गर्म या ठंडा होने का माप है | इसे डिग्री सेल्सियस (C), या डिग्री फारेन्हाईट (0F) आदि में मापा जाता है |

तापमान के वितरण कों नियंत्रित करने वाले कारक

किसी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है |

(1) उस स्थान की अक्षांश रेखा (भूमध्य रेखा से दूरी),     (2) समुद्र तल से उस स्थान की ऊँचाई (उत्तुंगता),   (3) समुद्र तल से दूरी, (4) वायु सहंति (वायुराशि) का परिसंचरण,  (5) कोष्ण (उष्ण) तथा ठंडी महासागरीय धाराओं की उपस्थिति   तथा  (6) स्थानीय कारक |

इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

(1) उस स्थान की अक्षांश रेखा (भूमध्य रेखा से दूरी):

किसी स्थान का तापमान उस स्थान द्वारा प्राप्त सूर्यातप पर निर्भर करता है | यह स्पष्ट है कि सूर्यातप की मात्रा में अक्षांश के अनुसार भिन्नता पाई जाती है | अत: तदनुसार तापमान में भी भिन्नता पाई जाती है | यही कारण है कि भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए तापमान कम होने लगता है |

(2) समुद्र तल से उस स्थान की ऊँचाई (उत्तुंगता)

वायुमंडल पार्थिव विकिरण द्वारा नीचे की परतों में पहले गर्म होता है | यही कारण है कि धरातल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा ऊँचे भाग में स्थित पर तापमान कम होता है | अन्य शब्दों में सामान्यत: उत्तुंगता बढ़ने के साथ तापमान घटता है | उत्तुंगता बढ़ने के साथ तापमान के घटने की दर कों ‘सामान्य ह्रास दर (Normal Lapse Rate) कहते हैं | सामान्य ह्रास दर प्रति 165 मीटर बढ़ने पर 1o Cया 1000 मीटर की ऊँचाई बढ़ने पर 6.5oC  है |

समुद्र से दूरी

किसी भी स्थान के तापमान कों प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में से एक समुद्र से उस स्थान की दूरी है | स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे –धीरे गर्म और धीरे –धीरे ठंडा होता है |समुद्र की अपेक्षा स्थल जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है | इसलिए समुद्र के ऊपर स्थल की अपेक्षा तापमान में भिन्नता कम होती है | समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों पर समुद्र समीर एवं स्थलीय का सामान्य प्रभाव पड़ता है और तापमान सम बना रहता है | जबकि समुद्र से दूर स्थित क्षेत्रों में तापमान गर्मियों में अधिक व शीत ऋतु में कम होता है |

वायु राशियाँ

स्थलीय एवं समुद्री समीरों की तरह वायु संहतियाँ भी तापमान कों प्रभावित करती हैं | कोष्ण वायुराशियों (Warm airmasses)  से प्रभावित होने वाले स्थानों का तापमान अधिक एवं शीत वायुराशियों (Cold Airmasses) से प्रभावित स्थानों का तापमान कम होता है |

महासागरीय धाराएँ

जिस प्रकार वायुराशियाँ किसी स्थान के तापमान कों प्रभावित करती हैं | उसी तरह ठंडी महासागरीय धारा के प्रभाव में आने वाले तटों का तापमान कम होता है | जबकि गर्म महासागरीय धारा के प्रभाव में आने वाले तटों का तापमान अधिक होता है | 

तापमान का वितरण

मानचित्र पर तापमान वितरण सामान्यत: समताप रेखाओं की मदद से दर्शाया जाता है | समताप रेखा समताप रेखा वह रेखा है, जो मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों कों जोड़ती है | 

जनवरी और जुलाई के तापमान का वितरण  मानचित्रों की सहायता से हम पूरे विश्व के तापमान वितरण कों समझ सकते हैं |  

तापमान वितरण से सम्बन्धित कुछ तथ्य जानना आवश्यक है जो निम्नलिखित है |

     (i)            सामान्यत: तापमान पर अक्षांश के प्रभाव कों मानचित्र में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | क्योंकि समताप रेखाएँ प्राय: अक्षांश के समानांतर होती है | इस सामान्य प्रवृति में विचलन, विशेष रूप से उत्तरी गोलार्द्ध में जुलाई की अपेक्षा जनवरी में अधिक स्पष्ट होता है अर्थात समताप रेखाएँ जनवरी में अक्षांश रेखाओं के समानांतर न होकर उत्तर या दक्षिण में विचलित हो जाती है |

   (ii)            दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलीय भाग अधिक है | इसलिए भू –संहति और समुद्री धारा का प्रभाव वहाँ स्पष्ट होता है |

जनवरी में तापमान का विश्वव्यापी वितरण

जनवरी में तापमान का विश्वव्यापी वितरण  कों हम निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            जनवरी में समताप रेखाएँ महासागर के उत्तर और महाद्वीपों पर दक्षिण की ओर विचलित हो जाती है | इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर पर देखा जा सकता है |

   (ii)            कोष्ण महासागरीय धाराएँ गल्फ स्ट्रीम तथा उत्तरी अटलांटिक महासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अटलांटिक महासागर अधिक गर्म होता है तथा  समताप रेखाएँ उत्तर की तरफ मुड़ जाती है | 

 (iii)            सतह के ऊपर तापमान तेजी से कम हो जाता है और समताप रेखाएँ यूरोप में दक्षिण की ओर मुड़ जाती हैं | यह साइबेरिया के मैदान पर ज्यादा स्पष्ट होता है | 60o पूर्वी देशान्तर के साथ –साथ  80o उत्तरी एवं 50o उत्तरी दोनों ही अक्षांशों पर जनवरी का माध्य तापमान -200 सेल्सियस पाया जाता है |

  (iv)            इसी प्रकार जनवरी का माध्य मासिक तापमान विषुवत रेखीय महासागरों पर 27o  सेल्सियस से अधिक, उष्ण कटिबंधों में 24o सेल्सियस से अधिक , मध्य अक्षांशों पर 200 सेल्सियस से 00 सेल्सियस तक तथा यूरेशिया के आंतरिक भागों में -180 सेल्सियस से 480 सेल्सियस तक दर्ज होता है |

    (v)            दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान पर महासागरों का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है | यहाँ समताप रेखाएँ लगभग अक्षांशों के समानांतर चलती हैं  तथा उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा भिन्नता कम तीव्र होती है |

  (vi)            दक्षिणी गोलार्द्ध में  200 सेल्सियस की समताप रेखाएँ  350  दक्षिणी अक्षांश, 100 सेल्सियस की समताप रेखाएँ 450  दक्षिणी अक्षांश तथा  00 सेल्सियस की समताप रेखाएँ  की 600  दक्षिणी अक्षांश के समानांतर पाई जाती है |

जुलाई में तापमान का विश्वव्यापी वितरण

जुलाई  में तापमान का विश्वव्यापी वितरण  कों हम निम्नलिखित तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            जुलाई में समताप रेखाएँ प्राय: अक्षांशों के समानांतर चलती हैं |

   (ii)            विषुवत रेखीय महासागरों पर तापमान 27o  सेल्सियस  से अधिक होता है |

 (iii)            एशिया के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के स्थलीय भागों में 30o उत्तरी अक्षांशों के साथ –साथ तापमान 30o सेल्सियस से अधिक पाया जाता है |

  (iv)            40o उत्तरी एवं 40o दक्षिणी अक्षांशों पर तापमान 10o  सेल्सियस दर्ज किया जाता है  |

जनवरी एवं जुलाई के बीच तापान्तर  के  विश्व व्यापी तथ्य 

     (i)            सर्वाधिक तापान्तर यूरेशिया के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में पाया जाता है | जो लगभग 60o  सेल्सियस है | इसका मुख्य कारण महाद्वीपीयता’ (Continentality)  है |

   (ii)            सबसे कम तापान्तर 3o  सेल्सियस  का है जो 20o दक्षिणी अक्षांशों से  15o उत्तरी अक्षांशों के बीच पाया जाता है | 



 

तापमान का व्युत्क्रमण (Inversion of Temperature)

सामान्यत: तापमान ऊँचाई के साथ साथ घटता जाता है | जिसे तापमान की सामान्य ह्रास दर कहते है | परन्तु कई बार स्थिति बदल जाती है  और सामान्य ह्रास दर की स्थिति उलट जाती है | जब किसी स्थान के भू पृष्ठ  से कुछ ऊँचाई की वायु का तापमान अधिक हो जाता है और भू पृष्ठ के पास की वायु का तापमान कम हो जाता है | इस स्थिति कों तापमान का व्युतक्रमण कहते है | अक्सर व्युत्क्रमण बहुत थोड़े समय के लिए होता है , परन्तु यह सामान्य घटना है | 

सर्दियों की मेघ विहीन रात तथा शांत वायु व्युत्क्रमण के लिए आदर्श दशाएँ हैं |  दिन में प्राप्त ऊष्मा रात के समय विकिरित कर दी जाती है और सुबह तक भू –पृष्ठ अपने ऊपर की हवा से अधिक ठंडी हो जाती है |

 

ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान व्युत्क्रमण

हिम क्षेत्रों कि अधिकता के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों में वर्ष भर तापमान व्युत्क्रमण एक सामान्य घटना है |  यहाँ सतह के पास की वायु का तापमान कम होता है जबकि उसके ऊपर की वायु गर्म होती है |

 

भू पृष्ठीय व्युत्क्रमण

भू पृष्ठीय व्युत्क्रमण वायुमंडल के निचले स्तर में स्थिरता कों बढ़ावा देता है |  धुआँ तथा धूलकण व्युत्क्रमण स्तर से नीचे एकत्र होकर चारों ओर फैल जाते हैं | जिनसे वायुमंडल का निम्न स्तर भर जाता है | इससे सर्दियों में सुबह के समय घने कुहरे की रचना सामान्य घटना है | यह व्युत्क्रमण कुछ ही घंटों तक रहता है | सूर्य के ऊपर चढ़ने और पृथ्वी के गर्म होने के साथ यह समाप्त हो जाता है |

 

पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान का व्युत्क्रमण

पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में वायु अपवाह के कारण व्युत्क्रमण की उत्पत्ति होती है | पहाड़ियों तथा पर्वतों पर रात में ठंडी हुई हवा गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में भारी और धनी होने के कारण लगभग जल की तरह कार्य करती है  और ढाल के साथ ऊपर से नीचे उतरती है | यह घाटी की तली में गर्म हवा के नीचे एकत्र हो जाती है | इसे वायु अपवाह कहते है | यह पाले से पौधे की रक्षा करती है | 

 

प्लैंक का नियम

प्लैंक का नियम बताता है कि एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उत्तनी ही अधिक ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंगदैधर्य उतनी ही लघु होगी |

 

विशिष्ट ऊष्मा

एक ग्राम पदार्थ का तापमान एक अंश  बढ़ाने के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है वह विशिष्ट ऊष्मा कहलाती है |

Thursday, July 23, 2026

LESSON 1 GEOGRAPHY AS A DISCIPLINE (CLASS 11TH )

 

कक्षा -11वीं

भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय 1 भूगोल एक विषय के रूप में

भूगोल का अर्थ

भूगोल कों अंग्रेजी भाषा में ज्योग्राफी (Geography) कहा जाता है | जो दो शब्दों Geo + graphy से मिलकर बना है | यह ग्रीक भाषा के शब्द “Geographos” का रूपान्तरण है | जिसमें “Geo” का अर्थ है पृथ्वी और “Graphos” का अर्थ है वर्णन | अत: Geography का अर्थ है पृथ्वी का वर्णन | इस प्रकार भूगोल के विद्वान भूगोल कों मानव निवास के रूप में पृथ्वी का अध्ययन मानते है |

ज्योग्राफी (Geography) शब्द का सबसे पहले प्रयोग ग्रीक विद्वान इरेटोस्थेनीज ने किया था |

भूगोल की परिभाषा

भूगोल का अध्ययन एक विस्तृत अध्ययन है | इसे कुछ शब्दों के द्वारा और सीमाओं में रखकर परिभाषित नहीं किया जा सकता | फिर भी भूगोल के विभिन्न विद्वानों ने भूगोल कों अनेक प्रकार से परिभाषित किया है | उनमें से कुछ की परिभाषाएँ निम्नलिखित है |

अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि एक विषय के रूप में भूगोल मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है |  यह पृत्वी पर पायी जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन भी करता है |  साथ ही वह उन कारकों का भी अध्ययन करता है जिनके प्रभाव से मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों में  ये भिन्नताएँ  पायी जाती है |

स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत किस प्रकार की  जानकारी प्राप्त होती है

            स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत तीन मुख्य कारकों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ये निम्नलिखित है |

1.       भौतिक पर्यावरण

2.       मानवीय क्रियाएँ

3.       भौतिक पर्यावरण और मानवीय क्रियाओं के बीच अंतरप्रक्रियात्मक सम्बन्ध  

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल क्यों पढ़ना चहिये ?

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल निम्नलिखित कारणों से पढ़ना चाहिए |

1.       पृथ्वी हमारा घर है | अत: पृथ्वी के विभिन्न घटकों, उसके पर्यावरण और उसके विभिन्न संसाधनों के कारण हमारा जीवन प्रभावित होता है | इन घटकों, हमारे आसपास के पर्यावरण और हमारे लिए उपयोगी संसाधनों का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

2.       विभिन्न संसाधनों  जैसे भूमि, जल, खनिज, मृदा आदि का उपयोग करते हुए हम भोजन प्राप्त करतें है और विभिन्न क्रियाकलाप करते हुए जीवन यापन करते है |  विभिन्न क्षेत्रों में कौन –कौन से संसाधन है और कितनी मात्रा में है उनके क्या उपयोग है इन सभी का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

3.       हम विभिन्न प्रकार  की जलवायु में रहते है और इसी तरह विभिन्न मौसम हमारे जीवन कों प्रभावित करते है | जलवायु और मौसम के तत्वों, उनको प्रभावित करने वाले कारकों  का अध्ययन हम भूगोल के अध्ययन के रूप में करते है और जलवायु और मौसम के मानव जीवन के प्रभावों और उसके कारण उत्त्पन्न भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत ही करते है अत: हमें भूगोल पढ़ना चाहिए |

4.       मानव द्वारा किए जाने वाले  विभिन्न क्रियाकलाप और उनके पर्यावरण पर प्रभावों का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत करते है इसलिए भी भूगोल का अध्ययन जरुरी है |

5.       विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं के कारण, प्रभाव और उनका क्षेत्रीय अध्ययन हम भूगोल में मुख्य रूप से करते है | साथ ही उनसे निपटने के उपायों का भी अध्ययन इस विषय में प्रमुखता से किया जाता है |

6.       भूगोल विविधता कों समझने और ऐसी विविधताओं कों उत्त्पन्न करने वाले कारकों का अध्ययन करता है  अत: इसका अध्ययन आवश्यक है |

7.        समय और स्थान के साथ होने वाले परिवर्तनों का  अध्ययन भूगोल के अंतर्गत किया जाता है | जिससे इन्हें समझने में आसानी होती है |

8.       भूगोल के द्वारा हम मानचित्र में परिवर्तित ग्लोब कों समझने में सहायता मिलती है |

9.       इस विषय के अध्यन्न से मानचित्र में दिए गए दृश्य कों समझने की क्षमता विकसित होती है |

10.   भूगोल में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों जैसे भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS), कंप्यूटर आधारित मानचित्र कला आदि में आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है जिससे आप राष्ट्रीय स्तर पर अपना योगदान दे सकते है |

भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है          या        

भूगोल बहु-आयामी पृथ्वी का अध्ययन

भूगोल वास्तविकता या यथार्थता का अध्ययन करता है | पृथ्वी की वास्तविकता भी बहु-आयामी है | क्योंकि हम पृथ्वी के विभिन्न भौतिक पक्षों जैसे भौमिकी, मृदा, जलवायु, समुद्रों और वनों के साथ-साथ मानवीय पक्षों जैसे जनसँख्या संबंधी विशेषताएँ जैसे घनत्व, लिंग अनुपात, आर्थिक क्रियाकलाप आदि का अध्ययन करते है जो बहु आयामी हो जाता है | अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्र विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी की वास्तविक और बहु-आयामी प्रकृति का अध्यन्न भूगोल का मुख्य कार्य है इसलिए ही भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है |

भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन  

भूगोल पृथ्वी का अध्ययन है | भू-तल पर बहुत भिन्नताएँ देखने कों मिलती है | ये भिन्नताएँ प्राकृतिक और सांस्कृतिक वातावरण से सम्बन्धित होती है |  अनेक तत्वों में समानताओं के साथ-साथ असमानताएँ भी होती है इन्ही असमानताओं कों क्षेत्रीय विभिन्नता का नाम दिया जाता है |  इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल में करते है | अत: भूगोल कों भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन भी कहते है | क्षेत्रीय विभिन्न्ताओं का अध्ययन करना भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इस प्रकार भूगोल उन सभी तथ्यों का अध्ययन करता है जो क्षेत्रीय संदर्भ में भिन्नता लिए हुए है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए  रिचार्ड हार्टशोर्न  महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

 रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

            भूगोल में हम केवल धरातल में विभिन्नता का अध्ययन नहीं करते बल्कि उन कारकों का भी अध्ययन करते है जो इन विभिन्नताओं के कारण है | उदाहरण के लिए फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन्न होता है  किन्तु यह भिन्नता मिट्टी, जलवायु, बाज़ार कि माँग, किसानों की व्यय क्षमता और तकनीकी निवेश कि उपलब्धता  आदि में भिन्नता से प्रभावित होती है | अत: भूगोल किन्ही दो तत्वों के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध भी ज्ञात करता है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए अल्फेर्ड हेटनर महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

  अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

भूगोल एक गत्यात्मक अध्ययन       या   

भूगोल एक परिवर्तनशील अध्ययन

भूगोल में हम भौतिक और मानवीय तथ्यों का अध्ययन करते है |  भौतिक और मानवीय  दोनों ही प्रकार के तथ्य स्थैतिक नहीं है बल्कि गत्यात्मक है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी और अथक एवं निरंतर प्रयत्नशील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है |  परिवर्तनशील अथवा गत्यात्मक तथ्यों का अध्ययन भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इसी कारण ही भूगोल गत्यात्मक या परिवर्तनशील अध्ययन कहलाता है |

भूगोल एक समाकलनात्म्क और संश्लेषित विज्ञान       या 

भूगोल समाकलन और संश्लेषण का अध्ययन

 प्राकृतिक और सामाजिक  दोनों ही प्रकार के विज्ञानों का मूल उद्देश्य  वास्तविकता (यथार्थता) कों ज्ञात करना | इसलिए प्रत्येक विज्ञान सभी अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध स्थापित करता हुआ  वास्तविकता (यथार्थता) कों प्राप्त करना चाहता है | भूगोल भी अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्र विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी तल पर चल रही प्रत्येक घटना की वास्तविकता कों जानता है |  इनके सहयोग से भौगोलिक अध्ययन सरल हो जाता है | विभिन्न विज्ञानों के साथ मिलकर अध्ययन करने कों ही समाकलन कहते है अत: स्पष्ट है कि भूगोल एक समाकलनात्म्क विज्ञान है |

भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध स्थापित है | इन विज्ञानों के विभिन्न घटकों से प्राप्त ज्ञान कों संश्लेषित करके भूगोल में इनका अध्ययन होता है इसलिए ही भूगोल कों संश्लेषित विज्ञान कहा जाता है |

भूगोल प्रकृति तथा मानव के बीच अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन

भौगोलिक तथा मानवीय दोनों ही प्रकार के कारक स्थैतिक (स्थाई) ना होकर हमेशा गतिशील (गत्यात्मक) रहते है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी अथक एवं निरंतर प्रयत्न शील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है | आदिमानव समाज अपने पर्यावरण पर ही निर्भर रहता था और उसी के अनुसार व्यवहार करता था | समय के साथ-साथ तकनीक उपलब्ध होने पर अब ऐसा नहीं है वह अपने अनुसार वातावरण कों ढालने लगा है | इस तरह आदिम समाज से लेकर वर्तमान तक प्रकृति और मानव के बीच के विभिन्न अंत: प्रक्रियाएं होती रही | इन अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन  हम भूगोल में करते है इसलिए भूगोल कों अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन कहा जाता है |

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है | ये निम्नलिखित है |

1.       क्या- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के प्रतिरूप की पहचान से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  ये क्या है ? अत: ये प्रश्न “क्या” से सम्बन्धित होते  है |

2.       कहाँ- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के वितरण  से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  कोई वस्तु या तत्व कहाँ पर स्थित है ? अत: ये प्रश्न “कहाँ ” से सम्बन्धित होते  है |

3.       क्यों- तीसरे प्रकार के प्रश्न व्याख्या से सम्बन्धित होते है जो तत्वों और तथ्यों के किसी स्थान पर होने या ना होने के कारण से जुड़े होते है | ये  तत्वों और तथ्यों के बीच कार्य –कारण सम्बन्ध से जुड़े होते है | जिसका मतलब है कोई वस्तु या तत्व किसी स्थान पर “क्यों” है? अत: ये प्रश्न “क्यों ” से सम्बन्धित होते  है |

भूगोल के उपागम (क्रमबद्ध और प्रादेशिक उपागम में अन्तर)

भूगोल का अध्ययन एक अंतर्शिक्षण (Interdisciplinary) विषय है | प्रत्येक विषय का अध्ययन कुछ विशेष उपागमों के अनुसार किया जाता है | इस दृष्टि से भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम हैं | (1) विषय वस्तुगत (क्रमबद्ध) उपागम तथा (2) प्रादेशिक उपागम |

क्रमबद्ध उपागम (क्रमबद्ध भूगोल)

     (i)            भूगोल के क्रमबद्ध उपागम कों जर्मनी के प्रसिद्ध भूगोलवेता अलक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के द्वारा प्रवर्तित किया गया |

   (ii)            विषय वस्तुगत भूगोल या  सामान्य भूगोल का उपागम,  क्रमबद्ध उपागम ही हैं |

 (iii)            इस उपागम में एक तथ्य का पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है | उसके बाद क्षेत्रीय स्वरूप के वर्गीकृत प्रकारों की पहचान की जाती है |

  (iv)            उदाहरण के लिए यदि कोई प्राकृतिक वनस्पति के अध्ययन में रूचि रखता है, तो सर्वप्रथम विश्व स्तर पर उसका अध्ययन किया जाएगा, फिर वनस्पति के प्रकारों के आधार पर वर्गीकरण जैसे विषुवतरेखीय सदाबाहर वन, नरम लकड़ी वाले कोणधारी वन अथवा मानसूनी वन इत्यादि की पहचान, उनका विवेचन तथा सीमांकन करना होगा |

प्रादेशिक उपागम (प्रादेशिक भूगोल)

     (i)            प्रादेशिक भूगोल का विकास हम्बोल्ट के समकालीन जर्मन भूगोलवेत्ता कार्ल रिटर द्वारा किया गया |

   (ii)            प्रादेशिक उपागम में विश्व कों विभिन्न पदानुक्रमित स्तर के प्रदेशों में विभक्त किया जाता है और फिर एक विशेष प्रदेश में सभी भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है |

 (iii)            ये प्रदेश प्राकृतिक, राजनीतिक या निर्दिष्ट (नामित) प्रदेश हो सकते हैं | एक प्रदेश में तथ्यों का अध्ययन समग्रता से विविधता में एकता की खोज करते हुए किया जाता है |

विषय वस्तुगत या क्रमबद्ध उपागम के आधार पर भूगोल की शाखाएँ  

 क्रमबद्ध उपागम के आधार पर भूगोल की दो प्रमुख शाखाएँ हैं | भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल |

 (1) भौतिक भूगोल :

भूगोल की इस प्रमुख शाखा में निम्नलिखित उपशाखाएँ शामिल की जाती हैं | भू –आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान,  जल विज्ञान  तथा मृदा भूगोल | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न लिखित है |

 भू –आकृति विज्ञान:  

यह भू-आकृतियों, उनके क्रम विकास एवं संबंधित प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है |

 जलवायु विज्ञान:

इसके अंतर्गत वायुमंडल  की संरचना, मौसम तथा जलवायु के तत्व, जलवायु के प्रकार तथा जलवायु प्रदेश का अध्ययन किया जाता है |

जल विज्ञान:

यह धरातल के जल परिमंडल जिसमें समुद्र, नदी , झील तथा अन्य जलाशय सम्मिलित हैं तथा उसका मानव सहित विभिन्न प्रकार के जीवों एवं उनके कार्यों पर प्रभाव का अध्ययन है |

मृदा भूगोल:

यह मिट्टी के निर्माण की प्रक्रियाओं, मिट्टी के प्रकार, उनका उत्पादकता स्तर, वितरण एवं उपयोग आदि के अध्ययन से सम्बन्धित है | 

मानव भूगोल

यह भूगोल की दूसरी प्रमुख शाखा है इसके  अंतर्गत निम्नलिखित उपशाखाओं का अध्ययन किया जाता है | सामजिक /सांस्कृतिक भूगोल, जनसंख्या एवं अधिवास भूगोल, आर्थिक भूगोल. ऐतिहासिक भूगोल  राजनीतिक भूगोल आदि | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

सामाजिक /सांस्कृतिक भूगोल :

इसके अंतर्गत समाज तथा इसकी स्थानिक /प्रादेशिक गत्यात्मकता एवं समाज के योगदान से निर्मित सांस्कृतिक सांस्कृतिक तत्वों का अध्ययन किया जाता है |

जनसंख्या भूगोल :

यह ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि उसका वितरण, घनत्व, लिंग –अनुपात, प्रवास एवं व्यवसायिक संरचना आदि का अध्ययन करता है |

अधिवास भूगोल

अधिवास भूगोल में ग्रामीण तथा नगरीय अधिवासों के वितरण प्रारूप तथा अन्य विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है |

आर्थिक भूगोल:

यह मानव की आर्थिक क्रियाओं, जैसे –कृषि, उद्योग, पर्यटन, व्यापार एवं परिवहन, अवस्थापना तत्व एवं सेवाओं का अध्ययन है |

ऐतिहासिक भूगोल:

ऐतिहासिक भूगोल उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है जो क्षेत्र कों संगठित करती हैं | प्रत्येक प्रदेश वर्तमान स्थिति में आने से पूर्व ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरता है | भौगोलिक तत्वों में भी सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं और इसी की व्याख्या ऐतिहासिक भूगोल का उद्देश्य है |  

राजनीति भूगोल:

राजनीति भूगोल क्षेत्र कों राजनीतिक घटनाओं की दृष्टि से देखता है | यह सीमाओं, निकटस्थ पड़ोसी इकाइयों के मध्य भू –वैन्यासिक संबंध, निर्वाचन क्षेत्र का परिसीमन एवं चुनाव परिदृश्य का विश्लेषण करता है | साथ ही जनसंख्या के राजनीतिक व्यवहार कों समझने के लिए सैद्धांतिक रूप रेखा विकसित करता है |

जीव भूगोल :

भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल के अन्तरापृष्ठ (Interface) के फलस्वरूप जीव –भूगोल का अभ्युदय हुआ | इसके अंतर्गत निम्नलिखित शाखाएँ आती हैं | जीव भूगोल, वनस्पति भूगोल, पारिस्थैतिक विज्ञान तथा पर्यावरण भूगोल | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

जीव भूगोल:

भूगोल की इस शाखा में पशुओं एवं उनके निवास क्षेत्र के स्थानिक स्वरूप एवं भौगोलिक विशेषताओं का अध्ययन होता है |

वनस्पति भूगोल :

यह शाखा प्राकृतिक वनस्पति का उसके निवास क्षेत्र (Habitat) में स्थानिक प्रारूप का अध्ययन करती है |

पारिस्थैतिक विज्ञान:

जीव भूगोल की इस शाखा में प्रजातियों (Species) के निवास/स्थिति क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है |

पर्यावरण भूगोल:

सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण प्रतिबोधन के फलस्वरूप पर्यावरणीय समस्याओं, जैसे भूमि ह्रास (भूमि निम्नीकरण), प्रदूषण, संरक्षण की चिंता आदि का अनुभव किया गया | जिसके अध्ययन के लिए भूगोल की इस शाखा का विकास हुआ |  

 

प्रादेशिक उपागम पर आधारित भूगोल की शाखाएँ

प्रादेशिक अध्ययन पर आधारित भूगोल की निम्नलिखित शाखाएँ हैं |

     (i)            बृहद, मध्यम, लघु स्तरीय प्रादेशिक/क्षेत्रीय अध्ययन

   (ii)            ग्रामीण/इलाका नियोजन तथा शहर एवं नगर नियोजन सहित प्रादेशिक नियोजन |

 (iii)            प्रादेशिक विकास

  (iv)            प्रादेशिक विवेचना /विश्लेषण

 क्रमबद्ध और  प्रादेशिक उपागमों के अतिरिक्त दो उभयनिष्ठ पक्ष

क्रमबद्ध और  प्रादेशिक उपागमों के अतिरिक्त दो पक्ष ऐसे हैं जो सभी विषयों के लिए उभयनिष्ठ हैं |ये दो विषय हैं दर्शन तथा विधितंत्र एवं तकनीक

दर्शन :

दर्शन के अंतर्गत (i) भौगोलिक चिंतन और (ii)भूमि एवं मानव अंतर्प्रक्रिया/ मानव पारिस्थिकी शामिल किए जाते हैं |

विधितंत्र एवं तकनीक:

इनके  अंतर्गत निम्नलिखित शामिल है |

     (i)            सामान्य एवं संगणक आधारित मानचित्रण ,

   (ii)            परिमाणात्मक एवं सांख्यिकी

 (iii)            क्षेत्र सर्वेक्षण विधियाँ

  (iv)            भू –सूचना विज्ञान तकनीक (Geoinformatics) जैसे –दूर संवेदन तकनीक (Remote Sensing Technology), भौगोलिक सूचना तंत्र (Geographical Information System –G.I.S.), वैश्विक स्थितीय तंत्र (Global Positioning System-G.P.S.) |