अध्याय 3 भू
संसाधन तथा कृषि
कक्षा 12वीं
(भूगोल)
पुस्तक: भारत
अर्थव्यवस्था तथा लोग
भारत में भू उपयोग वर्गीकरण के महत्वपूर्ण तथ्य
1. भू
राजस्व विभाग भू –उपयोग संबंधी अभिलेख रखता है |
2. भू
–उपयोग संवर्गों का योग कुल प्रतिवेदन (रिपोर्टिंग) क्षेत्र के बराबर होता है | जो
कि भौगोलिक क्षेत्रों से भिन्न है |
3. भारत
की प्रशासकीय इकाइयों के भौगोलिक क्षेत्र की सही जानकारी देने का दायित्व भारतीय
सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) पर है | इसके लिए भारत का भू सर्वेक्षण विभाग
विशेष तरह के मानचित्र बनाता है जिन्हें स्थलाकृतिक मानचित्र कहते हैं |
4. भूराजस्व
तथा सर्वेक्षण विभाग दोनों में मूलभूत अन्तर यह है कि भूराजस्व द्वारा प्रस्तुत
क्षेत्रफल पत्रों के अनुसार रिपोर्टिग क्षेत्र पर आधारित है | जो कि कम या अधिक हो
सकती है | जबकि कुल भौगोलिक क्षेत्र भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सर्वेक्षण पर
आधारित है तथा यह स्थाई है |
प्रश्न: भारत में भू राजस्व विभाग द्वारा भू-उपयोग वर्गीकरण कों वर्णन करें |
उत्तर:
भू राजस्व विभाग द्वारा अभिलेख किया गया भू –उपयोग वर्गीकरण का उल्लेख निम्न प्रकार से है |
वनों के अधीन क्षेत्र (Area
under Forest ) :
यह
जानना आवश्यक है कि वर्गीकृत वन क्षेत्र तथा वनों के अंतर्गत वास्तविक क्षेत्र
क्षेत्र दोनों अलग हैं | सरकार द्वारा वर्गीकृत वन क्षेत्र का सीमांकन इस प्रकार
किया कि जहाँ वन विकसित हो सकते हैं वह वन के अधीन क्षेत्र हैं | भू –राजस्व
अभिलेखों में इसी परिभाषा कों सतत अपनाया गया है | इस प्रकार इस संवर्ग के
क्षेत्रफल में वृद्धि दर्ज हो सकती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वहाँ
वास्तविक रूप से वन पाए जायेंगे |
बंजर
व व्यर्थ –भूमि (Barren and wastelands) :
वह
भूमि जो प्रचलित प्रौद्योगिकी मदद से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती, जैसे –बंजर
पहाड़ी भू भाग, मरुस्थल, खड्ड आदि कों कृषि
अयोग्य व्यर्थ –भूमि में वर्गीकृत किया गया है |
गैर
कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि (Land put to
Non-agricultural uses) :
इस संवर्ग में बस्तियाँ (ग्रामीण व शहरी)
अवसंरचना, (सडकें, नहरे आदि ) उद्योगों, दुकानों आदि हेतु भू –उपयोग सम्मलित हैं | द्वितीयक व तृतीयक कार्यकलापों
में वृद्धि से इस संवर्ग के भू –उपयोग में वृद्धि होती है |
स्थाई
चरागाह क्षेत्र (Permanent pastures) :
इस
प्रकार की अधिकतर भूमि पर ग्राम पंचायत या सरकार का स्वामित्व होता है | इस भूमि
का केवल एक छोटा भाग निजी स्वामित्व में होता है | ग्राम पंचायत के स्वामित्व वाली
भूमि कों ‘साझा संपत्ति संसाधन’ कहा जाता है |
विवध
तरु –फसलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र (Area
under miscellaneous tree crops and groves) :
इस
संवर्ग में वह भूमि सम्मिलित है जिस पर उद्यान व फलदार वृक्ष हैं | यह भूमि बोये
गए निवल क्षेत्र में सम्मिलित नहीं की जाती है |
इस प्रकार की अधिकतर भूमि व्यक्तियों के निजी स्वामित्व में हैं |
कृषि
योग्य व्यर्थ भूमि (Culturable waste land) :
वह
भूमि जो पिछले पाँच वर्षों तक या अधिक समय
तक परती या कृषि रहित है, इस संवर्ग में सम्मिलित की जाती है | भूमि उद्धार तकनीक
द्वारा इसे सुधार कर कृषि योग्य बनाया जा सकता है |
वर्तमान
परती भूमि (Current Fallow):
वह
भूमि जो एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित रहती है, वर्तमान परती भूमि
कहलाती है | भूमि की गुणवत्ता बनाए रखने हेतु भूमि का परती रखना एक सांस्कृतिक चलन
है | इस विधि से भूमि की क्षीण हुई उर्वरता या पौष्टिकता प्राकृतिक रूप से वापस आ
जाती है |
पुरातन
परती भूमि (Fallow land other than current fallow)
यह
भी कृषि योग्य भूमि है जो एक वर्ष से अधिक लेकिन पाँच वर्षों से कम समय तक कृषि
रहित रहती है | अगर कोई भू भाग पाँच वर्ष से अधिक समय तक कृषि रहित रहता है तो इसे
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में शामिल कर दिया जाता है |
निवल
(शुद्ध) बोया गया क्षेत्र (Net Area Sown):
वह
भूमि जिस पर वर्ष में कम से कम एक बार खेती की गई हो उसे निवल (शुद्ध) बोया गया
क्षेत्र कहते है |
प्रश्न : सकल बोया गया क्षेत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब शुद्ध बोया गया क्षेत्र में उसे क्षेत्र कों भी जोड़ दिया जाता है जिस पर एक से
अधिक बार फसल उगाई गई हो तो उसे सकल बोया गया क्षेत्र कहते है |
प्रश्न: किसी भी क्षेत्र में भू –उपयोग किस पर निर्भर है ? भू –उपयोग
कों प्रभावित करने वाले अर्थव्यवस्था के तीन परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए |
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में भू –उपयोग, अधिकतर वहाँ की आर्थिक क्रियाओं की प्रवृति पर
निर्भर है | यद्यपि समय के साथ आर्थिक क्रियाओं में बदलाव आता रहता है | लेकिन
भूमि अन्य बहुत से संसाधनों की भाँति, क्षेत्रफल की दृष्टि से स्थायी है | इसलिए हमें
भू –उपयोग कों प्रभावित करने वाले अर्थव्यवस्था के तीन परिवर्तनों कों समझना चाहिए
| ये परिवर्तन निम्न प्रकार से हैं |
1. अर्थव्यवस्था
के आकार कों उत्पादित वस्तुओं तथा मूल्य के संदर्भ में समझा जाता है |
अर्थव्यवस्था का आकार समय के साथ बढ़ता है जो बढ़ती जनसँख्या बदलते आय –स्तर, उपलब्ध
प्रौद्योगिकी व इसी से मिलते –जुलते कारकों पर निर्भर है | परिणामस्वरूप समय के
साथ भूमि पर दबाव बढ़ता है तथा सीमांत भूमि कों भी प्रयोग में लाया जाता है |
2. दूसरा,
समय के साथ अर्थव्यवस्था की संरचना में भी बदलाव होता है | दूसरे शब्दों में,
द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रकों में,
प्राथमिक क्षेत्रक की अपेक्षा अधिक
तीव्रता से वृद्धि होती है | इस प्रकार के परिवर्तन भारत जैसे विकासशील देश में एक
सामान्य बात है | इस प्रक्रिया में धीरे –धीरे कृषि भूमि गैर –कृषि संबंधित
कार्यों में प्रयुक्त होती है | इस प्रकार के परिवर्तन शहरों के चारों तरफ अधिक तीव्र
हो रहे हैं जहाँ कृषि भूमि कों इमारतों के
लिए उपयोग किया जा रहा है |
3. तीसरा,
यद्यपि समय के साथ, कृषि क्रियाकलापों का अर्थव्यवस्था में योगदान कम होता जाता है
| भूमि पर कृषि क्रियाकलापों का दबाव कम नहीं होता | कृषि –भूमि पर बढ़ते दबाव के
निम्नलिखित दो कारण हैं |
(अ) प्राय: विकासशील
देशों में कृषि पर निर्भर व्यक्तियों का अनुपात अपेक्षाकृत धीरे-धीरे घटता है जबकि
कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तीव्रता से कम होता है |
(ब) वह जनसंख्या जो कृषि क्षेत्रक पर निर्भर
होती है | प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है |
प्रश्न : भारत में वर्ष 1950-51तथा 2019-20 के आँकड़ों के आधार भू उपयोग के संवर्गों
में आए परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए |
उत्तर:
पिछले चार या पाँच दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रमुख बदलाव आए हैं |
जिससे भारत के भू –उपयोग परिवर्तन कों प्रभावित किया है | वर्ष 1950-51
तथा 2019-20 के आँकड़ों के आधार पर इस परिवर्तन कों हम समझ सकते है | इन आँकड़ों से पता
चलता है कि भू उपयोग के पाँच संवर्गों में वृद्धि व चार संवर्गों के अनुपात में कमी
दर्ज की गई है |
भू
उपयोग के पाँच संवर्ग जिनमें में वृद्धि दर्ज की गई
वन
क्षेत्र, गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि, स्थायी चरागाहें, वर्तमान परती भूमि
तथा निवल बोया गया क्षेत्र के इन पाँच संवर्गों के अनुपात में वृद्धि हुई है | इनमें
वृद्धि ने निम्न कारण हो सकते हैं |
(i)
गैर कृषि कार्यों में
प्रयुक्त क्षेत्र में वृद्धि दर अधिकतम है | इसका कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की
बदलती संरचना है, जिसकी निर्भरता औद्योगिक व सेवा सेक्टरों तथा अवसंरचना संबंधी
विस्तार पर उत्तरोत्तर बढ़ रही है | इसके अतिरिक्त गाँवों व शहरों में बस्तियों के
अंतर्गत क्षेत्रफल में विस्तार से भी इसमें वृद्धि हुई है | अत: गैर कृषि कार्यों
में प्रयुक्त भूमि का प्रसार कृषि योग्य व्यर्थ भूमि तथा कृषि भूमि की हानि पर हुआ
है |
(ii)
भू राजस्व विभाग के आँकड़ों
के अनुसार वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है परन्तु देश के वन क्षेत्र में यह वृद्धि
सीमांकन के कारण हुई है न कि देश में वास्तविक वन आच्छादित क्षेत्र के कारण |
(iii)
वर्तमान परती भूमि में
वृद्धि कों दो कारणों से समझा जा सकता है | वर्तमान परती भूमि क्षेत्र में समय
अनुसार काफी उतार –चढ़ाव की प्रवृति रही है तथा परती भूमि काफी हद तक वर्षा की
अनियमितता तथा फसल चक्र पर निर्भर है |
(iv)
कृषि हेतु कृषि योग्य व्यर्थ
भूमि के उपयोग के कारण निवल बोए गए क्षेत्र में वृद्धि एक वर्तमान घटना है | इससे
पहले निवल बोए गए क्षेत्र में धीमी गति से ह्रास दर्ज किया जाता रहा | ऐसे संकेत
हैं कि निवल बोए गए क्षेत्र कमी होने का कारण गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि
के अनुपात में वृद्धि थी |
भू
उपयोग के चार संवर्ग जिनमें में गिरावट दर्ज की गई
वे चार भू –उपयोग संवर्ग जिनमें क्षेत्रीय
अनुपात में गिरावट आई है उनमें बंजर व व्यर्थ भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, तथा
फसल वृक्षों के अंतर्गत क्षेत्र तथा पुरातन परती भूमि शामिल हैं | इनके अनुपात के
घटने की व्याख्या निम्न कारणों द्वारा की जा सकती है |
(i)
समय के साथ जैसे –जैसे कृषि
तथा गैर –कृषि कार्यों हेतु भूमि पर दबाव बढ़ा,वैसे –वैसे बंजर एवं व्यर्थ भूमि एवं
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में समय अनुसार कमी इसकी साक्षी है |
(ii)
फसल वृक्षों के अधीन क्षेत्र
में कमी का मुख्य कारण कृषि भूमि पर बढ़ता दबाव है |
प्रश्न: साझा संपत्ति संसाधन (Common
Property Resources) किस प्रकार निजी भू सम्पत्ति से भिन्न है ? साझा
संपत्ति संसाधनों का ग्रामीण क्षेत्रों
में भूमिहीन छोटे किसानों तथा महिलाओं के लिए क्या महत्व है ?
उत्तर:
भूमि के स्वामित्व के आधार पर इसे मौटे तौर पर दो वर्गों में बाँटा जाता है | निजी
भू संपत्ति तथा साझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources -
CPRs) |
(i)
पहले वर्ग की भूमि अर्थात निजी
भू सम्पत्ति पर व्यक्तियों का निजी स्वामित्व अथवा कुछ व्यक्तियों का सम्मिलित
निजी स्वामित्व होता है |
(ii)
दूसरे वर्ग की भूमियाँ अर्थात
साझा संपत्ति संसाधन सामुदायिक उपयोग हेतु राज्यों के स्वामित्व में होती हैं |
साझा
संपत्ति संसाधनों का महत्व
(i)
साझा संपत्ति संसाधन –पशुओं के
लिए चारा, घरेलु उपयोग हेतु ईंधन, लकड़ी तथा साथ ही अन्य वन उत्पाद जैसे- फल, रेशे,
गिरी,औषधीय पौधे आदि उपलब्ध कराती है |
(ii)
ग्रामीण क्षेत्रों में
भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के जीवन
यापन में इन भूमियों का विशेष महत्व है | क्योंकि इनमें से अधिकतर भूमिहीन होने के
कारण पशुपालन से प्राप्त आजीविका पर निर्भर हैं |
(iii)
महिलाओं के लिए भी इन भूमियों का विशेष महत्व है क्योंकि ग्रामीण
इलाकों में चारा व ईंधन की लकड़ी एकत्रीकरण की जिम्मेदारी महिलाओं की होती है | इन
भूमियों की कमी से उन्हें चारे तथा ईंधन की तलाश मन दूर तक भटकना पड़ता है |
(iv)
साझा संपत्ति संसाधनों कों
सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन भी कहा जा सकता है | जहाँ सभी सदस्यों कों इसके उपयोग
का अधिकार होता है | तथा इन संसाधनों पर किसी विशेष के संपत्ति अधिकार न होता
बल्कि सभी सदस्यों के कुछ विशेष कर्तव्य भी होते हैं |
(v)
सामुदायिक वन, चरागाहों,
ग्रामीण जलीय क्षेत्र तथा अन्य सार्वजनिक स्थान साझा संपत्ति संसाधन के ऐसे उदाहरण
हैं जिसका उपयोग एक परिवार से बड़ी इकाई करती है तथा यही उसके प्रबंधन के दायित्वों
का निर्वहन करती हैं |
प्रश्न: भारत में कृषि भूमि अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं ?
उत्तर:
भारत में कृषि भूमि का महत्व बहुत अधिक है जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है |
(i)
भू –संसाधनों का महत्व उन
लोगों के लिए अधिक है जिनकी आजीविका कृषि पर निर्भर है |
(ii)
द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक
क्रियाओं की अपेक्षा कृषि पूर्णतया भूमि पर आधारित है | अन्य शब्दों में, कृषि
उत्पादन में भूमि का योगदान अन्य सेक्टरों में इसके योगदान से अधिक है | अत:
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीनता प्रत्यक्ष रूप से वहाँ की गरीबी से सम्बन्धित है
|
(iii)
भूमि की गुणवत्ता कृषि
उत्पादकता कों प्रभावित करती है जो अन्य कार्यों में नहीं हैं |
(iv)
ग्रामीण क्षेत्रों में भू –स्वामित्व
का आर्थिक मूल्य के अतिरिक्त सामाजिक मूल्य भी है तथा प्राकृतिक आपदाओं या निजी
विपत्ति में एक सुरक्षा की भाँती है | यह समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाता है |
प्रश्न: भारत में कृषि भू –उपयोग के अंतर्गत किस संवर्ग की भूमि कों
शामिल किया जाता है ? भारत में भूमि बचत प्रौद्योगिकी विकसित करना आज अत्यंत
आवश्यक है क्यों ? भूमि बचत प्रौद्योगिकी के
तरीकों कों उल्लेख कीजिए |
उत्तर:
समस्त कृषि भूमि संसाधनों का अनुमान (अर्थात समस्त कृषि योग्य भूमि), निवल बोया
गया क्षेत्र तथा सभी प्रकार की परती भूमि और कृषि योग्य व्यर्थ भूमियों के योग से
लगाया जा सकता है | नीचे दी गई तालिका से हम कृषि भू उपयोग कों समझ सकते हैं |
तालिका:
भारत में समस्त कृषि योग्य भूमि की संरचना
|
कृषि योग्य भू
उपयोग |
रिपोर्टिंग क्षेत्रफल का प्रतिशत |
समस्त कृषि योग्य भूमि का प्रतिशत |
||
|
वर्ग |
1950 -51` |
2019 -20 |
1950 -51` |
2019 -20 |
|
कृषि योग्य व्यर्थ
भूमि |
8.0 |
3.9 |
13.4 |
6.8 |
|
पुरातन परती भूमि |
6.1 |
3.7 |
10.2 |
6.4 |
|
वर्तमान परती भूमि |
3.7 |
4.5 |
6.2 |
7.8 |
|
निवल बोया गया
क्षेत्र |
41.7 |
45.6 |
70.0 |
79.0 |
|
सकल कृषि योग्य
भूमि |
59.5 |
57.7 |
100.00 |
100.00 |
ऊपर
दी गई तालिका से निष्कर्ष निकलता है कि पिछले वर्षों में समस्त रिपोर्टिंग क्षेत्र
से कृषि भूमि का प्रतिशत कम हुआ है | कृषि योग्य व्यर्थ भूमि संवर्ग में कमी के
बावजूद कृषि योग्य भूमि में कमी आई है | तालिका से स्पष्ट होता है कि भारत में निवल
बोए गए क्षेत्र में बढ़ोतरी की सम्भावनाएँ सीमित हैं | अत: भूमि बचत प्रौद्योगिकी
विकसित करना आज अत्यंत आवश्यक है |
भूमि
बचत प्रौद्योगिकी दो भागों में बाँटी जा सकती है |
पहली
वह जो प्रति इकाई भूमि में फसल विशेष की उत्पादकता बढ़ाएँ तथा दूसरी वह
प्रौद्योगिकी जो एक कृषि वर्ष में गहन भू –उपयोग से सभी फसलों का उत्पादन बढ़ाएँ |
दूसरी प्रौद्योगिकी का लाभ यह है कि इसमें सीमित भूमि से भी कुल उत्पादन बढ़ने के
साथ श्रमिकों कि माँग भी पर्याप्त रूप से बढ़ती है |
भारत
जैसे देश में भूमि की कमी तथा श्रम की अधिकता है, ऐसी स्थिति में फसल सघनता की
आवश्यकता केवल भू –उपयोग हेतु वांछित है अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी
जैसी आर्थिक समस्या कों भी कम करने के लिए आवश्यक है |
प्रश्न: फसल या शस्य गहनता कों कैसे ज्ञात किया जाता है ?
उत्तर
: फसल गहनता की गणना निम्न प्रकार से की जाती है |
कृषि
(फसल) गहनता = सकल बोया गया क्षेत्र x100/ निवल
बोया गया क्षेत्र
प्रश्न: भारत
में फसली ऋतुओं का वर्णन कीजिए ? क्या दक्षिणी भारत में भी ये सभी ऋतुएँ पाई जाती
है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दें |
हमारे देश के उत्तरी
व आंतरिक भागों में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ पाई जाती है | जो खरीफ, रबी व जायद के
नाम से जानी जाती है |
(i)
खरीफ ऋतु जून से सितम्बर तक होती है | इस ऋतु
की फसलें अधिकतर दक्षिण –पश्चिम मानसून के साथ बोई जाती हैं | जिसमें उष्ण
कटिबंधीय फसलें सम्मिलित हैं, जैसे चावल, कपास, जूट , ज्वार, बाजरा तथा अरहर शामिल
हैं |
(ii)
रबी ऋतु की अक्टूबर –नवम्बर में शरद ऋतु से
प्रारम्भ होकर मार्च –अप्रैल में समाप्त होती हैं | इस समय तापमान शीतोष्ण तथा उपोष्ण
कटिबंधीय फसलों जैसे गेहूँ , चना तथा सरसों आदि फसलों की बुवाई में सहायक है |
(iii)
जायद एक अल्पकालिक ग्रीष्मकालीन फसली ऋतु है |
जो रबी की फसल की कटाई के बाद प्रारम्भ होती है | इस ऋतु में तरबूज, खीरा, ककड़ी,
सब्जियाँ व चारे की फसलों की कृषि सिंचित भूमि पर की जाती है |
(iv)
भारत के दक्षिणी भागों में इस प्रकार की अलग –अलग
ऋतुएँ नहीं पाई जाती | यहाँ का अधिकतम तापमान वर्षभर किसी भी उष्णकटिबंधीय फसल की
बुवाई में सहायक है, इसके लिए पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध होनी चाहिए | इसलिए देश के
इस भाग में जहाँ भी पर्याप्त मात्रा में सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हैं वहाँ एक वर्ष
में एक ही फसल तीन बार उगाई जा सकती है |
तालिका :
भारतीय कृषि ऋतु और उनकी फसलें
|
कृषि
ऋतु |
उत्तरी
भारत के राज्यों की प्रमुख फसलें |
दक्षिणी
भारत के राज्यों की प्रमुख फसलें |
|
खरीफ
(जून से सितम्बर) |
चावल,
कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, तथा अरहर (तुर) |
चावल,
मक्का, रागी, ज्वार तथा मूँगफली |
|
रबी
(अक्टूबर से मार्च) |
गेंहूँ,
चना, तोरई, सरसों तथा जौ |
चावल
तथा मक्का रागी, तथा मूँगफली |
|
जायद
(अप्रैल से जून) |
वनस्पति,
सब्जियाँ, फल तथा चारा फसलें |
चावल,
सब्जियाँ तथा चारा फसलें |
प्रश्न:
आर्द्रता के प्रमुख उपलब्ध स्त्रोत के आधार पर कृषि भारत में कृषि के प्रकारों का
उल्लेख कीजिए ?
उत्तर: आर्द्रता के
प्रमुख उपलब्ध स्त्रोत के आधार पर कृषि कों सिंचित कृषि तथा वर्षा निर्भर (बारानी
कृषि) में वर्गीकृत किया जाता है |
सिंचित
कृषि
सिंचित कृषि में भी
सिंचाई के उद्देश्य के आधार पर अन्तर पाया जाता है | जिससे इसे दो भागों में बाँटा जाता है | –रक्षित
सिंचाई कृषि तथा उत्पादक सिंचाई कृषि |
रक्षित सिंचाई कृषि
रक्षित सिंचाई कृषि
का मुख्य उद्देश्य आर्द्रता की कमी के कारण फसलों कों नष्ट होने से बचाना है |
जिसका अभिप्राय यह है कि वर्षा के अतिरिक्त जल की कमी कों सिंचाई द्वारा पूरा किया
जाता है | इस प्रकार की सिंचाई का उद्देश्य अधिकतम क्षेत्र कों पर्याप्त आर्द्रता
उपलब्ध कराना है |
उत्पादक सिंचाई कृषि
उत्पादक सिंचाई कृषि
का उद्देश्य फसलों कों पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराकर अधिकतम उत्पादकता
प्राप्त करना है | उत्पादक सिंचाई में जल निवेश की मात्रा रक्षित सिंचाई की
अपेक्षा अधिक होती है |
वर्षा
निर्भर कृषि
वर्षा निर्भर कृषि
या बरानी कृषि भी कृषि ऋतु में आर्द्रता
की मात्रा के आधार पर दो वर्गों में बाँटी जाती है | शुष्क भूमि कृषि तथा आर्द्र
भूमि कृषि |
शुष्क भूमि कृषि
भारत में शुष्क भूमि
कृषि मुख्यत: उन प्रदेशों तक सीमित है जहाँ वार्षिक वर्षा 75
सेंटीमीटर से कम है | इन क्षेत्रों में शुष्कता कों सहने में सक्षम फसलें जैसे –रागी,
बाजरा, मूँग, चना तथा ग्वार (चारा फसलें) आदि उगाई जाती है | इन क्षेत्रों में
आर्द्रता संरक्षण तथा वर्षा जल के प्रयोग की अनेक विधियाँ अपनाई जाती हैं |
आर्द्र भूमि कृषि
आर्द्र भूमि कृषि उन
क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा ऋतु के समय वर्षा जल पौधों की जरूरत से अधिक
होता है | ये प्रदेश बाढ़ तथा मृदा अपरदन का सामना करते हैं | इन क्षेत्रों में वे
फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें पानी की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है| जैसे –चावल,
जूट, गन्ना आदि | इनके अलावा ताजा पानी की जल कृषि भी की जाती है |
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