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Friday, December 5, 2025

PRINT CULTURE AND MODERN WORLD LESSON 5 10TH CLASS HISTORY (HINDI MEDIUM)

मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

अध्याय -5

कक्षा -10वीं

प्रश्न 1 : सबसे पहले मुद्रण की तकनीक किन देशों में विकसित हुई ?

उत्तर : मुद्रण कि सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई |

प्रश्न 2: वुड ब्लॉक प्रिंटिंग की तकनीक किस देश में सबसे पहले किस देश में और कब विकसित की गई ?

उत्तर : वुड ब्लॉक प्रिंटिंग की तकनीक सबसे पहले चीन में लगभग  594ई० विकसित की गई थी |

प्रश्न 3: चीन में लगभग  594ई० किताबें किस तरह छापी जाती थी ?

अथवा

प्रश्न : चीन में किस शैली की किताबें बनाई जाती थी ?

उत्तर : तकरीबन 594ई० से चीन में स्याही से लगे काठ के ब्लॉक या तख्ती पर रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं | चूँकि पतले, छिद्रित कागज के दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी, इसलिए पारम्परिक चीनी किताब ‘एकार्डियन’ शैली में किनारों को मोड़ने के बाद सिल कर बनाई जाती थी |

प्रश्न 4: सुलेखक या खुश खत किसे कहा जाता था ?

उत्तर : किताबों का सुलेखन या खुशनवीसी करने वाले लोग दक्ष सुलेखक या खुशखत होते थे, जो हाथ से बड़े सुंदर –सुडौल अक्षरों में सही –सही कलात्मक लिखाई करते थे | 

प्रश्न 5 : एक लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतन्त्र था | इस कथन पक्ष में तर्क दीजिए |

उत्तर : एक लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतन्त्र था |  क्योंकि सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त चीन की नौकरशाही भी विशालकाय थी, तो चीनी राजतन्त्र इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था | सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी, लिहाजा छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई |

प्रश्न 6: सत्रहवीं सदी तक आते –आते चीन में छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आई | उदाहरणों द्वारा इस तथ्य का विश्लेषण कीजिए |

उत्तर : सत्रहवीं सदी तक आते –आते चीन में छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आई | जो निम्न उदाहरणों से स्पष्ट है |

     (i)            सत्रहवीं सदी तक आते –आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने –फूलने से छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आई |

   (ii)            अब मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता सिर्फ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे |

 (iii)            व्यापारी अपने रोजमर्रा के कारोबार की जानकारी लेने के लिए मुद्रित सामग्री का इस्तेमाल करने लगे |

  (iv)            पढ़ना एक शगल भी बन गया | नए पाठक वर्ग को काल्पनिक किस्से, कहानियाँ, कविताएँ , आत्मकथाएँ, शास्त्रीय साहित्यिक कृतियों के संकलन और रूमानी नाटक पसंद थे |

    (v)            अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू कर किया और कुछ ने स्वरचित काव्य और नाटक भी छापे |  

प्रश्न 7: क्या कारण थे कि उन्नीसवीं सदी के अंत में शंघाई प्रिंट –संस्कृति का नया केन्द्र बन गया ?

उत्तर : चीन में पढ़ने की नई संस्कृति एक मुद्रण की नयी तकनीक के साथ आई | उन्नीसवीं सदी के अंत में पश्चिमी शक्तियों द्वारा अपनी चौकियाँ स्थापित करने के साथ ही पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रैस का आयात भी हुआ | इस तरह  पश्चिमी शैली के स्कूलों की जरूरतों को पूरा करने वाला शंघाई प्रिंट –संस्कृति का नया केन्द्र बन गया |  हाथ की छपाई की जगह अब धीरे-धीरे मशीनी या यांत्रिक छपाई ने ले ली |  

प्रश्न 8 : जापान में मुद्रण की तकनीक कब और कौन लोग लेकर आए ?

उत्तर : चीनी बौद्ध प्रचारक 768 -770 ई० के आस पास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए |

प्रश्न 9: जापान की सबसे पहली पुस्तक का क्या नाम है ? यह पुस्तक कब छापी गई ?

उत्तर : जापान की सबसे पुरानी पुस्तक डायमंड सूत्र है| यह 868 ई० में छापी गई |

प्रश्न 10 : जापान में तस्वीरें अकसर  किस प्रकार की सतह पर बनाई जाती थी ?

जापान में तस्वीरें अकसर कपड़ों, ताश के पत्तों, और कागज के नोटों पर बनाई जाती थीं |

प्रश्न 11 : जापान के शहर तोक्यो को अठारहवीं सदी के अंत तक किस नाम से जाना जाता था ?

उत्तर : एदो

प्रश्न 12 : त्रिपिटका कोरियाना की मुख्य विशेषताएँ बताइए |

उत्तर : 13वीं शताब्दी के मध्य में त्रिपिटका कोरियाना, वुड ब्लॉक्स मुद्रण के रूप में बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह है |

इन ग्रंथों को लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया है |  इन्हें 2007 में यूनेस्कों मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया है |

प्रश्न 13 : कितागावा उतामारो कौन थे ? उन्होंने किस प्रकार की चित्रात्मक शैली में अहम योगदान किए ? इनकी छपी प्रतियों ने किन लोगों को प्रभावित किया ?

उत्तर : कितागावा उतामारो 1753 ई० में एदो में पैदा हुए  थे |

कितागावा उतामारो ने उकियो (तैरती दुनिया के चित्र)  नाम की एक नयी चित्रात्मक शैली में अहम योगदान किए, जिनमें आम शहरी जीवन का चित्रण किया गया |

इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँची और माने, मोने और वान गॉग जैसे चित्रकारों को प्रभावित किया |

इस प्रक्रिया में मूल आरेख तो गायब हो जाता था, पर उसकी छपी नकल बच जाती थी |  

प्रश्न 14 : वुड ब्लॉकप्रिंट या तख्ती की छपाई यूरोप में  1295 बाद आई | इसके क्या कारण थे ?

उत्तर : सदियों तक  चीन से रेशम और मसाले रेशम मार्ग से यूरोप आते रहे थे | ग्यरहवीं सदी में चीनी कागज भी उसी रास्ते वहाँ पहुँचा | 

1295 ई० मार्को पोलो नामक महान खोजी यात्री चीन में काफी सालों तक खोज करने के बाद इटली वापस लौटा |

चीन के पास वुड बलॉक (काठ की तख्ती)  वाली छपाई की तकनीक पहले से मौजूद थी | मार्को पोलो यह ज्ञान अपने साथ लेकर लौटा | इतालवी भी तख्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाकि यूरोप में फ़ैल गई |

प्रश्न 15 : यूरोप में मुद्रित किताबों को सस्ती, अश्लील मानने वाले कुलीन वर्गों और भिक्षु –संघों के लिए छपी किताबों के विलासी संस्करण किस पर छपते थे ?

उत्तर : यूरोप में मुद्रित किताबों को सस्ती, अश्लील मानने वाले कुलीन वर्गों और भिक्षु –संघों के लिए छपी किताबों के विलासी संस्करण अभी भी बेशकीमती वेलम  (Vellum) या चर्म पत्र पर ही छपते थे |

प्रश्न 16: व्यापारी और विश्व विद्यालय के विद्यार्थी किस प्रकार की किताबें खरीदतें थे ?

उत्तर : व्यापारी और विश्व विद्यालय के विद्यार्थी सस्ती मुद्रित किताबें ही खरीदते थे |  

प्रश्न 17 : जापान में मुद्रण संस्कृति के विकास के बारे में उल्लेख कीजिए ?

उत्तर : जापान में मुद्रण के विकास को हम इस तथ्यों से समझ सकते हैं |

     (i)            चीनी बौद्ध प्रचारक 768 -770 ई० के आस पास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए |

   (ii)            जापान की सबसे पुरानी पुस्तक डायमंड सूत्र है| यह 868 ई० में छापी गई |

 (iii)            जापान में तस्वीरें अकसर कपड़ों, ताश के पत्तों, और कागज के नोटों पर बनाई जाती थीं |

  (iv)            मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी छपते थे |

    (v)            प्रिंट के आने से किताबें सस्ती और सुलभ थी |

  (vi)            हाथ से मुद्रित तरह –तरह की सामग्री –महिलाओं , संगीत के साजों, हिसाब –किताब, चाय अनुष्ठान, फूल साजी, शिष्टाचार और रसोई पर लिखी किताबों- से पुस्तकालय एवं दुकानें अटी पड़ी थी |

प्रश्न 18 : उकियों (तैरती दुनिया) की चित्रात्मक शैली में क्या कमियाँ थी ?

उत्तर : उकियों (तैरती दुनिया) की चित्रात्मक शैली में निम्न प्रकार की कमियाँ या नकारात्मकता  थी | |

उत्तर : उकियों चित्रात्मक शैली के आने से प्रकाशकों के द्वारा विषय चुनकर कलाकरों से उन पर चित्र बनाने का करार किया जाता था |

फिर चित्रकार विषय की रुपरेखा बनाते थे | इसके बाद हुनरमंद वुड ब्लॉक शिल्पी चित्रकार द्वारा बनाई गई रूपरेखा को तख्ती पर चिपकाकर उसकी आकृति को उकेर लेते थे |

प्रश्न 19 : हस्तलिखित पांडुलिपियों में कौन सी कठिनाइयाँ पेश आई ?

अथवा

प्रश्न : सोलहवीं सदी में पुस्तकों के लिए यूरोपियन की माँग को हस्तलिखित पांडुलिपियों का उत्पादन संतुष्ट क्यों नहीं कर पाया था ? कारण बताएँ |

उत्तर : किताबों की अबाध बढ़ती माँग हस्तलिखित पांडुलिपियों से पूरी नहीं होने वाली थी |

पांडुलिपियों की नकल उतरना बेहद खर्चीला, समयसाध्य श्रमसाध्य काम था |

पांडुलिपियाँ अकसर नाज़ुक होती थी | उनके लाने –ले जाने, रख रखाव में तमाम मुश्किलें थीं |

पांडुलिपियों को पढ़ना आसान नहीं था |

प्रश्न 20 : यूरोप में मुद्रण संस्कृति के प्रसार में सहायक कोई पाँच तत्वों का वर्णन करो |

अथवा                  

प्रश्न : यूरोप में वूड ब्लॉक प्रिंटिंग, (तख्ती की छपाई ) उत्तरोतर लोकप्रिय होता गया |  इसके कौन –कौन से कारण थे ?

उत्तर :यूरोप में वूड ब्लॉक प्रिंटिंग, (तख्ती की छपाई ) उत्तरोतर लोकप्रिय होने के निम्नलिखित कारण थे |

     (i)            किताबों की अबाध बढ़ती माँग हस्तलिखित पांडुलिपियों से पूरी नहीं होने वाली थी |

   (ii)            पांडुलिपियों की नकल उतरना बेहद खर्चीला, समयसाध्य श्रमसाध्य काम था |

 (iii)            पांडुलिपियाँ अकसर नाज़ुक होती थी | उनके लाने –ले जाने, रख रखाव में तमाम मुश्किलें थीं |

  (iv)            इसलिए उनका सर्कुलेशन – (चलन, गश्त) सीमित रहा तो किताबों की बढ़ती माँग के चलते वूड ब्लॉक प्रिंटिंग, (तख्ती की छपाई ) उत्तरोतर लोकप्रिय होता गया | 

प्रश्न 21: पन्द्रहवीं शताब्दी की शुरुआत तक  यूरोप  में बड़े पैमाने पर तख्ती की छपाई का इस्तेमाल करके किस प्रकार के चित्र चित्र छापे जा रहे थे ?

उत्तर : पन्द्रहवीं शताब्दी की शुरुआत तक  यूरोप  में बड़े पैमाने पर तख्ती की छपाई का इस्तेमाल करके कपड़े, ताश के पत्ते और छोटी –छोटी टिप्पणियों के साथ धार्मिक चित्र छापे जा रहे थे |

प्रश्न 22 : गुटेन्बर्ग प्रेस पर टिप्पणी कीजिए |

उत्तर : स्ट्रैसबर्ग के योहान गुटेनबर्ग  ने सबसे पहले आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का अविष्कार किया था |

गुटेन्बर्ग के पिता व्यापारी थे, और वह खेती की एक बड़ी रियासत में पल –बढ़कर बड़ा हुआ | वह बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीने (Press) देखता आया था |

उसने पत्थर पर पॉलिस करने की कला सीखी फिर सुनारी और अंत में उसने शीशे को इच्छित आकृतियों को गढ़ने में महारत हासिल कर ली |

अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल उसने अपने नए अविष्कार में किया |

जैतून प्रेस ही  प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श बना, और साँचें का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़नें के लिए किया गया | गुटेन्बर्ग ने 1448  तक अपना यह यंत्र मुकम्मल कर लिया था | उसने पहली किताब  बाइबिल छापी थी |

प्रश्न 23 : गुटेन्बर्ग ने पहली किताब  कौन-सी छापी थी | बाइबिल की तकरीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे कितने  साल लगे थे ?

उत्तर : गुटेन्बर्ग ने पहली किताब  बाइबिल छापी थी | तकरीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे तीन साल लगे | जो उस समय के हिसाब से काफी तेज था |

प्रश्न : गुटेन्बर्ग  प्रेस के द्वारा शुरू –शुरू में तो छपी किताबों की कौन –कौन सी विशेषताएँ थी ?

अथवा

प्रश्न : शुरू –शुरू में छपी किताबें पांडुलिपियों से किस प्रकार काफी मिलती जुलती थी  

उत्तर : मुद्रण तकनीक से ये किताबें शुरू –शुरू में पांडुलिपियों से ज्यादा अलग नहीं थी | इन किताबों की निम्नलिखित विशेषताएँ थी |

     (i)            शुरू –शुरू में तो छपीकिताबें अपने रंग –रूप और साज –सज्जा में हस्तलिखित पांडुलिपियों जैसी दिखती थीं |

   (ii)            धातुई अक्षर हाथ की सजावटी  शैली का अनुकरण करते थे |

 (iii)            हाशिए पर फूल –पत्तियों की डिजाइन बनाई जाती थी, और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे |

  (iv)            अमीरों के लिए बनाई गई किताबों के पन्ने पर हाशिये की जगह बेल –बूटों के लिए खाली छोड़ दी जाती थी |

    (v)            हर खरीददार अपनी रूचि के हिसाब से डिजाइन और पेंटर खुद तय करके उसे सँवार सकता था |  

प्रश्न 24 : कोरिया की जिक्जी को यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में क्यों अंकित किया गया है ?

उत्तर :कोरिया की जिक्जी (Jikji) मूवेबल मेटल टाइप (Movable metal type) के साथ मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से है |

इसमें से ज़ेन बौद्ध धर्म  की मुख्य विशेषताएँ हैं |

पुस्तक में भारत, चीन और कोरिया के लगभग 150 बौद्ध भिक्षुओं का उल्लेख किया गया है |

इसे 14 वीं शताब्दी के अंत में मुद्रित किया गया था |

पुस्तक का पहला खण्ड उपलब्ध नहीं है, दूसरा खण्ड फ्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में उपलब्ध है |

यह कार्य मुद्रण संस्कृति में  एक महत्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन साबित हुआ |

यही कारण है कि इसे 2001 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया है |

प्रश्न 25 : वेलम (Vellum) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : चर्म –पत्र या जानवरों के चमड़े से बनी लेखन की सतह को वेलम कहा जाता है |   

प्रश्न 26 : प्लाटेन किसे कहते हैं ?

उत्तर : प्लाटेन एक बोर्ड होता है, जो लेटर प्रेस छपाई में प्रयोग किया जाता था |  जिसे कागज के पीछे दबाकर टाइप की छाप ली जाती थी | पहले यह बोर्ड काठ (लकड़ी) का होता था , बाद में इस्पात का बनने लगा |

प्रश्न 27 : कम्पोजीटर किसे कहा जाता है ?

उत्तर : छपाई के लिए इबारत तैयार करने वाला व्यक्ति कम्पोजीटर कहलाता है |

प्रश्न 28 : गैली से आप समझते हैं ?

उत्तर : गैली एक धातुई फ्रेम होता है जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाई जाती है |

प्रश्न 29 : गाथा-गीत (Ballad) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : लोकगीत का ऐतिहासिक आख्यान, जिसे गाया या सुनाया जाता है  गाथा-गीत (Ballad)  कहलाता है |

प्रश्न 30 : शराब घर से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : शराब घर (Tavern) वह जगह जहाँ लोग शराब पीने, खाने, दोस्तों से मिलने और बात विचार  के लिए आते थे |

प्रश्न 31 : सोलहवीं सदी में मुद्रक का कार्यस्थल कैसा दिखाई देता था | एक तसवीर  के उदाहरण से बताएँ |

सोलहवीं सदी की एक  तसवीर से पता चलता है कि सोलहवीं सदी में मुद्रक का कार्यस्थल (एक मुद्रक की वर्कशॉप) कैसा दिखाई देता था |

सारे काम एक ही छत के नीचे चल रहे है |

दाएँ छोर पर अगले हिस्से में कम्पोजीटर काम कर रहे हैं |

बाएँ सिरे पर गैलीज तैयार किए जा रहे हैं और धातुई अक्षरों पर स्याही लगाई जा रही है |

पृष्ठभूमि में प्रिंटर्स प्रेस के पेंच कस रहे हैं और उन्हीं के पास प्रूफरीडर काम में जुटे हैं |

बिल्कुल अगले भाग में तैयार माल पड़ा है | ये दो- दो पृष्ठ वाले छपे पन्ने हैं जिनकी बाइंडिंग होनी है |

प्रश्न 32 : मुद्रण क्रान्ति क्या थी ? उसका लोगों के जीवन पर क्या असर हुआ ?

उत्तर : पुस्तकों के उत्पादन का नया तरीका मुद्रण क्रान्ति कहलाता है |

छापेखाने का अविष्कार महज़ तकनीकी दृषि से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था |

पुस्तक –उत्पादन के नए तरीकों ने लोगों की जिन्दगी बदल दी |

इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, संस्थाओं और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया |

इससे लोगों में लोकचेतना बदली

लोगों में चीजों के देखने का नजरिया भी बदला गया | 

प्रश्न 33: छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) के आने से एक नए पाठक वर्ग का उदय कैसे हुआ ?

उत्तर : छापेखाने के आने से नए पाठक वर्ग का उदय  हुआ | इसके निम्न कारण थे |

     (i)            छपाई से किताबों की कीमत गिरी |

   (ii)            किताब की हर प्रति के उत्पादन में जो वक्त और श्रम लगता था, वह कम हो गया और,|

 (iii)            बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापने आसान हो गया | |

  (iv)            बाज़ार किताबों से भर गए |

प्रश्न 34 : प्रिंट का जीवन के क्षेत्रों में क्या महत्व था ?

उत्तर : छापेखाने से विचारों के व्यापक प्रचार –प्रसार और बहस –मुबाहिसे के द्वार खुले |

स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छाप कर उन्हें फैला सकते थे |

छपे हुए संदेश के जरिये वे लोगों को अलग ढंग से सोचने के लिए मना सकते थे, या कोई कार्यवाही करने के लिए प्रेरित कर सकते थे | ज़ाहिर है कि इस बात का जीवन के कई क्षेत्रों में गम्भीर महत्व था |

प्रश्न 35 : प्रिंट को लेकर क्या डर था ?

अथवा

प्रश्न : हर कोई मुद्रित किताब को लेकर खुश  क्यों नहीं था ?

अथवा

प्रश्न : सभी ने मुद्रित किताबों स्वागत क्यों नहीं किया ?

उत्तर : , जिन्होंने इसका स्वागत भी किया, उनके मन में भी इसको लेकर कई डर थे |

     (i)            स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छाप कर उन्हें फैला सकते थे |

   (ii)            छपे हुए संदेश के जरिये वे लोगों को अलग ढंग से सोचने के लिए मना सकते थे, या कोई कार्यवाही करने के लिए प्रेरित कर सकते थे | ज़ाहिर है कि इस बात का जीवन के कई क्षेत्रों में गम्भीर महत्व था |

 (iii)            कई लोग को छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्द की सुगमता को लेकर आशंका थी कि न जाने इसका आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर हो |

  (iv)            भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोई नियंत्रण न होगा तो लोगों में बागी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे |

    (v)            अगर ऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी |

 

प्रश्न 36 : मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की इसके क्या कारण थे ?

अथवा

प्रश्न : प्रिंट के प्रति तहेदिल से कृतज्ञ लूथर ने कहा, “ मुद्रण ईश्वर की महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफा |” मार्टिन लूथर ने ऐसा क्यों कहा ?

उत्तर : धर्म –सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ लिखी | इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरिजाघर के दरवाजे पर टाँगी गई | इसमें लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी |  

जल्द ही लूथर के लेख बड़ी तादाद में छपे और पढ़े जाने लगे |

कुछ ही हफ्तों में न्यू –टेस्टामेंट के लूथर के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गई , और  तीन महीने के अन्दर दूसरा संस्करण निकालना पड़ा |

प्रिंट के प्रति तहेदिल से कृतज्ञ लूथर ने कहा, “ मुद्रण ईश्वर की महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफा |”

प्रश्न 37 : विवेक का प्रतीक किसे कहा गया है ?

उत्तर : मर्करी (दूत देव ) को विवेक का प्रतीक कहा गया है |

प्रश्न 38 : विद्या की देवी किसे कहा गया है ?

उत्तर : मिनर्वा को विद्या की देवी कहा गया है |

प्रश्न 39 : प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : सोलहवीं सदी में यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च में सुधार का आंदोलन प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार कहलाता है | मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेंट सुधारकों में से एक थे | इस आंदोलन से कैथोलिक ईसाई मत के विरोध में कई धाराएँ निकलीं |

प्रश्न 40 : रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य में प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी थी इसके क्या कारण थे ?

उत्तर : मुद्रण और प्रतिरोध छपे हुए साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग –अलग व्याख्याओं से परिचित हुए |

उदाहरण स्वरूप सोलहवीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने इलाके में उपलब्ध किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया था | उन किताबों के आधार पर उसने बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए, और उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथोलिक चर्च उससे क्रुद्ध हो गया |

ऐसे धर्म विरोधी विचारों को दबाने के लिए रोमन चर्च ने जब इन्क्विजिशन शुरू किया तो मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और आख़िरकार उसे मौत की सजा दे दी गई |

धर्म के पास ऐसे पाठ और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान रोमन चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर पाबंदियाँ लगाई, और 1558 ई० से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगे |

प्रश्न 41 : इन्क्विजिशन (धर्म-अदालत) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : सोलहवीं सदी में यूरोप में  विधर्मियों की शिनाख्त करने और सजा देने वाली रोमन कैथोलिक संस्था को इन्क्विजिशन (धर्म-अदालत)  कहा जाता था |

प्रश्न 42: धर्म विरोधी को परिभाषित कीजिए | मध्यकाल में चर्च विधर्मियों या धर्म द्रोह के प्रति सख्त क्यों था ?

उत्तर : इंसान या विचार जो चर्च की मान्यताओं से असहमत हो उसे धर्मविरोधी कहा जाता है | मध्यकाल में चर्च विधर्मियों या धर्म द्रोह के प्रति सख्त था , उसे लगता था कि लोगों की आस्था, उनके विश्वास पर सिर्फ उसका अधिकार है, और उसकी बात ही अंतिम है |

 

प्रश्न 43: छपी किताब  को लेकर इरैस्मस के विचारों पर टिप्पणी कीजिए ?  

उत्तर : इरैस्मस एक लातिन के विद्वान और कैथोलिक धर्म सुधारक था | जिसने कैथोलिक धर्म की ज्यादतियों की आलोचना की थी |

उसने लूथर से भी एक दूरी बनाकर रखी |

वह प्रिंट को लेकर बहुत आशंकित था |

उसने अपनी पुस्तक एडेजेज (1508) मुद्रित किताबों की आलोचना करते हुए लिखा कि  ‘किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं दुनिया का कौन सा कोना है,जहाँ ये नहीं पहुँच जाती ? हो सकता है कि जहाँ-तहाँ एकाध जानने लायक चीजें भी बताएँ लेकिन इनका ज्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए  हानिकारक ही है |

उसके अनुसार किताबें बेकार ढेर हैं, क्योंकि अच्छी चीजों की अति भी हानिकारक ही है, इनसे बचना चाहिए |

इरैस्मस  मानता था कि (मुद्रक) दुनिया को सिर्फ तुच्छ चीजों से ही नहीं पाट रहे, बल्कि बकवास, बेवकूफ, सनसनीखेज, धर्मविरोधी, अज्ञानी और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता |’

प्रश्न 44 : द मैकबर डान्स (विभत्स नाच) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : इस सोलहवीं सदी की तस्वीर में, छपाई का खौफ़ किस नाटकीयता से पेश किया जा रहा था, यह देखा जा सकता है | इस बेहद दिलचस्प वुडकट (तख्ती-छाप) तसवीर में मुद्रण के आगमन को दुनिया के अंत से जोड़ा गया है | मुद्रक के वर्कशॉप को मौत के नाच का मंच बताया गया है | मुद्रक और उसके मजदूर कंकालों के नियंत्रण में हैं, और  कंकाल उनसे मनचाही चीजे छपवाते हैं |

प्रश्न  45 :  सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप में मुद्रक  (प्रकाशक) ज्यादा किताबें छापने लगे | इसके क्या कारण थे ?

उत्तर : सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप में मुद्रक  (प्रकाशक) ज्यादा किताबें छापने लगे | इसके निम्न कारण थे

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में साक्षरता दर बढ़ती रही |

अलग –अलग सम्प्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों –कारीगरों को शिक्षित करने लगे |

अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में तो साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई थी |

यूरोपीय देशों में साक्षरता और स्कूलों के प्रसार के साथ लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया |

लोगों को किताबें चाहिए थीं, इसलिए मुद्रक ज्यादा किताबें छापने लगे |

प्रश्न 46: सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप में पढ़ने के जूनून के प्रभावों का वर्णन कीजिए |

अथवा

प्रश्न : अठारहवीं सदी के यूरोप में पुस्तक विक्रेताओं ने पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए कैसे –कैसे प्रयास किए ? व्याख्या कीजिए |

उत्तर : अठारहवीं सदी के यूरोप में पुस्तक विक्रेताओं ने पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए |

     (i)            नए पाठकों की रूची का ध्यान रखते हुए किस्म –किस्म का साहित्य छपने लगा |

   (ii)            पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव –गाँव जाकर छोटी –छोटी किताबें बेचने वाले फेरीवालों को काम पर लगाया |

 (iii)            किताबें मुख्यत: पंचांग  के रूप में होती थी | इनके के अलावा लोक-गाथाएँ और लोकगीतों की हुआ करती थीं |  साथ में मनोरंजन –प्रधान सामग्री भी आम पाठकों तक पहुँचने लगी |

  (iv)            इंग्लैंड में पैनी चैपबुक्स या एक पैसिया किताबें बेचीं जाने लगी थी | इस पैनी चैपबुक्स (एक पैसिया किताबें) बेचने वालों को चैपमैन कहा जाता था | इन किताबों को गरीब तबके भी खरीदकर पढ़ सकते थे |

    (v)            फ़्रांस में बिब्लियोथीक ब्ल्यू नामक किताबें छपने लगी जो सस्ते कागज पर छपी और नीली जिल्द में बंधी छोटी किताबें हुआ करती थी |

  (vi)            इसके अलग चार –पाँच पन्ने की प्रेम कहानियाँ थीं, और अतीत की थोड़ी गाथाएँ थीं,जिन्हें ‘इतिहास’ कहते थे |

(vii)            अठारहवीं सदी के आरम्भ में पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें समसामयिक घटनाओं की खबर के साथ मनोरंजन भी परोसा जाने लगा |

(viii)            अखबार और पत्रों में युद्ध और व्यापार से जुड़ी जानकारी के अलावा दूर देशों की खबरें होती थीं | 

प्रश्न 47 : यूरोप में मुद्रण क्रान्ति शुरू होने के बाद वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के विचार आम लोगों तक पहुँचने लगे, कैसे ?

     (i)            अठारहवीं सदी के आरम्भ में पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें समसामयिक घटनाओं की खबर के साथ मनोरंजन भी परोसा जाने लगा |  उसी तरह वैज्ञानिक और दार्शनिक भी आम जनता की पहुँच के बाहर नहीं रहे |

   (ii)            प्राचीन व मध्यकालीन ग्रन्थ संकलित किए गए, और नक्शों के साथ –साथ वैज्ञानिक खाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए |

 (iii)            जब आइजैक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने अविष्कार प्रकाशित करने शुरू किए तो उनके लिए विज्ञान-बोध में एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार हो चुका था | 

  (iv)            टॉमस पेन, वोल्तेयर और ज्याँ जाक रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भी भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगी | ज़ाहिर है कि विज्ञान, तर्क और विवेकवाद के उनके विचार लोकप्रिय साहित्य में भी जगह पाने लगे | 

 

प्रश्न 48 : सम्प्रदाय किसे कहते हैं ?

उत्तर : किसी धर्म का एक उपसमूह समुदाय कहलाता है |

प्रश्न 49 : पंचांग किसे कहते हैं ?

उत्तर : चाँद,सूरज की गति, ज्वार –भाटा के समय और लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी अहम जानकारियाँ देता वार्षिक प्रकाशन पंचांग कहलाता है |

प्रश्न 50 : चैपबुक (गुटका ) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : चैपबुक (गुटका ): पाकेट बुक के आकार की किताबों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द | इन्हें आमतौर पर  फेरीवाले बेचते थे | ये सोलहवीं सदी की मुद्रण क्रान्ति के समय से लोकप्रिय हुए |

प्रश्न 51 : अठारहवीं सदी के मध्य तक किताबों के बारें में आम लोगों लोगों के बीच किस प्रकार का विश्वास बन चुका था ?

उत्तर : अठारहवीं सदी के मध्य तक यह आम विश्वास बन चुका था कि किताबों के ज़रिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है |

कई सारे लोगों का मानना था कि किताबें दुनिया बदल सकती हैं|

उनके अनुसार किताबें  निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता से समाज को मुक्ति दिलाकर ऐसा दौर लाएँगी जब विवेक और बुद्धि का राज होगा |

प्रश्न 52 : लुई सेबेस्तिएँ मर्सिये कौन था ? उसके प्रिंटिंग प्रेस  (छापाखाना) को लेकर क्या विचार थे ?

उत्तर : लुई सेबेस्तिएँ मर्सिये अठारहवीं सदी के फ़्रांस के एक उपन्यासकार थे |

 लुई सेबेस्तिएँ मर्सिये ने घोषणा की, छापाखाना प्रगति का सबसे ताकतवर औजार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा |

ज्ञानोदय को लाने और निरंकुश वाद के आधार को नष्ट करने में छापेखाने की भूमिका के बारे में आश्वस्त मर्सिये ने कहा “हे निरंकुश वादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक्त आ गया है ! आभासी लेखक की कलम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे !” 

प्रश्न 53 : कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रची |  तीन तरह के तर्क देते हुए इस तथ्य का उल्लेख कीजिए |

अथवा

कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते थे कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए जमीन तैयार की |तर्क  द्वारा उल्लेख कीजिए ?

उत्तर: कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रची |  इसके लिए हम निम्नलिखित तीन तरह के तर्कों को देख सकते हैं |

 

1.       पहला तर्क : छपाई के चलते ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार हुआ | उनके लेखन ने कुल मिलाकर परम्परा, अन्धविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना पेश की | उन्होंने रीति –रिवाजों की जगह विवेक् के शासन पर बल दिया, और माँग की कि हर चीज़ को तर्कऔर विवेक् की कसौटी पर ही कसा जाए | उन्होंने चर्च की धार्मिक और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार करके परम्परा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को दुर्बल कर दिया | वॉल्तेयर और रूसो के लेखन का व्यापक पाठक-वर्ग था, और उनके पाठक एक नए, आलोचनात्मक, सवालिया और तार्किक नजरिये से दुनिया को देखने लगे थे |

 

2.       दूसरा तर्क : छपाई ने वाद –विवाद – संवाद की नई संस्कृति को जन्म दिया | सारे पुराने मूल्य, संस्थाओं और कायदों पर आम जनता के बीच बहस –मुबाहिसे हुए और उनके पूर्व मूल्यांकन का सिलसिला शुरू हुआ | तर्क की ताकत से परिचित यह नयी ‘पब्लिक’ धर्म और आस्था को प्रश्नांकित करने का मोल समझ सकती थी | इस तरह बनी ‘सार्वजनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रान्ति के नए विचारों का सूत्रपात्र हुआ |

 

3.       तीसरातर्क : 1780  के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मजाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था | इस प्रक्रिया में सामाजिक व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल खड़े किए गए | कार्टूनों और कैरिकेचरों (व्यंग्य चित्रों) में यह भाव उभरता था कि जनता तो मुश्किलों में फसीं है | जबकि राजशाही भोग –विलास में डूबी हुई है | भूमिगत घूमने वाले इस साहित्य ने लोगों को राजतन्त्र के खिलाफ़ भडकाया |

प्रश्न 54 : निरंकुशवाद से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : राजकाज की ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी एक व्यक्ति को सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त हो और उस पर कोई क़ानूनी  और सवैंधानिक पांबदी न हो |

प्रश्न 55 : उन्नीसवीं सदी के आखिर में प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के चलते बच्चे, पाठकों की अहम श्रेणी बन गए | उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए |

उत्तर : उन्नीसवीं सदी के आखिर में प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के चलते बच्चे, पाठकों की अहम श्रेणी बन गए | जो निम्न उदाहरणों से स्पष्ट है |

     (i)            प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्वपूर्ण हो गया |

   (ii)            फ्रांस में 1857 ई० में सिर्फ बाल –पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस या मुद्रणालय स्थापित किया गया |

 (iii)            इस प्रेस में पुरानी और नयी दोनों तरह की परी –कथाओं और लोक- कथाओं का प्रकाशन किया गया |

  (iv)            जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक –कथाएँ जमा कीं | उनके द्वारा एकत्रित सामग्री का सम्पादन हुआ, फिर कहानियों को अंतत: 1812  के एक संकलन में छापा गया |

    (v)            बच्चों के लिए अनुपयुक्त सामग्री या जो चीजें कुलीन वर्गों को अश्लील लगती थीं, उन्हें प्रकाशित संस्करण में शामिल नहीं किया जाता था |

प्रश्न 56 : उन्नीसवीं सदी के आखिर में महिलाएँ पाठिका और लेखिका की भूमिका में ज्यादा अहम श्रेणी बन गई | उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए |

उत्तर : उन्नीसवीं सदी में यूरोप ने जन –साक्षरता की दिशा में लम्बी –लंबी छलाँगे लगाई, जिसके बूते महिलाओं और बच्चों के रूप में बड़ी मात्र में नया पाठक वर्ग तैयार हुआ | परिणाम स्वरूप महिलाएँ पाठिका और लेखिका की भूमिका में ज्यादा अहम हो गई | जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है |

     (i)            पेनी मैगजीन्स या एक पैसिया पत्रिकाएँ खास तौर पर महिलाओं के लिए होती थी | वैसे ही जैसे कि सही चाल –चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाएँ |

   (ii)            उन्नीसवीं सदी में जब  उपन्यास छपने लगे तो महिलाएँ उनका अहम पाठक मानी गई |

 (iii)            मशहूर उपन्यासकारों में लेखिकाएँ अग्रणी थीं | जेन ऑस्टिन, ब्राण्ट बहनें, जार्ज इलियट आदि | उनके लेखन से नयी नारी की परिभाषा उभरी : जिनका व्यक्तित्व सुदृढ़ था, जिसमें गहरी सूझ –बूझ थी, और जिनका अपना दिमाग था, अपनी इच्छा शक्ति थी |

प्रश्न 57: अठारहवीं शताब्दी से प्रिंट तकनीक में कौन –कौन से नए तकनीकी परिष्कार (परिवर्तन) आए थे ?

उत्तर: अठारहवीं सदी से प्रिंट तकनीक में निम्नलिखित बदलाव देखने को मिले |

     (i)            अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धातु से बनने लगे थे |

   (ii)            उन्नीसवीं के मध्य तक न्यूयार्क के रिचर्ड एम० हो० ने शक्ति चलित बेलनाकार प्रेस को कारगर बना लिया था | इससे प्रति घण्टे 8000  शीट या ताव छप सकते थे |

 (iii)            उन्नीसवीं सदी के अंत तक ऑफसेट प्रेस आ गया था, जिससे एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी |

  (iv)            बीसवीं सदी के शुरू से ही, बिजली से चलनेवाले प्रेस के बल पर छपाई का काम तेजी से होने लगे |

    (v)            कागज डालने की विधि में सुधार हुआ , प्लेट की गुणवत्ता बेहतर हुई |

  (vi)            स्वचलित पेपर –रील और रंगों के लिए फोटो –विद्युतीय नियंत्रण भी काम में आने लगे |

(vii)            इस तरह कई छोटी –छोटी मशीनी इकाइयों में कुल सुधार की बदौलत छपे हुए पन्ने का रंग –रूप ही बदल गया |   

प्रश्न 58 : उन्नीसवीं सदी में मुद्रकों और प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के लिए कौन कौन से नए गुर अपनाए ?

उत्तर : उन्नीसवीं सदी में मुद्रकों और प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के नए गुर अपनाए | जो निम्नलिखित हैं |

     (i)            उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा जिससे उपन्यास लिखने की एक खास शैली विकसित हुई |

   (ii)            इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें एक सस्ती श्रंखला –शिलिंग श्रंखला –के तहत छापी गई |

 (iii)            किताबों की जिल्द का आवरण या डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत(नवाचार) है |

  (iv)            1930 की आर्थिक मंदी के आने से प्रकाशकों को किताबों की बिक्री गिरने का भय हुआ | लिहाज़ा पाठकों की जेब का ख्याल रखते हुए उन्होंने सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण छापे |

प्रश्न 59 : भारत में मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए |

उत्तर : भारत में संस्कृत, अरबी फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओँ में हस्त –लिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परम्परा थी | इन पांडुलिपियों की निम्नलिखित विशेषताएँ थी |

     (i)            पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर नकल करके बनाई जातीथीं |

   (ii)            उम्र बढ़ाने के ख़याल से पांडुलिपियों को तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था |

 (iii)            पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थी | इसलिए उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था |

  (iv)            पांडुलिपियाँ काफी महँगी भी होती थी |

    (v)            लिपियों के अलग –अलग तरीकों से लिखें जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था | इसलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था |

  (vi)            उन्नीसवीं सदी के अंत तक, छपाई के आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं |

प्रश्न 60 : मुद्रण संस्कृति से पहले पांडुलिपियों का चलन था परन्तु इनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था | इसके क्या कारण थे ?

उत्तर : पांडुलिपियों का व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था | इसके निम्न कारण थे |

     (i)            पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थी | इसलिए उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था |

   (ii)            पांडुलिपियाँ काफी महँगी भी होती थी |

 (iii)            लिपियों के अलग –अलग तरीकों से लिखें जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था |

प्रश्न 61: छपाई भारत में आई कब और किसके साथ आई ?

अथवा

प्रश्न : भारत में प्रिंटिंग प्रेस कब और कौन लाया ?

उत्तर : प्रिंटिंग प्रेस पहलेपहल सोलहवीं सदी में भारत के गोवा में पुर्तगाली धर्म –प्रचारकों के साथ आया |

प्रश्न 62 : भारत में सबसे पहली पुस्तकें किस भाषा में और किसके द्वारा छापी गई ?

उत्तर: भारत में सबसे पहली पुस्तकें जेसुइट पुजारियों द्वारा  कोंकणी भाषा में  छापी |

प्रश्न 63: भारत में 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओँ में कितनी किताबें छप चुकी थी ?

उत्तर : लगभग 50 किताबें |

प्रश्न 64 : भारत में पहली तमिल पुस्तक कब और किसने छापी ?

उत्तर:  कैथोलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी,

प्रश्न 65 : भारत में मलयालम भाषा में पहली पुस्तक कब और किसने छापी ?

उत्तर: भारत में पहली मलायम पुस्तक कैथोलिक पुजारियों 1713 में ने छापी थी |

प्रश्न 66 : डच प्रोटेस्टेंट धर्म –प्रचारकों ने किस भाषा में पुस्तकें छापी ? इन पुस्तकों की संख्या कितनी थी ? इनकी क्या एक मुख्य विशेषता थी ?

उतर:  डच प्रोटेस्टेंट धर्म –प्रचारकों ने  तमिल भाषा  किताबें छापीं|  इनकी संख्या 32थी | इनकी मुख्य विशेषता यह थी कि इनमें से कई पुरानी किताबों का अनुवाद थीं |

प्रश्न 67: भारत में  इंग्लिश ईस्ट इंडिया कम्पनी नें कब तक छापेखाने का आयात शुरू कर दिया था ?

उत्तर : भारत में इंग्लिश ईस्ट इंडिया कम्पनी नें सत्रहवीं सदी के अंत तक छापेखाने का आयात शुरू कर दिया था |  

प्रश्न 68: भारत में सबसे पहले किसने और कब अंग्रेजी भाषा में छपाई (मुद्रण) का कार्य शुरू किया ? उन्होंने किस अखबार (पत्रिका) का प्रकाशन किया ?

उत्तर : जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से अंग्रेजी भाषा में छपाई का कार्य शुरू किया | उन्होंने बंगाल गजट नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन शुरू किया|

प्रश्न 69:  भारत में किस भारतीय के द्वारा सबसे पहला अखबार छापने का प्रयास किया था ? उनके द्वारा प्रकाशित अखबार कौन-सा था ?

उत्तर:  राजा राम मोहन राय के करीबी रहे गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा सबसे पहले अखबार प्रकाशित किया था | उनके द्वारा प्रकाशित अखबार बंगाल गजट था  |

प्रश्न  70 : संवाद कौमुदी का प्रकाशन कब और किसने किया?

उत्तर : राजाराम मोहन राय ने 1821 ई० में |

प्रश्न 71: राममोहन राय के  संवाद कौमुदी प्रकाशित किया, और रूढिवादियों ने उनके विचारों से टक्कर लेने के लिए किस समाचार पत्र का सहारा लिया ?

उत्तर : रूढिवादियों ने राजाराम मोहन राय के विचारों से  टक्कर लेने के लिए समाचार चन्द्रिका का सहारा लिया |

प्रश्न 72: गुलामगिरी पुस्तक का प्रकाशन  कब और किसने किया ? इस पुस्तक का विषय क्या था ?

उत्तर : गुलामगिरी पुस्तक 1871 में ज्योतिबा फुले ने लिखी | उनकी इस पुस्तक का विषय जातिप्रथा के अत्याचारों से संबंधित था |

प्रश्न 73:  रामचरित मानस कब और किसने लिखी ?

 

उत्तर : तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में

प्रश्न 74: रामचरित मानस का पहला मुद्रित संस्करण कब और कहाँ  प्रकाशित हुआ ?

उत्तर : रामचरित मानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ |

प्रश्न 75: दो फ़ारसी अखबारों के नाम बताओ जो 1882 में प्रकाशित हुए |

उत्तर : जाम –ए जहाँनामा  और शम्सुल अखबार

प्रश्न 76: मुस्लिम संस्था देवबंद सेमिनरी की स्थापना कब हुई ?

उत्तर : 1867

 प्रश्न 77 : भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर क्यों  चिंतित थे ? इसके लिए उन्होंने क्या कदम उठाए |

उत्तर: भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे | उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मान्तरण को बढ़ावा न दें, या मुस्लिम कानून न बदल डालें |

इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्म ग्रंथों के फारसी या उर्दू अनुवाद छपे और धार्मिक अखबार तथा गुटके  निकाले |

सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमानों पाठकों को राजमर्रा का जीवन जीने का सलीका और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हजारों फतवे जारी किए |

पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान कई इस्लामी सम्प्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए, धर्म को लेकर सबकी अपनी –अपनी व्याख्याएँ थी, हर कोई अपना सम्प्रदाय बढ़ाना चाहता था और दूसरों के असर को काटना चाहता था |

प्रश्न 78: मुद्रण संस्कृति को लेकर भारतीय समाज सुधारकों ने किस प्रकार लिया ?

अथवा

प्रश्न : ‘मुद्रण से समुदायों के बीच केवल मत मतान्तर ही पैदा नहीं किए बल्कि इसने समुदायों और भारत के विभिन्न भागों के लोगों को जोड़ने का भी काम किया |’ व्याख्या करें | 

     (i)            उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही धार्मिक मसलों को लेकर बहसों का बाजार गर्म था |

   (ii)            अलग –अलग समूह औपनिवेशिक समाज में हो रहे बदलावों से जूझते हुए,धर्म की अपनी – अपनी व्याख्या पेश कर रहे थे |  

 (iii)            कुछ मौजूदा रीति –रिवाजों की आलोचना करते हुए उनमें सुधार चाहते थे, जबकि कुछ अन्य समाज- सुधारकों के लिए तर्कों के खिलाफ़ खड़े थे |

  (iv)            छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने न केवल नए विचारों का प्रसार किया बल्कि उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की | इन बहसों में व्यापक जन-समुदाय भी हिस्सा ले सकता था, अपने मत जाहिर कर सकता था | इस तरह के मत –मतान्तर से नए विचार उभरे |

    (v)            समाज सुधारकों और  धर्म –सुधारकों तथा हिंदू रूढिवादियों के बीच विधवा-दाह (सती प्रथा ), एकेश्वरवाद, ब्राहम्ण पुजारी वर्ग और मूर्ति –पूजा जैसे मुद्दों को लेकर तेज बहस ठनी हुई थी |

  (vi)            बंगाल में जैसे –जैसे बहस चली, लगातार बढ़ती तादाद में पुस्तिकाओं और अख़बारों के जरिए तरह –तरह कके तर्क समाज के बीच आने लगे | ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचने के ख्याल से इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया |

(vii)            राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी प्रकाशित किया, और रूढिवादियों ने उनके विचारों से टक्कर लेने के लिए समाचार चन्द्रिका का सहारा लिया |

(viii)            दो फ़ारसी अखबार – जाम –ए जहाँनामा  और शम्सुल अखबार –भी  1882 में प्रकाशित हुए |

  (ix)            उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे | उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मान्तरण को बढ़ावा न दें, या मुस्लिम कानून न बदल डालें | इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्म ग्रंथों के फारसी या उर्दू अनुवाद छपे और धार्मिक अखबार तथा गुटके  निकाले |

    (x)            सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमानों पाठकों को राजमर्रा का जीवन जीने का सलीका और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हजारों फतवे जारी किए |

धार्मिक पुस्तकें बड़ी तादाद ,एम व्यापक जन –समुदाय तक पहुँच रही थीं जिसके चलते विभिन्न धर्मों के बीच, और उनके अन्दर, बहस –मुबाहिसे, और वाद –विवाद संवाद की नयी स्थिति बन गई थी |  लेकिन प्रिंट ने समुदाय के बीच सिर्फ मत-मतान्तर ही नहीं पैदा किए, बल्कि इसने समुदायों को अन्दर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया |

प्रश्न  79 : लक्ष्मी नाथ बेजुबरुआ कौन थे ? उनका क्या योगदान है ?

उत्तर : लक्ष्मी नाथ बेजुबरुआ (1868-1938) आधुनिक असमिया साहित्य के एक वरिष्ठ रचनाकार थे |

बूढी आइर साधु (दादी की कहानियाँ ) उनकी उल्लेखनीय किताबों में से है |

उन्होंने असम का लोकप्रिय गीत ‘ओ मोर अपुनर देश (ओ मेरी प्यारी भूमि )भी लिखा|  

प्रश्न 80 : उलमा से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : इस्लामी कानून और शरिया के विद्वान को उलमा कहा जाता है |  

प्रश्न 81: फतवा से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर: अनिश्चय या असमंजस की स्थिति में, इस्लामी कानून जानने वाले विद्वान, सामान्यत: मुफ्ती के द्वारा की जाने वाली वैधानिक घोषणा  को फतवा कहा जाता है |

प्रश्न 82: राजा रवि वर्मा कौन थे ?

उत्तर: राजा रवि वर्मा एक चित्रकार थे | जिन्होंने मिथकीय कहानियों को लेकर अनगिनत चित्र बनाए, जो उनके अपने प्रेस (रवि वर्मा प्रेस) में छपती थीं | राजा ऋतुध्वज द्वारा असुरों के चंगुल से राजकुमारी मदालसा को बचाया जाना | उनका द्वारा बनाया गया प्रसिद्ध चित्र  है |

प्रश्न 83: उन्नीसवीं सदी में भारत में औरतों के पढ़ने के बारे में लोगों के क्या विचार थे ? औरतों का इसके बारे में क्या दृष्टिकोण था ?

अथवा

प्रश्न : भारतीय उदारवादियों और रूढिवादियों का भारतीय औरतों की शिक्षा के प्रति क्या दृष्टिकोण था ?

उत्तर:

उदारवादियों के विचार

उदारवादी पिता और पति अपने यहाँ औरतों को घर पर पढ़ाने लगे, और उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब बड़े –छोटे शहरों में स्कूल बने तो उन्हें स्कूल भेजने लगे |

रूढिवादियों के विचार

लेकिन सारे परिवार उदार –दिल के नहीं थे | अनेक परम्परावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं | और इसी तरह दकियानुसी मुसलमानों को लगता था कि उर्दू के रूमानी अफ्सानें पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगीं |

महिलाओं का दृष्टिकोण

     (i)            कभी –कभार बागी औरतों ने इन रूढिवादियों के प्रतिबंधों को अस्वीकार भी किया | हमें उत्तरी भारत के दकियानुसी मुसलमान परिवार की एक ऐसी लड़की की कहानी पता है, जिसमें गुपचुप ढंग से न् सिर्फ पढ़ना सीखा, बल्कि लिखा भी |

   (ii)            पूर्वी बंगाल में, उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में, कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही कन्या रशसुन्दरी देबी ने रसोई में छिप छिप कर पढ़ना सीखा | बाद में उन्होंने ‘आमार जीबन’ नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाशित हुई | यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म कहानी थी |

 (iii)            कैलाश बाशिनी देवी जैसी महिलाओं ने 1860 के दशक से महिलाओं के अनुभवों पर लिखना शुरू किया –कैसे वे घरों में बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं , कैसे वे घर- भर के काम का बोझ उठाती है, और जिनकी सेवा वे करती हैं, वही उन्हें दुत्कारते हैं |

  (iv)            आज जो महाराष्ट्र है वहाँ 1880 के दशक में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालात के बारे में जोश और रोष से लिखा |

प्रश्न 84: उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत में  जाति –पाति के भेद के बारे में तरह तरह की पुस्तिकाओं और निबन्धों में लिखा जाने लगा, उचित उदाहरणों से इस तथ्य की पुष्टि कीजिए ?

उत्तर : उन्नीसवीं सदी के अंत से जाति –भेद के बारे में तरह –तरह की पुस्तिकाओं और निबन्धों में लिखा था | जो निम्न उदाहरणों से स्पष्ट है |

     (i)            निम्न जातीय आंदोलनों के मराठी प्रणेता ज्योतिबा –फूले ने अपनी गुलामगिरी 1871में लिखी | जिसमें जाति –प्रथा के अत्याचारों पर लिखा |

   (ii)            बीसवीं सदी के महाराष्ट्र में भीम राव अम्बेडकर और मद्रास में ई०वी० रामास्वामी नायकर जो पेरियार के नाम से बेहतर जाने जाते हैं | उन्होंने जाति पर जोरदार कलम चलाई  और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए |

 (iii)            स्थानीय विरोध आंदोलनों और संप्रदायों ने भी प्राचीन धर्म ग्रन्थों की आलोचना करते हुए, नए न्यायपूर्ण समाज का सपना बुनने की मुहीम में लोकप्रिय पत्र पत्रिकाएँ और गुटखे छापे |

 

  (iv)            कानपुर के एक मिल –मजदूर काशीबाबा ने 1938  में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बीच रिश्ता समझाने की कोशिश की |

    (v)            1935 से 1955 बीच सुदर्शन चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल-मजदूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक एक संग्रह में छापा गया |

  (vi)            बैंगलौर के सूती –मिल मजदूरों ने  खुद को शिक्षित करने के ख़याल से पुस्कालय बनाए जिसकी प्रेरणा उन्हें बम्बई के मिल –मजदूरों से मिली थी | समाज –सुधारकों नें इन प्रयासों को संरक्षण दिया | उनकी मूल कोशिश यह थी कि मजदूरों के बीच नशाखोरी कम हो, साक्षरता आए, और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश भी यथा संभव पहुँचे |

प्रश्न 85: उन्नीसवीं सदी में भारत की मुद्रण संस्कृति ने गरीब वर्ग को पाठक के रूप में किस प्रकार आकृषित किया ? व्याख्या कीजिए ?

अथवा

प्रश्न : उन्नसवीं सदी में गरीब लोगों को मुद्रण संस्कृति के क्या मायने थे ?

उत्तर : उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में काफी सस्ती किताबें चौक –चौराहे पर बेचीं जा रही थी, जिसके चलते गरीब लोग भी बाजार से उन्हें खरीदने की स्थिति में आ गया थे |

बीसवीं सदी के आरम्भ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे थे | जिससे किताबों की पहुँच निस्संदेह बढ़ी थी |

ऐसे पुस्तकालय अकसर शहरों या कस्बों में होते थे  यदा कदा संपन्न गाँव में भी | स्थानीय अमिरों के लिए पुस्कालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी |       

कारखानों में मजदूरों से बहुत ज्यादा काम लिया जा रहा था, और उन्हें अपने तजुर्बों के बारे में ढंग से लिखने की शिक्षा तक नहीं मिली थी | लेकिन कानपुर के एक मिल –मजदूर काशीबाबा ने 1938  में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बीच रिश्ता समझाने की कोशिश की |

1935 से 1955 बीच सुदर्शन चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल-मजदूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक एक संग्रह में छापा गया |

बैंगलौर के सूती –मिल मजदूरों ने  खुद को शिक्षित करने के ख़याल से पुस्कालय बनाए जिसकी प्रेरणा उन्हें बम्बई के मिल –मजदूरों से मिली थी | समाज –सुधारकों नें इन प्रयासों को संरक्षण दिया | उनकी मूल कोशिश यह थी कि मजदूरों के बीच नशाखोरी कम हो, साक्षरता आए, और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश भी यथा संभव पहुँचे |

 

Monday, November 24, 2025

LESSON -3 MAKING OF A GLOBAL WORLD (HISTORY) CLASS 10TH (ENGLISH MEDIUM)

LESSON -3

MAKING OF A GLOBAL WORLD (HISTORY)

CLASS 10TH

Question: How old is the history of ‘globalisation’?

Answer: The history of ‘globalisation’ is 50 years old.

Question: Explain three flows of international economic exchange in nineteenth century in the context of the world history?

OR

Question: Globlisation is the process of becoming a world. Explain three types of movements or flows in international economic exchange?

OR

Question: Explain some factors that have gone into the making of global world?

Answer: Factors which have gone into the making of the global world has a long history. three types of movements or flows in international economic exchange have been done in international exchange these are given below.

         (i)         Flow of trade,

        (ii)        Flow of migration people in search of work,

       (iii)       The movement of capital and much else.

Question:  All through history, human societies have become steadily more interlinked. Justify the statement with illustrations (examples).

Answer: All through history, human societies have become steadily more interlinked. This can be discussed as under.

     (i)            From ancient times, travellers, traders, priests and pilgrims travelled vast distances for knowledge, opportunity and spiritual fulfilment, or to escape persecution.

   (ii)            They carried goods, money, values, skills, ideas, inventions, and even germs and diseases.

 (iii)            As early as 3000 BCE an active coastal trade linked the Indus valley civilisations with present-day West Asia.

 (iv)            For more than a millennia, cowries (the Hindi cowdi or seashells, used as a form of currency) from the Maldives found their way to China and East Africa.

   (v)            The long-distance spread of disease-carrying germs may be traced as far back as the seventh century.

Question: What is meant by ‘Cowrie’? For what purpose was these used?

Answer: ‘Cowrie’ is a hindi word. The meaning of cowrie is seashells. it is used as a form of currency)

Question: What was the importance of silk routes?

OR

Question: How did silk routes link the world? Explain with three examples.

OR

Question: Explain thre characteristics of silk routes.

Answer:

         (i)         The name ‘Silk Routes’ points to the importance of West-bound Chinese silk cargoes along this route.

        (ii)        Historians have identified several silk routes, over land and by sea, knitting together vast regions of Asia, and linking Asia with Europe and northern Africa.

       (iii)       They are known to have existed since before the Christian Era and thrived almost till the fifteenth century.

       (iv)       Silk routes were used to transport Chinese silk, Chinese pottery,  textiles and spices from India and Southeast Asia to Europe.  In return, precious metals – gold and silver – flowed from Europe to Asia.

        (v)        Early Christian missionaries almost certainly travelled this route to Asia. A few centuries later Muslim preachers also travelled from these routes. Buddhism emerged from eastern India and spread in several directions through intersecting points on the silk routes.

Question: “The silk routes an example of trade and cultural link between distant parts of the world.” Explain with examples.

Answer:  The silk routes are a good example of vibrant pre-modern trade and cultural links between distant parts of the world.

         (i)         Chinese pottery also travelled the same route, as did textiles and spices from India and Southeast Asia.  In return, precious metals – gold and silver – flowed from Europe to Asia.

        (ii)        Early Christian missionaries almost certainly travelled this route to Asia. A few centuries later Muslim preachers also travelled from these routes. Buddhism emerged from eastern India and spread in several directions through intersecting points on the silk routes.

Question: Food offers many examples of long-distance cultural exchange. Justify the statement.

Answer: Food offers many examples of long-distance cultural exchange. This can be justify with the examples given below.

         (i)         Traders and travellers introduced new crops to the lands they travelled.

        (ii)        Even ‘ready’ foodstuff in distant parts of the world might share common origins. Spaghetti and noodles are the example.

       (iii)       It is believed that noodles travelled west from China to become spaghetti.

       (iv)       Perhaps Arab traders took pasta to fifth-century Sicily, an island now in Italy.

        (v)        Many of our common foods such as potatoes, soya, groundnuts, maize, tomatoes, chillies, sweet potatoes, and so on were not known to our ancestors until about five centuries ago.

Question: who discovered the vast the vast continent that would later become known as the Americas?

Christopher Columbus accidentally discovered the vast continent that would later become known as the Americas. (i.e.North America, South America and the Caribbean.)

Question: Which foods were introduced in Europe and Asia aftermath Christopher Columbus accidentally discovered America?

Answer: Many of our common foods such as potatoes, soya, groundnuts, maize, tomatoes, chillies, sweet potatoes, and so on were introduced in Europe and Asia after Christopher Columbus accidentally discovered America.

Question: Discussed potato famine of Ireland.

Answer: Europe’s poor began to eat better and live longer with the introduction of the humble potato. Ireland’s poorest peasants became so dependent on potatoes that when disease destroyed the potato crop in the mid-1840s, hundreds of thousands died of starvation.

During the Great Irish Potato Famine (1845 to 1849), around 1,000,000 people died of starvation in Ireland, and double the number emigrated in search of work.

Question: Sometimes the new crops could make the difference between life and death. Explain the statement.

OR

Question: Which crop made the difference between life and death in Europe?

Answer: Sometimes the new crops could make the difference between life and death. For example potato made the difference between life and death in Europe.

Europe’s poor began to eat better and live longer with the introduction of the humble potato. Ireland’s poorest peasants became so dependent on potatoes that when disease destroyed the potato crop in the mid-1840s, hundreds of thousands died of starvation.

Question: Explain what we mean when we shay the world “shrank” in 1500s?

OR

The pre modern world shrank in the 16th century. Why?

Answer: When we say that the pre-modern world shrank greatly in the sixteenth century it means:

     (i)            In the 16th century European sailors found a sea route to Asia and also successfully crossed the western ocean to America.

   (ii)            Before its ‘discovery’, America had been cut off from regular contact with the rest of the world for millions of years. But from the sixteenth century, its vast lands and abundant crops and minerals began to transform trade and lives everywhere.

 (iii)            Precious metals, particularly silver, from mines located in present day Peru and Mexico also enhanced Europe’s wealth and financed its trade with Asia.

 (iv)            Legends spread in seventeenth-century Europe about South America’s fabled wealth.

Question: What is El Dorado in South America famous for?

Answer: El Dorado, in South America famous for the fabled city of gold.

Question: Who were the first Europeans to conquer and colonise America in the Sixteenth century?

Answer: The Portuguese and Spanish people were the first conquer and colonise America in the Sixteenth century. 

Question: Explain how the global transfer of disease in the pre-modern world helped in the colonisation of the Americas.

OR

Question: How did the small pox prove as the most powerful weapon of the Spanish conquerors in the mid-sixteenth century? Explain.

OR

Question: The most powerful weapon of the Spanish conquerors was not a conventional military weapon at all. Justify the statement by giving reasons.

Answer: The most powerful weapon of the Spanish conquerors was not a conventional military weapon. Small pox proved as the most powerful weapon of the Spanish conquerors in the mid-sixteenth century. Because of these reasons

     (i)            It was the germs such as those of smallpox that they carried on their person.

   (ii)            Because of their long isolation, America’s original inhabitants had no immunity against these diseases that came from Europe.

 (iii)            Smallpox in particular proved a deadly killer.

 (iv)            Once introduced, it spread deep into the continent, ahead even of any Europeans reaching there. It killed and decimated whole communities, paving the way for conquest.

Question: Why thousands people fled Europe for America in nineteenth century?

 OR 

Question: What are the conditions of Europe before nineteenth century?

Answer: Until the nineteenth century, poverty and hunger were common in Europe.

Cities were crowded and deadly diseases were widespread.

Religious conflicts were common, and religious dissenters were persecuted.

Thousands people of Europe were therefore fled Europe for America.

Question: Who did plantation work in America for European market?

Answer: By the eighteenth century, plantations worked by slaves captured in Africa were growing cotton and sugar for European markets.

Question: Until well into the eighteenth century, China and India were among the world’s richest countries. But in nineteenth century centre of world trade gradually moved westwards. Explain it.

Answer: Until well into the eighteenth century, China and India were among the world’s richest countries. They were also pre-eminent in Asian trade.

However, from the fifteenth century, China is said to have restricted overseas contacts and retreated into isolation.

China’s reduced role and the rising importance of the Americas gradually moved the centre of world trade westwards.

Europe now emerged as the centre of world trade.

Question: Define dissenter.

Answer: One who refuses to accept established beliefs and practices is known as dissenter