अध्याय 4
महासागरों और
महाद्वीपों का वितरण
(Distribution of Oceans and Continents)
(भौतिक भूगोल के मूल
सिद्धांत ) कक्षा -11
प्रश्न : निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के
साथ स्थित होने की सम्भावना व्यक्त की ?
उत्तर
: अब्राहम ऑरटेलियस (Abraham Ortelius)
प्रश्न : पोलर फ्लीइंग बल (ध्रुवीय फ्लीइंग बल) निम्नलिखित में से
किससे संबंधित है ?
|
क.
पृथ्वी का परिक्रमण |
ख.
पृथ्वी का घूर्णन |
|
|
ग.
गुरुत्वाकर्षण |
घ.
ज्वारीय बल |
|
|
|
|
|
उत्तर
: पृथ्वी का घूर्णन
इनमें से कौन सी लघु प्लेट नहीं है ?
|
क).
नजका |
ख).
फिलिपिन |
ग).
अरब |
घ).
अंटार्कटिक |
उतर
: अंटार्कटिक
प्रश्न : सागरीय अधस्थल
विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हैस ने निम्न में से किस अवधारणा पर विचार
नहीं किया ?
क).
मध्य महासागरीय
कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ |
ख).
महासागरीय नितल की
चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना |
ग).
विभिन्न
महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण |
घ).
महासागरीय तल की
चट्टानों की आयु |
उतर
: विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण |
प्रश्न : हिमालय पर्वतों के साथ
भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है ?
|
क).
महासागरीय - महाद्वीपीय अभिसरण |
ख).
अपसारी सीमा |
|
ग).
रूपान्तरण सीमा |
घ).
महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभिसरण |
उतर
: महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभिसरण
प्रश्न : महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख
किया है ?
उतर
: महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने
जिन बलों का उल्लेख किया है वे निम्नलिखित है |
क).
पोलर फ्लीइंग बल (ध्रुवीय
फ्लीइंग बल)
यह बल पृथ्वी के घूर्णन से
संबंधित है | पृथ्वी भूमध्य रेखा पर उभरी
हुई है जो ध्रुवीय फ्लीइंग बल के कारण ही है |
ख).
ज्वारीय बल
यह बल सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से संबंधित
है | जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते है |
प्रश्न : मेंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने तथा बने रहने के क्या
कारण है ?
उतर
: पृथ्वी की मेंटल परत में रेडियों एक्टिव (रेडियोधर्मी) पदार्थों
से उत्पन्न ताप में भिन्नता पाई जाती है | इसी ताप भिन्नता के कारण ही मेंटल में
संवहन धाराएँ आरम्भ होती है और लगातार बनी
रहती है | आर्थर होम्स के अनुसार इस तरह
की संवहन धाराएँ पुरे मेंटल परत में विद्यमान है |
प्रश्न : प्लेट की रूपान्तरण सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा में
मुख्य अन्तर क्या है ?
अथवा
प्लेट संचरण के फलस्वरूप भूगर्भीय प्लेट सीमाओं का चित्र सहित वर्णन कीजिए
|
उत्तर
: प्लेटों के संचरण के अनुसार प्लेट सीमाएं तीन प्रकार की होती हैं | रूपान्तरण सीमा,
अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा इनका वर्णन निम्न प्रकार से है |
रूपान्तर
सीमा ( Transform Boundaries):
जब दो प्लेटें एक दूसरे के क्षैतिज दिशा में गति
करती है तो उन दोनों प्लेटों के बीच की
सीमा कों रूपांतर सीमा कहते है | इन प्लेटों के द्वारा न तो नई पर्पटी निर्माण
होता है और न ही विनाश क्योंकि इन सीमा पर प्लेटें एक दूसरे के साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती है | इन्हें संरक्षी
प्लेट सीमा भी कहते है | रूपांतरण भ्रंश (Transform faults) दो प्लेटों को अलग करने वाला तल है जो सामान्यत: मध्य महासागरीय कटकोण से
लम्बवत स्थिति में पाए जाते हैं | क्योंकी कटकों के शीर्ष पर एक ही समय में सभी
स्थानों पर ज्वालामुखी उद्गार नहीं होता,
ऐसे में पृथ्वी के अक्ष से दूर प्लेट के हिस्से गति करने लगते हैं | इसके अतिरिक्त
पृथ्वी के घूर्णन का भी प्लेट के अलग –अलग खंडों पर भिन्न प्रभाव पड़ता है |
चित्र : रूपान्तर सीमा
अभिसरण
सीमा (Convergent Boundaries):
जब
दो प्लेटें एक दूसरे के निकट आती है तो उन दोनों प्लेटों के बीच की सीमा कों
अभिसारी सीमा कहते है | एक दूसरे के निकट आने
पर इन प्लेटों के किनारों का विनाश होता है | क्योंकि एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँस जाती
है और टूट जाती है | इन प्लेटों कों इसलिए
विनाशकारी प्लेटें भी कहते है | वह स्थान जहाँ से प्लेटें धँसती हैं, प्रविष्ठन
क्षेत्र (Subduction zone) भी कहते है | प्लेटों का अभिसरण तीन प्रकार से हो सकता है | (1)
महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेटों के बीच
अभिसरण, (2) दो महासागरीय प्लेटों के बीच अभिसरण
तथा (3) दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच अभिसरण |
चित्र : अभिसरण सीमा
अपसारी
सीमा (Divergent Boundaries ):
जब दो प्लेटें एक दूसरे के विपरीत दिशा में गति करती है तो उन दोनों प्लेटों के बीच की सीमा कों अपसारी सीमा कहते है | एक दूसरे से दूर जाने पर इन प्लेटों के बीच नई पर्पटी का निर्माण होता है | इन प्लेटों कों इसलिए रचनात्मक प्लेटें भी कहते है | वह स्थान जहाँ से प्लेट एक दूसरे से दूर हटती हैं, इन्हें प्रसारी स्थान (Spreading Site) भी कहा जाता है | अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है | यहाँ से अमेरिकी प्लेटें (उत्तर अमेरिकी तथा दक्षिणी अमेरिकी प्लेटें) तथा यूरेशियन व अफ्रीकी प्लेटें अलग हो रही हैं |
चित्र : अपसारी सीमा
प्रश्न : दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थल खंड की स्थिति क्या थी ?
उत्तर
: दक्कन ट्रैप का निर्माण आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ | इस
समय भारतीय स्थल खंड
भूमध्य रेखा के निकट स्थित था | यह
भूमध्य रेखा के दक्षिण में था |
प्रश्न : पृथ्वी के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीप (स्थल ) है ?
उत्तर
: 29
प्रतिशत
प्रश्न : पृथ्वी के कितने प्रतिशत भाग पर महासागर (जल ) है ?
उत्तर
: 71
प्रतिशत
प्रश्न : अब्राहम ऑरटेलियस कौन थे ?
उत्तर
: अब्राहम ऑरटेलियस एक डच मानचित्रवेता थे जिन्होंने सन् 1596
में सर्वप्रथम यह सम्भावना
व्यक्त की थी कि उत्तर और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीका एक साथ जुड़े हुए थे
|
प्रश्न : किस विद्वान ने उत्तर और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीका महाद्वीपों
कों अपने मानचित्र में इकट्ठा दिखाया था ?
उत्तर
: एन्टोनियो पैलेग्रीनी (
Antonio Pellegrini )
प्रश्न : महाद्वीपीय विस्थापन
सिद्धांत कब और किसने दिया ?
उत्तर
: सन् 1912 में जर्मन मौसमविद अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegner)
ने |
प्रश्न : महाद्वीपीय विस्थापन
सिद्धांत किससे संबंधित है ?
उत्तर
: महाद्वीपों और महासागरों के वितरण से
प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े बड़े भू खंड कों
क्या माना था ?
उत्तर
: पेंजिया
प्रश्न : पेंजिया का क्या अर्थ है ?
उत्तर
:संपूर्ण पृथ्वी
प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े बड़े भू खंड
कों चारों ओर से घेरे हुए विशाल महासागर
कों क्या माना था ?
उत्तर
: पैन्थालासा
प्रश्न : पैन्थालासा का क्या अर्थ है ?
उत्तर
: पैन्थालासा का अर्थ है जल ही जल |
प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार
पेंजिया का विभाजन कब हुआ ?
उत्तर
: लगभग 20
करोड़ वर्ष पहले |
प्रश्न : अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार
पेंजिया का विभाजन किन दो बड़े महाद्वीपों के रूप में हुआ ?
उत्तर
: लारेसिया (Laurasia
) : यह उत्तरी भूखंड के नाम से जाना जाता है |
गोंडवानालैंड
(Gondwana
land ) : यह दक्षिणी भू खंड
के नाम से जाना जाता है |
प्रश्न : लारेसिया (Laurasia ) तथा गोंडवानालैंड (Gondwana land ) के बीच कौन से
सागर की उत्पत्ति हुई ?
उत्तर
: टेथिस सागर
प्रश्न : कंप्यूटर प्रोग्राम
की सहायता से अटलांटिक (अंध महासागर ) के तटों कों जोड़ते हुए मानचित्र कब और किसने तैयार किया ?
उत्तर
: सन् 1964 में बुलर्ड (Bullard)
प्रश्न : टिलाइट (Tillite) क्या
है ?
उत्तर
:टिलाइट वे अवसादी चट्टानें है जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती है |
प्रश्न : संवहन धारा सिद्धांत (Conventional
Current Theory) कब और किसने प्रतिपादित किया ?
उत्तर :
1930 के दशक में आर्थर होम्स (Arthur Homes) ने |
प्रश्न : गहराई व उच्चावच के प्रकार के आधार पर महासागरीय तल कों कितने
प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है ? उनके नाम बताओ |
उत्तर
: गहराई व उच्चावच के प्रकार के आधार पर
महासागरीय तल कों तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है |
1. महाद्वीपीय
सीमा
2. गहरे
समुद्री बेसिन
3. मध्य-
महासागरीय कटक
प्रश्न : महाद्वीपीय सीमा से
आप क्या समझते है ? इसमें महासागरीय तल की कौन कौन से भाग शामिल है ?
उत्तर
: महासागरीय तल वह
भाग जो महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच होता है महाद्वीपीय सीमा
कहलाता है | इसके अंतर्गत निम्नलिखित भाग शामिल किए जाते है |
1. महाद्वीपीय
मग्नतट
2. महाद्वीपीय
ढाल
3. महाद्वीपीय
उभार
4. गहरी
महासागरीय खाइयाँ
प्रश्न : वितलीय मैदान
से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
: महासागरीय तल के विस्तृत मैदान भाग जो
महाद्वीपीय तटों और मध्य महासागरीय कटकों
के बीच स्थित है उसे वितलीय मैदान कहते है |
इन्हें गहरे समुद्री बेसिन समुद्री बेसिन भी कहते है | वितलीय मैदान वह क्षेत्र है जहाँ महाद्वीपों से
बहाकर लाए गए अवसाद इनके तटों से दूर निक्षेपित होते है |
प्रश्न : मध्य- महासागरीय कटक
किसे कहते है ?
उत्तर: मध्य- महासागरीय कटक आपस में जुड़े हुए पर्वतों की एक श्रंखला है जो
महासागरीय जल में डूबी हुई है | ये मध्य-
महासागरीय कटक पृथ्वी के धरातल पर पाई
जाने वाली सबसे बड़ी पर्वत श्रंखला है | ये ज्वालामुखी से निर्मित है और निरंतर
इसमें निर्माण प्रकिया चलती रहती है |
क्योंकि ये सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र है |
प्रश्न : किन क्षेत्रों पर भूकंप के उद्गम क्षेत्र कम गहराई पर होते है
?
उत्तर:
मध्य- महासागरीय कटकों के क्षेत्र
प्रश्न : किन क्षेत्रों पर भूकंप के उद्गम क्षेत्र अधिक गहराई पर होते है ?
उत्तर: अल्पाइन हिमालय पट्टी तथा प्रशांत
महासागरीय किनारे
प्रश्न : रिंग ऑफ फायर (अग्नि वलय ) किसे कहते है ?
उत्तर:
प्रशांत महासागर के किनारे सक्रिय
ज्वालामुखी के क्षेत्र है इसी कारण से प्रशांत महासागर के चारों ओर के क्षेत्र
कों रिंग ऑफ फायर (अग्नि वलय ) कहते है |
प्रश्न : सागरीय अधस्थल विस्तार (Sea Floor
Spreading) परिकल्पना किसने प्रतिपादित की ?
उत्तर:
हैरी हैस ने सन् 1961
में
प्रश्न : प्लेट विवर्तनिकी (प्लेट टक्टोनिक्स) की अवधारणा किन
विद्वानों की देन है ?
उत्तर:
प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा सन् 1968 में मैक्कैन्जी,
पार्कर तथा मोर्गन इन तीन विद्वानों की सम्मलित विचारधारा कों कहा गया |
प्रश्न : दुर्बलता मंडल (एस्थेनोंस्फीयर ) (Asthenosphere) किसे कहते है ?
उत्तर: पृथ्वी की ठोस ऊपरी प्लेटों के नीचे मैंटल परत
में ऐसा मंडल है जिस पर प्लेटे तैरती रहती है उसे दुर्बलता मंडल कहते है |
प्रश्न : महाद्वीपीय प्लेट किसे कहते है ?
उत्तर:
एक प्लेट कों महाद्वीपीय प्लेट कहते है यदि उसका अधिकतर भाग महाद्वीप से
संबंधित हो | जैसे अंटार्कटिक प्लेट,
यूरेशियन प्लेट , अफ्रीकन प्लेट, उत्तरी अमेरिकन प्लेट , दक्षिणी अमेरिकन प्लेट
तथा इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट आदि |
प्रश्न: महासागरीय प्लेट किसे कहते है ?
उत्तर:
एक प्लेट कों महासागरीय प्लेट कहते है यदि उसका अधिकतर भाग महासागर से संबंधित हो
| प्रशांत महासागरीय प्लेट,
प्रश्न: बड़ी प्लेटे कितनी है? उनके नाम बताओ |
उत्तर:
कुल बड़ी प्लेटे सात है | यूरेशियन प्लेट , अफ्रीकन प्लेट, उत्तरी अमेरिकन प्लेट ,
दक्षिणी अमेरिकन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन
प्लेट प्रशांत महासागरीय प्लेट तथा अंटार्कटिक प्लेट |
प्रश्न: छोटी प्लेटें
कितनी है? कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम बताओ |
उत्तर:
विद्वानों के अनुसार लगभग 20 छोटी प्लेटें है | जिनमें से
कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित है |
नजका
प्लेट, कोकोस प्लेट , अरेबियन प्लेट, फिलिपिन प्लेट, कैरोलिन प्लेट तथा फ्यूजी
प्लेट |
प्रश्न: किस प्लेट की प्रवाह दर सबसे कम है ?
उत्तर:
आर्कटिक कटक (प्रवाह दर 2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष)
प्रश्न: किस प्लेट की प्रवाह दर सबसे अधिक है ?
उत्तर:
ईस्टर द्वीप के निकट प्रशांत महासागरीय उभार
जो चिली से पश्चिम की ओर 3400 किलोमीटर दूर
दक्षिणी प्रशांत महासागर में है | (प्रवाह दर 5
सेंटीमीटर प्रति वर्ष) |
प्रश्न : महाद्वीपीय प्रवाह (CONTINENTAL DRIFT) सिद्धांत की संकल्पना की व्याख्या कीजिए ? साथ में वेगनर के जिन बलों को महाद्वीपीय
विस्थापन के लिए किया है उनका उल्ल्लेख कीजिए |
उत्तर:
अटलांटिक महासागरीय तटरेखा को ध्यान से देखे तो पता चलता है कि अंधमहासागर के
दोनों तरफ की तट रेखा में आश्चर्यजनक
सममिति है | इसी समानता के कारण बहुत से वैज्ञानिकों नें दक्षिणी व उत्तरी अमेरिका
तथा यूरोप व अफ्रीका के एक साथ जुड़े होने की सम्भावना को व्यक्त किया | सन् 1596 में एक डच मानचित्रवेत्ता अब्राहम ऑरटेलियस (Abraham Ortelius) ने सर्वप्रथम इस संभावना को
व्यक्त किया था | एंटोनियो पेलेग्रिनी (Antonio Pellegrini) ने
एक मानचित्र बनाया, जिसमें तीनों महाद्वीपों को इक्कट्ठा दिखाया गया था | जर्मन
मौसम विद अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने “महाद्वीपीय
विस्थापन सिद्धांत सन् 1912 में प्रस्तावित किया | यह सिद्धांत महाद्वीपों एवं महासागरों के वितरण
से संबंधित था |
वेगनर
के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की संकल्पना
वेगनर
के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप एक
अकेले भूखंड से जुड़े हुए थे | वेगनर के अनुसार आज के सभी महाद्वीप इस भूखंड के भाग
थे तथा यह एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था | वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े भूखंड को एक बड़ा महाद्वीप बताया जिसे
पैंजिया (Pengaea) का नाम दिया | पैंजिया का अर्थ है सम्पूर्ण पृथ्वी | जिस विशाल महासागर से पैंजिया घिरा हुआ था उसे
वेगनर ने पैंथालासा (Panthalasa) कहा जिसका अर्थ है –जल ही जल |
वेगनर के तर्क के अनुसार लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले इस बड़े महाद्वीप पैंजिया का विभाजन आरम्भ हुआ | पैंजिया
पहले दो बड़े महाद्वीपीय पिंडों लारेशिया (Laurasia) और
गोंडवाना लैंड (Gondwanaland) में विभक्त हुआ | उत्तरी भूखंड
लारेशिया और दक्षिणी भू खण्ड गोंडवानालैंड
के रूप में जाना गया | इसके बाद लारेशिया और गोंडवानालैंड धीरे –धीरे अनेक
छोटे हिस्सों में बँट गए जो आज एक महाद्वीप के रूप में हैं |
प्रवाह
संबंधी बल (Force for Drifting)
वेगनर
ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने जिन
बलों का उल्लेख किया है वे
निम्नलिखित है |
क).
पोलर फ्लीइंग बल (ध्रुवीय
फ्लीइंग बल)
यह बल पृथ्वी के घूर्णन से
संबंधित है | पृथ्वी की आकृति संपूर्ण
गोले जैसी नहीं है बल्कि या भूमध्यरेखा पर उभरी हुई है | पृथ्वी का भूमध्य रेखा पर
उभरी हुई होना ध्रुवीय फ्लीइंग बल से सबंधित घूर्णन के कारण ही है |
ख).
ज्वारीय बल
यह बल सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से संबंधित
है | जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते है | वेगनर का मानना था कि करोड़ों
वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हो गए |
यद्यपि
बहुत से वैज्ञानिक इन दोनों ही बलों को महाद्वीपीय विस्थापन के लिए सर्वथा
अपर्याप्त समझते हैं |
प्रश्न : वेगनर ने अपने सिद्धांत के पक्ष में
कौन –कौन से प्रमाण दिए वर्णन करें |
उत्तर:
अल्फ्रेड
वेगनर द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में दिए गए प्रमाण (Evidences in support of
continental drift)
वेगनर
महोदय के द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में अनेक प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए
हैं | इनमें से कुछ इस प्रकार हैं |
महाद्वीपों में साम्य
दक्षिणी
अमेरिका व अफ्रीका के आमने –सामने की तट रेखाएँ अद्भुत व त्रुटि रहित साम्य दिखाती है | 1964 ई० बुलार्ड (Bullard) ने एक कंप्यूटर प्रोग्राम की
सहायता से अटलांटिक तटों को जोड़ते हुए एक मानचित्र तैयार किया था | तटों का यह
साम्य बिल्कुल सही सिद्ध हुआ | साम्य बिठाने की यह कोशिश आज की तटरेखा की अपेक्षा 1.000 फैदम की गहराई की तटरेखा के साथ की गई थी |
महासागरों
के पार चट्टानों की आयु में समानता
आधुनिक
समय में विकसित की गई रेदियोमिट्रिक काल निर्धारण विधि (radiometric
dating method) से महासागरों के पार महाद्वीपों की चट्टानों के
निर्माण के समय को सरलता से जाना जा सकता है | 200 करोड़ वर्ष
प्राचीन शैल समूहों की एक पट्टी ब्राजील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर मिलती है
| जिनके गुण आपस में मेल खाते हैं | दक्षिणी अमेरिका व अफ्रीका की तटरेखा के साथ
पाए जाने वाले आरम्भिक समुद्री निक्षेप जुरेसिक काल (Jurassic
age) के हैं | इससे यह पता चलता
है कि इस समय से पहले महासागर की उपस्थिति वहाँ नहीं थी |
टिलाइट (Tillite)
टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं, जो हिमानी निक्षेपण से
निर्मित होती हैं | भारत में पाए जाने वाले गोंडवाना श्रेणी के तलछटों के प्रतिरूप
दक्षिणी गोलार्द्ध के छ: विभिन्न स्थल खण्डों में मिलते हैं | गोंडवाना श्रेणी के
आधार तल में घने टिलाइट हैं, जो विस्तृत व लंबे समय तक हिम आवरण या हिमाच्छादन की
ओर इशारा करते हैं | इसी क्रम के प्रतिरूप भारत के अतिरिक्त अफ्रीका, फाकलैंड
द्वीप, मैडागास्कर द्वीप, अंटार्कटिक और ऑस्ट्रेलिया में मिलते हैं | गोंडवाना
श्रेणी के तलछटों की यह समानता स्पष्ट करती है कि इन स्थल खण्डों के इतिहास में भी
समानता रही है | हिमानी निर्मित टिलाइट चट्टानें पुरातन जलवायु और महाद्वीपों के
विस्थापन के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं |
प्लेसर निक्षेप (Placer Deposits)
घाना तट पर सोने के बड़े निक्षेपों की उपस्थिति व उद्गम
चट्टानों की अनुपस्थिति एक आश्चर्यजनक तथ्य है | सोना युक्त शिराएँ (Gold bearing
veins) ब्राजील में
पाई जाती हैं|अत: स्पष्ट है कि घाना में मिलने वाले सोने के निक्षेप ब्राजील पठार
से उस समय निकले होंगें, जब ये दोनों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे |
जीवाश्मों का वितरण:(Distribution of fossils)
यदि समुद्री अवरोधक के दोनों विपरीत किनारों पर जल व स्थल
में पाए जाने वाले पौधे व जन्तुओं की समान प्रजातियाँ पाई जाए, तो उनके वितरण की
व्याख्या में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं| यह प्रेक्षण कि ‘लैमूर’ भारत, मैडागास्कर
व अफ्रीका में मिलते हैं तो कुछ वैज्ञानिकों ने इन तीनों महाद्वीपों को जोडकर एक
सतत स्थलखंड ‘लेमूरिया’ (Lemuria) की उपस्थिति को स्वीकार किया |
मेसोसारस (Mesosaurus) नाम के छोटे रेंगने वाले जीव केवल उथले
खारे पानी में ही रह सकते थे –इनकी अस्थियाँ केवल दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप
प्रांत और ब्राजील में इरावर शैल समूह में ही मिलते हैं | ये दोनों स्थल आज एक
दूसरे से 4800 किलोमीटर की दूरी पर हैं और इनके बीच में एक महासागर विद्यमान है | अत:
स्पष्ट है कि ये दोनों क्षेत्र कभी एक दूसरे से जुड़े हुए थे |
प्रश्न : संवहन धारा सिद्धांत (Conventional
Current Theory) पर एक नोट लिखिए |
उत्तर : संवहन धारा सिद्धांत सन् 1930 के दशक में आर्थर होम्स ने दिया था | उन्होंने पृथ्वी के मैंटल भाग में संवहन –धाराओं के प्रभाव की संभावनाएँ व्यक्त की | ये धाराएँ रेडियो एक्टिव तत्वों से उत्पन्न ताप भिन्नता से मैंटल भाग में उत्पन्न होती हैं | होम्स ने तर्क दिया कि पूरे मैंटल भाग में इस प्रकार की धाराओं का तंत्र विद्यमान है | यह सिद्धांत उन प्रवाह बलों की व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास था, जिसके आधार पर समकालीन वैज्ञानिकों ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया था | संवहन धाराओं कों हम निम्न चित्र से समझ सकते हैं |
प्रश्न : महासागरीय तल की आकृतियों को गहराई व
उच्चावच के प्रकार के आधार पर कितने भागों में बाँटा जा सकता है ? उनका संक्षिप्त
वर्णन कीजिए |
उत्तर: महासागरीय तल की आकृतियों को गहराई व उच्चावच के
प्रकार के आधार पर तीन प्रमुख भागों में
बाँटा जा सकता है |
1.
महाद्वीपीय सीमा 2. गहरे समुद्री बेसिन 3.मध्य महासागरीय कटक
इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
1. महाद्वीपीय
सीमा (Continental Margins)
ये महाद्वीपीय किनारों
और गहरे समुद्री बेसिन के बीच का भाग है | इसमें महाद्वीपीय मग्न तट, महाद्वीपीय
ढाल , महाद्वीपीय उभार और गहरी महासागरीय
खाइयाँ आदि शामिल की जाती है | महासागरों व महाद्वीपों के वितरण को समझने के लिए
गहरी –महासागरीय खाइयों के क्षेत्र विशेष महत्वपूर्ण और रोचक हैं |
2.
वितलीय मैदान (Abyssal Plains)
ये विस्तृत मैदान महाद्वीपीय तटों व
मध्य महासागरीय कटकों के बीच पाए जाते हैं | वितलीय मैदान वह क्षेत्र हैं जहाँ
महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसाद इनके
तटों से दूर निक्षेपित होते हैं |
3.
मध्य महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridges)
मध्य महासागरीय कटक आपस में जुड़े हए
पर्वतों की एक श्रंखला बनाती है | महासागरीय जल में डूबी हुई, यह पृथ्वी के धरातल
पर पाई जाने वाली संभवत: सबसे बड़ी पर्वत श्रंखला है | इन कटकों के मध्यवर्ती शिखर
पर एक रिफ्ट, एक प्रभाजक पठार और इनकी लम्बाई के साथ –साथ पार्श्व मण्डल इसकी
विशेषता है | मध्यवर्ती भाग में उपस्थित द्रोणी वास्तव में सक्रिय ज्वालामुखी
क्षेत्र है |
प्रश्न : विश्व में भूकम्प और ज्वालामुखियों के
वितरण कों समझायें |
उत्तर: भूकम्पीय गतिविधियों और ज्वालामुखियों के वितरण कों
हम निम्न प्रकार से समझते हैं |
अटलांटिक महासागर के मध्यवर्ती भाग
में, तट रेखा के समानांतर एक रेखा में भूकम्प और ज्वालामुखी क्षेत्र पाए जाते हैं
| यह रेखा आगे हिंद महासागर तक जाती है | भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण में यह दो
भागों में बँट जाती है, जिसकी एक शाखा पूर्वी अफ्रीका की ओर चली जाती है और दूसरी
म्यांमार से होती हुई न्यू गिनी पर एक ही रेखा से मिल जाती है | अगर ध्यान से
देखें तो हम पाते है कि यह भूकम्प और ज्वालामुखियों की यह रेखा मध्य –महासागरीय
कटकों के समरूप फैली है |
भूकम्पीय सकेन्द्रण का
दूसरा क्षेत्र अल्पाइन –हिमालय (Alpine-Himalayan) श्रेणियों
के और प्रशांत महासागरीय किनारों के साथ –साथ फैली है | सामान्यत: मध्य महासागरीय
कटकों के क्षेत्र में भूकम्प के उद्गम केन्द्र कम गहराई पर है जबकि अल्पाइन –हिमालय
पट्टी व प्रशांत महासागरीय किनारों पर ये केन्द्र अधिक गहराई पर हैं |
विश्व के ज्वालामुखी भी इन्हीं स्थानों
पर स्थित हैं | प्रशांत महासागर के किनारों कों सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र होने के
कारण रिंग ऑफ फायर (Ring
of Fire) भी कहा जाता है |
अथवा
प्रश्न : महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरांत
प्रमुख खोज क्या है ? जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर व महाद्वीपीय वितरण के अध्ययन
में पुन: रुचि ली ?
उत्तर: महाद्वीपीय प्रवाह के बाद के अध्ययनों ने महत्वपूर्ण
जानकारी प्रस्तुत की, जो वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के समय उपलब्ध नहीं
थी | चट्टानों के पुरा चुम्बकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्रण ने विशेष रूप
से निम्न तथ्यों कों उजागर किया |
2.
महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पाई जाने वाली
चट्टानों के निर्माण का समय, संरचना, संघटन और चुम्बकीय गुणों में समानता पाई जाती
है | महासागरीय कटकों के समीप की चट्टानों में सामान्य चुम्बकत्व ध्रुवण (Normal
Polarity) पाई जाती है तथा ये चट्टानें नवीनतम हैं | कटकों के शीर्ष
से दूर चट्टानों की आयु भी अधिक है |
3.
महासागरीय पर्पटी की चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों की
अपेक्षा अधिक नई हैं | महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कहीं भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं |
4.
गहरी खाइयों में भूकम्प के उद्गम अधिक गहराई पर हैं | जबकि मध्य –महासागरीय
कटकों के क्षेत्र में भूकम्प के उद्गम केन्द्र कम गहरे पर विद्यमान हैं |
इन तथ्यों और मध्य –महासागरीय कटकों के दोनों तरफ की
चट्टनों के चुम्बकीय गुणों के विश्लेषण के आधार पर हेस (Hess) ने सन् 1961में एक परिकल्पना
प्रस्तुत की , जिसे सागरीय अधस्थल विस्तार (Sea Floor Spreading) के नाम से जाना जाता है |
हेस (Hess) के तर्क अनुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर
लगातार ज्वालामुखी उद्भेदन से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ और नया लावा इस दरार
कों बभरकर महासागरीय पर्पटी कों दोनों तरफ धकेल रहा है | इस प्रकार महासागरीय
अधस्थल का विस्तार हो रहा है | महासागरीय पर्पटी का अपेक्षाकृत नवीनतम होना और
इसके साथ ही एक महासागर में विस्तार से दूसरे महासागर के न सिकुड़ने पर हेस (Hess) ने महासागरीय पर्पटी के क्षेपण की बात कही | हेस के अनुसार यदि मध्य
महासागरीय क्टकों में ज्वालामुखी उद्भेदन से नई पर्पटी का निर्माण होता है, तो
दूसरी ओर महासागरीय गर्तों में इनका विनाश भी होता है |
उत्तर: सागरीय तल विस्तार अवधारणा के बाद विद्वानों की
महाद्वीपों के वितरण के अध्ययन में फिर से रूचि पैदा हुई | सन् 1967
में मैकेन्जी (Mckenzie), पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विचारों कों समन्वित कर अवधारणा प्रस्तुत की,
जिसे प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) कहा गया |
एक विवर्तनिक प्लेट कों लिथोस्फेरिक
प्लेट भी कहा जाता है | यह ठोस चट्टानों
का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थल मंडलों से
मिलकर बना है | ये प्लेटें दुर्बलता मण्डल
(Asthenosphere) पर दृढ इकाई के रूप में क्षैतिज
अवस्था में चलायमान हैं | स्थलमण्डल में
पर्पटी एवं ऊपरी मैंटल कों सम्मिलित किया जाता है | जिसकी मोटाई 5 से 100 किलोमीटर और महाद्वीपीय भागों में लगभग 200 किलोमीटर है | एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट भी कहा जाता है
| जो इस बात पर निर्भर है कि उस प्लेट का
अधिकतर भाग महासागर से या महाद्वीप से संबंधित है | उदाहरण के लिए प्रशांत प्लेट
मुख्यत: महासागरीय प्लेट है, जबकि यूरेशियन प्लेट कों महाद्वीपीय प्लेट कहा जाता
है | प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थल मण्डल सात प्रमुख (बड़ी)
प्लेटों तथा कुछ गौण (छोटी) प्लेटों में विभक्त है |
सभी प्रमुख प्लेटों तथा कुछ गौण (छोटी) प्लेटों के
नाम निम्नलिखित है |
यूरेशियन
प्लेट , अफ्रीकन प्लेट, उत्तरी अमेरिकन प्लेट , दक्षिणी अमेरिकन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट प्रशांत महासागरीय
प्लेट तथा अंटार्कटिक प्लेट |
छोटी प्लेटें
नजका प्लेट, कोकोस प्लेट ,
अरेबियन प्लेट, फिलिपिन प्लेट, कैरोलिन प्लेट तथा फ्यूजी प्लेट | कुछ महत्वपूर्ण प्लेटें
है |
उत्तर: जिस समय वेगनर
ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्रस्तुत किया था, उस समय अधिकतर वैज्ञानिकों का
विश्वास था कि पृथ्वी एक ठोस, गति रहित पिंड है | यद्यपि सागरीय अधस्थल विस्तार और
प्लेट विवर्तनिक –दोनों सिद्धांतों ने इस बात पर बल दिया कि पृथ्वी का धरातल व भूगर्भ दोनों ही स्थिर न होकर गतिमान हैं |
प्लेट विचरण करती हैं- यह आज एक अकाट्य तथ्य है | ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट
के नीचे चलायमान चट्टानें वृताकार रूप में चल रही हैं | उष्ण पदार्थ (लावा) धरातल
पर पहुँचता है, फैलता है और धीरे –धीरे ठंडा होता है; फिर गहराई में जाकर नष्ट हो
जाता है | यह चक्र बारबार दोहराया जाता है | वैज्ञानिक इसे संवहन प्रवाह (Convection flow) कहते हैं | पृथ्वी के भीतर ताप उत्पत्ति के दो माध्यम हैं – रेडियोधर्मी
(रेडियोंएक्टिव ) तत्वों का क्षय और अवशिष्ट ताप | आर्थर होम्स ने सन् 1930 में इस
विचार को प्रतिपादित किया | जिसने बाद में हेरी हैस की सागरीय तल विस्तार की
अवधारणा को प्रभावित किया | दृढ़ प्लेटों के नीचे दुर्बल व उष्ण मैन्टल है | जो प्लेटों को प्रभावित करता है |
उत्तर : भारतीय प्लेट
की स्थिति को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं |
(क.)
भारतीय प्लेट में प्रायद्वीपीय भारत और
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपीय भाग सम्मिलित है |
(ख.)
हिमालय पर्वत श्रेणियों के साथ –साथ पाया जाने
वाला प्रविष्ठन (Subduction
zone) इसकी उत्तरी सीमा निर्धारित करता है – जो महाद्वीपीय
–महाद्वीपीय अभिसरण (Continent-continent convergence) के
रूप में है (अर्थात दो महाद्वीपीय प्लेटों
की सीमा है )
(ग.)
यह पूर्व दिशा में म्याँमार के राकिन्योमा
पर्वत से होते हुए एक चाप के रूप में जावा खाई तक फैला हुआ है |
(घ.)
इसकी पूर्वी सीमा एक विस्तारित तल (Spreading site) है, जो आस्ट्रेलिया के पूर्व में
दक्षिणी पश्चिमी प्रशांत महासागर में कटक के रूप में है |
(ङ.)
इसकी पश्चिमी सीमा पाकिस्तान की किरथर
श्रेणियों का अनुसरण करती हैं | यह आगे मकरान तट के साथ –साथ होती हुई दक्षिणी –पूर्वी
चागोस द्वीप समूह (Chagos
archipelago) के साथ –साथ लाल सागर द्रोणी (जो
विस्तारण तल है) में जा मिलती है |
(च.)
भारतीय तथा अंटार्कटिक प्लेट की सीमा भी महासागरीय
कटक से निर्धारित होती है | (जो एक अपसारी सीमा (Divergent boundary) है |) और यह लगभग पूर्व –पश्चिम दिशा
में होती हुई न्यूजीलैंड के दक्षिण में विस्तारित तल में मिल जाती है |
प्रश्न: प्राचीन
काल से वर्तमान तक भारतीय प्लेट के का संचलन (Movement of the Indian Plate) का उल्लेख कीजिए |
उत्तर : भारतीय
प्लेट के संचलन को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं |
(क.)
भारत एक बृहत द्वीप था, जो आस्ट्रेलियाई तट से
दूर एक विशाल महासागर में स्थित था | लगभग 22.5 करोड़ वर्ष पहले तक टेथिस सागर इसे
एशिया महाद्वीप से अलग करता था |
(ख.)
ऐसा माना जाता है कि लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले,
जब पैंजिया विभक्त हुआ तब भारत से उत्तर दिशा की ओर खिसकना शुरू किया |
(ग.)
लगभग 4 से 5 करोड़ वर्ष पहले भारत एशिया से
टकराया व परिणाम स्वरूप हिमालय पर्वत का उत्थान हुआ |
(घ.)
आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पहले भारतीय
उपमहाद्वीप सुदूर दक्षिण में 50० दक्षिणी अक्षांश पर स्थित था |
(ङ.)
भारतीय उपमहाद्वीपीय प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट
इन दोनों प्लेटों को टेथिस सागर अलग करता था इस समय तिब्बतीय खंड, एशियाई
स्थलखंड के करीब था |
(च.)
भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट की तरफ प्रवाह
के दौरान एक प्रमुख घटना घटी –वह थी लावा प्रवाह से दक्कन ट्रैप का निर्माण | ऐसा
लगभग 6 करोड़ वर्ष पहले हुआ | एक लंबे समय
तक यह लावा प्रवाह की प्रक्रिया जारी रही | इस घटना
के समय भारतीय उपमहाद्वीप भूमध्यरेखा के निकट था |
(छ.)
लगभग 4 करोड़ वर्ष पहले और इसके बाद हिमालय की
उत्पत्ति आरंभ हुई | वैज्ञानिकों का मानना है की भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर की ओर
खिकसने की प्रक्रिया अब भी जारी है और हिमालय की ऊँचाई अब भी बढ़ रही है |
उत्तर : महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत में मूलभूत अंतर निम्नलिखित हैं |
1. वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप एक अकेले भूखंड से जुड़े हुए थे | वेगनर के अनुसार आज के सभी महाद्वीप इस भूखंड के भाग थे तथा यह एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था | वेगनर ने सभी महाद्वीपों से जुड़े भूखंड को एक बड़ा महाद्वीप बताया जिसे पैंजिया का नाम दिया | जिस विशाल महासागर से पैंजिया घिरा हुआ था उसे वेगनर ने पैंथालासा कहा है | जबकि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमंडल सात प्रमुख तथा कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है |
2. वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत केवल महाद्वीपों के विस्थापन की बात करता है | जबकि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के अनुसार महासागरों और महाद्वीपों दोनों का विस्थापन होता है |




No comments:
Post a Comment