Saturday, June 29, 2024

LESSON 8 INTERNATIONAL TRADE FUNDAMENTALS OF HUMAN GEOGRAPHY (CLASS 12TH ) FOR HINDI MEDIUM

 

 

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

अध्याय 8

मानव भूगोल के मूल सिद्धांत

व्यापार

व्यापार का तात्पर्य वस्तुओं और सेवाओं के स्वैच्छिक आदान प्रदान से होता है | व्यापार करने के लिए दो व्यक्तियों या दो पक्षों का होना आवश्यक है | एक व्यक्ति या पक्ष बेचता है और दूसरा व्यक्ति या पक्ष उसे खरीदता है | व्यापार बेचने वाले और खरीदने वाले दोनों के लिए समान रूप से लाभदायक होता है |

व्यापार के स्तर

व्यापार दो स्तरों पर किया जा सकता है | अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय

1.       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार  

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विभिन्न राष्ट्रों के बीच राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार वस्तुओं और सेवाओं के आदान- प्रदान को कहते हैं | राष्ट्रों को व्यापार करने की आवश्यकता उन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए होती है जिन्हें या तो वे देश स्वयं उत्पादित नहीं कर सकते या जिन्हें वे अन्य स्थानों से का कीमत पर खरीद सकते हैं |

2.       राष्ट्रीय

एक देश की सीमाओं के अंदर होने वाले व्यापार को राष्ट्रीय व्यापार कहते है | देश के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में वस्तुओं के आदान –प्रदान के लिए होता है |

वस्तु विनिमय

जब व्यापार के अंतर्गत वस्तुओं का प्रत्यक्ष आदान –प्रदान होता है तो इसे वस्तु विनिमय कहते हैं | आदिम समाज में व्यापार का आरंभिक स्वरूप विनिमय व्यवस्था ही था | जिसमें वस्तुओं का प्रत्यक्ष आदान –प्रदान होता है अर्थात वस्तु के बदले में रुपये के स्थान पर वस्तु दी जाती थी |

उदाहरण के लिए इस व्यवस्था में आप कुम्हार होते और आपको एक नालसाज़ को ढूँढना पड़ता, जिसे आप द्वारा बनाए हुए बर्तनों की आवश्यकता होती और आप नलसाज़  की सेवाओं के अब्दले अपने बर्तन देकर आदान –प्रदान कर सकते थे |

रुपये अथवा मुद्रा के आगमन के साथ ही विनिमय व्यवस्था की कठिनाइयों को दूर कर लिया गया |

प्राचीन समय में मुद्रा के प्रकार

पुराने समय में कागजी व धात्विक मुद्रा के आगमन से पहले उच्च नैजमान मूल्य वाली दुर्लभ वस्तुओं को मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था | जैसे – चकमक पत्थर, अब्सीडियन (आग्नेय काँच), काउरी शेल, चीते के पंजे, ह्वेल के दाँत, कुत्ते के दांत, खालें, बाल (फर) मवेशी, चावल, पैपरकॉर्न, नमक, छोटे यंत्र, ताँबा, चाँदी, और स्वर्ण आदि |

भारत का एकमात्र वस्तु विनिमय मेल (असम के गुवाहाटी का जॉन बील मेला)

असम के गुवाहाटी से 35 किलोमीटर दूर जागी रॉड में हर वर्ष जनवरी में फसल कटाई की ऋतु के बाद जॉन बील मेला लगता है | यह संभवत: भारत का एकमात्र मेला है, जहाँ विनिमय वयबस्था आज भी जीवित (प्रचलित) है | इस मेले के दौरान बड़े बाज़ार की व्यवस्था की जाती है और विभिन्न जनजातीय समुदायों के लोग अपनी वस्तुओं का आदान- प्रदान करते हैं |

सैलरी (Salary)

सैलरी शब्द लैटिन भाषा के शब्द सैलेरिअम (Salarium) से बना है | जिसका अर्थ है नमक के द्वारा भुगतान | क्योंकि उस समय समुद्र के जल से नमक बनाना ज्ञात नहीं था और इसे केवल खनिज नमक से बनाया जाता था, ज उस समय प्राय: दुर्लभ और खर्चीला था, यही वजह है कि यह भुगतान का एक माध्यम बना | 

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का इतिहास (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का ऐतिहासिक विकास)

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के ऐतिहासिक विकास (इतिहास) को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं |

1.       प्राचीन काल में लम्बी दूरी तक वस्तुओं का परिवहन जोखिमपूर्ण होता था, इसलिए व्यापार स्थानीय बाजारों तक ही सीमित था | लोग तब अ संसाधनों का अधिकांश भाग मूलभूत आवश्यकताओ जैसे भोजन और वस्त्र खर्च करते थे | केवल धनी लोग ही आभूषण और महँगे परिधान खरीदते थे, औr इन्हीं के कारण विलास की वस्तुओं का व्यापार आरम्भ हुआ था |

2.       लम्बी दूरी के व्यापार का एक आरम्भिक उदाहरण रेशम मार्ग है, ये मार्ग 6000 किलोमीटर लंबे थे जो रोम को चीन से जोड़ता था | व्यापारी भारत, पर्शिया (ईरान) और मध्य एशिया के मध्यवर्ती स्थानों से चीन में बने रेशम, रोम की ऊन व बहुमूल्य धातुओं तथा अन्य अनेक महँगी वस्तुओं का परिवहन करते थे |

3.       रोमन साम्राज्य के विखंडन के बाद 12 वीं और 13 वीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय वाणिज्य (व्यापार) में वृद्धि हुई | समुद्रगामी युद्धपोतों के विकास के साथ ही यूरोप और एशिया के बीच व्यापार बढ़ा तथा अमेरिका की खोज हुई |

4.       15वीं शताब्दी से ही यूरोपीय उपनिवेशवाद शुरू हुआ और विदेशी वस्तुओं के साथ व्यापार के साथ ही व्यापार के नए  स्वरूप का उदय हुआ जिसे दास व्यापार कहा गया | पूर्तगालियों  डचो, स्पेनिशलोगों व अंग्रेजों ने अफ्रीकी मूलनिवासियों को पकडा और उन्हें बलपूर्वक, बागानों में श्रम हेतु नए खोजे गए अमेरिका में परिवहित किया | दास व्यापार के दौरान नीलामी में प्राय: परिवार के सदस्यों को अलग कर दिया था | उनमें से बहुतों ने अपने परिवार के लोगों को दोबारा नहीं देखा |

दास व्यापार 200 वर्षों से भी अधिक समय तक एक लाभदायक व्यापार रहा | जब तक कि यह 1792 में डेनमार्क में, 1807 में ग्रेट ब्रिटेन में और 1808 में संयुक्त राज्य अमेरिका में पूर्णरूपेण समाप्त नहीं कर दिया गया |

5.       औद्योगिक क्रांति के बाद, कच्चे माल जैसे- अनाज, माँस, ऊन की माँग बढ़ी, लेकिन विनिर्माण की वस्तुओं की तुलना में उनका मौद्रिक मूल्य घट गया |

औद्योगिककृत राष्ट्रों ने कच्चे माल के रूप में प्राथमिक उत्पादों का आयात किया और मूल्यपरक तैयार माल को वापस अनौद्योगीकृत राष्ट्रों को निर्यात कर दिया |

6.       19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादन करने वाले प्रदेश अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहे और औद्योगिक राष्ट्र एक दूसरे के मुख्य ग्राहक बन गए |

7.       प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पहली बार राष्ट्रों ने व्यापार कर लगाए और संख्यात्मक प्रतिबंध लगाए | विश्व युद्ध के बाद के समय के दौरान ‘व्यापार व शुल्क हेतु सामान्य समझौता’ (GATT) जैसी संस्थाओं ने व्यापार शुल्क घटाने में सहायता की | ‘व्यापार व शुल्क हेतु सामान्य समझौता’ (GATT) नामक संस्था ही बाद में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के रूप में स्थापित हुई |

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अस्तित्व में होने के कारण

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उत्पादन में विशिष्टीकरण का परिणाम है | यह विश्व की अर्थव्यवस्था को लाभान्वित करता है | यदि विभिन्न राष्ट्र वस्तुओं के उत्पादन या सेवाओं की उपलब्धता में श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण को प्रयोग में लाएं | हर प्रकार का विशिष्टीकरण व्यापार को जन्म दे सकता है | इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वस्तुओं और सेवाओं के तुलनात्मक लाभ, परिपूरकता व हस्तांतरणीयता के सिद्धांतों पर आधारित होता है और सिद्धांतीय रूप से व्यापारिक भागीदारों को समान रूप से लाभदायक होना चाहिए |

आधुनिक समय में व्यापार, विश्व के आर्थिक संगठन का आधार है और यह राष्ट्रों की विदेश नीति से संबंधित है | सुविकसित परिवहन तथा संचार प्रणाली से युक्त कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी से मिलने वाले लाभों को  छोड़नें का इच्छुक नहीं हैं |

 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधारों (विश्व में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधारों का विश्लेषण)

                    (I.)       राष्ट्रीय संसाधनों में भिन्नता: :

भौतिक संरचना जैसे कि भूविज्ञान, उच्चावच, मृदा व जलवायु में भिन्नता के कारण विश्व के राष्ट्रीय संसाधन असमान रूप से वितरित हैं | जो विश्व व्यापार के लिए आधार प्रदान करते हैं | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

                              (क.)      भौगोलिक संरचना खनिज संसाधन आधार को निर्धारित करती है और धरातलीय विभिन्नताएं फसलों व पशुओं की विविधता सुनिश्चित करती है | निम्न भूमियों में कृषि –संभाव्यता अधिक होती है | पर्वत पर्यटकों को आकृषित करते हैं और पर्यटन को बढ़ावा देते हैं |

                              (ख.)      खनिज संसाधन पूरे संसार में असमान रूप से वितरित है | खनिज संसाधनों की उपलब्धता औद्योगिक विकास को आधार प्रदान करती है |

                               (ग.)       जलवायु किसी दिए हुए क्षेत्र में जीवित रह जाने वाले पादप व वन्य जात के प्रकार को प्रभावित करती है | यह विभिन्न उत्पादों की विविधता को भी सुनिश्चित करती है | उदाहरणत: ऊन-उत्पादन ठंडे क्षेत्रों में ही हो सकता है; केला, रबड़ तथा कहवा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उग सकते हैं |

                  (II.)      जनसंख्या कारक

विभिन्न देशों में जनसंख्या के आकार, वितरण तथा उसकी विविधता व्यापार की गई वस्तुओं के प्रकार और मात्रा  पर को प्रभावित करते हैं |

                  (क.)      सांस्कृतिक कारक  

विशिष्ट संस्कृतियों में में कला तथा हस्तशिल्प के विभिन्न रूप विकसित हुए है | जिन्हें विश्व भर में सराहा जाता है | उदाहरण स्वरूप चीन द्वारा उत्पादित उत्तम कोटी का पॉर्सलिन (चीनी मिट्टी का बर्तन) तथा ब्रोकेड (किमखाब-जरीदार या बूटेदार कपड़ा) | ईरान के कालीन प्रसिद्ध है | जबकि उत्तरी अफ्रीका का चमड़े का काम और इंडोनेशियाई बटिक (छींट वाला) वस्त्र बहुमूल्य हस्तशिल्प है | 

                  (ख.)      जनसंख्या का आकार

सघन बसाव वाले देशों में आंतरिक व्यापार अधिक है जबकि बाह्य व्यापार कम परिमाण वाला होता है, क्योंकि कृषीय और औद्योगिक उत्पादों का अधिकांश भाग स्थानीय बाजारों में ही खप जाता है | जनसंख्या का जीवन स्तर बेहतर गुणवत्ता वाले आयातित उत्पादों की माँग को निर्धारित करता है | क्योंकि निम्न जीवन स्तर के साथ केवल कुछ लोग ही महँगी आयातित वस्तुएँ खरीद पाने में समर्थ होते है |

 

                (III.)    आर्थिक विकास की प्रावस्था:

 देशों के आर्थिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं में व्यापार की गई वस्तुओं का स्वभाव (प्रकार) बदल जाता है | कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों में, विनिर्माण की वस्तुओं के लिए कृषि उत्पादों का विनिमय किया जाता है, जबकि औद्योगिक राष्ट्र मशीनरी और निर्मित उत्पादों का निर्यात करते हैं तथा अन्य कच्चे पदार्थों का आयात करते हैं |

                 (IV.)    विदेशी निवेश की सीमा : 

विदेशी निवेश विकास शील देशों में व्यापार को बढ़ावा दे सकता है | जिनके पास खनन, प्रवेधन द्वारा तेल खनन , भारी अभियांत्रिकी, काठ कबाड़ तथा बागवानी कृषि के विकास के लिए आवश्यक पूँजी का अभाव रहता है |  विकासशील देशों में ऐसे पूँजी प्रधान उद्योगों के विकास द्वारा औद्योगिक राष्ट्र खाद्य पदार्थों, खनिजों का आयात सुनिश्चित करते हैं तथा अपने निर्मित उत्पादों के लिए बाजार निर्मित करते हैं | यह सम्पूर्ण चक्र देशों के बीच व्यापार के परिमाण को आगे बढ़ाता है |

                  (V.)      परिवहन:

 पुराने समय में परिवहन के पर्याप्त और समुचित साधनों का अभाव स्थानीय क्षेत्रों में व्यापार को प्रतिबंधित करता था | केवल उच्च मूल्यों वाली वस्तुओं, जैसे –रत्न , रेशम तथा मसाले का लम्बी दूरियों तक व्यापार किया जाता था | रेल, समुद्री तथा वायु परिवहन के विस्तार और प्रशीतन तथा परीक्षण के बेहतर साधनों के साथ, व्यापार ने स्थानिक विस्तार का अनुभव किया है | 

व्यापार संतुलन

व्यापार संतुलन, एक देश के द्वारा अन्य देशों को आयात एवं इसी प्रकार निर्यात की गई वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा (परिमाण) का प्रलेखन करता है | व्यापार संतुलन को दो तरीकों से दर्शाया जाता है |

       (I.)       धनात्मक व्यापार संतुलन

यदि निर्यात का मूल्य, आयात के मूल्य की तुलना में अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन धनात्मक या अनुकूल है |

      (II.)      ऋणात्मक व्यापार संतुलन

यदि आयात का मूल्य, निर्यात मूल्य की अपेक्षा अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन ऋणात्मक या प्रतिकूल है |

व्यापार संतुलन का प्रभाव

एक देश की अर्थव्यवस्था के लिए व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन के गंभीर निहितार्थ होते है | एक ऋणात्मक व्यापार संतुलन का अर्थ होगा कि देश वस्तुओं के क्रय (खरीदने) पर उससे अधिक व्यय करता है जितना कि वह अपने सामानों के विक्रय (बेचने) से अर्जित करता है | यह अंतिम रूप में वित्तीय संचय (धन के भंडार) की समाप्ति को अभिप्रेरित करता है |

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रकार

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया ज सकता है | द्विपार्श्विक व्यापार तथा बहुपार्श्विक व्यापार

        (I.)       द्विपार्श्विक व्यापार

द्विपार्श्विक व्यापार दो देशों के द्वारा एक दूसरे के साथ किया जाता है | आपस में निर्दिष्ट वस्तुओं का व्यापार करने के लिए वे सहमति करते हैं | उदाहरणार्थ देश ‘क' कुछ कच्चे पदार्थ के व्यापार के लिए इस समझौते के साथ सहमत हो सकता है कि देश ‘ख’ कुछ अन्य निर्दिष्ट सामग्री खरीदेगा अथवा इसके विपरीत कोई सामग्री देगा |

 

      (II.)      बहुपार्श्विक व्यापार

नाम से ही स्पष्ट है कि बहुपार्श्विक व्यापार व्यापार बहुत से व्यापारिक देशों के साथ किया जाता है | वही देश अन्य देशों के साथ व्यापार कर सकता है जो आपस में निर्दिष्ट वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिए सहमति रखते हैं | देश कुछ व्यापारिक साझेदारों को ‘सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र’ (Most Favorable Country) की स्थिति प्रदान कर सकता है |

मुक्त व्यापार की स्थिति

व्यापार हेतु अर्थव्यवस्थाओं को खोलने का कार्य मुक्त व्यापार अथवा व्यापार उदारीकरण के रूप में जाना जाता है | यह कार्य व्यापारिक अवरोधों जैसे सीमा शुल्क को घटाकर किया जाता है |

घरेलू उत्पादों एवं सेवाओं से प्रतिस्पर्धा करने के लिए व्यापार उदारीकरण सभी स्थानों से वस्तुओं और सेवाओं के लिए अनुमति प्रदान करता है |

भूमंडलीकरण और मुक्त व्यापार विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को उन पर प्रतिकूल थोपते हए तथा उन्हें विकास के समान अवसर न देकर बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं

परिवहन एवं संचार तंत्र के विकास के साथ ही वस्तुएँ एवं सेवाएँ पहले की अपेक्षा तीव्र गति से एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच सकती है | 

किन्तु व्यापार मुक्त व्यापार को केवल सम्पन्न देशों के द्वारा ही बाजारों की ओर नहीं ले जाना चाहिए , बल्कि विकसित देशों को चाहिए कि वे अपने स्वयं के बाजारों को विदेशी उत्पादों से संरक्षित रखें |

देशों को भी डंप की गई वस्तुओं से सतर्क  की आवश्यकता है, क्योंकि मुक्त व्यापार के साथ इस प्रकार की सस्ते मूल्य की डंप की गई वस्तुएँ  घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुँचा सकती है |

डंप करना

लागत की दृष्टि से नहीं बल्कि भिन्न –भिन्न कारणों से अलग –अलग कीमत की किसी वस्तु को दो देशों में विक्रय करने की प्रथा डंप करना कहलाती है |

देशों को भी डंप की गई वस्तुओं से सतर्क  की आवश्यकता है, क्योंकि मुक्त व्यापार के साथ इस प्रकार की सस्ते मूल्य की डंप की गई वस्तुएँ  घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुँचा सकती है |

विश्व व्यापार संगठन (WTO) (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए विश्व व्यापार संगठन (WTO)की भूमिका )

विश्व व्यापार संगठन

1948 में विश्व को उच्च सीमा शुल्क और विभिन्न प्रकार की अन्य बाधाओं से मुक्त करवाने हेतु कुछ देशों के द्वारा जनरल ऐग्रीमेंट ऑन ट्रेड एण्ड टैरिफ (GATT) का गठन किया गया | सन् 1994 में जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एण्ड टैरिफ (GATT) के सदस्य देशों द्वारा राष्ट्रों के बीच मुक्त एवं निष्पक्ष व्यापार को बढ़ाने, प्रोन्नत करने के लिए एक स्थाई संस्था के निर्माण का निश्चय किया | इसलिए जनवरी 1995 में GATT को विश्व व्यापार संगठन में बदल दिया गया | विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में स्थित है और वर्तमान में 104 देश इसके  सदस्य है | भारत विश्व व्यापार संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक रहा है |

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भूमिका

1.       विश्व व्यापार संगठन  एक मात्र ऐसा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के मध्य वैश्विक नियमों का व्यवहार करता है |

2.       यह विश्व व्यापी व्यापार तंत्र के लिए  नियमों को नियत करता है |

3.       यह सदस्य देशों के मध्य विवादों का निपटारा करता है |

4.       यह व्यापार के लिए दूरसंचार एवं बैंकिंग इत्यादि सेवाओं को भी सम्मिलित करता है |

5.       यह बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार को भी अपने कार्यों मे शामिल करता है |

6.       विश्व व्यापार संगठन सेवाओं के व्यापार को भी अपने कार्यों में शामिल करता हैं |

विश्व व्यापार संगठन (WTO)की आलोचना

उन लोगों के द्वारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) की आलोचना या विरोध किया गया है जो मुक्त व्यापार और अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के प्रभावों से परेशान है | इस पर तर्क किया गया है कि मुक्त व्यापार आम लोगों के जीवन को अधिक सम्पन्न नहीं बनाता |  धनी देशों को अधिक धनी बनाकर यह वास्तव में गरीब और अमीर के बीच खाई को बढ़ा रहा है | ऐसा इसलिए है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन में प्रभावशाली देश केवल अपने वाणिज्यिक हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं | इसके अतिरिक्त अनेक विकसित देशों ने अपने बाजारों को विकासशील देशों के उत्पादों के लिए पूरी तरह नहीं खोला है | यह भी एक तर्क दिया जाता है कि स्वास्थ्य, श्रमिकों के अधिकार, बाल श्रम और पर्यावरण जैसे मुद्दों की उपेक्षा की गई है | 

प्रादेशिक व्यापार समूह

प्रादेशिक व्यापार समूह व्यापार की मदों में भौगोलिक सामीप्य, समरूपता और पूरकता के साथ देशों के मध्य व्यापार को बढ़ाने एवं विकाशशील देशों के व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के उद्देश्य से अस्तित्व मे आए हैं | आज 120 प्रादेशिक व्यापार समूह विश्व के 52 प्रतिशत व्यापार करते है | इन व्यापार समूहों का विकास अंतत: प्रादेशिक व्यापार को गति देने में वैश्विक संगठनों के असफल होने के परिणाम स्वरूप हुआ है |

यद्यपि ये प्रादेशिक समूह सदस्य देशों में व्यापार शुल्क को हटा देते हैं  तथा मुक्त व्यापार को बढ़ावा देते हैं | लेकिन भविष्य में विभिन्न व्यापारिक समूहों के बीच मुक्त व्यापार का रहना कठिन होता जा रहा है |

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित मामले (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रभाव)

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित मामलों  (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रभावों) को हम निम्न लिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं |

1.       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का होना राष्ट्रों के लिए  पारस्परिक लाभदायक होता है | यदि यह प्रादेशिक विशिष्टीकरण उत्पादन के उच्च स्तर, रहन सहन के स्तर, वस्तुओं एवं सेवाओं की विश्व व्यापी उपलब्धता, कीमतों और वेतन का समानीकरण, ज्ञान एवं संस्कृति के प्रस्फुरण को प्रेरित करता है | 

2.       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार देशों के लिए हानिकारक हो सकता है यदि यह अन्य देशों पर निर्भरता, विकास के असमान स्तर, शोषण और युद्ध का कारण बनने वाली प्रतिद्वंद्विता की ओर उन्मुख है |

3.       विश्वव्यापी व्यापार जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित करते हैं | यह सारे विश्व में पर्यावरण से लेकर लोगों के स्वास्थ्य एवं कल्याण इत्यादि सभी को प्रभावित कर सकता है |

4.       जैसे –जैसे देश अधिक व्यापार के लिए प्रतिस्पर्धी बनते ज रहे हैं, वैसे-वैसे उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बढ़ता ज रहा है |जिससे संसाधनों  के नष्ट होने की दर उनके पुनर्भरण की दर से तीव्र होती है | परिणाम स्वरूप समुद्री जीवन भी तीव्रता से नष्ट हो रहा है |  वन काटे ज रहे हैं  और नदी बेसिन निजी पेय जल कंपनियों को बेचे ज रहे हैं | तेल गैस खनन, औषधि विज्ञान और कृषि व्यवसाय में संलग्न बहुराष्ट्रीय निगम और अधिक प्रदूषण उत्पन्न करते हुए हर कीमत पर अपने कार्यों को  बढ़ाए रखती है |

5.       उनकी कार्य पद्धति सतत पोषणीय विकास के मानकों का अनुसरण नहीं करती | यदि संगठन केवल लाभ  बनाने की ओर उन्मुख रहते हैं और पर्यावरणीय तथा स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर ध्यान नहीं देते तो यह भविष्य के लिए इसके गहरे निहितार्थ हो सकते हैं | 

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का होना राष्ट्रों के लिए पारस्परिक लाभदायक होता है इसके निम्न लिखित लाभ है |

1)      अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रादेशिक विशिष्टीकरण को प्रेरित करता है |

2)      उत्पादन का  उच्च स्तर

3)       उच्च रहन –सहन के स्तर

4)      विश्वव्यापी व्यापार जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित करते हैं |

5)      वस्तुओं और सेवाओं की विश्वव्यापी उपलब्धता

6)      कीमतों एवं वेतन का समानीकरण

7)      ज्ञान व संस्कृति का प्रष्फुकरण  

पत्तन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रवेश द्वार

पत्तन के प्रकार

सामान्यत: पत्तन का वर्गीकरण उनके द्वारा सँभाले गए यातायात के प्रकार के अनुसार के अनुसार किया जाता है |

निपटाए गए नौ भार के अनुसार पत्तनों  के प्रकार

      (क.)      औद्योगिक पत्तन :  ये पत्तन थोक नौभार के लिए विशेषीकृत होते हैं | जैसे अनाज, चीनी, अयस्क तेल, रसायन और इसी प्रकार के पदार्थ |

      (ख.)     वाणिज्यिक पत्तन : ये पत्तन सामान्य नौभार संवेष्टित उत्पादों तथा तथा विनिर्मित वस्तुओं का निपटान करते है | ये पत्तन यात्री –यातायात का भी प्रबंध करते हैं |

       (ग.)      विस्तृत पत्तन : ये पत्तन बड़े परिमाण में सामान्य नौभार का थोक में प्रबंध करते हैं | संसार के अधिकांश महान पत्तन विस्तृत पत्तनों के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं |

अवस्थिति के आधार पर पत्तनों के प्रकार आंतरपों

      (क.)      अन्तर्देशीय पत्तन  :

ये पत्तन समुद्री तट से दूर अवस्थित होते हैं | ये समुद्र से एक नदी अथवा नहर द्वारा जुड़े होते है | ये पत्तन चौरस ताल वाले जहाज या बजरे द्वारा ही गम्य होते हैं | उदाहरणस्वरूप: मानचेस्टर एक नहर से जुड़ा है; मेंफिस मिसीसिपी नदी पर अब स्थित है ; राइन के अनेक पत्तन है  जैसे –मैनहीम तथा ड्यूसबर्ग; और कोलकाता हुगली नदी पर स्थित है जो गंगा नदी की एक शाखा है |

      (ख.)     बाह्य पत्तन :

ये गहरे जल के पत्तन हैं जो वास्तविक पत्तन से दूर बने होते हैं | ये उन जहाजों को अपने बड़े आकार के कारण उन तक पहुँचने में अक्षम है को ग्रहण करके पैतृक पत्तनों को सेवा प्रदान करते हैं | उदाहरणस्वरूप  ऐथेन्स तथा यूनान में इसके बाह्य पत्तन पिरेइयस एक उच्च कोटी का संयोजन है |

विशिष्टीकृत कार्यकलापों के आधार पर पत्तनो के प्रकार

      (क.)      तैल  पत्तन :

ये पत्तन तेल के प्रक्रमण और नौ-परिवहन का कार्य करते है | इनमें से कुछ टैंकर पत्तन है  तथा कुछ तेल शोधन पत्तन है | वेनेजुएला में माराकाइबो, ट्यूनीशिया में ऐस्सखीरा, लेबनान में त्रिपोलि टैंकर पत्तन है | पर्शिया की खड़ी पर अबादान एक तेलशोधन पत्तन है |  

      (ख.)     मार्ग पत्तन (विश्राम पत्तन):

ये ऐसे पत्तन है जो मूल रूप से मुख्य समुद्री मार्गों पर विश्राम केंद्र के रूप में विकसित हुए हैं | जहाँ पर जहाज़ पुन: ईंधन भरने, जल भरने तथा खाद्य सामग्री लेने के लिए लंगर डाला करते थे | बाद में, वे वाणिज्यिक पत्तनों में विकसित हो गए | अदन, होनोलूलू तथा सिंगापुर इसके अच्छे उदाहरण हैं |    

       (ग.)      पैकेट स्टेशन (फेरी-पत्तन):

इन्हें फेरी पत्तन के नाम से भी जाना जाता है | ये पैकेट पत्तन विशेष रूप से छोटी दूरियों को ते करते हुए जलीय क्षेत्रों के आर पार डाक तथा यात्रियों के परिवहन (आवागमन) से जुड़े होते हैं | ये स्टेशन जोड़ों में इस तरह अवस्थित होते हैं कि वे जलीय क्षेत्र के आर पार एक दूसरे के सामने होते हैं | उदाहरणस्वरूप इंग्लिश चैनल के आर पार इंग्लैंड में डोवर तथा फ़्रांस में कैलाइस पत्तन हैं |  

      (घ.)      आन्त्रपो पत्तन :

ये वे एकत्रण केंद्र है, जहाँ विभिन्न देशों से निर्यात हेतु वस्तुएँ लाई जाती हैं | सिंगापुर एशिया के लिए एक आन्त्रपो पत्तन है | रोटरड़म यूरोप के लिए और कोपेनहेगेन बाल्टिक क्षेत्र के लिए आन्त्रपो पत्तन हैं | 

      (ङ.)      नौसेना पत्तन  :

ये केवल सामरिक महत्व के पत्तन हैं  ये पत्तन युद्धक जहाजों को सेवाएँ देते हैं तथा उनके लिए मरम्मत कार्यशालाएँ चलाते हैं | कोच्चि तथा कारवाड़ भारत में ऐसे पत्तनों के उदाहरण हैं |

व्यापारिक समूहों के निर्माण द्वारा राष्ट्रों को प्राप्त लाभ 

1.       इन व्यापारिक समूह सदस्य राष्ट्रों ने व्यापार शुल्क को हटकर मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया है |

2.       विश्व बाजार में देशों को एक व्यापारिक समूह के रूप में एक राष्ट्र की बजाय अधिक ताकत मिलती है |

3.       ये व्यापारिक समहू प्रादेशिक विशिष्टीकरण उत्पादन के उच्च स्तर, उच्च रहन सहन के स्तर, वस्तुओं व सेवाओं की विश्वव्यापी उपलब्धता, कीमतों और वेतन का समानीकरण, ज्ञान एवं संस्कृति के प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं  | 

 

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