अध्याय -2
विश्व जनसंख्या
: वितरण घनत्व और वृद्धि
मानव भूगोल के मूल
सिद्धांत (कक्षा-12)
एक देश के निवासी (लोग) ही उसके
वास्तविक धन होते है | (एक देश की पहचान उसके लोगों से होती है |)
किसी देश में रहले वाले लोग ही देश के
संसाधनों का उपयोग करते है और उस देश की नीतियों का निर्धारण करते है | अत: लोग ही
देश के वास्तविक धन होते है | और उस देश की पहचान उसमें रहनें वाले लोगों से ही
होती है |
जनसंख्या वितरण से अभिप्राय
जनसंख्या वितरण शब्द का अर्थ इस बात से लगाया
जाता है कि भू-पृष्ठ पर लोग किस प्रकार वितरित है |
विश्व में जनसंख्या का वितरण
21वीं शताब्दी के प्रारम्भ में विश्व की जनसंख्या 600 करोड़
से अधिक मानी गयी थी | जो 2010 के विश्व के जनसंख्या के
आँकड़ों के अनुसार अनुमानित जनसंख्या 6 अरब 90 करोड़ (690 करोड़) हो गयी| यह जनसंख्या एक समान रूप
से विश्व के सभी भागों में फैली हुई नहीं है | विश्व में जनसंख्या का वितरण असमान
है | मोटे तौर पर विश्व की जनसंख्या के वितरण कों निम्न प्रकार से समझा जा सकता है
कि जनसंख्या का 90 प्रतिशत विश्व के 10 प्रतिशत स्थलभाग पर रहता है |
विश्व
के दस सर्वाधिक जनसंख्या वाले देशों में विश्व की 60
प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है | अन्य सभी देशों में विश्व की शेष 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है | दस सर्वाधिक जनसंख्या वाले देशों में से छह
देश एशिया महाद्वीप में ही है | जिनमें चीन, भारत,इंडोनेशिया, पाकिस्तान,
बांग्लादेश तथा जापान शामिल है | इनके अलावा
संयुक्त राज्य अमेरिका उत्तर अमेरिका में, ब्राजील दक्षिणी अमेरिका में, नाइजीरिया
अफ्रीका में है | रूस एशिया और यूरोप दोनों महाद्वीपों में है |
विश्व
के तीन अधिकतम जनसंख्या वाले देशों (चीन,भारत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका) में
विश्व की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है | चीन सबसे
अधिक जनसंख्या वाला देश है | यहाँ विश्व की कुल जनसंख्या की 21.03 प्रतिशत जनसंख्या चीन में रहती है | इस हिसाब से विश्व का हर पाँचवां
व्यक्ति चीनी है | इसके बाद भारत दूसरे स्थान पर है | यहाँ पर विश्व की 16.87
प्रतिशत जनसंख्या रहती है | अत: विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय है
|
अगर
विभिन्न महाद्वीपों मन जनसंख्या के प्रतिशत को देखते है तो स्पष्ट होता है कि
एशिया में 59.5 प्रतिशत , अफ्रीका में 16.9 प्रतिशत , यूरोप में 9.7 प्रतिशत, दक्षिणी अमेरिका और
कैरेबियन द्वीप समूह में 8.5 प्रतिशत, उत्तरी अमेरिका
महाद्वीप में 4.87 प्रतिशत तथा ओशिनिया (ऑस्ट्रेलिया तथा
उसके आस-पास के देश ) में केवल 0.5 प्रतिशत जनसंख्या ही
निवास करती है |
उपरोक्त
विवरण से पता चलता है कि विश्व में जनसंख्या का वितरण असमान है |
जनसंख्या घनत्व का अर्थ
किसी
क्षेत्र की जनसंख्या और क्षेत्रफल के
अनुपातिक संबंध कों उस क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व या जन घनत्व कहते है | भूमि की
प्रत्येक इकाई में उस पर रह रहे लोगों के पोषण की सीमित क्षमता होती है | अत:
लोगों की संख्या और भूमि के अनुपात कों समझना आवश्यक हो जाता है | यह सामान्यत:
प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाले व्यक्तियों के रूप में मापा जाता है |
जनसंख्या घनत्व का माप
जनसंख्या
का घनत्व जनसंख्या के वितरण का विश्लेषणात्मक
अध्ययन करने का महत्वपूर्ण
माप है | इसे तीन प्रकार से मापा जा सकता है |
1. अंकगणितीय
घनत्व ,
2. कायिक
(पोषक घनत्व )
3. कृषि
घनत्व |
इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
1. अंकगणितीय
घनत्व :
प्रति इकाई क्षेत्रफल में
रहने वाले लोगों की संख्या कों उस क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व कहते है | यह
जनसंख्या तथा भूमि के क्षेत्रफल के बीच एक साधारण अनुपात है | इसे व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर में व्यक्त करते
हैं | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |
जनसंख्या घनत्व = कुल जनसंख्या/ कुल क्षेत्रफल
उदाहरण के लिए एक प्रदेश का क्षेत्रफल 100
वर्ग किलोमीटर है | और उसकी 1,50,000 जनसंख्या
है | तो जनसंख्या घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
जनसंख्या घनत्व = 1,50,000
/ 100
= 1500 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर
2. कायिक
या पोषक घनत्व )
किसी क्षेत्र की कुल
जनसंख्या तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कायिक या पोषक
घनत्व कहते है | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है |
कायिक घनत्व = कुल जनसंख्या/ शुद्ध कृषि
क्षेत्र
उदाहरण के लिए भारत की कुल जनसंख्या लगभग 121
करोड़ है तथा शुद्ध कृषि
योग्य क्षेत्रफल 14.26 लाख वर्ग किलोमीटर है | तो कायिक
घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
कायिक
घनत्व = 121 करोड़ / 14.26 लाख वर्ग
किलोमीटर = 848
व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर
3. कृषीय
घनत्व
किसी क्षेत्र की कुल कृषीय जनसंख्या (कृषि
कार्यों में लगे लोग) तथा वहाँ की शुद्ध कृषि क्षेत्र के बीच के अनुपात कों कृषीय घनत्व कहते है | इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा
व्यक्त किया जाता है |
कृषीय घनत्व = कुल कृषीय जनसंख्या जनसंख्या/
शुद्ध कृषि क्षेत्र
उदाहरण के लिए एक प्रदेश की कुल जनसंख्या लगभग 150,000
है तथा शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्रफल 100 वर्ग
किलोमीटर है | तो कृषीय घनत्व इस तरह निकाला जाएगा |
कृषीय घनत्व = 150,000 / 100 = 1500 व्यक्ति प्रति
वर्ग किलोमीटर
विश्व में जनसंख्या घनत्व का प्रारूप
विश्व
के जनसंख्या का घनत्व असमान तथा अव्यवस्थित है | मोटे तौर पर विश्व की जनसंख्या के
वितरण कों समझें तो देखते है कि जनसंख्या का 90 प्रतिशत
विश्व के 10 प्रतिशत स्थलभाग पर रहता है | जबकि बाकी 10
प्रतिशत जनसंख्या विश्व के 90 प्रतिशत भाग पर
रहती है | विश्व का लगभग 33 प्रतिशत भाग मानव विहीन (निर्जन)
है | विश्व के विभिन्न प्रदेशों कों
जनसंख्या घनत्व के आधार पर उच्च जनसंख्या घनत्व, विरल जनसंख्या घनत्व तथा समान्य
जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेशों में बाँट सकते है | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
है |
उच्च
जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश
विश्व में कुछ क्षेत्र जनसंख्या के हिसाब से
सघन बसे हुए है | इस प्रदेशों में
जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | इन क्षेत्रों कों उच्च जनसंख्या घनत्व
वाले प्रदेश कहते है | इनमें निम्नलिखित क्षेत्रों कों शामिल किया जाता है |इन
क्षेत्रों में मानसून एशिया अर्थात पूर्व
एशिया, तथा दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया , यूरोप , उत्तर अमेरिका का पूर्वी तटीय प्रदेश शामिल है |
समान्य
(मध्यम) जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश
जिनका जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से कम और 10 व्यक्ति
प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक हो साधारण या मध्यम जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश
कहलाते है | इन क्षेत्रों के अंतर्गत एशिया महाद्वीप में चीन तथा दक्षिणी भारत,
यूरोप महाद्वीप में नार्वे तथा स्वीडन देश, उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में प्रेयरीज
के मैदान का मध्य भाग, ऑस्ट्रेलिया के तटीय भाग तथा मरे-डार्लिंग बेसिन, दक्षिणी
अमेरिका महाद्वीप में में उतरी-पूर्वी ब्राजील, मध्यवर्ती चिली, वेनेजुएला, उत्तरी
अफ्रीका का तटीय भाग, नाइजीरिया तथा दक्षिणी अफ्रीका संघ के कुछ भाग शामिल है |
विरल
जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश
जिन क्षेत्रों में 1से 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर रहते है | उन्हें
विरल जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश कहलाते है | इन क्षेत्रों के अंतर्गत उत्तरी व
दक्षिणी ध्रुव, उष्ण तथा शीत मरुस्थल और विषुवत रेखा के निकट उच्च वर्षा के
क्षेत्र शामिल हैं |
जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले कारक
विष
की जनसंख्या के वितरण प्रारूप से पता चलता है कि विश्व में जनसंख्या का वितरण असमान
है | इस असमान वितरण का मुख्य कारण वे विभिन्न कारक हैं जो लोगों कों किसी क्षेत्र
में रहने या वहाँ से चले जाने के लिए प्रेरित करते हैं | इन कारकों कों भौतिक
(प्राकृतिक ), कारक तथा मानवीय कारकों में वर्गीकृत किया जाता है | मानवीय कारकों
कों पुन: आर्थिक, सामजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक कारकों में विभाजित किया जाता
है | इन कारकों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
जनसंख्या
कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक
जनसंख्या
के वितरण कों प्रभावित करने वाले जो कारक प्राकृतिक कारणों होते हैं उन्हें भौतिक
या प्राकृतिक कारक कहते है | इन कारकों में जल की उपलब्धता, भू-आकृति, जलवायु तथा
मृदा कों शामिल किया जाता है | इनका वर्णन निम्नलिखित है |
1. जल
की उपलब्धता
जल जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है | जल
का उपयोग पीने, नहाने, भोजन बनाने, पशुओं के लिए, फसलों में सिंचाई के लिए ,
उद्योगों में तथा नौका चालन आदि कार्यों में किया जाता है | अत: लोग उन् क्षेत्रों
में बसना अधिक पसंद करते हैं, जहाँ जल आसानी से उपलब्ध हो सके | यही कारण है कि
नदी घाटियाँ विश्व के सबसे सघन बसे क्षेत्र हैं |
2. भू-आकृति
(उच्चावच )
उच्चावच जनसंख्या कों
प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है |ऊँचे पर्वत,
उबड-खाबड क्षेत्र तथा पठारी क्षेत्र विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र होते हैं |
पर्वतीय प्रदेशों में ढाल अधिक होने के कारण जनसंख्या की वृद्धि के लिए अवरोध
उत्पन्न करते है | क्योंकि समतल भू भाग नहीं होने से इन क्षेत्रों में बसाव
स्थानों की समस्या होती है | अधिक ढाल के कारण भूमि के कम उपलब्ध होने तथा मृदा अपरदन से मिट्टी की पतली परत हो जाने से
कृषि का विकास भी नहीं हो पाता | परिवहन के साधनों का विकास इन क्षेत्रों में कम
होता है | पर्वतीय क्षेत्रों में ये सुविधाएँ मैदानोंकी अपेक्षा कम विकसित हो पाती
है | इसलिए लोग पहाड़ी क्षेत्रों में कम
रहना पसंद करते है |
जबकि जनसंख्या का बड़ा हिस्सा
समतल मैदानों और मंद ढाल वाले क्षेत्रों में रहता है | इसके निम्नलिखित कारण है | इन
क्षेत्रों में कृषि करना आसान है | परिवहन के साधनों का विकास इन क्षेत्रों में
तेजी से हो सकता है | उद्योगों के विकास के लिए समतल भूमि का होना आवश्यक है |
3. जलवायु
जलवायु जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले
कारकों में दूसरा महत्वपूर्ण कारक है | क्योंकि मनुष्य तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता
की कुछ अनुकूल परिस्थितियों में ही रह सकता है | प्राय: वह सम जलवायु की दशाएँ
ही जनसंख्या कों किसी क्षेत्र में अर्हें
के लिए आकृषित करती है |
अति
उष्ण तथा अति शीत मरुस्थलीय क्षेत्र ऐसे क्षेत्र है जहाँ विषम जलवायु पाई जाती है
| प्रतिकूल जलवायु के कारण इन क्षेत्रों
में विरल जनसंख्या पाई जाती है | जैसे
सहारा मरुस्थल, उत्तरी ध्रुव का साइबेरिया क्षेत्र तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेश, अत्यधिक
विषम जलवायु के कारण विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र है |
अधिकतापमान के साथ अधिक
आर्द्रता भी स्वाथ्य के लिए अनुकूल नहीं होती | इस तरह की जलवायु में पेचिश,
मलेरिया तथा पीलिया जैसी बीमारियाँ अधिक होती है | इसी कारण से अफ्रीका के जायरे
बेसिन तथा दक्षिणी अमेरिका में अमेजन बेसिन क्षेत्र जो भूमध्यरेखीय प्रदेशों में
आते है विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र है |
जबकि वे क्षेत्र जहाँ सम
जलवायु मिलती है | अनुकूल और आराम दायक होने के
कारण मानव बसाव कों प्रोत्साहित करती है |
जिससे यहाँ सघन जनसंख्या मिलती है | जैसे मानसून एशिया, उतरी पश्चिमी
यूरोप का भूमध्य सागरीय प्रदेश तथा उत्तरी
अमेरिका उत्तरी पूर्वी भाग सम जलवायु होने के कारण सघन बसे क्षेत्र है |
4. मृदा
जिन
क्षेत्रों में उपजाऊ मृदा मिलती है | उन् क्षेत्रों में कृषि तथा उससे संबंधित
क्रियाएँ अधिक विकसित होती हैं | इसलिए अधिक उपजाऊ मृदा वाले क्षेत्रों में अधिक
जनसंख्या मिलती है | भारत में नदी घाटी क्षेत्र में आत्याधिक जनसंख्या रहती है |
जबकि मरुस्थलीय भाग मैं अनुपजाऊ मृदा के कारण कम जनसंख्या निवास करती है |
जनसंख्या
कों प्रभावित करने वाले आर्थिक कारक
जनसंख्या
के वितरण कों प्रभावित करने वाले आर्थिक कारणों में खनिजों की उपलब्धता, नगरीकरण
तथा औद्योगिकीकरण कों शामिल किया जाता है | जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |
1. खनिजों
की उपलब्धता
खनिजों के निक्षेप से युक्त
क्षेत्र उद्योग कों अपनी ओर आकृषित करते हैं | परिणाम स्वरूप खनन कार्य और
उद्योगों में उत्पन्न रोजगार लोगों कों अपनी ओर आकृषित करते है | लोग रोजगार की
तलाश में इन क्षेत्रों में आकार बसने लगते है | इन क्षेत्रों में कुशल तथा
अर्द्धकुशल श्रमिकों के आने ये क्षेत्र अत्यधिक
जनसंख्या वाले बन जाते है |
उदाहरण के लिए अफ्रीका महाद्वीप में कटंगा -
जाम्बिया तांबा पेटी खनिजों की उपलब्धता के कारण सघन जनसंख्या वाला क्षेत्र है |
इसी तरह भारत का छोटा नागपुर का पठारी क्षेत्र भी खनिजों की बहुलता के कारण सघन
बसा हुआ है |
2. नगरीकरण
नगरीय क्षेत्र में रोजगार के
बेहतर अवसर उपलब्ध होते हैं | इसके अलावा यहाँ शिक्षा व चिकित्सा संबंधी सुविधाएँ
भी बेहतर होती है | परिवहन और संचार के साधन विकसित होते है | इसके अतिरिक्त नगरीय
जीवन में ग्रामीण सामजिक व्यवस्था से राहत मिलती है | इसलिए अच्छी सुविधाओं और
नगरीय जीवन की स्वतंत्रता के आकर्षण के कारण लोग नगरों में आकार बसने लगते है |
ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर प्रवास इन्हीं कारणों से करती है | जिससे ये
क्षेत्र सघन जनसंख्या वाले हो जाते है | विश्व के सभी महानगर जैसे लन्दन, पेरिस,
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, न्यूयार्क, सिडनी, बीजिंग, शंघाई मास्को आदि सभी नगर अत्यधिक सघन बसे है और
इनमें अब भी तेजी से जनसंख्या बढ़ रही रही है |
3. औद्योगिकीकरण
औद्योगिक क्षेत्र रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते
हैं | यहाँ कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के अलावा परिवहन परिचालक, दुकानदार,
बैंककर्मी, डॉक्टर, अध्यापक तथा अन्य विभिन्न प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध कराने वाले लोग
बड़ी संख्या में आकर्षित होकर यहाँ बसने लगते है | जिससे इन क्षेत्रों में सघन
जनसंख्या निवास करती है | उदाहरण के लिए जापान का कोबे ओसाका प्रदेश अनके प्रकार
के उद्योगों के कारण सघन बसा है | इसी प्रकार भारत में भी दिल्ली, मुम्बई कोलकाता,
गुरुग्राम कानपुर तथा मद्रास आदि सघन औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण सघन बसे है
|
जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले सामाजिक
कारक
जिन
क्षेत्रों में धर्म, भाषा जाति आदि के
कारण सामजिक एकरूपता पाई रहती है | उन क्षेत्रों में सामाजिक संबंध अच्छे रहते है
| लोग अपनी भाषा, धर्म, जाति आदि के लोगों के बीच रहना पसंद करते है | जिससे ऐसे
क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने लगती है |
इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में सामाजिक आधार
पर दंगे जैसे जाति, धर्म या भाषा के आधार पर होने वाले दंगें उन क्षेत्रों से लोगों के पलायन कों बढ़ावा देते
है | इस तरह के क्षेत्र कम बसे क्षेत्र हो जाते है |
जनसंख्या
कों प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक कारक
कुछ
स्थान धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण अधिक लोगों कों आकृषित करते हैं और सघन जनसंख्या के केन्द्र बन जाते हैं | जैसे जेस्र्सलम
और मक्का-मदीना अपने धार्मिक महत्व के कारण सघन बसे है |इसी भारत में हरिद्वार,
मथुरा, वाराणसी, अमृतसर, इलाहाबाद, मदुरै, उज्जैन आदि नगर अपने धार्मिक महत्व के
कारण सघन बसे है |
जनसंख्या
कों प्रभावित करने वाले राजनैतिक कारक
किसी
भी देश की राजनैतिक व्यवस्था वहाँ के लोगों आकृषित भी कर सकती है और वहाँ से जाने
ले लिए मजबूर भी कर सकती है | अगर देश या क्षेत्र में राजनैतिक कारणों से अशांति
उत्पन्न होती है तो लोग वहाँ से चले जाते है |
क्योंकि उन क्षेत्रों में राजनैतिक अस्थिरता आ जाता है | इसके विपरीत किसी
प्रदेश राजनैतिक की स्थिरता लोगों कों उस प्रदेश में रहने के लिए प्रोत्साहित करती
है |
इसके अलावा जब सरकार की नीतियाँ भी जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित
करती है | जैसे सरकार किसी क्षेत्र विशेष में लोगों कों बसाने के लिए विभिन्न
प्रकार की सुविधायें देती है तो लोग उन क्षेत्रों में जाकर बसने लगते हैं |
सरकारें कई बार लोगों कों भीड़ -भाड़ वाले स्थानों से चले जाने ले लिए वहाँ कर अधिक
लगा देती है और वहाँ से विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहित
करती है | जैसे भारत की राजधानी दिल्ली के भीड़ भाड इलाकों से लोगों कों चले जाने
के लिए प्रोत्साहित किया गया था | साथ ही यहाँ पर उद्योगों के लिए कम
सुविधाएँ तथा अधिक सख्त नियम बना दिए गए |
जिससे लोग दिल्ली से बहार की ओर बसने लगे |
जनसंख्या वृद्धि का अर्थ
जनसंख्या
वृद्धि अथवा जनसंख्या परिवर्तन का अभिप्राय किसी क्षेत्र में समय की किसी निश्चित
अवधि के दौरान बसे हुए लोगों की संख्या में परिवर्तन से है |
दूसरे
शब्दों में समय के दो अंतरालों के बीच एक क्षेत्र विशेष में जनसंख्या में होने
वाले परिवर्तन कों जनसंख्या वृद्धि कहते हैं |
उदाहरण
के लिए, भारत की जनसंख्या सन् 2001 की जनगणना के अनुसार 102.70
करोड़ थी | जो 2011 की जनगणना के अनुसार 121.02 करोड़ हो गई | इन दोनों
समय अंतरालों के दौरान भारत में 18.30 करोड़ लोगों की संख्या
में वृद्धि हुई | भारत की जनसंख्या में इस वृद्धि कों ही जनसंख्या वृद्धि कहते है
|
जनसंख्या वृद्धि के अध्ययन का महत्व
जनसंख्या
वृद्धि या परिवर्तन के अध्ययन के द्वारा हम किसी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति,
सामाजिक उत्थान, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आदि के बारे में महत्वपूर्ण
जानकारियाँ प्राप्त करते है |
जनसंख्या वृद्धि के प्रकार
जनसंख्या
वृद्धि या परिवर्तन कों हम धनात्मक तथा ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि, प्राकृतिक
जनसंख्या वृद्धि और वास्तविक जनसंख्या
वृद्धि के रूप में बाँट सकते हैं | इनका
वर्णन इस प्रकार है |
A. जनसंख्या
की धनात्मक वृद्धि
जब दो समय अंतरालों के बीच
जन्म दर मृत्यु दर से अधिक हो और अन्य देशों से लोग आकर बस जाते है तो लोगों की
कुल संख्या में वृद्धि हो जाए तो इस बढोतरी कों जनसंख्या की धनात्मक वृद्धि कहते
है |
B. जनसंख्या
की ऋणात्मक वृद्धि
यदि दो समय अंतरालों के बीच
जनसंख्या में कमी आये तो उसे जनसंख्या की ऋणात्मक वृद्धि कहते हैं | यह तब होती है
जब जन्म दर मृत्यु दर से कम हो और लोग
अधिक संख्या में दूसरे देशों में जाकर रहने लगे |
C. प्राकृतिक
जनसंख्या वृद्धि
किसी क्षेत्र विशेष में दो
समय अंतरालों में जन्म और मृत्यु के अन्तर से जनसंख्या में होने वाली वृद्धि कों
उस क्षेत्र की प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि कहते है | इसे निम्न सूत्र द्वारा परिकलित
किया जा सकता है |
प्राकृतिक वृद्धि = जन्म
लेने वाले लोगों की संख्या –मरने वाले लोगों की संख्या
या प्राकृतिक वृद्धि = जन्म–मृत्यु
D. वास्तविक
जनसंख्या वृद्धि
किसी क्षेत्र विशेष में दो
समय अंतरालों के बीच जन्म और मृत्यु के अन्तर तथा आप्रवास व उत्प्रवास करने वाले
लोगों के अन्तर से जनसंख्या में होने वाली वृद्धि (परिवर्तन) कों उस क्षेत्र की
वास्तविक जनसंख्या वृद्धि कहते है | इसे निम्न सूत्र के द्वारा परिकलित किया जाता
है |
वास्तविक
जनसंख्या वृद्धि =
(जन्म लेने वाले लोगों की संख्या –मरने वाले
लोगों की संख्या) + (आप्रवास करने वाले लोगों की संख्या – उत्प्रवास करने वाले
लोगों की संख्या)
या (जन्म–मृत्यु ) + (आप्रवास – उत्प्रवास)
जनसंख्या वृद्धि कों व्यक्त करने के
तरीके
किसी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि कों हम
निरपेक्ष संख्या या वास्तविक संख्या के रूप में और प्रतिशत या वृद्धि दर के रूप
में व्यक्त कर सकते हैं | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
A. निरपेक्ष
संख्या द्वारा जनसंख्या वृद्धि दर्शाना
इस तरीके के अंतर्गत किसी
क्षेत्र की जनसंख्या के परिवर्तन कों वास्तविक संख्या के रूप में दर्शाते हैं |
जैसे भारत की जनसंख्या सन् 2001 की जनगणना के अनुसार 102.70
करोड़ थी | जो 2011 की जनगणना के अनुसार 121.02 करोड़ हो गई | इन दोनों
समय अंतरालों के दौरान भारत में 18.30 करोड़ लोगों की संख्या
में वृद्धि हुई |
B. प्रतिशत
द्वारा जनसंख्या वृद्धि दर्शाना या जनसंख्या की वृद्धि दर
इस
तरीके के अंतर्गत जनसंख्या में हुए परिवर्तन कों प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है
| जैसे भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार 2011
में 17.64 प्रतिशत जनसंख्या की वृद्धि हुई |
जनसंख्या परिवर्तन
(वृद्धि) के घटक (कारक)
जनसंख्या
वृद्धि के कारक जनसंख्या के वे तत्व हैं जिनसे किसी स्थान की जनसंख्या वृद्धि
प्रभावित होती है | जन्म, मृत्यु तथा प्रवास ये जनसंख्या वृद्धि के तीन मुख्य घटक हैं | इनका संक्षिप्त वर्णन
निम्नलिखित है |
1) जन्म
दर (अशोधित जन्म दर ) Curd
Birth Rate (CBR)
अशोधित
जन्म दर कों प्रति हजार स्त्रियों द्वारा जन्म दिए गए जीवित बच्चों के रूप में व्यक्त किया जाता है |
इसकी गणना इस प्रकार की जाती है |
क्षेत्र में किसी वर्ष
विशेष में जीवित जन्म लेने वाले बच्चे x 1000
अशोधित जन्म दर (CBR) = ___________________________________
क्षेत्र में वर्ष विशेष के मध्य में जनसंख्या
जन्म
दर के उच्च होने या निम्न होने का जनसंख्या वृद्धि से सीधा संबंध होता है |
2) मृत्यु
दर (अशोधित मृत्यु दर ) Curd
Death Rate (CDR)
अशोधित
मृत्यु दर कों किसी क्षेत्र में किसी वर्ष के दौरान प्रति हजार जनसंख्या के पीछे
मरने वालों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है | अशोधित मृत्यु दर की गणना इस प्रकार की जाती है
|
क्षेत्र में
किसी वर्ष विशेष में मृतकों की संख्या x 1000
अशोधित मृत्यु दर (CDR) = ________________________________
क्षेत्र
में वर्ष विशेष के मध्य में जनसंख्या
मृत्यु दर जनसंख्या परिवर्तन में सक्रिय
भूमिका निभाती है |क्योंकि जनसंख्या वृद्धि केवल बढती हुई जन्म दर से ही नहीं होती
बल्कि घटती हुई मृत्यु दर से भी होती है |
3) प्रवास
लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर
रहना प्रवास कहलाता है | जन्म दर और मृत्यु दर के अतिरिक्त यह कारक जनसंख्या
वृद्धि कों प्रभावित करता है | प्रवास के अंतर्गत व्यक्ति का एपने स्थान कों छोड़कर
जाना व दूसरे स्थान पर जाकर रहना दोनों ही प्रक्रियाएँ शामिल की जाती है | प्रवास
स्थाई, अस्थाई तथा मौसमी हो सकता है | यह गांव से गांव, गांव से नगर, नगर से नगर,
नगर से गांव की ओर हो सकता है | प्रवास देश की सीमा में हो तो आंतरिक और देश की
सीमा के बाहर हो तो अंतर्राष्ट्रीय होता है |
प्रवास का अर्थ
किसी
विशेष उद्देश्य से लोगों का एक स्थान कों छोकर दूसरे स्थान पर जाकर रहना प्रवास
कहलाता है |
प्रवास की प्रक्रिया
प्रवास
की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति का अपने स्थान कों छोड़कर जाने और दूसरे स्थान पर
आकर रहना दोनों ही प्रकार की प्रक्रिया कों शामिल किया जाता है | ये निम्नलिखित दो
प्रकार की होती है |
A. आप्रवास
(In-Migration)
:- जब लोग
किसी नए स्थान पर आकर रहने लगते है | तो इस प्रक्रिया कों आप्रवास कहते है |
B. उत्प्रवास
आप्रवास (Out-
Migration) :- जब लोग एक स्थान कों छोडकर
चले जाते हैं | तो इस प्रक्रिया कों उत्प्रवास कहते है |
समय के अवधि अनुसार प्रवास के
प्रकार
प्रवास
के समय के अवधि अनुसार प्रवास तीन प्रकार का होता है | स्थाई, अस्थाई तथा मौसमी प्रवास | इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
A. स्थाई
प्रवास
जब व्यक्ति किसी स्थान कों छोड़कर
चला जाए और दूसरे स्थान पर स्थाई रूप से रहने लगे तो इस प्रकार के प्रवास कों
स्थाई प्रवास कहते है | महिलाओं अधिकतर विवाह के बाद इसी तरह का प्रवास करती हैं |
B. अस्थाई
प्रवास
जब व्यक्ति कुछ समय के लिए
अपने स्थान कों छोड़कर रहने लगता है | तो इस तरह के प्रवास कों अस्थाई प्रवास कहते
है | जैसे विद्यार्थी द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने जन्म स्थान कों
छोड़कर जाना और शिक्षा ग्रहण करने पर वापस लौट आना |
C. मौसमी
प्रवास
जब प्रवास एक विशेष समय (मौसम) में किया जाता
है तो यह मौसमी प्रवास कहलाता है | इस प्रवास का मुख्य रूप से कृषि क्रिया में
होता है | लोग कृषि कार्य करने के लिए जैसे कटाई या बुआई के मौसम में प्रवास करते
हैं और काम समाप्त हो जाने पर अपने घर लौट आते है | इसी तरह जम्मू कश्मीर से चरवाहे सर्दी के समय
मैदानी क्षेत्रों में आ जाते है और गर्मियों की शुरुआत में वापस पहाड़ी क्षेत्रों में जाने लगते है |
गंतव्य स्थान के आधार पर प्रवास के प्रकार
गंतव्य
स्थान के आधार पर प्रवास दो प्रकार का होता है | आंतरिक प्रवास तथा अंतर्राष्ट्रीय
प्रवास |
आंतरिक
प्रवास (Inland Migration)
प्रवास
देश की सीमा में हो तो आंतरिक प्रवास कहलाता है |
अंतर्राष्ट्रीय
प्रवास (International Migration)
प्रवास
जब देश की सीमा के बाहर (एक देश से दूसरे
देश में ) हो तो अंतर्राष्ट्रीय होता है |
प्रवास की धाराएँ
प्रवास
की चार मुख्य धाराएँ हैं |
(a) गांव
से गांव (b) गांव से नगर (c)
नगर से नगर
(d) नगर से गांव
आप्रवासी और उत्प्रवासी में अन्तर
आप्रवासी
(in-migrant
) :- वे लोग जो किसी नए स्थान पर आकर
बस जाते हैं, आप्रवासी कहलाते हैं |
उत्प्रवासी
(out-
migrant) :- वे लोग जो अपने स्थान कों
छोड़कर बाहर चले जाते है, उत्प्रवासी
कहलाते हैं |
उद्गम स्थान और गंतव्य स्थान में अन्तर
उद्गम
स्थान :- वह स्थान जहाँ से लोग चले जाते
हैं या गमन कर जाते है | उस स्थान कों उद्गम
स्थान कहते है | उत्प्रवास के प्रवास के कारण यहाँ उद्गम स्थान की जनसंख्या में कमी होती है
|
गंतव्य
स्थान :- वह
स्थान जहाँ पर लोग आकार बीएस जाते हैं | उस स्थान कों गंतव्य स्थान कहते है |
आप्रवास के कारण गंतव्य स्थान की जनसंख्या में वृद्धि होती है |
प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारक
लोग
अपने जन्म स्थान से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं | लेकिन बेहतर आर्थिक और
सामाजिक जीवन जीने के लिए या सामाजिक और राजनैतिक कारणों से अपने जन्म स्थान कों
छोड़कर प्रवास करते है | इसी तरह बहुत से
ऐसे कारक होते है जो लोगों कों प्रवास करने लिए प्रोत्साहित करते हैं या उन्हें
बाध्य करते है | प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारकों कों हम दो भागों में बाँट
सकते हैं | ये प्रतिकर्ष कारक तथा अपकर्ष
कारक कहलाते है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |
प्रतिकर्ष
कारक (Push Factors of Migration)
वे
कारक जो लोगों कों उनके निवास स्थान या उद्गम स्थान कों छोड़कर जाने का कारण बनते
है उन्हें प्रवास के प्रतिकर्ष कारक कहते हैं | इन कारकों के अंतर्गत बेरोजगारी,
रहन-सहन की निम्न दशाएँ, राजनैतिक उपद्रव, प्रतिकूल जलवायु, बाढ़ और सूखे जैसी
प्राकृतिक आपदाओं का बार बार आना, महामारियाँ तथा सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन आदि
शामिल हैं | जिनके कारण लोग अपना स्थान छोड़कर चले जाते है |
अपकर्ष
कारक (Pull Factors of
Migration)
वे
कारक जो लोगों कों विभिन्न स्थानों से आकार रहने के लिए आकर्षित करते हैं उन्हें
प्रवास के अपकर्ष कारक कहते है | इन कारकों में रोजगार के अच्छे अवसर, रहन-सहन की
उच्च दशाएँ, राजनैतिक शांति और स्थायित्व, जीवन और सम्पति की सुरक्षा, अनुकूल
जलवायु, तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत समाज आदि शामिल हैं | ये ऐसे कारक है
जो किसी स्थान (गंतव्य स्थान ) कों उद्गम स्थान की अपेक्षा अपनी ओर आकर्षित करते
हैं |
विश्व में जनसंख्या वृद्धि की प्रवर्तियाँ (आदि काल से लेकर अब तक विश्व की जनसंख्या की
प्रवर्तियाँ)
पृथ्वी
पर 700 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं | विश्व की जनसंख्या कों इस विशाल आकार में
पहुँचने में शताब्दियाँ लगी हैं | आरम्भिक कालों में विश्व की जनसंख्या धीरे-धीरे
बढ़ी है | पिछले कुछ वर्षों के दौरान ही जनसंख्या आश्चर्यजनक ररूप से बढ़ी है |
आदिकाल से लेकर अब तक विश्व की जनसंख्या वृद्धि की प्रवर्तियों कों निम्नलिखित
बिंदुओं द्वारा समझा ज सकता है |
1. लगभग
8000 से 12000 वर्ष पूर्व कृषि के उद्गम व आरम्भ के बाद
जनसंख्या का आकार बहुत छोटा था | मौते तौर पर जनसंख्या 800
लाख के आस पास थी |
2. ईसा
की पहली शताब्दी में जनसंख्या करोड़ से कम थी |
3. 16वीं और 17वीं शताब्दी में बदले विश्व व्यापार ने
जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के लिए मंच तैयार किया |
4. औद्योगिक
क्रान्ति केन उदय के समय 1600 ईस्वीं के आस पास जनसंख्या
लगभग 50 करोड़ थी |
5. औद्योगिक
क्रान्ति के बाद विश्व जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि हुई | सन् 1830
में जनसंख्या 1 अरब के आसपास होंगे थी |जो सन् 1930 अर्थात सौ वर्षों में दोगुनी हो
गई |
6. केवल
बीसवीं शताब्दी में यह 4 गुनी बढ़ गई | अब एक अनुमान के
अनुसार 8 करोड़ लोग
पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बढ़ जाते है |
विश्व में जनसंख्या के दोगुणा होने
की अवधि की प्रवर्तियाँ
मानव जनसंख्या को शुरू में एक करोड़ होने में 10 लाख से भी अधिक वर्ष लग गए थे | लेकिन वर्तमान समय में यह 8 अरब के आस-पास हो गई है
| जो दर्शाता है कि विश्व जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है | अपनी पिछली
जनसंख्या के मुकाबले दोगुनी होने का समय तेजी से घटता ज रहा है | विश्व की
जनसंख्या के दोगुणा होने की प्रवर्तियों को निम्न तथ्यों से समझा ज सकता है |
A.
प्रारम्भिक काल में जनसंख्या
बहुत धीमी गति से बढ़ी | प्रारम्भिक एक करोड़ होने में 10 लाख से भी
अधिक वर्ष लग गए |
B.
सन् 1650 के आस - पास जनसंख्या 50 करोड़ थी | जो सन् 1850 में 100 करोड़ हो गई | 50 करोड़
जनसंख्या बढ़ने में लगभग 150 वर्ष लग गए |
C.
सन् 1850 में जनसंख्या 100 करोड़ (एक अरब) से बढ़कर सन् 1930 में यह 200 करोड़ (दो अरब) जनसंख्या हो गई | केवल 80 वर्षों में
जनसंख्या दोगुनी हो गई |
D.
अगली बार दोगुनी होने में
केवल 45 वर्ष ही लगे | 1930 मेंजनसंख्या 200 करोड़ थी जो 1975 में बढ़कर 400
करोड़ हो गई | यह स्थिति जनसंख्या विस्फोट
की स्थिति कों दर्शाती है |
E.
विद्वानों के अनुमान के
अनुसार विश्व की जनसंख्या जो 1975 में 400 करोड़ थी केवल 37 वर्षों में ही सन् 2012 के आस पास 800 करोड़ (8 अरब ) हो गई है |
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विश्व
में जनसंख्या के दोगुने होने की अवधि तेजी से कम हो रही है |
जनसंख्या वृद्धि के स्थानिक प्रारूप
विश्व के विभिन्न महाद्वीपों
और प्रदेशों में जनसंख्या वृद्धि की दर में अत्यधिक असमानता देखने कों मिलती है |
विकसित देशों में वृद्धि की दर विकासशील देशों की तुलना में कम है | सन् 2015 के
विश्व की जनसंख्या के आकडों के अनुसार विश्व में जनसंख्या परिवर्तन की दर 1.2
प्रतिशत वार्षिक है | जो निम्न प्रतीत होती है | लेकिन इस वृद्धि दर
से भी विशाल जनसंख्या में बहुत अधिक वृद्धि होती है | विश्व में जनसंख्या के
स्थानिक प्रारूप कों निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |
1)
उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले
क्षेत्र
इस
वर्ग में वे राष्ट्र शामिल हैं जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर 2 से 2.9
प्रतिशत वार्षिक होती है | इस वर्ग में अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश देश शामिल है
| अफ्रीका महाद्वीप की औसत वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 2.6
प्रतिशत है |
2)
मध्यम जनसंख्या वृद्धि वाले
देश
इस
वर्ग में 1से 1.9 प्रतिशत
वार्षिक वृद्धि वाले देश शामिल किए जाते है | इन देशों में दक्षिणी अमेरिका
महाद्वीप व केरेबियन द्वीप समूह के देश,
तथा एशिया के अधिकांश देश आते है |
3)
निम्न जनसंख्या वृद्धि वाले
देश
जिन
देशों की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1 प्रतिशत से
भी कम रहती है | वे निम्न जनसंख्या वृद्धि वाले देश कहलाते हैं | इन देशों में
यूरोप के अधिकांश देश तथा उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के संयुक्त राज्य अमेरिका तथा
कनाडा शामिल हैं |
जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास
में संबंध
किसी भी देश की जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ वहाँ
प्राकृतिक संसाधनों की माँग भी बढ़ने लगती है | साथ ही रोजगार के अवसरों की भी
आवश्यकता होती है | यदि जनसंख्या के बढ़ने से लोगों की आय कम होने लगती है तो देश
पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | देश का विकास अवरूध हो जाता है | जीवन स्तर गिरने
लगता है |
इसके
विपरीत जनसंख्या वृद्धि होने के कारण संसाधनों का सही उपयोग होता है | तो जनसंख्या
वृद्धि अनुकूल प्रभाव प्रदान करती है | क्योंकि जनसंख्या के द्वारा संसाधनों का
सही उपयोग होने पर रोजगार के साधन बढते हैं | लोगों की आर्थिक उन्नति होने लगती है
| देश का विकास तेज गति से होने लगता है | लोगों के जीवन स्तर में बढोतरी होती है
|
जनसंख्या वृद्धि के कारण उत्पन्न
समस्याएँ
जनसंख्या वृद्धि के कारण निम्नलिखित समस्याएं
उत्पन्न हो सकती है |
1)
संसाधनों पर अत्यधिक दबाव
पड़ता है |
2)
जनसंख्या के भरण-पोषण में
कठिनाई उत्पन्न होने लगती है |
3)
विकास की गति धीरे हो जाती
है |
4)
रोजगार के अवसरों की कमी
होती है | इससे आश्रित जनसंख्या बढ़ने लगती है |
जनसंख्या ह्रास (कमी) से उत्पन्न
समस्याएँ
जनसंख्या में कमी (ह्रास) के कारण निम्नलिखित
समस्याएं उत्पन्न हो सकती है |
1)
संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं
हो पाता है |
2)
समाज की आधारभूत संरचना
अस्थिर होने लगती है |
3)
देश का भविष्य चिंता और
निराशा में डूबने लगता है |
4)
हमेशा असुक्षा की भावना बनी
रहती है |
जनांकिकीय चक्र
जनसंख्या का विकास एक चक्र के रूप में होता है
| ऐसा चक्र जिसमें किसी क्षेत्र का समाज ग्रामीण, खेतिहर और अशिक्षित अवस्थाओं से
उन्नति करता हुआ नगरीय, औद्योगिक और शिक्षित बनता है तो उस क्षेत्र की जनसंख्या
में भी उच्च जन्म दर से निम्न जन्म दर और
उच्च मृत्यु दर से निम्न मृत्यु दर में परिवर्तन
हो जाता है | यह चक्र इन परिवर्तनों के दौरान अनेक अवस्थाओं से गुजरता है |
इन अवस्थाओं कों ही सामूहिक रूप से जनांकिकीय चक्र कहते हैं |
जनसंख्या का जनांकिकीय संक्रमण
सिद्धांत
जनांकिकीय संक्रमण अथवा जनसांख्यकीय संक्रमण
सिद्धांत एक जनसंख्या संबंधी सिद्धांत है | जो किसी स्थान की जनसंख्या के आँकड़ों
के वर्णन के साथ-साथ उस स्थान की भविष्य की जनसंख्या के पूर्व अनुमान एक लिए
प्रयोग किया ज सकता है |
इस
सिद्धांत का प्रतिपादन डब्ल्यू० एम० थाम्पसन ने सन् 1929
में किया और एल० डब्ल्यू० नेटोस्टीन
ने सन् 1945 में किया | इन्होने
यूरोप,ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में प्रजनन दर (जन्म दर ) और मृत्यु दर की प्रवृति
के अनुभवों के आधार पर यह सिद्धांत दिया था |
यह सिद्धांत उच्च प्रजनन
दर (जन्म दर) तथा मृत्यु दर से न्यून जन्म दर (प्रजनन दर ) से न्यून मृत्यु दर
के जनसंख्या परिवर्तन कों दर्शाता है | विद्वान इस सिद्धांत के चक्र कों जनसंख्या
चक्र, जनांकिकीय चक्र या जनसंख्या संक्रमण भी कहते है | इस सिद्धांत के अनुसार
जनसंख्या संक्रमण के चक्र की विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए कोई समाज ग्रामीण,
खेतिहर और अशिक्षित अवस्थाओं से उन्नति करता हुआ नगरीय, औद्योगिक और शिक्षित
(साक्षर) बनता है |
जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत के अनुसार
जनसंख्या के संक्रमण की अवस्थायें
जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत के अनुसार
जनसंख्या के संक्रमण की तीन अवस्थायें हैं | जिनका वर्णन निम्नलिखित है |
1) प्रथम
अवस्था
इस अवस्था में उच्च
प्रजननशीलता (जन्म दर) तथा उच्च मृत्यता (मृत्यु दर ) होती है | इसका कारण यह है
कि लोग महामारियों तथा भोजन की अनिश्चित आपूर्ति से होने वाली मृत्युओं की क्षति
पूर्ति अधिक सन्तान पैदा करके करते हैं | जनसंख्या वृद्धि धीमी गति से होती है |
अधिकांश लोग खेती में कार्यरत रहते है | इस अवस्था में बड़े परिवारों कों परिसम्पति
माना जाता है | जीवन प्रत्याशा निम्न होती है | अधिकांश लोग अशिक्षित होते हैं |
प्रौद्योगिकी का स्तर निम्न होता है | 200 वर्ष
पूर्व विश्व के सभी देश इसी अवस्था में थे |
2) द्वितीय
अवस्था
इस अवस्था के प्रारम्भ में प्रजननशीलता ऊँची
बनी रहती है | परन्तु जैसे - जैसे समय बीतता है यह घटती जाती है | इस अवस्था
में मृत्यु दर कम रहती है | स्वास्थ्य
संबंधी सेवाओं तथा स्वच्छता में सुधार के कारण मृत्यु दर में कमी आने लगती है |
उच्च जन्म दर तथा निम्न मृत्यु दर के कारण जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होने लगती
है | यह स्थिति जनसंख्या विस्फोट कहलाती है |
3) तृतीय
अवस्था (अंतिम अवस्था)
यह जनसंख्या संक्रमण की अंतिम अवस्था कहलाती
है | इस अवस्था में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत अधिक कम हो जाते हैं |
फलस्वरूप या तो जनसंख्या स्थिर हो जाती है या मंद गति से बढती है | लोगों का
तकनीकी ज्ञान (प्रौद्योगिकी स्तर) उच्च स्तर का होता है | ऐसी अवस्था में जनसंख्या
विचार पूर्वक परिवार के आकार कों नियंत्रित करती है |
इन तीनों अवस्थाओं कों निम्न चित्र द्वारा
समझा ज सकता है |
जनसंख्या नियंत्रण के उपाय
किसी
भी देश की जनसंख्या वृद्धि कों नियंत्रित करना बहुत आवश्यक हो जाता है | क्योंकि
तेजी से बढती हुई जनसंख्या देश के संसाधनों पर बोझ बनने लगती है |
1. जनसंख्या
को नियांत्रित करने का सबसे प्रभावशाली उपाय परिवार नियोजन है | परिवार नियोजन का
अर्थ है बच्चों के जन्म कों रोकना या उनके जन्म के मध्य अंतराल रखना | इससे
जनसंख्या कों तो नियंत्रित किया ही ज सकता है | साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य में
भी सुधार लाया ज सकता है | जनसंख्या
नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन कों निम्नलिखित तरीकों से बढ़ावा दिया जा सकता है |
क.
परिवार नियोजन के तरीकों का
प्रचार करके लोगों कों जागरूक किया जाये |
ख.
गर्भ निरोधक साधनों की सुगम
उपलब्धता द्वारा भी परिवार नियोजन कों बढ़ावा दिया ज सकता है |
2. बड़े
परिवारों के के लिए कर की व्यवस्था या उन्हें सरकार द्वारा मिलने वाली सब्सिडी (छूट) आदि ना देकर उन्हें निरुत्साहित
करके भी परिवार छोटा रखने के लिए बाध्य किया जा सकता है |
ये
प्रावधान (उपाय ) जनसंख्या कों नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं |
थॉमस माल्थस का जनसंख्या संबंधी सिद्धांत
थॉमस माल्थस ने सन् 1793 में जनसंख्या संबंधी सिद्धांत दिया था | उनके सिद्धांत में उन्होंने कहा
था कि लोगों की संख्या में वृद्धि 1,2,4,8,16,32………. की गति
से ढ़ेगी जबकि खाद्य आपूर्ति के बढ़ने की गति 1,2,3,4,5,6,…….. की होगी अर्थात लोगों कि संख्या
खाद्य आपूर्ति की अपेक्षा तेजी से बढ़ेगी | इस तरह जनसंख्या में वृद्धि के परिणाम
स्वरूप प्राकृतिक आपदायें जैसे अकाल, बाढ़, आदिके आने या महामारियों के आने, या
युद्ध द्वारा जनसंख्या में तेजी से गिरावट देखने कों मिलेगी |
उच्च जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश और उनमें सघन जनसंख्या होने के कारण
विश्व में कुछ क्षेत्र जनसंख्या के हिसाब से
सघन बसे हुए है | इस प्रदेशों में
जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | इन क्षेत्रों कों उच्च जनसंख्या घनत्व
वाले प्रदेश कहते है | इनमें निम्नलिखित क्षेत्रों कों शामिल किया जाता है |इन
क्षेत्रों में मानसून एशिया अर्थात पूर्व
एशिया, तथा दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया , यूरोप , उत्तर अमेरिका का पूर्वी तटीय प्रदेश शामिल है | इन प्रदेशों में सघन जनसंख्या होने के
निम्नलिखित कारण हैं |
मानसून
एशिया (पूर्व एशिया) तथा दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया में सघन जनसंख्या होने के
कारण
चीन
भारत, बांग्लादेश, जापान, सिंगापुर तथा इंडोनेशिया का जावा द्वीप इस क्षेत्र में
आते है | इनमें जनसंख्या सघन होने के निम्नलिखित कारण है |
1) इन
क्षेत्रों की जलवायु उष्ण-आर्द्र है | इन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है |
2) इन
क्षेत्रों में नदियों द्वारा लाकर बिछाई गई उपजाऊ
मिट्टी मिलती है | जिससे इन
क्षेत्रों में चावल की दो या तीन फसलें एक वर्ष में ली जाती है | कृषि के लिए
अनुकूल परिस्थितियों के कारण यहाँ जनसंख्या सघन है |
3) भारत
चीन तथा जापान जैसे देशों में नगरीकरण के
बढ़ने और औद्योगिकीकरण के विकास से भी जनसंख्या बढ़ी है |
पश्चिमी
यूरोप के देशों में सघन जनसंख्या होने के कारण
पश्चिमी यूरोप के देशों में सघन जनसंख्या की
पेटी इंग्लिश चैनल से नीपर नदी तक 500
उत्तरी अक्षांशों के
साथ साथ विस्तृत है | यूरोप
में 500 उत्तरी अक्षांश रेखा कों जनसंख्या
की धुरी (Axis of Population) कहा जाता हैं | इन क्षेत्रों
में ब्रिटेन, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, हॉलैंड, डेनमार्क, फ्रांस तथा जर्मनी में रुहर प्रदेश, और रूस में
मास्को –यूक्रेन क्षेत्र अधिक जनसंख्या
घनत्व वाले क्षेत्र है | इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक होने के
निम्नलिखित कारण है |
1. पश्चिमी
यूरोप की अधिकतर जनसंख्या मुख्यत: उद्योगों पर आधरित है |
2. समुद्री
मार्गों द्वारा व्यापार अधिक उन्नत है |
3. इन
क्षेत्रों में समशीतोष्ण जलवायु पाई जाती है जो मानव के अनुकूल होती है |
4. इन
क्षेत्रों में खनिजों के विशाल भंडार मिलते है |
5. इन
क्षेत्रों में नगरीकरण के कारण बड़े बड़े नगरों का विकास हुआ | जिससे जनसंख्या के
संकेन्द्रण में सहायता मिली है |
6. इन
क्षेत्रों में पुर्तगाल, इटली, तथा दक्षिणी फ्रांस नदी घाटियों के क्षेत्र है |
जिससे यहाँ सघन जनसंख्या मिलती है |
उत्तरी
अमेरिका का पूर्वी तट के क्षेत्रों में सघन जनसंख्या होने के कारण
इन
क्षेत्रों में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के पूर्वी भाग शामिल हैं | यहाँ पर
जनसंख्या का संकेन्द्रण होने के निम्नलिखित कारण है |
1. यहाँ
की अधिकतर जनसंख्या मुख्यत: उद्योगों पर आधरित है |
2. समुद्री
मार्गों द्वारा व्यापार अधिक उन्नत है |
3. इन
क्षेत्रों में समशीतोष्ण जलवायु पाई जाती है जो मानव के अनुकूल होती है |
4. इन
क्षेत्रों में खनिजों के विशाल भंडार मिलते है |
5. इन
क्षेत्रों में नगरीकरण के कारण बड़े बड़े नगरों का विकास हुआ | जिससे जनसंख्या के
सकेन्द्रण में सहायता मिली है |
क. यहाँ
पर यूरोपीय प्रवासी आकार बस गए | जिन्होंने यहाँ पर उद्योगों का विकास किया जो
जनसंख्या कों अपनी ओर आकृषित करते हैं |
विरल जनसंख्या घनत्व वाले
प्रदेश और उनमें विरलजनसंख्या होने के कारण
जिन क्षेत्रों में 1से 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर रहते है | उन्हें
विरल जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश कहलाते है | इन क्षेत्रों के अंतर्गत उत्तरी व
दक्षिणी ध्रुव, उष्ण मरुस्थल में सहारा, आटाकामा, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, अरब का
मरुस्थल थार का मरुस्थल था सोनोरेन का मरुस्थल शामिल है | इसी तरह शीत मरुस्थल तथा विषुवत रेखा के निकट उच्च वर्षा
के क्षेत्र शामिल हैं | इन प्रदेशों में विरल जनसंख्या होने के निम्नलिखित कारण
हैं |
उष्ण
मरुस्थल में सहारा, आटाकामा, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, अरब का मरुस्थल थार का मरुस्थल
था सोनोरेन का मरुस्थल ये सभी न्यून वर्षा के क्षेत्र हैं अर्थात जल की कमी के कारण यहाँ जनसंख्या विरल
है |
अति
शीत क्षेत्र जिनमें धुर्वीय क्षेत्र है | उत्तरी
ध्रुव के क्षेत्र जिनमें कनाडा का उत्तरी भाग, ग्रीनलैंड, साइबेरिया का उत्तरी भाग
शामिल हैं | इनके अतिरिक्त दक्षिणी ध्रुव के चारों ओर फैला अंटार्कटिक महाद्वीप का
क्षेत्र शामिल है | इन क्षेत्रों में तापमान कम है और फसलों का वर्धन काल छोटा है
| इसलिए ये क्षेत्र विरल जनसंख्या वाले है |
शीतोष्ण
मरुस्थलीय क्षेत्र जो विशेष रूप से मध्य एशिया में स्थित क्षेत्र भी विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र
है | जैसे गोबी का मरुस्थल | ये क्षेत्र
समुद्र से दूर और वृष्टि छाया क्षेत्र (कम वर्षा वाले क्षेत्र ) में स्थित है |
वर्षा की कमी और शीत ऋतु में तापमान न्यून (कम) होने से जनसंख्या विरल है |
विषुवत
रेखीय क्षेत्र जिनमें दक्षिणी अमेरिका का अमेजन बेसिन तथा अफ्रीका का जायरे बेसिन
शामिल है | विरल जनसंख्या के क्षेत्र हैं | इन क्षेत्रों में अधिक तापमान तथा अधिक
वर्षा के वन अत्यधिक उगते है| जिन्हें पार करना बहुत कठिन है | जलवायु असहनीय है
और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | जिससे इन क्षेत्रों में विरल जनसंख्या पाई जाती
है |
इन
सभी प्रदेशों में आधारभूत संरचना जैसे परिवहन के साधनों, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि
का पर्याप्त विकास नहीं किया जा सकता | इन क्षेत्रों में उद्योगों का आभाव है |
कृषि के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं होने से भी विरल जनसंख्या मिलती है |
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