Sunday, May 1, 2022

FOREST AND WILDLIFE RESOURCES CHAPTER 2 GEOGRAPHY CLASS 10TH QUESTION ANSWERS

अध्याय 2

वन एवं वन्यजीव संसाधन

कक्षा -10वीं (समकालीन भारत -2)

 

प्रश्न: इनमें से कौन सी टिप्पणी प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणीजात के ह्रास का सही कारण नहीं हैं ?

   क).            कृषि प्रसार

  ख).            बृहत स्तरीय विकास परियोजनाएं

    ग).            पशुचारण और ईंधन लकड़ी एकत्रित करना

   घ).            तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण 

उत्तर : पशुचारण और ईंधन लकड़ी एकत्रित करना

प्रश्न: इनमें से कौन सा  संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता ?

   क).            संयुक्त वन प्रबंधन  

  ख).            चिपको आंदोलन

    ग).            बीज बचाओ आंदोलन  

   घ).            वन्य पशुविहार (Sanctuary) का परिसीमन   

उत्तर : वन्य पशु विहार (Sanctuary) का परिसीमन   

प्रश्न: निम्नलिखित प्राणियों/ पौधों का उनके अस्तित्व के वर्ग से मेल करो |

जानवर /पौधे

अस्तित्व वर्ग

काला हिरण

एशियाई हाथी

अंडमान जंगली सुअर

हिमालयन भूरा भालू

गुलाबी सिर वाली बतख

 

लुप्त

दुर्लभ

संकटग्रस्त

सुभेद्य

स्थानिक

 

उत्तर :

जानवर /पौधे

अस्तित्व वर्ग

काला हिरण

संकटग्रस्त

एशियाई हाथी

सुभेद्य

अंडमान जंगली सुअर

स्थानिक

हिमालयन भूरा भालू

दुर्लभ

गुलाबी सिर वाली बतख

लुप्त

 

प्रश्न : निम्नलिखित का मेल करें |

आरक्षित वन

रक्षित वन

अवर्गीकृत वन  

सरकार, व्यक्तियों के निजी  और समुदायों के अधीन अन्य वन और बंजर भूमि |

वन और वन्यजीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से  सर्वाधिक मूल्यवान वन  |

वन भूमि जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है |

 

उत्तर :

आरक्षित वन

वन और वन्यजीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से  सर्वाधिक मूल्यवान वन  |

रक्षित वन

वन भूमि जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है |

अवर्गीकृत वन 

सरकार, व्यक्तियों के निजी  और समुदायों के अधीन अन्य वन और बंजर भूमि |

 

प्रश्न: जैव विविधता क्या है ? यह मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्यों है ?

उत्तर: पृथ्वी पर मानव, विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे  जीव-जंतु, सूक्ष्म-जीवाणु, बैक्टीरिया जिसमें जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी, ब्लू व्हेल, विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी आदि सभी मिलकर रहते है | जीवों की इस भिन्नता कों ही जैव विविधता कहते है | जिन पारिस्थितिक तंत्रों में जीवों कों प्रजातियाँ जितनी अधिक होंगी जैव विविधता उतनी ही अधिक होगी |

जैव विविधता का मानव जीवन के लिए महत्व

मानव अपने पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा मात्र है | हम अपने अस्तित्व के लिए भिन्न –भिन्न तत्वों पर निर्भर करते है | पारिस्थितिक तंत्र में पायी जाने वाली जैव विविधता इन तत्वों कों हमे प्रदान करती है | इसलिए जैव विविधता मानव जीवन के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है | मानव के लिए इसके महत्व कों निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं |

1.       विविध प्रकार के पौधे वायु कों शुद्ध करते है | इसी वायु की सहायता से हम साँस लेते है |

2.       पानी की गुणवता बढ़ाने में अनेक सूक्ष्म जीवों का योगदान होता है |

3.       विभिन्न प्रकार के जीवाणु तथा पेड़ –पौधे मृदा की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है | इसी मृदा से हम अनाज तथा भोजन के अन्य पदार्थ पैदा करते है |

4.       वन में पाए जाने वाले पेड़ –पौधे तथा जीव –जंतु पारिस्थितिक तंत्र कों संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है | क्योंकि वन प्राथमिक उत्पादक है दूसरे जीव इन्हीं पर निर्भर होते है |

प्रश्न: विस्तार पूर्वक बताए कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणीजात के ह्रास कारक हैं ?

उत्तर: मानव क्रियाएँ प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणीजात के ह्रास कारण बनती हैं | जो निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है |

1.       मनुष्य ने अपने आवास, कृषि के विस्तार तथा उद्योगों की स्थापना के लिए वनों का विनाश किया है | वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण कई प्राणियों के आश्रय स्थल (आवास स्थान ) नष्ट हो गए है | परिणाम स्वरूप बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी है या विलुप्त होने के कगार पर हैं |

2.       मनुष्य द्वारा कृषि के विशिष्टिकरण करने से पादपों तथा वन्य प्राणियों पर बुरा प्रभाव पड़ा है | मनुष्य अपने लाभ के लिए एक विशेष प्रकार की फसल अथवा पेड़-पौधे उगाने पर बल देने लगा है | जिससे अन्य प्रजातियों के पेड़-पौधों की अवहेलना हुई है | परिणाम स्वरूप वे विलुप्त होती जा रही है |

3.       उद्योगों के द्वारा किया जाने वाला प्रदूषण विशेषकर रासायनिक उद्योगों के कारण भूमि तथा जल प्रदूषण किया जाता है \ इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है| इसके अलावा विभिन्न प्रकार के जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है |

 

प्रश्न: भारत में विभिन्न समुदायों ने किस प्रकार वनों और वन्यजीव  संरक्षण और रक्षण में योगदान किया है?

अथवा

प्रश्न: भारत में वनों और वन्य जीवन संरक्षण में समुदायों की भूमिका के महत्व की व्याख्या कीजिए |

उत्तर: भारत के कुछ परम्परागत समुदायों का वनों से गहरा नाता है | ये उनके आवास के साथ-साथ उनकी आजीविका के साधन भी है | अत: ये समुदाय अपने आवास तथा आजीविका की रक्षा के लिए वनों की रक्षा करते हुए संघर्ष कर रहे हैं | इस समुदायों द्वारा वनों एवंवन्य जीवन के संरक्षण और रक्षण में महत्वपूर्ण योगदान  है | जिसका का वर्णन इस प्रकार से है |

   क).            भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर अपने आवास स्थलों के संरक्षण में लगे हुए है | क्योंकि इसी से ही दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है |

  ख).            सरिस्का बाघ रिजर्व में राजस्थान के गांवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम के अंतर्गत वहाँ से खनन कार्य बंद करवाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं | 

    ग).            कई क्षेत्रों में तो लोग स्वयं वन्य जीव आवासों की रक्षा कर रहे हैं और सरकार के हस्तक्षेप कों भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं | उदाहरण के लिए राजस्थान के अलवर जिले में 5 गाँवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन भूमि भैरोंदेव डाकव सोंचुरी (Bhairodev Dakav Sonchuri)  घोषित कर दी है | जिसके अपने ही नियम और कानून हैं | जो शिकार कों रोकने तथा बाहरी लोगों की घुसपैंठ से यहाँ के वन्य जीवन कों बचाते हैं |

   घ).            हिमालय के क्षेत्रों में चला चिपको आंदोलन ने दिखाया है कि स्थानीय पौधों की जातियों का प्रयोग करके सामुदायिक वनीकरण अभियान कों सफल बनाया जा सकता है |

   ङ).            पारम्परिक संरक्षण तरीकों कों पुनर्जीवित करना अथवा पारिस्थितिकी कृषि के लिए नए तरीकों का विकास अब व्यापक रूप से प्रयोग में लाया जाने लगा है | जैसे  टिहरी में किसानों के “बीज बचाओ आंदोलन” और “नवदानय” ने दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक लाभ के लिए कृषि उत्पादन संभव है |

   च).            भारत के विभिन्न आदिवासी और जनजातीय क्षेत्रों के समुदायों के द्वारा विशेष वृक्षों तथा वनों कों देवी –देवताओं कों समर्पित करके उनकी पूजा करते है |

प्रश्न: वन और वन्यजीव संरक्षण में सहयोगी रीती रिवाजों पर एक निबन्ध लिखिए |

उत्तर: भारत में कई ऐसी रीति-रिवाज हैं जो वन और वन्य जीव संरक्षण में सहयोगी होते है |जिसमें प्रकृति की पूजा, विशेष वृक्षों की पूजा तथा विभिन्न संस्कृतियों द्वारा वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के पारम्परिक तरीके है | इन सहयोगी रीति रिवाजों के से संबंधित वर्णन निम्नलिखित है |

प्रकृति की पूजा के द्वारा वन और वन्य जीव संरक्षण

सदियों से भारत में रहने वाली जनजातियाँ प्रकृति की पूजा में विश्वास रखती है | उनका मानना है की प्रकृति के प्रत्येक रूप की रक्षा करनी चाहिए | उनके इसी विश्वास ने विभिन्न वनों कों मूल और कौमार्य (नए ) रूप में बचा कर रखा हुआ है |  जनजातीय लोग इनको पवित्र पेड़ों के  झुरमुट (देवी देवताओं के वन) कहते है | ये कबीले वनों कों पवित्र मानकर इनकी पूजा करते है | इन वनों में ना तो स्थानीय लोग घुसते हैं और ना ही किसी और कों इनमें छेड़छाड़ करने देते है | जिससे कई वनों का संरक्षण हुआ है |

विशेष वृक्षों की पूजा के द्वारा वन और वन्य जीव संरक्षण

कुछ समाज  आदिकाल से ही कुछ विशेष पेड़ों कों पूजनीय मानकर उनकी पूजा करते आये हैं | अत: वे उनका आदिकाल से ही  संरक्षण करते रहे हैं | उदाहरण के लिए छोटा नागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करते हैं | उड़ीसा (ओडिसा) और बिहार की जनजातियाँ पुराने समय से ही  शादी के समय इमली और आम के वृक्षों की पूजा करते हैं | इसी प्रकार बहुत से लोग पीपल तथा वटवृक्ष कों पूजनीय मानते है और उनका संरक्षण करते हैं |

विभिन्न संस्कृतियों द्वारा वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के पारम्परिक तरीके

            भारतीय समाज अनेक संस्कृतियों मिलाजुला रूप है | प्रत्येक संस्कृति के लोग अपने परम्परागत तरीकों से प्रकृति तथा उसकी रचना (कृतियों) कों संरक्षित करने में योगदान देते हैं | आमतौर पर झरनों, पहाड़ी चोटियों, पेड़ों और पशुओं कों पवित्र मानकर उनका संरक्षण किया जाता है | कई मंदिरों के आस-पास हम बंदर तथा लंगूर देखते है | मंदिर में आने वाले उपासक इन्हें भक्त मानकर खाने की वस्तुएँ देते है | उदाहरण के लिए राजस्थान में बिश्नोई समुदाय के गाँवों में काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय, और मोरों के झुण्ड देखे ज सकते है | ये वहाँ के समुदाय का अभिन्न हिस्सा है और उनको किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते है | यहाँ के लोग भी उनकी रक्षा करते है |

प्रश्न: पारिस्थितिक तंत्र किसे कहते है ?

उत्तर: पृथ्वी पर मानव, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, सूक्ष्म-जीवाणु, बैक्टीरिया जिसमें जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी, ब्लू व्हेल, विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी आदि सभी मिलकर रहते है | साथ रहते हुए ये एक तंत्र का निर्माण करते है | इस तंत्र कों ही पारिस्थितिक तंत्र कहते है | मानव इस पारिस्थितिक तंत्र का एक हिस्सा है |

प्रश्न: वनों का पारिस्थितिक तंत्र में महत्व बताएँ |

उत्तर: वन पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख भाग है | ये पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है | क्योंकि ये  सभी प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों में प्राथमिक उत्पादक होते है | दूसरे सभी जीव प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से इन्हें पर निर्भर करते है | इसलिए वन पारिस्थितिक तंत्र के मत्वपूर्ण तत्व हैं |

प्रश्न: भारत में जैव विविधता  (भारत में वनस्पतिजात और प्राणीजात ) पर नोट लिखो |

उत्तर: जैव विवधता के संदर्भ में भारत विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है | संसार की समस्त जैव उपजातियों की 8 प्रतिशत संख्या भारत में ही पाई जाती है | भारत में लगभग 16 लाख उपजातियाँ  पायी जाती है |

            हमारे देश में लगभग 81,000 वन्य जीवों की उपजातियाँ है | इसके साथ लगभग 47,000 उपजातियाँ वनस्पति की पायी जाती है | वनस्पति उपजातियों में से लगभग 15,000 उपजातियाँ भारतीय मूल की हैं | जिन्हें स्थानीय या देशज वनस्पति कहा जाता है |

देशज और विदेशज वनस्पति में अन्तर बताइए |

देशज वनस्पति और विदेशज वनस्पति में निम्नलिखित अन्तर हैं |

देशज वनस्पति 

वह वनस्पति जो मूल रूप से उसी देश की होती है जिस देश में वो है तो उसे देशज वनस्पति कहते है | जैसे जो वनस्पति भारत में है और उनका जन्म भी भारत में ही हुआ है तो वे मूल रूप से भारतीय होने के कारण भारत की देशज वनस्पति है |

विदेशज वनस्पति

वह वनस्पति जो मूल रूप से उस देश की नहीं  होती है जिस देश में वो है तो उसे विदेशज वनस्पति कहते है | जैसे जो वनस्पति भारत में है और उनका जन्म भारत में नहीं हुआ है तो वे मूल रूप से भारतीय नहीं  होने के कारण भारत के लिए विदेशज वनस्पति है |

प्रश्न: भारत में जैव विविधता कों खतरा है ? स्पष्ट कीजिए |               अथवा

प्रश्न : भारत की जैव विविधता खतरे में है | उदाहरण देकर स्पष्ट करें |

उत्तर: आधुनिकता की होड़ और आर्थिक विकास के लालच के परिणाम स्वरूप पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदन शीलता बढ़ी है | इसके  कारण पिछले कुछ समय में वनस्पति और प्राणी संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है | जिससे इनकी उपजातियाँ लुप्त होती जा रही हैं |          भारत में भी 10 प्रतिशत वनस्पतिजात और 20 प्रतिशत स्तनधारियों के लुप्त होने का खतरा है | इनमें से कई उपजातियाँ तो नाजुक दौर में हैं | ये लुप्त होने के कगार पर है |इनमें से चीता, गुलाबी सिर वाली बतख, पहाड़ी कोयल, और जंगली चित्तीदार उल्लू जंगली महुआ (मधुका इनसिगनिस), घास की एक प्रजाति हुबरडिया  हेप्टान्यूरोन जैसे वन्य जीव तथा पौधे शामिल है |\

भारत में इस समय बड़े प्राणियों की 79, पक्षियों की 44, सरिसर्पों की 15,जलस्थलचरों की 3 प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं | पेड़ पौधों (पादपों) की लगभग 1500 प्रजातियों के भी लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है | रीढ़दारी  प्राणियों और फूलदार वनस्पति के लुप्त होने की दर  प्राकृतिक दर से 50 से 100 गुणा अधिक है |

            वास्तव में कोई नहीं जानता की अब तक कितनी प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी है | हमारा ध्यान केवल अधिक बड़े और दिखाई देने वाले प्राणियों और पौधों के विलुप्त होने पर ही हैं जबकि छोटे प्राणी जैसे कीट और छोटे पौधों की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी है जो  हमारे लिए महत्वपूर्ण होते है |

प्रश्न: अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार पौधों और प्राणियों की श्रेणियाँ का वर्णन कीजिए |

उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ  (International Union for Conservation of Nature and Natural Resources) एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो विभिन्न प्रकार के पौधों और प्राणियों की जातियों कों के संरक्षण के लिए कार्य करती है | इस संस्था ने पौधों और प्राणियों की उपजातियों कों विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

1.       सामान्य जातियाँ

इसके अंतर्गत वे जातियाँ हैं, जिनके संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है | जैसे –पशु, चीड, साल और कृन्तक (रोडेन्टस) इत्यादि इस प्रकार की जातियाँ हैं |

2.       संकटग्रस्त जातियाँ

ये वे जातियाँ हैं जिनके लुप्त होने का खतरा हैं | जिनके विषम परिस्थितियों के परिणामस्वरूप इनकी संख्या कम हुई है ,यदि वे जारी रहती हैं | तो इन जातियों का जीवित रहना मुश्किल है | कला हिरण,  मगरमच्छ, शेर-पूंछ वाला बंदर, भरतीय जंगली गधा, गैंडा, संगाई (मणिपुर हिरण ) इत्यादि इस प्रकार की जातियों के उदाहरण हैं |

3.       सुभेद्य जातियाँ

ये वे जातियाँ हैं | जिनकी संख्या निरंतर घट रही है | यदि इनकी संख्या पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली परिस्तिथियाँ   नहीं बदलती और इनकी संख्या घटती रहती है | ये भी संकटग्रस्त जातियों कि श्रणी में शामिल हो जाएगी | नीली भेड़ ,गंगा नदी की डाल्फिन, एशियाई हाथी इत्यादि ऐसी जातियों के उदारण हैं

4.       दुर्लभ जातियाँ

इन जातियों कि संख्या बहुत कम या सुभेद्य है |अगर इनको प्रभावित करने वाली विषम परिस्थियाँ परिवर्तित नहीं होती तो ये संकटग्रस्त जातियों कि श्रेणी में आ सकती हैं | जैसे हिमालयन भूरा भालू |

5.       स्थानिक जातियाँ

भौगोलिक या प्राकृतिक सीमाओं से अलग विशेष क्षेत्रों में पाई जाने वाली जातियाँ स्थानिक जातियाँ कहलाती हैं |अंडमानी टिल व् जंगली सुअर,निकोबारी कबूतर और अरुणाचल के मिथुन इन जातियों के उदाहरण हैं |

6.       लुप्त जातियाँ

ये वे जातियाँ हैं |जो इनके रहने के स्थलों में खोजने पर अनुपरिस्थित पाई गई हैं | ये  उपजातियां स्थनीय क्षेत्र , प्रदेश , देश, द्वीप, महाद्वीप या पूरी पृथ्वी से ही लुप्त हो गयी है | एशियाई चीता व गुलाबी सिर वाली बत्तख इस प्रकार की जातियों में शामिल हैं |

 

प्रश्न: भारत में प्राणीजात और वनस्पतिजात के भयानक ह्रास के कारक  कौन से हैं ?            अथवा

प्रश्न : वे प्रतिकूल कारक कौन से है ? जिनसे प्राणीजात और वनस्पतिजात का भयानक ह्रास हुआ है |

मानव ने अपने स्वार्थ के लिए वन और वन्य प्राणियों का बहुत अधिक शोषण किया है | जिसके कारण मानव ने खुद वन और वन्य जीवन कों नुकसान पहुँचाया है |  प्राणीजात तथा वनस्पतिजात के इस भयानक ह्रास के निम्नलिखित कारण रहे है |

1)      मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं (जैसे लकड़ी, छाल, पत्ते, दवाइयाँ भोजन चारा और ईंधन आदि ) की पूर्ति के लिए वनों कों हानि पहुँचाई है | जिसके कारण प्राणीजात तथा वनस्पतिजात का ह्रास हुआ है |

2)      औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय वनों कों सबसे अधिक क्षति पहुँची | जिसके मुख्य कारण रेलवे का विस्तार, कृषि का विस्तार, व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक वानिकी तथा खनन थे |

3)      आजादी के बाद कृषि में विकास करना वनों के विनाश का मुख्य कारण बना | भारत में वन सर्वेक्षण के अनुसार सन् 1951 से 1980 के बीच लगभग 26,200 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कों कृषि भूमि में बदल दिया गया |

4)      इनके अलावा उत्तर-पूर्वी तथा मध्य भारत में की जाने वाली स्थानांतरित कृषि (झूम कृषि ) या स्लश और बर्न खेती की जाती है जिसके कारण वनों की कटाई या निम्नीकरण हुआ है |

5)      बड़ी विकास परियोजनाओं के कारण भी वनों का बहुत अधिक विनाश हुआ है | सन् 1952 से अब तक नदी घाटी परियोजनाओं के कारण  5000 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्रों कों साफ़ करना पड़ा है | यह प्रिक्रिया अब भी जारी है | उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में  4,00,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र नर्मदा सागर परियोजना के पूर्ण होने पर जलमग्न हो जाएगा |

6)      खनन प्रक्रिया ने भी वनों की बर्बादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में डोलोमाईट के खनन के कारण बक्सा टाइगर रिजर्व (Tiger Reserve) गम्भीर खतरे में पद गया है | खनन के कारण ही कई प्रजातियों के आवास स्थल कों भी नुक्सान पहुँचा है | जिसमें हाथी भी शामिल है | कई प्रजातियों के आवागमन के रास्ते कों प्रभावित हुए है |

7)      कुछ पर्यावरणविद तथा वन अधिकारियों के अनुसार पशुचारण तथा ईंधन के लिए लकडियों की कटाई वनों के विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है |

प्रश्न: एक लुप्त प्रजाति एशियाई चीता पर नोट लिखिए ?      अथवा 

प्रश्न: एशियाई चीता  कहाँ पाया जाता था ? इसकी विशेताएँ बताइए | इसके लुप्त होने के क्या कारण है ?

बींसवीं शताब्दी से पहले चीता एशिया तथा अफ्रीका में दूर-दूर तक फैले हुए थे |

एशियाई चीता की विशेषताएँ

   क).            एशियाई चीता भूमि पर रहने वाला सबसे तेज दौड़ने वाला स्तनधारी प्राणी है |

  ख).            यह 112किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड सकता है |

    ग).            यह बिल्ली परिवार का अजूबा तथा विशिष्ट सदस्य है |

   घ).            लोगों कों भ्रम रहता है कि चीता एक तेंदुआ होता है |  चीते की विशेष पहचान उसकी आँखों के कोने से मुँह तक नाक के दोनों ओर फैली आँसुओं के लकीरनुमा निशान है |

एशियाई चीता के लुप्त होने के कारण

 इनके आवासीय क्षेत्र के लगातार समाप्त होने  तथा इनके भोजन के लिए शिकार की उपलब्धता की कमी के कारण ये प्रजाति लुप्त ही गयी है | भारत में तो चीता की प्रजाति बहुत पहले, लगभग सन् 1952 के आस-पास ही लुप्त हो गयी थी |

प्रश्न: हिमालयन यव एक औषधीय पौधा कहाँ पाया जाता है ? यह किस कारण से संकट में है ?        अथवा

हिमालयन यव किन कारणों से संकटग्रस्त प्रजाति बन गयी ?

उत्तर : हिमालयन यव चीड की प्रकार का एक सदाबहार वृक्ष है | यह एक औषधीय पौधा है | भारत में यह हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में पाया जाता है |

    इस पौधे की छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से टकसोल (Taxol) नामक रासायन निकाला जाता है | इस टकसोल कों कैंसर रोगों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है | इससे बनने वाली दवाई विश्व में सबसे अधिक बिकने वाली कैंसर की औषधि है | इसी कारण से हिमालयन यव से टकसोल के अत्यधिक निष्कासन से इस प्रजाति कों खतरा बढ़ गया है | पिछले दशक में हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में इस प्रजाति के लाखों पेड़ सूख चुके है | जिससे यह प्रजाति संकट में पड़ गई है |

प्रश्न: बाघों की संख्या कम होने के कौन –कौन से कारण हैं ?                         अथवा

प्रश्न : बाघों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर: वन्यजीवन संरचना में बाघ (टाइगर) एक महत्वपूर्ण जंगली जानवर है | 1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में बींसवीं शताब्दी के आरम्भ में बाघों की संख्या में तेजी से कमी आई है | जो अनुमान के अनुसार 55,000 से घटकर केवल 1827 रह गई है | बाघों की संख्या में इस कमी के निम्नलिखित कारण रहे हैं |

1)      बाघों कों मारकर उनकी चोरी करना |

2)      बाघों के आवासीय स्थलों का सिकुडना |

3)      बाघों के भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होते जाना |

4)      जनसँख्या में वृद्धि भी इनकी संख्या में कमी का एक कारण है क्योंकि वन तेजी से काटे ज रहे है |

5)      बाघों की खाल का व्यापार तथा एशियाई देशों में परम्परागत औषधियों के रूप में बाघ की हड्डियों का प्रयोग होने से इनकी जाति विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी है |

6)      भारत और नेपाल दुनिया की दो –तिहाई बाघों की संख्या कों आवास प्रदान करते है | इसलिए  बाघों के शिकार, चोरी तथा व्यापार करने वाले लोगों के लिए ये दोनों देश प्रमुख रूप से निशाने पर है |

प्रश्न : बाघ परियोजना  (प्रोजेक्ट टाइगर)पर नोट लिखे |

उत्तर:  बाघ परियोजना के अंतर्गत हम बाघों की संख्या कम होने के कारणों तथा भारत सरकार द्वारा

वन्यजीवन संरचना में बाघ (टाइगर) एक महत्वपूर्ण जंगली जानवर है | सन् 1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में बींसवीं शताब्दी के आरम्भ में बाघों की संख्या में तेजी से कमी आई है | जो अनुमान के अनुसार 55,000 से घटकर केवल 1827 रह गई है | इसके विलुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार द्वारा इस परियोजना कों चलाया जा रहा है |

प्रोजेक्ट टाइगर (बाघ परियोजना) बाघों कों संरक्षण प्रदान करने की एक महत्वपूर्ण परियोजना है | यह विश्व की बेहतरीन वन्यजीव परियोजनाओं में से एक है |

सन् 1973 में इस परियोजना  कों शुरू किया गया था | वन और पर्यावरण मंत्रालय  भारत सरकार के 2009-10  के आंकडो के अनुसार बाघ परियोजना के लिए 32137 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 39 बाघ आरक्षित क्षेत्र थे | जो सन् 2016 में 71027 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 51 बाघ आरक्षित क्षेत्र हो गए |

सन् 1985 में इनकी संख्या 4,002 थी | जो  1989 में  4,334  हुई | सन् 1993 में इनकी संख्या कम होकर  3,600  रह गयी | सन् 2016 में इनकी संख्या 3,890 हो गई |

बाघ संरक्षण की यह योजना केवल संकटग्रस्त बाघों की जाति के लिए ही नहीं है | अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति कों भी बचाना है |

भारत के कुछ प्रमुख बाघ आरक्षित क्षेत्र निम्नलिखित है |

1)      उतराखंड में जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान (जिम कार्बेट नेशनल पार्क)

2)      पश्चिम बंगाल में सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान (सुंदरवन नेशनल पार्क)         

3)      मध्यप्रदेश में बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (बांधवगढ़ नेशनल पार्क)

4)      राजस्थान में सरिस्का वन्य जीव पशु विहार (सरिस्का वाइल्ड लाइफ सेंचुरी )

5)      असम में मानस बाघ आरक्षित क्षेत्र (मानस टाइगर रिजर्व )

6)      केरल में पेरियार बाघ आरक्षित क्षेत्र (पेरियार टाइगर रिजर्व )

प्रश्न : वनों तथा वन्य जीवों का संरक्षण क्यों आवश्यक है ?

उत्तर : वनों तथा वन्य जीवों के लिए संरक्षण आवशयक ही नहीं अनिवार्य है –

1.       वन संरक्षण से ही जैव –विविधता कों बनाए रखा ज सकता है |

2.       इससे हमारे जीवन को आश्रय देने वाले घटकों अर्थात जल, वायु,तथा मिट्टी कों भी सुरक्षित रखा ज सकता है |

3.       वन्य जीवों कों संरक्षण से पौधों और प्राणियों की जीव-विविधता सुरक्षित रहती है | जो पहले से अच्छी प्रजातियों के विकास में सहायक  होती है| उदाहरण के लिए हम अभी तक फसलों की परंपरागत विविधता पर ही निर्भर है | संरक्षण द्वारा इसे नया रूप दिया जा सकता है |

4.       मछलियों का विकास भी जलीय जीव विविधता की सुरक्षा पर निर्भर  करता है |

प्रश्न : वन संरक्षण के उपायों का वर्णन कीजिए |

उत्तर : वनों का लगातार कम होना एक राष्ट्रीय समस्या है | इस समस्या को सर्कार के विभिन्न विभागों द्वारा आपसी सहयोग से प्रयास किए जा  रहे है | लेकिन इसके साथ ही वनों के संरक्षण में सामान्य लोगो की भागीदारी का भी विशेष महत्व है | वनों के संरक्षण के लिए निम्लिखित उपाय किए जाने चाहिए |

1.       वन आरोपण और सामाजिक वानिकी कार्यकर्मों के द्वारा वन आवरण क्षेत्र में वृद्धि के प्रयास करने चाहिए |

2.       लोगों में वनों तःथा वन्य उत्पादों के  प्रति जागरुकता पैदा की जानी चाहिए |

3.       लोगों में वनों की कटाई कों कम करने तथा नए वृक्ष लगाने के लिए जागुरुकता पैदा की जानी चाहिए |

4.       सभी राष्ट्रीय पर्वों को वृक्ष आरोपण से जोड़ा जाए | और अधिक् से अधिक पेड़ इन पर्वों पर लगाए जाए |

5.       मौजूदा वनों से दबाव कम करने  तथा राष्ट्रीय वन निति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए  वन संरक्षण  में महिलों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए |

6.      ग्रामीण लोगों की इंधन सम्बन्धी तथा वन उत्पादों सम्बन्धी आव्शाक्तों की पूर्ति  के लिए नए विकल्प  ढूंढने चाहिए  ताकि उनकी वन पर निर्भरता कम हो |

प्रश्न : संयुक्त वन प्रबंधन ( JFM) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : भारत में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम क्षरित वनों के प्रबंधन और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका के महत्व कों उजागर करतें है | औपचारिक रूप में इन कार्यक्रमों की शुरुआत 1988 में हुई | जब उड़ीसा राज्य ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया |

वन विभग के अंतर्गत संयुक्त वन प्रबंधन क्षरित वनों के बचाव के लिए कार्य करता है और इसमें गांव के स्तर पर संस्थाएँ बनाई जाती है | जिसमें ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से कार्य करते है | इसके बदले ये समुदाय मध्य स्तरीय लाभ जैसे गैर इमारती वन उत्पादों के हक़दार होतें हैं तथा साफक संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी के लाभ में भी इनकी भागीदारी होती है |

प्रश्न : चिपको आंदोलन तथा बीज बचाओ आंदोलन का क्या महत्व है ?

उत्तर :

चिपको आंदोलन

वनों कों विनाश से बचाने में चिपको आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | हिमालय क्षेत्र के इस आंदोलन ने कई प्रदेशों में वनों के कटाव का सफलता पूर्वक विरोध किया है | इसने यह भी दिखा दिया है कि स्थानीय पौधों के प्रयोग से सामुदायिक वन रोपण कों पूरी तरह सफल बनाया जा सकता है |

बीज बचाओ आंदोलन

आज संरक्षण के परम्परागत तरीकों कों पुनर्जीवित करने के साथ साथ नए नए तरीकों के विकास के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं | ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे | आज टिहरी में किसान बीज बचाओ आन्दोलन कों महत्व देते हैं | इसने यह दिखाया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध प्रकार की फसलें उगाई ज सकती हैं | जो आर्थिक दृष्टि से अधिक उपयोगी है |

प्रश्न: संवर्धन वृक्षारोपण क्या है ? दो उदारहण देकर स्पष्ट कीजिए कि इससे पेड़-पौधों की कुछ जतियों को क्षति पहुंची है ?

उत्तर : संवर्धन वृक्षारोपण में आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान कोई प्रजाति बड़े पैमाने पर उगाई जाती है और अन्य प्रजातियों का सफाया कर दिया जाता है | उदारहण के लिए टीके के पेड़ों को बड़े पैमाने पर उगाने से दक्षिण भारत के प्राकृतिक वनों को भारी क्षति पहुंची है | इसी प्रकार हिमालय क्षेत्र में चीड़पाइन के बगानों ने ओक तथा रोड़ोडेंड्रोनके वनों को समाप्त कर दिया है |

प्रश्न : वनों के विनाश के दो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणाम बताओ |

उत्तर :

वनों के विनाश के प्रत्यक्ष परिणाम 

1.       वनों के विनाश से निर्धनता को बढ़ावा मिला है |

2.       इससे बहुत से प्रदेशों में महिलाओं के जीवन को नीरस बना दिया है और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाला है |

वनों के विनाश के अप्रत्यक्ष परिणाम

1.       वनों के विनाश से बाढ़ों की समस्या गंभीर हो गई है |

2.       इससे सूखे को बढ़ावा मिला हैं |

प्रश्न : भारतीय वन्य जीवन (सुरक्षा) अधिनियम सर्वप्रथम कब लागू किया गया ? इसका मुख्य उद्देश्य क्या था ?

उत्तर : भारतीय वन्य जीवन (सुरक्षा) अधिनियम 1972 में लागू किया गया था | इसका उद्देश्य वन्य प्राणियों के शिकार पर रोक लगाना ,उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना तथा अवैध व्यापार पर रोक लगाना था |

प्रश्न: वनों तथा वन्य जीवों का विनाश एक सांस्कृतिक समस्या भी है | स्पष्ट कीजिए |        अथवा

प्रश्न : वनों तथा वन्य जीवों के विनाश के कारण स्त्रियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़े है ?

उत्तर : वनों तथा वन्य जीवों का विनाश पर्यावरण की समस्या तो है | साथ ही इससे देश की सांस्कृतिक विविधता को भी क्षति पहुंची है| इसके परिणामस्वरूप वनों तथा वन्य जीवों पर भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भर अनेक समुदाय गरीबी का शिकार हो गए हैं | निर्धनों में भी पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ा है | बहुत से समाजों में ईंधन ,चारा, पानी आदि लाने की ज़िम्मेदारी मुख्यत: स्त्रियों पर ही है | जिससे वन संसाधनों के विनाश ने स्त्रियों के जीवन को थकान भरा तथा नीरस बना दिया है| अब वन उत्पादों को इकट्ठा करने के लिए मिलों दूर जाना पड़ता है | कामकाज का बोझ बढ़ने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा है| वे अपने घर तथा बच्चों की देखभाल भी पूरी तरह नहीं कर पातीं |

प्रश्न: भारत के वन संसाधनों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जा सकता है ?      अथवा

प्रश्न : प्रबंधन या नियंत्रण कि दृष्टि से भारत के  वन संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए |

 

उत्तर :  वनों के प्रबंधन नियंत्रण और विनियमन का कार्य अपेक्षाकृत कठिन कार्य है | भारत में अधिकतर वन और वन्य जीवन या तो प्रत्यक्ष रूप से सरकार के अधिकार क्षेत्र में है या वन विभग अथवा अन्य सरकारी विभागों की सहायता से उन पर नियंत्रण रखे हुए हैं | भारत में वन संसाधनों कों तीन प्रकार के वनों आरक्षित वन, संरक्षित वन तथा अवर्गीकृत वन में वर्गीकृत किया जा सकता है | इनका वर्णन निम्नलिखित है |

आरक्षित वन  - भारत के कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक भाग को आरक्षित वन घोषित किया गया है | वनों तथा वन्य जीवन की दृष्टि से ये वन सबसे अधिक मूल्यवान हैं | आरक्षित वनों का सबसे अधिक विस्तार जम्मू और कश्मीर , आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडू, पश्चिमी बंगाल तथा महाराष्ट्र में हैं |

 संरक्षित (सुरक्षित) वन - इन वनों के अधीन भारत के कुल क्षेत्र का लगभग एक तिहाई भाग आता है | इन वनों को और अधिक क्षति से बचाने के लिए वन-विभाग द्वारा इन्हें संरक्षित घोषित किया गया है| बिहार,हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा तथा राजस्थान के अधिकांश वन संरक्षित वनों के अंतर्गत आते है|

आरक्षित तथा संरक्षित वनों को स्थायी वन क्षेत्र भी कहा जाता है | इन वनों का विकास इमारती लकड़ी तथा अन्य वन उत्पादों की प्राप्ति और रक्षा की दृष्टि से किया गया है | स्थायी वनों का सबसे विस्तृत क्षेत्र मध्य प्रदेश में हैं जो ऐसे वनों का 75 प्रतिशत है |

अवर्गीकृत वन - आरक्षित तथा संरक्षित  वनों के अतिरिक्त वन तथा बंजर भूमिया अवर्गीकृत वनों की श्रेणी में शामिल हैं | इन वनों पर सरकार या किसी समुदाय अथवा व्यक्ति समूह का निजी स्वामित्व है | इस तरह के वन मुख्यत: उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा गुजरात के कुछ भागों में फैले हुए हैं|

प्रश्न :  मानव के लिए वन किस प्रकार उपयोगी हैं ?

उत्तर : मानव के लिए वन प्रकृति की अमूल्य भेंट हैं | इनका मानव जीवन में बहुत ही उपयोगी स्थान है | ये निम्नलिखित प्रकार से मानव के लिए उपयोगी है |

1.       वन पर्यावरण की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है |

2.       वन स्थानीय जलवायु में सुधार करते है |

3.       वन मृदा अपरदन को नियंत्रित कतरे है |

4.       वन नदी प्रवाहों को नियंत्रित करके बाढ़ों को रोकते है |

5.       विभिन्न उद्योगों के संचालन के लिए वन कच्चा माल उपलब्ध कराते है |

6.       वन मानव को आजीविका का उपलब्ध कराते है |

7.       वन मनोरंजन साधन उपलब्ध कराते हैं|

8.       वनों से इमारती लकड़ी और ईंधन की लकड़ी मिलती हैं |

9.       वन हमें  फल और अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ प्रदान करते है |

10.   वन वन्य जीवों के लिए प्राकृतिक पर्यावरण प्रदान करते है |

11.   वनों से हमें चारा, गोंद इत्यादि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं |

12.   वन वर्षा लाने में सहायक है |

प्रश्न : भारत में वनों के वितरण का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए |

उत्तर: भारत में वनों का  वितरण बहुत असमान है | भारत के कुल क्षेत्रफल के केवल 19.39 प्रतिशत भाग पर ही वन हैं जबकि 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश में कम से कम 33 प्रतिशत भू-भाग पर वनों का होना आवश्यक हैं | स्टेट ऑफ फोरेस्ट रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में वन आवरण के अंतर्गत अनुमानित 79.42 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल है | जो देश के 24.16 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में फैला है | जिसमे सघन वन 12.2  प्रतिशत ,  खुला वन  9.14 प्रतिशत तथा मैंग्रोव वन 0.14 प्रतिशत  है |

वनों के वितरण को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है |

सघन वन क्षेत्र – इन क्षेत्रों में कुल भू-भाग के 60 प्रतिशत से अधिक भाग पर वन पाए जाते हैं | भारत में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम ,त्रिपुरा आदि प्रदेश आते हैं |

कम सघन वन क्षेत्र—इन क्षेत्रों में कुल भू-भाग के 40 से 60 प्रतिशत भाग पर वन पाए जाते हैं | इस श्रेणी में असम, मेघालय और नागालैंड प्रदेश आते हैं |

सामान्य वन क्षेत्र – दक्षिण भारत के सभी राज्यों में तमिलनाडू को छोडकर सामान्य वन पाए जाते है | इन राज्यों में कुल भू-भाग के 20 से 40 प्रतिशत भाग पर वन पाए जाते हैं|

विरल वन क्षेत्र – इन प्रदेशों में वनों का क्षेत्र बहुत कम होता है | उत्तर भारत में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान,बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 20 प्रतिशत से भी कम क्षेत्रों पर वन पाए जाते हैं | इसका कारण यह है कि इन राज्यों में भूमि बहुत उपजाऊ है, इसलिए लोगों ने वनों को काटकर भूमि को बहुत कृषि योग्य बना लिया है |

प्रश्न :भारत में पर्यावरणीय ह्रास पर्यावरण के सभी रूपों होता हुआ दिखाई देता है | कुछ उदाहरणों के द्वारा इस तथ्य कों स्पष्ट कीजिए |

उत्तर: भारत में पर्यावरणीय ह्रास पर्यावरण के सभी रूपों होता हुआ दिखाई देता है | जो निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट है |

1.       भारत के आधे से भी अधिक प्राकृतिक वन नष्ट होचुके हैं |

2.       देश की लगभग एक तिहाई आद्र भूमियाँ सुख चुकी है |

3.       देश के 70 प्रतिशत धरातलीय जल भंडार दूषित हो चुके है |

4.       40 प्रतिशत मैंग्रोव सूख गए हैं |

5.       देश के पौधों तथा प्राणियों की हजारों जातियाँ शिकार तथा वन्य प्राणियों के व्यापार के कारण विलुप्त होने के कगार पर है |

प्रश्न :  आप कैसे कह सकते है कि भारत के प्राकृतिक वनों की स्थिति चिंता जनक है ?

उत्तर: आज भारत में प्राकृतिक वन बहुत तेजी से कम हो रहे है | भारत में वनों का वितरण भी बहुत असमान है | एक अनुमान के अनुसार भारत में 6,37,293 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनों का विस्तार है | यह  कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 19.39 प्रतिशत है | जबकि 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश में कम से कम 33 प्रतिशत भू-भाग पर वनों का होना आवश्यक हैं | स्टेट ऑफ फोरेस्ट रिपोर्ट   के अनुसार भारत में वन आवरण के अंतर्गत अनुमानित  जिसमे सघन वन 11.48 प्रतिशत ,  खुला वन  7.76 प्रतिशत तथा मैंग्रोव वन 0.15 प्रतिशत  है | स्टेट ऑफ फोरेस्ट रिपोर्ट  के अनुसार  (2013) वर्ष 1997 से सघन वनों के क्षेत्र में 10,098 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की बढोतरी हुई थी | 2015  की रिपोर्ट के अनुसार  2013 में इन वनों का क्षेत्रफल 3,775 वर्ग किलोमीटर बढा था | लेकिन यह वृद्धि व संरक्षण उपायों, प्रबंधन की भागीदारी तथा वृक्षारोपण से हुई है | जो विभिन्न संघठनों के द्वारा की गयी है | प्राकृतिक वनों में इस तरह की वृद्धि नहीं हुई है |  अत: स्पष्ट है कि  भारत में प्राकृतिक वनों की स्थिति चिंता जनक है |

1 comment:

SAINI SABHA REG. NARNAUL said...

आपका कार्य सराहनीय है | इससे सामाजिक विषय से सम्बन्धित प्रश्न उत्तर विशेषकर भूगोल कि पाठ्य पुस्तक के नोट्स और प्रश्न उत्तर विद्यार्थियों के लिए सहायक है |