कक्षा
12वीं
मानव भूगोल के मूल
सिद्धांत
अध्याय
10 मानव बस्ती
मानव
भूगोल में मानव बस्तियों के अध्ययन का औचित्य (उद्देश्य)
या
मानव
बस्ती का अध्ययन मानव भूगोल का मूल
किसी भी क्षेत्र में बस्तियों का रूप उस
क्षेत्र के वातावरण से मानव का संबंध दर्शाता है | इन सम्बन्धों का अध्ययन ही मानव
भूगोल का उद्देश्य है | इसलिए मानव बस्ती का अध्ययन मानव भूगोल का मूल है |
मानव बस्ती का अर्थ
आवास
मानव की मूलभूत आवश्यकता है | आवास के रूप में लोग जहाँ पर रहते है | वह निवास
स्थान एक झोपडी, एक या दो कमरों का मकान या एक बड़ी हवेली हो सकती है | मनुष्य के आवासों के संगठित रूप कों ही ‘बस्ती’ कहते हैं | साधारण शब्दों में एक स्थान जिसमें अनेक मकान
स्थाई रूप से बसे हुए हो उसे मानव बस्ती कहते है | गांव , नगर या शहर आदि मानव बस्ती के ही रूप है
|
स्थान (site) तथा स्थिति (situation) में
अन्तर
स्थान
(साइट) या स्थल
स्थान
से हमारा अभिप्राय: उस वास्तविक भूमि से है जिस पर बस्ती बनी हुई है |
स्थिति
(सिचुएशन)
बस्ती
की स्थिति से अभिप्राय: उसके आस-पास के क्षेत्र (गाँवों) के संबंध में उसकी
अवस्थिति से होता है |
बस्तियों का वर्गीकरण के आधार (ग्रामीण
–नगरीय द्विभाजन के मापदंड)
हम
बस्तियों का वर्गीकरण करते समय इन्हें ग्रामीण – नगरीय बस्तियों के रूप में बाँटते
है | बस्तियों कों ग्रामीण कहे या नगरीय इसके लिए विद्वानों के मत एक जैसे नहीं है
फिर भी बस्ती ग्रामीण है या नगरीय इसके
लिए दो मुख्य आधार माने जाते है |
1. जनसँख्या
जनसंख्या बस्तियों कों
गांवों और नगरों में वर्गीकृत करने का महत्वपूर्ण आधार है | जनसंख्या के आधार पर
ग्राम नगरों से छोटे होते है | जनसंख्या घनत्व गांव में कम तथा नगरों में अधिक
होता है | लेकिन जनसंख्या के आधार पर वर्गीकरण एकरूपता नहीं दिखाता है | क्योंकि
विभिन्न देशों ने अपनी सुविधा के अनुसार बस्तियों कों नगरीय तथा ग्रामीण बस्ती के
रूप में परिभाषित किया है | उदाहरण के लिए चीन तथा भारत के कई गांव ऐसे है जिनकी
जनसंख्या पश्चिमी यूरोप के देशों के नगरों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के नगरों की
जनसंख्या से भी अधिक है |
2. आर्थिक
क्रियाकलाप (व्यवसाय )
यह कारक भी बस्तियों कों
ग्रामीण तथा नगरीय बस्तियों में बांटने का मूल आधार लोगों के द्वारा किए जाने वाले
आर्थिक क्रियाकलाप है | नगरों में लोग द्वितीयक तृतीयक तथा चतुर्थक व्यवसायों जैसे
विनिर्माण उद्योग, व्यापार, परिवहन सेवाएँ, शोध एवं विकास से संबंधित कार्यों से
जुड़े होते है | इसके विपरीत गाँवों में अधिकतर लोग प्राथमिक क्रियाओं जैसे कृषि, मत्स्य पालन तथा वानिकी आदि में
संलग्न रहते है |
ग्रामीण –नगरीय बस्तियों का अन्तर
ग्रामीण
तथा नगरीय बस्तियों में निम्नलिखित अन्तर है |
ग्रामीण
बस्ती : इन
बस्तियों का आकार छोटा होता है | ग्रामीण बस्तियों में रहने वाले निवासियों का
मुख्य व्यवसाय प्राथमिक गतिविधियाँ जैसे कृषि, मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, खनन कार्य तथा
पशुपालन से संबंधित होता है | इन बस्तियों में आधुनिक सुविधाओं का अभाव होता है |
इन बस्तियों में जनसंख्या घनत्व कम होता है | ये बस्तियाँ कृषि प्रधान होने के
कारण नगरों कों कृषि तथा पशु उत्पाद उपलब्ध करवाती हैं |
शहरी
बस्ती : इन बस्तियों काआकार बड़ा होता है | शहरी
बस्ती के निवासियों का मुख्य व्यवसाय द्वितीयक तथा तृतीयक गतिविधियों जैसे विनिर्माण उद्योग,व्यापार, परिवहन ,शिक्षा व
चिकित्सा आदि सेवाओं से संबंधित होता है | इन बस्तियों में आधुनिक सुविधाएँ
पर्याप्त मात्रा में होती है | इन बस्तियों में जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक
होता है | ये बस्तियाँ उद्योग प्रधान होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कारखानों
में बनी हुई वस्तुओं कों उपलब्ध करवाती है |
बस्तियों कों प्रभावित करने वाले कारक
ग्रामीण
बस्तियों कों प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण तत्व (कारक) निम्नलिखित है |
जल
आपूर्ति
जल
मानव जीवन के लिए अनिवार्य है | इसलिए बस्तियाँ नदियों, झीलों, झरनों जैसे जल के
स्त्रोतों या जलराशियों के समीप स्थित होती थी | ताकि इन बस्तियों के निवासियों
कों जल आसानी से उपलब्ध हो सके | कभी – कभी पानी की आवश्यकता लोगों कों असुविधाजनक
स्थानों जैसे दलदल से घिरे द्वीपों अथवा नदी के किनारों के निचले हिस्सों में बसने के लिए प्रेरित करती है |
नम बिंदु बस्तियों में पीने के लिए, खाना
बनाने, वस्त्र धोने आदि के लिए जल आसानी से उपलब्ध उपलब्ध हो जाता है | सिंचाई, मत्स्य पालन आदि के लिए भी नदियों तथा
झीलों का उपयोग किया जाता है | नाव चलाने योग्य नदियाँ तथा झीलें यातायात के लिए
भी प्रयोग की जा सकती है |
भूमि
किसी भी क्षेत्र में प्रारम्भ अधिवासी समतल
तथा उपजाऊ क्षेत्र में ही बसना पसंद करते है | मनुष्य बसने के लिए उस जगह का चुनाव
करता है | जहाँ की भूमि कृषि कार्य के लिए उपयुक्त और उपजाऊ हो | क्योंकि उपजाऊ
भूमि कृषि कों बढ़ावा देती है | प्राचीन काल में
अधिकाँश बस्तियाँ नदी घाटियों की
उपजाऊ भूमि पर ही स्थापित की गई थी | यूरोप में दलदली क्षेत्र और नदी घाटी के
निचले भागों में बस्तियाँ नहीं बसाई जाती बल्कि उनके पास के ढलवाँ और उपजाऊ भागों
में बसाई जाती है | जबकि दक्षिणी-पूर्वी एशिया में लोग नदी घाटियों के निम्न
(निचले) भागों एवं तटवर्ती मैदानों के निकट बस्तियाँ बसाते हैं | क्योंकि ये भाग
चावल की कृषि के लिए बहुत उपयोगी होते है |
उच्च
भूमि के क्षेत्र
मानव
अपने निवास के लिए ऊँचे क्षेत्रों कों इसलिए चुना कि वहाँ पर बाढ़ के समय होने वाली
क्षति से बचा सके ताकि मकान और लोगों का
जीवन सुरक्षित रह सके | इसलिए नदी बेसिन (नदी घाटी ) के निचले क्षेत्रों में
बस्तियाँ नदी वेदिकाओं तथा तटबंधो जैसी ऊँची भूमियों पर बसाई जाती है | क्योंकि ये
शुष्क बिंदु क्षेत्र होते है | उदाहरण के लिए उष्णकटिबंधीय देशों के दलदली
क्षेत्रों के निकट के लोग अपने मकान स्तम्भों पर बनाते है जिससे कि बाढ़ व कीड़े-मकोडों
से बचा जा सके |
गृह
निर्माण सामग्री
मानव
बस्तियों के विकसित होने में गृह निर्माण सामग्री की उपलब्धता भी एक बड़ा कारक होती
है | गृह निर्माण के लिए सामान्यत:
स्थानीय रूप में मिलने वाली सामग्री का प्रयोग किया जाता है | जहाँ आसानी से
पत्थर, लकड़ी, मिट्टी, सरकंडे आदि मिल जाते है वहीँ पर मनुष्य अपनी बस्ती बसाता है
| वन क्षेत्रों में लकड़ी प्रचुर मात्रा में मिलती है और गृह निर्माण के लिए मुख्य
रूप से लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है | प्राचीन गाव वनों से लकड़ी काटकर ही बसाए
गए थे |
उदाहरण के लिए चीन के लोयस क्षेत्र के
निवासी कन्दाराओं में ही अपने मकान बनाते थे | क्योंकि यहाँ ये कन्दराएँ आसानी से
उपलब्ध हो जाती थी | अफ्रीका के सवाना प्रदेश में कच्ची ईंटों के मकान बनते थे |
जबकि ध्रुवीय क्षेत्र में एस्किमो लोग हिम खंडों से अपने लिए इग्लू का निर्माण
करते है |
सुरक्षा
बस्ती
का निर्माण करते समय सुरक्षा का विशेष ध्यान
रखा जाता है इसलिए बस्तियाँ सुरक्षित स्थानों पर ही बनाई जाती है | राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध, पडोसी समूहों के उपद्रवी होने
की स्थिति में गाँवों कों सुरक्षित पहाड़ियों एवं द्वीपों पर बसाया जाता था | भारत
में अधिकांश दुर्ग (किले) उच्च स्थानों एवं पहाड़ियों पर ही स्थित हैं | नाईजीरिया
में खड़े इन्सेलबर्ग वहाँ के गाँवों के लिए
सुरक्षा की दृष्टि से अच्छी सुरक्षित स्थिति प्रदान करते है |
सरकारी
हस्तक्षेप के द्वारा बसाई गई नियोजित बस्तियां
कई
बार सरकार द्वारा नियोजित ढंग से किया जाता है | इन बस्तियों कों नियोजित बस्तियाँ कहते है |
ग्रामवासियों के द्वारा इस तरह की बस्तियों का निर्माण नहीं किया जाता | सरकार
द्वारा का भूमि अधिग्रहण किया जाता है और बस्ती स्थापित की जाती है और निवासियों
कों सभी प्रकार की सुविधाएँ जैसे आवास, जल तथा अन्य अवसंरचना आदि उपलब्ध कराकर
बस्तियों कों विकसित किया जाता है |
उदाहरण के लिए इथोपिया में सरकार द्वारा ग्रामीणीकरण योजना के द्वारा
नियोजित बस्तियों का निर्माण किया गया | भारत में भी इंदरा गाँधी नहर के क्षेत्र
में नहरी बस्तियों का विकास किया गया |
ग्रामीण बस्तियों का वर्गीकरण
ग्रामीण
बस्तियों का वर्गीकरण कई मापदंडो के आधार पर किया जा सकता है |
1) आकार
के आधार पर बस्तियों के प्रकार
आकार
(बसाव की सघनता ) के आधार पर बस्तियाँ दो
प्रकार की होती है | सहंत बस्तियाँ और प्रकीर्ण बस्तियाँ | इनका संक्षिप्त वर्णन
निम्न प्रकार से है |
a) सहंत
(सघन) बस्तियाँ
वे बस्तियाँ जिनके मकान एक
दूसरे से सटे हुए होते हैं उन्हें सहंत या सघन बस्तियाँ कहते है | इस तरह की
बस्तियों कों विकास नदी घाटियों के सहारे तथा उपजाऊ मैदानों में होता है | इन
बस्तियों में रहने वाले समुदाय के लोग मिलजुल कर रहते हैं | इन लोगों के व्यवसाय
भी एक जैसे होते हैं | इन बस्तियों में गलियाँ संकरी (कम चौड़ी) होती है | पानी की
निकासी सही नहीं होने के कारण इन बस्तियों की नालियाँ गंदी होती है |
चित्र:- सघन बस्तियाँ
b) प्रकीर्ण
(बिखरी हुई ) बस्तियाँ
वे बस्तियाँ जिनमें मकान एक दूसरे
से दूर-दूर होते हैं उन्हें प्रकीर्ण या बिखरी हुई बस्तियाँ कहते है | इन बस्तियों
के घर प्राय; खेतों के द्वारा एक दूसरे से अलग होते है | इस तरह की बस्तियों का
विकास पर्वतीय क्षेत्रों, ऊँची भूमि के क्षेत्रों और मरुस्थलीय क्षेत्रों में होता
है | इन बस्तियों कों एक सांस्कृतिक आकृति जैसे कोई धार्मिक स्थल अथवा बाजार एक
सूत्र में बाँधता है | ये बस्तियाँ साफ़ सुथरी होती है | इन बस्तियों के लोग एकाकी
जीवन बिताते हैं | इन बस्तियों के लोगों के व्यवसाय भी अलग-अलग होते है |
चित्र :- प्रकीर्ण (बिखरी हुई ) बस्तियाँ
2) विन्यास
के आधार पर बस्तियों के प्रकार
विन्यास के आधार पर बस्तियाँ निम्नलिखित
प्रकार की होती है |
मैदानी ग्राम, तटीय ग्राम, वन ग्राम, पर्वतीय
ग्राम एवं मरुस्थलीय ग्राम आदि |
3) कार्य
के आधार पर बस्तियों के प्रकार
लोगों के कार्य के आधार पर ग्रामीण बस्तियों
निम्नलिखित प्रकार हो सकते हैं |
कृषि ग्राम, मछुआरों के ग्राम, लकडहारों के
ग्राम तथा पशुपालक ग्राम आदि |
4) बस्तियों
की ज्यामितिक आकृति के आधार पर बस्तियों के प्रकार
ज्यामितिक आकृति के आधार पर बस्तियाँ कई
प्रकार की होती है | जैसे रैखिक , चौक पट्टी प्रतिरूप, तारक प्रतिरूप, टी आकार
प्रतिरूप, गोलाकार प्रतिरूप, वाई आकार प्रतिरूप तथा युग्म आकृति प्रतिरूप आदि |
इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |
क).
लम्बवत (रैखिक) प्रतिरूप
इस प्रकार की ग्रामीण
बस्तियों में मकान सड़कों, रेल लाइनों, नदियों, नहरों , घाटी के किनारे अथवा
तटबंधों पर स्थित होते है | जो एक रेखा
के रूप में दिखाई देते है | ऐसे गाँवों
में मुख्य गलियाँ सड़क, रेल लाइन, नदी, नहर आदि के समानान्तर होती है |
चित्र :- रैखिक प्रतिरूप
इस प्रकार के प्रतिरूप कों आयताकार प्रतिरूप
भी कहते है | इस प्रकार के गांव उस स्थानों पर बसते हैं | जहाँ सड़कें आयताकार होती
है | ये सड़कें चारों ओर से आकार एक दूसरे कों समकोण पर काटती है | इन गाँवों में
सड़कों के साथ-साथ चारों दिशाओं में घर बन जाते हैं | ग्रामीण बस्तियों का यह
प्रतिरूप समतल क्षेत्रों अथवा चौड़ी अंतरा पर्वतीय घाटियों में पाया जाता है |
चित्र :- क्रास या चौक पट्टी प्रतिरूप
कई बार एक गांव के मध्य से कई सड़कें विभिन्न
दिशाओं से आकर एक स्थान पर मिलती है | उन सड़कों के सहारे मकान बन जाते है | इस
प्रकार एक गांव तारे के आकार की बस्ती में विकसित
हो जाता है | इस प्रकार की बस्ती कों तारक प्रतिरूप वाली बस्ती कहते है |
चित्र :- तारक प्रतिरूप
घ). टी (T) आकार प्रतिरूप
टी के आकार की बस्तियाँ सड़क से तिराहे पर
विकसित होती है | जब मुख्य सड़क से एक कम महत्वपूर्ण सड़क समकोण पर मिलती है तो उन सड़कों के द्वारा टी (T) की आकृति
बनायी जाती है |इन सड़कों के साथ-साथ मकान बन जाने से बस्ती का प्रतिरूप भी टी (T) के आकार का हो
जाता है |
चित्र :- टी (T) आकार प्रतिरूप
वाई (Y) के आकार की
बस्तियाँ सड़क से तिराहे पर विकसित होती है | जब दो अलग-अलग सड़के तीसरी सड़क इस तरह
मिलती है कि उनके द्वारा वाई (Y) की आकृति बनायी जाती है | इन सड़कों के साथ-साथ मकान बन जाने से बस्ती का प्रतिरूप भी वाई (Y) के आकार का हो
जाता है |
चित्र:- वाई (Y) आकार प्रतिरूप
इस प्रकार के गांव झीलों व तालाबों किसी
धार्मिक स्थल आदि के चारों ओर बस्ती के बस जाने से विकसित होते है | कभी-कभी
गाँवों कों इस योजना से बसाया जाता है कि उसका मध्य भाग खुला रहे जिसमें पशुओं कों
रखा जा सके ताकि पशुओं कों जंगली जानवरों से बचाया जा सके |
चित्र:- गोलाकार प्रतिरूप
जब कोई सड़क नदी या नहर कों पुल के द्वारा पार
करती है तो सड़क तथा नदी के दोनों ओर बस्तियों का निर्माण हो जाता है तो इस प्रकार की बस्ती कों युग्म आकृति वाली बस्ती
या दोहरे ग्राम कहते है |
चित्र:-
युग्म आकृति प्रतिरूप या दोहरे ग्राम
ग्रामीण
बस्तियों के निवासियों कों कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है |
विकासशील देशों में ग्रामीण बस्तियों की संख्या अधिक है | इसके अलावा इन देशों में
ग्रामीण बस्तियों का आधारभूत विकास भी नहीं हुआ है | इसलिए इन देशों की ग्रामीण
बस्तियों में समस्याएँ अधिक गम्भीर है |
ये समस्याएँ चुनौती और सुअवसर दोनों ही प्रदान करती है | ग्रामीण बस्तियों
की मुख्य समस्याएँ जल, सामान्य जनसुविधाएँ, संतोषजनक आवासीय घरों की कमी तथा सडकों के अभाव के कारण उत्पन्न होती
है | कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित है |
क).
जल आपूर्ति की समस्या
ग्रामीण इलाकों में सवच्छ जल की आपूर्ति की
व्यवस्था संतोषजनक नहीं है | पर्वतीय एवं शुष्क क्षेत्रों में ग्रामवासियों कों
पेय जल लाने के लिए लंबी दूरियाँ तय करनी पडती है | जल में कई प्रकार की
अशुद्धियाँ होती है | जिसके कारण हैजा, पीलिया तथा पाचन संबंधी कई जल के होने वाली
बीमारियाँ फ़ैल जाती है | दक्षिणी एशिया
में प्राय: बाढ़ तथा सूखे का प्रकोप बना रहता है | जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल
प्रभाव पड़ता है |
ख).
समान्य जनसुविधाओं की कमी
विकासशील देशों की ग्रामीण बस्तियों में शौचघर
एवं कूड़ा-कर्कट के निस्तारण की सुविधाएँ नगण्य होती है | जिसमें स्वास्थ्य संबंधी
समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है | ग्रामीण इलाकों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी
सेवाएँ भी पर्याप्त नहीं होती है | इन सेवाओं कों प्राप्त करने के लिए ग्रामीण
लोगों कों नगरों की ओर जाना पड़ता है |
ग).
असंतोष जनक आवासीय व्यवस्था
मकानों की रूप रेखा तथा उनके निर्माण में
प्रयुक्त होने वाली गृह निर्माण सामग्री हर पारिस्थितिक क्षेत्र में अलग – अलग
होती है | आधिकांश गाँवों में मकानों का निर्माण स्थानीय रूप से प्राप्त होने वाली
सामग्री से किया जाता है | ये मकान मिट्टी, गारा, लकड़ी तथा सरकंडे(छप्पर) आदि के
बनाए जाते है | इस तरह के मकानों कों भारी वर्षा तथा बाढ़ के समय काफी नुकसान
पहुँचता है | हर वर्ष उनके रख-रखाव की उचित व्यवस्था करनी पडती है | अधिकाँश मकानों
की रूपरेखा भी इस तरह की होती हैं कि उनमें उपयुक्त संवातन नहीं होता अर्थात ये कम
हवादार होते है |
इसके अलावा गाँवों में एक ही
मकान में पशु भी रहते है | इसी मकान में पशु शेड तथा उनके चारे कों रखने की जगह भी
होती है | इस तरह की व्यवस्था जंगली जानवरों से पालतू पशुओं और उनके चारे कों
सुरक्षित के लिए की जाती है | अत : स्पष्ट है कि विकास शील देशों में उचित आवासीय
व्यवस्था की कमी जैसी समस्या देखने कों मिलती है |
घ).
परिवहन तथा संचार की समस्या
कच्ची
सड़कें तथा आधुनिक संचार के साधनों की कमी ग्रामीण बस्तियों की प्रमुख समस्या है |
अधिकांश गाँवों में सडकें तंग तथा कच्ची होती है | वर्षा ऋतु में ये परिवहन के
लायक नहीं रहती | जिस कारण से इन बस्तियों का संपर्क आसपास के क्षेत्रों से टूट
जाता है | इसके कारण आपातकालीन सेवाएँ प्राप्त करने में भी बहुत आधिक कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है | इसके आधुनिक संचार व्यवस्था इन क्षेत्रों में लगभग नगण्य
रहती है | इनकी कमी से स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबंधी सुविधाएँ प्राप्त करना भी कठिन
हो जाता है |
विश्व में नगरीय बस्तियों का विकास
नगरीय
बस्तियाँ प्राचीन काल से ही विकसित होती रही है | लेकिन तीव्र नगरीय विकास एक नई
परिघटना है |कुछ समय पूर्व तक बहुत ही कम
बस्तियाँ कुछ हजार से अधिक जनसंख्या वाली होती थी | औद्योगिक क्रान्ति के बाद इसमें तेजी से बढोतरी
हुई है | विश्व में नगरीय बस्तियों के विकास कों हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं
|
1810
में लन्दन ऐसी पहली नगरीय बस्ती थी जिसकी जनसंख्या दस लाख हुई थी | 1982 में
विश्व के लगभग 175 नगर 10 लाख से अधिक
जनसंख्या वाले हो गए थे |
कुल जनसंख्या में नगरीय जनसंख्या के प्रतिशत
के हिसाब से वृद्धि कों देखने से पता चलता है कि नगरीय जनसंख्या जो सन् 1800 में 3 प्रतिशत थी यह बढ़कर 1850 में 6 प्रतिशत, 1900 में 14
प्रतिशत, 1950 में 30 प्रतिशत,
1982 में 37 प्रतिशत तथा 2001 में 48 प्रतिशत तथा
2011 में 52 प्रतिशत जनसंख्या
नगरीय हो गई है |
नगरीय बस्तियों के वर्गीकरण के आधार
नगरीय
बस्तियों का वर्गीकरण जनसंख्या के आकार, व्यवसायिक संरचना, प्रशासनिक निर्णय,
स्थिति (अवस्थिति), नगरों की आकृति तथा नगरों के मुख्य कार्यों के आधारों पर किया
जा सकता है |
जनसंख्या के आकार के आधार पर नगरों का वर्गीकरण
नगरीय
क्षेत्रों कों परिभाषित करने के लिए अधिकतर देशों नें जनसंख्या कों मुख्य मापदंड माना
है | परन्तु नगर कों परिभाषित करने के लिए
जनसंख्या का मापदंड सभी देशों में अलग-अलग है | जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है |
a) डेनमार्क,
स्वीडन तथा फिनलैंड में 250 व्यक्तियों की जनसंख्या
वाले सभी क्षेत्र नगरीय क्षेत्र कहलाते है |
b) आइसलैंड
में नगर होने के लिए न्यूनतम जनसंख्या 300 व्यक्ति
होनी चाहिए |
c) कनाडा
और वेनेजुएला में 1000 व्यक्तियों की जनसंख्या
वाले क्षेत्र नगर माने गए है |
d) कोलम्बिया
में नगरीय बस्ती होने के लिए 1500 व्यक्ति होने जरूरी
है |
e) अर्जेंटाइना
तथा पुर्तगाल में 2000 व थाईलैंड में 2500 व्यक्तियों का आवासीय क्षेत्र नगरीय बस्ती कहलाती है |
f) जापान
में 30000 लोगों की बस्ती कों ही नगरीय
बस्ती माना जाता है |
g) भारत
में
5000 लोगों के साथ साथ जनसंख्या का घनत्व न्यूनतम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना जरूरी है | साथ ही जनसंख्या का 75 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न होना चाहिए |
व्यवसायिक संरचना के आधार पर नगरों का वर्गीकरण
जनसंख्या के आकार के अतिरिक्त कुछ देशों में बस्तियों
कों नगरीय बस्ती मानने के लिए प्रमुख आर्थिक गतिविधियों कों भी एक महत्वपूर्ण
मापदंड माना जाता है | जैसे भारत में यदि किसी क्षेत्र की जनसंख्या का 75 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में लगा होता है तो उसे नगरीय बस्ती माना
जा सकता है | इसी प्रकार इटली में उस बस्ती कों नगरीय बस्ती कहा जा सकता है जिसकी
आर्थिक रूप से उत्पादक जनसंख्या का 50 प्रतिशत भाग गैर कृषि
कार्यों में संलग्न हो |
प्रशासनिक निर्णय के आधार पर नगरों का वर्गीकरण
कुछ देशों में किसी बस्ती कों नगरीय बस्ती में
वर्गीकृत करने के लिए प्रशासनिक ढाँचे कों भी आधार बनाया जाता है | उदाहरण के लिए
भारत में किसी भी आकार की बस्ती कों नगर के रूप में वर्गीकृत किया जाता है | यदि
वहाँ नगरपालिका, छावनी बोर्ड (कैन्टोंमेंट बोर्ड ) हो या प्रशासन के द्वारा
अधिसूचित नगरीय क्षेत्र समिति है | इसी प्रकार लैटिन अमेरिका महाद्वीप के देश
ब्राजील तथा बोलीविया में जनसंख्या आकार का ध्यान नहीं रखते हुए किसी भी प्रशासकीय
केन्द्र कों नगरीय बस्ती मान लिया जाता है |
स्थिति (अवस्थिति ) के आधार पर नगरों का वर्गीकरण
नगरीय केन्द्रों की स्थिति उनके द्वारा किए जा
रहे कार्यों कों ध्यान में रखकर देखी जाती है | क्योंकि अलग-अलग प्रकार के कार्यों
के लिए नगरों की स्थिति भी अलग-अलग ही होती है | जैसे औद्योगिक नगर, सेना नगर,
पत्तन नगर तथा मनोरंजन नगर (अवकास सैर गाह ) आदि नगरों के लिए उनकी स्थिति भी भिन्न भिन्न
होती है | जो निम्नप्रकार से स्पष्ट है |
a) सामरिक
नगरों की स्थिति ऐसी जगह होती है जहाँ उसे प्राकृतिक सुरक्षा मिल सके |
b) खनन
नगरों की स्थिति उन स्थानों पर होती है जहाँ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण खनिजों
के भंडार मिलते है |
c) औद्योगिक
नगरों के लिए वे स्थान अधिक उपयुक्त होते है जहाँ कच्चा माल आसानी से पहुँच सके,
शक्ति के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो, परिवहन की सुविधा पर्याप्त हो तथा तैयार माल के
लिए बाजार आसानी से उपलब्ध हो सके |
d) पत्तन
नगरों के लिए पोताश्रय का होना आवश्यक होता है |
e) पर्यटन
नगर के लिए आकर्षक दृश्य, या सामुद्रिक तट, औषधीय जल वाला झरना या कोई ऐतिहासिक
अवशेष आदि की स्थिति होनी चाहिए |
आकृति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण
वास्तव में किसी भी नगर की आकृति, वास्तुकला एवं भवनों की शैली वहाँ के ऐतिहासिक
एवं सांस्कृतिक परम्पराओं की देन होती है | आकृति के आधार पर एक नगरीय बस्ती रेखीय
प्रतिरूप , वर्गाकार प्रतिरूप, तारे के आकार तथा अर्ध चंद्राकार (चापाकार) हो सकती है |
नगरों का प्रकार्यात्मक वर्गीकरण (कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण )
नगरों में विभिन्न प्रकार के कार्य चलते रहते
है | ये कार्य इतने विविध प्रकार के है कि किसी एक नगर कों किसी विशेष प्रकार के
कार्य से जोड़ना कठिन हो जाता है | अत: नगर
एक प्रकार्यात्मक ना होकर बहु प्रकार्यात्मक होते है | लेकिन नगरों में कुछ कार्य
अधिक महत्व रखते है | जैसे कुछ नगरों
सामाजिक आर्थिक महत्व के कार्य होते है | कुछ सैनिक महत्व के लिए बसाये जाते है |
कुछ नगर औद्योगिक कार्य करते है | कुछ नगरों में प्रशासनिक कार्य अधिक किए जाते है |
अत: उनके महत्वपूर्ण कार्यों के आधार पर नगरों कों निम्नलिखित प्रकारों बाँटा जा सकता है |
1.
प्रशासनिक नगर
वे नगर जिनका संबंध जन साधारण के प्रशासन
संबंधी कार्यों से होता है उन्हें प्रशासनिक नगर कहते है | इस प्रकार के नगर,
देशों तथा राज्यों की राजधानियों , जिला एवं अन्य प्रशासनिक इकाइयों के मुख्यालय
होते है | इन नगरों में सरकारी विभागों के मुख्यालय तथा विभिन्न विभागों के सरकारी
कार्यालय होते है |
देश की राजधानी के रूप में प्रशासनिक नगरों के
उदाहरण इंग्लैंड में लन्दन, भारत में नई दिल्ली, फ्रांस में पेरिस, कनाडा में
ओटावा, ऑस्ट्रेलिया में कैनबरा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में वाशिंग्टन डी. सी.
आदि है | जबकि राज्यों के प्रशासनिक नगरों में हरियाणा का चंडीगढ, राजस्थान का
जयपुर, मध्य प्रदेश का भोपाल, उत्तर प्रदेश का लखनऊ, गुजरात का गांधीनगर आदि है
|
2. प्रतिरक्षा
नगर
इन
नगरों कों गैरीसन या छावनी नगर या कैंटोनमेंट या कैंट आदि नामों से जाना जाता है
| ये नगर सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते
है | इन नगरों में सेना, नौ सेना तथा वायु सेना के रहने की व्यवस्था के
साथ-साथ, उनके अभ्यास तथा प्रशिक्षण की
व्यवस्था भी होती है | अम्बाला, पुणे,
मेरठ , जोधपुर, जालंधर, देहरादून आदि प्रतिरक्षा नगरों के उदाहरण है |
3. सांस्कृतिक
नगर
वे
नगर जिनमें शिक्षा, कला धार्मिक (सांस्कृतिक) महत्व के कार्य मुख्य रूप से किए
जाते है | उन्हें सांस्कृतिक नगर कहते है | ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है
| शैक्षिक नगर (शिक्षा नगर) शिक्षा नगर तथा धार्मिक नगर | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a) शैक्षिक
नगर (शिक्षा नगर)
कई नगरों का विकास उनमें
शिक्षा संबंधी सुविधाओं की उपस्थिति के कारण होता है | विश्वविद्यालय
(यूनिवर्सिटी), महाविद्यालय (कॉलेज), विद्यालय, छात्रावास आदि की सुविधाएँ इन
नगरों में प्रचुरता मिलती है | ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, रुड़की, आगरा अलीगढ, बनारस ,
खड़गपुर, पिलानी, कोटा तथा शांति निकेतन आदि शैक्षिक नगरोंके प्रमुख उदाहरण है |
b) धार्मिक
नगर
कई नगर विभिन्न धर्मों या
सांस्कृतियों के लोगों के तीर्थ स्थानों के रूप में विकसित हो जाते है | इन नगरों
का धार्मिक महत्व होता है | रोम में वेटिकन सिटी पोप के कारण, तिब्बत में ल्हासा
दलाई लामा के कारण, मक्का पैगाम्बर मोहम्मद के कारण, जेरूसलम ईसा मसीह के कारण,
अमृतसर सिखों के गुरु स्थान के कारण, वाराणसी, हरिद्वार, मथुरा, द्वारका, पुष्कर
तथा उज्जैन आदि हिंदू धर्म के पूज्य स्थलों के रूप में धार्मिक महत्व के नगर है |
4.
खनन नगर
जिन स्थानों पर खनिज पाए
जाते है | उन क्षेत्रों के आस पास नगरों का
विकास हो जाता है | जिन्हें खनन नगर या खनन केन्द्र कहते हैं | जैसे दक्षिण
अफ्रीका में जोहान्सबर्ग, ऑस्ट्रेलिया में कूलगार्डी, भारत में डिगबोई, झरिया,
रानीगंज, कोलार तथा खेतडी आदि खनन नगर है |
5. औद्योगिक
नगर
निर्माण उद्योगों के विकास
के साथ-साथ नए नगरों का भी उद्भव होता है | जिन्हें औद्योगिक नगर कहते है | इन
नगरों का विकास औद्योगिक उन्नति पर ही निर्भर होता है | इंग्लैंड में
मानचेस्टर,जापान में टोकियो, जर्मनी में पिट्सबर्ग, भारत में जमशेदपुर, कानपुर,
अहमदाबाद, सूरत, राउरकेला, भिलाई, फरीदाबाद, बडौदा आदि प्रमुख औद्योगिक नगरों के
उदाहरण है |
6. बाजार
नगर
इन नगरों कों मंडियां भी
कहते हैं | इन नगरों में व्यापारी तथा व्यापारी संगठनों से संबंधित कार्यालय जैसे
बैंक,स्टॉक एक्सचेंज, बीमा कम्पनियों के कार्यालय तथा अन्य वितीय संगठन होते है |
भारत में हापुड, मुज्जफरनगर तथा मेरठ आदि बाजार नगरों के उदाहरण है |
7. पतन
नगर
समुद्र तटीय भागों में
पत्तनों के पास बड़े-बड़े नगर विकसित हो जाते है | ये नगर व्यापारिक केन्द्र तथा
वितरण केन्द्र के रूप में यहाँ विकसित हो जाते है | इन नगरों कों ही पत्तन नगर
कहते है | इन नगरों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के द्वारा किए जाने वाले आयात-निर्यात
संबंधी कार्य अधिक होते है | विभिन्न देशों में टोकियो, सिंगापुर, हांगकांग, लन्दन
न्यूयार्क लिवरपूल आदि तथा भारत में मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, सूरत, कांडला,
विशाखापट्टनम तथा तिरुवनंतपुरम प्रमुख पत्तन नगर है |
8. विनोद
प्रिय नगर
वे नगर जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर,
आकर्षक, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु वाले तथा
मनोरंजक होते है, विनोदप्रिय नगर कहलाते
है | इस तरह के नगर पर्यटकों कों अपनी ओर
आकर्षित करते है | श्रीनगर, शिमला, दार्जिलिंग, मसूरी, जयपुर आदि विनोदप्रिय नगर
के उदाहरण हैं |
नगरीय बस्तियों का वर्गीकरण उनके आकार (जनसंख्या के आकार के कारण)
नगरीय बस्तियों का वर्गीकरण उनकी जनसंख्या के
आकार, उनमें उपलब्ध सेवाओं तथा उनके द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों के आधार
पर किया जाता है | ये बस्तियाँ निम्नलिखित प्रकार की होती है |
1. नगर (Town)
नगर एक सहंत बस्ती होती है , जिसका आकार गांव
से बड़ा होता है | इन बस्तियों के निवासी नगरीय व्यतीत करते है | सामान्यतः नगर में
एक नगरपालिका होती है | नगरीय बस्तियों में कुछ विशेष कार्य जैसे निर्माण, खुदरा
एवं थोक व्यापार तथा व्यवसायिक सेवाएँ विद्यमान होती है |
2. शहर
(City)
यह अग्रणी नगर होता है, जो अपने स्थानीय व
क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी नगरों कों पीछे छोड़ देता है | लेविस ममफोर्ड के अनुसार, ‘वास्तव
में शहर उच्च एवं अधिक जटिल प्रकार के सहचरी जीवन का भौतिक रूप है |’
शहरों
का आकार, नगरों के आकार से बड़ा होता है और इसकी आर्थिक क्रियाएँ भी अधिक होती हैं
| यहाँ पर प्रमुख वित्तीय संस्थान, प्रादेशिक प्रशासकीय कार्यालय एवं यातायात के
केन्द्र होते है | जब शहर की जनसंख्या दस लाख से अधिक हो जाती है तो ये मिलियन शहर
(Million
City) कहते हैं |
3. सन्नगर (Conurbation)
सन्नगर शब्दाबली का प्रयोग सबसे
पहले पैट्रिक गिडीज (Patrick Geddes) ने 1915
में किया था | सन्नगर एक विशाल विकसित नगरीय क्षेत्र होता है | जो
अलग –अलग नगरों या शहरों के आपस में मिल जाने से एक विशाल नगरीय विकास क्षेत्र में
परिवर्तित हो जाता है | ग्रेटर लन्दन, मानचेस्टर, शिकागो एवं टोकियो इसके उदाहरण
है | भारत में कोलकाता सन्नगर बजबज से बाँसबेरिया तक फैला है | इसी तरह दिल्ली
सन्नगर पानीपत से मेरठ तक फैला हुआ है |
4. विश्वनगरी या मेगासिटी
(Mega City) या मेगालोपोलिस (Megalopolis)
मेगालोपोलिस एक यूनानी शब्द
है जिसका अर्थ है विशाल नगर होता है | इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले जीन
गो़टमेन (Jean Goutman) ने 1957 किया था | यह बड़ा महानगर प्रदेश होता है |
जिसमें कई सन्नगर शामिल होते हैं | इन नगरों कों मेगासिटी भी कहते है |
मेगासिटी शब्दावली का प्रयोग
उन नगरों के लिए किया जाता है, जिनकी जनसंख्या मुख्य नगर तथा उपनगरों कों मिलाकर
एक करोड़ (100 लाख) से अधिक होती है | विश्वनगरी का सबसे अच्छा उदाहरण संयुक्त राज्य
अमेरिका में है जहाँ उत्तर में बोस्टन से दक्षिण में वाशिंगटन तक नगरीय भू दृश्य के
रूप में दिखाई देता है |
5. मिलियन
सिटी (Million City)
जब किसी नगर की जनसंख्या दस लाख अथवा इससे
अधिक हो जाती है तो इन्हें दसलाखी नगर या मिलियन सिटी कहते है | पिछले कुछ दशकों
में विश्व में मिलियन सिटी की संख्या तेजी से बढ़ रही है | सबसे पहले सन् 1800 में
लन्दन मिलियन सिटी की श्रेणी में आया था | सन् 1850 में
पेरिस, 1860 ई० में न्यूयार्क मिलियन सिटी में शामिल हुए थे
| सन् 1950 तक विश्व
में कुल 80 मिलियन शहर थे | 1975 में
इस श्रेणी के नगर 160 हो गए | 2005 में इनकी संख्या 438 हो गयी थी | अर्थात इन पचास वर्षों
की अवधि में इनकी संख्या में लगभग पाँच गुना से अधिक वृद्धि हुई |
विश्व में मिलियन सिटी का वितरण
विश्व में सबसे पहले
सन् 1800 में लन्दन मिलियन सिटी की श्रेणी में
आया था | सन् 1850 में पेरिस, 1860 ई०
में न्यूयार्क मिलियन सिटी में शामिल हुए थे | सन् 1950 तक विश्व में कुल
80 मिलियन शहर थे | 1975 में इस श्रेणी
के नगर 160 हो गए | 2005 में इनकी
संख्या 438 हो गयी थी | अर्थात इन पचास वर्षों की अवधि में इनकी संख्या में लगभग पाँच गुना से
अधिक वृद्धि हुई |
विश्व
के विभिन्न महाद्वीपों में मिलियन सिटी का वितरण निम्न प्रकार से है |
1) यूरोप
महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों में 23 मिलियन सिटी थे | 1970 के दशक में इनकी संख्या 30 तथा 2000 के दशक के मध्य में 58 मिलियन सिटी यूरोप महाद्वीप में थे |
2) एशिया
महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों में 32 मिलियन सिटी थे | 1970 के दशक में इनकी संख्या 69 तथा 2000 के दशक के मध्य में 206 हो गई |
3) उत्तरी
एवं मध्य अमेरिका महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों
में 16 मिलियन सिटी थे जो 1970 के दशक में 36 तथा 2000
के दशक के मध्य में 79 हो गई |
4) दक्षिणी
अमेरिका महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों में 8 मिलियन सिटी थे | 1970 के दशक में इनकी संख्या 17 है जो 2000 के दशक के मध्य में 43 मिलियन सिटी हो गए |
5) अफ्रीका
महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों में 3 मिलियन सिटी थे | 1970 के दशक में इनकी संख्या 8 तथा 2000 के दशक के मध्य में 46 मिलियन सिटी थे |
6) ऑस्ट्रेलिया
महाद्वीप में 1950 के आरम्भिक वर्षों में 2 मिलियन सिटी थे | 1970 के दशक में इनकी संख्या 2 तथा 2000 के दशक के मध्य में 6 मिलियन सिटी इस महाद्वीप में थे |
विश्व में मेगासिटी का वितरण
मेगालोपोलिस एक यूनानी शब्द है जिसका अर्थ है
विशाल नगर होता है | जिसमें कई सन्नगर शामिल होते हैं | इन नगरों कों मेगासिटी भी
कहते है | मेगासिटी शब्दावली का प्रयोग उन नगरों के लिए किया जाता है, जिनकी
जनसंख्या मुख्य नगर तथा उपनगरों कों मिलाकर एक करोड़ (100
लाख) से अधिक होती है |
न्यूयार्क विश्व का पहला मेगासिटी था | जो 1950 में
मेगासिटी बना था | जब उसकी जनसंख्या 1.25 करोड़ थी | पिछले
पचास वर्षों में इनकी संख्या विकसित देशों की अपेक्षा विकासशील देशों में अधिक बढ़ी
है | सन् 2006 के आँकड़ों के अनुसार विश्व के 25 नगर मेगासिटी
( मेगोलोपोलिस ) थे | जो 2012 में 27
मेगासिटी थी | वर्तमान में सबसे बड़ा मेगा शहर जापान का टोकियो है | मैक्सिको सिटी,
न्यूयार्क, सिओल, साओ पालो, शंघाई, ओसाका,
जकार्ता, मास्को मनीला, कराँची तथा बीजिंग
आदि मेगा सिटी है | भारत के मुंबई,
दिल्ली, कोलकाता, प्रमुख मेगा शहर है |
विकसित और विकासशील देशों की नगरीय बस्तियों में अन्तर
विकसित और विकासशील देशों के कस्बे एवं नगर
उनके विकास एवं नगर नियोजन में कई तरह की
विभिन्नताएं रखते है | विकसित देशों में अधिकतर नगर योजनाबद्ध तरीके से बसाए जाते
है | जबकि विकासशील देशों में अधिकतर नगरों की उत्पति ऐतिहासिक है | विकसित देशों में नगरों की आकृति नियमित होती
है | जबकि विकासशील देशों में नगरों की
आकृति अनियमित है | उदाहरण के तौर पर चंडीगढ़ एवं केनबरा नियोजित नगर है | जो
योजनाबद्ध तरीके से बसाये गए है | जबकि भारत के अधिकाँश छोटे कस्बे ऐतिहासिक रूप
से बसे थे जो परकोटे से बाहर की ओर गैर योजनाबद्ध तरीके से फ़ैल गए और बड़े नगर के
रूप में विकसित हुए है | इनकी आकृति भी नियमित है |
विकासशील देशों में नगरीय बस्तियों की समस्याएँ
नगरीकरण
से तात्पर्य एक देश की नगरीय क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या में अनुपातिक
वृद्धि से है | दूसरे शब्दों में नगरी करण का अर्थ है जनसंख्या का नगरीय होना है | इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप नगरों के
सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन होते हैं | जिस कारण
नगरों में, विशेष रूप से विकासशील देशों
में कई बड़ी समस्याएँ दिखने कों मिलती है | जिनमें से कुछ कस्बों तथा नगरों की
अनियमित वृद्धि, अवहनीय जनसंख्या का केन्द्रीकरण, छोटे व तंग आवास तथा गलियाँ तथा पीने
योग्य जल की कमी आदि हैं | इन समस्याओं
कों निम्नलिखित विवरण से समझ सकते हैं |
आवास
संबंधी समस्याएँ
1. विकासशील
देशों में नगर अनियोजित तरीके से बसे हुए है | बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवास की
सुविधाएँ पर्याप्त नहीं हो पाती | परिणाम स्वरूप लोग बिना किसी योजना के नई
बस्तियों का निर्माण कर लेते है | जिससे नगर अनियमित रूप से वृद्धि करने लगता है |
2. रोजगार
के अवसरों की तलाश में और आधुनिक सुविधाओं के लिए लोग शहरों की ओर आते है | जिससे इन शहरों में अत्यंत भीड़ की स्थिति पैदा
होती जा रही है |
3. विकासशील
देशों के आधुनिक में जनसंख्या के अत्यधिक बढ़ने से आवासों की कमी होती जा रही है |
जिससे बहु मंजिला मकान और गंदी बस्तियों की संख्या में वृद्धि हो रही है | इसी
कारण अनेक नगरों में जनसंख्या का बढ़ता भाग निम्न स्तरीय आवासों जैसे गंदी बस्तियों
तथा अनधिकृत बस्तियों में रहने के लिए विवश है | उदाहरण के लिए भारत के अधिकांश
मिलियन सिटी में रहने वाले लोगों में से 25 प्रतिशत अवैध बस्तियों में रहते हैं | इस तरह के नगर अन्य नगरों की
अपेक्षा तेजी से बढ़ रहे है | एशिया पेसिफिक के देशों में नगरीय जनसंख्या का
प्रतिशत भाग अनाधिकृत बस्तियों में ही रहता है | जो एक बड़ी समस्या है |
आर्थिक
(रोजगार संबंधी) समस्याएँ
विकासशील देशों में ग्रामीण व छोटे नगरीय क्षेत्रों
से रोजगार के घटते अवसरों के कारण लोग इन क्षेत्रों में पलायन कर रहे है | यह
विशाल प्रवासी जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में अकुशल तथा अर्धकुशल श्रमिक की संख्या
में अत्यधिक वृद्धि कर देती है | जबकि इन क्षेत्रों में जनसंख्या पहले से ही बहुत
अधिक होती है | प्रवासी जनसंख्या के आने से नगरीय क्षेत्रों में रोजगार की
समस्याएँ बढ़ती जा रही है |
सामाजिक
समस्याएँ
विकासशील देशों में शहर विभिन्न प्रकार की
सामाजिक बुराइयों से ग्रस्त हैं | जो
निम्नलिखित है |
1. वित्तीय
संसाधनों की कमी के कारण अधिकतर निवासियों की आधारभूत सामाजिक ढांचागत आवश्यकताएँ
भी पूरी नहीं हो पाती है |
2. उपलब्ध
स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी सुविधाएँ गरीब नगरवासियों की पहुँच से बाहर रहती हैं
| विकासशील देशों में स्वास्थ्य संबंधी सूचक निराशाजनक तथ्य प्रस्तुत करते है |
3. बेरोजगारी
तथा शिक्षा की कमी के कारण अपराध निरंतर बढ़ते जा रहे हैं |
4. ग्रामीण
क्षेत्रों से प्रवास करके नगरों में आयी जनसंख्या में पुरुषों की अधिकता के कारण
नगरों में जनसंख्या का लिंग अनुपात असंतुलित हो जाता है |
पर्यावरण
संबंधी समस्याएँ
विकासशील
देशों में रहने वाली विशाल नगरीय जनसंख्या जल तथा अन्य पदार्थों का केवल उपयोग ही नहीं करती
बल्कि जल एवं सभी प्रकार के व्यर्थ पदार्थों का निस्तारण भी करती है | जिससे अनेक
प्रकार की पर्यावरण संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है | जो निम्न लिखित हैं |
1. विकासशील
देशों के अनेक नगरों में पीने योग्य पानी की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति तथा घरेलू
और औद्योगिक उपयोग के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना अत्यंत कठिन है |
2. घरेलू
एवं औद्योगिक कार्यों के लिए परम्परागत ईंधन के व्यापक उपयोग के कारण वायु
प्रदूषित हो जाती है | जो सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है |
3. एक
अनुपयुक्त मल निस्तारण व्यवस्था अस्वास्थ्यकर दशाएँ पैदा करती हैं | साथ ही घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों
कों सामान्य मल निस्तारण व्यवस्था में डाल दिया जाता है | या उन्हें बिना किसी
शोधन के अनिश्चित स्थानों पर डाल दिया जाता है | जिससे भूमि तथा जल प्रदूषण की
समस्या तेजी से बढ़ रही है |
4. बढ़ती
हुई जनसंख्या कों आवास प्रदान करने के लिये विशाल कंक्रीट के ढाँचे बनाए जा रहे है
और वृक्ष आवरण कों कम किया जा रहा है | जो इन नगरों कों ऊष्मा द्वीप बनाने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है | इस कारण से भू मंडलीय तापन की प्रक्रिया में
वृद्धि हो रही है |
नगरीकरण का अर्थ
नगरीकरण
से तात्पर्य एक देश की नगरीय क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या में अनुपातिक
वृद्धि से है | दूसरे शब्दों में नगरी करण का अर्थ है जनसंख्या का नगरीय होना |
विश्व में नगरीकरण की प्रक्रिया
नगरीकरण
का प्रमुख कारण लोगों का ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों की ओर स्थानान्तरण करना है
| 1990 के दशक
के अंत में 2 से 3
करोड़ लोग प्रतिवर्ष गांव छोड़कर नगरों और शहरों की ओर रहने के लिए
चले जाते थे |
19 वीं शताब्दी में विकसित देशों में नगरीकरण तेजी से हुआ है |
20 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (1950 के बाद के वर्षों)
में विकासशील देशों में नगरीकरण तेजी से हुआ है |
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ शहर में होने वाली सुविधाएँ
विश्व
स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ शहर में
निम्नलिखित सुविधाएँ अवश्य होनी चाहिए |
1. स्वच्छ
एवं सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए |
2. नगर
के सभी निवासियों की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए |
3. स्थानीय
सरकार में समुदाय की भागीदारी होनी चाहिए |
4. स्वास्थ्य
सुविधाएँ सभी के लिए आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए |
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के द्वारा नगरीय रणनीति की योजना सुझाई
गयी प्राथमिकताएँ
संयुक्त
राष्ट्र विकास कार्यक्रम के द्वारा नगरीय रणनीति की योजना के तहत निम्नलिखित प्राथमिकताएँ
सुझाई गई हैं |
1. नगरीय
निर्धनों के लिए आश्रयस्थल में वृद्धि करना |
2. नागरिकों
के लिए आधारभूत नगरीय सुविधाओं जैसे शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, स्वच्छ जल की
आपूर्ति, सफाई का प्रबंध आदि कों उपलब्ध करवाना |
3. महिलाओं
की मूलभूत सेवाओं तथा राजकीय सुविधाओं तक पहुँच में सुधार करना |
4. उर्जा
उपयोग तथा वैकल्पिक परिवहन तंत्र कों उन्नत बनाना |
5. वायु
प्रदूषण कों कम करना |
अदीस अबाबा (नवीन
पुष्प)
अदीस
अबाबा इथोपिया की राजधानी है | जिसमें अदीस का अर्थ है नया (नवीन) और अबाबा का
अर्थ है पुष्प | अत: अदीस अबाबा का अर्थ है नवीन पुष्प है | इस नगर की स्थापना सन् 1878 में हुई थी | इस नगर की निम्नलिखित विशेषताएँ है |
1. यह
संपूर्ण नगर पर्वतीय घाटी स्थलाकृति पर स्थित है | इस नगर की सड़कों का प्रारूप नगर
स्थानीय धरातल से प्रभावित है | राजकीय मुख्यालय प्याज्जा, अरात एवं आमिस्ट किलो से चारों ओर सडकें जाती है |
2. मरकाटो
में एक विकसित बाजार है, जिसके बारे में माना जाता है कि उत्तर में काहिरा एवं
दक्षिण में जोहान्सबर्ग के बीच ये सबसे बड़ा बाजार है |
3. अदीस
अबाबा में एक बहु संकाय विश्वविद्यालय,
चिकित्सा महाविद्यालय एवं कई अच्छे स्कूल होने के कारण यह शिक्षा का भी महत्वपूर्ण
केन्द्र है |
4. जिबूती-अदीस
अबाबा रेलमार्ग का अंतिम स्टेशन है | बोले हवाई अड्डा सापेक्षत: इस नगर का एक नया हवाई अड्डा है |
5. इस
नगर का तेजी से विकास हुआ है | क्योंकि यह इथोपिया के मध्य में स्थित है एवं कई
प्रकार के कार्य यहाँ संपन्न किए जाते है |
केनबेरा
केनबेरा
ऑस्ट्रेलिया की राजधानी है | इस राजधानी नगर की योजना अमेरिकन वास्तुविद वाल्टर
बरली ग्रिफिन ने सन् 1912 में बनाई थी | इस नगर की
निम्नलिखित विशेषताएँ है |
1. भू
दृश्य की प्राकृतिक आकृतियों कों ध्यान में रखते हुए लगभग 25,000
लोगों के रहने के लिए इस नगर की कल्पना की गई थी |
2. इस
नगर के पाँच मुख्य केन्द्र थे | जिनमें प्रत्येक केन्द्र अलग-अलग कार्य के लिए थे
|
3. पिछले
कुछ दशकों में कई उपनगर इसके समीप बन गए हैं जिनके अपने केन्द्र है |
4. इस
नगर में बहुत खुले क्षेत्र हैं और कई उद्यान तथा पार्क है |
उप नगरीकरण
आमतौर
पर लोग रोजगार और जीवन की आधुनिक सुविधाओं की तलाश में नगरों की ओर प्रवास करते हैं
| लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लोगों में एक नई प्रवृति देखने कों मिल रही है |
जिसमें शहरों के मध्यवर्ती घने बसे क्षेत्रों में रहने वाले लोग वहाँ से हटकर शहर
से बाहर स्वच्छ एवं खुले क्षेत्रों में जा रहे है | ताकि अच्छी गुणवत्ता वाले जीवन
का आनंद ले सके | इस प्रकार बड़े नगरों के समीप उनके चारों ओर उपनगर विकसित हो गए है
| जहाँ से प्रतिदिन हजारों लोग अपने घरों से नगरों में स्थित अपने कार्यस्थलों पर
आते-जाते हैं | नगरों से बाहर रहने की इस प्रकिया कों ही उप नगरीकरण कहते है |
उप नगर
शहरों
के मध्यवर्ती घने बसे क्षेत्रों में रहने वाले लोग वहाँ से हटकर शहर से बाहर
स्वच्छ एवं खुले क्षेत्रों में जाकर रहने लगते है | ताकि अच्छी गुणवत्ता वाले जीवन
का आनंद ले सके | बड़े नगरों के समीप उनके चारों ओर एक बस्ती का विकास हो जाता है तो वह बस्ती उपनगर
कहलाता है |
भारत में नगरीय बस्ती की परिभाषा (1991 की भारतीय जनगणना के अनुसार नगरीय बस्ती की
परिभाषा )
1991
की भारतीय जनगणना में नगरीय बस्ती कों इस प्रकार परिभाषित किया है |
1) सभी
स्थान जहाँ नगरपालिका, नगर निगम, छावनी बोर्ड (कैंटोनमेंट बोर्ड) या अधिसूचित नगरीय क्षेत्र समिति (नोटिफाइड टाउन
एरिया कमेटी) हो |
2) नगर
बस्ती के लिए कम से कम 5000 व्यक्ति वहाँ निवास करतें
हो |
3) जनसंख्या
का घनत्व न्यूनतम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग
किलोमीटर होना जरूरी है |
4) उस
क्षेत्र में निवास करने वाली कुल जनसंख्या का 75 प्रतिशत
भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न होना चाहिए |
वे
स्थान जो उपरोक्त शर्तों कों पूरा करते हों उन्हें भारत में नगरीय बस्ती के कहा जा
सकता है |
नम बिंदु बस्तियाँ
साधारणतया ग्रामीण बस्तियाँ जल स्त्रोतों या जलराशियों जैसे नदियों, झीलों तथा झरनों आदि के समीप
स्थापित होती है | इन बस्तियों कों नम बिंदु बस्तियाँ कहते है | दलदली क्षेत्रों
तथा द्वीपों में स्थित इन बस्तियों में कई असुविधाएँ होती हैं | लेकिन लोग जल के
कारण यहाँ बस जाते है | इन बस्तियों के निम्नलिखित लाभ हैं |
नम बिंदु बस्तियों में पीने के लिए, खाना बनाने,
वस्त्र धोने आदि के लिए जल आसानी से उपलब्ध उपलब्ध हो जाता है |
सिंचाई,
मत्स्य पालन आदि के लिए भी नदियों तथा झीलों का उपयोग किया जाता है |
नाव
चलाने योग्य नदियाँ तथा झीलें यातायात के लिए भी प्रयोग की जा सकती है |
विकासशील देशों में ग्रामीण जनसंख्या के नगरों की ओर प्रवास के कारण तथा
तथा उनके प्रभाव
विकासशील
देशों में ग्रामीण जनसंख्या की वृद्धि ने रोजगार सृजन और आर्थिक अवसरों की समस्या
कों अधिक बढ़ा दिया है | जिसके कारण ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर प्रवास तेजी
से बढ़ा है | जिसने नगरीय क्षेत्रों में पहले से ही समस्याग्रस्त ढाँचागत सुविधाओं
और सेवाओं पर बहुत अधिक दबाव बढ़ा दिया है |
विकासशील देशों में ग्रामीण जनसंख्या के नगरों की ओर प्रवास कों रोकने
के उपाय (नगरों की समस्याओं कों कम करने के लिए आवश्यक कार्य)
नगरों
की समस्याओं कों कम करने के लिए हमे ग्रामीण जनसंख्या के नगरों की ओर प्रवास कों
रोकना आवश्यक है | जिसके निम्नलिखित कार्य
आवश्यक है |
1. ग्रामीण
निर्धनता कों दूर करना शीघ्र आवश्यक है |
2. ग्रामीण
बस्तियों में रहन- सहन के स्तर कों सुधारना जरूरी है |
3. ग्रामीण
क्षेत्रों में रोजगार एवं शिक्षा के अवसरों का सृजन करना भी आवश्यक है |