अध्याय 1
जनसंख्या : वितरण,
घनत्व, वृद्धि और संघटन
कक्षा- 12 (भूगोल)
भारत
की जनसंख्या
भारत विश्व के अधिकतम
जनसंख्या वाले देशों में से एक है | भारत विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 2.4 प्रतिशत
भाग पर विस्तृत है जबकि यहाँ पर विश्व की 17.5 प्रतिशत
जनसंख्या निवास करती है |
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की
जनसंख्या 121.02 करोड़ है | जनसंख्या के हिसाब से भारत चीन के बाद दूसरा स्थान है | भारत
की कुल जनसंख्या उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से
भी अधिक है |
भारत
की विशाल जनसंख्या का प्रभाव
विशाल
जनसंख्या के कारण बहुत अधिक समस्याएँ सामने आती है | जो निम्नलिखित हैं |
1)
प्राय: यह तर्क दिया जाता है कि इतनी बड़ी
जनसंख्या निश्चित तौर पर देश के सीमित संसाधनों पर दबाव डालती है |
2)
देश में अनेक सामाजिक आर्थिक समस्याओं के लिए उत्तरदायी
है |
3)
जनसंख्या के अधिक बोझ के कारण गरीबी एक विकराल
रूप धारण कर रही है |
4)
विशाल जनसंख्या ने पर्यावरण संबंधी कई
समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं |
भारत
में जनसंख्या की गणना (जनगणना) या
जनसंख्या के आँकड़ों के स्त्रोत
भारत
में जनसंख्या से संबंधित आँकडों कों प्रति दस वर्ष के बाद होने वाली जनगणना के
द्वारा एकत्रित किए जाते है | भारत में पहली जनगणना 1872 ई०
में हुई थी | लेकिन यह पूर्ण नहीं थी | भारत की पहली सम्पूर्ण जनगणना 1881 ई० में हुई थी | हमारे देश की अंतिम जनगणना सन् 2011 में हुई थी | अब तक कुल 14 संपूर्ण जनगणना हो चुकीं है | अगली (पंद्रहवी)
जनगणना सन् 2021 में होनी है |
भारत
में जनसंख्या वितरण
सन् 2011 की
जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़ है | भारत की इतनी विशाल जनसंख्या समान रूप से देश में वितरित नहीं
है बल्कि असमान रूप से देश के विभिन्न भागों में वितरित है |
देश
के विशाल आकार वाले राज्यों की जनसंख्या कों देखते है तो पता चलता है कि उत्तरप्रदेश
भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है
यहाँ सन् 2011 की जनगणना के अनुसार
19.95 करोड़ लोग रहते हैं | 11.23 करोड़ जनसंख्या के साथ
महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है | बिहार में 10.38 करोड़
जनसंख्या निवास करती है | इसके बाद पश्चिम बंगाल में 9.13 करोड़
तथा आंध्रप्रदेश की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 8.46 करोड़
थी | ये पाँच बड़े राज्यों में देश की लगभग 50 % (आधी)
जनसंख्या पाई जाती है | देश के दस राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र , बिहार,बंगाल
पश्चिम बंगाल आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान कर्नाटक तथा गुजरात
भारत की लगभग 76 प्रतिशत जनसंख्या रहती है |
जबकि विशाल आकार होते हुए भी कुछ
राज्य ऐसे है जिनमें बहुत ही कम जनसंख्या रहती है | जैसे सन् 2011 की जनगणना के
अनुसार ही जम्मूकश्मीर में देश की केवल 1.04 %, अरुणाचलप्रदेश में देश की 0.84% तथा उत्तराखंड में केवल 0.83 % जनसंख्या ही
निवास करती है | क्षेत्रफल की हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में कुल
जनसंख्या का केवल 5.67% हिस्सा ही रहता है |
सिक्किम सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य
है जहाँ लगभग
6 लाख लोग ही रहते है | जो देश की जनसंख्या का केवल 0.05% जनसंख्या ही है | इसके अलावा अधिकाशं उत्तरी पूर्वी राज्यों जैसे
नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश राज्यों में देश
की बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है |
केन्द्र
शासित प्रदेशों में दिल्ली में सबसे अधिक जनसंख्या मिलती है | जबकि अंडमान और
निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप समूह में बहुत ही कम संख्या में लोग रहते हैं |
जनसंख्या
का विषम स्थानिक वितरण जनसंख्या और देश के भौतिक, समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक
कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध
या
भारत
में जनसंख्या के असमान वितरण के कारण
भारत में
जनसंख्या का वितरण असमान है | जनसंख्या का यह विषम स्थानिक वितरण देश की जनसंख्या
और देश के भौतिक (भौगोलिक ), समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ
संबंध प्रकट करता है | ये कारक जनसंख्या
के वितरण कों अत्यधिक प्रभावित करते है | इनका वर्णन निम्न प्रकार से है |
जनसंख्या के
वितरण कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक
भौतिक
कारकों में धरातल, जलवायु तथा जल की उपलब्धता आदि प्रमुख है | ये कारक जनसंख्या के
वितरण कों काफी प्रभावित करते हैं | जैसे भारत के उत्तरी मैदान, डेल्टाओं और तटीय
मैदानों में जनसंख्या का अनुपात दक्षिणी तथा मध्य भारत के राज्यों के आंतरिक जिलों
में अधिक है क्योंकि मैदानी भाग पर लोग अधिक रहना पसंद करते है |
हिमालय, उत्तरी-पूर्वी राज्यों में
विरल जनसंख्या पाई जाती है | जो की पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है | इसी तरह
राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी विरल जनसंख्या मिलती है |
हिमालय
पर्वतीय राज्यों में खास तौर पर हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर में विषम जलवायु के कारण
बहुत ही कम लोग रहते है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी जलवायु
की विषमता तथा जल की कमी लोगों के रहने के
उपयुक्त स्थान नहीं उपलब्ध होने देती है अत: वहाँ भी जनसंख्या विरल है |
कुछ पठारी
क्षेत्रों में भी भौतिक कारकों के करण जैसे जल की की कमी से जनसंख्या अपेक्षाकृत
कम मिलती है |
इन क्षेत्रों में नहरों के विकास तथा
आर्थिक विकास संबंधी कर उपलब्ध कराने के बाद जनसंख्या का अनुपात उच्च होता जा रहा
है | जैसे राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर
से सिंचाई की व्यवस्था के बढ़ने और झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार में खनिजों एवं
ऊर्जा के अपार भण्डारों के कारण इन राज्यों में मध्यम से उच्च जनसंख्या अनुपात
मिलता है |
जनसंख्या के
वितरण कों प्रभावित करने वाले समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारक
इन कारकों में स्थाई कृषि उद्भव और विकास,
मानव बस्ती के प्रतिरूप, परिवहन जाल तंत्र का विकास, औद्योगिकरण और नगरी करण
महत्वपूर्ण हैं |
समान्यत: नदी
घाटियों के मैदानों, तथा तटीय क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है | क्योंकि
इन इलाकों में मानव बस्तियों के आरम्भिक इतिहास और परिवहन जाल तंत्र के विकास के
कारण जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है
|
दिल्ली,
कोलकाता, मुंबई, बंगलौर, पुणे, अहमदाबाद, चेन्नई और जयपुर के नगरीय क्षेत्र
औद्योगि विकास तथा नगरीकरण के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों कों अपनी और
आकृषित कर रहे है | इसलिए इन क्षेत्रों में जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है |
भारत
में जनसंख्या का घनत्व का राज्य स्तरीय वितरण
2011की
जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था | लेकिन राज्य स्तर पर देखते है तो
जनसंख्या घनत्व में बहुत अधिक
विषमताएँ पाई जाती है | क्योंकि धरातल,
वर्षा, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, खनिज संसाधनों का वितरण, उद्योग तथा शहरीकरण आदि
जनसंख्या के घनत्व कों बहुत अधिक प्रभावित करते है | अत: राज्य तथा केन्द्रशासित
प्रदेशों के स्तर पर जनसंख्या घनत्व कों समझना आनिवार्य हो जाता है |
भारत के
जनसंख्या घनत्व का वर्णन निम्न प्रकार से है |
जनसंख्या का
घनत्व
जनसंख्या के
घनत्व को प्रति इकाई क्षेत्र में व्यक्तियों की संख्या द्वारा अभिव्यक्त किया जाता
है | इससे भूमि के संदर्भ में जनसंख्या के स्थानिक वितरण को बेहतर ढंग से समझने
में सहायता मिलती है | 2011की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर
है | 1951 में जनसंख्या का घनत्व 117 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 382
व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमेटर होने से पिछले 50 वर्षों में 250 व्यक्ति प्रति वर्ग
किलोमीटर से अधिक की उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है | 2011 की जनगणना के आँकड़ों से हमें देश की
जनसंख्या घनत्वों की स्थानिक भिन्नता का आभास होता है | जो अरुणाचल प्रदेश में सबसे
कम 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से लेकर दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र
में 11297 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हैं |
उत्तरी भारत के
राज्यों बिहार (1102), पश्चिम बंगाल (1029) तथा उत्तर प्रदेश (828) में जनसंख्या
घनत्व उच्चतर है जबकि प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में केरल (859 ) और तमिलनाडु
(555) में उच्चतर घनत्व पाया जाता है | असम, गुजरात, आंध्र प्रदेश, हरियाणा,
झारखंड, ओडिशा में मध्यम घनत्व पाया जाता है | हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय राज्यों
और असम को छोड़कर भारत के उत्तरी –पूर्वी राज्यों में अपेक्षाकृत निम्न जनसंख्या
घनत्व है | जबकि अंडमान और निकोबार द्वीपों को छोड़कर केन्द्र-शासित प्रदेशों में
जनसंख्या के उच्च घनत्व पाए जाते हैं |
जनसंख्या का घनत्व एक अशोधित माप है |
कुल कृषित भूमि पर जनसंख्या के दबाव के संदर्भ में मानव भूमि अनुपात के बेहतर
परिज्ञान के लिए कायिक और कृषीय घनत्वों का ज्ञात करना चाहिए जो भारत जैसे विशाल
कृषि वाले देश के लिए सार्थक है
नसंख्या घनत्व का माप
जनसंख्या
का घनत्व जनसंख्या के वितरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने का महत्वपूर्ण माप है |
इसे तीन प्रकार से मापा जा सकता है | अंकगणितीय
घनत्व , कायिक (पोषक घनत्व ) कृषि घनत्व | इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है
|
1. अंकगणितीय
घनत्व :
प्रति इकाई क्षेत्रफल में
रहने वाले लोगों की संख्या कों उस क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व कहते है | यह
जनसंख्या तथा भूमि के क्षेत्रफल के बीच एक साधारण अनुपात है | इसे व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर में व्यक्त
करते हैं | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |
जनसंख्या घनत्व = कुल जनसंख्या/ कुल क्षेत्रफल
उदाहरण के लिए एक प्रदेश का क्षेत्रफल 100
वर्ग किलोमीटर है | और उसकी 1,50,000 जनसंख्या
है | तो जनसंख्या घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
जनसंख्या घनत्व = 1,50,000
/ 100
= 1500 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर
2. कायिक
या पोषक घनत्व )
किसी क्षेत्र की कुल जनसंख्या
तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कायिक या पोषक घनत्व कहते है
| इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |
कायिक घनत्व = कुल जनसंख्या/ शुद्ध कृषि
क्षेत्र
उदाहरण के लिए भारत की कुल जनसंख्या लगभग 121
करोड़ है तथा शुद्ध कृषि
योग्य क्षेत्रफल 14.26 लाख वर्ग किलोमीटर है | तो कायिक
घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
कायिक
घनत्व = 121 करोड़ / 14.26 लाख वर्ग
किलोमीटर = 848
व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर
3. कृषीय
घनत्व
किसी क्षेत्र की कुल कृषीय जनसंख्या (कृषि
कार्यों में लगे लोग) तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कृषीय घनत्व कहते है | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा
व्यक्त किया जाता है |
कृषीय घनत्व = कुल कृषीय जनसंख्या जनसंख्या/
शुद्ध कृषि क्षेत्र
उदाहरण के लिए भारत की कुल जनसंख्या लगभग 150,000
है तथा शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्रफल 100 वर्ग
किलोमीटर है | तो कृषीय घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
कृषीय
घनत्व = 150,000 / 100 = 1500 व्यक्ति प्रति
वर्ग किलोमीटर
जनसंख्या वृद्धि
जनसंख्या
वृद्धि दो समय बिंदुओं के बीच किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की संख्या
में परिवर्तन को कहते हैं | इसकी दर को प्रतिशत में अभिव्यक्त किया जाता है |
जनसंख्या वृद्धि के दो घटक होते हैं |
जिनके
नाम है | प्राकृतिक (Natural) जनसंख्या वृद्धि और अभिप्रेरित (Induced) )
जनसंख्या वृद्धि |
प्राकृतिक
(Natural) जनसंख्या वृद्धि
प्राकृतिक
वृद्धि का विश्लेषण अशोधित जन्म और मृत्यु दरों से निर्धारित किया जाता है |
अभिप्रेरित
(Induced) ) जनसंख्या
वृद्धि
अभिप्रेरित
घटकों को किसी दिए गए क्षेत्रों में लोगों के अंतर्वर्ती और बहिर्वर्ती संचलन की
प्रबलता (प्रवास की प्रबलता) द्वारा स्पष्ट किया जाता है |
भारत में जनसंख्या वृद्धि की प्रावस्थाएँ (अवस्थाएँ)
भारत
की जनसंख्या के दोनों दशकीय और वार्षिक वृद्धि दर बहुत ऊँचे हैं और समय के साथ नित्य बढ़ रहे है | भारत की
जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.64 प्रतिशत है | विगत एक शताब्दी में भारत में
जनसंख्या की वृद्धि वार्षिक जन्म दर और मृत्यु दर तथा प्रवास की दर के कारण हुई है
और इसलिए यह वृद्धि विभिन्न प्रवृतियों को दर्शाती है | इस अवधि में वृद्धि की चार
सुस्पष्ट प्रावस्थाओं को पहचाना गया है |
जो निम्नलिखित हैं |
सन् 1901 से 1921बीच
की अवधि (रूद्ध अथवा स्थिर प्रावस्था)
1)
सन् 1901 से 1921 के बीच की अवधि को भारत की
जनसंख्या की वृद्धि की रूद्ध अथवा स्थिर प्रावस्था कहा जाता है |
2)
इस अवधि में जनसंख्या वृद्धि दर अत्यंत निम्न
थी |
3)
1911 से 1921 के दौरान ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि
दर्ज की गई |
4)
इस प्रावस्था में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों
ऊँचे थे | जिससे वृद्धि दर निम्न बनी रही |
5)
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं का निम्न स्तर,
अधिकतर लोगों की निरक्षरता, भोजन और अन्य आधारभूत आवश्यकताओं का अपर्याप्त वितरण होना
इस अवधि में उच्च जन्म और मृत्यु दरों के लिए उत्तरदायी थे |
सन् 1921 से
1951बीच की प्रावस्था (स्थिर वृद्धि की अवधि)
1)
1921 से 1951 के दशकों को जनसंख्या की स्थिर वृद्धि
की अवधि के रूप मे जाना जाता है |
2)
इस अवधि मे देश भर
में स्वास्थ्य और स्वच्छता में व्यापक सुधारों ने मृत्यु दर को नीचे ला दिया था |
3)
बेहतर परिवहन और
संचार तंत्र से वितरण प्रणाली में सुधार हुआ | फलस्वरूप अशोधित जन्म दर ऊँची बनी
रही जिससे पिछली प्रावस्था की तुलना में वृद्धि दर उच्चतर हुई |
4)
1920 के दशक की महान
आर्थिक मंदी और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में यह वृद्धि प्रभावशाली थी |
सन् 1951 से
1981बीच की प्रावस्था (जनसंख्या विस्फोट की अवधि)
1)
1951 से 1981 के दशकोण को भारत में जनसंख्या
विस्फोट की अवधि के रूप में जाना जाता है |
2)
यह देश में मृत्यु दर में तीव्र ह्रास और
जनसंख्या की उच्च प्रजनन दर के कारण हुआ |
3)
इस अवधि में औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.2
प्रतिशत तक ऊँची बनी रही |
4)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यही वह अवधि
जिसमें एक केन्द्रीकृत नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से विकसात्मक कार्यों को आरंभ
किया गया | अर्थव्यवस्था सुधरने लगी | जिससे अधिकांश लोगों के जीवन की दशाओं से
सुधार सुनिश्चित हुआ |
5)
परिणाम स्वरूप जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि
उच्च रही और वृद्धि दर उच्चतर बनी रही |
6)
इन सबके अतिरिक्त तिब्बतियों, बांगलदेशियों,
नेपाल को देश में लाने वाले बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय प्रवास और यहाँ तक कि पाकिस्तान से आने वाले लोगों ने
भी उच्च वृद्धि दर में योगदान दिया |
सन् 1981से
वर्तमान तक की अवधि (घटती जनसंख्या वृद्धि कि अवस्था )
1)
1981 के पश्चात से वर्तमान तक की जनसंख्या की
वृद्धि दर यद्यपि ऊँची बनी रही| परंतु
इसमें धीरे –धीरे मंद गति से घटने की प्रवृति आने लगी थी |
2)
ऐसी जनसंख्या वृद्धि के लिए अशोधित जन्म दर की
अधोमुखी (नीचे गिरती हुई) प्रवृति को उत्तरदायी माना जाता है |
3)
जनसंख्या वृद्धि की यह दर देश में विवाह के
समय की औसत आयु में वृद्धि, जीवन की गुणवत्ता विशेष रूप से स्त्री शिक्षा में
सुधार से प्रभावित हुई |
देश में जनसंख्या की वृद्धि दर अभी भी ऊँची बनी हुई है और
विश्व विकास रिपोर्ट द्वारा यह अनुमान किया गया है कि 2025 ई० तक भारत की जनसंख्या
135 करोड़ को स्पर्श करेगी |
जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय भिन्नताएँ
देश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में वृद्धि दर में
विस्तृत भिन्नताएँ पाई जाती हैं | 1991-2001
के दौरान भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनसंख्या की वृद्धि दर
सुस्पष्ट प्रतिरूप दर्शाती है |
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश,
ओडिशा, पुदुच्चेरी और गोवा जैसे राज्यों में निम्न वृद्धि दर देखने को मिलती है | जो
की 1991-2001 के दशक में 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हुई | केरल में 9% की वृद्धि दर
देश में सबसे कम थी |
देश के उत्तरी –पश्चिमी, उत्तरी और
उत्तर मध्य भागों में पश्चिम से पूर्व स्थित राज्यों की एक सतत पेटी में दक्षिण के
राज्यों की अपेक्षा उच्च वृद्धि पाई गई थी | इस पेटी के राज्यों जैसे गुजरात,
महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश,
सिक्किम, असम, पश्चिमी बंगाल, बिहार, छतीसगढ़ और झारखंड में औसत वृद्धि दर 20 -25
प्रतिशत रही थी |
वर्ष 2001से 2011 के दशक के दौरान सभी
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पिछले दशक (1991-2001) की तुलना में
जनसंख्या वृद्धि दर धीमी रही है | देश के छः सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्यों उत्तर
प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिमी बंगाल, आंध्रप्रदेश और मध्य प्रदेश में भी
1991-2001 की तुलना में दशकीय वृद्धि दर कम रही है |
आंध्रप्रदेश में सबसे कम(3.5%) तक
महाराष्ट्र में सर्वाधिक (6.7%)गिरावट थी | जबकि तमिलनाडु (3.9%), तथा पुदुच्चेरी (7.1%)
में पिछले दशक की तुलना में कुछ जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई है |
भारत में किशोर जनसंख्या
भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसके
किशोरों की वृद्धि है | वर्तमान में किशोरों अर्थात 10-19 वर्ष का आयु वर्ग का अंश
20.9 प्रतिशत है, (2011), जिसमें 52.7 प्रतिशत किशोर और 47.3 प्रतिशत किशोरियाँ
सम्मिलित हैं |
किशोरों की समस्याएं
किशोर जनसंख्या, यद्यपि उच्च संभावनाओं से युक्त युवा
जनसंख्या समझी जाती है, यदि उन्हें समुचित ढंग से मार्गदर्शित और दिशा निर्देशित न
किया जाए तो वे काफी सुभेद्य (Vulnerable) भी होते हैं | जहाँ तक इस
किशोरों का संबंध है समाज के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं | जिनमें से कुछ विवाह की
निम्न आयु, निरक्षरता, विशेषत: स्त्री निरक्षरता, विद्यालय विरत छात्र (School Dropout), पोषकों की निम्न ग्राह्यता, किशोरी
माताओं में उच्च मातृ मृत्यु दर, एच० आई० वी० / एड्स के संक्रमण की उच्च दरें,
शारीरिक और मानसिक अपंगता अथवा मंदता, औषध
दुरुपयोग और मदिरा सेवन किशोर अपचार और अपराध करना इत्यादि हैं | इन तथ्यों को
दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार ने किशोर वर्गों को उपयुक्त शिक्षा प्रदान करने के
लिए कुछ निश्चित नीतियाँ बनाई हैं ताकि उनके गुणों का बेहतर मार्गदर्शन और उपयुक्त
उपयोग किया जा सके | राष्ट्रीय युवा नीति एक ऐसा उदाहरण है जिसे हमारी विशाल, युवा
और किशोर जनसंख्या के समय समग्र विकास की देखरेख हो हेतु अभिकल्पित किया गया है |
भारत सरकार द्वारा किशोर जनसंख्या के लिए बनाई
गई नीतियाँ
राष्ट्रीय युवा नीति (NYP-2014)
फरवरी 2014 में आरंभ की गई है जो भारत के युवाओं के लिए एक समग्र दूरदर्शी
प्रस्ताव रखती है | “देश के युवाओं को
अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए सक्षम बनाना और उनके द्वारा भारत को
राष्ट्रों के समूह में अपना उचित स्थान प्राप्त करने में सक्षम बनाना है |”
राष्ट्रीय युवा नीति 2014, 15-29 वर्ष के आयु समूह के व्यक्ति को ‘युवा’ के रूप
में परिभाषित करती है |
भारत सरकार ने 2015 में कौशल विकास तथा
उद्यमिता के लिए नीति बनाई है, जिसका उद्देश्य देश भर में हो रही कौशल से संबंधित
गतिविधियों के लिए एक रूप रेखा प्रदान करना है, साथ ही साथ इन सभी गतिविधियों को
एक मानक के साथ बाँधना तथा विभिन्न कौशलों को इनके भाग –केंद्रों के साथ जोड़ना है
|
जनसंख्या संघटन
जनसंख्या संघटन, जनसंख्या भूगोल के अंतर्गत अध्ययन का एक
सुस्पष्ट क्षेत्र है जिसमें आयु व लिंग का
विश्लेषण, निवास का स्थान, मानव जातीय लक्षण, जनजातियाँ, भाषा, धर्म, वैवाहिक
स्थिति, ससखरता और शिक्षा, व्यवसायिक
विशेताएँ आदि का अध्ययन किया जाता है |
भारत में ग्रामीण-नगरीय संघटन (भारत की जनसंख्या का ग्रामीण नगरीय संघटन)
अपने- अपने निवास स्थानों के अनुसार जनसंख्या का संघटन
सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं का एक महत्वपूर्ण सूचक है | जब देश की कुल जनसंख्या
का 68.8 (2011 की जनगणना के अनुसार )
प्रतिशत भाग गावों में रहता हो तब यह और सार्थक हो जाता है |
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में
6,40,867 गाँव हैं जिनमें से 5.97.608 (93.2 प्रतिशत) गाँव ही बसे हुए हैं | फिर
भी पूरे देश में ग्रामीण जनसंख्या का वितरण समान नहीं है |
हिमाचल प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में
ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत बहुत अधिक है | गोवा और मिजोरम राज्यों की कुल
जनसंख्या का आधे से कुछ अधिक भाग गाँवों में बसता है | दूसरी ओर दादरा और नगर
हवेली (53.38 प्रतिशत) को छोड़कर केंद्र –शासित प्रदेशों का लघु अनुपात ही ग्रामीण
जनसंख्या का है | गाँवों का आकार भी काफी हद तक भिन्न है |
उत्तर –पूर्वी भारत के पहाड़ी राज्यों,
पश्चिमी राजस्थान और कच्छ के रन में यह 200 व्यक्तियों से कम और केरल व महाराष्ट्र
के कुछ भागों में यह 17,000 व्यक्ति तक पाया जाता है |
भारत की ग्रामीण जनसंख्या के वितरण के
प्रतिरूप का सम्पूर्ण परीक्षण उजागर करता है कि
अंतर –राज्य और अंत:राज्य दोनों स्तरों पर नगरीकरण का सापेक्षिक परिमाण और ग्रामीण –नगरीय प्रवास का विस्तार ग्रामीण जनसंख्या के सांद्रण को नियंत्रित करते हैं |
ग्रामीण जनसंख्या के विपरीत भारत में
नगरीय जनसंख्या का अनुपात 31.16 प्रतिशत है जो काफी निम्न है | किन्तु पिछले दशकों
में यह वृद्धि बहुत तीव्र दर को दर्शाती है | नगरीय जनसंख्या की वृद्धि दर संवृद्ध
आर्थिक विकास, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी दशाओं में सुधार के कारण तेजी से बढ़ी
है | कुल जनसंख्या की भाँति नगरीय जनसंख्या के वितरण में भी पूरे देश में भिन्नताएँ पाई जाती हैं |
फिर भी ऐसा देखा गया है कि लगभग सभी राज्यों और केंद्र
शासित प्रदेशों में नगरीय जनसंख्या काफी बढ़ी है | यह सामाजिक आर्थिक दशाओं के
संदर्भ में नगरीय क्षेत्रों के विकास और ग्रामीण –नगरीय प्रवास की बढ़ी हुई दर
दोनों को इंगित करता है |
उत्तरी भारत के मैदानों में मुख्य सड़कों के मिलन बिंदुओं
और रेलमार्गों से सटे हुए नगरीय क्षेत्रों , कोलकाता, मुंबई, बैंगलूरू –मैसूर, मदुरै –कोयंबटूर, अहमदाबाद-सूरत, दिल्ली , कानपुर
और लुधियाना –जालंधर में ग्रामीण –नगरीय प्रवास सुस्पष्ट देखने को मिलता है |
कृषि की दृष्टि से प्रगतिरुद्ध मध्य और
निम्न गंगा के मैदानों, तेलंगाना, असिंचित पश्चिमी राजस्थान, उत्तर –पूर्व के दूर –दराज
के पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों, प्रायद्वीपीय भारत के बाढ़ संभावित क्षेत्रों और
मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में नगरीकरण का स्तर निम्न रहा है |
नगरीय जनसंख्या के अत्यंत उच्च और अत्यंत निम्न
अनुपात वाले राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की पहचान कीजिए |
नगरीय जनसंख्या के अत्यंत उच्च अनुपात वाले
राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश
दिल्ली, चंडीगढ़, दमन और दीव, लक्षद्वीप, पुदुच्चेरी, तथा गोवा
नगरीय जनसंख्या के अत्यंत निम्न अनुपात वाले
राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश
हिमाचल प्रदेश, बिहार, असम, ओडिसा, मेघालय, उत्तर प्रदेश,
अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, झारखंड तथा छतीसगढ़ |
भारत की जनसंख्या का भाषाई संघटन
भारत एक भाषाई विविधता की भूमि है | ग्रियर्सन के अनुसार
(भारत का भाषाई सर्वेक्षण, 1903-1928) देश में 179 भाषाएँ और 544 के लगभग बोलियाँ
थी | आधुनिक भारत के संदर्भ में संविधान में 22 भाषाएँ अनुसूचित हैं और अनेक
भाषाएँ गैर – अनुसूचित हैं | अनुसूचित भाषाओं में हिन्दी बोलने वाले लोगों का
प्रतिशत सर्वाधिक है | जबकि 2011 के अनुसार लघुतम भाषा वर्ग संस्कृत, बोड़ो तथा
मणिपुरी बोलने वालों के हैं | देश में भाषाई प्रदेशों की सीमाएँ सुनिश्चित और
स्पष्ट नहीं हैं बल्कि इन भाषाओं का अपने – अपने सीमांत प्रदेशों में क्रमिक विलय
और अध्यारोपण हो जाता है |
भारतीय भाषाओं का वर्गीकरण
भाषाई वर्गीकरण प्रमुख भारतीय भाषाओं के बोलने वाले चार
भाषा परिवारों से जुड़े हुए हैं | जिनके उप-परिवार, शाखाएँ अथवा वर्ग हैं| इसे
निम्न तालिका से बेहतर ढंग से समझा ज सकता है |
तालिका:
आधुनिक भारतीय भाषाओँ का वर्गीकरण
|
परिबार |
उप परिवार |
शाखा/वर्ग |
वाक् क्षेत्र |
|
आस्ट्रिक (निषाद) 1.38% |
आस्ट्रो-एशियाई आस्ट्रो-नेशियन |
मॉन खमेर मुंडा -- |
मेघालय, निकोबार द्वीप समूह पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा ,असम, मध्य प्रदेश,
महाराष्ट्र भारत से बाहर |
|
द्रविड़ (20%) |
-- |
दक्षिण द्रविड़ मध्य द्रविड़ उत्तर द्रविड़ |
तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश |
|
चीनी –तिब्बती (किरात) (0.85 %) |
तिब्बती – म्यांमारी सियामी –चीनी |
तिब्बती –हिमलायी उत्तरी असम असम –म्यांमारी |
जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम अरुणाचल प्रदेश असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय |
|
भारतीय –यूरोपीय (आर्य) (73%) |
इंडो –आर्य |
ईरानी (फारसी) दरदी भारतीय आर्य |
भारत से बाहर जम्मू और कश्मीर जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश,
राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात
महाराष्ट्र और गोवा |
स्त्रोत – एजाजुद्दीन अहमद (1999), सामाजिक भूगोल, रावत
पब्लिकेशन, नई दिल्ली
भारत की जनसंख्या का धार्मिक संघटन
धर्म सर्वाधिक भारतीयों के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को
प्रभावित करने वाले प्रमुख बलों में से एक है | क्योंकी धर्म लोगों के परिवार और
सामुदायिक जीवन के लगभग सभी पक्षों में आभासी रूप से व्याप्त होता है | भारत के
धार्मिक समूह के वितरण को हम निम्न तथ्यों से समझ सकते हैं |
(क.)
देश में धार्मिक समुदायों का स्थानिक वितरण
दर्शाता है कि कुछ निश्चित राज्यों और जिलों में एक धर्म की संख्यात्मक प्रबलता
विशाल है, जबकि उसी का दूसरे राज्यों में प्रतिनिधित्व नगण्य है |
(ख.)
भारत बांग्लादेश सीमा व भारत पाक सीमा से
संलग्न जिलों, जम्मू और कश्मीर, उत्तर पूर्व के पर्वतीय राज्यों और दक्कन पठार व
गंगा के मैदान के प्रकीर्ण क्षेत्रों को छोड़कर हिन्दू अनेक राज्यों में एक प्रमुख
समूह के रूप वितरित है | इन राज्यों में हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों का
प्रतिशत 70 से 90 प्रतिशत तक और उससे अधिक
है |
(ग.)
विशालतम धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिम जम्मू और
कश्मीर, पश्चिम बंगाल और केरल के कुछ जिलों, उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों, दिल्ली
में व उसके आस पास और लक्षद्वीप में सांद्रित है |
(घ.)
ईसाई जनसंख्या अधिकांशत: देश के ग्रामीण
क्षेत्रों में वितरित है | मुख्य सांद्रण पश्चिमी तट के साथ, गोआ एवं केरल और
मेघालय, मिजोरम और नागालैंड के पहाड़ी क्षेत्रों, छोटा नागपुर क्षेत्र और मणिपुर की
पहाड़ियों में भी देखा जाता है |
(ङ.)
अधिकांश सिक्ख देश के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र
विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में सकेंद्रित हैं |
(च.)
भारत के सबसे छोटे धमिक समूह जैन और बौद्ध देश
के गिने –चुने क्षेत्रों में सकेंद्रित हैं | जैनियों का प्रमुख सकेन्द्रण
राजस्थान के नगरीय क्षेत्रों, गुजरात और महाराष्ट्र में हैं जबकि बौद्ध अधिकांशत:
महाराष्ट्र में सकेंद्रित हैं | बौद्ध बाहुल्य अन्य क्षेत्र सिक्किम, अरुणाचल
प्रदेश, जम्मू और कश्मीर में लद्दाख, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में लाहुल और
स्पिती हैं |
(छ.)
भारत के अन्य धर्मों में जरतुश्त (पारसी),
जनजातीय एवं अन्य देशज निष्ठाएँ और विश्वास सम्मिलित हैं | ये समूह छोटे समूह में
सकेंद्रित हैं और देश भर में बिखरे हुए हैं |
भारत में
धार्मिक समूहों के प्रतिशत को हम निम्नलिखित तालिका से समझ सकते हैं |
तालिका:
भारत के धार्मिक समुदाय (2011)
|
धार्मिक समुदाय |
2011 की जनगणना के अनुसार प्रतिशत |
|
|
जनसंख्या
मिलियन में |
जनसंख्या
का प्रतिशत |
|
|
हिंदू |
966.3 |
79.8% |
|
मुस्लिम |
172.2 |
14.2 |
|
ईसाई |
27.8 |
2.3 |
|
सिक्ख |
20.8 |
1.7 |
|
बौद्ध |
8.4 |
0.7 |
|
जैन |
4.5 |
0.4 |
|
अन्य धर्म |
7.9 |
0.7 |
|
धर्म ज्ञात
नहीं |
2.9 |
0.2 |
स्त्रोत :
भारत की जनगणना (2011)
धर्म और भू
दृश्य
धर्म और भू दृश्य भू
दृश्य पर धर्मों की औपचारिक अभिव्यक्ति पवित्र संरचनाओं, कब्रिस्तान के उपयोग और
पौधों के समुच्चय , धार्मिक उद्देश्यों के लिए वृक्षों के निकुंजों के माध्यम से
प्रकट होती है | पवित्र संरचनाएं पूरे देश में व्यापक रूप में वितरित हैं | ये
अस्पष्ट ग्रामीण समाधियों से लेकर विशाल हिंदू मंदिरों, स्मरणार्थ मस्जिदों अथवा
महानगरों में शोभायमान ढंग से अभिकल्पित (डिजाइन किया हुआ ) बड़े गिरिजाघर तक हो
सकते हैं | क्षेत्र के संपूर्ण भू –दृश्य कों एक विशेष आयाम प्रदान करते हुए इन
मंदिरों गुरुद्वारों मठों और गिरिजाघरों के आकार –प्रकार, स्थान- प्रयोग और संख्या में भिन्नता पाई जाती हैं |
श्रमजीवी
जनसंख्या का संघटन
जनसंख्या का व्यवसायिक संघटन का वास्तव
में अर्थ किसी व्यक्ति के खेती, विनिर्माण, व्यापार , सेवाओं अथवा किसी भी प्रकार
की व्यवसायिक क्रियाओं में लगे होने से है | आर्थिक स्तर की दृष्टि से भारत की जनसंख्या कों
तीन वर्गों में बाँटा जाता है | जिनके नाम है | मुख्य श्रमिक, सीमांत श्रमिक और अश्रमिक |
श्रमिकों के प्रकार
मुख्य श्रमिक : मुख्य श्रमिक
वह व्यक्ति है जो एक वर्ष में कम से कम 183 दिन या छ: महीनें काम करता
है |
सीमांत श्रमिक : सीमांत श्रमिक वह व्यक्ति है जो एक
वर्ष में 183 दिनों या छ : महीने से कम दिन काम करता है |
भारत में श्रमिकों कों मुख्य और सीमांत
दोनों का अनुपात 2011के
अनुसार 39.8 प्रतिशत है जबकि 60 प्रतिशत की विशाल
संख्या अश्रमिकों की है | यह आर्थिक स्तर
कों इंगित करता है जिसमें एक बड़ा अनुपात आश्रित जनसंख्या का है, जो आगे बेरोजगार
और अल्प रोजगार प्राप्त लोगों की बड़ी संख्या के होने की संभावना की ओर इशारा करता
है |
राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों
श्रमजीवी जनसंख्या का अनुपात लक्षद्वीप में लगभग 29.1 प्रतिशत हिमाचल प्रदेश में लगभग 51.9 प्रतिशत सामान्य भिन्नता दर्शाता
है |
श्रमिकों के अपेक्षाकृत अधिक प्रतिशत
वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, छतीसगढ़, आंध्रपद्रेश, कर्नाटक, अरुणाचल
प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय हैं |इसी प्रकार केन्द्र शासित प्रदेशों दादरा
और नगर हवेली तथा दमन और दीव की प्रतिभागिता दर ऊँची है |
भारत जैसे देश के संदर्भ में ऐसा समझा
जाता है कि आर्थिक विकास के निम्न स्तरों वाले क्षेत्रों में श्रम की सहभागिता दर
ऊँची है क्योंकि निर्वाह अथवा लगभग निर्वाह की आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन के लिए
अनेक कामगारों की जरूरत पडती है |
तालिका: भारत में श्रम –शक्ति का सेक्टर वार संघटन (2011)
|
संवर्ग |
जनसंख्या |
|||
|
व्यक्ति |
कुल श्रमिकों का
प्रतिशत |
पुरुष |
स्त्री |
|
|
प्राथमिक |
26,30,22,473 |
54.6 |
16,54,47,075 |
9,75,75,398 |
|
द्वितीयक |
1,83,36,307 |
3.8 |
97,75,635 |
85,60,672 |
|
तृतीयक |
20,03,84,531 |
41.6 |
15,66,43,220 |
4,37,41,311 |
भारत की जनसंख्या का व्यवसायिक संघटन द्वितीयक
और तृतीयक सेक्टरों की तुलना में प्राथमिक सेक्टर के श्रमिकों के बड़े अनुपात कों
दर्शाता है | कुल श्रमजीवी जनसंख्या का लगभग 54.6 प्रतिशत कृषक और कृषि
मजदूर हैं | जबकि 3.8 प्रतिशत लोग श्रमिक, घरेलू उद्योगों
में लगे है | और 41.6 प्रतिशत अन्य श्रमिक हैं | जो गैर –घरेलू उद्योगों, व्यापार, वाणिज्य,
विनिर्माण और मरम्मत तथा अन्य सेवाओं में कार्यरत हैं |
जहाँ तक देश की पुरुष और स्त्री जनसंख्या
के व्यवसाय का प्रश्न है | पुरुष श्रमिकों की संख्या स्त्री श्रमिकों की संख्या से
तीनों सेक्टरों में अधिक है | महिला श्रमिकों की संख्या प्राथमिक सेक्टर में
अपेक्षाकृत अधिक है यद्यपि विगत कुछ वर्षों में महिलाओं की द्वितीयक और तृतीयक
सेक्टरों की सहभागिता में सुधार हुआ है |
पिछले कुछ दशकों में भारत में कृषि
सेक्टर के श्रमिकों के अनुपात में उतार दिखाई दिया है | (2001
में 58.2 प्रतिशत से 2011में 54.6 प्रतिशत)| परिणाम स्वरूप,
द्वितीयक और तृतीयक सेक्टर में सहभागिता दर बढ़ी है यह श्रमिकों की खेत –आधारित
रोजगारों पर निर्भरता से गैर –खेत आधारित रोजगारों पर निर्भरता कों इंगित करता है
| यह देश की अर्थव्यवस्था में सेक्टर स्थानांतरण है |
देश के विभिन्न सेक्टरों में श्रम
सहभागिता दर की स्थानिक भिन्नता है | उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश और नागालैंड
जैसे राज्यों में कृषकों की संख्या बहुत अधिक है | दूसरी ओर बिहार, आंध्रप्रदेश,
छतीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कृषि
मजदूरों की संख्या अधिक है | दिल्ली, चंडीगढ़ और पुदुच्चेरी जैसे नगरी कृत
क्षेत्रों में श्रमिकों का बहुत बड़ा अनुपात अन्य सेवाओं में लगा हुआ है | यह न
केवल सीमित कृषि भूमि की उपलब्धता कों बल्कि बृहत स्तर पर होने वाले नगरीकरण और
औद्योगिकरण द्वारा गैर –कृषि सेक्टरों में और अधिक श्रमिकों की आवश्यकता कों भी
इंगित करता है |
व्यवसायिक संवर्ग
सन् 2011 कीजनगणना ने भारत की श्रमजीवी जनसंख्या
कों चार प्रमुख संवर्गों में बाँटा है |
(1) कृषक , (2) कृषि मजदूर, (3) घरेलू
औद्योगिक श्रमिक तथा (4S) अन्य श्रमिक
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” सामाजिक अभियान के द्वारा
जेंडर के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा
समाज का विभाजन पुरुष, महिला और ट्रांसजेडर में प्राकृतिक
और जैविक रूप से माना जाता है | लेकिन वास्तव में समाज सब के लिएबलग-अलग भूमिका
निर्धारित करता है और ये भूमिकाएँ फिर से सामाजिक संस्थाओं द्वारा सुदृढ़ कर दी
जाती है | जिसके फलस्वरूप ये जैविक विभिनताएँ सामाजिक अलगाव तथा बहिष्कार का आधार
बन जाती है | आधी से ज्यादा जनसंख्या का बहिष्करण किसी भी विकास शील और सभ्य समाज
के लिए एक गंभीर समस्या है |यह एक वैश्विक चुनौती है | जिसको संयुक्त राष्ट्र
विकास कार्यक्रम (UNDP) ने संज्ञान में लिया है |
यू० एन० डी ० पी० के अनुसार यदि विकास
में सभी जेंडर सम्मिलित नहीं हैं तो ऐसा विकास लुप्तप्राय है | (HDR UNDP 1995) | समान्य जन में किसी भी प्रकार का भेदभाव और विशेष रूप से जेंडर के
आधार पर भेदभाव, मानवता के प्रति एक अपराध है | इसलिए सभी के लिए शिक्षा, रोजगार,
राजनीतिक प्रतिनिधत्व में समान अवसर, समान कार्य के लिए समान वेतन, स्वाभिमान के
साथ जीवन जीने का अवसर सभी को मिलें, इसके लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता
है | जो समाज इन सभी भेदभाव तथा बुराइयों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम नहीं
उठाता है, वह एक सभ्य समाज नहीं कहा ज सकता | भारत सरकार ने इन सभी को संज्ञान में
लेते हुए तथा भेदभाव से होने वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय
स्तर पर “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” सामाजिक अभियान चलाया है |