अध्याय 2
वन एवं वन्यजीव
संसाधन
कक्षा -10वीं
(समकालीन भारत -2)
प्रश्न: इनमें से कौन सी टिप्पणी प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणीजात के
ह्रास का सही कारण नहीं हैं ?
क).
कृषि प्रसार |
ख).
बृहत स्तरीय विकास परियोजनाएं |
ग).
पशुचारण और ईंधन लकड़ी एकत्रित
करना |
घ).
तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण |
उत्तर
: पशुचारण और ईंधन लकड़ी एकत्रित करना
प्रश्न: इनमें से कौन सा
संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता ?
क).
संयुक्त वन प्रबंधन |
ख).
चिपको आंदोलन |
ग).
बीज बचाओ आंदोलन |
घ).
वन्य पशुविहार (Sanctuary) का परिसीमन |
उत्तर
: वन्य पशु विहार (Sanctuary) का परिसीमन
प्रश्न : निम्नलिखित का मेल करें |
आरक्षित
वन रक्षित
वन अवर्गीकृत
वन |
सरकार,
व्यक्तियों के निजी और समुदायों के अधीन
अन्य वन और बंजर भूमि | वन और
वन्यजीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से
सर्वाधिक मूल्यवान वन | वन भूमि
जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है | |
उत्तर
:
आरक्षित वन |
वन और वन्यजीव
संसाधन संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक
मूल्यवान वन | |
रक्षित वन |
वन भूमि जो और अधिक
क्षरण से बचाई जाती है | |
अवर्गीकृत वन |
सरकार, व्यक्तियों
के निजी और समुदायों के अधीन अन्य वन और
बंजर भूमि | |
प्रश्न: जैव विविधता क्या है ? यह मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्यों
है ?
उत्तर:
पृथ्वी पर मानव, विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे
जीव-जंतु, सूक्ष्म-जीवाणु, बैक्टीरिया जिसमें जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी,
ब्लू व्हेल, विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी आदि सभी मिलकर रहते है | जीवों की इस
भिन्नता कों ही जैव विविधता कहते है | जिन पारिस्थितिक तंत्रों में जीवों कों
प्रजातियाँ जितनी अधिक होंगी जैव विविधता उतनी ही अधिक होगी |
जैव
विविधता का मानव जीवन के लिए महत्व
मानव
अपने पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा मात्र है | हम अपने अस्तित्व के लिए भिन्न –भिन्न
तत्वों पर निर्भर करते है | पारिस्थितिक तंत्र में पायी जाने वाली जैव विविधता इन
तत्वों कों हमे प्रदान करती है | इसलिए जैव विविधता मानव जीवन के लिए बहुत अधिक
महत्वपूर्ण होती है | मानव के लिए इसके महत्व कों निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते
हैं |
1. विविध
प्रकार के पौधे वायु कों शुद्ध करते है | इसी वायु की सहायता से हम साँस लेते है |
2. पानी
की गुणवता बढ़ाने में अनेक सूक्ष्म जीवों का योगदान होता है |
3. विभिन्न
प्रकार के जीवाणु तथा पेड़ –पौधे मृदा की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते है | इसी मृदा से हम अनाज तथा भोजन के अन्य पदार्थ पैदा करते है |
4. वन
में पाए जाने वाले पेड़ –पौधे तथा जीव –जंतु पारिस्थितिक तंत्र कों संतुलित करने
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है | क्योंकि वन प्राथमिक उत्पादक है दूसरे जीव
इन्हीं पर निर्भर होते है |
प्रश्न: विस्तार पूर्वक बताए कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक
वनस्पतिजात और प्राणीजात के ह्रास कारक हैं ?
उत्तर:
मानव क्रियाएँ प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणीजात के ह्रास कारण बनती हैं | जो
निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है |
1. मनुष्य
ने अपने आवास, कृषि के विस्तार तथा उद्योगों की स्थापना के लिए वनों का विनाश किया
है | वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण कई प्राणियों के आश्रय स्थल (आवास स्थान )
नष्ट हो गए है | परिणाम स्वरूप बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी है या विलुप्त
होने के कगार पर हैं |
2. मनुष्य
द्वारा कृषि के विशिष्टिकरण करने से पादपों तथा वन्य प्राणियों पर बुरा प्रभाव पड़ा
है | मनुष्य अपने लाभ के लिए एक विशेष प्रकार की फसल अथवा पेड़-पौधे उगाने पर बल
देने लगा है | जिससे अन्य प्रजातियों के पेड़-पौधों की अवहेलना हुई है | परिणाम
स्वरूप वे विलुप्त होती जा रही है |
3. उद्योगों
के द्वारा किया जाने वाला प्रदूषण विशेषकर रासायनिक उद्योगों के कारण भूमि तथा जल
प्रदूषण किया जाता है \ इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है| इसके अलावा
विभिन्न प्रकार के जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है |
प्रश्न: भारत में विभिन्न समुदायों ने किस प्रकार वनों और वन्यजीव संरक्षण और रक्षण में योगदान किया है?
अथवा
प्रश्न: भारत में वनों और वन्य जीवन संरक्षण में समुदायों की भूमिका के
महत्व की व्याख्या कीजिए |
उत्तर:
भारत के कुछ परम्परागत समुदायों का वनों से गहरा नाता है | ये उनके आवास के
साथ-साथ उनकी आजीविका के साधन भी है | अत: ये समुदाय अपने आवास तथा आजीविका की
रक्षा के लिए वनों की रक्षा करते हुए संघर्ष कर रहे हैं | इस समुदायों द्वारा वनों
एवंवन्य जीवन के संरक्षण और रक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है | जिसका का वर्णन इस प्रकार से है |
क).
भारत के कुछ क्षेत्रों में
स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर अपने आवास स्थलों के संरक्षण में
लगे हुए है | क्योंकि इसी से ही दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती
है |
ख).
सरिस्का बाघ रिजर्व में राजस्थान
के गांवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम के अंतर्गत वहाँ से खनन कार्य बंद करवाने
के लिए संघर्ष कर रहें हैं |
ग).
कई क्षेत्रों में तो लोग
स्वयं वन्य जीव आवासों की रक्षा कर रहे हैं और सरकार के हस्तक्षेप कों भी स्वीकार
नहीं कर रहे हैं | उदाहरण के लिए राजस्थान के अलवर जिले में 5 गाँवों के लोगों ने 1,200
हेक्टेयर वन भूमि “भैरोंदेव डाकव सोंचुरी” (Bhairodev Dakav Sonchuri) घोषित कर दी है | जिसके अपने ही नियम और कानून
हैं | जी शिकार कों रोकने तथा बाहरी लोगों की घुसपैंठ से यहाँ के वन्य जीवन कों
बचाते हैं |
घ).
हिमालय के क्षेत्रों में चला
चिपको आंदोलन ने दिखाया है कि स्थानीय पौधों की जातियों का प्रयोग करके सामुदायिक
वनीकरण अभियान कों सफल बनाया ज सकता है |
ङ).
पारम्परिक संरक्षण तरीकों
कों पुनर्जीवित करना अथवा पारिस्थितिकी कृषि के लिए नए तरीकों का विकास अब व्यापक
रूप से प्रयोग में लाया जाने लगा है | जैसे
टिहरी में किसानों के “बीज बचाओ आंदोलन” और “नवदानय” ने दिखा दिया है कि
रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक लाभ के
लिए कृषि उत्पादन संभव है |
च).
भारत के विभिन्न आदिवासी और
जनजातीय क्षेत्रों के समुदायों के द्वारा विशेष वृक्षों तथा वनों कों देवी –देवताओं
कों समर्पित करके उनकी पूजा करते है |
प्रश्न: वन और वन्यजीव संरक्षण में सहयोगी रीती रिवाजों पर एक निबन्ध
लिखिए |
उत्तर:
भारत में कई ऐसी रीति-रिवाज हैं जो वन और वन्य जीव संरक्षण में सहयोगी होते है
|जिसमें प्रकृति की पूजा, विशेष वृक्षों की पूजा तथा विभिन्न संस्कृतियों द्वारा
वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के पारम्परिक तरीके है | इन सहयोगी रीति रिवाजों के से
संबंधित वर्णन निम्नलिखित है |
प्रकृति
की पूजा के द्वारा वन और वन्य जीव संरक्षण
सदियों से भारत में रहने वाली जनजातियाँ
प्रकृति की पूजा में विश्वास रखती है | उनका मानना है की प्रकृति के प्रत्येक रूप
की रक्षा करनी चाहिए | उनके इसी विश्वास ने विभिन्न वनों कों मूल और कौमार्य (नए )
रूप में बचा कर रखा हुआ है | जनजातीय लोग
इनको पवित्र पेड़ों के झुरमुट (देवी
देवताओं के वन) कहते है | ये कबीले वनों कों पवित्र कर इनकी पूजा करते है | इन
वनों में ना तो स्थानीय लोग घुसते हैं और ना ही किसी और कों इनमें छेड़छाड़ करने
देते है | जिससे कई वनों का संरक्षण हुआ है |
विशेष
वृक्षों की पूजा के द्वारा वन और वन्य जीव संरक्षण
कुछ समाज
आदिकाल से ही कुछ विशेष पेड़ों कों पूजनीय मानकर उनकी पूजा करते आये हैं |
अत: वे उनका आदिकाल से ही संरक्षण करते
रहे हैं | उदाहरण के लिए छोटा नागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ
और कदंब के पेड़ों की पूजा करते हैं | उड़ीसा (ओडिसा) और बिहार की जनजातियाँ पुराने
समय से ही शादी के समय इमली और आम के
वृक्षों की पूजा करते हैं | इसी प्रकार बहुत से लोग पीपल तथा वटवृक्ष कों पूजनीय
मानते है और उनका संरक्षण करते हैं |
विभिन्न
संस्कृतियों द्वारा वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के पारम्परिक तरीके
भारतीय समाज अनेक संस्कृतियों मिला
जुला रूप है | प्रत्येक संस्कृति के लोग अपने परम्परागत तरीकों से प्रकृति तथा
उसकी रचना (कृतियों) कों संरक्षित करने में योगदान देते हैं | आमतौर पर झरनों,
पहाड़ी चोटियों, पेड़ों और पशुओं कों पवित्र मानकर उनका संरक्षण किया जाता है | कई मंदिरों
के आस-पास हम बंदर तथा लंगूर देखते है | मंदिर में आने वाले उपासक इन्हें भक्त
मानकर खाने की वस्तुएँ देते है | उदाहरण के लिए राजस्थान में बिश्नोई समुदाय के
गाँवों में काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय, और मोरों के झुण्ड देखे जा सकते है | ये
वहाँ के समुदाय का अभिन्न हिस्सा है और उनको किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते
है | यहाँ के लोग भी उनकी रक्षा करते है |
प्रश्न: वनों का पारिस्थितिक तंत्र में महत्व बताएँ |
उत्तर:
वन पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख भाग है | ये पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते है | क्योंकि ये सभी प्रकार
के पारिस्थितिक तंत्रों में प्राथमिक उत्पादक होते है | दूसरे सभी जीव प्रत्यक्ष
तथा अप्रत्यक्ष रूप से इन्हें पर निर्भर करते है | इसलिए वन
प्रश्न: बाघों की संख्या कम होने के कौन –कौन से कारण हैं ? अथवा
प्रश्न : बाघों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है ?
वन्यजीवन
संरचना में बाघ (टाइगर) एक महत्वपूर्ण जंगली जानवर है | 1973 में अधिकारियों ने
पाया कि देश में बींसवीं शताब्दी के आरम्भ में बाघों की संख्या में तेजी से कमी आई
है | जो अनुमान के अनुसार 55,000 से घटकर केवल 1827 रह गई है | बाघों की संख्या में इस कमी के निम्नलिखित कारण रहे हैं |
1) बाघों
कों मारकर उनकी चोरी करना |
2) बाघों
के आवासीय स्थलों का सिकुडना |
3) बाघों
के भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होते जाना |
4) जनसँख्या
में वृद्धि भी इनकी संख्या में कमी का एक कारण है क्योंकि वन तेजी से काटे ज रहे
है |
5) बाघों
की खाल का व्यापार तथा एशियाई देशों में परम्परागत औषधियों के रूप में बाघ की
हड्डियों का प्रयोग होने से इनकी जाति विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी है |
6) भारत
और नेपाल दुनिया की दो –तिहाई बाघों की संख्या कों आवास प्रदान करते है | इसलिए बाघों के शिकार, चोरी तथा व्यापार करने वाले
लोगों के लिए ये दोनों देश प्रमुख रूप से निशाने पर है |
प्रश्न : बाघ परियोजना (प्रोजेक्ट टाइगर)पर नोट लिखे |
उत्तर: बाघ परियोजना के अंतर्गत हम बाघों की संख्या कम
होने के कारणों तथा भारत सरकार द्वारा
वन्यजीवन
संरचना में बाघ (टाइगर) एक महत्वपूर्ण जंगली जानवर है | सन् 1973 में अधिकारियों
ने पाया कि देश में बींसवीं शताब्दी के आरम्भ में बाघों की संख्या में तेजी से कमी
आई है | जो अनुमान के अनुसार 55,000 से घटकर केवल 1827 रह गई है | इसके विलुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार द्वारा इस
परियोजना कों चलाया जा रहा है |
प्रोजेक्ट
टाइगर (बाघ परियोजना) बाघों कों संरक्षण प्रदान करने की एक महत्वपूर्ण परियोजना है
| यह विश्व की बेहतरीन वन्यजीव परियोजनाओं में से एक है |
सन् 1973 में इस परियोजना कों शुरू किया गया था | वन और पर्यावरण
मंत्रालय भारत सरकार के 2009-10
के आंकडो के अनुसार बाघ
परियोजना के लिए 32137 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 39 बाघ आरक्षित क्षेत्र थे | जो सन् 2016 में
71027 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 51 बाघ
आरक्षित क्षेत्र हो गए |
सन् 1985 में इनकी
संख्या 4,002 थी | जो 1989 में 4,334 हुई | सन् 1993 में इनकी
संख्या कम होकर 3,600
रह गयी | सन् 2016 में इनकी संख्या 3,890 हो गई |
बाघ संरक्षण की यह योजना केवल संकटग्रस्त
बाघों की जाति के लिए ही नहीं है | अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति
कों भी बचाना है |
भारत के कुछ प्रमुख बाघ आरक्षित क्षेत्र
निम्नलिखित है |
1)
उतराखंड में जिम कार्बेट
राष्ट्रीय उद्यान (जिम कार्बेट नेशनल पार्क)
2) पश्चिम
बंगाल में सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान (सुंदरवन नेशनल पार्क)
3)
मध्यप्रदेश में बांधवगढ़
राष्ट्रीय उद्यान (बांधवगढ़ नेशनल पार्क)
4)
राजस्थान में सरिस्का वन्य
जीव पशु विहार (सरिस्का वाइल्ड लाइफ सेंचुरी )
5)
असम में मानस बाघ आरक्षित
क्षेत्र (मानस टाइगर रिजर्व )
6)
केरल में पेरियार बाघ
आरक्षित क्षेत्र (पेरियार टाइगर रिजर्व )
प्रश्न : वनों तथा वन्य जीवों का संरक्षण क्यों आवश्यक है ?
उत्तर
– वनों तथा वन्य जीवों के लिए संरक्षण आवशयक ही नहीं अनिवार्य है –
1. वन
संरक्षण से ही जैव –विविधता कों बनाए रखा ज सकता है |
2. इससे
हमारे जीवन को आश्रय देने वाले घटकों अर्थात जल, वायु,तथा मिट्टी कों भी सुरक्षित
रखा ज सकता है |
3. वन्य
जीवों कों संरक्षण से पौधों और प्राणियों की जीव-विविधता सुरक्षित रहती है | जो
पहले से अच्छी प्रजातियों के विकास में सहायक
होती है| उदाहरण के लिए हम अभी तक फसलों की परंपरागत विविधता पर ही निर्भर
है | संरक्षण द्वारा इसे नया रूप दिया जा सकता है |
4. मछलियों
का विकास भी जलीय जीव विविधता की सुरक्षा पर निर्भर करता है |
प्रश्न : वन संरक्षण के उपायों का वर्णन कीजिए |
उत्तर -- वनों का लगातार कम होना एक राष्ट्रीय समस्या
है | इस समस्या को सर्कार के विभिन्न विभागों द्वारा आपसी सहयोग से प्रयास किए
जा रहे है | लेकिन इसके साथ ही वनों के
संरक्षण में सामान्य लोगो की भागीदारी का भी विशेष महत्व है | वनों के संरक्षण के
लिए निम्लिखित उपाय किए जाने चाहिए |
1. वन
आरोपण और सामाजिक वानिकी कार्यकर्मों के द्वारा वन आवरण क्षेत्र में वृद्धि के
प्रयास करने चाहिए |
2. लोगों
में वनों तःथा वन्य उत्पादों के प्रति
जागुरुक्ता पैदा की जानी चाहिए |
3. लोगों
में वनों की कटाई कों कम करने तथा नए वृक्ष लगाने के लिए जागुरुकता पैदा की जानी
चाहिए |
4. सभी
राष्ट्रीय पर्वों को वृक्ष आरोपण से जोड़ा जाए | और अधिक् से अधिक पेड़ इन पर्वों पर
लगाए जाए |
5. मौजूदा
वनों से दबाव कम करने तथा राष्ट्रीय वन निति
के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वन
संरक्षण में महिलों की भागीदारी बढ़ानी
चाहिए |
6. ग्रामीण
लोगों की इंधन सम्बन्धी तथा वन उत्पादों सम्बन्धी आव्शाक्तों की पूर्ति के लिए नए विकल्प ढूंढने चाहिए
ताकि उनकी वन पर निर्भरता कम हो |
प्रश्न : संयुक्त वन प्रबंधन ( JFM) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |
उत्तर :
भारत में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम क्षरित वनों के प्रबंधन और
पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका के महत्व कों उजागर करतें है |
औपचारिक रूप में इन कार्यक्रमों की शुरुआत 1988 में हुई
| जब उड़ीसा राज्य ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया |
वन विभग के अंतर्गत संयुक्त
वन प्रबंधन क्षरित वनों के बचाव के लिए कार्य करता है और इसमें गांव के स्तर पर
संस्थाएँ बनाई जाती है | जिसमें ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से
कार्य करते है | इसके बदले ये समुदाय मध्य स्तरीय लाभ जैसे गैर इमारती वन उत्पादों
के हक़दार होतें हैं तथा साफक संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी के लाभ में भी इनकी
भागीदारी होती है |
प्रश्न : चिपको आंदोलन तथा बीज बचाओ आंदोलन का क्या महत्व है ?
उत्तर
:
चिपको
आंदोलन
वनों
कों विनाश से बचाने में चिपको आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | हिमालय
क्षेत्र के इस आंदोलन ने कई प्रदेशों में वनों के कटाव का सफलता पूर्वक विरोध किया
है | इसने यह भी दिखा दिया है कि स्थानीय पौधों के प्रयोग से सामुदायिक वन रोपण
कों पूरी तरह सफल बनाया जा सकता है |
बीज
बचाओ आंदोलन
आज
संरक्षण के परम्परागत तरीकों कों पुनर्जीवित करने के साथ साथ नए नए तरीकों के
विकास के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं | ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे | आज
टिहरी में किसान बीज बचाओ आन्दोलन कों महत्व देते हैं | इसने यह दिखाया है कि
रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध प्रकार की फसलें उगाई ज सकती हैं |
जो आर्थिक दृष्टि से अधिक उपयोगी है |
प्रश्न: संवर्धन वृक्षारोपण
क्या है ? दो उदारहण देकर स्पष्ट कीजिए कि इससे पेड़-पौधों की
कुछ जतियों को क्षति पहुंची है ?
उत्तर
: संवर्धन वृक्षारोपण में आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान कोई प्रजाति बड़े
पैमाने पर उगाई जाती है और अन्य प्रजातियों का सफाया कर दिया जाता है | उदारहण के लिए टीके के पेड़ों को बड़े पैमाने पर उगाने से दक्षिण भारत के
प्राकृतिक वनों को भारी क्षति पहुंची है | इसी प्रकार हिमालय
क्षेत्र में चीड़पाइन के बगानों ने ओक तथा रोड़ोडेंड्रोनके वनों को समाप्त कर दिया
है |
प्रश्न : वनों के विनाश के
दो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणाम बताओ |
उत्तर
:
प्रत्यक्ष
परिणाम
1. वनों
के विनाश से निर्धनता को बढ़ावा मिला है |
2. इससे
बहुत से प्रदेशों में महिलाओं के जीवन को नीरस बना दिया है और उनके स्वास्थ्य पर
बुरा प्रभाव डाला है |
अप्रत्यक्ष
परिणाम
1. वनों
के विनाश से बाढ़ों की समस्या गंभीर हो गई है |
2. इससे
सूखे को बढ़ावा मिला हैं |
प्रश्न : भारतीय वन्य जीवन
(सुरक्षा) अधिनियम सर्वप्रथम कब लागू किया गया ? इसका मुख्य
उद्देश्य क्या था ?
उत्तर
:
भारतीय वन्य जीवन (सुरक्षा) अधिनियम 1972 में लागू किया गया था | इसका उद्देश्य वन्य प्राणियों के शिकार पर रोक लगाना ,उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना तथा अवैध व्यापार पर रोक लगाना
था |
प्रश्न: वनों तथा वन्य
जीवों का विनाश एक सांस्कृतिक समस्या भी है | स्पष्ट कीजिए | अथवा
प्रश्न : वनों तथा वन्य जीवों के विनाश के कारण स्त्रियों के जीवन पर
क्या प्रभाव पड़े है ?
उत्तर
: वनों तथा वन्य जीवों का विनाश पर्यावरण की समस्या तो है | साथ ही इससे
देश की सांस्कृतिक विविधता को भी क्षति पहुंची है| इसके
परिणामस्वरूप वनों तथा वन्य जीवों पर भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
निर्भर अनेक समुदाय गरीबी का शिकार हो गए हैं | निर्धनों में
भी पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ा है | बहुत से समाजों में ईंधन ,चारा, पानी आदि लाने की ज़िम्मेदारी मुख्यत: स्त्रियों पर ही है | जिससे वन संसाधनों के विनाश ने स्त्रियों के जीवन को थकान भरा तथा नीरस
बना दिया है| अब वन उत्पादों को इकट्ठा करने के लिए मिलों
दूर जाना पड़ता है | कामकाज का बोझ बढ़ने से उनके स्वास्थ्य पर
बुरा प्रभाव पड़ा है| वे अपने घर तथा बच्चों की देखभाल भी
पूरी तरह नहीं कर पातीं |
प्रश्न: भारत के वन
संसाधनों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जा सकता है ? अथवा
प्रश्न : प्रबंधन या नियंत्रण कि दृष्टि से भारत के वन संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए |
उत्तर : वनों के प्रबंधन नियंत्रण और
विनियमन का कार्य अपेक्षाकृत कठिन कार्य है | भारत में अधिकतर वन और वन्य जीवन या
तो प्रत्यक्ष रूप से सरकार के अधिकार क्षेत्र में है या वन विभग अथवा अन्य सरकारी
विभागों की सहायता से उन पर नियंत्रण रखे हुए हैं | भारत में
वन संसाधनों कों तीन प्रकार के वनों आरक्षित वन, संरक्षित वन तथा अवर्गीकृत वन में
वर्गीकृत किया जा सकता है | इनका वर्णन निम्नलिखित है |
आरक्षित
वन - भारत
के कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक भाग को आरक्षित वन घोषित किया गया है | वनों तथा वन्य जीवन की दृष्टि से ये वन सबसे अधिक मूल्यवान हैं | आरक्षित वनों का सबसे अधिक विस्तार जम्मू और कश्मीर , आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडू, पश्चिमी बंगाल तथा महाराष्ट्र में हैं |
संरक्षित (सुरक्षित) वन
- इन वनों के अधीन भारत के कुल क्षेत्र का लगभग एक तिहाई भाग
आता है | इन वनों को और अधिक क्षति से बचाने के लिए वन-विभाग द्वारा इन्हें
संरक्षित घोषित किया गया है| बिहार,हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा
तथा राजस्थान के अधिकांश वन संरक्षित वनों के अंतर्गत आते है|
आरक्षित
तथा संरक्षित वनों को स्थायी वन क्षेत्र भी कहा जाता है | इन वनों का विकास इमारती लकड़ी तथा अन्य वन उत्पादों की प्राप्ति और रक्षा
की दृष्टि से किया गया है | स्थायी वनों का सबसे विस्तृत
क्षेत्र मध्य प्रदेश में हैं जो ऐसे वनों का 75 प्रतिशत है |
अवर्गीकृत
वन - आरक्षित
तथा संरक्षित वनों के अतिरिक्त वन तथा
बंजर भूमिया अवर्गीकृत वनों की श्रेणी में शामिल हैं | इन वनों पर सरकार या किसी समुदाय अथवा व्यक्ति समूह का निजी स्वामित्व है
| इस तरह के वन मुख्यत: उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा गुजरात के
कुछ भागों में फैले हुए हैं|
प्रश्न : मानव के लिए वन किस प्रकार उपयोगी हैं ?
उत्तर
: मानव के लिए वन प्रकृति की अमूल्य भेंट हैं | इनका मानव
जीवन में बहुत ही उपयोगी स्थान है | ये निम्नलिखित प्रकार से
मानव के लिए उपयोगी है |
1. वन
पर्यावरण की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है |
2. वन
स्थानीय जलवायु में सुधार करते है |
3. वन
मृदा अपरदन को नियंत्रित कतरे है |
4. वन
नदी प्रवाहों को नियंत्रित करके बाढ़ों को रोकते है |
5. विभिन्न
उद्योगों के संचालन के लिए वन कच्चा माल उपलब्ध कराते है |
6. वन
मानव को आजीविका का उपलब्ध कराते है |
7. वन
मनोरंजन साधन उपलब्ध कराते हैं|
8. वनों
से इमारती लकड़ी और ईंधन की लकड़ी मिलती हैं |
9. वन
हमें फल और अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ
प्रदान करते है |
10. वन
वन्य जीवों के लिए प्राकृतिक पर्यावरण प्रदान करते है |
11. वनों
से हमें चारा, गोंद इत्यादि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त
होती हैं |
प्रश्न :भारत में पर्यावरणीय ह्रास पर्यावरण के सभी रूपों होता हुआ
दिखाई देता है | कुछ उदाहरणों के द्वारा इस तथ्य कों स्पष्ट कीजिए |
उत्तर:
भारत में पर्यावरणीय ह्रास पर्यावरण के सभी रूपों होता हुआ दिखाई देता है | जो
निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट है |
1. भारत
के आधे से भी अधिक प्राकृतिक वन नष्ट होचुके हैं |
2. देश
की लगभग एक तिहाई आद्र भूमियाँ सुख चुकी है |
3. देश
के 70 प्रतिशत धरातलीय जल भंडार दूषित हो चुके है |
4. 40 प्रतिशत मैंग्रोव सूख गए हैं |
5. देश
के पौधों तथा प्राणियों की हजारों जातियाँ शिकार तथा वन्य प्राणियों के व्यापार के
कारण विलुप्त होने के कगार पर है |