Friday, December 16, 2022

LESSON 9 Planning and Sustainable Development in Indian Context (India People and Economy) 12th Geography

 

  अध्याय 9

भारत  के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास

पुस्तक - भारत लोग और अर्थव्यवस्था

 

नियोजन: नियोजन एक ऐसी प्रकिया है जिसके अंतर्गत  सोच विचार की प्रकिया, कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करना

तथा उद्देश्यों कों प्राप्त करने हेतु गतिविधियों का क्रियान्वयन शामिल किया जाता है |

 

नियोजन की प्रकिया में  शामिल तत्व : नियोजन की प्रकिया में निम्नलिखित कों  शामिल किया जाता है |

1)      सोच विचार की प्रकिया,

2)      कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करना

3)      उद्देश्यों कों प्राप्त करने हेतु गतिविधियों का क्रियान्वयन

 

नियोजन के उपागम: सामान्यतः नियोजन के दो उपागमन होते है |

1.       खण्डीय (Sectoral) नियोजन

2.       प्रादेशिक उपागम नियोजन

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

 

1.       खण्डीय (Sectoral) नियोजन

खण्डीय (Sectoral) नियोजन का अर्थ है अर्थव्यवस्था के विभिन्न खण्डों (क्षेत्रों ) जैसे कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा,  निर्माण, परिवहन, संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना तथा उनको लागू करना |

 

2.       प्रादेशिक  नियोजन

किसी भी देश में सभी क्षेत्रों में एक समान आर्थिक विकास नहीं हुआ है | परिणाम स्वरूप कुछ क्षेत्र बहुत अधिक विकसित हो गए है और कुछ पिछड़े हुए है | जो बताता है कि विकास समान रूप से नहीं हुआ है | जब पिछड़े क्षेत्रों कों विकसित करने के लिए स्थानिक परिपेक्ष्य कों ध्यान में रखकर नियोजन किया जाता है | तो इस प्रकार के नियोजन कों प्रादेशिक नियोजन कहते है | इस प्रकार के नियोजन से प्रादेशिक असंतुलन भी कम होता है |

लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह नियोजन के उपागमों  कों प्रस्तुत करने के कारण

या

लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह नियोजन की आवश्यकता

हम जानते हैं कि एक क्षेत्र का आर्थिक विकास उसके संसाधनों पर निर्भर करता है | लेकिन कभी- कभी संसाधनों से भरपूर क्षेत्र भी पिछड़े रह जाते है | क्योंकि संसाधनों के साथ-साथ तकनीक और निवेश की भी आर्थिक विकास के लिए बहुत अधिक आवश्यकता होती है |

            भारत में भी लगभग डेढ़ दशक के नियोजन अनुभवों से नियोजकों ने यह महसूस किया कि आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन प्रबलित होता जा रहा है | क्षेत्रीय और सामाजिक आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने विशेष उपागमों के द्वारा नियोजन करने की सोची | इसलिए नियोजन के लिए  लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह उपागमों कों प्रस्तुत किया गया |

लक्ष्य क्षेत्र विकास  कार्यक्रम (Target Area Development Programme)

 क्षेत्रीय आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने कुछ क्षेत्रों कों चिन्हित करके उन्हें लक्ष्य क्षेत्र मानकर उनके विकास हेतु विभिन्न कार्यक्रम शुरू किए गए |

जैसे- कमान नियंत्रित क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम तथा पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम

 लक्ष्य समूह विकास  कार्यक्रम (Target Group Development Programme)

सामाजिक आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने कुछ सामाजिक समूहों कों चिन्हित करके उन्हें लक्ष्य समूह  मानकर उनके विकास हेतु विभिन्न कार्यक्रम शुरू किए गए |

जैसे - लघु कृषक विकास संस्था (SFDA), सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA) आदि |

 

पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme )

पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम कों पाँचवी पंचवर्षीय योजना (1974 -79) में प्रारम्भ किया गया था | इस कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश से सभी पर्वतीय जिले जो वर्तमान में उत्तराखंड में शामिल है, असम की मिकरी पहाड़ी, और उत्तरी कछार पहाडियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला और तमिलनाडु के नीलगिरी आदि कों मिलाकर कुल 15 जिले शामिल किए गए है |

            सन् 1981 पिछड़े क्षेत्रों पर बनी राष्ट्रीय समिति ने उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों कों पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल करने की सिफ़ारिश की थी जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उप-योजना शामिल नहीं है |

पहाड़ी क्षेत्रों में विकास के लिए सुझाव

पिछड़े क्षेत्रों पर बनी राष्ट्रीय समिति ने निम्नलिखित बातों कों ध्यान में रख कर पहाड़ी क्षेत्रों में विकास के लिए सुझाव दिए थे |

1.       सभी लोग लाभान्वित हो, केवल प्रभावशाली व्यक्ति ही नहीं |

2.       स्थानीय संसाधनों और प्रतिभाओं का विकास करना |

3.       जीविका निर्वाह अर्थव्यवस्था कों निवेश मुखी अर्थव्यवस्था बनाना |

4.       अंत: प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े क्षेत्रों का शोषण ना हो |

5.       पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में सुधार करके श्रमिकों कों लाभ पहुँचना |

6.       पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखना |

पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम के उद्देश्य

 पहाड़ी क्षेत्र के विकास कों विस्तृत योजनाएँ इनके स्थलाकृतिक, पारिस्थितिकीय, सामाजिक तथा आर्थिक दशाओं कों ध्यान में रखकर बनाई गई | इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था | ये कार्यक्रम पहाड़ी क्षेत्रों में बागवानी का विकास, रोपण कृषि, पशुपालन. मुर्गी पालन, वानिकी, लघु तथा ग्रामीण उद्योगों का विकास करने के लिए स्थानीय संसाधनों कों उपयोग में लाने के उद्देश्य से बनाए गए |  

 

सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम

इस कार्यक्रम की शुरुआत चौथी पंचवर्षीय योजना में हुई | इस कार्यक्रम का उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों कों रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव कों कम करने के लिए उत्पादन के साधनों कों विकसित कारण था |

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इसके कार्यक्षेत्र कों और विकसित किया गया | प्रारम्भ में इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है | परन्तु बाद में इन कार्यक्रम के अंर्तगत सूखा प्रभावी क्षेत्रों में समन्वित विकास पर बल दिया गया | जिसके लिए सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह विकास और आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना जैसे विद्युत, सड़कों बाजार, ऋण सुविधाओं और सेवाओं पर जोर दिया गया | इस कार्यक्रम में राज्य के सामान्य प्रयत्नों के अतिरिक्त केन्द्र सरकार के द्वारा भी सहायता उपलब्ध कराई गई थी |    

पिछड़े क्षेत्रों के विकास की समिति ने इस कार्यक्रम की समीक्षा की जिसमें यह पाया गया कि यह कार्यक्रम मुख्यतः कृषि तथा इससे संबंधित सेक्टरों (क्षेत्रों ) के विकास तक ही सीमित है और पर्यावरण संतुलन पुनःस्थापना पर इस कार्यक्रम में विशेष बल दिया गया है |

यह भी महसूस किया गया कि जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार लगातार बढ़ रहा है | जिससे कृषक अधिक कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए सीमांत भूमि का उपयोग करने के लिए बाध्य हो रहे हैं | इससे पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड रहा है |

फलस्वरूप सूखा संभावी क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करना अति आवश्यक हो गया है | ऐसे क्षेत्रों का विकास करने की रणनीतियों में सूक्ष्म – स्तर पर समन्वित जल –संभर विकास कार्यक्रम अपनाना शामिल है |

अत: सूखा संभावी क्षेत्रों के विकास की रणनीति में जल, मिट्टी, पौधों , मानव तथा पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन, पुनःस्थापन पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए |

भारत में सूखा संभावी क्षेत्र

सन् 1967 में योजना आयोग ने देश में 67 जिलों (पूर्ण या आंशिक) की पहचान सूखा संभावी जिलों के रूप में की थी | सन् 1972 में सिंचाई आयोग ने 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र का मापदण्ड लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया |

भारत में सूखा संभावी क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के मराठावाडा क्षेत्र, आंध्रप्रदेश के रायलसीमा तथा तेलगांना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि तथा आंतरिक भाग के शुष्क तथा अर्धशुष्क भागों में फैलें हुए हैं | पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते है |   

 

भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम

            भरमौर जनजातीय क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसे भारत सरकार के द्वारा 21नवम्बर 1975 में अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र घोषित किया था | इस क्षेत्र में ‘गद्दी’ जनजातीय समुदाय के लोग रहते है | इस समुदाय की हिमालय क्षेत्र में अपनी अलग पहचान है | क्योंकि गद्दी लोग ऋतु प्रवास करते है | ये गद्दीयाली भाषा बोलते हैं |

भौगोलिक स्थिति तथा क्षेत्रफल

इस जनजातीय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले की दो तहसीलें भरमौर और होली शामिल है | यह क्षेत्र 320 11’ उत्तर से  320 41’ उत्तरी अक्षांशों तथा 760 22’ पूर्व से 760  53’ पूर्व देशान्तरों के बीच स्थित है | यह प्रदेश लगभग 1888 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  का धरातल

इस जनजातीय क्षेत्र का अधिकतर भाग 1500 मीटर से 3700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच स्थित है | गद्दी जनजाति की आवास भूमि कहलाया जाने वाला यह प्रदेश चारों दिशाओं में ऊँचे पर्वतों से घिरा हुआ है | इसके उत्तर में पीरपंजाल तथा दक्षिण में धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ है | पूर्व में धौलाधार श्रेणी का फैलाव रोहतांग दर्रे के पास पीरपंजाल श्रेणी से मिलता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की प्रमुख नदियाँ

            इस क्षेत्र में रावी प्रमुख नदी है | इसकी सहायक नदियाँ बुढील और टुंडेन है | ये नदियाँ इस क्षेत्र में गहरे महाखड्डों का निर्माण करती हैं | ये नदियाँ इस पहाड़ी क्षेत्र कों होली, खणी, कुगती  तथा दुहा     न्ड (तुन्दाह)  नामक चार भूखंडों में विभाजित करती हैं |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जलवायु

इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है | शरद ऋतु में जमा देने वाली कडाके की सर्दी और बर्फ पड़ती है | यहाँ का औसत मासिक तापमान जनवरी में 40 सेल्सियस और जुलाई में 260  सेल्सियस होता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित करने वाले कारक

निम्नलिखित कारकों ने भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित किया है |

1         इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है |

2         यहाँ आधारभूत संसाधन कम हैं |

3         यहाँ का पर्यावरण क्षण भंगुर है |

 

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जनसंख्या संबंधी विशेषताएँ

 

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या  39113थी | यहाँ का जनसंख्या घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के  आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है | ऐतिहासिक रूप से गद्दी जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव का अनुभव किया है | इसलिए सामाजिक और आर्थिक विकास से वंचित रही है | यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं इससे संबंधी क्रियाएँ जैसे भेड़ और बकरी पालना है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया 1970 के दशक में शुरू हुई | जब गद्दी लोगों कों अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया गया | सन् 1974 में पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जनजातीय उपयोजना शुरू की गई | हिमाचल प्रदेश में पाँच क्षेत्रों कों समन्वित जनजातीय विकास परियोजना के तहत चुना गया | जिनमें से भरमौर क्षेत्र कों भी समन्वित जनजातीय विकास परियोजना  (Integrated Tribal Development Programme) का दर्जा मिला |  

            इस योजना का उद्देश्य गद्दियों के जीवन स्तर में सुधार करना और भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के बीच में विकास के अन्तर कों कम करना है | इस योजना के अंतर्गत परिवहन तथा संचार, कृषि और इससे संबंधित क्रियाओं तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं के विकास कों प्राथमिकता दी गई |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना का योगदान  

 भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना से निम्नलिखित महत्वपूर्ण  योगदान दिए है |

1         इस क्षेत्र में जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान विद्यालयों, जन - स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना का विकास है | होली तथा खणी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ बसे गाँव अवसंरचना विकास से  सबसे अधिक लाभान्वित हुए है | इकुगती  तथा दुहान्ड (तुन्दाह)   क्षेत्रों के दूरदराज के गाँव अभी भी इस विकास की परिधि से बाहर है |

2         इस क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास उपयोजना लागू होने से कई सामाजिक लाभ हुए है | जिनमें साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात में सुधार और बाल विवाह में कमी आना आदि शामिल है |

3         इस क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर जो  सन् 1971 में  1.88 प्रतिशत थी वह सन् 2011 में बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई |

4         गद्दियों की परम्परागत अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह कृषि व पशुचारण पर आधारित थी जिनमें खाद्यान्नों के उत्पादन और पशुपालन पर बल दिया जाता था | परन्तु 20वीं शताब्दी  के अंतिम तीन दशकों के दौरान, भरमौर क्षेत्र में दालों और अन्य नकदी फसलों की खेती में बढोतरी हुई है |

5         इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में पशुचारण का महत्व कम हुआ है | पशुचारण के घटते महत्व कों इस बात से आँका जा सकता है कि आज कुल पारिवारिक इकाइयों का दसवाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है | परन्तु गद्दी जनजाति आज भी बहुत गतिशील है | क्योंकि इनकी एक बड़ी संख्या शरद ऋतु में कृषि और मजदूरी करके आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करती है |      

 

इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र    

इंदिरा गाँधी नहर कों पहले राजस्थान के नाम से जाना जाता था | यह परियोजना मरुभूमि कों हरी-भरी और समृद्ध भूमि में बदलने के लिए मानवीय प्रयास का ज्वलंत उदाहरण है | यह नहर तंत्र भारत के सबसे बड़े नहर तंत्रों में से एक है |

इंदिरा गाँधी नहर की स्थिति तथा विस्तार

इंदिरा गाँधी नहर परियोजना की संकल्पना कँवर सेन ने सन् 1948  में दी थी | इस परियोजना की शुरूआत 31 मार्च 1958 यह नहर पंजाब के फिरोजपुर जिले में सतलुज तथा व्यास नदी के संगम पर स्थित हरिके बाँध (बैराज) से निकाली गई है | पंजाब में यह नहर कोई सिंचाई नहीं करती | यहाँ इसे राजस्थान फीडर के नाम से जाना जाता है | राजस्थान में थार के मरुस्थल में पाकिस्तान की सीमा के समानांतर 40 किलोमीटर की औसत दूरी पर बहती है | इस नहर की कुल नियोजित लम्बाई 9060 किलोमीटर है |

इंदिरा गाँधी नहर की सिंचाई क्षेत्र और नहर तंत्र

यह नहर परियोजना 19.63 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य कमान क्षेत्र में सिंचाई सुविधा प्रदान करेगी | इस परियोजना में दो प्रकार के नहर तंत्र है | प्रवाह नहर तंत्र तथा लिफ्ट नहर तंत्र |

1         प्रवाह नहर तंत्र

इस परियोजना के कुल कमान क्षेत्र में से 70 प्रतिशत क्षेत्र प्रवाह नहर तंत्रों से सिंचाई सुविधा प्रदान करता है | प्रवाह नहर में जल ढाल के साथ साथ बहता है | इंदिरा गाँधी नहर तंत्र में सभी प्रवाह नहरें मुख्य नहर के दाएँ किनारे से निकलती हैं |

2         लिफ्ट नहर तंत्र

नहर के कुल कमान क्षेत्र का 30 प्रतिशत क्षेत्र लिफ्ट तंत्र द्वारा सिंचाई सुविधा प्रदान करता है | लिफ्ट नहर में ढाल के विपरीत प्रवाह के लिए जल कों बार-बार मशीनों से ऊपर उठाया जाता है | इंदिरा गाँधी नहर तंत्र में सभी लिफ्ट नहरें मुख्य नहर के बाएँ किनारे से निकलती हैं |

नहर निर्माण के चरण और उनके कमान क्षेत्र 

 इंदिरा गाँधी नहर का निर्माण कार्य दो चरणों में पूरा किया गया है |

1         चरण -1 का कमान क्षेत्र

इंदिरा गाँधी नहर के चरण -1 का कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिले के उत्तरी भाग में पड़ता है | इस चरण के कमान क्षेत्र का भूतल थोडा उबड़-खाबड है है |  इसका कृषि योग्य कमान क्षेत्र 5.53 लाख हेक्टेयर है | इस कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1960 के दशक के मध्य  में हुई |

2         चरण -2 का कमान क्षेत्र

इंदिरा गाँधी नहर के चरण -2 का कमान क्षेत्र बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर और चुरू जिलों में पड़ता है | इसका कृषि योग्य कमान क्षेत्र 14.10 लाख हेक्टेयर है | इसमें स्थानांतरित बालू टिब्बों वाला मरुस्थल भी शामिल है | यहाँ स्थानान्तरित बालू के टिब्बे पाए जाते हैं | इस क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु में तापमान 500सेल्सियस तक पहुँच जाता है |  इस कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1980 के दशक के आरम्भ में हुई |

 

इंदिरा गाँधी नहर सिंचाई का पर्यावरण पर प्रभाव

इंदिरा गाँधी नहर द्वारा सिंचाई करने से पर्यावरणीय परिस्थितियों पर साकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों ही प्रकार के प्रभाव पड़े है | जो निम्नलिखित है |

1         साकारात्मक प्रभाव

इंदिरा गाँधी नहर द्वारा सिंचाई करने से पर्यावरणीय पर साकारात्मक निम्नलिखित है |

                                                   क).            लंबी अवधि तक मृदा में नमी उपलब्ध होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत शुरू किए गए वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों   के कारण यहाँ भूमि हरी-भरी हो गई है |

                                                  ख).            इससे वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ  धीमी पड़ गई है |

2         नकारात्मक प्रभाव

इस नहर द्वारा सिंचाई करने से पर्यावरणीय पर नकारात्मक भी पड़े है जो निम्नलिखित है |

                                                   क).            सघन सिंचाई और जल के अत्यधिक प्रयोग से जल भराव और मृदा लवणता जैसी दोहरी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है |

                                                  ख).            चरण -1के अधिकाँश भागों में भौम जल स्तर 0.8 मीटर प्रति वर्ष की तीव्र गति से ऊपर उठ रहा है |

                                                    ग).            जल भराव तथा मृदा लवणता से मृदा की उपजाऊ शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | जिससे कृषि उत्पादन में भी कमी आ रही है |

 

इंदिरा गाँधी नहर सिंचाई का कृषि पर प्रभाव

इंदिरा गाँधी नहर द्वारा सिंचाई करने से इस क्षेत्र की कृषि पर कई प्रभाव पड़े है जो निम्नलिखित है |

1         नहरी सिंचाई के प्रसार से इस प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में रूपांतरित हो गई है | इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक फसलें उगाने के लिए मृदा नमी सबसे महत्वपूर्ण सीमकारी कारक रहा है | परन्तु नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र के विस्तार से बोये गए क्षेत्र में विस्तार हुआ है | परिणाम स्वरूप परती भूमि में कमी आई है | इससे फसलों की सघनता में भी वृद्धि हुई है |

2         यहाँ की पारम्परिक फसलें चना, बाजरा और ग्वार थे | सघन सिंचाई की सुविधा के बाद पारम्परिक फसलों के स्थान पर गेहूँ, कपास. मूँगफली और चावल ने ले लिया है |

3         सघन सिंचाई से आरम्भ में कृषि और पशुधन उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि हुई |

4         सघन सिंचाई के कारण इस क्षेत्र में जल भराव तथा मृदा लवणता की समस्याएँ उत्पन्न हुई परिणाम स्वरूप लंबी अवधि के दौरान कृषि की सतत पोषणीयता पर प्रश्न उठ गए है | 

 

इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने वाले उपाय

पिछले चार दशकों में जिस तरह से  इस क्षेत्र में विकास हुआ और उससे साथ साथ इस क्षेत्र में भौतिक पर्यावरण का निम्नीकरण हुआ है | क्योंकि इस नहर परियोजना के द्वारा इस क्षेत्र में जल भराव तथा मृदा लवणता की समस्याएँ उत्पन्न होने से सतत पोषणीय विकास में बाधा उत्पन्न हुई है | इसे देखते हुए बहुत से विद्वानों ने इंदिरा गाँधी नहर परियोजना की पारिस्थितिकीय पोषणता पर प्रश्न उठाये हैं |

            यह एक मान्य तथ्य है कि इस कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से पारिस्थितिकीय सतत पोषणीय विकास कों बल देना होगा |  अत: इस कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने वाले सात प्रस्तावित उपायों में से  पाँच उपाय पारिस्थितिकीय संतुलन कों पुन: स्थापित करने पर बल देते है | ये सात उपाय निम्नलिखित है |

1         पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है जल प्रबंधन नीति का कठोरता से लागू करना | इस नहर परियोजना के चरण -1 में कमान क्षेत्र में फसल रक्षण सिंचाई और चरण -2 में फसल उगाने और चरागाह विकास के लिए विस्तारित सिंचाई का प्रावधान है |

2         इस क्षेत्र में शस्य प्रतिरूप में सामान्यत: जल सघन फसलों कों नहीं बोया जाना चाहिए | इसका पालन करते हुए किसानों का बागवानी कृषि के अंतर्गत खट्टे फलों की खेती करनी चाहिए |

3         कमान क्षेत्र जैसे नालों का पक्का करना, भूमि विकास तथा समतलन और वारबंदी (ओसरा) पद्धति (नहर के कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण) प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जानी चाहिए ताकि बहते जल की क्षति मार्ग में कम हो सके |

4         अति सिंचाई के कारण जलाक्रांत तथा लवणता से प्रभावित भूमि का पुनरुद्धार किया जाए |

5          इस क्षेत्र में पारिस्थितिकीय तंत्र के विकास के लिए वनीकरण, वृक्षों की रक्षक मेखला (Shelterbelt) का निर्माण और चरागाह का विकास बहुत आवश्यक है | विशेषकर चरण -2 में भंगुर (Fragile) पर्यावरण में पारितंत्र विकास (Eco-Development ) के लिए अति आवश्यक है |

6         इस प्रदेश में सामाजिक सतत पोषणीता का लक्ष्य हासिल करने के लिए निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भू-आवंटियों कों कृषि के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध करावाई जाए |

7         केवल कृषि और पशुपालन के विकास से इन क्षेत्रों में आर्थिक सतत पोषणीय विकास की अवधारणा कों साकार नहीं किया जा सकता | अत: कृषि तथा इससे संबंधित क्रियाकलापों कों अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों के साथ विकसित करना होगा | इससे इस क्षेत्र में आर्थिक विविधीकरण होगा तथा मूल आबादी गाँवों, कृषि-सेवा केन्द्रों (सुविधा गाँवों) और विपणन केन्द्रों (मंडी कस्बों) के बीच प्रकार्यात्मक संबंध स्थापित होगा |

विकास का अभिप्राय

साधारणतया ‘विकास’ शब्द से अभिप्राय समाज विशेष की स्थिति और उसके द्वारा अनुभव किए गए परिवर्तन की प्रक्रिया से होता है | इसका मुख्य उदेश्य पर्यावरण कों कम से कम हानि पहुंचाते हुए प्रगति करना तथा प्राप्त लाभ का  समान रूप से वितरण करना है |

मानव इतिहास कें लम्बे अंतराल में समाज और उसके जैव –भौतिक पर्यावरण की निरंतर अंत: क्रियाएँ  समाज की स्थिति कों निर्धारित करती हैं | ये अंत:क्रियाएँ इस बात पर निर्भर करती है कि समाज में किस प्रकार की प्रौद्योगिकी विकसित की है और किस प्रकार की संस्थाओं का पोषण किया है | प्रौद्योगिकी और संस्थाएँ मिलकर ही मानव विकास कों गति प्रदान की है | तो इससे पैदा हुए संवेग ने प्रौद्योगिकी का स्तर ऊँचा उठाया है | जिससे अनेक संस्थाओं का निर्माण और रूपान्तरण हुआ है | अत : विकास एक बहु-आयामी संकल्पना है और अर्थव्यवस्था, समाज तथा पर्यावरण में सकारात्मक  व अनुत्क्रमणीय परिवर्तन का घोतक है |

विकास की संकल्पना में समय के अनुसार परिवर्तन

विकास की संकल्पना गतिक है | विकास की संकल्पना का प्रादुर्भाव बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ | द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकास की संकल्पना आर्थिक वृद्धि का सूचक थी | जिसे सकल राष्ट्रीय उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय  प्रति व्यक्ति उपभोग में समय के साथ बढोतरी के रूप में मापा जाता था | परन्तु अधिक आर्थिक वृद्धि वाले देशों में आय के असमान वितरण के कारण गरीबी का स्तर बहुत तेजी से बढ़ा | जिसके परिणाम स्वरूप 1970 के दशक में ‘पुनर्वितरण के साथ वृद्धि’ तथा ‘वृद्धि और समानता’ जैसे वाक्यांश विकास की परिभाषा में शामिल किए गए |

            पुनर्वितरण तथा समानता के प्रश्नों से निपटते हुए यह अनुभव हुआ कि विकास की संकल्पना कों केवल आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता | तो विकास की संकल्पना में लोगों के कल्याण और रहने के स्तर, जन स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर तथा राजनैतिक तथा नागरिक अधिकारों से संबंधित मुद्दों कों भी शामिल किया गया |

1980 ई० के दशक तक विकास एक बहु आयामी संकल्पना के रूप में उभरा जिसमें समाज के सभी लोगों के लिए बृहद स्तर पर सामाजिक एवं भौतिक कल्याण का समावेश है |

सतत पोषणीय विकास की अवधारणा का विकास

विकास का मुख्य उदेश्य पर्यावरण कों कम से कम हानि पहुंचाते हुए प्रगति करना तथा प्राप्त लाभ का  समान रूप से वितरण करना है | इसके लिए मानव जीवन और विकास के साधनों का बुद्धिमता पूर्ण उपयोग अनिवार्य है |  इसके लिए सतत पोषणीय विकास अति आवश्यक है |

 

            सतत पोषणीय विकास का तात्पर्य विकास कि उस प्रक्रिया से है, जिसमें पर्यावरणीय संसाधनों की पुनर्भरण क्षमता के अनुसार प्रयोग करना ताकि उनकी आपूर्ति निरंतर सुनिश्चित की जा सके | 

            सतत पोषणीय विकास की अवधरणा का विकास सन् ‍ 1960 के दशक के अंत में हुआ, जब पश्चिमी देशों में पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर बढ़ती जागरूकता की समान्य वृद्धि हुई  और लोगों ने पर्यावरण पर औद्योगिक विकास के अनापेक्षित प्रभावों के संबंध में चिंता व्यक्त की |

सन् 1968 में प्रकाशित एहरलिच की पुस्तक  ‘द पॉपुलेशन बम’ (The Population Bomb ) और 1972 में मिडोस और अन्य द्वारा लिखी गई पुस्तक लिमिट टू ग्रोथ (Limit to Growth) के प्रकाशन ने इस विषय पर लोगों कों और विशेषकर पर्यावरण विदों की चिंता और गहरी कर दी | इस घटनाक्रम के परिपेक्ष्य में विकास के एक नए मॉडल की शुरुआत हुई जिसे सतत पोषणीय विकास कहा जाता है |

पर्यावरणीय मुद्दों पर विश्व समुदाय की बढ़ती हुई चिंता कों ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘विश्व पर्यावरण और विकास आयोग’ (World Commission on Environment and Development WCED) की स्थापना की | इस आयोग की प्रमुख नार्वे की प्रधानमंत्री गरो हरलेम ब्रंटलैंड  थी | जिस कारण इस आयोग कों ब्रंटलैंड आयोग  भी कहा जाता है | इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्यूचर’(हमारा सांझा भविष्य )  सन् 1987 में प्रकाशित की | इस रिपोर्ट कों ब्रंटलैंड रिपोर्ट  भी कहते हैं | विश्व पर्यावरण और विकास आयोग’ (WCED) ने सतत पोषणीय विकास की सीधी-सरल और बृहद स्तर पर प्रयुक्त होने वाली परिभाषा प्रस्तुत की |  ब्रंटलैंड रिपोर्ट  के अनुसार सतत पोषणीय विकास का अर्थ है – ‘एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति कों प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना |’

 

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