अध्याय 1
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
भारत और समकालीन विश्व -2 (इतिहास )
कक्षा -10व वीं
प्रश्न : ज्युसेपे मेत्सिनी पर
टिप्पणी लिखिए |
उत्तर : ज्युसेपे मेत्सिनी इटली का एक
क्रांतिकारी था | वह इटली को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहता था |
उसका जन्म सन् 1807 में
जेनोआ में हुआ था |
वह “कार्बोनारी” के गुप्त संगठन का
सदस्य था | 24 वर्ष की युवावस्था में लिगुरिया में
क्रान्ति करने के लिए उसे बहिष्कृत कर दिया गया था |
मेत्सिनी ने दो भूमिगत संगठनों की स्थापना की
| मार्सेई में ‘यंग इटली’ और बर्न में ‘यंग यूरोप’ |
मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के
अनुसार राष्ट्र ही मनुष्य की प्राकृतिक इकाई थी |अत: इटली छोटे राज्यों और
प्रदेशों के पैबन्दों की तरह नहीं रह सकता था | उसे जोड़ कर राष्ट्रों के के व्यापक
गठबंधन के द्वारा एक व्यापक राष्ट्र और गणतंत्र बनना ही होगा | उसके अनुसार केवल
एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता है |
मेत्सिनी के द्वारा राजतन्त्र का घोर विरोध
किया गया और उसने प्रजातांत्रिक गणतंत्रों के अपने स्वप्न से रूढिवादियों को हरा
दिया |
ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटरनिख ने उसे “हमारी
सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन” बताया है |
प्रश्न : काउंट कैमिलो दे कावूर पर
टिप्पणी लिखिए |
उत्तर : सार्डिनिया पीडमांट के शासक विक्टर
इमेनुअल द्वितीय का प्रधानमंत्री था |
जिसने इटली के प्रदेशों कों एकीकृत करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया था | वह न तो
क्रांतिकारी कारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखता था | इटली के अभिजात्य वर्ग
के सभी अमीरों और शिक्षित सदस्यों की तरह इतालवी भाषा की से अच्छी फ्रेंच भाषा
बोलता था | फ्रांस से सार्डीनिया पीडमॉण्ट की एक चतुर कूटनीति संधि के पीछे कावूर
का ही हाथ था | इसी संधि के परिणाम स्वरूप
सार्डीनिया पीडमॉण्ट 1859 ई॰ में
ऑस्ट्रियाई शक्तियों को हराने में कामयाब
हुआ था |
प्रश्न : यूनानी स्वतंत्रता युद्ध
पर टिप्पणी लिखिए |
उत्तर : पंद्रहवी शताब्दी में यूनान ऑटोमन
साम्राज्य का हिस्सा था | यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से
यूनानियों का आजादी के लिए संघर्ष 1821 में
आरम्भ हो गया | यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियीं के साथ
पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला | ये लोग यूनान की प्राचीन
संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे |
कवियों
और कलाकारों नें यूनान को यूरोपीय सभ्यता का पालना बताकर देश की प्रशंसा की और एक
मुस्लिम साम्राज्य के विरूद्ध यूनान के
संघर्ष के लिए जनमत भी जुटाया | अंग्रेज कवि लार्ड बॉयरन ने यूनानी स्वतंत्रता के
युद्ध के लिए धन एकत्रित किया और युद्ध भी लड़ा | अंततः 1832
की कुस्तुनतुनिया की संधि
के बाद यूनान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा प्राप्त हो गया |
प्रश्न : फ्रैंकफर्ट संसद पर
टिप्पणी लिखिए |
उत्तर : फ्रैंकफर्ट संसद जर्मनी को एक राष्ट्र
के रूप में स्थापित करने से संबंधित थी | जर्मन इलाकों में बड़ी संख्या में
राजनैतिक संगठनों नें फ्रैंकफर्ट में मिल कर एक सर्व जर्मन नेशनल एसेम्बली के पक्ष
में मतदान करने फैसला लिया | 18 मई 1848 को 831 निर्वाचित
प्रतिनिधियों ने एक सजे धजे जुलूस में जा कर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण
किया | यह संसद सेंट पाल चर्च में आयोजित हुई | इस संसद ने जर्मन राष्ट्र के लिए
संविधान का प्रारूप तैयार किया |
इस
संसद के प्रतिनिधियों के द्वारा जर्मन राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी
जानी थी | जो संसद के अधीन रहना था | जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख
विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने कि पेशकश कि तो उसने उसे अस्वीकार कर दिया| उसने उन्
राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे |
जहाँ
कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ा , वहीं संसद का सामाजिक आधार कमजोर हो गया | संसद
में मध्य वर्ग का प्रभाव अधिक था जिन्होंने मजदूरों और कारीगरों की माँगों का
विरोध किया जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे | अंत में सैनिकों को बुलाया गया और संसद
(एसेंबली) भंग होने को मजबूर हो गई |
इस संसद में महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की
हैसियत से दर्शक दीर्घा में खड़ा होने दिया गया था |
प्रश्न : राष्ट्रवादी संघर्षों में
महिलाओं की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए |
उत्तर : राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की
भूमिका को हम निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं |
उदारवादी आंदोलन के
अंदर महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने का मुद्दा विवादास्पद था | हाँलाकि,
आंदोलन के वर्षों बड़ी संख्या में महिलाओं सक्रिय रूप से भाग लिया था |
महिलाओं ने अपने
रणनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में
भाग लिया | इसके बावजूद उन्हें एसेम्बली (संसद) के चुनाव के दौरान मताधिकार से
वंचित रखा गया था |
फ्रैंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल
प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक-दीर्घा में खड़ा होने दिया गया था |
प्रश्न : फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के
लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए ?
अथवा
फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए
फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा प्रारम्भ किए गए उपायों और कार्यों का विश्लेषण
कीजिए ?
अथवा
“राष्ट्रवाद की पहली पूर्ण अभिव्यक्ति में फ्रांसीसी क्रांति के साथ आई
|” कथन को स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर : राष्ट्रवाद की पहली पूर्ण अभिव्यक्ति
में फ्रांसीसी क्रांति के साथ आई | क्योंकि फ्रांसीसी क्रांति के समय
क्रांतिकारियों ने फ्रांस के लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के
लिए अनेक कदम उठाए जिनमें से कुछ निम्नलिखित है |
i)
क्रान्तिकारियों ने पितृभूमि (La Patrie) तथा
नागरिक (Le Citoyen) जैसे विचारों को लोगों तक पहुँचाया |इन
विचारों ने एक संयुक्त समुदाय पर बल दिया जिसे जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान
अधिकार प्राप्त थे |
ii)
एक नया फ्रांसीसी तिरंगा
झंडा (The
Tricolour ) चुना गया | जिसने पहले के
राष्ट्रीय ध्वज की जगह ले ली |
iii)
इस्टेट जेनरल का चुनाव
सक्रिय नागरिकों के एक समूह द्वारा किया जाने लगा और इसका नाम बदलकर नेशनल
एसेम्बली कर दिया गया |
iv)
क्रांतिकारियों के द्वारा नई
स्तुतियाँ रची गई, शपथें ली गई , शहीदों का गुणगान किया गया ये सब कार्य लोगों में
राष्ट्रीय भावना को बढाने के लिए किया गया |
v)
एक केन्द्रीय प्रशासनिक
व्यवस्था लागू की गई जिसमें अपने भू भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान
कानून बनाए |
vi)
आंतरिक आयात –निर्यात शुल्क
समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एक समान व्यवस्था लागू की गई |
vii)
क्षेत्रीय बोलियों को
हतोत्साहित किया गया और पेरिस में फ्रेंच जैसी बोली और लिखी जाती थी उसे ही
राष्ट्र की साझा भाषा बन गई |
प्रश्न : मारिआन और जर्मेनिया कौन
थे ? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया उसका क्या महत्व था ?
उत्तर : : मारिआन और जर्मेनिया दो नारियों के
चित्र हैं | उन्हें राष्ट्रों के रूप में चित्रित किया गया है | : मारिआन
फ्रांसीसी गणराज्य का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र का रूपक
है |
वास्तव में अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी
में इन देशों के कलाकारों ने
राष्ट्रों को मानवीय रूप प्रदान
किया और उनकी अभिव्यक्ति एक साधारण नारी के रूप में की |
फ़्रांस ने सन् 1850 में एक डाक टिकट और सिक्कों पर मारिआन की छवि छापी
गई | उसकी प्रतिमाओं को सार्वजनिक स्थानों पर लगाया गया ताकि लोगों में राष्ट्रीय
भावना जागती रहे |
चाक्षुष अभिव्यक्तियों में जर्मेनिया को बलूत
वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दिखाया गया, क्योंकि जर्मन बलूत को वीरता का प्रतीक
माना जाता है |
मारिआन और जर्मेनिया को इस तरह चित्रित करने
का महत्व :
इनसे
लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को प्रबल हुई | इससे भी बढ़कर मारिआन ने फ़्रांस और
जर्मेनिया ने जर्मनी को एक अलग राष्ट्र के रूप में पहचान प्रदान करने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
प्रश्न
: जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का
संक्षेप में पता लगाएँ |
अथवा
जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए |
उत्तर :
जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |
1815 में
नेपोलियन की पराजय के बाद नेपोलियन ने 39 राज्यों का जो
जर्मन महासंघ स्थापित किया था उसे बरकरार रखा गया | जिससे जर्मनी के देश –भक्तों
में इस संघ को मजबूत बनाकर इसे एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के विचार जोर
पकड़ने लगे |
राष्ट्रवादी
भावनाएँ मध्यवर्गीय जर्मन लोगों में काफी व्यापत होने लगी थी |
इन
मध्यवर्गीय राष्ट्रवादी लोगों ने 1848 में जर्मन महासंघ के
विभिन्न इलाकों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र –राज्य बनाने का
प्रयास किया था | प्रशा के राजा फ्रेडरिख
विल्हेम चतुर्थ को इन क्रांतिकारियों ने जर्मन महासंघ का अध्यक्ष बनाने की पेशकश
की | मगर उसने इसे अस्वीकार कर दिया | राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही
और फ़ौज की ताकतों ने मिलकर दबा दी | प्रशा के बड़े भूस्वामियों ने भी उनका समर्थन
किया |
उसके बाद
प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया | उसका प्रमुख मंत्री
ऑटो वॉन बिस्मार्क इसक प्रक्रिया का जनक था | जिसने प्रशा की सेना और नौकर शाही की
मदद से जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को पूरा किया |
सात वर्षों
के दौरान तीन युद्ध 1866
में ऑस्ट्रिया के साथ, 1867 में डेनमार्क के
साथ और 1871फ्रांस साथ
हुए जिसमें प्रशा की जीत हुई | और जर्मनी के एकीकरण की प्रकिया पूरी हुई |
जनवरी 1871में
वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट
घोषित कर दिया गया |
18 जनवरी
1871को जर्मन राज्यों के राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों
और प्रमुख मंत्री (प्रधान मंत्री) ऑटो वॉन बिस्मार्क समेत प्रशा के महत्वपूर्ण
मंत्रियों की बैठक वर्साय के महल के बेहद ठंडे शीशमहल (हॉल ऑफ मिरर्स) में हुई इस
सभा ने प्रशा के राजा काइज़र विलियम प्रथम के नेतृत्व में नए जर्मन का साम्राज्य
की घोषणा की |
प्रश्न : अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन-व्यवस्था को ज्यादा कुशल
बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या –क्या बदलाव किए ?
अथवा
“फ़्रांस में नेपोलियन ने प्रजातंत्र को नष्ट किया था | परन्तु
प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों का समावेश किया जिससे पूरी
व्यवस्था अधिक तर्कसंगत और कुशल बन सके |” तर्कों सहित इस कथन का विश्लेषण कीजिए |
अथवा
नेपोलियन कि सहिंता को फ्रांसीसी नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में किस
प्रकार लागू किया गया ? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए |
अथवा
एक अधिक तर्कसंगत और कुशल प्रणाली बनाने वाले शासक के रूप में आप
नेपोलियन का मूल्याकंन कैसे करेंगे ? उपयुक्त उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर : 1804 की
नागरिक सहिंता जिसे आमतौर पर नेपोलियन की सहिंता कहा जाता है | नेपोलियन ने अपने
अधीन शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को कुशल बनाने के लिए अपनी इस सहिंता में निम्नलिखित प्रावधान किए थे |
1
इस सहिंता ने जन्म पर आधारित
विशेष अधिकार समाप्त कर दिए थे |
2
उसने कानून के समक्ष बराबरी
और सम्पति के अधिकार को सुरक्षित बनाया |
3
इस सहिंता को फ़्रांस के अधीन
क्षेत्रों में लागू किया गया |
4
डच गणतंत्र, स्विट्जरलैंड,
इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया |
5
सामंती व्यवस्था को समाप्त
किया |
6
किसानों को भू दासत्व और
जमींदारी शुल्कों से मुक्ति दिलवाई |
7
शहरों में भी कारीगरों के
श्रेणी संघों के नियंत्रण को हटा दिया गया |
8
यातायात और संचार व्यवस्था
को सुधारा गया |
9
एक समान कानून व्यवस्था तथा
माप-तौल के एक समान पैमानों ने व्यापार को सुविधा जनक बनाया |
10 पूरे
देश में एक ही राष्ट्रीय मुद्रा प्रचलित की गई | जिससे व्यापार को बढ़ावा मिला |
प्रश्न : यूरोप
में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के लिए उदाहरण दें |
अथवा
“यूरोप में राष्ट्रवाद की
वृद्धि में संस्कृति बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | ” इस कथन को उदाहरणों
सहित स्पष्ट करें |
अथवा
“राष्ट्रवाद का विकास केवल
युद्ध द्वारा ही नहीं होता | संस्कृति भी राष्ट्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण
भूमिका निभाती है |” उदाहरणों सहित स्पष्ट करें |
अथवा
19 वीं शताब्दी में
यूरोप में राष्ट्रवादी भावनाओं के विकास में रुमानीवाद की भूमिका का वर्णन कीजिए |
उत्तर : राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और
क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ | राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने एक
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | कला काव्य कहानियों- किस्सों और संगीत ने
राष्ट्रवादी भावनाओं को गढ़ने और व्यक्त करने में सहयोग दिया है | राष्ट्रवादी भावनाओं के विकास में संस्कृति के योगदान को हम निम्नलिखित तीन उदाहरणों से समझ सकते हैं |
राष्ट्रवाद
के विकास में रुमानीवाद की भूमिका :
रुमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन था जो एक
खास तरह की राष्ट्र भावना का विकास करण चाहता था | रूमानी कलाकारों तथा कवियों नें
तर्क –वितर्क के महिमामंडन की आलोचना की और उसकी जगह भावनाओं, अंतर्दृष्टि और
रहस्यवादी भावनाओं पर जोर दिया | उनका प्रयास था कि एक साझा-सामूहिक विरासत की
अनुभूति और एक साझा सांस्कृतिक अतीत को राष्ट्र का आधार बनाया जाए |
जर्मन दार्शनिक योहान गॉट फ्रीड जैसे रूमानी
दार्शनिकों नें दावा किया कि सच्ची जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों में निहित थी |
उनका विश्वास था कि राष्ट्र की सच्ची आत्मा उसके आम लोकगीतों, जन काव्यों और
लोकनृत्यों से प्रकट होती है | इसलिए लोक संस्कृति के इन स्वरूपों को एकत्रित करना
राष्ट्र के निर्माण की परियोजना के लिए आवश्यक है |
राष्ट्रवाद
के विकास में स्थानीय बोलियों तथा लोक साहित्य की भूमिका :
राष्ट्रवाद के विकास के लिए स्थानीय बोलियों पर
बल दिया गया और स्थानीय लोक साहित्य को इक्कट्ठा किया गया | ऐसा करने का उद्देश्य
केवल प्राचीन राष्ट्रीय भावना को वापस लाना नहीं था बल्कि आधुनिक राष्ट्रीय संदेश
को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना था |
जिनमें अधिकाँश लोग अनपढ़ थे |
पोलैंड पर यह बात विशेष रूपसे लागू होती थी |
इस देश का अठारहवीं शताब्दी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी बड़ी शक्तियों
ने विभाजन कर दिया था | यद्यपि पोलैंड अब स्वतंत्र भू क्षेत्र नहीं था, तो भी
संगीत और भाषा के माध्यम से वहाँ राष्ट्रीय भावना जीवित रखी गई | उदाहरण के रूप
में कैरोल कुर्पिस्की ने राष्ट्रीय संघर्ष का अपने ऑपेरा और संगीत से गुणगान किया और पोलेनेस और माजुरका जैसे लोकनृत्यों
को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया |
राष्ट्रवाद
के विकास में भाषा की भूमिका :
भाषा ने भी राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में एक
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | रूस के अधीन पोलैंड में पोलिस भाषा को स्कूलों से
बलपूर्वक हटा कर रूसी भाषा को हर जगह जबरन लादा जाने लगा | इसके परिणाम स्वरूप 1831 में
रूस के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह हुआ जिसे आखिरकार कुचल दिया गया | इसके बावजूद
अनेक सदस्यों ने राष्ट्रवादी विरोध के लिए
भाषा को एक हथियार बनाया | चर्च के आयोजनों और संपूर्ण धार्मिक शिक्षा में
पोलिश भाषा का इस्तेमाल किया जाने लगा | इसके परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में
पादरियों और बिशपों को जेल में डाल दिया गया | रुसी अधिकारियों ने उन्हें सजा देते
हुए साइबेरिया भेज दिया क्योंकि उन्होंने रूसी भाषा का प्रचार करने से मना कर दिया
था | इस तरह पोलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गई |
प्रश्न
: 1830 दशक यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया | उदाहरण
देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए |
उत्तर : 1830 दशक
वास्तव में यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया | इस दशक में यूरोप की मुख्य
कठिनाइयाँ निम्नलिखित थी |
i)
उन्नीसवीं सदी के प्रथम भाग में यूरोप में जनसंख्या
में जबरदस्त वृद्धि हुई | जिससे बेरोजगारी बढ़ी | ज्यादातर देशों में नौकरी ढूंढने
वालों की संख्या (तादाद ) उपलब्ध रोगार से अधिक थी |
ii)
ग्रामीण क्षेत्रों की अतिरिक्त आबादी शहरों
में जाकर भीड़ भरी गरीब बस्तियों में रहने लगी |
iii)
नगरों के लघु (छोटे) उत्पादकों को अक्सर
इंग्लैंड से आयातित मशीन से बने सस्ते
कपड़े से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था |
iv)
इंग्लैंड में औद्योगीकरण का स्तर पूरे यूरोप
महाद्वीप के मुकाबले ऊँचा था | पूरे यूरोप को यह प्रतिस्पर्धा कपड़ा –उद्योग में
झेलनी पड़ रही थी | क्योंकि उसका उत्पादन मुख्यतः घरों और छोटे कारखानों में होता
था और केवल आंशिक रूप से मशीनीकृत था |
v)
यूरोप के उन् इलाकों में जहाँ कुलीन वर्ग अभी
भी सत्ता में था | वहाँ कृषक सामंती शुल्कों और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे थे |
vi)
खाने –पीने की चीजों के मूल्य बढने या किसी
वर्ष फसल के खराब हो जाने के कारण शहर और गावों में व्यापक गरीबी फैले जाती थी |
प्रश्न
: उदारवादियों की 1848 की क्रांति का क्या अर्थ जाता है ? उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक
और आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया ?
अथवा
उदारवादियों
ने किन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक
विचारों को बढ़ावा दिया ?
उत्तर : 1848 की
उदारवादियों की क्रान्ति का अर्थ
1848 में जब अनेक यूरोपीय देशों में गरीबी, बेरोजगारी
और भुखमरी से ग्रस्त किसान –मजदूर विद्रोह कर रहे थे तब उसके समानांतर पढ़े लिखे
मध्य्वर्गों की एक क्रान्ति भी हो रही थी | जिसे 1848 की
उदारवादियों की क्रान्ति कहा जाता है | 1848 की उदारवादियों
की क्रान्ति का अर्थ राष्ट्र वाद की विजय से था | जो राष्ट्र- राज्यों के निर्माण
का आधार था | जिन्हें निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है |
i)
फरवरी 1848 की घटनाओं से राजा को
गद्दी छोडनी पड़ी थी |
ii)
एक गणतंत्र की घोषणा की गई जो सभी पुरुषों के
सार्विक मताअधिकार पा आधारित था |
iii)
यूरोप के अन्य भागों में जहाँ अभी तक स्वतंत्र
राष्ट्र –राज्य अस्तित्व में नहीं आए थे जैसे जर्मनी,इटली पोलैंड,
ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य –वहाँ के उदारवादी मध्य्वर्गों के स्त्री –पुरूषों ने
संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया |
iv)
उदारवादियों ने बढ़ते जन असंतोष का फायदा उठाया
और एक राष्ट्र –राज्य के निर्माण की माँग को आगे बढ़ाया | यह राष्ट्र –राज्य
संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी जैसे संसदीय सिद्धांतों पर
आधारित था |
उदारवादियों नें निम्नलिखित राजनीतिक,
सामाजिक और आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया |
राजनीतिक
विचार :
i)
नए मध्य वर्ग के लिए उदारवाद का मतलब था
व्यक्ति के लिए आजादी और कानून के समक्ष बराबरी |
ii)
राजनीतिक रूप से उदारवाद एक ऐसी सरकार पर जोर
देता था जो सहमति से बनी हो \
iii)
फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद उदारवादी निरंकुश
शासक और पादरी वर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति का पक्षधर थे |
iv)
उदारवादी संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार
का पक्षधर था |
सामाजिक
विचार :
i)
उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के
स्वामित्व की अनिवार्यता पर बल देते थे |
ii)
उदारवादी कानून के समक्ष बराबरी का विचार के
पक्ष थे | लेकिन उनके विचार सबके लिए मताधिकार के पक्ष में नहीं था |
iii)
उदारवादियों ने प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष
में थे |
iv)
उदारवादी लोग महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देने
के पक्ष में नहीं थे |
आर्थिक विचार :
i)
आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद, बाजारों की
मुक्ति और चीजों तथा वस्तुओं के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को
खत्म करने के पक्ष में था |
ii)
नया वाणिज्यिक वर्ग कई आर्थिक
परिस्थितियों जैसे सभी क्षेत्रों के
सीमाशुल्क और अलग-अलग नाप –तौल व्यवस्था, को आर्थिक विकास में बाधक मानते हुए एक
एकीकृत आर्थिक क्षेत्र के निर्माण के पक्ष में तर्क दे रहा था जहाँ वस्तुओं, लोगों
और पूँजी का आवागमन बाधा रहित हो |
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