Monday, April 25, 2022

HUMAN DEVELOPMENT LESSON 3 (FUNDAMENTAL HUMAN GEOGRAPH)Y CLASS 12TH GEOGRAPHY

कक्षा 12वीं

मानव भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय 3 मानव विकास

वृद्धि

            वृद्धि का अर्थ  मात्रात्म्क परिवर्तन से है | यह मूल्य निरपेक्ष होता है | यह धनात्म्क या ऋणात्मक हो सकती है | इसका अर्थ है कि परिवर्तन धनात्म्क है तो वृद्धि दर्शाएगा और परिवर्तन ऋणात्मक है तो ह्रास  दर्शाएगा | वृद्धि विकासहीन भी हो सकती है और विकासयुक्त भी हो सकती है |

विकास

            विकास का अर्थ  गुणात्मक परिवर्तन  से है | यह मूल्य सापेक्ष होता है | विकास ऋणात्मक नहीं हो सकता | दूसरे शब्दों में कहे कि विकास तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक कि वर्तमान दशाओं में धनात्मक वृद्धि न हो | अर्थात विकास उस समय होता है जब सकारात्मक वृद्धि होती है | लेकिन केवल सकारात्मक वृद्धि से विकास नहीं होता | विकास उस समय होता है जब गुणवत्ता  में सकारात्मक परिवर्तन होता है |

विकासहीन वृद्धि

विकासहीन वृद्धि से अभिप्राय ऐसी वृद्धि से है जिसमे वृद्धि तो हो लेकिन विकास ना हो | इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है | किसी निश्चित समय अवधि में किसी नगर की जनसंख्या एक लाख से दो लाख हो जाती है तो  हम कहते है की नगर की वृद्धि हुई है | लेकिन उस नगर मे मूलभूत सुविधाएं जैसे स्वास्थ्यआवासशिक्षाचिकित्सापेय जल तथा सुरक्षा आदि की पर्याप्त मात्रा में बढ़ोतरी नहीं हुई है तो ऐसी वृद्धि विकासहीन वृद्धि कहलाती है |

विकास की अवधारणा में बदलाव

                        अनेक दशकों तक किसी देश के विकास के स्तर को केवल आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में मापा जाता था | इसका अर्थ यह है की जिस देश की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होगी वह देश उतना ही अधिक विकसित माना जाता था | इस अवधारणा के अंतर्गत वृद्धि का अधिकतर लोगो के जीवन के परिवर्तन से कोई संबंध नहीं था |

                        1980 के दशक के अंत में और 1990 के दशक के प्रारम्भ में एक नयी विचारधारा (अवधारणा) का जन्म हुआ | इस अवधारणा के अनुसार जिस देश में लोग जीवन की गुणवत्ता का जो आनंद लेते है | उन्हे जितने अधिक अवसर उपलब्ध होते है | जितनी अधिक स्वतंत्रताओं का वहाँ के लोग उपभोग करते है | वह देश उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | इस विचारधारा के अनुसार जीवन की गुणवत्ताअवसरों की उपलब्धताजीने की स्वतंत्रता विकास के महत्वपूर्ण पक्ष है |

मानव विकास की अवधारणा

                                    1980 के दशक के अंत में और 1990 के दशक के प्रारम्भ में विकास की एक नयी विचारधारा (अवधारणा) का जन्म हुआ जिसे मानव विकास की अवधारणा कहते हैइस अवधारणा के अनुसार जिस देश में लोग जीवन की गुणवत्ता का जो आनंद लेते है | उन्हे जितने अधिक अवसर उपलब्ध होते है | जितनी अधिक स्वतंत्रताओं का वहाँ के लोग उपभोग करते है | वह देश उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | इस विचारधारा के अनुसार जीवन की गुणवत्ताअवसरों की उपलब्धताजीने की स्वतंत्रता विकास के महत्वपूर्ण पक्ष है |

            मानव विकास की अवधारणा का प्रतिपादन डॉ० महबूब उल हक के द्वारा1990 ई० में  किया गया था | ये एक पाकिस्तानी अर्थशास्त्री थे | 1990 में इन्होने मानव विकास प्रतिवेदन (मानव विकास रिपोर्ट) प्रस्तुत की थी और मानव विकास सूचकांक निर्मित किया था |

                         डॉ० महबूब उल हक ने मानव विकास का वर्णन एक ऐसे विकास के रूप में किया जो लोगो के विकल्पों में वृद्धि कर्ता हैऔर उनके जीवन में सुधार लाता है | उनकी अवधारणा में सभी प्रकार के विकास का केंद्र बिन्दु मनुष्य है | उनके अनुसार लोगो के विकल्प स्थिर नहीं है बल्कि परिवर्तनशील है | इस प्रकार विकास का मूल उद्देश्य ऐसी दशाओं को उत्पन्न करना है जिनमे लोग सार्थक जीवन व्यतीत कर सकें |

मानव विकास की परिभाषा

डॉ० महबूब उल हक के अनुसार,”विकास का संबंध लोगों के विकल्पों में बढ़ोतरी से है ताकि वे आत्मसम्मान के साथ दीर्घ और स्वस्थ जीवन जी सकें |

डॉ० अमर्त्य सेन के अनुसारविकास का मुख्य ध्येय स्वतन्त्रता मे वृद्धि करना (परतंत्रता मे कमी )है | स्वतन्त्रताओं  में वृद्धि भी विकास लाने वाला सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम है | स्वतन्त्रता की वृद्धि में सामाजिक और राजनैतिक संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं का महत्वपूर्ण स्थान होता है |

सार्थक जीवन

मानव विकास की अवधारणा के अनुसार सार्थक जीवन केवल दीर्घ (लंबा जीवन) नहीं होता | सार्थक जीवन का अर्थ है लोग स्वस्थ होंवे अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हों | वे सामाज में प्रतिभागिता करें और अपने उद्देश्यों को पूरा करने में  स्वतंत्र हो |

मानव विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष (केंद्र बिन्दु)

मानव विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण  पक्ष निम्नलिखित है |

1.      दीर्घ व स्वस्थ जीवन जीना,

2.      ज्ञान प्राप्त कर पाना

3.      एक शिष्ट जीवन जीने के लिए पर्याप्त संसाधनों का होना

दूसरे शब्दों में मानव विकास की अवधारणा के अनुसार मानव विकास के तीन  केंद्र बिन्दु है |

1.      स्वास्थ्य

2.      शिक्षा   

3.      संसाधनों तक पहुँच

लोगों में विकल्पों को तय करने की क्षमता और स्वतन्त्रता में कमी के  कारणप्रभाव और उपाय

            प्राय: लोगों में विकल्पों को तय करने की क्षमता और स्वतन्त्रता में कमी होती है | यह ज्ञान प्राप्त करने की अक्षमतालोगों की भौतिक निर्धनतासामाजिक भेदभावसंस्थाओं की अक्षमता और अन्य कारणों के होती है |

            लोगों में विकल्पों को तय करने की क्षमता और स्वतन्त्रता में कमी के प्रतिकूल प्रभाव पड़ते है | जैसे लोगों को दीर्घ और स्वस्थ जीवन जीनेशिक्षा प्राप्ति के योग्य होने और एक शिष्ट जीवन जीने के साधनों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होती है |

            लोगों में विकल्पों को तय करने की क्षमता और स्वतन्त्रता में कमी को दूर करने के लिए या विकल्पों में वृद्धि करने के लिए महत्वपूर्ण उपाय है की लोगों के स्वास्थ्यशिक्षा और संसाधनों तक पहुँच में उनकी क्षमताओं का निर्माण करना चाहिए | यदि इन क्षेत्रों मे लोगों की क्षमता नहीं है तो उनके विकल्प भी सीमित हो जाते है | 

उदाहरण के लिए एक अशिक्षित बच्चा डॉक्टर बनने का विकल्प नहीं चुन सकता क्योंकि उसका विकल्प शिक्षा के अभाव में सीमित हो गया है | इसी प्रकार निर्धन लोग बीमारी की लिए अच्छा चिकित्सा उपचार नहीं चुन सकते क्योंकि संसाधनों के अभाव में उनका विकल्प सीमित हो जाता है |
मानव विकास के स्तंभ (मानव विकास की संकल्पनाएँ )

            जिस प्रकार किसी इमारत को स्तंभो के सहारे की जरूरत होती हैं | उसी प्रकार मानव विकास का विचार भी समतासतत पोषणीयताउत्पादकता और सशक्तिकरण की संकल्पनाओं पर आश्रित है |  मानव विकास की इन चारों संकल्पनाओं या स्तंभों का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

1.  समता

समता से आशय ऐसी व्यवस्था करने से है जिससे प्रत्येक व्यक्ति की उपलब्ध संसाधनों तक पहुँच हो सके | लोगों को उपलब्ध अवसर या संसाधन लिंगप्रजातिधर्मआय और भारत के संदर्भ में जाति के भेदभाव के विचार के बिना समान रूप से प्राप्त होने चाहिए | यद्यपि ऐसा ज़्यादातर नहीं होता फिर भी यह प्रत्येक समाज में घटित होता है | अर्थात समाज में कभी कभी जातिगत भेदभाव की घटनाएँ होती रहती है |

            उदाहरण के लिए भारत में स्त्रियाँ और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों के व्यक्ति बड़ी संख्या में विद्यालय नहीं जा पाते |इससे पता चलता है की शिक्षा तक समान पहुँच ना होना इन वर्गों के लोगों के विकल्पों को सीमित करता है |

2.  सतत पोषणीयता

 सतत पोषणीयता या निर्वहन का अर्थ है अवसरों की उपलब्धता में निरंतरता | अर्थात अवसर लगातार उपलब्ध होते रहने चाहिए | सतत पोषणीय मानव विकास के लिए आवश्यक है की प्रत्येक पीढ़ी को समान अवसर मिले | इसलिए हमें अपने पर्यावरणीयवित्तीय तथा मानव संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए की हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इससे वंचित न रह जाएँ |

उदाहरण के लिए यदि हम प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग सही ढंग से ना करके उनको बर्बाद करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए ये प्राप्त नहीं होंगे | जिससे उनके विकल्पों में कमी आ जाएगी और उनके विकास मे बाधा आएगी |

3. उत्पादकता  

            यहाँ उत्पादकता का अर्थ मानव श्रम उत्पादकता अथवा मानव कार्य के संदर्भ में उत्पादकता  है | लोगों में क्षमताओं का निर्माण करके ऐसी उत्पादकता में निरंतर वृद्धि की जानी चाहिए | किसी देश के लोग ही वहाँ के वास्तविक धन होते है | उनके ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करके और उन्हे बेहतर चिकित्सा सुविधायें प्रदान करके उनकी उत्पादक क्षमता बेहतर की जा सकती है |

4. सशक्तिकरण

सशक्तिकरण का अर्थ है अपने विकल्प चुनने के लिए शक्ति प्राप्त करना | यह शक्ति बढ़ती हुई स्वतन्त्रताक्षमता और उत्पादकता से आती है | लोगों को सशक्त करने के लिए सुशासन और लोकोन्मुखी नीतियों की आवश्यकता होती है | सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए समूहों के सशक्तिकरण का मानव विकास में बहुत महत्व है |

 

मानव विकास के उपागम

मानव विकास के उपागम के चार उपागम है |

1.       आय उपागम

2.       कल्याण उपागम

3.       आधारभूत आवश्यकता उपागम

4.       क्षमता उपागम             

इनका वर्णन इस प्रकार है 

1         आय उपागम 

यह मानव विकास के सबसे पुराने उपगमों मे से एक है | इसमें मानव विकास को आय के साथ जोड़कर देखा जाता है | इस उपागम में यह माना जाता है की किसी व्यक्ति की आय का स्तर उसके द्वारा भोगी जा रही स्वतन्त्रता के स्तर को परिलक्षित करता है | आय का स्तर ऊँचा होने पर मानव विकास का स्तर ऊँचा होगा और आय का स्तर निम्न होने पर मानव विकास का स्तर भी नीचा होगा |

2         कल्याण उपागम 

यह उपागम मानव को लाभार्थी अथवा सभी विकासात्मक गतिविधियों के लक्ष्य (केंद्र) के रूप में देखता है | यह उपागम शिक्षास्वास्थ्यसामाजिक सुरक्षा और सुख साधनों पर उच्चतर सरकारी व्यय का तर्क देता है | इस उपागम के अनुसार लोग लोग विकास में प्रतिभागी नहीं है किन्तु वे केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता है | यह उपागम मानता है की सरकार लोगो के कल्याण पर अधिकतम व्यय करके मानव विकास के स्तरों में वृद्धि करने के लिए जिम्मेदार है

3         आधारभूत आवश्यकता उपागम 

इस उपागम को मूल रूप से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने प्रस्तावित किया था | इसमें छ: न्यूनतम आवश्यकताओं जैसे स्वास्थ्यशिक्षाभोजनजलापूर्तिस्वच्छ्ता और आवास की पहचान की गई थी | इसमें मानव विकल्पों के प्रश्न की उपेक्षा की गई है और परिभाषित वर्गों की मूलभूत आवश्यकताओं की व्यवस्था पर ज़ोर दिया गया है |

4         क्षमता उपागम

इस उपागम का संबंध डॉ०  अमर्त्य सेन से है | इस उपागम के अनुसार संसाधनों के पहुँच के क्षेत्रों में मानव क्षमताओं का निर्माण बढ़ते मानव विकास की कुंजी है | दूसरे शब्दों में हम कह सकते है की क्षमताओं को विकसित किए बिना मनुष्य संसाधनों तक नहीं पहुँच सकता | मानव क्षमताओं का निर्माण ही मानव विकास का आधार है |

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNITED NATION DEVELOPMENT PROGRAMME)

            संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो 1990 ई० से प्रतिवर्ष मानव विकास प्रतिवेदन (मानव विकास रिपोर्ट) प्रकाशित करती है | यह संस्था मानव विकास मापने के लिए मानव विकास सूचकांक (HDI) तथा मानव गरीबी सूचकांक (HPI) का प्रयोग करती है | इन सूचकांकों की सहायता से यह संस्था विभिन्न देशों को मानव विकास के आधार पर वर्गीकृत करती है |

मानव विकास प्रतिवेदन (मानव विकास रिपोर्ट) (HUMAN DEVELOPMENT REPORT)

            मानव विकास प्रतिवेदन (मानव विकास रिपोर्ट) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) नामक संस्था 1990 ई० से प्रतिवर्ष प्रकाशित करती है | इस रिपोर्ट में  मानव विकास को मापने के लिए मानव विकास सूचकांक (HDI) तथा मानव गरीबी सूचकांक (HPI) का प्रयोग करती है | इन सूचकांकों की सहायता से यह रिपोर्ट मानव विकास के स्तर के अनुसार सभी सदस्य देशों की कोटि (रैंक)तथा क्रमानुसार उन देशों की सूची उपलब्ध कराती है | यह रिपोर्ट विभिन्न देशों को मानव विकास के सूचकांकों के आधार पर अति उच्चउच्चमध्यम तथा निम्न मानव विकास के स्तर के रूप में वर्गीकृत करती है |

मानव विकास का मापन

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के द्वारा मानव विकास का मापन दो प्रकार के सूचकांकों द्वारा किया जाता हैं |

1.      मानव विकास सूचकांक

2.      मानव गरीबी सूचकांक

मानव विकास सूचकांक (HDI)

 मानव विकास सूचकांक स्वास्थ्य शिक्षा और संसाधनों तक पहुँच जैसे प्रमुख क्षेत्रों में निष्पादन के आधार पर देशों का क्रम तैयार करता है | यह क्रम 0 से 1 के बीच के स्कोर पर आधारित होता है | यह स्कोर एक देश मानव विकास के महत्वपूर्ण सूचकों में अपने रिकॉर्ड के आधार पर प्राप्त करता है |

            स्वास्थ्यशिक्षा तथा संसाधनों तक पहुँच ये तीन महत्वपूर्ण सूचक है जिनके आधार पर मानव विकास सूचकांक का मान (स्कोर) प्राप्त किया जाता है | इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

1         स्वास्थ्य  (दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन)

किसी भी देश के लोगों के स्वास्थ्य का मूल्यांकन करने के लिए जन्म के समय आयु (जीवन प्रत्याशा) के सूचक का प्रयोग किया जाता है | जिसका अर्थ है की जिस समय कोई बच्चा जन्म लेता है उस समय उस देश के लोगों की औसत आयु कितनी है | उच्चतर जीवन प्रत्याशा का अर्थ है कि लोगों के पास अधिक दीर्घ (लंबा) और अधिक स्वस्थ जीवन जीने के ज्यादा अवसर है |

2         शिक्षा (शिक्षित एवं ज्ञानवान होना )

शिक्षा का मूल्याकंन करने के लिए प्रौढ़ साक्षरता दर तथा सकल नामांकन अनुपात जैसे सूचकों का प्रयोग किया जाता है |  पढ़ और लिख सकने वाले व्यस्कों कि संख्या (प्रौढ़ लोगों कि संख्या जो पढ़ लिख सकते है |) तथा विद्यालयों में नामांकित बच्चों कि संख्या यह बताती है कि किसी देश में ज्ञान तक पहुँच (शिक्षा प्राप्त करना) कितना आसान या कितना कठिन है | यदि लोगों और नामांकित बच्चों कि संख्या अधिक है तो शिक्षा प्राप्त करना आसान है और यदि कम है तो शिक्षा प्राप्त करना कठिन है |

3         संसाधनों तक पहुँच (संसाधनों की उपलब्धता )

संसाधनों तक पहुँच (संसाधनों की उपलब्धता ) को लोगों की क्रय शक्ति के संदर्भ में मापा जाता है अर्थात लोगों का अपनी आवश्यकताओं के लिए कितना धन खर्च करने की क्षमता है | इसे अमीरीकी डॉलर में मापा जाता है |

मानव विकास सूचकांक की गणना

            स्वास्थ्यशिक्षा तथा संसाधनों तक पहुँच ये तीन महत्वपूर्ण सूचक है जिनके आधार पर मानव विकास सूचकांक का मान (स्कोर) प्राप्त किया जाता है | इन तीनों सूचकों को समान रूप से अधिकतम 1 में से 1/3 भरिता दी जाती है |  तीनों सूचक या आयाम जितना मान प्राप्त करतें है उनके जोड़ को मानव विकास सूचकांक कहते है |

            तीनों सूचकों से कुल प्राप्त मान (स्कोर) 0 से 1 के बीच होता है | किसी देश मान जितना 1 के पास होता है  उसका मानव विकास भी उतना ही अधिक होता है  और जितना कम होता है  मानव विकास भी उतना ही कम होता है | इस प्रकार 0.983 का स्कोर मानव विकास का अति उच्च स्तर तथा 0.268 का मान मानव विकास का अत्यंत निम्न स्तर माना जाता है |

मानव विकास सूचकांक सर्वाधिक विश्वसनीय माप नहीं

            मानव विकास सूचकांक मानव विकास में प्राप्तियों का मापन करता है | यह प्रदर्शित करता है कि मानव विकास के प्रमुख क्षेत्रों में क्या उपलब्धि हुई है | फिर भी यह सर्वाधिक विश्वसनीय माप नहीं है क्योकि यह माप विकास के वितरण के बारे में मौन है  अर्थात यह माप यह स्पष्ट नहीं करता कि विकास किन- किन क्षेत्रों में कितना-कितना हुआ है |

मानव गरीबी सूचकांक (HPI)

मानव गरीबी सूचकांक मानव विकास सूचकांक से संबन्धित है | यह सूचकांक विकास में कमी का मापता है | यह एक बिना आय वाला माप है | यह मानव विकास में कमी को दर्शाता है | इस कमी की गणना करने के लिया निम्नलिखित कारकों को शामिल किया जाता है |

1.       40 वर्ष की आयु तक जीवित न रह पाने की संभाव्यता

2.       प्रौढ़ निरक्षरता दर

3.       स्वच्छ जल तक पहुँच न रखने वाले लोगो की संख्या

4.       अल्प भार वाले छोटे बच्चों की संख्या

भूटान की प्रगति का आधिकारिक माप (सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता या  GROSS NATIONAL HAPPINESS )

भूटान विश्व का अकेला देश है जिसने सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता को देश की प्रगति का आधिकारिक माप घोषित किया है | भूटान की सरकार ने भौतिक प्रगति और प्रौद्योगिक विकास से होने वाले संभावित नुकसान को ध्यान में रखा और सतर्कता पूर्वक अपने पर्यावरण अथवा सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के अन्य पहलुओं को सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता को देश की प्रगति का आधिकारिक माप घोषित किया है | इसका अर्थ है की प्रसन्नता की कीमत पर भौतिक प्रगति नहीं की जा सकती |

            भूटान द्वारा अपनाया गया  सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (GNH) का माप हमें विकास के आध्यात्मिकभौतिकता और गुणात्मक पक्षों को सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है |

मानव विकास के सूचकांक (स्कोर) के आधार पर देशों का वर्गीकरण

अथवा

मानव विकास के सूचकांक (स्कोर) के आधार पर देशों का वितरण

 मानव विकास के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की तुलना करें तो हम डेकते है कि प्रदेश के आकार और प्रति व्यक्ति आय का मानव विकास के साथ प्रत्यक्ष संबंध नहीं है | प्राय: मानव विकास में बड़े देशों की अपेक्षा छोटे देश अधिक अच्छा प्रदर्शन कर रहे है | इसी प्रकार मानव विकास में अपेक्षाकृत गरीब देशों का सूचकांक अधिक होने के कारण उनका कोटी क्रम (रैंक) अमीर देशों से ऊँचा है |

उदाहरण के लिए श्रीलंकाट्रिनिडाड और टोबैगो जैसी छोटी अर्थवयवस्था वाले देश  मानव विकास सूचकांक के आधार पर भारत से उच्च स्थान रखते है | इसी प्रकार केरल में प्रति व्यक्ति आय  पंजाब और गुजरात से कम है लेकिन अन्य कारकों में इसका स्थान ऊपर है इसलिए केरल का मानव विकास सूचकांक इन राज्यों से अच्छा है | 

मानव विकास के सूचकांक के आधार पर द्देशों का कोटी क्रम निर्धारित होता है | इसी के आधार पर विश्व के देशों को चार समूहो में वर्गीकृत किया जाता है |  मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार विभिन्न देशों को निम्न लिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है |

मानव विकास का स्तर

मानव विकास सूचकांक का स्कोर

देशों की संख्या

अति उच्च                     

0.800 से ऊपर

66

उच्च    

0.700 से 0.799 के बीच

49

मध्यम

0.550 से 0.699 के बीच

44

निम्न

0.549 से नीचे

32

 स्त्रोत : मानव विकास प्रतिवेदन (रिपोर्ट )2021-22

देशों का इस आधार पर वर्णन निम्न प्रकार से है |

1.    अति उच्च मानव विकास वाले देश

इस वर्ग में वे सभी देश शामिल है जिनका मानव विकास सूचकांक का स्कोर 0.800 से ऊपर है | इनकी संख्या 2022 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार 66 है | स्वीटजरलैंड सबसे उच्च मानव विकास सूचकांक वाला देश है | इसकी क्रम संख्या एक  है | इसके अलावा नार्वेआइसलैंडहाँग काँग, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, आयरलैंडजर्मनी, स्वीडन  तथा नीदरलैंड इस वर्ग के प्रमुख देश है |

इन देशों में अति उच्च मानव विकास होने के निम्न कारण है |

a)      शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करवाना सरकार की महत्वपूर्ण प्राथमिकता है |

b)     इन देशो में सामाजिक खंड (सामाजिक विकास ) में  बहुत अधिक करते है |

c)      इन देशों की शासन वयवस्था में उच्च निवेश किया जाता है | या ये कहे की इन देशों में सुशासन है |

इस वर्ग में अधितकतर वे देश है जो पहले साम्राज्यवादी शक्तियाँ रही है | इन देशों में सामाजिक विविधता की डिग्री उच्च नहीं है | इनमें  यूरोप के अधिकांश देशशामिल है | ये देश औद्योगीकृत है और पश्चिमी विश्व का प्रतिनिधित्व करते है |

2.      उच्च मानव विकास वाले देश

इस वर्ग में वे सभी देश शामिल है जिनका मानव विकास सूचकांक का स्कोर 0.700 से 0.799 के बीच  है | इनकी संख्या 2022 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार 49 है |

इन देशों में उच्च मानव विकास होने के निम्न वे सभी कारण जो अति उच्च मानव विकास वाले  देशों में  है |

a)      शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करवाना सरकार की महत्वपूर्ण प्राथमिकता है |

b)     इन देशो में सामाजिक खंड (सामाजिक विकास ) में  बहुत अधिक करते है |

c)      इन देशों की शासन वयवस्था में उच्च निवेश किया जाता है | या ये कहे की इन देशों में सुशासन है |

3.      मध्यम मानव विकास वाले देश

     इस वर्ग में वे सभी देश शामिल है जिनका मानव विकास सूचकांक का स्कोर 0.550 से 0.699 के बीच  है | इनकी संख्या 2022 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार 44 है | इस वर्ग के अधिकांश देश विकासशील देशों की श्रेणी में आते है | इनमे से अधिकांश पूर्वकाल में उपनिवेश थे | इन देशो में से अधिकांश का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ है | इस वर्ग में वे देश भी शामिल है जो रूस के विघटन के बाद 1990 में  विकसित हुए है |

इन देशों में  मध्यम  मानव विकास होने के निम्न कारण है |

a)      इन देशों में लोकोन्मुखी नीतियों को अपनाया है |

b)     इन देशों ने सामाजिक भेदभाव को तेजी से दूर करके मानव विकास का स्कोर सुधारा है |

 

4.      निम्न मानव विकास वाले देश

इस वर्ग में वे सभी देश शामिल है जिनका मानव विकास सूचकांक का स्कोर 0.549 से कम है | इनकी संख्या 2022 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार 32 है |

इन देशों में निम्न मानव विकास होने के निम्न कारण है |

a)      इस वर्ग के अधिकांश देश छोटे है |

b)     इन देशों में राजनीतिक उपद्रवगृहयुद्धसामाजिक अस्थिरताअकाल तथा बीमारियों की अधिक घटनाएँ हुए है जिससे ये अल्प विकसित रहे है |

c)      सुविचार करके नीतियों का निर्माण नहीं होना एक महत्वपूर्ण कारण है |

d)     इन  देशों की सरकार सामाजिक सेक्टरों की बजाय प्रतिरक्षा पर अधिक खर्च करतीं है |

इन देशों को सही नीतियों की तत्काल आवश्यकता है जिससे इनके मानव विकास की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके |

 

मानव विकास की अंतर्राष्ट्रीय तुलनाएं अत्यंत रुचिकर परिणाम दर्शाती है

 मानव विकास के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की तुलना करें तो हम देखते है कि अंतर्राष्ट्रीय तुलनाएं अत्यंत रुचिकर परिणाम दर्शाती है जो निम्न प्रकार से स्पष्ट होती है |

1.      प्रदेश के आकार और प्रति व्यक्ति आय का मानव विकास के साथ प्रत्यक्ष संबंध नहीं है | प्राय: मानव विकास में बड़े देशों की अपेक्षा छोटे देश अधिक अच्छा प्रदर्शन कर रहे है | इसी प्रकार मानव विकास में अपेक्षाकृत गरीब देशों का सूचकांक अधिक होने के कारण उनका कोटी क्रम (रैंक) अमीर देशों से ऊँचा है |उदाहरण के लिए श्रीलंकाट्रिनिडाड और टोबैगो जैसी छोटी अर्थवयवस्था वाले देश  मानव विकास सूचकांक के आधार पर भारत से उच्च स्थान रखते है | इसी प्रकार केरल में प्रति व्यक्ति आय  पंजाब और गुजरात से कम है लेकिन अन्य कारकों में इसका स्थान ऊपर है इसलिए केरल का मानव विकास सूचकांक इन राज्यों से अच्छा है |    

            मानव विकास के सूचकांक के आधार पर देशों का कोटी क्रम निर्धारित होता है | इसी के आधार पर विश्व के देशों को चार समूहो में वर्गीकृत किया जाता है |  मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार विभिन्न देशों को निम्न लिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है |

मानव विकास का स्तर

मानव विकास सूचकांक का स्कोर

देशों की संख्या

अति उच्च                     

0.800 से ऊपर

66

उच्च    

0.700 से 0.799 के बीच

49

मध्यम

0.550 से 0.699 के बीच

44

निम्न

0.549 से नीचे

32

2.     प्राय: लोग मानव विकास के निम्न स्तरों के लिए लोगों की संस्कृति को भी दोष देते हैं | उदाहरण के लिए किसी देश का विकास इसलिए कम हुआ है क्योंकि उस देश के लोग किसी विशेष धर्म का अनुसरण करते है या किसी विशेष समुदाय से संबंध रखते है | 

3.      तुलनाएं बताती है की सामाजिक क्षेत्रक में अगर सरकारी खर्च अधिक होता है तो मानव विकास का स्तर उच्च होने लगता है |

4.      देश का राजनीतिक परिवेश तथा लोगो को उपलब्ध स्वत्न्त्रताएं भी मानव विकास को प्रोत्साहित करती है |

5.      मानव विकास के उच्च स्तरों वाले देश सामाजिक सेक्टरों में अधिक निवेश करते है | ये देश राजनीतिक उपद्रवों और अस्थिरता से प्राय: स्वतंत्र होते है | इन देशों में संसाधनो का वितरण भी लगभग समान होता है |

6.      मानव विकास के निम्न स्तरों वाले देश सामाजिक सेक्टरों की बजाय प्रतिरक्षा पर अधिक निवेश करते है | ये देश राजनीतिक उपद्रवों और अस्थिरता  में पड़े होते है | इन देशों में संसाधनो का वितरण भी असमान होता है | परिणाम स्वरूप इनका सामाजिक और आर्थिक विकास  तीव्रता नहीं पकड़ पाता |

 

प्रश्न : 1 निम्नलिखित में से कौन सा विकास का सर्वोतम वर्णन करता है |

(क) आकार में वृद्धि  (ख) गुण में धनात्मक परिवर्तन  (ग) आकार में स्थिरता  (घ )गुण में साधारण  परिवर्तन

उत्तर :  गुण में धनात्मक परिवर्तन  

 

प्रश्न : 2 मानव विकास की अवधारणा निम्नलिखित में से किस विद्वान की दें है |

(क)प्रो०  अमर्त्य सेन   (ख) डॉ ० महबूब उल-हक  (ग) एलन सी० सेंपुल (घ) रेटजेल 

उत्तर: डॉ ० महबूब उल-हक 

 

प्रश्न : 3 HDI  का पूरा नाम क्या है |

उत्तर : मानव विकास सूचकांक (HUMAN DEVELOPMENT INDEX )

 

प्रश्न  4: UNDP का पूरा नाम क्या है |

उत्तर : संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNITED NATION DEVELOPMENT PROGRAMME )

 

प्रश्न 5 :GNH का पूरा नाम क्या है |

उत्तर : सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (GROSS NATIONAL HAPPINESS)

 

प्रश्न 6 : HPI का पूरा नाम क्या है |

उत्तर : मानव गरीबी सूचकांक (HUMAN POWERTY INDEX )

 

प्रश्न 7 : HDR  का पूरा नाम क्या है |

उत्तर : मानव विकास रिपोर्ट (HUMAN DEVELOPMENT REPORT )

 

 प्रश्न 8 : मानव विकास रिपोर्ट कौन जारी करता है |

उत्तर : संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNITED NATION DEVELOPMENT PROGRAMME )

 

प्रश्न 9 : मानव विकास रिपोर्ट (HUMAN DEVELOPMENT REPORT )सबसे पहले कब जारी की गयी |

उत्तर :1990 ई०

 

प्रश्न 10 : दो दक्षिणी एशियाई विद्वानों के नाम बताओ जिसने मानव विकास की अवधारणा का विकास किया |

उत्तर :  प्रो०  अमर्त्य सेन  और  डॉ ० महबूब उल-हक

 

प्रश्न 11 : मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार सबसे विकसित देश कौन सा है |

उत्तर : स्वीटजरलैंड (मानव विकास सूचकांक  0.962 )

 

प्रश्न 12 : मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत का स्थान कौन सा है |

उत्तर :132 वां

 

प्रश्न 13   मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत का मानव विकास सूचकांक कितना है |

उत्तर : 0.633

 

प्रश्न 14 : किन देशों का स्थान मानव विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत से  ऊँचा है |

उत्तर :  श्रीलंकाट्रिनिडाड और टोबैगो

 

प्रश्न 12 : मानव विकास रिपोर्ट 2006 के अनुसार भारत का स्थान कौन सा था |

उत्तर :126 वां


 प्रश्न 12 : मानव विकास की अवधारणा के अनुसार मानव विकास के तीन  केंद्र बिन्दु  कौनसे है |

उत्तर :    (1) स्वास्थ्य  (2) शिक्षा   (3)संसाधनों तक पहुँच

 

प्रश्न 13 : मानव विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण  पक्ष कौन से  है |

उत्तर : मानव विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण  पक्ष निम्नलिखित है |

 (1)दीर्घ व स्वस्थ जीवन जीना,  

(2) ज्ञान प्राप्त कर पाना 

(3) एक शिष्ट जीवन जीने के लिए पर्याप्त संसाधनों का होना

 

प्रश्न 14 : मानव विकास के उपागम के नाम बताओ |

उत्तर : मानव विकास के उपागम के चार उपागम है |

1.       आय उपागम 

2.       कल्याण उपागम 

3.       आधारभूत आवश्यकता उपागम 

4.       क्षमता उपागम  

प्रश्न 15 : मानव विकास की संकल्पनाएँ कौनसी है ?  या  मानव विकास के चार स्तंभ कौनसे है ?

उत्तर : मानव विकास की चार संकल्पनाएँ निम्न लिखित है |

1.       समता

2.       सतत पोषणीयता 

3.       उत्पादकता

4.       सशक्तिकरण

 

10TH CLASS lesson 1 geography question answers (land degradation, resource planning in india earth summit and agenda-21 etc)

भूमि निम्नीकरण किसे कहते है? भारत में भूमि निम्नीकरण के कारण कौन कौन से कारण है ? वर्णन कीजिए |

उत्तर : भूमि निम्नीकरण से अभिप्राय भूमि के गुणों में कमी होना है | विभिन्न प्रकार के मानवीय क्रियाकलापों के कारण भूमि का तेजी से निम्नीकरण हो रहा है | इन्हीं कार्यों से कुछ प्राकृतिक कारक जो भूमि निम्नीकरण करते है वे भी अधिक ताकतवर हो गए हैं और भूमि निम्नीकरण कर रहे हैं |

भारत में लगभग 13करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है |  कुल निम्नीकृत भूमिमें का लगभग 28 प्रतिशत वनों के अंतर्गत आती है | 56 प्रतिशत निम्नीकृत भूमि जल अपरदित है | शेष लगभग 16 प्रतिशत भूमि लवणीय और क्षारीय है | मानवीय क्रियाकलापों जैसे वनोन्मूलन (वनों की कटाई ), अति पशुचारण तथा खनन आदि ने भी भूमि निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है | भारत में भूमि निम्नीकरण के कारण निम्नलिखित है |

1.       खनन के कारण

खनन के बाद खदानों  वाले स्थानों कों गहरी खाइयों और मलबों के साथ खुला छोड दिया जाता है | जिससे भूमि निम्नीकरण होता है | भारत के झारखण्ड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा जैसे राज्यों में भूमि निम्नीकरण मुख्य कारण है |

2.       वनोन्मूलन के कारण

खनन क्रिया तथा अन्य कारणों से वनों की कटाई तेजी से होती है | जिससे भूमि अपरदन अधिक होता है और भूमि निम्नीकरण होता है | झारखण्ड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा में इस तरह भूमि निम्नीकरण होता है |

3.       अति चराई के कारण 

अति पशुचारण के कारण भूमि की ऊपरी परत कमजोर हो जाती है और  मृदा अपरदन होने से भूमि का निम्नीकरण होता है | गुजरात, राजस्थान ,मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में अति पशुचारण के भूमि निम्निकरण का मुख्य कारण है |

4.       अधिक सिंचाई के कारण

अति सिंचाई से उत्पन्न जलाक्रांता (भूमि में जल की मात्रा अधिक हो जाना ) भी भूमि निम्नीकरण के लिए उतरदायी है | क्योंकि इससे मृदा में क्षारीयता (अम्लीयता) और लवणता बढ़ जाती है | पंजाब , हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए उतरदायी है |

5.       उद्योगों में खनिज प्रक्रिया

उद्योगों में खनिज प्रक्रिया जैसे सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर कों पीसना तथा मृदा बर्तन उद्योग में चूने (खडिया मृदा ) और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धुल विसर्जित होती है | जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया रुक  हो जाती है |  अत: उद्योगों में खनिज प्रक्रिया भी भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है |

6.       औद्योगिक जल निकासी से भूमि निम्नीकरण

पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिकी जल की निकासी हो रही है |  इस औद्योगिक जल निकास के साथ उद्योगों से बहार आने वाला अपशिष्ट पदार्थ जल प्रदूषण के साथ साथ भूमि प्रदूषण भी करता है | जिससे भूमि निम्नीकरण हो रहा है |

प्रश्न : भूमि निम्नीकरण कों रोकने के कौन कौन से उपाय है वर्णन कीजिए ?

भूमि निम्नीकरण की समस्या कों सुलझाने के निम्नलिखित उपाय किए जा सकते है |

  क).            वनरोपण करके

पर्वतीय ढालों, मरुस्थलीय क्षेत्रों और बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों  में वृक्षारोपण करके  मृदा के अपरदन में कमी करके कुछ हद तक भूमि निम्नीकरण कों किया जा सकता है |  

 ख).            पेड़ों की रक्षक मेखला बनाकर

शुष्क क्षेत्रों में पेड़ों की रक्षक मेखला बनाकर मृदा अपरदन में कमी करके भूमि के निम्नीकरण कों कम किया जा सकता है |

   ग).            रेतीले टीलों में काँटेदार झाडियाँ लगाकर

रेतीले टीलों में काँटेदार झाडियाँ लगाकर इन्हें स्थिर बनाने की प्रक्रिया के द्वारा भी भूमि कटाव नियंत्रित करके और मरुस्थली करण कों रोककर भी भूमि निम्नीकरण कम किया जा सकता है |

   घ).            चरागाहों के उचित प्रबंधन के द्वारा

पशु चरते समय कृषि भूमि को ढीला करते  जिससे मृदा अपरदन की क्रिया कों बढ़ावा मिलता है | अत: पशुचारण कों नियंत्रित करके और चरागाहों के उचित प्रबंधन द्वारा भी भूमि निम्नीकरण कम किया जा सकता है |

   ङ).            बंजर भूमि का उचित प्रबंधन

बंजर भूमि कों सुधार कर कृषि योग्य बनाने या गैर कृषि कार्यों में प्रयोग किया जा सकता है जिससे उपजाऊ भूमि का निम्नीकरण कम किया जा सकता है |

  च).            खनन क्रियाओं पर नियंत्रण तथा प्रबंधन

खनन क्रियाओं को नियंत्रित करके और खनन के बाद खादानों कों सही तरीके से भरने से भूमि निम्नीकरण कों का किया जा सका है |

   छ).            औद्योगिक  अपशिष्ट जल का उचित प्रबंधन

औद्योगिक जल कों परिष्करण के बाद ही विसर्जित किया जाए | जिससे जल प्रदूषण के साथ साथ भूमि प्रदूषण में भी कमी आएगी |

प्रश्न : संसाधन विकास किसे कहते है ?

उत्तर : संसाधनों का समझ के साथ उचित प्रयोग करना ही संसाधन विकास कहलाता है |

प्रश्न : संसाधनों के विकास संबंधी समस्याओं के क्या कारण है ?

उत्तर : हमें पता है कि संसाधन मनुष्य जीवन के लिए अति आवश्यक है | ये हमारे जीवन की गुणवत्ता को भी बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है | ये भी विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है  और कभी खत्म नहीं होंगें | इसी कारण इनका अंधाधुंध प्रयोग करना शुरू कर दिया |  जिससे संसाधनों की कमी होने की समस्या दिखाई देने लगी | जो समस्याएँ पैदा हुई उनके निम्नलिखित कारण है |

1.       कुछ व्यक्तियों के लालच के कारण संसाधनों का तेजी से दोहन हुआ और ये तेजी से घटते चले गए |

2.       संसाधन कुछ ही लोगों के हाथों में आ गए  है, जिससे संसाधनों के हिसाब से हमारा समाज दो भागों में  बँट गया है | एक संसाधन संपन्न (अमीर) समाज तथा दूसरा संसाधन विहीन (गरीब) समाज |

3.       संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गए है | जैसे भू मंडलीय तापन (ग्लोबल वार्मिंग), ओजोन परत अवक्षय (ओजोन परत का घटना ), पर्यावरण प्रदूषण तथा भूमि निम्नीकरण आदि |

प्रश्न : संसाधनों के उपयोग की योजना बनना क्यों अति आवश्यक है ?

उत्तर : हम जानते है की संसाधन मनुष्य जीवन के लिए अति आवश्यक है | ये सीमित भी है | यदि कुछ व्यक्तियों के द्वारा संसाधनों का दोहन इसी गति से होता रहा तो आने वाली पीढ़ियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा | क्योंकि हम उनके हिस्से के संसाधन भी प्रयोग कर रहे है और बर्बाद कर रहे है |

मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व में शांति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्याय संगत बँटवारा जरूरी हो जाता है | इसी तरह  हर प्रकार के जीवों की सुरक्षा और उनके जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए संसाधनों के सही उपयोग की योजना बनानी आवश्यक हो जाती है | सतत पोषणीय विकास की धारणा के अनुसार कार्य करके हम संसाधनों का योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग कर सकते है | 

प्रश्न : सतत पोषणीय विकास किसे कहते है?

उत्तर : सतत पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण कों बिना नुक्सान पहुँचाए हो | वर्तमान विकास भी होता रहे तथा  भविष्य में आने वाली पीढियों  की भी अवहेलना ना हो  अर्थात उनके लिए भी पर्याप्त संसाधन बने रहे |

प्रश्न : पृथ्वी सम्मलेन 1992 (रियो –डी-जेनेरो सम्मलेन ) पर नोट लिखो |

उत्तर : जून 1992 में ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो में विश्व के 100 से अधिक देशों के राष्ट्र अध्यक्षों का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ |  जो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास सम्मलेन के तत्वाधान में किया गया था | यह सम्मेलन विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक – आर्थिक विकास के कार्यों  के बीच में आने वाली समस्यायों के हल निकालने के लिए किया गया था | इसे प्रथम पृथ्वी सम्मलेन  कहा जाता है | 

इस सम्मलेन में शामिल हुए नेताओं ने भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता पर तैयार एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए |

इस सम्मलेन में नेताओं ने भू मंडलीय वन सिद्धांतों पर सहमति जताई |

इस  सम्मलेन में  21वीं शताब्दी में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने के लिए एजेंडा –21 पर स्वीकृति प्रदान की |

प्रश्न : एजेंडा – 21 पर संक्षिप्त नोट लिखो ?

उत्तर : जून 1992 में ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो में विश्व के 100 से अधिक देशों के राष्ट्र अध्यक्षों द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था | जिसमें एक एक घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास सम्मलेन के तत्वाधान में स्वीकृत किया गया था | जिसका उद्देश्य भूमंडलीय सतत पोषणीय विकास हासिल करना है |  जिसे एजेंडा –21 कहा गया |

एजेंडा –21 एक घोषणा पत्र की कार्य सूची है | जिसका उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मलित  जिम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय क्षति कों रोकना, गरीबी और रोगों कों मिटाना है |

एजेंडा –21 का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना खुद का एजेंडा –21 तैयार करे | जिससे सतत पोषणीय विकास कों हासिल किया जा सके |

प्रश्न : भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर : संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन एक सर्वमान्य रणनीति है | भारत में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है | यहाँ के कुछ प्रदेशों में संसाधनों की प्रचुरता है तो कुछ प्रदेश ऐसे भी है जहाँ संसाधनों की कमी है | अर्थात भारत में संसाधनों का वितरण असमान है |  उदाहरण के लिए झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ आदि राज्यों में कोयले तथा अन्य खनिजों के प्रचुर भंडार है | अरूणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है | लेकिन इन सभी राज्यों में मूल विकास (आधारभूत विकास) की कमी है | राजस्थान में पवन तथा सौर ऊर्जा संसाधनों  बहुत अधिक है | लेकिन जल संसाधन की कमी है | लद्दाख सांस्कृतिक विरासत का धनी प्रदेश है | लेकिन यह देश से बिल्कुल अलग एक शीत मरुस्थलीय क्षेत्र है जहाँ पर जल, आधारभूत संरचना तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की भी कमी है | इसलिए हम कह सकते है की भारत में संसाधनों का वितरण असमान है | इसलिए संतुलित विकास के लिए राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक (क्षेत्रीय) और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है |

प्रश्न : भारत में संसाधन नियोजन की प्रकिया के सोपान कौन कौन से है ?

उत्तर : संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है | भारत में संसाधन नियोजन के कुछ सोपान (steps) निम्नलिखित है |

   क).            देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना | इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना, संसाधनों का गुणात्मक और मात्रात्मक अनुमान लगाना तथा उनका मापन करना शामिल है |

  ख).            संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल तथा संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना |

    ग).            संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना |

प्रश्न : किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों के साथ साथ प्रौद्योगिकी भी आवश्यक स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर : किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक अनिवार्य शर्त है | लेकिन प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के अनुसार परिवर्तन विकास के लिए जरूरी है क्योंकि अगर प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के अनुसार परिवर्तन नहीं होते तो विकास संभव नहीं है | भारत में ही हम देखते है कि बहुत से ऐसे क्षेत्र है जो संसाधनों से समृद्ध है लेकिन आर्थिक विकास में बहुत पीछे रह गए है क्योंकि वहाँ समय के अनुरूप प्रौद्योगिकी का प्रयोग नहीं हो रहा है |  जैसे ओडिसा, बिहार, छतीसगढ आदि | इसके विपरीत जहाँ पर अच्छी और विकसित प्रौद्योगिकी है वे क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की कमी के बावजूद आर्थिक रूप से विकसित है | जैसे हरियाणा, पंजाब आदि | इसलिए  किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों के साथ साथ प्रौद्योगिकी भी आवश्यक है |

प्रश्न : प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में समय के अनुसार परिवर्तन उपनिवेशी शासन के दौरान भारत में संसाधनों का दोहन किस प्रकार हुआ है ?

अथवा

भारत में  उपनिवेशी शासन के दौरान विकास के साथ - साथ भारत में संसाधनों का दोहन किस प्रकार हुआ है ?

उत्तर : उपनिवेशन इतिहास हमें बताता है की उपनिवेशों के संसाधन सम्पन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे है | क्योंकि इन आक्रमणकारी (उपनिवेशकारी ) देशों के पास अच्छी प्रौद्योगिकी थी जिसके दम पर उन्होंने इन प्रदेशों के संसाधनों का जमकर शोषण किया और उन पर अपना अधिकार स्थापित किया |

इससे स्पष्ट होता है कि संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते है | जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास तथा संस्थागत परिवर्तन किए जाए | उपनिवेशन के इतिहास के विभिन्न चरणों में भारत ने इसका अनुभव किया है | अत: भारत में समान्य तथा संसाधन विकास लोगों के पास उपलब्ध संसाधनों पर ही मुख्य रूप से आधारित नहीं था | बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है | 

प्रश्न : संरक्षण की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर : संसाधनों के विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है | बढती हुई जनसँख्या और औद्योगिक विकास के कारण संसाधनों का दोहन तेजी से हो रहा है | इसी तरह से संसाधनों का ह्रास होता रहा तो आने वाली पीढ़ी के लिए संसाधन नहीं रहेंगें | साथ ही संसाधनों के विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई प्रकार की सामाजिक –आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है | इन समस्याओं से बचाव के लिए और आने वाली पीढ़ी के के लिए संसाधनों का संरक्षण बहुत आवश्यक है |

प्रश्न : गाँधी जी के अनुसार संसाधनों के संरक्षण की अवधारणा स्पष्ट कीजिए ?

अथवा

संसाधनों के संरक्षण पर गाँधी जी चिंता क्या थी ?

उत्तर : गाँधी जी ने संसाधनों के संरक्षण पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा की – “हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकत की पूर्ति के लिए बहुत कुछ है | लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं अर्थात हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ है पेटी भरने के लिए नहीं |”

उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधनों की कमी के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृति जिम्मेवार है |  वे एक या कुछ व्यक्तियों द्वारा अधिक उत्पादन के विरुद्ध थे |   जबकि एक स्थान पर बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे |

प्रश्न : अतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण  के लिए उठाए गए कदम कौन कौन से है ?

उत्तर : क्लब ऑफ रोम :-  क्लब ऑफ रोम (Club of Rome) ने 1968 में सबसे पहले अतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण की वकालत शुरू की |

स्माल इज ब्यूटीफुल :-  1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक “स्माल इज ब्यूटीफुल” में संसाधन संरक्षण के गाँधी जी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृति की |

ब्रुटलैंड आयोग 1987 तथा  ब्रुटलैंड आयोग रिपोर्ट :- 1987 में ब्रुटलैंड आयोग ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें वैश्विक स्तर पर संसाधनों के संरक्षण पर मूलाधार योगदान दिया | इस रिपोर्ट ने सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की | बाद में यह रिपोर्ट  “हमारा साँझा भविष्य” (Our Common Future) के शीर्षक से प्रकाशित हुई |

पृथ्वी सम्मेलन (1992) :- अतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण के लिए योगदान 1992 में ब्राजील के शहर रियो - डी - जेनेरो में हुए पृथ्वी सम्मेलन के द्वारा भी दिया गया |