अध्याय 8
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
कक्षा 12वीं (भूगोल)
मानव भूगोल के मूल सिद्धांत
व्यापार
व्यापार से तात्पर्य वस्तुओं और सेवाओं के
स्वैच्छिक आदान प्रदान से है | व्यापार के लिए दो पक्षों का होना आवश्यक है | एक
पक्ष बेचने वाला तथा दूसरा खरीदने वाला | व्यापार का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना
होता है | अत: व्यापार दोनों ही पक्षों के लिए लाभदायक होता है |
व्यापार के स्तर
व्यापार के दो स्तर है | राष्ट्रीय तथा
अंतर्राष्ट्रीय स्तर |
1. राष्ट्रीय व्यापार
एक
राष्ट्र की सीमाओं के अंतर्गत होने वाले वस्तुओं और सेवाओं के आदान प्रदान को
राष्ट्रीय व्यापार कहते है |
2. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
जब
वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान –प्रदान विभिन्न राष्ट्रों के बीच राष्ट्रीय सीमाओं के
आर-पार हो तो यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं |
राष्ट्रों कों व्यापार की आवश्यकता
राष्ट्रों कों व्यापार की आवश्यकता उन वस्तुओं
कों प्राप्त करने के लिए होती है जिन्हें या तो वे देश स्वयं उत्पादित नहीं कर
सकते या जिन्हें वे अन्य स्थान से कम दामों में खरीद सकते हैं |
वस्तु विनिमय
ऐसा व्यापार या विनिमय जिसमें लोग वस्तु के
बदले वस्तु का आदान प्रदान करते हैं | वस्तु विनिमय कहलाता है|
आदिम समाज में विनिमय व्यवस्था
आदिम समाज में व्यापार का आरम्भिक स्वरूप
‘विनिमय व्यवस्था’ था, जिसमें वस्तुओं का प्रत्यक्ष आदान –प्रदान होता था | अर्थात
वस्तु के बदले में रूपये (मुद्रा) के स्थान पर वस्तु दी जाती थी | इस व्यवस्था में
यदि आप एक कुम्हार होते और आपको एक
नालसाज़ की आवश्यकता होती, तो आपको एक ऐसा नालसाज़ ढूँढना पड़ता, जिसे आप
द्वारा बनाए हुए बर्तनों की आवश्यकता होती और आप उसकी नालसाज़ की सेवाओं के बदले अपने बर्तन देकर आदान –प्रदान कर सकते थे
|
भारत का एकमात्र वस्तु विनिमय मेला
हर जनवरी में फसल की कटाई की ऋतु के बाद
गुवाहाटी से 35 किलोमीटर दूर जागीरॉड में जॉन बील मेला लगता है
| संभवतः यह भारत का एकमात्र मेला है,
जहाँ विनिमय व्यवस्था आज भी जीवित है | इस मेले के दौरान एक बड़े बाज़ार की व्यवस्था
की जाती है और विभिन्न जनजातियों तथा समुदायों के लोग अपनी वस्तुओं का आदान –प्रदान
करते हैं |
कागज़ी व धात्विक मुद्रा के आगमन से पहले किस प्रकार की वस्तुएँ
मुद्रा के रूप में प्रयोग की जाती थी ?
रूपये अथवा मुद्रा के
आगमन के साथ ही विनिमय व्यवस्था की कठिनाइयों कों दूर कर लिया गया | पुराने समय में
कागज़ी व धात्विक मुद्रा के आगमन से पहले उच्च नैजमान मूल्य वाली दुर्लभ वस्तुओं
कों मुद्रा के रूप में प्रयुक्त किया जाता
था | जैसे –चकमक पत्थर, आब्सीडीयन, (आग्नेय काँच), काउरी शेल, चीते के पंजे, ह्वेल
के दाँत, कुत्ते के दाँत, खालें, बाल (फर) मवेशी, चावल, पैपर कार्न , नमक, छोटे
यंत्र, ताँबा, चाँदी और स्वर्ण आदि |
सैलरी (Salary)
सैलरी (Salary) शब्द लैटिन शब्द ‘सैलेरियम’ (Salarium) से बना है,
जिसका अर्थ है नमक के द्वारा भुगतान | क्योंकि उस समय समुद्र के जल से नमक बनाना
ज्ञात नहीं था और इसे केवल खनिज से बनाया जा सकता था, जो उस समय प्राय: दुर्लभ और
खर्चीला था | यही वजह कि यह भुगतान का एक माध्यम बना |
अंतर्राष्ट्रीय
व्यापार का इतिहास
प्राचीन काल से
वर्तमान तक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के इतिहास कों हम निम्न तथ्यों की सहायता से
समझ सकते हैं |
(i)
प्राचीन समय में, लम्बी दूरियों तक वस्तुओं का
परिवहन जोखिमपूर्ण होता था, इसलिए व्यापार स्थानीय बाज़ारों तक ही सीमित था | लोग
तब अपने संसाधनों का अधिकाँश भाग मूलभूत आवश्यकताओं- भोजन और वस्त्र पर खर्च करते
थे | केवल धनी लोग ही आभूषण व महंगे परिधान खरीदते थे, और परिणामस्वरूप विलास की
वस्तुओं का व्यापार आरम्भ हुआ |
(ii)
रेशम मार्ग लम्बी दूरी के व्यापार का एक
आरम्भिक उदाहरण है, जो 6,000
किलोमीटर लंबे मार्ग के सहारे रोम को चीन से जोड़ता था | व्यापारी भारत, पर्शिया
(ईरान) और मध्य एशिया के मध्यवर्ती स्थानों से चीन में बने रेशम, रोम की ऊन, व
बहुमूल्य धातुओं तथा अन्य अनेक महंगी वस्तुओं का परिवहन करते थे |
(iii)
रोमन साम्राज्य के विखंडन के बाद 12वीं
और 13वीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय वाणिज्य में वृद्धि हुई |
समुद्रगामी युद्धपोतों के विकास के साथ ही यूरोप तथा एशिया के बीच व्यापार बढ़ा तथा
अमेरिका की खोज हुई |
(iv)
15वीं शताब्दी से ही यूरोपीय उपनिवेशवाद शुरू हुआ और विदेशी वस्तुओं के साथ
व्यापार के साथ ही व्यापार के एक नए स्वरूप का उदय हुआ, जिसे ‘दास व्यापार’ कहा
गया | पुर्तगालियों, डचों, स्पेनिश लोगों व अंग्रेजों ने अफ़्रीकी मूल निवासियों को
पकड़ा और उन्हें बलपूर्वक, बागानों में श्रम हेतु नए खोजे गए अमेरिका में परिवहित
किया गया | दास व्यापार दो सौ वर्षों से भी अधिक समय तक एक लाभ दायक व्यापार रहा
जब तक कि यह 1792 में डेनमार्क में, 1807 में ग्रेट ब्रिटेन में और 1808 में संयुक्त राज्य
में पूर्णरूपेण समाप्त नहीं कर दिया गया |
(v)
औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात कच्चे माल जैसे –
अनाज, माँस, ऊन की माँग भी बढ़ी, लेकिन विनिर्माण की वस्तुओं की तुलना में उनका
मौद्रिक मूल्य घट गया |
(vi)
औद्योगिकृत राष्ट्रों ने कच्चे माल के रूप में
प्राथमिक उत्पादों का आयात किया और मूल्यपरक तैयार माल को वापस अनौद्योगिकृत
राष्ट्रों को निर्यात कर दिया |
(vii)
19
वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादन करने
वाले प्रदेश अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहे और औद्योगिक राष्ट्र एक दूसरे के मुख्य
ग्राहक बन गए |
(viii) प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पहली बार राष्ट्रों ने व्यापार कर और संख्यात्मक प्रतिबंध लगाए | विश्व युद्ध के बाद के समय के दौरान ‘व्यापार व शुल्क हेतु सामान्य समझौता’ (GATT) जैसे संस्थानों ने शुल्क को घटाने में सहायता की | यही GATT बाद में विश्व व्यापार संगठन WTO बना |
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अस्तित्व में क्यों है?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उत्पादन में विशिष्टीकरण का परिमाण
है | यह विश्व की अर्थव्यवथा कों लाभान्वित करता है, यदि विभिन्न राष्ट्र वस्तुओं
के उत्पादन या सेवाओं की उपलब्धता में श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण कों प्रयोग में
लाए | हर प्रकार का विशिष्टीकरण व्यापार कों जन्म दे सकता है |
इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
वस्तुओं और सेवाओं के तुलनात्मक लाभ, परिपूरकता व हस्तांतरणीयता के सिद्धांतों पर
आधारित होता है और सिद्धांत: यह व्यापारिक भागीदारों कों समान रूप से लाभदायक होना
चाहिए |
आधुनिक समय में व्यापार विश्व के
आर्थिक संगठन का आधार है और यह राष्ट्रों की विदेश नीति से संबंधित है | सुविकसित
परिवहन तथा संचार प्रणाली से युक्त कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में
भागीदारी से मिलने वाले लाभों कों छोड़ने का इच्छुक नहीं है |
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार निम्नलिखित लिखित हैं |
(1) राष्ट्रीय
संसाधनों में भिन्नता :
भौतिक संरचना जैसे कि भूविज्ञान, उच्चावच, मृदा व जलवायु
में भिन्नता के कारण विश्व के राष्ट्रीय संसाधन असमान रूप से वितरित हैं | जो
निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |
(क) भौगोलिक संरचना खनिज संसाधन आधार कों निर्धारित करती
है और धरातलीय विभिन्ताएँ फसलों व पशुओं की विविधता सुनिश्चित करती हैं | निम्न
भूमियों में कृषि –संभाव्यता अधिक होती है | पर्वत पर्यटकों कू आकृषित करते हैं और
पर्यटन कों बढ़ावा देते हैं |
(ख) खनिज संसाधन संपूर्ण विश्व में असमान रूप से वितरित
हैं | खनिज संसाधनों की उपलब्धता औद्योगिक विकास कों आधार प्रदान करती है |
(ग) जलवायु किसी दिए हुए क्षेत्र में जीवित रह जाने वाले
पादप व वन्य जात के प्रकार कों प्रभावित करती है | यह विभिन्न उत्पादों की विविधता
कों भी सुनिश्चित करती है, उदाहरणत: ऊन उत्पादन ठंडे क्षेत्रों में ही हो सकता है
| केला, रबड़ तथा कहवा उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ही उग सकते हैं |
(2) जनसँख्या कारक :
विभिन्न देशों में जनसँख्या संबंधी
कारक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कों प्रभावित करते हैं | जैसे- जनसँख्या के आकार,
वितरण तथा उसकी विविधता व्यापार की गई वस्तुओं के प्रकार और मात्रा कों प्रभावित
करते हैं | कुछ जनसँख्या कारक निम्नलिखित हैं |
(क) सांस्कृतिक कारक:
विशष्ट संस्कृतियों में कला तथा
हस्तशिल्प के विभिन्न रूप विकसित हुए हैं जिन्हें विश्व –भर में सराहा जाता है |
उदाहरण के रूप में चीन द्वारा उत्पादित उत्तम कोटि का प[र्सलिन (चीनी मिट्टी के
बर्तन) तथा ब्रोकेड (किमखाब –जरीदार या बूटेदार कपड़ा) | ईरान के कालीन प्रसिद्ध हैं | जबकि उत्तरी अमेरिका का चमड़े का काम और
इण्डोनेशियाई बटीक (छींट वाला) वस्त्र बहुमूल्य हैं |
(ख ) जनसँख्या का आकार:
सघन बसाव वाले क्षेत्रों में आंतरिक
व्यापार अधिक है जबकि बाह्य व्यापार कम परिमाण वाला होता है, क्योंकि कृषीय और
औद्योगिक उत्पादों का अधिकाँश भाग स्थानीय बाजारों में ही खप जाता है | जनसँख्या
का जीवन स्तर बेहतर गुणवत्ता वाले आयातित उत्पादों की माँग कों निर्धारित करता है
क्योंकि निम्न जीवन स्तर के साथ केवल कुछ लोग ही महंगी आयातित वस्तुएँ खरीद पाने
में समर्थहोते हैं |
(3) आर्थिक विकास की
प्रावस्था:
देशों के आर्थिक विकास की विभिन्न
अवस्थाओं में व्यापार की गई वस्तुओं का स्वभाव (प्रकार) परिवर्तित हो जाता है | कृषि
की दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों में, विनिर्माण की वस्तुओं के लिए कृषि उत्पादों का
विनिमय किया जाता है, जबकि औद्योगिक राष्ट्र मशीनरी और निर्मित उत्पादों का
निर्यात करते हैं तथा खाद्यान तथा अन्य कच्चे पदार्थों का आयात करते हैं |
(4) विदेशी निवेश की
सीमा:
विदेशी निवेश विकासशील देशों में
व्यापार कों बढ़ावा दे सकता है जिनके पास खनन,प्रवेधन द्वारा तेल –खनन, भारी अभियांत्रिकी,
काठ कबाड तथा बागवानी कृषि के लिए आवश्यकपूँजी का अभाव है | विकासशील देशों में
ऐसे पूँजी प्रधान उद्योगों के विकास द्वारा औद्योगिक राष्ट्र खाद्य पदार्थों,
खनिजों का आयात सुनिश्चित करते हैं तथा अपने निर्मित उत्पादों के लिए बाज़ार
निर्मित करते हैं | यह सम्पूर्ण चक्र देशों के बीच में व्यापार के परिमाण कों आगे
बढाता है |
(5) परिवहन : पुराने समय में परिवहन के पर्याप्त और समुचित साधनों का अभाव
स्थानीय क्षेत्रों में व्यापार कों प्रतिबंधित करता था | केवल उच्च मूल्य वाली
वस्तुओं, जैसे रत्न, रेशम तथा मसाले का लम्बी दूरियों तक व्यापार किया जाता था |
रेल, समुद्री तथा वायु परिवहन के विस्तार और प्रशीतन तथा परिरक्षण के बेहतर साधनों
के साथ, व्यापार ने स्थानिक विस्तार का अनुभव किया है |
व्यापार संतुलन
व्यापार संतुलन, एक देश के द्वारा अन्य
देशों कों आयात एवं इसी प्रकार निर्यात की गई वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा
(परिमाण) का प्रलेखन करता है | व्यापार संतुलन दो प्रकार का होता है |
ऋणात्मक व्यापार संतुलन :
यदि
आयात की गई वस्तुओं का कुल मूल्य देश की निर्यात की गई वस्तुओं के मूल्य की
अपेक्षा अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन ऋणात्मक अथवा प्रतिकूल होता है |
धनात्मक व्यापार संतुलन :
यदि निर्यात की गई वस्तुओं का मूल्य,
आयात की गई वस्तुओं के मूल्य की तुलना में अधिक है तो देश का व्यापार संतुलन
धनात्मक अथवा अनुकूल होता है |
व्यापार संतुलन का महत्व
एक देश की आर्थिकी (अर्थव्यवस्था) के लिए व्यापार संतुलन
एवं भुगतान संतुलन के गम्भीर निहितार्थ होते हैं | एक ऋणात्मक संतुलन का अर्थ होगा
कि देश वस्तुओं के क्रय (खरीद) पर उससे
अधिक व्यय करता है जितना कि अपने सामानों के विक्रय (बेचने) से अर्जित करता है |
यह अंतिम रूप में वित्तीय संचय की समाप्ति कों अभिप्रेरित करता है |
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रकार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कों दो प्रकार में
वर्गीकृत किया जा सकता है | द्विपार्श्विक व्यापार तथा बहु पार्श्विक व्यापार |
द्विपार्श्विक व्यापार:
द्विपार्श्विक व्यापार दो देशों के
द्वारा एक दूसरे के साथ किया जाता है | दो देश आपस में निर्दिष्ट वस्तुओं का
व्यापार करने के लिए सहमति करते हैं | उदाहरण के लिए देश “क” कुछ कच्चे पदार्थ के
व्यापार के लिए इस समझौते के साथ सहमत हो सकता है कि देश “ख” कुछ अन्य निर्दिष्ट
सामग्री खरीदेगा अथवा स्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है |
बहु पार्श्विक
व्यापार :
जैसा कि शब्द
से स्पष्ट होता है कि बहु पार्श्विक व्यापार बहुत से व्यापारिक देशों के साथ किया
जाता है | वही देश अन्य अनेक देशों के साथ व्यापार कर सकता है | देश कुछ व्यापारिक
साझेदारों कों सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (Most Favoured Nation -MFN)
की स्थिति प्रदान कर सकता है |
मुक्त
व्यापार की स्थिति (मुक्त व्यापार के विकासशील देशों पर प्रभाव)
व्यापार हेतु
अर्थव्यवस्था कों खोलने का कार्य मुक्त व्यापार अथवा व्यापार उदारीकरण के रूप में
जाना जाता है |
यह कार्य
व्यापारिक अवरोधों जैसे सीमा शुल्क कों घटाकर किया जाता है | घरेलू उत्पादों एवं
सेवाओं से प्रतिस्पर्धा करने के लिए व्यापार उदारीकरण सभी स्थानों से वस्तुओं और
सेवाओं के लिए अनुमति प्रदान करता है |
भूमंडलीकरण और मुक्त
व्यापार का विकासशील देशों पर प्रभाव
भूमंडलीकरण
और मुक्त व्यापार विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं कों उन पर प्रतिकूल थोपते हुए
तथा विकास के समान अवसर न देकर बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं | परिवहन एवं
संचार तंत्र के विकास के साथ ही वस्तुएँ एवं सेवाएँ पहले की अपेक्षा तीव्रगति से
एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच सकती है | किन्तु मुक्त व्यापार कों केवल संपन्न
देशों के द्वारा ही बाजारों की ओर नहीं ले
जाना चाहिए , बल्कि विकसित देशों कों चाहिए कि वे अपने स्वयं के बाजारों कों
विदेशी उत्पादों से संरक्षित रखें | विकासशील देशों कों भी डंप की गई वस्तुओं से
सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि मुक्त व्यापार के साथ इस प्रकार की सस्ते
मूल्य की डंप की गई वस्तुएँ घरेलू उत्पादकों कों नुकसान पहुँचा सकती है |
डंप करना :
लागत की दृष्टि से
नहीं वरन भिन्न –भिन्न कारणों से अलग –अलग कीमत की किसी वस्तु कों दो देशों में
विक्रय करने (बेचने) की प्रथा डंप करना कहलाती है |
विश्व
व्यापार संगठन
1948
में विश्व को उच्च सीमा शुल्क और विभिन्न प्रकार की अन्य बाधाओं से
मुक्त कराने हेतु कुछ देशों द्वारा जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ (GATT) का गठन किया गया | 1994 में सदस्य देशों के द्वारा
राष्ट्रों के बीच मुक्त एवं निष्पक्ष व्यापार को बढ़ा प्रौन्नत करने के लिए एक
स्थाई संस्था के निर्माण का निश्चय किया गया तथा जनवरी 1995 में
(GATT) को विश्व व्यापार संगठन (WTO)
में रूपांतरित कर दिया गया |
विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय जिनेवा (स्विटजरलैंड) में
स्थित है | 2024
में 166 देश विश्व व्यापार संगठन के सदस्य थे
|
भारत विश्व व्यापार संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक
रहा है |
विश्व व्यापार संगठन के कार्य
विश्व व्यापार संगठन एकमात्र ऐसा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है
जो राष्ट्रों के मध्य वैश्विक नियमों का
व्यवहार करता है |
यह विश्वव्यापी व्यापार तंत्रों के लिए नियमों को नियत
करता है और इसके सदस्य देशों के मध्य विवादों का निपटारा करता है |
विश्व व्यापार संगठन दूरसंचार और बैंकिंग जैसी सेवाओं तथा
अन्य विषयों जैसे बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार को भी अपने कार्यों में सम्मलित
करता है |
विश्व व्यापार संगठन की आलोचना या विरोध
उन लोगों के द्वारा विश्व व्यापार संगठन की आलोचना एवं
विरोध किया गया है जो मुक्त व्यापार और अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के प्रभावों से
परेशान हैं | इस पर तर्क किया गया है कि मुक्त व्यापार आम लोगों को अधिक संपन्न
नहीं बनाता | धनी देशों को और अधिक धनीबनाकर यह वास्तव में गरीब और अमीर के बीच की
खाई को बढ़ा रहा है | ऐसा इसलिए है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन में प्रभावशाली
राष्ट्रकेवल अपने वाणिज्यिक हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं |
इसके अतिरिक्त अनेक विकसित देशों ने अपने बाजारों को
विकासशील देशों के उत्पादों के लिए पूरी तरह नहीं खोल है| यह भी तर्क दिया जाता है
कि स्वास्थ्य, श्रमिकों के अधिकार, बल श्रम और पर्यावरण जैसे मुद्दों की उपेक्षा
की गई है |
प्रादेशिक व्यापार समूह
प्रादेशिक व्यापार समूह व्यापार की मदों में भौगोलिक
सामीप्य समरूपता और पूरकता के साथ देशों के मध्य व्यापार कों बढ़ाने एवं विकासशील
देशों के व्यापार पर लगे प्रतिबंध कों हटाने के उद्देश्य से अस्तित्व में आए हैं |
आज 120 प्रादेशिक व्यापार समूह विश्व के 52 प्रतिशत व्यापार का जनन करते हैं | इन व्यापार समूहों का विकास अंतत:
प्रादेशिक व्यापार कों गति देने में वैश्विक संगठनों के असफल होने के प्रत्युतर
में हुआ है |
यद्यपि
ये प्रादेशिक समूह सदस्य राष्ट्रों में व्यापार शुल्क कों हटा देते हैं तथा मुक्त
व्यापार को बढ़ावा देते हैं लेकिन भविष्य में विभिन्न व्यापारिक समूहों के बीच
मुक्त व्यापार का बने रहना कठिन होता जा रहा है | कुछ प्रमुख प्रादेशिक व्यापार
समूह निम्नलिखित है | ASEAN
(आसियान), E.U. (यूरोपियन
यूनियन या यूरोपीय संघ), NAFTA (नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड
एसोसिएशन), OPEC(ऑर्गनाइजेशन ऑफ पैट्रोलियम
एक्सपोर्टिंग कंट्रीज) तथा SAFTA (साऊथ
एशियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) आदि |
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित मामले (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ तथा हानियाँ )
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का होना राष्ट्रों के लिए
पारस्परिक लाभदायक होता है, यदि यह प्रादेशिक विशिष्टीकरण, उत्पादन के उच्च स्तर,
रहन सहन के स्तर, वस्तुओं और सेवाओं की विश्वव्यापी उपलब्धता, कीमतों और वेतन का
समानीकरण, ज्ञान एवं संस्कृति के प्रस्फुरण कों प्रेरित करता है |
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की हानियाँ
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार देशों के लिए हानिकारक हो सकता है
यदि यह अन्य देशों पर निर्भरता, विकास के
असमान स्तर, शोषण और युद्ध का कारण बनने वाली प्रतिद्वंद्विता की ओर उन्मुख है |
विश्वव्यापी व्यापार जीवन के अनेक पक्षों कों प्रभावित
करते हैं |
यह सारे विश्व में पर्यावरण से लेकर
लोगों के स्वास्थ्य एवं कल्याण इत्यादि कों प्रभावित कर सकता है | जैसे-जैसे देश अधिक
व्यापार के लिए प्रतिस्पर्धी बनते जा रहे हैं, उत्पादन के साधनों और प्राकृतिक
संसाधनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है | जिससे
संसाधनों के नष्ट होने की दर उनके पुनर्भरण की दर से तीव्र होती है | परिणाम
स्वरूप समुद्री जीवन भी तीव्रता से नष्ट हो रहा है, वन काटे जा रहे हैं और नदी बेसिन निजी पेय जल कम्पनियों को बेचे जा
रहे हैं |
तेल गैस खनन, औषधि विज्ञान और कृषि
व्यवसाय में संलग्न बहुराष्ट्रीय निगम और अधिक प्रदूषण उत्पन्न करते हुए हर कीमत
पर अपने कार्यों कों बढ़ाए रखती है –उनके कार्य करने की प्रगति सतत पोषणीय विकास के
मानकों का अनुसरण नहीं करती |
यदि संगठन केवल लाभ बनाने की ओर उन्मुख
रहते है और पर्यावर्णीय तथा स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर ध्यान नहीं देते तो भविष्य
के लिए इसके गहरे निहितार्थ हो सकते हैं |
पत्तन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रवेश द्वार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दुनिया के मुख्य प्रवेश द्वार
पोताश्रय तथा पत्तन होते हैं | समझ सकते हैं |
(i)
इसे हम निम्न प्रकार से इन्हीं पत्तनों के
द्वारा जहाजी माल तथा यात्री विश्व के एक भाग से दूसरे भाग कों जाते हैं |
(ii)
पत्तन जहाज के लिए गोदी, लादने, उतारने तथा
भंडारण हेतु सुविधाएँ प्रदान करते हैं |
(iii)
इन सुविधाओं कों प्रदान करने के उद्देश्य से
पतन के प्राधिकारी नौगम्य द्वारों का रख –रखाव,रस्सों की व्यवस्था व बजरों (छोटी अतिरिक्त नौकाओं ) की
व्यवस्था करने और श्रम एवं प्रबंधकीय
सेवाओं कों उपलब्ध कराने की व्यवस्था करते हैं |
(iv)
एक पत्तन के महत्व कों नौभर के आकार और निपटान
किए गए जहाज़ों की संख्या द्वारा निश्चित किया जाता है | एक पत्तन द्वारा निपटाया
नौभार,उसके पृष्ठ प्रदेश के विकास के स्तर का सूचक है |
पत्तन के वर्गीकरण के आधार
सामान्यत: पत्तनों का वर्गीकरण उनके द्वारा संभाले गए
यातायात (निपटाए गए नौ भार), अवस्थिति और विशिष्टकृत कार्यकलाप के आधार पर किया
जाता है |
निपटाए गए नौभार के आधार पर पत्तनों के प्रकार
(1) औद्योगिक पत्तन
ये पत्तन थोक नौभार के लिए विशेषीकृत होते हैं | जैसे
अनाज, चीनी, अयस्क, तेल, रसायन और इसी प्रकार के पदार्थ |
(2) वाणिज्यिक पत्तन
ये पत्तन सामान्य नौभार संवेष्टित उत्पादों तथा विनिर्मित वस्तुओं का निपटान करते हैं | ये
पत्तन यात्री –यातायात का भी प्रबंध करते हैं |
(3) विस्तृत पत्तन
ये
पत्तन बड़े परिमाण में सामान्य नौभार का थोक में प्रबंध करते हैं | संसार के
अधिकाँश महान पत्तन विस्तृत पत्तनों के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं |
अवस्थिति के आधार पर पत्तनों के प्रकार
अवस्थिति के आधार पर पत्तन दो प्रकार के होते है |
अंतर्देशीय पत्तन तथा बाह्य पत्तन | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
(1) अंतर्देशीय पत्तन:
ये
पत्तन समुद्री तट से दूर अवस्थित होते हैं | ये समुद्र से एक नदी अथवा नहर द्वारा
जुड़े होते हैं | ऐसे पत्तन चौरस तल वाले जहाज या बजरे द्वारा ही गम्य होते हैं |
उदाहरण स्वरूप मानचेस्टर एक नहर से जुड़ा है | मेम्फिस मिसिसिपी नदी पर स्थित है , राइन नदी के अनेक पत्तन हैं
जैसे –मैनहीम और ड्यूसबर्ग | इसी प्रकार कोलकाता हुगली नदी जो गंगा नदी की एक शाखा
है उस पर स्थित है |
(2) बाह्य पत्तन:
ये
गहरे जल के पत्तन हैं जो वास्तविक पत्तन से दूर बने होते हैं | ये उन जहाजों कों
सेवाएँ प्रदान करते हैं जो अपने बड़े आकार के कारण पैतृक पत्तन तक पहुँचने में
अक्षम है, इन पत्तनों से नौ परिवहन ग्रहण करके पैतृक पत्तनों कों पहुँचाया जाता है
तथा पैतृक पत्तन से इन पत्तनों तक पहुँचाया जाता है | इस प्रकार ये पत्तन अपनी सेवाएँ
प्रदान करते हैं | उदाहरण स्वरूप एथेंस
तथा यूनान में इसके बाह्य पत्तन पिरेइअस एक उच्च कोटि का संयोजन है |
विशिष्टीकृत कार्यकलापों के आधार पर पत्तनों
के प्रकार
विशिष्टीकृत कार्यों के आधार पर पत्तनों के निम्नलिखित
प्रकार हैं |
(1) तैल पत्तन:
ये पत्तन तेल के प्रक्रमण और नौ –परिवहन
का कार्य करते हैं | तैल पत्तन दो प्रकार के होते है | इनमें से कुछ टैंकर पत्तन
हैं तथा कुछ तेल शोधन पत्तन हैं | वेनेजुएला में माराकाइबो, ट्यूनीशिया में
ऐस्सखीरा, लेबनान में त्रिपोली टैंकर पत्तन हैं | जबकि पर्शिया की खाड़ी पर अबादान
एक तेल शोधन पत्तन हैं |
(2) समुद्री मार्ग पत्तन
(विश्राम पत्तन):
ये ऐसे पत्तन हैं, जो जो मूल रूप से
मुख्य समुद्री मार्गों पर विश्राम केन्द्र के रूप में विकसित हुए हैं | जहाँ पर
जहाज पुन: ईंधन भरने, जल भरने तथा खाद्य सामग्री लेने के लिए लंगर डाला करते थे |
बाद में, वे वाणिज्यिक पत्तनों में विकसित हो गए | अदन, होनोलूलू तथा सिंगापुर
इसके अच्छे उदाहरण हैं |
(3) पैकेट पत्तन:
पैकेट पत्तनों कों फेरी –पत्तन के नाम
से भी जाना जाता है | ये पैकेट स्टेशन विशेष रूप से छोटी दूरियों कों तय करते हुए
जलीय क्षेत्रों के आर –पार डाक तथा यात्रियों के परिवहन (आवागमन) से जुड़े होते हैं
| ये स्टेशन जोड़ों में इस प्रकार अवस्थित होते हैं कि वे जलीय क्षेत्र के आर पार
एक दूसरे के सामने होते हैं | उदाहरणस्वरूप –इंग्लिश चैनल के आरपार इंग्लैंड में
डोवर तथा फ्रांस में कैलाइस पत्तन हैं |
(4) आंत्रपो पत्तन:
ये पत्तन वे एकत्रण केन्द्र हैं जहाँ विभिन्न देशों से
निर्यात हेतु वस्तुएँ लाई जाती हैं | सिंगापुर एशिया के लिए एक आंत्रपो पत्तन है,
रोटरडम यूरोप के लिए और कोपेनहेगन बाल्टिक क्षेत्रों के लिए आंत्रपो पत्तन हैं |
(5) नौ सेना पत्तन:
नौ सेना पत्तन केवल सामरिक महत्व के
पत्तन हैं ये पत्तन युद्धक जहाज़ों कों सेवाएँ देते हैं तथा उनके लिए मरम्मत
कार्यशालाएँ चलाते हैं | कोच्चि तथा कारवाड भारत में ऐसे ही पत्तनों के उदाहरण हैं
|
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