Tuesday, November 23, 2021

Lesson 4 Primary activities Class 12th Geography

                                                                             कक्षा 12वीं

मानव भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय  4 प्राथमिक क्रियाएँ

आर्थिक क्रिया

मानव के वे सभी क्रियाकलाप जिनसे आय प्राप्त होती है उन्हे आर्थिक क्रिया कहते है | जैसे खेती करना, अध्यापक द्वारा स्कूल में बच्चों को पढ़ाना , फ़र्निचर उद्योग , चीनी उद्योग आदि |

आर्थिक क्रियाओं के प्रकार

आर्थिक क्रियाओं को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जाता है |

प्राथमिक, द्वितीयक , तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाएँ | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

प्राथमिक क्रियाएँ

जिन क्रियाओं में मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त संसाधनों का सीधा प्रयोग करके अपनी आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की पूर्ति करता है | उन्हे प्राथमिक क्रियाएँ कहते है | ये वे क्रियाएँ है जो प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर निर्भर है | इनका सीधा संबंध प्राकृतिक पर्यावरण की दशाओं से होता है |

इन आर्थिक क्रियाओं के अंतर्गत आखेट (शिकार करना), भोजन संग्रह, पशुचारण, मछ्ली पकड़ना (मत्स्य पालन), वनों से लकड़ी काटना , कृषि तथा खनन कार्य शामिल किए जाते है |

द्वितीयक क्रियाएँ

            वे क्रियाएँ जिनमें मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त संसाधनों का सीधा  प्रयोग न करके उन्हे साफ, परिष्कृत तथा परिवर्तित किया जाता है | इस प्रकार की क्रियाओं में प्रकृति से प्राप्त पदार्थों का उपयोग करके नयी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है | इसलिए इन्हे विनिर्माण प्रक्रिया भी कहते है |

            इन आर्थिक क्रियाओं में सभीप्रकार के निर्माण उद्योग के कार्य जैसे लौह अयस्क से लौह इस्पात बनाना, कपास से सूती वस्त्र बनाना, गन्ने से चीनी तथा गुड़ बनाना आदि शामिल किए जाते है |

तृतीयक क्रियाएँ

            वे क्रियाएँ जिनमे समुदाय या समाज कों व्यक्तिगत या व्यवसायिक सेवाएं प्रदान की जाती है उन्हें तृतीयक सेवाएं कहते है | इस प्रकार की क्रियाओं में लगे लोग प्रत्यक्ष रूप से किसी वस्तु का उत्पादन नहीं करते बल्कि अपनी कार्य कुशलता तथा तकनीकी क्षमता से समाज की सेवा करते है | इसलिए इन क्रियाओं कों सेवा क्षेत्रक में शामिल किया जाता है|  

इस प्रकार की क्रियाओं में यातायात, चिकित्सा, स्वास्थ्य, व्यापार, संचार, परिवहन तथा प्रशासनिक सेवाएं शामिल की जाती है |

चतुर्थक क्रियाएँ

            जीन गॉटमैन के अनुसार वे सेवाएं जो अप्रत्यक्ष रूप से समाज कों सेवाएं प्रदान करती है उन्हें चतुर्थक सेवाओं में शामिल किया जाता है | ये अनुसंधान और विकास पर केंद्रित होती है |

उच्च शिक्षण,प्रबंधन, लेखा कार्य, सूचना का संग्रहण आदि क्रियाएँ इस प्रकार की क्रियाओं में शामिल की जाती है |

आखेट और संग्रहण

मानव सभ्यता के आरम्भिक युग में आदिमकालीन मानव अपने जीवन निर्वाह के लिए अपने समीप के वातावरण पर निर्भर रहता था | उसका जीवन निर्वाह दो कार्यों द्वारा होता था |

a.       आखेट (पशुओं का आखेट)

b.       संग्रहण (अपने समीप के जंगलो से खाने योग्य जंगली पौधे एवं कंदमूल आदि कों एकत्रित करना)

इन क्रियाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

आखेट

आदिमकालीन मानव अपने भोजन के लिए जंगली जानवरों पर निर्भर रहता था | अतिशीत तथा अत्यधिक गर्म प्रदेशों के लोग आखेट द्वारा ही जीवन यापन करतें थे और आज भी इन क्षेत्रों में यही क्रिया प्रचलित है | इसी प्रकार तटीय भागों में रहने वाले लोग मछली पकड़ने का कार्य करतें है | वर्तमान समय में तकनीकी विकास के कारण मत्स्य-ग्रहण व्यवसाय का आधुनिकीकरण हो गया है |

प्राचीन काल में शिकारी (आखेटक) पत्थर या लकड़ी के बने औजारों एवं तीर आदि से शिकार करते थे | जिससे मारे जाने वाले पशुओं की संख्या सीमित रहती थी | परन्तु वर्तमान समय में पशुओं का अवैध शिकार किया जाता है | जिसके कारण जीवों की कई जातियां लुप्त हो गई है या संकटापन्न जातियों की श्रेणी में आ गई है |

संग्रहण

संग्रहण के अंतर्गत अपने समीप के जंगलो से खाने योग्य जंगली पौधे एवं कंदमूल आदि कों एकत्रित करना शामिल किया जाता है | यह कार्य भी कठोर जलवायु वाली दशाओं में किए जाते है | इस प्रकार का कार्य अधिकतर आदिमकालीन समाज के लोग करतें है | ये लोग अपने भोजन, वस्त्र और आवास (शरण) की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए पशुओं और वनस्पति से प्राप्त उत्पादों का संग्रह करते है | इस कार्य के लिय बहुत कम पूंजी और निम्न स्तरीय तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है | इस क्रिया की मुख्य बात यह है की इसमें भोजन अधिशेष नहीं रहता है | इन क्रियाओं में प्रति व्यक्ति उत्पादकता भी कम होती है

विश्व में भोजन संग्रहण के मुख्य क्षेत्र

भोजन संग्रहण के क्षेत्र विश्व के दो भागो में पाए जाते है |

1.       उच्च अक्षांशीय क्षेत्र: इन क्षेत्रों के अंतर्गत उतरी कनाडा, उतरी यूरेशिया और दक्षिणी चिली शामिल है |

 

2.       निम्न अक्षांशीय क्षेत्र: इन क्षेत्रों के अंतर्गत अमेजन बेसिन, उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया का आंतरिक क्षेत्र शामिल है |

आधुनिक समय में भोजन संग्रहण व्यवसाय

आधुनिक समय में भोजन संग्रहण व्यवसाय में काफी परिवर्तन आ गए है | विश्व के कुछ क्षेत्रों में इसका व्यापारीकरण हो गया है | इस कार्य कों करने वाले लोग कीमती पौधों की पत्तियाँ, छाल एवं औषधीय पौधों कों सामान्य रूप से संशोधित करके बाजार में बेचते है | ये पौधों के विभिन्न भागों का उपयोग करते है | उदाहरण के लिए छाल का उपयोग कुनैन बनाने, चमड़ा तैयार करने, कार्क बनाने लिए किया जाता है और इसी तरह पत्तियों का उपयोग पेय पदार्थ बनाने, दवाईयां एवं कांतिवर्धक (सौंदर्य प्रसाधन) की वस्तुएं बनाने के लिए, रेशे का प्रयोग कपडे बनाने, ढृढफल का प्रयोग भोजन और तेल के लिए किया जाता है | पेड़ के तने का प्रयोग रबड़,बलाटा, गोंद और राल बनाने के लिए किया जाता है |

एक विशेष प्रकार के जपोटा नामक वृक्ष के दूध का प्रयोग चिकल बनाने के लिए किया जाता है | इस चिकल का उपयोग चुविंगम बनाने में होता है |

भोजन संग्रहण व्यवसाय का महत्व कम होना

भोजन संग्रहण व्यवसाय विश्व स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण नहीं है | क्योंकि इन क्रियाओं द्वारा प्राप्त उत्पाद विश्व बाज़ार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते | कई प्रकार की अच्छी किस्म एवं कम दाम वाले कृत्रिम उत्पादों ने उष्ण कटिबंधीय वनों के लोगो द्वारा संग्रहण के उत्पादों का स्थान ले लिया है |

पशुचारण

            जब आखेट पर निर्भर रहने वाले समुदायों ने यह महसूस किया की अब केवल आखेट से हमारा जीवन यापन नहीं हो सकता तब उन्होने पशुओं को पालने की सोची | इस प्रकार मानव के क्रियाकलापों में पशुपालन या पशुचारण की शुरुआत हुई |

             पशुचारण मानव के प्रारम्भिक क्रियाकलापों में से एक है | विभिन्न प्रकार की जलवायु प्रदेशों में रहने वाले लोगों ने उन क्षेत्रों में पाएँ जाने वाले पशुओं का चयन करके उन्हे पालतू बनाया | जिसका उपयोग वह विभिन्न प्रकार के कार्यों में करने लगा | जैसे इन पशुओं से माँस, चमड़ा तथा दूध प्राप्त करना, कृषि कार्यों में प्रयोग करना आदि |

पशुचारण  (पशुपालन  व्यवसाय) के प्रकार

भौगोलिक कारकों तथा तकनीकी विकास के आधार पर वर्तमान में पशुपालन व्यवसाय निर्वहन एवं व्यापारिक स्तर पर होता है | निर्वहन एवं व्यापारिक स्तर के अनुसार पशुपालन दो प्रकार का होता है |

1.       चलवासी पशुचारण

2.       वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु पालन)

इनका संक्षिप्त वर्णन इस निम्न प्रकार से है |

1.       चलवासी पशुचारण

            चलवासी पशुचारण एक प्राचीन  जीवन –निर्वाह व्यवसाय रहा है | इसमें पशुचारक अपनी दैनिक आवश्यकताओं भोजन, वस्त्र, आवास, औज़ार एवं यातायात के लिए पशुओं पर ही निर्भर रहता है | पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते है | जब एक स्थान पर पशुओं के लिए चारा कम होने लगता है तो ये लोग दूसरे स्थान पर चले जाते है | इस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलते रहने के कारण इन लोगो को चलवासी कहा जाता है |

चलवासी पशुचारण के अंतर्गत  पाले जाने वाले प्रमुख पशु

चलवासी पशुचारण के अंतर्गत  विश्व के अलग–अलग क्षेत्रों में अलग–अलग प्रकार के पशु पाले जाते है | जैसे

a)      उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में गाय तथा बैल प्रमुख पालतू पशु है |

b)      अफ्रीका के सहारा मरुस्थल और एशिया के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भेड़, बकरी एवं ऊँट मुख्य पालतू पशु है |

c)      तिब्बत और एंडीज के पर्वतीय भागों में याक और लामा पाले जाते है |

d)      आर्कटिक और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में रेंडियर पाला जाता है |

चलवासी पशुचारण के क्षेत्र (चलवासी पशुचारण का विश्व वितरण )

                        चलवासी पशुचारण के विश्व में तीन प्रमुख क्षेत्र हैं | जो निम्न लिखित है |

a.       चलवासी पशुचारण का सबसे प्रमुख क्षेत्र उत्तरी अफ्रीका के अटलांटिक (अंध महासागर ) के तट से अरब प्रायद्वीप होता हुआ मंगोलिया एवं मध्य चीन तक फैला है |

b.       दूसरा क्षेत्र यूरोप तथा एशिया के टुंड्रा प्रदेश में फैला है |

c.       तीसरा क्षेत्र दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका एवं मेडागास्कर द्वीप पर है |

चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के कारण

            चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के कारण दो मुख्य कारण है |

a)      राजनीतिक सीमाओं का अधिरोपण 

b)      कई देशों द्वारा चरागाह क्षेत्रों में नई बस्तियों की योजना बनाना

चलवासी पशुचारकों का ऋतु प्रवास

चलवासी पशुचारण की मुख्य विशेषता यह है की पशु पूर्ण रूप से प्राकृतिक रूप से प्राप्त चारे पर ही निर्भर रहते है | पशुचारक किसी भी प्रकार की चारे की फसल नहीं उगाते है | इस कारण पशुचारक चारे और जल की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करतें  है | नए चरागाह की खोज में ये पशुचारक सर्दियों में पर्वतीय भागों से समतल मैदानी  भागों  में एवं ग्रीष्म ऋतु में समतल मैदानी  से पर्वतीय भागों की और प्रवास करते है | ये प्रवास ऋतु के अनुसार होता है इसलिए इसे ऋतु प्रवास कहते है |

            भारत में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में गुज्जर,बकरवाल, गद्दी एवं भूटिया लोगों के समूह ग्रीष्म काल में मैदानी क्षेत्रों से पर्वतीय क्षेत्रों में चले जाते है एवं सर्दियों में पर्वतीय भागों से समतल मैदानी  भागों  में आ जाते है |

            इसी प्रकार टुंड्रा प्रदेश में ग्रीष्म काल में दक्षिण से उत्तर की ओर एवं शीत काल में उत्तर से दक्षिण की ओर चलवासी पशुचारकों का पशुओं के साथ प्रवास होता है |

2.             वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु पालन)

वाणिज्य पशुधन पालन चलवासी पशुचारण की अपेक्षा अधिक पूंजी प्रधान एवं व्यवस्थित है | यह क्रिया पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित है |

         इस प्रकार के पशुपालन में पशु चारे और जल की तलाश में घूमते नहीं है बल्कि पशुओं के लिए स्थायी फार्म होते है | ये फार्म विशाल क्षेत्र में फैले होते है | इन विशाल फार्मों को छोटी- छोटी इकाइयों में बाँट दिया जाता है | चराई को नियंत्रित करने के लिए इन इकाइयों को बाड़ लगाकर एक दूसरे से अलग किया जाता है | जब एक छोटी इकाई की घास चराई के बाद समाप्त हो जाती है तब पशुओं को दूसरी इकाई (क्षेत्र ) में ले जाया जाता है |

         इस प्रकार के पशुपालन में पशुओं की संख्या चरागाह की वहन क्षमता पर निर्भर करती है की चरागाह में कितने पशु एक साथ चारा प्राप्त कर सकते हैं|

                     वाणिज्य पशुधन पालन एक विशेष प्रकार की गतिविधि है जिसमें केवल एक ही प्रकार के पशु पाले जाते है | इस प्रकार के पशुपालन में मुख्य रूप से भेड़, बकरी, गाय, बैल एवं घोड़े पाले जाते है |

         इन पशुओं से दूध,माँस, खालें, और ऊन जैसे पदार्थ प्राप्त किए जाते है और इन्हें वैज्ञानिक ढंग से संसाधित करके डिब्बा बंद पैकेटों के द्वारा विश्व के बाजारों में निर्यात कर दिया जाता है |

                     वाणिज्य पशुधन पालन वैज्ञानिक आधार पर होता व्यवस्थित होता  है इस प्रकार के पशुपालन में पशुओं के प्रजनन, जननिक सुधार, बीमारियों पर नियंत्रण एवं पशुओं के स्वास्थ्य पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है |  

वाणिज्य पशुधन पालन  के प्रमुख क्षेत्र (वाणिज्य पशुधन पालन  का विश्व वितरण)

विश्व के विस्तृत घास के मैदानों में वाणिज्य पशुधन पालन मुख्य रूप से किया जाता है | जो निम्नलिखित है |

1)      उत्तरी अमरीका का प्रेयरीज घास के मैदानी क्षेत्र जो इस महाद्वीप में उत्तर से दक्षिण की ओर पश्चिमी कनाडा, पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका तथा मैक्सिको में फैला है |

2)      दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में पम्पास के घास के मैदानी क्षेत्र जो ब्राज़ील के पठारी भाग तथा अर्जेंटइना में फैले है |

3)      वेनेजुएला के लनोस के घास के मैदान

4)      अफ्रीका महाद्वीप में वेल्ड नामक घास के मैदान जो दक्षिणी अफ्रीका में स्थित है |

5)      ऑस्ट्रेलिया तथा  न्यूजीलैंड के घास के मैदान

6)       यूरोप तथा एशिया महाद्वीप में स्टेपीज़ घास के मैदान |

चलवासी पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में अंतर

चलवासी पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में निम्नलिखित अंतर है |

चलवासी पशुचारण

वाणिज्य पशुधन पालन

a.       चलवासी पशुचारण एक प्राचीन  जीवन –निर्वाह व्यवसाय रहा है |

 

b.       इसमें पशुचारक अपनी दैनिक आवश्यकताओं भोजन, वस्त्र, आवास, औज़ार एवं यातायात के लिए पशुओं पर ही निर्भर रहता है |       

 

c.       पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते है |

d.       इस प्रकार के पशुपालन में पशु अपने आप बड़े होते हैं | उनकी विशेष देखभाल नहीं की जाती है |

 

e.       चलवासी पशुचारण एक प्राचीन  व्यवसाय है | जिसमें एक साथ कई प्रकार के पशु पाले जाते है |

 

f.        पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे के लिए किसी प्रकार की फसल नहीं उगाते | चारे के लिए पशु प्राकृतिक चरागाहों पर ही निर्भर रहते है |

 

a.       वाणिज्य पशुधन पालन चलवासी पशुचारण की अपेक्षा अधिक पूंजी प्रधान एवं व्यवस्थित है |

 

b.       इसमें पशुचारक व्यापार के लिए तथा पूंजी प्राप्त करने के लिए पशुओं को पालता है |

 

 

c.       पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे और पानी की की व्यवस्था एक स्थान पर करता है | पशु एक ही स्थान पर बाड़े में रहते है |

d.       इस प्रकार के पशुपालन में पशुओं का पालन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है | उनकी विशेष देखभाल की जाती है |

e.       वाणिज्य पशुधन पालन एक विशेष प्रकार की गतिविधि है जिसमें केवल एक ही प्रकार के पशु पाले जाते है |

f.        पशुचारक अपने पशुओं के लिए चारे के लिए  फसल उगाते हैं |

 

कृषि

यह मानव की प्राथमिक क्रियाओं में से सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक क्रिया है | कृषि फसलों का बोया जाना तथा पशुपालन पर अआधारित क्रिया है | विश्व की लगभग आधी जनसँख्या कृषि पर ही निर्भर है |

 विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की भौतिक,आर्थिक और  सामाजिक दशाएँ पायी जाती है | जो कृषि कार्य कों प्रभावित करती है | इन्हीं दशाओं के परिणाम स्वरूप विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग प्रकार की कृषि प्रणालियाँ पायी जाती है | जो निम्नलिखित है |

1)      निर्वाह कृषि

2)      रोपण कृषि

3)      विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि

4)      मिश्रित कृषि

5)      डेरी कृषि

6)      भूमध्यसागरीय कृषि

7)      बाजार के लिए खेती एवं उद्यान कृषि

इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है |

निर्वाह कृषि

इस प्रकार की कृषि में कृषि क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय लोग कृषि से प्राप्त उत्पादों का संपूर्ण या अधिकाँश भाग अपने लिए उपयोग करते है | अर्थात वह कृषि जिसमें किसान कृषि से प्राप्त उत्पादों का इस्तेमाल अपने जीवन निर्वाह के लिए करता है उसे निर्वाह कृषि कहते है |

ये कृषि दो प्रकार की होती है |

A.     आदिकालीन निर्वाह कृषि (स्थानांतरित कृषि)

B.     गहन निर्वाह कृषि

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

A.     आदिकालीन निर्वाह कृषि (स्थानांतरित कृषि)

आदिकालीन निर्वाह कृषि कों स्थानांतरित कृषि भी कहते है | इस प्रकार की कृषि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है | इन क्षेत्रों में रहने वाली आदिम जातियों के लोग इस प्रकार की कृषि करते है |

स्थांनातरित कृषि  की  पद्धति में वन के एक छोटे टुकड़े के पेड़ तथा झड़ियों कों काटकर जला दिया जाता है और भूमि कों साफ़ किया जाता है | जली हुई वनस्पति की राख कों उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जाता है | वनस्पति के काटने और जलाने के कारण इस कृषि प्रणाली कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न) कृषि भी कहते है |

इस प्रकार की कृषि में बोये गए खेत बहुत छोटे होते है | खेती का कार्य पुराने औजारों जैसे लकड़ी, कुदाली एवं फावड़े द्वारा की जाती है |कुछ समय बाद (3 से 5 वर्ष)  जब उस खेत की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होने लगती है तो कृषक नए क्षेत्र में वन जलाकर कृषि के लिए भूमि तैयार करता है | कुछ वर्षों बाद कृषक वापस अपने पहले वाले स्थान पर आकर खेती करने आ जाता है | इस प्रकार एक चक्र पूरा होता है जिसे झूम का चक्र कहते है |

स्थानांतरित कृषि की समस्याएं (दोष)                                   या

स्थानांतरित कृषि का भविष्य उज्जवल नहीं है

इस प्रकार की कृषि की निम्नलिखित समस्याएं है  |

a)      बार बार आग लगाने से कृषि क्षेत्र छोटा होता जाता है |

b)      इससे वनों का ह्रास हो रहा है जिससे पर्यावरण को हानि हो रही है |

c)      वन क्षेत्र के समाप्त हो जाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती जाती है साथ ही मृदा अपरदन अधिक होता है |

इन दोषों के कारण ही स्थानांतरित कृषि की आलोचना होने लगी है | परिणाम स्वरूप कई भागों में जहाँ स्थानांतरित कृषि होती थी अब स्थानबद्ध कृषि होने लगी है | यही कारण है की स्थानांतरित कृषि का भविष्य उज्जवल नहीं है

स्थानांतरित कृषि के क्षेत्र

यह कृषि अफ्रीका, दक्षिणी एवं मध्य अमेरिका का उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र, एवं दक्षिणी एशिया के पूर्वी भाग में की जाती है |

स्थानांतरित कृषि के विभिन्नक्षेत्रों में  स्थानीय नाम

देश का नाम

स्थांनातरित कृषि का नाम

भारत के उत्तरी पूर्वी राज्य (असम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड व मिजोरम )

झूमिंग (Jhuming)

मध्य अमेरिका और मैक्सिको

मिल्पा (Milpa)

मलेशिया और इंडोनेशिया

लादांग  (Ladan)

वियतनाम

रे (Ray)

वेनेजुएला

कोनुको (Conuco)

ब्राजील

रोका (Roca)

जायरे नदी की घाटी तथा मध्य अफ्रीका

मसोले (Masole)

 

B.     गहन निर्वाह कृषि

वह कृषि जिसमें अधिक उपज प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रति इकाई क्षेत्र में पूंजी और श्रम का अधिक  प्रयोग किया जाता है | उसे गहन निर्वाह कृषि कहतें है | इस प्रकार की कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पर जनसँख्या घनत्व अधिक होता है और कृषि भूमि पर अधिक जनसँख्या के भरण पोषण का दबाब होता है |

गहन निर्वाह कृषि के प्रकार

गहन निर्वाह कृषि दो प्रकार की होती है|

1.       चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि

2.       चावल रहित गहन निर्वाह कृषि

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है|

1.       चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि

इसमें चावल प्रमुख फसल होती है| इस प्रकार की कृषि की मुख्य विशेषताएं (लक्षण) निम्नलिखित है|

1)      अधिक जनसँख्या घनत्व के कारण खेतों का आकार छोटा होता है|

2)      भूमि का गहन उपयोग किया जाता है|

3)      कृषि कार्य में कृषक का पूरा परिवार लगा रहता है|

4)      मशीनों (यंत्रों) का प्रयोग कम किया जाता है| अत: इस प्रकार की कृषि में मानव श्रम का अधिक महत्व है|

5)      मृदा की उर्वरता बनाये रखने के लिए पशुओं के गोबर की खाद तथा हरी खाद का प्रयोग किया जाता है|

6)      इस कृषि में प्रति इकाई (प्रति एकड) उत्पादन अधिक होता है| जबकि कृषक उत्पादन कम होता है|

2.       चावल रहित गहन निर्वाह कृषि

इस प्रकार की गहन निर्वाह कृषि में चावल मुख्य फसल नहीं होती और इसके स्थान पर गेहूँ, सोयाबीन, जौं तथा सोरपम मुख्य फसलें होती हैं | यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा पर्याप्त मात्रा में नहीं होती | इसके अलावा उच्चावच, जलवायु तथा मृदा का प्रकार अगर चावल की खेती के अनुकूल नहीं होते वहाँ भी इसी प्रकार की गहन कृषि की जाती है |

            उत्तरी चीन, मंचुरिया,उत्तरी कोरिया तथा उत्तरी जापान में इसी तरह की कृषि की जाती है जहाँ पर गेहूँ, सोयाबीन तथा सोरपम बोया जाता है |

            भारत में सिंधु-गंगा के मैदान के पश्चिमी में गेहूँ भाग तथा दक्षिणी तथा दक्षिणी - पश्चिमी शुष्क प्रदेश में ज्वार और बाजरा मुख्य रूप से उगाया जाता है|

इस कृषि की अधिकांश विशेषताएँ वे ही है जो चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि की है| अंतर केवल इतना ही है की इस कृषि के क्षेत्रों में वर्षा कम होती है और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए सिंचाई की जाती है|

रोपण कृषि

रोपण कृषि एक प्रकार की व्यापारिक कृषि है | यह वृहद स्तर पर लाभ प्राप्त करने के लिए एक उत्पादन प्रणाली है | जिसके अन्तर्गत बाज़ार में बेचने के लिए चाय, कहवा, कोको, रबड़, कपास, गन्ना, केला तथा अनन्नास आदि फसलें उगाई जाती है|

यूरोपीय लोगों ने विश्व के अनेक भागों में अपने उपनिवेश स्थापित किए और अपने अधीन उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों पर इस तरह की कृषि की शुरुआत की थी | इन देशों के लोगों ने अपने उपनिवेशों में चाय, कहवा, कोको, रबड़, कपास, गन्ना, केला तथा अनन्नास आदि फसलें लगायी जिसका मुख्य उद्देश्य लाभ प्राप्त करना ही था |

रोपण कृषि के लक्षण (विशेषताएँ)

रोपण कृषि के लक्षण (विशेषताएँ) निम्नलिखित है |

1)      यूरोपीय लोगों ने अपने अधीन उष्णकटिबंधीय उपनिवेशों  पर इस तरह की कृषि की शुरुआत की थी |

2)      इसमें कृषि क्षेत्र का आकार बहुत बड़ा होता है | कुछ बागानों का आकार तो हज़ारों हेक्टेयर होता है |

3)      इसमें अधिक पूंजी निवेश, उच्च प्रबंध तथा तकनीकी आधार एवं वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है |

4)      यह एक फसली कृषि है जिसमें किसी एक फसल के उत्पादन पर ही ध्यान दिया जाता है |

5)      इस प्रकार की कृषि में सस्ता श्रम स्थानीय लोगों द्वारा मिल जाता है |

6)      यह कृषि उन्ही क्षेत्रों में विकसित होती है जहाँ पर यातायात विकसित होता है | जिसके द्वारा बागान तथा बाजार सुचारू रूप से जुड़े होतें है |

यूरोपीय और अमेरिकी लोगों द्वारा रोपण कृषि के विकास में योगदान

यूरोपीय और अमेरिकी लोगों द्वारा रोपण कृषि के विकास में योगदान कों निम्नलिखित तथ्यों द्वारा समझा जा सकता है |

a)      फ्रांसीसियों ने पश्चिमी अफ्रीका में कॉफी और कोकोआ की पौध लगायी थी |

b)      ब्रिटेनवासियों ने भारत एवं श्रीलंका में चाय के बाग लगाये थे |

c)      ब्रिटेनवासियों के द्वारा ही  मलेशिया में रबड़ के बाग लगाये गए थे |

d)      ब्रिटेनवासियों ने  ही पश्चिमी द्वीपसमूह में गन्ने और केले के बाग विकसित किए थे |

e)      स्पेन तथा अमेरिका के निवासियों ने फिलीपाइन्स  में नारियल व गन्ने के बाग लगाये |

f)       डच (हॉलैंड निवासी) लोगों ने इंडोनेशिया में गन्ने की खेती शुरू की थी | उनका गन्ने की कृषि में  एक समय तक एकाधिकार था |

g)      ब्राजील में कॉफी के बागानों पर यूरोपीय देशों के लोगों का अधिकार अभी तक है | ब्राजील के इन कॉफी के बागानों कों फेजेंडा कहा जाता है |

यूरोपीय और अमेरिकी लोगों द्वारा विकसित अधिकतर बागानों का स्वामित्व अब उन् देशों की सरकारों के नियंत्रण में है | 

           

विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि

यह कृषि भी एक प्रकार की व्यापारिक कृषि है | इस प्रकार की कृषि में खेतों का आकार बड़ा होता है | जिनमें एक ही प्रकार के अनाज की कृषि की जाती है|

विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि की विशेषताएँ

इस कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ है |

1)      इस कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है | इसके अलावा मक्का, जौं, राई एवं जई भी बोई जाती है |

2)      इसमें कृषि में खेतों का आकार बहुत बड़ा होता है | आमतौर पर खेत सैकड़ों हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में विस्तृत होते है |

3)      यह एक यंत्रीकृत कृषि है | इसमें खेत जोतने से लेकर फसल काटने तक के सभी कार्य मशीनों द्वारा किए जाते है |

4)      इस प्रकार की कृषि यंत्रीकृत है और जिन क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि होती है वे विरल जनसँख्या वाले क्षेत्र है | इसलिए इस कृषि में प्रति एकड (हेक्टेयर) उत्पादन कम होता है लेकिन प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिक होता है|

विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि के क्षेत्र

            इस प्रकार की कृषि मध्य अक्षांशों के आंतरिक अर्धशुष्क प्रदेशों में की जाती है | इस प्रकार की कृषि घास के मैदानों में की जाती है | जो निम्न लिखित है |

1)      यूरेशिया के स्टेपीज

2)      उत्तरी अमेरिका के प्रेयरिज

3)      अर्जेंटाइना के पम्पास

4)      दक्षिणी अफ्रीका के वेल्डस

5)      ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स

6)      न्यूजीलैंड के केंटबरी 

 

मिश्रित कृषि

ऐसी कृषि जिसमें फसलों कों उगाने के साथ-साथ पशुओं कों भी पाला जाता है मिश्रित कृषि कहलाती है|

मिश्रित कृषि  की विशेषताएँ

1)         इस कृषि में फसल उत्पादन और पशुपालन कों समान महत्व दिया जाता है|

2)         इस कृषि में खेतों का आकार मध्यम होता है|

3)         इस कृषि में मुख्य फसलें गेहूँ, जौं, राई, जई, मक्का, चारे की फसलें और कंदमूल है|

4)         चारे की फसलें इस कृषि का मुख्य घटक है|

5)         फसलों के साथ जैसे मवेशी, भेड़, सूअर एवं कुक्कुर(कुत्तें) पाले जाते है जो आय का मुख्य स्त्रोत है|

6)         श्स्यवर्तन और अंत: फसली कृषि के द्वारा मृदा की उर्वरता कों बनाए रखा जाता है|

7)         इस कृषि में यंत्रों, भवनों, रासायनिक और वनस्पति खाद(हरी खाद) का अधिक उपयोग होता है| इसलिए इसमें अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है|

8)         कृषकों की कुशलता और योग्यता मिश्रित कृषि की सफलता के लिए अनिवार्य मानी जाती है|

विश्व में मिश्रित कृषि के क्षेत्र

इस प्रकार की कृषि विश्व के अत्यधिक विकसित भागों में की जाती है| उदहारण के लिए उत्तरी पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिक का पूर्वी भाग, यूरेशिया के कुछ भाग और दक्षिणी महाद्वीपों के समशीतोष्ण अक्षांश वाले भागों में यह कृषि की जाती है|

डेरी कृषि (डेरी फार्मिंग)

ऐसी कृषि जिसमें मुख्य ध्यान दुधारू पशुओं के पालन -पोषण, चिकित्सा तथा प्रजजन पर दिया जाता डेरी कृषि कहलाती है | कृषि फसलें केवल इन पशुओं के खिलने के लिए ही उगाई जाती है | 

डेरी कृषि की विशेषताएँ

1)      डेरी व्यवसाय दुधारू पशुओं के पालन-पोषण का  सबसे उन्नत और दक्ष प्रकार है|

2)      पशुओं के लिए छप्पर, घास संचित करने के भंडार और दुग्ध उत्पादन में अधिक यंत्रों की आवश्यकता होती है जिसके लिए इस व्यवसाय में अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है|

3)      पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजजन और पशु चिकित्सा पर अधिक ध्यान दिया जाता है |

4)      इसमें पशुओं कों चराने और दूध निकालने आदि कार्यों के लिए श्रम की आवश्यकता होती है | अत: पर्याप्त श्रम होना अनिवार्य है| क्योंकि फसलों की तरह इस व्यवसाय में कोई अंतराल नहीं होता इसलिए वर्षभर श्रम की आवश्यकता होती है |

5)      डेरी कृषि का कार्य नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों के समीप किया जाता है  क्योंकि ए क्षेत्र दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए अच्छे बाज़ार होते है|

6)      वर्तमान समय में विकसित यातायात के साधनों के द्वारा दूध और दुग्ध उत्पादों कों इनके खपत क्षेत्रों तक आसानी से और जल्दी पहुँचाया जाने लगा है जिससे इस व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |

7)      प्रतिशितकों (रेफ्रिजेटर) के उपयोग और पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन ) के कारण विभिन्न डेरी उत्पादों कों अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है जिससे भी  इस व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |

 विश्व में डेरी कृषि के क्षेत्र

विश्व में डेरी कृषि के तीन प्रमुख क्षेत्र है |

A.     उत्तरी पश्चिमी यूरोप का क्षेत्र ,

B.     कनाडा  

C.     न्यूजीलैंड, दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया का सम्मिलित   

 

  विस्तृत पैमाने पर डेरी कृषि के विकास में यातायात के साधनों और प्रतिशितकों का महत्व

दूध और दुग्ध उत्पाद जल्दी खराब होने वाली वस्तुएँ है| वर्तमान समय में विकसित यातायात के साधनों के द्वारा दूध और दुग्ध उत्पादों कों इनके खपत क्षेत्रों तक आसानी से और जल्दी पहुँचाया जाने लगा है| इसके अलावा प्रतिशितकों (रेफ्रिजेटर) के उपयोग और पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन ) के कारण विभिन्न डेरी उत्पादों कों अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है जिससे भी  इस व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |

भूमध्यसागरीय कृषि

भूमध्यसागरीय कृषि एक विशेष पकार की कृषि है जो की भूमध्यसागरीय जलवायु में की जाती है | इसमें मुख्य रूप से खट्टे फलों की खेती की जाती है |

भूमध्यसागरीय कृषि के क्षेत्र

इस कृषि का विस्तार भूमध्यसागर के समीपवर्ती क्षेत्रों में है | यह क्षेत्र  दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका में  ट्यूनीशिया से  अटलांटिक महासागर के तट के फैला है | इसके अलावा दक्षिणी कैलीफोर्निया, मध्यवर्ती चिली, दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी पश्चिमी भाग तथा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी और दक्षिणी पश्चिमी में इस कृषि का विस्तार है|

मुख्य फसलें

अंगूर की कृषि भूमध्यसागरीय क्षेत्र की विशेषता है | अंगूर के अलावा अंजीर और जैतून की खेती भी इन क्षेत्रों में की जाती है | शीत ऋतु में जब यूरोप एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में फलों और सब्जियों की मांग रहती है तो भूमध्यसागरीय क्षेत्र से ही उनकों  फलों और सब्जियों की आपूर्ति की जाती है |

भूमध्यसागरीय क्षेत्र की मुख्य विशेषता अंगूर की कृषि

अंगूर की कृषि भूमध्यसागरीय क्षेत्र की विशेषता है | इस क्षेत्र के कई देशों में अच्छे किस्म के अंगूर की खेती होती है | इन अच्छे किस्म वाले अंगूरों से उच्च गुणवता वाली मदिरा का उत्पादन किया जाता है |निम्न किस्म के अंगूरों कों सुखाकर मुन्नका और किशमिश बनायीं जाती है |

बाजार के लिए सब्जी कृषि एवं उद्यान कृषि

खेतों में फसलें उगने की बजाये छोटे छोटे भू खण्डों पर सब्जियों और फलों की खेती करण उद्यान कृषि या बागवानी कृषि कहलाती है| यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें अधिक मुद्रा मिलने वाले फसलें जैसे सब्जियाँ, फल तथा पुष्प उगाए जातें है जिनकी माँग नगरीय क्षेत्रों में अधिक होती है| जहाँ इन उत्पादों कों बेचकर धन  कमाया जाता है| इसी कारण से यह कृषि नगरीय क्षेत्रों के समीप की जाती है |

बाजार के लिए सब्जी कृषि एवं उद्यान कृषि की विशेषताएँ

1)      इस कृषि में खेतों का आकार छोटा होता है|

2)      इस कृषि में खेत यातायात के साधनों की सहायता से नगरीय क्षेत्रों जहाँ उच्च आय वाले उपभोक्ता रहते है उनसे से जुड़े रहतें है|

3)      इसमें गहन श्रम और पूंजी की आवश्यकता होती है|

4)      इस कृषि में अतिरिक्त सिंचाई, उर्वरकों का अधिक प्रयोग, अच्छी किस्म के बीजों, कीटनाशकों का प्रयोग होता है|

5)      इस कृषि में हरित गृह और शीत क्षेत्रों में कृत्रिम ताप का भी प्रयोग किया जाता है|

6)      इस प्रकार की कृषि उत्तरी पश्चिमी यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी पूर्वी भाग एवं भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में अधिक विकसित है| क्योंकि इन क्षेत्रों में जनसँख्या घनत्व अधिक है|

7)      इस प्रकार की कृषि से ही नीदरलैंड पुष्प उत्पादन में विशिष्टीकरण रखता है| यहाँ पर बागवानी में विशेष फूल ट्यूलिप उगाया जाता है और पुरे यूरोप में इसे भेजा जाता है|

8)      इस प्रकार की कृषि में जिन प्रदेशों में किसान केवल सब्जियाँ पैदा करता है तो इसे ट्रक कृषि कहाँ जाता है|

ट्रक फार्मिंग या ट्रक कृषि

नगरीय केन्द्रों के चारों ओर लोगों की दैनिक मांगों कों पुरा करने के लिए सब्जियों कों उगाना ट्रक कृषि या ट्रक फार्मिंग कहलाता है| यह बाजार ओर फार्म (खेत) के बीच एक ट्रक द्वारा एक रात में तय की गई दूरी द्वारा नियंत्रित होती है|

कारखाना कृषि

यह एक विशेष प्रकार कृषि है जिसमें गाय-बैल तथा कुक्कुर कों पाला जाता है | इन्हें बाड़ों में रखा जाता है ओर कारखानों में निर्मित चारा खिलाया जाता है | पशुओं की बीमारियों का विशेष ध्यान रखा जाता है |अन्य व्यापारिक कृषि प्रणालियों  की तरह इस कृषि में भी भवन निर्माण, यंत्र खरीदने, प्रकाश ओर ताप की व्य्वस्था करने के लिए और पशुओं की चिकित्सा के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है | अच्छी नस्ल के पशुओं का चुनाव और प्रजजन की  वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग  कुक्कुर और पशुपालन के लिए महत्वपूर्ण है | जो इस कृषि के मुख्य लक्षण है |

यह कृषि मुख्य रूप से पश्चिमी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के औद्योगिक क्षेत्रों में की जाती है|

संगठन के आधार पर कृषि के प्रकार 

कृषि विधियों के अतिरिक्त कृषि का वर्गीकरण कृषि संगठन के आधार पर भी किया जा सकता है | क्योंकि कृषि संगठन कृषक का खेतों पर अपना अधिकार और सरकारी नीतियों द्वारा प्रभावित होता है इसलिए संगठन के आधार पर कृषि दो प्रकार की होती है,  सहकारी कृषि  और  सामूहिक कृषि|

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

सहकारी कृषि  

सहकारी एक ऐसी कृषि है जिसमें कृषकों का एक समूह अपनी कृषि से अधिक लाभ कमाने के लिए अपनी इच्छा से एक सहकारी संस्था बनाकर कृषि कार्यों कों संपन्न करतें है | इसमें किसान अपनी इच्छा से अपनी भूमि और अन्य संसाधन एकत्रित करके मिलजुल कर फसलें उगते है | इसमें व्यक्तिगत (निजी) फार्म  या खेत अक्षुण्ण रहते हुए सहकारी रूप में कृषि की जाती है |

इस प्रकार की कृषि में सहकारी संस्था कृषकों कों हर प्रकार की सहायता करती है | यह सहायता कृषि कार्य में काम आने वाली सभी चीजों की खरीद करने,कृषि उत्पाद कों उचित मूल्य पर बेचने एवं सस्ती दरों पर प्रसंस्कृत साधनों कों जुटाने के लिए होती है | 

सहकारी कृषि का विकास (सहकारी आंदोलन)

            सहकारी आंदोलन एक शताब्दी पहले शुरू हुआ था | इस आंदोलन कों सर्वाधिक सफलता पश्चिमी यूरोप के देशों में मिली |  डेनमार्क, नीदरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन और इटली जैसे देशों में यह सफलतापूर्वक चल रहा है | डेनमार्क में इस कृषि कों सबसे अधिक सफलता मिली है | यहाँ का प्रत्येक किसान व्यवहारिक रूप से इस आंदोंलन का सदस्य है |

सामूहिक कृषि

  सामूहिक कृषि का आधारभूत सिद्धांत यह है की इसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व संपूर्ण समाज का होता है| और सामूहिक श्रम के द्वारा फसल उत्पादन किया जाता है|

            कृषि का यह प्रकार साम्यवादी क्रान्ति के फलस्वरूप वर्ष 1917 में पूर्व सोवियत संघ शुरू हुई| पूर्व सोवियत संघ (रूस) में कृषि की दशा सुधारने एवं उत्पादन में वृद्धि करने और आत्मनिर्भरता की प्राप्ति के लिए सामूहिक कृषि प्रारम्भ की गई थी| इस कृषि कों सोवियत संघ में कोलखहोज का नाम दिया गया | कोलखहोज से अभिप्राय सामूहिक खेत से है जिसमें गांव की समस्त कृषि भूमि कों शामिल किया जाता है और इस पर गांव के सभी लोगों का अधिकार होता है|

पूर्व सोवियत संघ में सामूहिक कृषि की विशेषताएं

1)      सभी कृषक अपने संसाधन जैसे भूमि, पशुधन कों मिलाकर कृषि करते थे| 

2)      सभी कृषक सामूहिक श्रम द्वारा कृषि का समस्त कार्य निपटाते थे|

3)      अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसान भूमि का छोटा टुकड़ा अपने अधिकार में रखते थे|

4)      सरकार उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित करती थी और उसे निर्धारित मूल्य पर सरकार ही खरीदती थी|

5)      निर्धारित लक्ष्य से अधिक उत्पन्न होने वाले भाग कों सभी सदस्यों में बाँट दिया जाता था या बाज़ार में बेच दिया जाता था |

6)      उत्पादन और किराये पर लि गई मशीनों पर कृषकों कों कर (टैक्स) देना पड़ता था |

7)      सभी सदस्यों कों उनके द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति के आधार पर उन्हें वेतन मिलता था|

8)      असाधारण कार्य करने वाले सदस्य कों नकद भुगतान या माल (फसल का कुछ हिस्सा) के रूप  में पुरस्कृत किया जाता था|

                        सोवियत संघ की समाजवादी सरकार ने इसे शुरू किया था | विभिन्न देशों की समाजवादी सरकारों ने इस कृषि मॉडल कों अपनाया है | जिनमें हंगरी, पौलैंड, रोमानिया तथा बुल्गारिया शामिल है| 1991 में रूस के टुकड़े होने (विघटन) के बाद इस प्रकार की कृषि में संसोधन किए गए|   

खनन

खनन कार्य से अभिप्राय खनिज पदार्थों के उत्खनन से है अर्थात खनन एक ऐसा प्राथमिक क्रियाकलाप  है जो खदानों से खनिज पदार्थों के निकालने से सम्बन्धित है| यह व्यवसाय मानव के प्राचीनतम व्यवसायों में से एक है|

खनिजों का महत्व

            खनिज संसाधन मानव की भौतिक सभ्यता का मूल आधार है |  खनिजों का सभ्यता के विकास में इतना महत्व है की इतिहास के कई युगों का नामकरण भी खनिजों के प्रयोग के अनुसार ही हुआ है| प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य औजारों तथा हथियारों के निर्माण में केवल पत्थरों का प्रयोग करता था इसलिए उसे पाषाण युग (Stone age) कहते है| जैसे-जैसे मनुष्य ने धातुओं का प्रयोग करण शुरू किया उसी अनुसार उन युगों के नाम भी उन धातुओं के नाम के अनुरूप हो गए| जैसे सबसे पहले तांबा प्रयोग में लाया गया तो ताम्र युग (Copper age), काँसा प्रयोग में लाया गया तो काँस्य युग (Bronze age) और उसके बाद लौह प्रयोग में आया तो लौह युग (Iron age) कहा गया|  वर्तमान में हम इस्पात युग (Steel age) में रह रहे  है |

            प्राचीन काल में खनिजों का उपयोग औजार बनाने, बर्तन बनाने एवं हथियार बनाने तक ही सीमित था | इनका वास्तविक विकास औद्यौगिक क्रांति के बाद ही संभव हुआ है जिससे इनका महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है की खनिजों के बिना उद्योगों की कल्पना भी नहीं की जा सकती | वर्तमान स्तिथि में हम ये भी कह सकतें है की खनिजों के बिना हमारा जीवन अधूरा है |

खनन कार्य कों प्रभावित करने वाले कारक

खनन कार्य की लाभप्रदता कों निम्नलिखित दो प्रकार कारक प्रभावित करते है|

a)      भौतिक कारक

इनमें निक्षेपों के आकार, श्रेणी  और उनकी उपस्थिति की अवस्था कों शामिल किया जाता है |

b)      आर्थिक कारक

इन कारकों में खनिज की माँग, विद्यमान तकनीकी ज्ञान एवं उसका उपयोग, अवसंरचना के विकास के लिए उपलब्ध पूंजी तथा यातायात एवं श्रम पर होने वाले व्यय कों शामिल किया जाता है |

खनन की विधियाँ

उपस्थिति की अवस्था तथा अयस्क की प्रकृति के आधार पर खनन  की दो विधियाँ है |

a)      धरातलीय या  विवृत खनन

b)      कूपकी या भूमिगत खनन

इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है|

a)      धरातलीय या  विवृत खनन

धरातलीय खनन कों विवृत खनन भी कहा जाता है | इस विधि कों उन खनिजों के खनन के लिए प्रयोग किया जाता है जो भूतल के निकट ही कम गहराई में पाए जाते है | यह खनिजों के खनन की सबसे सस्ती विधि है | क्योंकि इस विधि में सुरक्षात्मक पूर्व उपायों एवं उपकरणों पर अतिरिक्त खर्च नहीं अपेक्षाकृत कम होता है एवं उत्पादन शीघ्र और अधिक होता है |

b)      भूमिगत खनन या कूपकी खनन

भूमिगत खनन कों कूपकी खनन भी कहते है| यह विधि उन अयस्कों के खनन के लिए प्रयोग की जाती है जो अधिक गहराई पर पाए जाते है| इस विधि में लम्बवत कूपक गहराई तक स्थित होते है जहाँ से भूमिगत गैलरियाँ खनिजों तक पहुँचने के लिए बनी फैली होती है| इन मार्गों से होकर खनिजों का निष्कर्षण एवं परिवहन धरातल तक किया जाता है|

इस विधि में खादान में काम करने वाले श्रमिकों तथा निकाले जाने वाले खनिजों के सुरक्षित और प्रभावी आवागमन हेतु इसमें कई प्रकार की लिफ्ट भेदक (बरमा), माल धोने की गाडियाँ तथा वायु संचार प्रणाली की आवश्यकता होती है|

भूमिगत खनन जोखिम भरा होने के कारण   

खनन का यह तरिका जोखिम भरा है| क्योंकि जहरीली गैसें, आग व बाढ के कारण कई बार दुर्घटनाएं होने का डर रहता है|

विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और शोधन कार्य से पीछे हटने का कारण

विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और शोधन कार्य से पीछे हट रहें है| क्योंकि इसमें श्रमिक लागत अधिक आने लगी है|

विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देश खनन प्रकरण और शोधन कार्य कों महत्व देने का कारण

            विकासशील देश अपनी विशाल श्रम शक्ति के बल पर अपने देशवासियों के ऊँचे रहन-सहन को बनाये रखने के लिए खनन कार्य कों महत्व दे रहे है| अफ्रीका के कई देश, दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश और एशिया के दशों में आय के साधनों का पचास प्रतिशत तक खनन कार्यों से ही प्राप्त होता है|     

प्रश्न 1. आर्थिक क्रिया किसे कहते है?

उत्तर: मानव के वे सभी क्रियाकलाप जिनसे आय प्राप्त होती है उन्हे आर्थिक क्रिया कहते है | जैसे खेती करना, अध्यापक द्वारा स्कूल में बच्चों को पढ़ाना , फ़र्निचर उद्योग , चीनी उद्योग आदि |

प्रश्न 2. आर्थिक क्रियाओं के प्रकार बताये ?

उत्तर: प्राथमिक, द्वितीयक , तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाएँ |

प्रश्न 3. चिकल का उपयोग चुविंगम बनाने में होता है, ये चिकल किस वृक्ष से प्राप्त किया जाता है?

उत्तर: जपोटा नामक वृक्ष

प्रश्न 4. निर्वहन एवं व्यापारिक स्तर के अनुसार पशुपालन कितने प्रकार का होता है ?

अथवा

पशुपालन कितने प्रकार का होता है ?

उत्तर: पशुपालन दो प्रकार का होता है |

1.       चलवासी पशुचारण       

2.       वाणिज्य पशुधन पालन (व्यापारिक पशु पालन)

प्रश्न 5. किस प्रकार की कृषि कों कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न) कृषि भी कहते है और क्यों ?

उत्तर: जीवन निर्वाह कृषि या स्थानांतरित कृषि कों कर्तन दहन प्रणाली (स्लश एंड बर्न) कृषि भी कहते है क्योंकि इसमें  वनस्पति के काट और जलाकर कृषि योग्य भूमि तैयार की जाती है|

प्रश्न 6.चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के दो कारण बताओ |

उत्तर: चलवासी पशुचारकों की संख्या में कमी होने एवं चलवासी पशुचारण के क्षेत्र कमी होने के कारण दो मुख्य कारण है |

1.       राजनीतिक सीमाओं का अधिरोपण 

2.       कई देशों द्वारा चरागाह क्षेत्रों में नई बस्तियों की योजना बनाना

प्रश्न 7. अंगूर की कृषि किस क्षेत्र की विशेषता है

उत्तर: भूमध्यसागरीय क्षेत्र

प्रश्न 8. मिश्रित कृषि किसे कहते है?

उत्तर: ऐसी कृषि जिसमें फसलों कों उगाने के साथ-साथ पशुओं कों भी पाला जाता है मिश्रित कृषि कहलाती है|

प्रश्न 9. कोलखहोज से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर: कोलखहोज से अभिप्राय सामूहिक खेत से है जिसमें गांव की समस्त कृषि भूमि कों शामिल किया जाता है और इस पर गांव के सभी लोगों का अधिकार होता है|

प्रश्न 10. सहकारी आंदोलन सर्वाधिक सफलता किस देश में मिली ?

उत्तर:  डेनमार्क

प्रश्न  11.  जो  खनिज भूतल के निकट ही कम गहराई में पाए जाते है उनके खनन के लिए किस खनन विधि का प्रयोग किया जाता है ?

उत्तर:  धरातलीय या  विवृत खनन

प्रश्न 12. भूमिगत खनन कों अन्य किस नाम से जाना जाता है?

उत्तर: कूपकी खनन

प्रश्न 13 निम्न में से कौनसी रोपण फसल नहीं है ?

1.       कॉफी

2.       गन्ना

3.       गेंहूँ

4.       रबड़

उत्तर: गेहूँ

प्रश्न 14. निम्न देशों में से किस देश में सहकारी कृषि का सफल परीक्षण किया गया है ?

1.       रूस

2.       डेनमार्क

3.       भारत

4.       नीदरलैंड

उत्तर: डेनमार्क

प्रश्न 15. फूलों की कृषि  कहलाती है ?

1.       ट्रक फार्मिंग

2.       कारखाना कृषि

3.       मिश्रित कृषि

4.       पुष्पोत्पादन (फ्लोरीकल्चर)

उत्तर : पुष्पोत्पादन (फ्लोरीकल्चर)

प्रश्न 16. निम्न में से कौनसी कृषि के प्रकार का विकास यूरोपीय औपनिवेशिक समूहों द्वारा किया गया ?

1.       कोलखोज

2.       अंगूरोत्पादन (अंगूर उत्पादन)

3.       मिश्रित कृषि

4.       रोपण कृषि

उत्तर:  रोपण कृषि

प्रश्न 17. निम्न प्रदेशों में से किसमे विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि नहीं की जाती है ?

1)      उत्तरी अमेरिका और कनाडा के प्रेयरिज क्षेत्र

2)      अर्जेंटाइना के पम्पास क्षेत्र

3)      यूरोपीय स्टैपीज क्षेत्र

4)      अमेजन बेसिन क्षेत्र

उत्तर:   अमेजन बेसिन क्षेत्र

प्रश्न  18. निम्न कृषि के प्रकारों में से कौनसा प्रकार कर्तन दहन कृषि का प्रकार है?

1.       गहन जीवन निर्वाह कृषि

2.       विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि

3.       आदिकालीन  निर्वाह कृषि

4.       मिश्रित कृषि

उत्तर: आदिकालीन  निर्वाह कृषि

प्रश्न 19. निम्न में से कौन- सी एकल कृषि नहीं है?

1.       डेरी कृषि

2.       मिश्रित कृषि

3.       विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि

4.       रोपण कृषि

उत्तर: मिश्रित कृषि

प्रश्न 20. निम्न में से किस प्रकार की कृषि में खट्टे रसदार फलों की कृषि की जाती है?

1.       बाजारीय सब्जी कृषि

2.       भूमध्यसागरीय कृषि

3.       रोपण कृषि

4.       कारखाना कृषि

उत्तर: भूमध्यसागरीय कृषि

प्रश्न 21. उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में प्रमुख पालतू पशु कौन-से है ?

उत्तर: गाय तथा बैल |

प्रश्न 22. अफ्रीका के सहारा मरुस्थल और एशिया के मरुस्थलीय क्षेत्रों में मुख्य पालतू पशु कौन-से है ?

उत्तर: भेड़, बकरी एवं ऊँट

प्रश्न 23. तिब्बत और एंडीज के पर्वतीय भागों में कौन-से पशु मुख्य रूप पाले जाते है ?

उत्तर: याक और लामा

प्रश्न 24. रेंडियर किन क्षेत्रों में  पाला जाता है ?

उत्तर: आर्कटिक और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में

प्रश्न 25. डेरी कृषि के विकास किस कारण तेजी से हुआ है ?

उत्तर:  निम्नलिखित साधनों के कारण डेरी व्यवसाय का विकास तेजी से हुआ है |

1.       यातायात के साधनों

2.       प्रतिशितकों

3.       पोस्तीकरण (पाश्चुराइजेशन )

प्रश्न 26. प्राथमिक क्रियाकलाप करने वाले लोगों कों किस प्रकार की कॉलर के श्रमिक कहा जाता है और क्यों ?

उत्तर: प्राथमिक क्रियाकलाप करने वाले लोगों कों लाल कॉलर श्रमिक कहते है क्योंकि इनका कार्य क्षेत्र इनके घरों से बहार होता है |

Meaning,Types and Causes and Consequences of Migration

 

प्रवास का अर्थ

किसी विशेष उद्देश्य से लोगों का एक स्थान कों छोकर दूसरे स्थान पर जाकर रहना प्रवास कहलाता है |

प्रवास की प्रक्रिया

प्रवास की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति का अपने स्थान कों छोड़कर जाने और दूसरे स्थान पर आकर रहना दोनों ही प्रकार की प्रक्रिया कों शामिल किया जाता है | ये निम्नलिखित दो प्रकार की होती है |

A.     आप्रवास (In-Migration)

 

जब लोग किसी नए स्थान पर आकर रहने लगते है | तो इस प्रक्रिया कों आप्रवास कहते है |

B.     उत्प्रवास  आप्रवास (Out- Migration)

 

जब लोग एक स्थान कों छोडकर चले जाते हैं | तो इस प्रक्रिया कों उत्प्रवास कहते है |

समय के  अवधि अनुसार प्रवास के प्रकार

प्रवास के समय के अवधि अनुसार प्रवास तीन प्रकार का होता है |  स्थाई, अस्थाई तथा मौसमी प्रवास | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

A.     स्थाई प्रवास

जब व्यक्ति किसी स्थान कों छोड़कर चला जाए और दूसरे स्थान पर स्थाई रूप से रहने लगे तो इस प्रकार के प्रवास कों स्थाई प्रवास कहते है | महिलाओं अधिकतर विवाह के बाद इसी तरह का प्रवास करती हैं |

B.     अस्थाई प्रवास

जब व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने स्थान कों छोड़कर रहने लगता है | तो इस तरह के प्रवास कों अस्थाई प्रवास कहते है | जैसे विद्यार्थी द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने जन्म स्थान कों छोड़कर जाना और शिक्षा ग्रहण करने पर वापस लौट आना |

C.     मौसमी प्रवास

जब प्रवास एक विशेष समय (मौसम) में किया जाता है तो यह मौसमी प्रवास कहलाता है | इस प्रवास का मुख्य रूप से कृषि क्रिया में होता है | लोग कृषि कार्य करने के लिए जैसे कटाई या बुआई के मौसम में प्रवास करते हैं और काम समाप्त हो जाने पर अपने घर लौट आते है |  इसी तरह जम्मू कश्मीर से चरवाहे सर्दी के समय मैदानी क्षेत्रों में आ जाते है और गर्मियों की शुरुआत में वापस  पहाड़ी क्षेत्रों में जाने लगते है | 

गंतव्य स्थान के आधार पर प्रवास के प्रकार

गंतव्य स्थान के आधार पर प्रवास दो प्रकार का होता है | आंतरिक प्रवास तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रवास |

आंतरिक प्रवास (Inland Migration)

प्रवास देश की सीमा में हो तो आंतरिक प्रवास कहलाता है |

अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration)

प्रवास जब देश की सीमा के बाहर  (एक देश से दूसरे देश में ) हो तो अंतर्राष्ट्रीय होता है |

प्रवास की धाराएँ

प्रवास की चार मुख्य धाराएँ हैं |

(a)    गांव से गांव    (b)   गांव से नगर      (c)   नगर से नगर      (d)  नगर से गांव

आप्रवासी और उत्प्रवासी में अन्तर

आप्रवासी (in-migrant )

वे लोग जो किसी नए स्थान पर आकर बस जाते हैं, आप्रवासी कहलाते हैं |

उत्प्रवासी (out- migrant)

वे लोग जो अपने स्थान कों छोड़कर  बाहर चले जाते है, उत्प्रवासी कहलाते हैं |

उद्गम स्थान और गंतव्य स्थान में अन्तर

उद्गम स्थान

वह स्थान जहाँ से लोग चले जाते हैं या गमन कर जाते है | उस स्थान कों उद्गम  स्थान कहते है | उत्प्रवास के प्रवास के कारण  यहाँ उद्गम स्थान की जनसंख्या में कमी होती है |

गंतव्य स्थान

वह स्थान जहाँ पर लोग आकार बीएस जाते हैं | उस स्थान कों गंतव्य स्थान कहते है | आप्रवास के कारण गंतव्य स्थान की जनसंख्या में वृद्धि होती है |

प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारक

लोग अपने जन्म स्थान से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं | लेकिन बेहतर आर्थिक और सामाजिक जीवन जीने के लिए या सामाजिक और राजनैतिक कारणों से अपने जन्म स्थान कों छोड़कर प्रवास करते है |  इसी तरह बहुत से ऐसे कारक होते है जो लोगों कों प्रवास करने लिए प्रोत्साहित करते हैं या उन्हें बाध्य करते है | प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारकों कों हम दो भागों में बाँट सकते हैं |  ये प्रतिकर्ष कारक तथा अपकर्ष कारक  कहलाते है |  इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

प्रतिकर्ष कारक (Push Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों उनके निवास स्थान या उद्गम स्थान कों छोड़कर जाने का कारण बनते है उन्हें प्रवास के प्रतिकर्ष कारक कहते हैं | इन कारकों के अंतर्गत बेरोजगारी, रहन-सहन की निम्न दशाएँ, राजनैतिक उपद्रव, प्रतिकूल जलवायु, बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं का बार बार आना, महामारियाँ तथा सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन आदि शामिल हैं | जिनके कारण लोग अपना स्थान छोड़कर चले जाते है |

अपकर्ष कारक  (Pull Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों विभिन्न स्थानों से आकार रहने के लिए आकर्षित करते हैं उन्हें प्रवास के अपकर्ष कारक कहते है | इन कारकों में रोजगार के अच्छे अवसर, रहन-सहन की उच्च दशाएँ, राजनैतिक शांति और स्थायित्व, जीवन और सम्पति की सुरक्षा, अनुकूल जलवायु, तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत समाज आदि शामिल हैं | ये ऐसे कारक है जो किसी स्थान (गंतव्य स्थान ) कों उद्गम स्थान की अपेक्षा अपनी ओर आकर्षित करते हैं | 

प्रश्न : भारत में पुरुष प्रवास के मुख्य कारण क्या है ?

उत्तर :  काम और रोजगार |

प्रश्न :  भारत के किस शहर में सर्वाधिक संख्या में आप्रवासी आते हैं ?

उत्तर : महाराष्ट्र

प्रश्न :  भारत में प्रवास की निम्न धाराओं में से कौन सी धारा एक धारा पुरुष प्रधान है ?

क.     ग्रामीण से नगरीय

ख.     नगर से नगरीय

ग.      ग्राम से ग्राम

घ.      नगर से ग्राम

उत्तर : ग्राम से नगरीय

प्रश्न :  किस नगरीय समूहन में प्रवासी जनसंख्या का अंश सर्वाधिक है ?

उत्तर : मुंबई नगरीय समूहन में |

जनगणना में प्रवास पर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय जनगणना में प्रवास पर निम्नलिखित प्रश्न पूछे जाते है |

1.       क्या व्यक्ति इसी गांव अथवा शहर में पैदा हुआ है ?  यदि नहीं, तब जन्म के स्थान (ग्रामीण या नगरीय) की स्थिति , जिले, और राज्य का नाम और यदि भारत के बहार का है तो जन्म के देश के नाम की सूचना प्राप्त की जाती है |

2.       क्या व्यक्ति इस गांव या शहर में कहीं और से आया है ? यदि हाँ, तब निवास के पूर्व (पिछले) स्थान के स्तर (ग्रामीण या नगरीय) , जिले और राज्य का नाम और यदि भारत के बहार का है तो जन्म के देश के नाम के बारे में आगे प्रश्न पूछे जाते है |

भारत की जनगणना में प्रवास की गणना के आधार

भारतीय जनगणना में प्रवास की गणना दो आधारों पर की जाती है |  जीवन पर्यंत प्रवासी  तथा  पिछले निवास स्थान से प्रवासी |

1.       जीवन पर्यन्त प्रवासी (जन्म स्थान से प्रवासी ) : यदि प्रवास करने वाले व्यक्ति के जन्म का स्थान गणना के स्थान से भिन्न है तो उसे जीवन पर्यन्त प्रवासी या जन्म स्थान से प्रवासी के नाम से जाना जाता है |

2.       पिछले निवास स्थान से प्रवासी  : यदि  प्रवास करने वाले व्यक्ति के निवास का पिछला स्थान गणना के स्थान से भिन्न है तो उसे निवास के पिछले स्थान से प्रवासी के रूप जाना जाता है |

पुरुष वरणात्मक (चयनात्मक) प्रवास के मुख्य कारण

पुरुष बड़ी संख्या में  ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों की ओर रोजगार की तलाश में प्रवास करते हैं | 

स्त्री वरणात्मक (चयनात्मक) प्रवास के मुख्य कारण

स्त्रियाँ विवाह के कारण प्रवास करती हैं | क्योंकि भारत में लड़की कों विवाह के बाद अपने मायके  के घर से सुसराल के घर तक प्रवास करना होता है | जो अधिकाँश ग्रामीण क्षेत्र से ग्रामीण क्षेत्र में ही होता है |

उद्गम और गंतव्य स्थान की आयु व लिंग संरचना पर ग्रामीण नगरीय प्रवास का प्रभाव

बड़ी संख्या में युवक रोजगार की तलाश में ग्रामीण इलाकों कों से नगरों की ओर प्रवास करते हैं | इससे ग्रामीण क्षेत्रों में युवकों की संख्या में कमी हो जाती है | इसके विपरीत नगरों में इनके जाने से नगरों में इनकी संख्या बढ़ जाती है | गाँवों में बूढ़े, बच्चें तथा स्त्रियाँ रह जाती हैं | अत: ग्रामीण नगरीय प्रवास से उद्गम तथा गंतव्य दोनों ही स्थानों की आयु एवं लिंग संरचना पर प्रभाव पड़ता है |

भारत में  लोगों के  ग्रामीण  से नगरीय क्षेत्रों में प्रवास के कारण 

किसी भी क्षेत्र में प्रवास के लिए दो प्रकार के कारक उत्तरदायी होते है | प्रतिकर्ष कारक तथा अपकर्ष कारक |

प्रतिकर्ष कारक (Push Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों उनके निवास स्थान या उद्गम स्थान कों छोड़कर जाने का कारण बनते है उन्हें प्रवास के प्रतिकर्ष कारक कहते हैं |  भारत में प्रवास के लिए उत्तरदायी प्रतिकर्ष कारक निम्नलिखित है |

गरीबी, कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव, स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव आदि के कारण भारत में लोग  ग्रामीण  से नगरीय क्षेत्रों में प्रवास करते हैं |

प्राकृतिक कारक जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवातीय तूफान, भूकंप तथा सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ  लोगों कों प्रवास के लिए प्रेरित करती है |

युद्ध, स्थानीय संघर्ष भी प्रवास के लिए प्रतिकर्ष कारक पैदा करते है |

 

अपकर्ष कारक  (Pull Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों विभिन्न स्थानों से आकार रहने के लिए आकर्षित करते हैं उन्हें प्रवास के अपकर्ष कारक कहते है | भारत में प्रवास के निम्न लिखित कारण हैं |

गरीबी , कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव, स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव आदि के कारण भारत में लोग  ग्रामीण  से नगरीय क्षेत्रों में प्रवास करते हैं |

प्राकृतिक कारक जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवातीय तूफान, भूकंप तथा सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ  लोगों कों प्रवास के लिए प्रेरित करती है |

युद्ध, स्थानीय संघर्ष भी प्रवास के लिए प्रतिकर्ष कारक पैदा करते है |

प्रवास की तरंगें (भारतीय लोगों के अंतर्राष्ट्रीय प्रवास तथा उनके कारण )

भारतीय इतिहास में भरतीय लोगों के प्रवास या भरतीय प्रसार की तीन मुख्य तरंगें देखने कों मिलती है |

पहली तरंग

भारतीय लोंगों के द्वारा उत्प्रवास की पहली तरंग ब्रिटिश काल के दौरान पैदा हुई | जब अंग्रेजों ने उत्तर प्रदेश और बिहार से मॉरीशस,कैरिबियन द्वीप समूह (ट्रिनिडाड, टोबैगो और गुयाना ), फिजी और दक्षिणी अफ्रीका में , फ्रांसीसियों और जर्मनी ने रियूनियन द्वीप, गुआडेलोप, मार्टीनीक और सूरीनाम में ; फ्रांसीसी और डच लोगों तथा पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव से अंगोला, मोजाम्बिक व अन्य देशों में करारबद्ध लाखों लोगों श्रमिकों कों रोपण कृषि में काम करने के लिए भेजा था | इस तरह के सभी प्रवास भारतीय उत्प्रवास अधिनियम या गिरमिटिया एक्ट नामक समयबद्ध अनुबंध के तहत किए गए थे | इस अधिनियम के  द्वारा गए मजदूरों कों अमानवीय परिस्थितियों में रखा जाता था और उनकी दशा दासों जैसी ही होती थी |

दूसरी तरंग

यह तरंग 1970 के दशक में आई | इस तरंग ने  प्रवासियों की नूतन समय में व्यवसायियों, शिल्पियों व्यापारियों तथा फैक्ट्री मजदूरों कों निकटवर्ती देशों में भेजा | इस तरंग में जाने वाले लोग बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में थाईलैंड,मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ब्रूनेई आदि देशों में जाकर बस गए | यह प्रवृति अब भी जारी है | 1970 के दशक में पश्चिमी एशिया के देशों में अचानक ही तेल के उत्पादन में वृद्धि हुई जिसके परिणाम स्वरूप भारत से बहुत बड़ी संख्या में कुशल तथा अर्धकुशल श्रमिकों कों आकृषित किया | कुछ बाह्य प्रवास उधमियों, भंडार मालिकों, व्यवसायिकों का भी पश्चिमी देशों में प्रवास हुआ है |

तीसरी तरंग

इस तरंग में उच्च शिक्षा प्राप्त कुशल व्यक्तियों ने प्रवास किया | वर्ष 1969 के बाद डॉक्टरों और अभियंताओं ने तथा 1980 के बाद सॉफ्टवेयर अभियंताओं, प्रबंध परामर्शदाताओं, वित्तीय विशेषज्ञ संचार माध्यम से संबंधित आदि  व्यक्तियों ने प्रवास किया | ये लोग उच्च स्तरीय व्यतीत करने तथा अधिक धन कमाने के लिए भारत कों छोड़कर संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाड़ा, यू०  के० (यूनाइटेड किंग), ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड न्यूजीलैंड, जर्मनी देशों में आ आकर बस गए | 1991 में उदारीकरण के बाद शिक्षा और ज्ञान आधारित भारतीय उत्प्रवासियों नें  भारतीय प्रसार  कों “विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली प्रसार में से एक बना दिया है |

भारत में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास

आंतिरक प्रवास की प्रक्रिया के साथ - साथ भारत के में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास भी देखने कों मिलता है | अंतर्राष्ट्रीय प्रवास के अंतर्गत पड़ोसी देशों से आप्रवास और उन देशों में भारत के लोग उत्प्रवास करते है | सन् 2011 की जनगणना के अनुसार  50 लाख लोगों का भारत में अन्य देशों से आप्रवास हुआ है | इनमें से अधिकाँश आप्रवासी भारत के पड़ोसी देशों से आए है | सन् 2001 की जनगणना के अनुसार  96 प्रतिशत आप्रवासी भारत के पड़ोसी देशों से आए थे जो सन् 2011 में घटकर 88.9 प्रतिशत रह गए |  अकेले बंगलादेश से 27.47 लाख से अधिक प्रवासी भारत में है | जो कुल आप्रवासियों का 51.2  प्रतिशत है | उसके बाद नेपाल से 8.10 लाख लोग भारत में आप्रवासी है जो कुल आप्रवासियों का 15.1 प्रतिशत है | पाकिस्तान से 9.18 लाख लोग आप्रवासी के रूप में रह रहे है जो कुल आप्रवासियों का 17.1 प्रतिशत है | इसके अलावा तिब्बत, भूटान, श्रीलंका, अफगानिस्तान, ईरान और म्यांमार के आप्रवासी भी शामिल है |

जहाँ भारत से उत्प्रवास का प्रश्न है ऐसा अनुमान है कि भारतीय डायस्पोरा के लगभग 1.25 करोड़ लोग है जो विश्व के लगभग 110 देशों में फैले हुए है | जिनमें मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, कनाडा, इंग्लैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कैरिबियन द्वीप समूह तथा पश्चिमी एशिया के देशों  (संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, कुवैत, साउदी अरब) आदि देशों में भारतीय लोग उत्प्रवास करते है |

 

प्रवास के परिणाम

प्रवास के अच्छे तथा बुरे दोनों ही प्रकार के परिणाम होते है | प्रवास के कारण किसी क्षेत्र में जीवन पर आर्थिक, जनांकिकीय, सामाजिक तथा पर्यावरणीय परिणाम होते है | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

आर्थिक परिणाम

बहुत से लोग आर्थिक लाभ के लिए प्रवास करते हैं | प्रवास का सबसे बड़ा परिणाम भी आर्थिक लाभ ही है | देश के बाहर जाने वाले प्रवासी अधिक धन कमाते हैं  और उससे अपने परिवार की आर्थिक सहायता करते हैं | अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली हुंडियाँ विदेशी विनिमय के प्रमुख स्त्रोतों में से एक है | विश्व बैंक की प्रवास और हुंडी तथ्य- पुस्तिका 2008 के अनुसार विदेशों से हुंडी प्राप्त करने वाले देशों में भारत का प्रथम स्थान है | 2007 में भारत ने हुंडियों के रूप में 27 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्राप्त किए थे | भारत के बाद चीन, मैक्सिकों, फिलीपीन्स, फ्रांस तथा स्पेन  आदि देश है जो प्रवास के कारण अच्छी विदेशी हुंडियाँ प्राप्त करते है | प्रवास के कारण निम्नलिखित आर्थिक परिणाम देखने कों मिलते हैं |

1)      पंजाब, केरल तथा तमिलनाडु अपने अपने राज्यों से विदेशों में गए प्रवासियों से महत्वपूर्ण राशि हुंडी के रूप में प्राप्त करते हैं | इन हुंडियों  से प्राप्त धन का प्रयोग भोजन, ऋणों की अदायगी, रोगों के इलाज, विवाह , बच्चों की शिक्षा, कृषीय निवेश, गृह निर्माण आदि कार्यों में किया जाता है |

2)      बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिसा, आन्ध्रप्रदेश तथा हिमाचलप्रदेश आदि राज्यों के हजारों निर्धन गाँवों की अर्थव्यवस्था के लिए ये हुंडियाँ जीवन दायक रक्त का काम करती हैं |

3)      पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश में हरित क्रान्ति के कारण पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश तथा ओडिसा से बड़ी संख्या में कृषि मजदूरों ने प्रवास किया है | जिससे इन प्रदेशों में भी रोजगार की समस्या उत्पन्न होने लगी है |

4)      रोजगार की तलाश में महानगरों में बड़ी संख्या में अनियमित रूप से पलायन हो रहा है जिससे रोजगार के साथ- साथ भीड़ – भाड़ की समस्या और मलिन बस्तियों की समस्या भी पैदा हो गई है |

जनांकिकीय परिणाम

प्रवास से देश के अंदर जनसंख्या के वितरण में जनांकिकीय असंतुलन पैदा हो जाता है | ग्रामीण इलाकों से युवा आयु वर्ग वाले दक्ष और कुशल लोगों का नगरों की ओर प्रवास करने से ग्रामीण जनांकिकीय संघटन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | उदाहरण के लिए उत्तराखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश और पूर्वी महाराष्ट्र से होने वाले बाह्य प्रवास ने इन राज्यों की आयु लिंग संरचना में गंभीर असंतुलन पैदा कर दिया है | इसी तरह के असंतुअलं उन राज्यों में भी उत्पन्न हो गए है जिनमें ये प्रवासी लोग जाकर बस जाते है |

सामाजिक परिणाम

1)      प्रवासी लोग सामाजिक परिवर्तन के अच्छे माध्यम होते है | क्योंकि ये नवीन प्रौद्योगिकी, परिवार , भोजन , बालिका शिक्षा, रीति रिवाज, आदि के संबंध में नए विचारों का प्रसार करते है |

2)      प्रवास से विविध संस्कृतियों का अंतमिश्रण होता है | जिससे संकीर्ण विचारों के भेदन तथा लोगों के मानसिक क्षितिज कों  विस्तृत करने में सहायता मिलती है |

3)      प्रवास के कुछ नकारात्मक परिणाम भी समाज में देखने कों मिलते है | प्रवास के कारण गुमनामी होती है |  जो व्यक्तियों में सामाजिक निर्वात और खिन्नता की भावना भर देती है | खिन्नता की सतत भावना लोगों कों अपराध और औषध दुरूपयोग (ड्रग्स लेना या दवाओं के द्वारा नशा करना ) जैसी असामाजिक क्रियाओं के जाल में फँसने के लिए अभिप्रेरित करती है |

4)      प्रवास में अलग –अलग  क्षेत्रों से लोग आते है उनकी भाषा, रीति रिवाज, धर्म आदि अलग होने से भाईचारे की भावना भी कम होती जा रही है |

पर्यावरणीय परिणाम

1)      बड़ी संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों की ओर प्रवास करते हैं | जिसके कारण लोगों का अति संकुलन नगरीय क्षेत्रों में  भीड़ भाड़  बढ़ जाती है | जो नगरों के सामाजिक और भौतिक अवसंरचना (आधारभूत ढाँचे) पर दबाव डालता है |

2)      प्रवास के कारण बढ़ी हुई जनसंख्या से मलिन बस्तियों तथा क्षुद्र कॉलोनियों का विस्तार होता है |  जिससे नगरीय पर्यावरण प्रदूषित होता है |

3)      भीड़ भाड़ से प्राकृतिक संसाधनों का अति शोषण होता है | भौम जल का अधिक उपयोग होने से भौम जल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है | जल की कमी होती है |

4)      इनके अतिरिक्त जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, वाहित मल के निपटान तथा ठोस कचरे के प्रबंधन जैसी अनेकों गम्भीर समस्याएँ पैदा हो जाती है |

प्रवास के अन्य परिणाम

प्रवास महिलाओं के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है | ग्रामीण इलाकों में पुरुष रोजगार की तलाश में अपनी पत्नियों कों छोड़कर नगरों की ओर प्रवास करते है | जिससे महिलाओं पर अत्यधिक शारीरिक दबाव पड़ता है | शिक्षा एवं रोजगार के लिए स्त्रियों द्वारा प्रवास उनकी स्वायत्तता और अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका कों बढता है | परन्तु उन्हें सुभेद्य भी बना देता है |

            प्रवास की प्रक्रिया के कारण स्त्रोत प्रदेश (उद्गम क्षेत्र ) कों सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि प्रवासियों के परिवार कों हुंडियों के रूप में धन मिलता है | परन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि स्त्रोत प्रदेश (उद्गम क्षेत्र ) से कुशल व्यक्तियों का अभाव हो जाता है |

विश्व स्तर पर कुशलता का महत्व बढ़ गया है और वैश्विक बाजार वास्तव में कुशलता का बाजार बन गया है | गत्यात्मक औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ गरीब प्रदेशों से उच्च प्रशिक्षित व्यवसायिकों कों सार्थक अनुपात में प्रवेश दे रही है  और भर्ती कर रही हैं | परिणाम स्वरूप स्त्रोत प्रदेश (उद्गम क्षेत्र ) के  वर्तमान में चल रहे अल्पविकस को बल मिलता है |

 


Friday, October 29, 2021

Population of India : Distribution

 

जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

कक्षा- 12 (भूगोल)

भारत की जनसंख्या

            भारत विश्व के अधिकतम जनसंख्या वाले देशों में से एक है | भारत विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 2.4 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है जबकि यहाँ पर विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है |

            सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ है | जनसंख्या के हिसाब से भारत चीन के बाद दूसरा स्थान है | भारत की कुल जनसंख्या उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक है |

 

भारत की विशाल जनसंख्या का प्रभाव

विशाल जनसंख्या के कारण बहुत अधिक समस्याएँ सामने आती है | जो निम्नलिखित हैं |

1)      प्राय: यह तर्क दिया जाता है कि इतनी बड़ी जनसंख्या निश्चित तौर पर देश के सीमित संसाधनों पर दबाव डालती है |

2)      देश में अनेक सामाजिक आर्थिक समस्याओं के लिए उत्तरदायी है |

3)      जनसंख्या के अधिक बोझ के कारण गरीबी एक विकराल रूप धारण कर रही है |

4)      विशाल जनसंख्या ने पर्यावरण संबंधी कई समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं |

 

भारत में जनसंख्या की गणना (जनगणना)  या जनसंख्या के आँकड़ों के स्त्रोत

भारत में जनसंख्या से संबंधित आँकडों कों प्रति दस वर्ष के बाद होने वाली जनगणना के द्वारा एकत्रित किए जाते है | भारत में पहली जनगणना 1872 ई० में हुई थी | लेकिन यह पूर्ण नहीं थी | भारत की पहली सम्पूर्ण जनगणना  1881 ई० में हुई थी |  हमारे देश की अंतिम जनगणना सन् 2011 में हुई थी | अब तक कुल 14 संपूर्ण जनगणना हो चुकीं है | अगली (पंद्रहवी) जनगणना सन् 2021 में होनी है |  

 

भारत में जनसंख्या वितरण

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल  जनसंख्या 121.02 करोड़ है | भारत की इतनी विशाल जनसंख्या समान रूप से देश में वितरित नहीं है बल्कि असमान रूप से देश के विभिन्न भागों में वितरित है |

देश के विशाल आकार वाले राज्यों की जनसंख्या कों देखते है तो पता चलता है कि उत्तरप्रदेश भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है  यहाँ  सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 19.95 करोड़ लोग रहते हैं | 11.23 करोड़ जनसंख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है | बिहार में 10.38 करोड़ जनसंख्या निवास करती है | इसके बाद पश्चिम बंगाल में 9.13 करोड़ तथा आंध्रप्रदेश की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 8.46 करोड़ थी | ये पाँच बड़े राज्यों में देश की लगभग 50 % (आधी) जनसंख्या पाई जाती है | देश के दस राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र , बिहार,बंगाल पश्चिम बंगाल आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान कर्नाटक तथा गुजरात भारत की लगभग 76 प्रतिशत जनसंख्या रहती है |  

            जबकि विशाल आकार होते हुए भी कुछ राज्य ऐसे है जिनमें बहुत ही कम जनसंख्या रहती है | जैसे सन् 2011 की जनगणना के अनुसार ही जम्मूकश्मीर में देश की केवल 1.04 %, अरुणाचलप्रदेश  में देश की  0.84% तथा उत्तराखंड में  केवल 0.83 % जनसंख्या ही निवास करती है | क्षेत्रफल की हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में कुल जनसंख्या का केवल 5.67% हिस्सा ही रहता है |

            सिक्किम सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य है जहाँ लगभग 6 लाख लोग ही रहते है | जो देश की जनसंख्या का केवल 0.05% जनसंख्या ही है | इसके अलावा अधिकाशं उत्तरी पूर्वी राज्यों जैसे नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश राज्यों में देश की बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है |

  

केन्द्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में सबसे अधिक जनसंख्या मिलती है | जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप समूह में बहुत ही कम संख्या में लोग रहते हैं |

 

 

जनसंख्या का विषम स्थानिक वितरण जनसंख्या और देश के भौतिक, समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध  

या

भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के कारण

भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है | जनसंख्या का यह विषम स्थानिक वितरण देश की जनसंख्या और देश के भौतिक (भौगोलिक ), समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध प्रकट करता है |  ये कारक जनसंख्या के वितरण कों अत्यधिक प्रभावित करते है | इनका वर्णन निम्न प्रकार से है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक

भौतिक कारकों में धरातल, जलवायु तथा जल की उपलब्धता आदि प्रमुख है | ये कारक जनसंख्या के वितरण कों काफी प्रभावित करते हैं | जैसे भारत के उत्तरी मैदान, डेल्टाओं और तटीय मैदानों में जनसंख्या का अनुपात दक्षिणी तथा मध्य भारत के राज्यों के आंतरिक जिलों में अधिक है क्योंकि मैदानी भाग पर लोग अधिक रहना पसंद करते है |

            हिमालय, उत्तरी-पूर्वी राज्यों में विरल जनसंख्या पाई जाती है | जो की पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी विरल जनसंख्या मिलती है |

हिमालय पर्वतीय राज्यों में खास तौर पर हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर में विषम जलवायु के कारण बहुत ही कम लोग रहते है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी जलवायु की विषमता  तथा जल की कमी लोगों के रहने के उपयुक्त स्थान नहीं उपलब्ध होने देती है अत: वहाँ भी जनसंख्या विरल है |

कुछ पठारी क्षेत्रों में भी भौतिक कारकों के करण जैसे जल की की कमी से जनसंख्या अपेक्षाकृत कम मिलती है |

            इन क्षेत्रों में नहरों के विकास तथा आर्थिक विकास संबंधी कर उपलब्ध कराने के बाद जनसंख्या का अनुपात उच्च होता जा रहा है | जैसे राजस्थान में  इंदिरा गाँधी नहर से सिंचाई की व्यवस्था के बढ़ने और झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार में खनिजों एवं ऊर्जा के अपार भण्डारों के कारण इन राज्यों में मध्यम से उच्च जनसंख्या अनुपात मिलता है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारक

इन कारकों में स्थाई कृषि उद्भव और विकास, मानव बस्ती के प्रतिरूप, परिवहन जाल तंत्र का विकास, औद्योगिकरण और नगरी करण महत्वपूर्ण हैं |

समान्यत: नदी घाटियों के मैदानों, तथा तटीय क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है | क्योंकि इन इलाकों में मानव बस्तियों के आरम्भिक इतिहास और परिवहन जाल तंत्र के विकास के कारण जनसंख्या का सांद्रण  उच्च बना हुआ है |

दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलौर, पुणे, अहमदाबाद, चेन्नई और जयपुर के नगरीय क्षेत्र औद्योगि विकास तथा नगरीकरण के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों कों अपनी और आकृषित कर रहे है | इसलिए इन क्षेत्रों में जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है |