Friday, October 29, 2021

Population of India : Distribution

 

जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

कक्षा- 12 (भूगोल)

भारत की जनसंख्या

            भारत विश्व के अधिकतम जनसंख्या वाले देशों में से एक है | भारत विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 2.4 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है जबकि यहाँ पर विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है |

            सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ है | जनसंख्या के हिसाब से भारत चीन के बाद दूसरा स्थान है | भारत की कुल जनसंख्या उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक है |

 

भारत की विशाल जनसंख्या का प्रभाव

विशाल जनसंख्या के कारण बहुत अधिक समस्याएँ सामने आती है | जो निम्नलिखित हैं |

1)      प्राय: यह तर्क दिया जाता है कि इतनी बड़ी जनसंख्या निश्चित तौर पर देश के सीमित संसाधनों पर दबाव डालती है |

2)      देश में अनेक सामाजिक आर्थिक समस्याओं के लिए उत्तरदायी है |

3)      जनसंख्या के अधिक बोझ के कारण गरीबी एक विकराल रूप धारण कर रही है |

4)      विशाल जनसंख्या ने पर्यावरण संबंधी कई समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं |

 

भारत में जनसंख्या की गणना (जनगणना)  या जनसंख्या के आँकड़ों के स्त्रोत

भारत में जनसंख्या से संबंधित आँकडों कों प्रति दस वर्ष के बाद होने वाली जनगणना के द्वारा एकत्रित किए जाते है | भारत में पहली जनगणना 1872 ई० में हुई थी | लेकिन यह पूर्ण नहीं थी | भारत की पहली सम्पूर्ण जनगणना  1881 ई० में हुई थी |  हमारे देश की अंतिम जनगणना सन् 2011 में हुई थी | अब तक कुल 14 संपूर्ण जनगणना हो चुकीं है | अगली (पंद्रहवी) जनगणना सन् 2021 में होनी है |  

 

भारत में जनसंख्या वितरण

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल  जनसंख्या 121.02 करोड़ है | भारत की इतनी विशाल जनसंख्या समान रूप से देश में वितरित नहीं है बल्कि असमान रूप से देश के विभिन्न भागों में वितरित है |

देश के विशाल आकार वाले राज्यों की जनसंख्या कों देखते है तो पता चलता है कि उत्तरप्रदेश भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है  यहाँ  सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 19.95 करोड़ लोग रहते हैं | 11.23 करोड़ जनसंख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है | बिहार में 10.38 करोड़ जनसंख्या निवास करती है | इसके बाद पश्चिम बंगाल में 9.13 करोड़ तथा आंध्रप्रदेश की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 8.46 करोड़ थी | ये पाँच बड़े राज्यों में देश की लगभग 50 % (आधी) जनसंख्या पाई जाती है | देश के दस राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र , बिहार,बंगाल पश्चिम बंगाल आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान कर्नाटक तथा गुजरात भारत की लगभग 76 प्रतिशत जनसंख्या रहती है |  

            जबकि विशाल आकार होते हुए भी कुछ राज्य ऐसे है जिनमें बहुत ही कम जनसंख्या रहती है | जैसे सन् 2011 की जनगणना के अनुसार ही जम्मूकश्मीर में देश की केवल 1.04 %, अरुणाचलप्रदेश  में देश की  0.84% तथा उत्तराखंड में  केवल 0.83 % जनसंख्या ही निवास करती है | क्षेत्रफल की हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में कुल जनसंख्या का केवल 5.67% हिस्सा ही रहता है |

            सिक्किम सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य है जहाँ लगभग 6 लाख लोग ही रहते है | जो देश की जनसंख्या का केवल 0.05% जनसंख्या ही है | इसके अलावा अधिकाशं उत्तरी पूर्वी राज्यों जैसे नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश राज्यों में देश की बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है |

  

केन्द्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में सबसे अधिक जनसंख्या मिलती है | जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप समूह में बहुत ही कम संख्या में लोग रहते हैं |

 

 

जनसंख्या का विषम स्थानिक वितरण जनसंख्या और देश के भौतिक, समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध  

या

भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के कारण

भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है | जनसंख्या का यह विषम स्थानिक वितरण देश की जनसंख्या और देश के भौतिक (भौगोलिक ), समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध प्रकट करता है |  ये कारक जनसंख्या के वितरण कों अत्यधिक प्रभावित करते है | इनका वर्णन निम्न प्रकार से है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक

भौतिक कारकों में धरातल, जलवायु तथा जल की उपलब्धता आदि प्रमुख है | ये कारक जनसंख्या के वितरण कों काफी प्रभावित करते हैं | जैसे भारत के उत्तरी मैदान, डेल्टाओं और तटीय मैदानों में जनसंख्या का अनुपात दक्षिणी तथा मध्य भारत के राज्यों के आंतरिक जिलों में अधिक है क्योंकि मैदानी भाग पर लोग अधिक रहना पसंद करते है |

            हिमालय, उत्तरी-पूर्वी राज्यों में विरल जनसंख्या पाई जाती है | जो की पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी विरल जनसंख्या मिलती है |

हिमालय पर्वतीय राज्यों में खास तौर पर हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर में विषम जलवायु के कारण बहुत ही कम लोग रहते है | इसी तरह राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में भी जलवायु की विषमता  तथा जल की कमी लोगों के रहने के उपयुक्त स्थान नहीं उपलब्ध होने देती है अत: वहाँ भी जनसंख्या विरल है |

कुछ पठारी क्षेत्रों में भी भौतिक कारकों के करण जैसे जल की की कमी से जनसंख्या अपेक्षाकृत कम मिलती है |

            इन क्षेत्रों में नहरों के विकास तथा आर्थिक विकास संबंधी कर उपलब्ध कराने के बाद जनसंख्या का अनुपात उच्च होता जा रहा है | जैसे राजस्थान में  इंदिरा गाँधी नहर से सिंचाई की व्यवस्था के बढ़ने और झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार में खनिजों एवं ऊर्जा के अपार भण्डारों के कारण इन राज्यों में मध्यम से उच्च जनसंख्या अनुपात मिलता है |

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले समाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारक

इन कारकों में स्थाई कृषि उद्भव और विकास, मानव बस्ती के प्रतिरूप, परिवहन जाल तंत्र का विकास, औद्योगिकरण और नगरी करण महत्वपूर्ण हैं |

समान्यत: नदी घाटियों के मैदानों, तथा तटीय क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है | क्योंकि इन इलाकों में मानव बस्तियों के आरम्भिक इतिहास और परिवहन जाल तंत्र के विकास के कारण जनसंख्या का सांद्रण  उच्च बना हुआ है |

दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलौर, पुणे, अहमदाबाद, चेन्नई और जयपुर के नगरीय क्षेत्र औद्योगि विकास तथा नगरीकरण के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों कों अपनी और आकृषित कर रहे है | इसलिए इन क्षेत्रों में जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है |  

Sunday, October 10, 2021

Biosphere, Ecology, Ecological System, Types of Biomes and cycles in biosphere

 अध्याय 15

पृथ्वी पर जीवन

कक्षा 11वीं (भूगोल)

जैव मंडल ( Biosphere )

पृथ्वी के पर्यावरण का वह भाग जहाँ पर जीवन पाया जाता है जैवमंडल कहलाता है | यह पृथ्वी के पर्यावरण के तीन मण्डलों स्थलमंडल, वायुमंडल तथा जलमंडल के मिलन स्थल होता है | इस मंडल में तीनों मंडलों के गुण विद्यमान होते है |  इसमें सभी जीवित जीव पाए जाते हैं |

जैवमंडल का महत्व

जैवमंडल हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है | क्योंकि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवधारी जिसमें मानव सभी प्रकार के पौधे जन्तु तथा सभी प्रकार के सूक्ष्म जीव भी इसी मंडल में रहकर पारस्परिक क्रिया करतें है | जैव मंडल और इसके घटक अन्य प्राकृतिक घटक जैसे भूमि, जल व मिट्टी के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं | ये वायुमंडल के तत्वों जैसे तापमान, वर्षा, आर्द्रता व सूर्य के प्रकाश से प्रभावित होते है | पर्यावरण के जैविक घटकों का स्थल, जल तथा वायु के साथ पारस्परिक आदान–प्रदान होता रहता है | जो जीवों के जीवित रहने, बढ़ने व विकसित होने में सहायक होता है |

पारिस्थितिकी (Ecology)                    

            इकोलॉजी (Ecology) शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों Oikos (ओइकोस) तथा logy (लॉजी) से मिलकर बना है | जिसमें ‘ओइकोस’ का शाब्दिक अर्थ ‘घर’ तथा ‘लॉजी’ का अर्थ विज्ञान या अध्ययन है | इस प्रकार इकोलॉजी का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीवों (पौधों, मनुष्यों, जंतुओं तथा सूक्ष्म जीवों ) के घर के रूप में अध्ययन करना है |

जर्मन प्राणीशास्त्री अर्नस्ट हैक्कल (Ernst Haeckel) ने पारिस्थितिकी से संबंधित ओइकोलॉजी (Oekologie) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1869 में किया था | इसलिए ये पारिस्थितिकी के ज्ञाता के रूप में जाने जाते हैं |

जैवमंडल में रहने वाले सभी वनस्पति जगत तथा प्राणी जगत के जीव  एक दूसरे के साथ अंतक्रिया करते हुए एक दूसरे कों प्रभावित करते है | इसके साथ ही ये अपने भौतिक जीवन कों भी प्रभावित करते है | पर्यावरण तथा जीवों के बीच होने वाली इन पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन कों ही पारिस्थितिकी (Ecology) कहते है |

पर्यावरण में पाए  जाने वाले जैविक घटकों (जीवधारियों) तथा अजैविक  घटकों (भौतिक पर्यावरण के तत्वों ) के  पारस्परिक सम्पर्क के अध्यन्न कों ही पारिस्थितिकी विज्ञान कहते है | अत: जीवधारियों का आपस में व उनका भौतिक पर्यावरण से अंतर्सबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्थितिकी है |

पारितंत्र (Ecological System)

किसी क्षेत्र विशेष में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का अजैविक तत्वों  (भूमि, जल अथवा वायु ) से ऐसा अंतर्संबंध जिसमें उर्जा प्रवाह व पोषण श्रंखलाएं स्पष्ट रूप से समायोजित हो, उसे पारितंत्र कहा जाता है |

आवास (Habitat)

पारिस्थिति के संदर्भ में पर्यावरण के भौतिक तथा रासायनिक कारकों के योग को आवास कहते है |

 पारिस्थितिक अनुकूलन (Ecological Adaptation)

विभिन्न प्रकार के पर्यावरण तथा विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में भिन्न प्रकार के पारितंत्र पाए जाते है , जहाँ अलग-अलग प्रकार के पौधे व जीव-जन्तु विकास करते है | जिस पर्यावरण में रहकर जीव विकास की प्रक्रिया करते है उसी पर्यावरण के अभ्यस्त हो जाते है |  इस प्रक्रमण (प्रक्रिया ) कों पारिस्थितिक अनुकूलन कहते है |

पारितंत्र की संरचना

पारितंत्र की संरचना का संबंध परितंत्र में पाए जाने वाले पौधों तथा जंतुओं की प्रजातियों से होता है | इन पारितंत्र की संरचना कों समझने के लिए हमें इसके घटकों के बारे में जानना अनिवार्य है  | जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

पारितंत्र के घटक (कारक)  

पौधों और जंतुओं कों परितंत्र के घटक कहते है | जो अजैविक तथा जैविक घटकों के में वर्गीकृत किए जाते है |

अजैविक कारक  (Abiotic Factors )

इन्हें भौतिक कारक भी कहते है | क्योंकि ये भौतिक पर्यावरण का प्रतिनिधित्व करते हैं | इन कारकों में सूर्य का प्रकाश, वर्षा, तापमान, आर्द्रता तथा मृदा की स्थिति के साथ साथ अकार्बनिक तत्व जैसे कार्बन डाईऑक्साइड, जल, नाइट्रोजन, कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा पोटाशियम आदि शामिल है |   

जैविक कारक (Biotic Factors)

जैविक कारकों या घटकों में सभी प्रकार के जीव शामिल किए जाते है | जिनमें उत्पादक, प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ता तृतीयक उपभोक्ता तथा अपघटक शामिल है |

उत्पादक (Primary Producers)

पौधे प्राथमिक उत्पादक होते है | क्योंकि ये सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के द्वारा अपना भोजन स्वयं निर्मित (उत्पादन) करते है | इसलिए पौधों कों उत्पादक कहते है | पौधें अपना आहार स्वयं बनाते है इसलिए ये स्वपोषित भी कहलाते है | ये भूतल पर मानव सहित समस्त जंतुओं के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आहार एवं ऊर्जा की आपूर्ति के प्रमुख स्त्रोत है |

प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumer)

पारितंत्र के वे घटक जो अपने आहार के लिए प्राथमिक उत्पादकों  (हरे पौधों) पर निर्भर रहते है | उन्हें प्राथमिक उपभोक्ता कहते है | सभी शाकाहारी जीव इस वर्ग में शामिल किए जाते है | जैसे हिरण, चूहें, गाय, बकरी तथा हाथी आदि |

द्वितीयक उपभोक्ता (Carnivores)

वे जीव जो मांसाहारी होते है उन्हें द्वितीयक उपभोक्ता कहा जाता है | ये जीव प्राथमिक उपभोक्ता (छोटे जीवों) कों अपने आहार के रूप में ग्रहण करते है | इस वर्ग में बाघ, शेर, साँप आदि जीवों कों शामिल लिया जा  सकता है |

तृतीयक उपभोक्ता (सर्वाहारी ) चरम स्तर के माँसाहारी (Top Carnivores)

वे मांसाहारी जीव जो अपने भोजन के लिए दूसरे मांसाहारी जीवों पर निर्भर होते है उन्हें  तृतीयक उपभोक्ता (सर्वाहारी ) चरम स्तर के माँसाहारी कहते है | जैसे बाज, नेवला, आदि |

अपघटक (Decomposers)

अपघटक वे सूक्ष्म जीव होते हैं जो मृत जीवों  पर निर्भर रहते है उन्हें अपघटक या वियोजक कहा जाता है | ये जीव मृत पौधों, जन्तुओं तथा जैविक पदार्थों  कों अपघटित करते है और उन्हें जटिल कार्बनिक पदार्थों से सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं | इस वर्ग में सूक्ष्म जीव जैसे बैक्टीरिया तथा कवक (फंगस) शामिल किए जाते हैं |

जीवोम या बायोम के प्रकार (Types of Biomes )

वन बायोम

मरुस्थलीय बायोम

घासभूमि बायोम

जलीय बायोम

उच्च प्रदेशीय बायोम

जल चक्र

जल एक पुनः पूर्ति योग्य संसाधन है | जल एक चक्र के रूप में महासागर से धरातल तथा धरातल से महासागर तक पहुँचता है | जल इस प्रकार चक्र के द्वारा पृथ्वी पर, पृथ्वी के नीचे व वायुमंडल में पृथ्वी के ऊपर संचलन करता है | जल के इसी संचलन कों जलीय चक्र या जल चक्र कहते है | जलीय चक्र पृथ्वी के जलमंडल में विभिन्न रूपों अर्थात गैस, तरल (द्रव) तथा ठोस के रूप में जल का परिसंचरण है | इसका संबंध महासागरों, वायुमंडल, भूपृष्ठ, अध:स्तल और जीवों के बीच जल के सतत आदान प्रदान से है |  जल चक्र कों हम  निम्न प्रकार से समझ सकते है |

महासागरों में उपस्थित जल वाष्पीकरण की प्रक्रिया के द्वारा जलवाष्प के रूप में वायुमंडल में पहुँचता है | वायु के ठंडा होने पर ये जलवाष्प संघनित होकर  आर्द्रताग्राही कणों पर बूंदों के रूप में जमने लगती है जिससे बादलों का निर्माण होता है | बादलों में उपस्थित जल वर्षण के विभिन्न रूपों (वर्षा, ओला वृष्टि, हिमपात आदि  के रूप ) में पृथ्वी के धरातल पर पहुँचता है |

            इनमें से अधिकांश जल वाही जल के रूप में नदियों के द्वारा वापस महासागरों में आकार मिल जाता है | जल का एक हिस्सा हिम के रूप में जमा होता है वो भी हिम के पिघलने पर नदियों के द्वारा महासागरों में आ जाता है | कुछ जल भूमिगत (पृथ्वी के सतह के नीचे)  कुछ गहराई में जाकर जमा हो जाता है | उसमें से कुछ जल भूमिगत नदियों के द्वारा महासागरों में या अन्य जल स्त्रोतों तक पहुँच जाता है |

            नदियों हिमनदियों से जल पुनः वाष्पीकृत होता है और वायुमंडल में पहुँच जाता है | भूमिगत जल भी पेड़ पौधों के द्वारा  अवशोषित किया जाता है जिसे बाद में इनके द्वारा वाष्पोत्सर्जन की क्रिया के द्वारा वायुमंडल में छोड दिया जाता है |

इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और जल चक्र के द्वारा महासागर से धरातल तथा धरातल से महासागर तक पहुँचता है |

कार्बन चक्र

 कार्बन जैवमंडल में पाए जाने वाले  समस्त जीवन का आधार है और समस्त कार्बन यौगिक का मूल, तत्व है | कार्बन चक्र, कार्बनडाइऑक्साइड का परिवर्तित रूप है जो पोधों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा कार्बनडाइऑक्साइड का यौगिककरण आरम्भ होता है | इस प्रक्रिया से काबोहाईड्रेट्स व ग्लूकोस बनता है, जो कार्बनिक यौगिक : जैसे –स्टार्च, सैल्यूलोस, सूक्रोज के रूप में पौधों में संचित हो जाता है | काबोहाईड्रेट्स का कुछ भाग सीधे पौधों की जैविक प्रक्रिया में प्रयुक्त होते है और शेष पौधों के उत्तकों में  संचित हो जाते हैं | पौधे या तो शाकाहारी पौधों का जीवन बनते है या सूक्ष्म जीवों द्वारा विघटित हो जाते है | शाकाहारी उपभोग किए गए काबोहाईड्रेट्स कों कार्बनडाइऑक्साइड में परिवर्तित करते हैं और श्वसन क्रिया द्वारा वायुमंडल में छोडते हैं | इनमें शेष काबोहाईड्रेट्स का जंतुओं के मरने पर सूक्ष्म जीव अपघटन करते हैं | सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा काबोहाईड्रेट्स ऑक्सीजन प्रक्रिया द्वारा कार्बनडाइऑक्साइड में परिवर्तित होकर पुनः वायुमंडल में आ जाती है|

ऑक्सीजन चक्र

ऑक्सीजन  जीवन के अनिवार्य है, क्योंकि हम साँस  लेते समय ऑक्सीजन का प्रयोग करते हैं | यह प्रकाश संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है| ऑक्सीजन का चक्रण बहुत ही जटिल प्रक्रिया है क्योंकि यह अनेक रासायनिक तत्वों तथा मिश्रणों के रूप में होता है | यह अन्य कई के साथ मिलकर ऑक्साइड का निर्माण कर्ता है | जल अणुओं (H2O)के विघटन से ऑक्सीजन उत्पन्न होती है और पौधों की वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के दौरान भी यह वायुमंडल में पहुँचती है|

 

नाइट्रोजन चक्र

नाइट्रोजन हमारे वायुमंडल की संरचना का प्रमुख घटक है| वायुमंडलीय गैसों के 78.08 प्रतिशत भाग में नाइट्रोजन ही है | विभिन्न कार्बनिक यौगिक : जैसे – एमिनो एसिड, न्यूक्लिक एसिड, विटामिन व वर्णक (Pigment) आदि में यह एक महत्वपूर्ण घटक है | नाइट्रोजन चक्र को वायुमंडलीय नाइट्रोजन के मिट्टी ,जल,वायु तथा जीवों के बीच निरंतर चक्रण तथा वायुमंडल में इसकी वापसी के रूप परिभाषित किया जाता है | इसे प्रत्यक्ष गैसीय रूप में मृदा जीवाणु तथा ब्लू ग्रीन एल्गी जैसे जीव ही ग्रहण कर सकते हैं | सामान्यत: इसे यौगिकीकरण (Fixation) द्वारा ही प्रयोग किया जाता है | नाइट्रोजन का 90 प्रतिशत भाग जैविक है जिसे यौगिकीकरण द्वारा ही ग्रहण कर सकते हैं | स्वतंत्र नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया व संबंधित पौधों की जड़ें व रंध्र वाली मृदा है, जहाँ से यह वायुमंडल में पहुंचती है | वायुमंडल में भी बिजली चमकने (Lighting) व कोसमिक रेडियेशन (Cosmic Radiation) द्वारा नाइट्रोजन का यौगिकीकरण होता है | वायुमंडलीय नाइट्रोजन के यौगिक रूप में उपलब्ध होने से हरे पौधों में इसका स्वांगीकरण (Assimilation ) होता है | पौधों कों शाकाहारी जीव खाते है जिससे नाइट्रोजन का कुछ भाग उनके शरीर में चला जाता है | इसके बाद मृत पौधों तथा जीवों के नाइट्रोजनी अपशिष्ट मिट्टी में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा नाइट्रेट परिवर्तित हो जाते है | कुछ जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट में परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं व पुनः हरे पौधों द्वारा नाइट्रोजन-यौगिकीकरण हो जाता है | कुछ अन्य प्रकार के जीवाणु इन नाइट्रेट कों पुन स्वतंत्र नाइट्रोजन में परिवार्तित करने में सक्षम होते हैं और इस प्रक्रिया को डी-नाइट्रीकरण (De-nitrification) कहते है |

प्रश्न : निम्नलिखित में से कौन सा जैवमंडल में सम्मलित है ?

अ)    केवल पौधे

आ)  केवल प्राणी 

इ)       सभी जैव तथा अजैव जीव

ई)       सभी जीवित जीव 

उत्तर : सभी जीवित जीव 

प्रश्न : उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते है ?

(क).प्रेयरी

(ख).                        स्टैपी

(ग). सवाना

(घ). इनमें से कोई नहीं

उत्तर :  सवाना

प्रश्न : चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है ?

(क).आयरन कार्बोनेट

(ख).                        आयरन ऑक्साइड

(ग). आयरन नाइट्राइट

(घ). आयरन  सल्फेट

उत्तर :  आयरन ऑक्साइड

प्रश्न : प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाई ऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है ?

(क).प्रोटीन

(ख).                        कार्बोहाइड्रेट्स

(ग). एमिनो एसिड

(घ). विटामिन

उत्तर : कार्बोहाइड्रेट्स

Biodiversity and Conservation (lesson 16 class 11th) Geography

अध्याय - 16

जैव विविधता एवं संरक्षण

कक्षा- 11वीं (भूगोल)

 

प्रश्न: जैव विविधता का संरक्षण निम्न में से किसके लिए महत्वपूर्ण है ?

A.     जन्तु

B.     पौधे

C.     पौधे एवं प्राणी

D.     सभी जीवधारी

उत्तर : सभी जीवधारी

प्रश्न: निम्नलिखित से से असुरक्षित प्रजातियाँ कौन सी हैं ?

A.     जो दूसरों कों असुरक्षा दें

B.     बाघ व शेर

C.     जिनकी संख्या अत्यधिक हो

D.     जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है |

उत्तर:  जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है |

प्रश्न : नेशनल पार्क (National Park) और पशु विहार  (Sanctuaries) निम्न में से किस उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं ?

A.     मनोरंजन

B.     पालतू जीवों के लिए

C.     शिकार के लिए

D.     संरक्षण के लिए

उत्तर: संरक्षण के लिए

प्रश्न : जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं |

A.     उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

B.     शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र

C.     ध्रुवीय क्षेत्र

D.     महासागरीय क्षेत्र

उत्तर: उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

प्रश्न : निम्न में से किस देश में पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) हुआ था ?

A.     यू .के . (युनाईटेड किंगडम)

B.     ब्राजील

C.     मैक्सिको

D.     चीन

उत्तर: ब्राजील

प्रश्न : जैव विविधता क्या है ?

उत्तर: जैव-विविधता दो शब्दों ‘बायो’ (Bio) और डाइवर्सिटी’ (Diversity)  के मेल से बना है | जिसमें ‘बायो’ का अर्थ है - जीव तथा डाइवर्सिटी का अर्थ है - विविधता | अत:  साधारण शब्दों में किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव - विविधता कहते हैं |

प्रश्न: जैव विविधता के विभिन्न स्तर क्या है ?

उत्तर: जैव-विविधता के तीन स्तर हैं, जो निम्नलिखित  हैं |

1.       आनुवांशिक जैव-विविधिता

2.       प्रजातीय जैव-विविधिता

3.       पारितंत्रीय जैव-विविधिता

प्रश्न : हॉट-स्पॉट (Hot-Spots) से आप क्या समझते है ?

उत्तर:  जिन क्षेत्रों में प्रजातियां विविधता अधिक होती है, उन्हें जैव विविधता के हॉट-स्पॉट कहते है |

प्रश्न: मानव जाति के लिए जंतुओं के महत्व का वर्णन संक्षेप में करें |

उत्तर :  पारितंत्र में सभी प्रकार के जीव जंतु आपस में रहकर अंत: क्रिया करते है और निवास करते है |  जीव व जन्तुओं की प्रजातियाँ पारितंत्र में ऊर्जा का कों ग्रहण करते है तथा उनका संरक्षण करते है  सभी प्रकार के जंतु किसी ना किसी प्रकार से पारितंत्र के संतुलन कों बनाए रखने में योगदान देता है | जंतु विभिन्न प्रकार के कार्बनिक पदार्थों के उत्पन्न करते है | जल तथा अन्य पोषक तत्वों के चक्र कों बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है | मानव भी इसी पारितंत्र का हिस्सा है और विभिन्न प्रकार के जीवों से आपसी क्रिया करता हुआ अपना जीवन यापन करता है | वह कई प्रकार के पोषक तत्वों भोजन तथा वस्त्र आदि के लिए भी जंतुओं पर निर्भर रहता है | अत: मानव जाति के लिए जंतुओं का अत्यधिक महत्व है |

प्रश्न : विदेशज प्रजातियों (Exotic Species) से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर:  वे प्रजातियाँ जों स्थानीय आवास की मूल प्रजातियाँ नहीं है, लेकिन उस तन्त्र में स्थापित की गई है, उन्हें विदेशज प्रजातियाँ कहाँ जाता है | इन प्रजातियों के आने से पारितंत्र में स्थानीय या मूल प्रजातियों के समुदाय कों व्यापक नुकसान हुआ है |  

प्रश्न: प्रकृति कों बनाए रखने के लिए जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करो?

उत्तर : जैव विविधता ने मानव संस्कृति के विकास में बहुत योगदान दिया है और इसी प्रकार मानव समुदायों ने भी आनुवांशिक ,प्रजातीय व पारिस्थितिक स्तरों पर प्राकृतिक विविधता कों बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया है | जैव विविधता की पारिस्थितिक, आर्थिक और वैज्ञानिक भूमिकाएँ प्रमुख है |

जैव-विविधता की पारिस्थितिकीय भूमिका

पारितंत्र में विभिन्न प्रजातियां कोई न कोई क्रिया करती हैं | पारितंत्र में कोई भी प्रजाति बिना कारण न तो विकसित हो सकती है और न ही बनी रह सकती है| अर्थात, प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरा करने के साथ –साथ दूसरों जीवों कों पनपने में भी सहायक होता है | प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरा करने के साथ साथ दूसरे जीवों के पनपने में सहायक होता है | जीव और प्रजातियां ऊर्जा ग्रहण कर उसका संग्रहण करती है, कार्बनिक पदार्थ उत्पन्न एवं विघटित करती है और पारितंत्र में जल एवं पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती है | इसके अतिरिक्त प्रजातियाँ वायुमंडलीय गैस कों स्थिर करती है  और जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक होती है | ये पारितंत्र क्रियाएँ मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्रियाएँ है | पारितंत्र में जितनी अधिक विविधता होगी प्रजातियों के प्रतिकूल स्थितियों में रहने की संभावना और उत्पादकता भी उतनी अधिक होगी |

जैव-विविधता की आर्थिक भूमिका

सभी मनुष्यों के लिए दैनिक जीवन में जैव-विविधता एक महत्वपूर्ण संसाधन है | जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण भाग ‘फसलों की विविधता है, जिसे कृषि जैव विविधता भी कहा जा सकता है | जैव-विविधता को संसाधनों के उन भंडारों के रूप में कहा जा सकता है जिनकी उपयोगिता भोज्य पदार्थ, औषधियों और सौंदर्य प्रसाधन बनाने में है | खाद्य फसलें, पशु, वन संसाधन, मत्स्य और दवा संसाधन आदि कुछ ऐसे प्रमुख आर्थिक महत्व के उत्पाद है | जो मानव कों जैव विविधता के फलस्वरूप होते हैं |

जैव-विविधता की वैज्ञानिक भूमिका

जैव विविधता इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक प्रजाति हमें यह संकेत दे सकती है कि जीवन का आरम्भ कैसे हुआ और यह भविष्य में कैसे विकसित होगा | जीवन कैसे चलता है और पारितंत्र, जिसमें हम भी एक प्रजाति हैं उसे बनाए रखने में प्रत्येक प्रजाति कि  की भूमिका है, इन्हें हम जैव विविधता से ही समझ सकते है |

प्रश्न : जैव विविधता के ह्रास के लिए  उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें | इसे रोकने के उपाय भी बताएँ |

उत्तर :  संसार के विभिन्न भागों में जीवों (पौधों और जंतुओं ) की प्रजातियों में कमी होना जैव विविधता का ह्रास कहलाता है | पिछले कुछ दशकों में जैव विविधता का तेजी से ह्रास हुआ है | जिसके कई कारण है |  जो निम्नलिखित है |

1.       जनसंख्या वृद्धि

पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या वृद्धि के कारण, प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपभोग होने लगा है | इससे विश्व के विभिन्न भागों में प्रजातियों तथा उनके आवास स्थानों में तेजी से कमी हुई है | बढ़ती हुई जनसंख्या की जरूरतों कों पूरा करने के लिए संसाधनों का दोहन तथा वनों का उन्मूलन तेजी से हुआ है | जिससे  प्राकृतिक आवासों का विनाश हुआ है | जो पूरे जैवमंडल के लिए हानिकारक होता जा रहा है |

2.       प्राकृतिक आपदाएँ

प्राकृतिक आपदाएँ – जैसे भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी उद्गार, दावानल तथा सूखा आदि पृथ्वी पर पाई जाने वाले प्राणीजात तथा वनस्पतिजात कों बहुत अधिक हानि पहुँचाती है | परिणाम स्वरूप  जिन क्षेत्रों में ये आपदाएँ आती है उन क्षेत्रों में जैव विविधता की हानि होती है |

3.       वन्य जीवों का अवैध शिकार

पिछले कुछ दशकों के दौरान कुछ जंतुओं जैसे बाघ, चीता, गैंडा, हाथी, मगरमच्छ, मिंक और विभिन्न प्रकार के पक्षियों का अवैध शिकार उनके सिंग, खाल, सूंड तथा दाँत आदि के लिए  किया जा रहा है | जिसके परिणाम स्वरूप कुछ प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर आ गई है |

4.       रासायनिक कीटनाशकों तथा दवाइयों का अधिक प्रयोग

कृषि कार्यों में विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक तथा दवाइयों के उपयोग से भूमि में पाई जाने वाली कई जीवों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई है या लुप्त होने के कगार पर हैं |

5.       प्रदूषण

पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के प्रदूषक जैसे – हाइड्रोकार्बन, और विषैली भारी धातु, संवेदनशील और कमजोर प्रजातियों कों नष्ट कर देते हैं | विशेषकर जलीय प्रदूषण के कारण कई प्रकार के जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है |

6.       विदेशज प्रजातियों का आगमन

वे प्रजातियाँ जों स्थानीय आवास की मूल प्रजातियाँ नहीं है, लेकिन उस तन्त्र में स्थापित की गई है, उन्हें विदेशज प्रजातियाँ कहाँ जाता है | इन प्रजातियों के आने से पारितंत्र में स्थानीय या मूल प्रजातियों के समुदाय कों व्यापक नुकसान हुआ है |  जिससे जैव विविधता का ह्रास बढ़ता जा रहा है |

जैव विविधता के संरक्षण के उपाय  (जैव विविधता के ह्रास कों रोकने के उपाय)

मानव जीवन के लिए जैव विविधता अति आवश्यक है | अत:  जैव विविधता का संरक्षण अति आवश्यक हो जाता है | इसके संरक्षण के उपाय करके ही हम इसके ह्रास कों रोक सकतेहै | जैव विविधता के ह्रास कों रोकने के लिए ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरों में सन् 1992 में हुए जैव विविधता सम्मेलन में विश्व संरक्षण कार्य योजना तैयार की गई थी | जिसमें जैव विविधता के संरक्षण के निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं |

1.       संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयास करने चाहिए |

2.       प्रजातियों कों लुप्त हिने से बचाने के लिए उचित योजनाएँ व प्रबंधन किए जाने चाहिए |

3.       प्रत्येक देश कों वन्य जीवों के आवास कों चिन्हित कर उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए |

4.       प्रजातियों के पलने बढ़ने तथा विकसित होने के लिए सुरक्षित और संरक्षित स्थान उपलब्ध होने चाहिए |

5.       वन्य व् जीवों और पौधों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप करना चाहिए |

6.       खाद्यान्नों की किस्में, चारे के पौधे की किस्में, इमारती लकड़ी के पेड़, पशुधन, जन्तु व उनकी वन्य प्रजातियों की किस्मों कों संरक्षित करना चाहिए |