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Saturday, September 7, 2024

COMPOSITION AND STRUCTURE OF ATMOSPHERE


 

प्रश्न  1                    वायुमंडल किसे कहते हैं ?

उत्तर :           वायुमंडल विभिन्न गैसों का मिश्रण है जो पृथ्वी को चारों ओर से ढके हुए है |

प्रश्न  2                    वायुमंडल के द्रव्यमान का 99 प्रतिशत भाग कितने किलोमीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है ?

उत्तर :           32 किलोमीटर

प्रश्न  3                    ऑक्सीजन गैस वायुमंडल में कितनी ऊँचाई तक पाई जाती है ?

उत्तर :           120 किलोमीटर

प्रश्न  4                    जलवाष्प वायुमंडल में कितनी ऊँचाई तक पाई जाती है ?

उत्तर :           90 किलोमीटर

प्रश्न  5                    कार्बन  डाई ऑक्साइड गैस वायुमंडल में कितनी ऊँचाई तक पाई जाती है ?

उत्तर :           90 किलोमीटर

प्रश्न  6                    ओज़ोन गैस वायुमंडल में कहाँ पाई जाती है ?

उत्तर :           ओज़ोन गैस वायुमंडल में समतापम मंडल में पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर के बीच पाई जाती है |

प्रश्न  7                    ओज़ोन गैस पर संक्षिप्त नोट लिखों |

उत्तर :           ओज़ोन गैस वायुमंडल में समतापम मंडल में पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर के बीच पाई जाती है | यह वायुमंडल का महत्वपूर्ण घटक है | इस गैस कि परत एक फिल्टर की तरह कार्य करती है | यह सूर्य से निकलने वाली पैराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है और उनको पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देती | जिससे पृथ्वी का तापमान अधिक नहीं हो पाता | ये पैराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभावों से मानव तथा जीवों को बचाती है |

प्रश्न  8                    वायुमंडल के संघटन की व्याख्या करें |

अथवा

वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न गैसों, जलवाष्प तथा धूलकणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए |

 

उत्तर :           वायुमंडल विभिन्न गैसों का मिश्रण है जो पृथ्वी को चारों ओर से ढके हुए है | इसके संघटन में विभिन्न प्रकार की गैसें, जैसे नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन, कार्बन डाई ऑक्साइड, ओजोन, हीलियम, हाइड्रोजन, निओन, फ़्रीओन,  क्रेप्टो, जेनन आदि शमिल हैं |  इनके अलावा वायुमंडल में जलवाष्प तथा धूलकण भी पायें जाते हैं |  जिनकी संक्षिप्त व्याख्या निम्नलिखित है |

  1.  नाइट्रोजन गैस  : इस गैस की मात्रा वायुमंडल में सबसे अधिक पाई जाती है | जो कि वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का 78.8 प्रतिशत है | यह गैसे आसानी से अन्य तत्वों के साथ रासायनिक अभिक्रिया नहीं करती | यह मृदा में स्थिर हो जाती है | इस गैस का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह वस्तुओं को तेजी से जलने से बचाती है | नाइट्रोजन पेड़ –पौधों में प्रोटीन का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | नाइट्रोजन गैस के कारण ही वायुदाब, पवनों की शक्ति तथा प्रकाश के परावर्तन का पता चलता है |
  2.  ऑक्सीजन गैस : यह गैस जीवन दायनी गैस है | क्योंकि इसके बिना हम साँस नहीं ले सकते | ऑक्सीजन वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का 20.95 भाग है | यह गैस वायुमंडल की निचली परतों में पाई जाती है | वायुमंडल में 120 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद ऑक्सीजन गैस की मात्रा नगण्य हो जाती है | यह गैस ईंधन को जलाने के लिए आवश्यक है |  
  3.   आर्गन गैस  :     यह वायुमंडल में तीसरी सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस है | जो वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का 0.93 प्रतिशत है |
  4.  कार्बन डाई ऑक्साइड गैस:  यह गैस वायुमंडल में केवल यह गैस वायुमंडल वायुमंडल के कुल आयतन का केवल 0.036 भाग ही है | जो वायुमंडल में 90 किलोमीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है | यह एक भारी गैस है और वायुमंडल की निचली परतों में पाई जाती है | इसका अधिकांश भाग पृथ्वी कि सतह के निकट ही होता है | कम मात्रा के होने के बावजूद भी यह एक महत्वपूर्ण गैस है | क्योंकि पेड़-पौधों के लिए प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए अनिवार्य गैस है | इसके अलावा यह लघु तरंगदैधर्य वाली सौर विकिरण के लिए पारगम्य है लेकिन दीर्घ तरंगदैधर्य वाली पार्थिव विकिरण के लिए अपारगम्य है | अत: यह गैस ग्रीन हाउस प्रभाव (हरित गृह प्रभाव) के लिए उत्तरदायी है | और वायुमंडल की निचली परतों को गर्म रखती है | जैव ईंधन के अधिक जलाए जाने के कारण इस गैस की मात्रा तेजी से बढ़ रही है |
  5. ओजोन गैस : ओज़ोन गैस वायुमंडल में समतापम मंडल में पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर के बीच पाई जाती है | यह वायुमंडल का महत्वपूर्ण घटक है | इस गैस कि परत एक फिल्टर की तरह कार्य करती है | यह सूर्य से निकलने वाली पैराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है और उनको पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देती | जिससे पृथ्वी का तापमान अधिक नहीं हो पाता | ये पैराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभावों से मानव तथा जीवों को बचाती है |
  6. हाइड्रोजन  गैस : यह वायुमंडल में पाई जाने वाली सबसे हल्की गैसों में से एक है | जो वायुमंडल की ऊपरी परतों में पाई जाती है | यह वायुमंडल में बहुत ही कम मात्रा में विद्यमान है | यह बहुत ही ज्वलनशील गैस है |
  7.  हीलियम गैस : यह वायुमंडल में पाई जाने वाली सबसे हल्की गैसों में से एक है | जो वायुमंडल की ऊपरी परतों में पाई जाती है |
  8. अन्य गैसें : उपरोक्त गैसों के अलावा निओन, फ़्रीओन,  क्रेप्टो, तथा जेनन जैसी अन्य गैसें भी वायुमंडल में उपस्थित है|
  9.  जलवाष्प : जलवाष्प वायुमंडल में उपस्थित एक परिवर्तनीय तत्व है | जो ऊँचाई के साथ –साथ घटती है | वायुमंडल में अधिकतम वायुमंडल में अधिकतम यह वायु के द्रव्यमान का 4 प्रतिशत तक होती है | ठंडे ध्रुवीय क्षेत्रो में तथा गर्म रेगिस्तानों जैसे शुष्क प्रदेशों में यह बहुत कम होती है जबकि आर्द्र और उष्ण प्रदेशों में यह अधिक होती है | विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर जाने पर जलवाष्प की मात्रा में कमी आने लगती है |यह सूर्य से आने वाले ताप के कुछ भाग को अवशोषित करती है तथा पृथ्वी से उत्पन्न ताप को संग्रहित करती है | यह पृथ्वी के वायुमंडल को न टो अधिक गर्म होने देती और न ही अधिक ठंडा इस प्रकार यह पृथ्वी के लिए कम्बल का काम करती है | 
  10.  धूलकण : विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त वायुमंडल में उपस्थित छोटे –छोटे कण जैसे समुद्री नमक, महीन मिट्टी, धुएँ की कालिमा, राख, पराग, उल्काओं के टूटे हुए कण आदि को सम्मलित रूप से धूलकण कहा जाता है | धूलकण  प्राय: वायुमंडल के निचले भाग में ही मौजूद होते है | लेकिन कभी कभार संवहनीय धाराओं के द्वारा ये वायुमंडल में काफी ऊँचाई तक पहुँच जाते है | धूलकण आर्द्र्ताग्राही केन्द्र की तरह काम करते हैं इनके चारों ओर जलवाष्प की बूंदे संघनित हो जाती है और मेघों (बादलों) का निर्माण करती है | आकाश का नीला रंग भी धूलकणों के कारण ही दिखाई देता है | सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी तथा लाल रंग का दिखना इन्हीं के कारण होता है |

Monday, August 8, 2022

Distribution of Continents and Oceans Lesson 4 class 11th Geography

अध्याय 4

महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

(भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत )  कक्षा -11

 

प्रश्न : निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की सम्भावना व्यक्त की ?

उत्तर : अब्राहम ऑरटेलियस (Abraham Ortelius)

प्रश्न : पोलर फ्लीइंग बल (ध्रुवीय फ्लीइंग बल) निम्नलिखित में से किससे संबंधित है ?

क.     पृथ्वी का परिक्रमण

ख.     पृथ्वी का घूर्णन

ग.      गुरुत्वाकर्षण

घ.      ज्वारीय बल

 

 

उत्तर : पृथ्वी का घूर्णन

इनमें से कौन सी लघु प्लेट नहीं है ?

   क).            नजका

  ख).            फिलिपिन

    ग).            अरब

   घ).            अंटार्कटिक

उतर : अंटार्कटिक

प्रश्न :  सागरीय अधस्थल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हैस ने निम्न में से किस अवधारणा पर विचार नहीं किया ?

   क).            मध्य महासागरीय कटकों  के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ  |

  ख).            महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना | 

    ग).            विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण |

   घ).            महासागरीय तल की चट्टानों की आयु |

उतर : विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण |

प्रश्न : हिमालय पर्वतों के साथ  भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है ?

   क).            महासागरीय - महाद्वीपीय अभिसरण

  ख).            अपसारी सीमा

    ग).            रूपान्तरण सीमा

   घ).            महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभिसरण

उतर : महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभिसरण

प्रश्न : महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख किया है ?

उतर :  महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने जिन  बलों का उल्लेख किया है  वे निम्नलिखित है |

   क).            पोलर फ्लीइंग बल (ध्रुवीय फ्लीइंग बल)   

यह बल पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित है |  पृथ्वी भूमध्य रेखा पर उभरी हुई है जो ध्रुवीय फ्लीइंग बल के कारण ही है |

  ख).            ज्वारीय बल 

यह बल सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से संबंधित है | जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते है |

प्रश्न : मेंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने तथा बने रहने के क्या कारण है ?

उतर :  पृथ्वी की मेंटल  परत में रेडियों एक्टिव (रेडियोधर्मी) पदार्थों से उत्पन्न ताप में भिन्नता पाई जाती है | इसी ताप भिन्नता के कारण ही मेंटल में संवहन धाराएँ  आरम्भ होती है और लगातार बनी रहती है |  आर्थर होम्स के अनुसार इस तरह की संवहन धाराएँ पुरे मेंटल परत में विद्यमान है |

प्रश्न : प्लेट की रूपान्तरण सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा में मुख्य अन्तर क्या है ?

उत्तर : प्लेट की रूपान्तरण सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा में अन्तर निम्न प्रकार से स्पष्ट है |

रूपान्तर सीमा ( Transform Boundaries):

जब  दो प्लेटें एक दूसरे के क्षैतिज दिशा में गति करती है  तो उन दोनों प्लेटों के बीच की सीमा कों रूपांतर सीमा कहते है | इन प्लेटों के द्वारा न तो नई पर्पटी निर्माण होता है और न ही विनाश क्योंकि इन सीमा पर प्लेटें एक दूसरे के साथ  क्षैतिज दिशा में सरक जाती है | इन्हें संरक्षी प्लेट सीमा भी कहते है |

चित्र : रूपान्तर सीमा

अभिसरण सीमा (Convergent Boundaries):

जब दो प्लेटें एक दूसरे के निकट आती है तो उन दोनों प्लेटों के बीच की सीमा कों अभिसारी सीमा कहते है | एक दूसरे के निकट आने  पर इन प्लेटों के किनारों का विनाश होता है |  क्योंकि एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँस जाती है और टूट जाती है |  इन प्लेटों कों इसलिए विनाशकारी प्लेटें भी कहते है |

चित्र : अभिसरण सीमा

अपसारी सीमा (Divergent Boundaries ):

 जब दो प्लेटें एक दूसरे के विपरीत दिशा में गति करती है तो उन दोनों प्लेटों के बीच की सीमा कों अपसारी सीमा कहते है | एक दूसरे से दूर जाने पर इन प्लेटों के बीच नई पर्पटी का निर्माण होता है |  इन प्लेटों कों इसलिए रचनात्मक प्लेटें भी कहते है |

                             

                                                          चित्र : अपसारी सीमा

प्रश्न : दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय  स्थल खंड की स्थिति क्या थी ?

उत्तर :  दक्कन ट्रैप  का निर्माण आज से लगभग 6  करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ | इस समय  भारतीय  स्थल खंड  भूमध्य रेखा के निकट  स्थित था | यह भूमध्य रेखा के दक्षिण में  था |

प्रश्न : पृथ्वी के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीप (स्थल ) है ?

उत्तर : 29 प्रतिशत

प्रश्न : पृथ्वी के कितने प्रतिशत भाग पर महासागर  (जल ) है ?

उत्तर : 71 प्रतिशत

प्रश्न : अब्राहम ऑरटेलियस कौन थे ?

उत्तर : अब्राहम ऑरटेलियस एक डच मानचित्रवेता थे जिन्होंने सन् 1596  में सर्वप्रथम यह सम्भावना व्यक्त की थी कि उत्तर और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीका एक साथ जुड़े हुए थे |

प्रश्न : किस विद्वान ने उत्तर और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीका महाद्वीपों कों अपने मानचित्र में इकट्ठा दिखाया था ?

उत्तर : एन्टोनियो पैलेग्रीनी  ( Antonio Pellegrini )

प्रश्न :  महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत कब और किसने दिया ?

उत्तर : सन् 1912 में जर्मन मौसमविद अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegner) ने |

प्रश्न :  महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत किससे संबंधित है ?

उत्तर : महाद्वीपों और महासागरों के वितरण से

प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े बड़े भू खंड कों क्या माना था ?

उत्तर : पेंजिया

प्रश्न : पेंजिया का क्या अर्थ है ?

उत्तर :संपूर्ण पृथ्वी

प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े बड़े भू खंड कों  चारों ओर से घेरे हुए विशाल महासागर कों क्या माना था ?

उत्तर : पैन्थालासा

प्रश्न : पैन्थालासा का क्या अर्थ है ?

उत्तर : पैन्थालासा का अर्थ है जल ही जल |

प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार पेंजिया का विभाजन कब हुआ ?

उत्तर : लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले |

प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार पेंजिया का विभाजन किन दो बड़े महाद्वीपों के रूप में हुआ ?

उत्तर : लारेसिया  (Laurasia ) : यह उत्तरी भूखंड  के नाम से जाना जाता है |

गोंडवानालैंड (Gondwana land ) : यह दक्षिणी भू खंड  के नाम से जाना जाता है |

प्रश्न :  लारेसिया  (Laurasia ) तथा गोंडवानालैंड (Gondwana land ) के बीच कौन से सागर की उत्पत्ति हुई ?

उत्तर : टेथिस सागर

प्रश्न :   कंप्यूटर प्रोग्राम की सहायता से अटलांटिक (अंध महासागर ) के तटों कों जोड़ते हुए मानचित्र  कब और किसने तैयार किया ?

 उत्तर : सन् 1964 में  बुलर्ड (Bullard)

प्रश्न : टिलाइट (Tillite) क्या है ?

उत्तर :टिलाइट वे अवसादी चट्टानें है जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती है |

प्रश्न : संवहन धारा सिद्धांत (Conventional Current Theory) कब और किसने प्रतिपादित किया ?

 उत्तर :  1930 के दशक में आर्थर होम्स  (Arthur Homes) ने | 

प्रश्न : गहराई व उच्चावच के प्रकार के आधार पर महासागरीय तल कों कितने प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है ? उनके नाम बताओ |

उत्तर :  गहराई व उच्चावच के प्रकार के आधार पर महासागरीय तल कों तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है |

1.       महाद्वीपीय सीमा

2.       गहरे समुद्री बेसिन

3.       मध्य- महासागरीय कटक

प्रश्न : महाद्वीपीय सीमा से आप क्या समझते है ? इसमें महासागरीय तल की कौन कौन से भाग शामिल है ?

उत्तर :   महासागरीय तल वह भाग जो महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच होता है महाद्वीपीय सीमा कहलाता है | इसके अंतर्गत निम्नलिखित भाग शामिल किए जाते है |

1.       महाद्वीपीय मग्नतट

2.       महाद्वीपीय ढाल

3.       महाद्वीपीय उभार

4.       गहरी महासागरीय खाइयाँ

 प्रश्न : वितलीय मैदान से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : महासागरीय तल के विस्तृत मैदान  भाग जो महाद्वीपीय  तटों और मध्य महासागरीय कटकों के बीच स्थित है उसे वितलीय मैदान कहते है |  इन्हें गहरे समुद्री बेसिन समुद्री बेसिन भी कहते है |  वितलीय मैदान वह क्षेत्र है जहाँ महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसाद इनके तटों से दूर निक्षेपित होते है |

प्रश्न :  मध्य- महासागरीय कटक किसे कहते है ?

उत्तर:  मध्य- महासागरीय कटक  आपस में जुड़े हुए पर्वतों की एक श्रंखला है जो महासागरीय जल में डूबी हुई है |  ये मध्य- महासागरीय कटक  पृथ्वी के धरातल पर पाई जाने वाली सबसे बड़ी पर्वत श्रंखला है | ये ज्वालामुखी से निर्मित है और निरंतर इसमें  निर्माण प्रकिया चलती रहती है | क्योंकि ये सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र है |

प्रश्न : किन क्षेत्रों पर भूकंप के उद्गम क्षेत्र कम गहराई पर होते है ?

उत्तर: मध्य- महासागरीय कटकों के क्षेत्र

प्रश्न : किन क्षेत्रों पर भूकंप के उद्गम क्षेत्र अधिक  गहराई पर होते है ?

 उत्तर: अल्पाइन हिमालय पट्टी तथा प्रशांत महासागरीय किनारे

प्रश्न : रिंग ऑफ फायर (अग्नि वलय ) किसे कहते है ?

उत्तर: प्रशांत महासागर के  किनारे सक्रिय ज्वालामुखी के क्षेत्र है इसी कारण से प्रशांत महासागर के चारों ओर के क्षेत्र कों  रिंग ऑफ फायर (अग्नि वलय ) कहते है |

प्रश्न : सागरीय अधस्थल विस्तार (Sea Floor Spreading) परिकल्पना किसने प्रतिपादित की ?

उत्तर: हैरी हैस ने  सन् 1961 में

प्रश्न : प्लेट विवर्तनिकी (प्लेट टक्टोनिक्स) की अवधारणा किन विद्वानों की देन है ?

उत्तर: प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा सन् 1968 में मैक्कैन्जी, पार्कर तथा मोर्गन इन तीन विद्वानों की सम्मलित विचारधारा कों कहा गया |

प्रश्न : दुर्बलता मंडल (एस्थेनोंस्फीयर ) (Asthenosphere) किसे कहते है ?

उत्तर:  पृथ्वी की ठोस ऊपरी प्लेटों के नीचे मैंटल परत में ऐसा मंडल है जिस पर प्लेटे तैरती रहती है उसे दुर्बलता मंडल कहते है |

प्रश्न : महाद्वीपीय प्लेट किसे कहते है ?

उत्तर: एक प्लेट कों महाद्वीपीय प्लेट कहते है यदि उसका अधिकतर भाग महाद्वीप से संबंधित  हो | जैसे अंटार्कटिक प्लेट, यूरेशियन प्लेट , अफ्रीकन प्लेट, उत्तरी अमेरिकन प्लेट , दक्षिणी अमेरिकन प्लेट तथा इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट आदि |

प्रश्न: महासागरीय प्लेट किसे कहते है ?

उत्तर: एक प्लेट कों महासागरीय प्लेट कहते है यदि उसका अधिकतर भाग महासागर से संबंधित हो | प्रशांत महासागरीय प्लेट,

प्रश्न: बड़ी प्लेटे कितनी है? उनके नाम बताओ |

उत्तर: कुल बड़ी प्लेटे सात है | यूरेशियन प्लेट , अफ्रीकन प्लेट, उत्तरी अमेरिकन प्लेट , दक्षिणी अमेरिकन प्लेट,  इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट प्रशांत महासागरीय प्लेट तथा अंटार्कटिक प्लेट |

प्रश्न: छोटी प्लेटें कितनी है? कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम बताओ |

उत्तर: विद्वानों के अनुसार लगभग 20 छोटी प्लेटें है | जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित है |

नजका प्लेट, कोकोस प्लेट , अरेबियन प्लेट, फिलिपिन प्लेट, कैरोलिन प्लेट तथा फ्यूजी प्लेट |

प्रश्न: किस प्लेट की प्रवाह दर सबसे कम है ?

उत्तर: आर्कटिक कटक  (प्रवाह दर 2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष)

प्रश्न: किस प्लेट की प्रवाह दर सबसे अधिक  है ?

उत्तर: ईस्टर द्वीप के निकट प्रशांत महासागरीय उभार  जो चिली से पश्चिम की ओर 3400  किलोमीटर दूर  दक्षिणी प्रशांत महासागर में है | (प्रवाह दर 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष) |


Sunday, July 31, 2022

Earthquake, Layers of Earth, Volcano, and Volcanism (Lesson 3, Interior of the Earth, 11th Geography )

 

भूकंप का अर्थ

साधारण भाषा में भूकंप का अर्थ है - पृथ्वी का कांपना |

भूकंप का उद्गम केन्द्र

पृथ्वी के अंदर वह स्थान जहाँ  से ऊर्जा निकलती है उसे भूकंप का उद्गम केन्द्र भूकंप  मूल (Focus) कहते है |  इसे अवकेंद्र भी कहते है | यहीं से भूकम्पीय तरंगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई पृथ्वी की सतह तक पहुँचती है |

 भूकंप अधिकेंद्र

भूतल पर  वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के सबसे निकट होता है | उस पर भूकम्पीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती है | इस बिंदु कों ही भूकंप अधिकेंद्र (Epicenter) कहते है | यह बिंदु उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर समकोण (90°) पर होता है |


                                                                        चित्र : भूकम्प मूल तथा भूकंप अधिकेंद्र 

भूकंप लेखी (भूकंप मापी) यंत्र

भूकंप के दौरान पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली भूकम्पीय तरंगों कों मापने के लिए  जिस यंत्र का प्रयोग किया जाता है उसे भूकंप लेखी (भूकंप मापी) यंत्र या सिस्मोग्राफ (Seismograph)  कहते है | 

उत्पत्ति स्थान के आधार पर भूकम्पीय तरंगों के प्रकार

उत्पत्ति के आधार पर भूकम्पीय तरंगें दो प्रकार की होती है | भूगर्भिक तरंगें तथा धरातलीय तरंगें  |

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

1.       भूगर्भिक तरंगें

वे तरंगे जो भूकम्प के केन्द्र से ऊर्जा के मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती तथा पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढती है | उन्हें भूगर्भिक तरंगें कहते है | 

ये तरंगे भी दो प्रकार की होती है | प्राथमिक तथा गौण तरंगे |

अ.     प्राथमिक तरंगे  (P-WAVES)

ये तरंगे ध्वनि तरंगों की तरह  होती है | इन्हें अनुदैर्ध्य तरंगें भी कहते है | क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक ही दिशा में होती है | ये सबसे तेज होती है जिसके कारण ये पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती है | ये सभी तरह ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती हैं |

आ.   गौण तरंगे (S- WAVES)

ये जल तरंगों की तरह होती है |इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें भी कहते है | क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक दूसरे समकोण पर होती है | इनकी औसत गति 4 किलोमीटर प्रति सैकेंड होती है | ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती है और तरल माध्यम में आने पर लुप्त हो जाती है | इसी विशेषता के कारण इन तरंगों से वैज्ञानिकों  कों भूगर्भीय संरचना कों समझने में काफी सहायता मिली है |

2.       धरातलीय तरंगें  

भूगर्भिक तरंगों और धरातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य क्रिया होने के कारण नई प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती है | जिन्हें धरातलीय तरंगें कहते है | ये तरंगे धरातल के साथ- साथ चलती है | ये तरंगे भूकंप लेखी यंत्र पर अंत में अभिलेखित होती है अर्थात ये सबसे अंत में आती है | ये तरंगें लंबी तरंगों के नाम से भी जानी जाती है | ये धरातल तक ही सीमित रहती हैं | इनकी औसत गति 3 किलोमीटर प्रति सैकेंड होती है | ये भी प्राथमिक तरंगों की तरह ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती हैं |  ये तरंगे सबसे अधिक विनाशकारी  होती है | इनसे शैले विस्थापित होती है | इमारते गिर जाती है |

भूकम्पीय तरंगों का संचरण तथा शैलों (चट्टानों) पर भूकम्पीय तरंगों का प्रभाव

भिन्न –भिन्न प्रकार की भूकम्पीय तरंगों के संचारित होने की प्रणाली भी अलग-अलग होती है | जैसे ही ये संचारित होती है | तो शैलों में कंपन पैदा होती है | भिन्न –भिन्न प्रकार की तरंगे शैलों पर अपना अलग –अलग प्रभाव छोडती है | उनके प्रभाव कों निम्न प्रकार से समझा जा सकता है |

प्राथमिक या P तरंगों के कारण शैलों पर पड़ने वाले प्रभाव

P तरंगों के कम्पन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर होती है | तरंगों का यह संचरण उनकी गति की दिशा में ही पदार्थों पर दबाव डालती है | इस दबाव के कारण शैलों के पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन तथा फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है |

गौण (द्वितीयक) या S तरंगों के कारण शैलों पर पड़ने वाले प्रभाव

S तरंगों के कम्पन की दिशा तरंगों की दिशा के समकोण पर होती है | इस कारण ये तरंगें जिन शैलों से गुजरती है उनमें उभार और गर्त बनाती है |

धरातलीय या L तरंगों के कारण शैलों पर पड़ने वाले प्रभाव

ये तरंगे सबसे अधिक विनाशकारी  होती है | इनसे शैले विस्थापित होती है  अर्थात शैलें अपने स्थान से खिसक जाती है |

भूकम्पीय छाया क्षेत्र (Earthquake Shadow Zone)

भूकंपलेखी पर दूरस्थ सथानों से आने भूकम्पीय तरंगें अभिलेखित होती है |  लेकिन कुछ स्थान ऐसे भी होते है जहाँ कोई भी भूकम्पीय तरंग अभिलेखित नहीं होती है | ऐसे स्थानों कों जहाँ जहाँ कोई भी भूकम्पीय तरंग अभिलेखित नहीं होती भूकम्पीय छाया क्षेत्र कहते है |

प्राय: देखा जाता है कि भूकंपलेखी अधिकेंद्र से  1050   भीतर किसी भी दूरी पर प्राथमिक (P) तथा  गौण (S)  तरंगों का अभिलेखन करते है | लेकिन  अधिकेंद्र से  1450  से दूर केवल प्राथमिक (P) तरंगों कों ही दर्ज करते है  और गौण (S)  तरंगों का अभिलेखन नहीं करते | वैज्ञानिक मानते है कि 1050 से 1450 के बीच का क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर कोई भी भूकम्पीय तरंग नहीं जाती है | अत : यह क्षेत्र दोनों ही प्रकार की तरंगों का छाया क्षेत्र है |

प्राथमिक (P) तरंगों का छाया क्षेत्र

    भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से 1450  के बीच के क्षेत्र में  प्राथमिक (P) तरंगे नहीं पहुँच पाती है | अत: भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से 1450  बीच का क्षेत्र  प्राथमिक (P) तरंगों के लिए भूकम्पीय छाया क्षेत्र होता है | यह एक पट्टी के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है |

 

गौण (S) तरंगों का छाया क्षेत्र

                भूकंप अधिकेंद्र से 1050 से दूर गौण (S) तरंगें नहीं पहुँच पाती है | अत: बाकी सारा क्षेत्र इन तरंगों के लिए भूकम्पीय छाया क्षेत्र होता है | इन तरंगों का छाया क्षेत्र प्राथमिक (P) तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत होता है |  गौण (S)  का तरंगों के छाया क्षेत्र विस्तार में बड़ा होने के साथ-साथ पृथ्वी  के 40 प्रतिशत भाग पर होता है | 

 


भूकंप के प्रकार

भूकम्प के वर्गीकरण के कई आधार है | भूकंप की उत्पत्ति के कारणों के आधार पर भूकंप के प्रकारों का वर्णन निम्नलिखित है |

A.     सामान्यतः विवर्तनिक भूकंप

वे भूकंप जो भ्रंश तल के किनारे चट्टानों के सरकने के कारण उत्पन्न होते है उन्हें सामान्यतः विवर्तनिक भूकंप कहते है | इस प्रकार के भूकंप ही सबसे अधिक आते है |

B.     ज्वालामुखी जन्य भूकंप

ऐसे भूकंप जो ज्वालामुखी उद्गार के कारण उत्पन्न होते है उन्हें ज्वालामुखी जनित भूकंप कहते है | ये भी एक प्रकार के विवर्तनिक भूकंप ही होते है| ये भूकंप अधिकांशतः सक्रीय ज्वालामुखी के क्षेत्रों में तक ही सीमित रहते है |

C.     नियात भूकंप

खनन क्षेक्षेत्रों में कभी-कभी भूमिगत खादानों की छतें ढह जाती है |  इस प्रकार के भूकंप कों नियात (collapse)  भूकंप कहते है | इस प्रकार के भूकंप के हल्के झटके महसूस होते है |

D.     विस्फोट  भूकंप

जब कभी भूमि में परमाणु विस्फोट या रासायनिक विस्फोट किया जाता है तो भूमि में कंपन होती है | इस तरह से उत्पन्न भूकंप कों विस्फोट भूकंप कहते है |

E.     बाँध जनित भूकंप

बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण बड़ी मात्रा में जल कों संचित करने के लिए किया जाता है | विशाल जल राशि के भार के  कारण उस स्थान की भूमि का संतुलन बिगड जाता है | जिससे भूकंप उत्पन्न होते है | इस प्रकार के भूकम्प कों बाँध जनित भूकंप कहते है |

भूकंप की माप

भूकंप कों उसकी तीव्रता तथा गहनता  (आघात की तीव्रता )के संदर्भ में मापा जाता है |  इन दोनों कों निम्नप्रकार से समझ सकते है |

अ.    भूकंप की तीव्रता

                      भूकंप की तीव्रता भूकंप के समय मुक्त होने वाली ऊर्जा से सम्बन्धित है | इसे रिक्टर स्केल (Richter scale) मापा जाता है | इस मापनी के अनुसार भूकंप की तीव्रता 0 से 10 तक होती है |  इस मापनी का कों चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर  के द्वारा विकसित किया गया था |

ब. भूकंप की गहनता  (आघात की तीव्रता )

                      भूकंप की गहनता  के अंतर्गत किसी स्थान परभूमि में होने वाले कंपन मापा जाता है | इसे मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव के संदर्भ में देखा जाता है कि इन कम्पन या झटकों से कितनी हानि हुई है | इस मापनी कों इटली के भूकंप वैज्ञानिक मरकैली (Mercelli) के द्वारा विकसित किया गया था | इस मापनी में भूकंप की गहनता कों 1 से 12 तक मापा जाता है |

भूकंप के प्रभाव

                  भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है |  इस आपदा से निम्नलिखित प्रभाव पड़ते है |

1)      भूमि के हिलने से भूकंप अधिकेंद्र के पास अत्यधिक कंपन होता है |  जिससे लोगों में  डर बना रहता है |

2)      भूकम्प के कारण जन-धन की आपार हानि होती है |

3)      भूकंप के कारण बहुत अधिक मात्रा में इमारतें टूट जाती है या ध्वस्त हो जाती है | 

4)      भूकंप के कारण धरातल में मोड या वलन पड़ते है | जिससे धरातलीय विसंगति  उत्पन्न होती है |

5)      भूकंप के कारण कई बार पर्वतीय क्षेत्रों में भू स्खलन या पंक स्खलन होता है जिससे जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है |

6)      भूकंप के कारण कई बार  दरार पड जाने से वस दरार में से जल, कीचड़  निकलता है जिससे मृदा द्रवण होने लगता है |

7)      भूकम्प के कारण धरातल का एक तरफ झुक जाता है |

8)      इसके कारण सड़कें टूट जाती है |

9)      भूकंप से नदियाँ अपना मार्ग भी बदल लेती है | जिसके कारण भयंकर बाढ़ें आती है |

10)   भूकंप से धरातल एक स्थान से खिसक जाता है अर्थात धरातल का विस्थापन होता है |

11)   भूकंप यदि बाँध या तटबंध वाले क्षेत्रों में आ जाये तो ये टूट जाते है परिणाम स्वरूप भयंकर बाढ़ें आती है |

12)   यदि भूकम्प केंद्र समुद्र में हो तो समुद्र में भूकम्पीय लहरों के कारण एक विशेष प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती है जिन्हें सुनामी कहते है | ये तरंगें अत्यधिक विनाशकारी होती है |

भूकंप की आवर्ती

            भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है |  इसकी आवर्ती भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न –भिन्न होती है | तीव्र भूकंप अधिकतर उन्हीं स्थानों पर आते है जो भ्रंश के समीप होते है | इसी प्रकार रिक्टर स्केल पर 8 से अधिक तीव्रता वाले भूकंप एक या दो सालों में एक ही बार आते  है | जबकि हल्के भूकंप लगभग हर मिनट पृथ्वी के किसी ना किसी भाग में आते ही रहते है |

पृथ्वी की संरचना (पृथ्वी की परतें)

                        भूकम्पीय तरंगों के व्यवहार कों समझनें के बाद हम पृथ्वी की आंतरिक संरचना कों समझ कर पृथ्वी कों तीन परतों में बाँट सकते है | इन तीन परतों कों हम भू पर्पटी, मैंटल तथा क्रोड कहते है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

भू पर्पटी

ठोस पृथ्वी का सबसे ऊपरी भाग कों भू पर्पटी कहते है | यह बहुत भंगुर (कमजोर) भाग है | इस भाग में जल्दी टूटने की प्रवृति पाई जाती है | इस परत की मोटाई महाद्वीपों तथा महासागरों के नीचे अलग-अलग है | महासागरों के नीचे इसकी मोटाई 5 किलोमीटर तक है जबकि महाद्वीपों के नीचे इसकी औसत मोटाई 30 किलोमीटर है | अर्थात यह महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों के नीचे अधिक गहराई तक स्तिथ है | बड़ी और ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं के नीचे ये और भी अधिक गहराई तक है | उदाहरण के लिए हिमालय पर्वत के नीचे इसकी मोटाई 70 किलोमीटर तक है |

                        यह परत हल्की चट्टानों से बनी है | इसका औसत घनत्व 3 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर  (3g/cm3)है | महासागरों के नीचे इसका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर  (2.7g/cm3) है | महासागरों के नीचे ए परत बेसाल्ट से निर्मित है |

मैंटल

भू पर्पटी के नीचे कि परत कों मैंटल के नाम से जाना जाता है | मोहो असांतत्य (Moho Discontinuity) से लेकर 2900 किलोमीटर की गहराई तक इस परत कों माना गया है |

इस परत के ऊपरी भाग कों दुर्बलता मंडल (Asthenosphere) या ऐस्थेनोस्फेयर  भी कहते है | ऐस्थेनो शब्द का अभिप्राय दुर्बलता से है | इस दुर्बलता मंडल कों 400 किलोमीटर का गहराई तक माना जाता है | ज्वालामुखी विस्फोट के समय जो लावा धरातल पर निकलता है उसका स्त्रोत दुर्बलता मंडल कों ही माना जाता है | निचले मैंटल का विस्तार दुर्बलता मंडल के समाप्त होने के बाद शुरू होता है | निचला मैंटल ठोस अवस्था में है |

भू पर्पटी तथा मैंटल का ऊपरी भाग (दुर्बलता मंडल) मिलकर स्थल मंडल  (Lithosphere)का निर्माण करते है |  स्थल मंडल  की मोटाई किलोमीटर  से किलोमीटर के बीच पाई जाती है |

इस परत का घनत्व भू पर्पटी से अधिक है | इसका औसत घनत्व 3.4 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर  (3.4g/cm3)है |

क्रोड

                        मैंटल परत 2900 किलोमीटर तक ही पाई जाती है | इस गहराई के बाद की परत कों  क्रोड (Core) कहते है | इस परत के भी दो भाग है | बाह्य क्रोड (Outer Core) तथा आंतरिक क्रोड (Inner Core) | वैज्ञानिकों के अनुसार बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है | जबकि आंतरिक क्रोड ठोस अवस्था में है | भूकम्पीय तरंगों के  व्यवहार तथा उनके वेग ने क्रोड कों समझने में बहुत अधिक सहायता प्रदान की है |

मैंटल तथा क्रोड की सीमा पर  घनत्व 5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है | जबकि केन्द्र में 6300 किलोमीटर की गहराई पर यह लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर हो जाता है | इससे यह स्पष्ट होता है कि क्रोड भारी पदार्थों का बना है | जिसमें निकिल (Nikile) तथा लौह (Ferrum) अधिक मात्रा में विद्यमान है | इसलिए इस परत कों निफे (Nife) भी कहते है |  

 


ज्वालामुखी (Volcano)

ज्वालामुखी वह स्थान है  जहाँ से निकलकर गैसें, राख और  तरल चट्टानी पदार्थ (लावा) पृथ्वी के आंतरिक भाग से निकल कर धरातल तक पहुँचता है |

ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism)

वह प्राकृतिक क्रिया जिसके द्वारा गैसें, राख और  तरल चट्टानी पदार्थ (लावा) पृथ्वी के  आंतरिक भाग से निकल कर धरातल तक पहुँचता है | ज्वालामुखी क्रिया कहलाती है | यह पृथ्वी पर होने वाली आकस्मिक घटना है | इससे भू पटल पर अचानक विस्फोट होता है |

ज्वालामुखी क्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

ज्वालामुखी क्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए ज्वालामुखी क्रिया के संबंधित निम्नलिखित तथ्यों की जानकारी होनी चाहिए |

a)      मैग्मा

 पृथ्वी के आंतरिक भाग में पिघली हुई अवस्था में जो पदार्थ होता है उसे मैग्मा कहते हैं |

b)      लावा

पृथ्वी के आंतरिक भाग में पिघली हुई अवस्था में विद्यमान मैग्मा जब ज्वालामुखी उद्गार के बाद पृथ्वी के धरातल पर आता है तो उसे लावा कहते हैं |

c)      निकास नलिका

ज्वालामुखी क्रिया के दौरान सभी पृथ्वी के आंतरिक भाग के पदार्थ एक प्राकृतिक नली द्वारा बाहर निकलते हैं इस नली को निकास नलिका कहते है |

d)      विवर या क्रेटर या शंकु

पृथ्वी के आंतरिक भाग का मैग्मा पृथ्वी के धरातल पर आने के लिए एक छिद्र बनाता है जिसे विवर या क्रेटर या शंकु कहते है |

e)      गौण शंकु या परजीवी शंकु

कई बार मैग्मा मुख्य नली के दोनों ओर रंध्रों से होकर बाहर निकलने लगता है  और छोटे –छोटे शंकुओं का निर्माण करता है | जिन्हें गौण शंकु या परजीवी शंकु कहते है|

 

सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखी के प्रकार

सक्रिय ज्वालामुखी

 वे ज्वालामुखी जिनमें से लगातार विस्फोट होता ही रहता है | समय- समय पर इसमें से धुआं, लावा तथा अन्य चट्टानी पदार्थ निकलते रहते है उन ज्वालामुखियों कों सक्रिय ज्वालामुखी कहते है | दूसरे शब्दों में ऐसा ज्वालामुखी जिसमें से कुछ समय पहले ही चट्टानी पदार्थ बहार निकला हो या निकल रहा हो सक्रिय ज्वालामुखी कहलाता है |  जैसे :-इटली का माउंट एटना का ज्वालामुखी इस तरह के ज्वालामुखी पिछले 2500 वर्षों से सक्रिय है |  सिसली द्वीप समूह का स्ट्राम्बोली का ज्वालामुखी भी एक सक्रिय ज्वालामुखी है, जिसमें प्रत्येक 15 मिनट के बाद विस्फोट होता है |

प्रसुप्त ज्वालामुखी

वे ज्वालामुखी जिनमें लंबे समय से कोई विस्फोट नहीं हुआ होता लेकिन ऐसी संभावनाएँ होती है की ये कभी भी अचानक क्रियाशील हो सकते है तो ऐसे ज्वालामुखी कों प्रसुप्त ज्वालामुखी कहते है | इस प्रकार के ज्वालामुखी में जब भी विस्फोट होता है तो जान-माल की बहुत अधिक हानि होती है | इनओटी के विस्फोट से जन-धन की बहुत अधिक हानि है | इटली का माउंट विसुवियस , जापान का फ्यूजीयामा, इंडोनेशिया का क्राकाटाओ तथा भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह  के नार्कोंडम द्वीप में स्थित दो ज्वालामुखी प्रसुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण हैं |

मृत ज्वालामुखी

वे ज्वालामुखी जिनमें हजारों वर्षों से कोई विस्फोट नहीं हुआ है और भविष्य में भी इनमें उद्भेदन होने की कोई सम्भावना है मृत ज्वालामुखी कहलाते हैं | इनका मुख मिट्टी, लावा आदि से भर जाने से बंद हो जाता है | मुख का गहरा क्षेत्र झील का रूप ले लेता है | म्यांमार का पोपा, इक्वेडोर का चिम्बराजो, ईरान का देमबन्द तथा एंडीज पर्वतश्रेणी का एकांकागुआ का ज्वालामुखी आदि मृत ज्वालामुखी के उदाहरण हैं |

ज्वालामुखी उद्गार की प्रवृति के आधार पर ज्वाला मुखी के प्रकार

उद्गार की प्रवृति के आधार पर ज्वालामुखी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं |

केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी

वे ज्वालामुखी जिनमें लावा का उद्गार ज्वालामुखी के केन्द्रीय मुख से प्रचंड विस्फोट होता है | जिसमें  तेज ध्वनि, कंपन और गडगडाहट होती है उन्हें केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी कहते हैं | इटली का एटना तथा विसुवियस और जापान का फ्यूजीयामा केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखियों के उदाहरण हैं |

दरारी उद्भेदन वाले ज्वालामुखी

  वे ज्वालामुखी जिनमें लावा का उद्गार ज्वालामुखी के केन्द्रीय मुख से ना होकर पृथ्वी के तल पर सकड़ों लंबी दरारों के द्वारा होता है उन्हें दरारी उद्भेदन वाले ज्वालामुखी कहा जाता है | इस प्रकार के  उद्भेदन में न हो भीषणता होती हैं न ही गैसे और चट्टानी पदार्थ बहार आते है |  इससे तरल लावा बाहर आकार मोटी परत के रूप में भूमि के बड़े भाग पर परत के रूप में जम जाता है | बेसाल्ट प्रवाह की घटना दरारी उद्भेदन के कारण ही हुई थी जिससे दक्षिणी भारत के पठार का निर्माण हुआ था |  

ज्वालामुखी स्थ्लाकृतियाँ (ज्वालामुखी द्वारा निर्मित स्थ्लाकृतियाँ)

ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है उसके ठंडा होने पर आग्नेय शैलों का निर्माण होता है | लावा का यह जमाव धरातल के नीचे तथा धरातल पर पहुँच कर दोनों ही प्रकार से होता है | इस प्रकार लावा के ठंडे होने के स्थान के आधार पर आग्नेय शैलें दो प्रकार की होती है | ज्वालामुखी शैल  तथा पतालीय शैल  | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित लिखित है |

ज्वालामुखी शैल

                        जब लावा धरातल पर पहुँच कर ठंडा होता है तो उससे बनी शैलों कों ज्वालामुखी शैल कहते है | इन्हें शैलों में बनी आकृतियों कों बहिर्वेधी ज्वालामुखीय आकृतियों के नाम से जाना जाता है |

पातालीय शैल 

                        जब लावा धरातल पर पहुँचने से पहले ही ठंडा होकर जम जाता है तो उससे बनी शैलों कों पातालीय  शैल कहते है | इन शैलों में कई प्रकार की आकृतियाँ बनती है जिन्हें अंतर्वेधी ज्वालामुखीय आकृतियों के नाम से भी जाना जाता है | जिनमें बैथोलिथ, लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ सिल, शीट तथा डाईक आदि प्रमुख है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

        I.            बैथोलिथ

            यदि मैग्मा का बड़ा पिंड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह गुम्बद के आकार में विकसित हो जाता है  तो उसे बैथोलिथ कहते है | ये ग्रेनाईट के बने होते हैं | अनाच्छादन प्रक्रियाओं के द्वारा जब ऊपरी चट्टानी पदार्थ अपरदित हो जाता है तो ये धरातल पट प्रकट हो जाते है | ये विशाल क्षेत्र में फैले होते हैं | कभी –कभी इनकी गहराई कई किलोमीटर तक होती है |

     II.            लैकोलिथ

            ये गुम्बदनुमा अंतर्वेधी चट्टानें हैं जिनका तल समतल व एक पाईपरूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है | इनकी ढाल उत्तल होती है |   इनकी आकृति धरातल पर पाए जाने वाले मिश्रित ज्वालामुखी के गुम्बद से मिलती है | ये सिर्फ अवसादी चट्टानों में मैग्मा के जमाव से बनता है | अन्तर केवल इतना ही है कि मिश्रित ज्वालामुखी धरातल पर बनता है जबकि लैकोलिथ धरातल के नीचे गहराई में बनता है |

   III.            लैपोलिथ

            जब मैग्मा का जमाव धरातल के नीचे अवतल ढाल वाली छिछली बेसिन में होता है तब उसे लैपोलिथ कहते है | यह तश्तरी के आकार का होता है |

  IV.            फैकोलिथ

            ज्वालामुखी उद्गार से प्राप्त मैग्मा मोड़दार पर्वतों के अपनति तथा अभिनति में जमा हो जाता है तो एक लहर युक्त आकृति का निर्माण होता है जिसे फैकोलिथ कहते है |

     V.            सिल तथा शीट

            जब मैग्मा अवसादी या रूपांतरित चट्टानों में ठंडा होकर लगभग क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में जमा हो जाता है और मोटाई अधिक होती है  तो इस आकृति कों सिल कहते है | इस तरह के जमाव वाली आकृति जो कम मोटाई वाली होती है तो उसे शीट कहते है |

  VI.            डाईक

            जब मैग्मा का प्रवाह दरारों में धरातल के लगभग समकोण की ओर होता है और इसी अवस्था में यह ठंडा हो जाता है तो एक दीवार की तरह की आकृति बनाता है  जिसे डाईक कहते है |