Tuesday, September 21, 2021

URBAN SETTLEMENT: DEVELOPMENT, MEANING CLASSIFICATIONS (LESSON 10 HUMAN SETTLEMENT)

 विश्व में नगरीय बस्तियों का विकास

नगरीय बस्तियाँ प्राचीन काल से ही विकसित होती रही है | लेकिन तीव्र नगरीय विकास एक नई परिघटना है |कुछ समय पूर्व तक  बहुत ही कम बस्तियाँ कुछ हजार से अधिक जनसंख्या वाली होती थी |  औद्योगिक क्रान्ति के बाद इसमें तेजी से बढोतरी हुई है | विश्व में नगरीय बस्तियों के विकास कों हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |

1810 में लन्दन ऐसी पहली नगरीय बस्ती थी जिसकी जनसंख्या दस लाख हुई थी |  1982 में विश्व के लगभग 175 नगर 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले हो गए थे |

कुल जनसंख्या में नगरीय जनसंख्या के प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि कों देखने से पता चलता है कि नगरीय जनसंख्या जो सन् 1800 में 3 प्रतिशत थी यह बढ़कर 1850 में 6 प्रतिशत, 1900 में 14 प्रतिशत, 1950 में 30 प्रतिशत, 1982 में 37 प्रतिशत तथा 2001 में 48 प्रतिशत तथा  2011 में 52 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय हो गई है |

नगरीय बस्तियों के वर्गीकरण के आधार

नगरीय बस्तियों का वर्गीकरण जनसंख्या के आकार, व्यवसायिक संरचना, प्रशासनिक निर्णय, स्थिति (अवस्थिति), नगरों की आकृति तथा नगरों के मुख्य कार्यों के आधारों पर किया जा सकता है |

जनसंख्या के आकार के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

नगरीय क्षेत्रों कों परिभाषित करने के लिए अधिकतर देशों नें जनसंख्या कों मुख्य मापदंड माना है |  परन्तु नगर कों परिभाषित करने के लिए जनसंख्या का मापदंड सभी देशों में अलग-अलग है | जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है |

a)      डेनमार्क, स्वीडन तथा फिनलैंड में 250 व्यक्तियों की जनसंख्या वाले सभी क्षेत्र नगरीय क्षेत्र कहलाते है |

b)      आइसलैंड में नगर होने के लिए न्यूनतम जनसंख्या 300 व्यक्ति होनी चाहिए |

c)      कनाडा और वेनेजुएला में 1000 व्यक्तियों की जनसंख्या वाले क्षेत्र नगर माने गए है |

d)      कोलम्बिया में नगरीय बस्ती होने के लिए 1500 व्यक्ति होने जरूरी है |

e)      अर्जेंटाइना तथा पुर्तगाल में 2000 व थाईलैंड में 2500 व्यक्तियों का आवासीय क्षेत्र नगरीय बस्ती कहलाती है | 

f)       जापान में 30000 लोगों की बस्ती कों  ही नगरीय बस्ती माना जाता है |

g)      भारत में 5000 लोगों के साथ साथ जनसंख्या का घनत्व न्यूनतम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना जरूरी है | साथ ही जनसंख्या का 75 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न होना चाहिए |

व्यवसायिक संरचना के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

जनसंख्या के आकार के अतिरिक्त कुछ देशों में बस्तियों कों नगरीय बस्ती मानने के लिए प्रमुख आर्थिक गतिविधियों कों भी एक महत्वपूर्ण मापदंड माना जाता है | जैसे भारत में यदि किसी क्षेत्र की जनसंख्या का 75 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में लगा होता है तो उसे नगरीय बस्ती माना जा सकता है | इसी प्रकार इटली में उस बस्ती कों नगरीय बस्ती कहा जा सकता है जिसकी आर्थिक रूप से उत्पादक जनसंख्या का 50 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न हो |

प्रशासनिक निर्णय के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

कुछ देशों में किसी बस्ती कों नगरीय बस्ती में वर्गीकृत करने के लिए प्रशासनिक ढाँचे कों भी आधार बनाया जाता है | उदाहरण के लिए भारत में किसी भी आकार की बस्ती कों नगर के रूप में वर्गीकृत किया जाता है | यदि वहाँ नगरपालिका, छावनी बोर्ड (कैन्टोंमेंट बोर्ड ) हो या प्रशासन के द्वारा अधिसूचित नगरीय क्षेत्र समिति है | इसी प्रकार लैटिन अमेरिका महाद्वीप के देश ब्राजील तथा बोलीविया में जनसंख्या आकार का ध्यान नहीं रखते हुए किसी भी प्रशासकीय केन्द्र कों नगरीय बस्ती मान लिया जाता है |   

स्थिति (अवस्थिति ) के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

नगरीय केन्द्रों की स्थिति उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों कों ध्यान में रखकर देखी जाती है | क्योंकि अलग-अलग प्रकार के कार्यों के लिए नगरों की स्थिति भी अलग-अलग ही होती है | जैसे औद्योगिक नगर, सेना नगर, पत्तन नगर तथा मनोरंजन नगर (अवकास सैर गाह )  आदि नगरों के लिए उनकी स्थिति भी भिन्न भिन्न होती है | जो निम्नप्रकार से स्पष्ट है |

a)      सामरिक नगरों की स्थिति ऐसी जगह होती है जहाँ उसे प्राकृतिक सुरक्षा मिल सके |

b)      खनन नगरों की स्थिति उन स्थानों पर होती है जहाँ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार मिलते है |

c)      औद्योगिक नगरों के लिए वे स्थान अधिक उपयुक्त होते है जहाँ कच्चा माल आसानी से पहुँच सके, शक्ति के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो, परिवहन की सुविधा पर्याप्त हो तथा तैयार माल के लिए बाजार आसानी से उपलब्ध हो सके |

d)      पत्तन नगरों के लिए पोताश्रय का होना आवश्यक होता है |

e)      पर्यटन नगर के लिए आकर्षक दृश्य, या सामुद्रिक तट, औषधीय जल वाला झरना या कोई ऐतिहासिक अवशेष आदि की स्थिति होनी चाहिए |

आकृति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

वास्तव में किसी भी नगर की आकृति,  वास्तुकला एवं भवनों की शैली वहाँ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं की देन होती है | आकृति के आधार पर एक नगरीय बस्ती रेखीय प्रतिरूप , वर्गाकार प्रतिरूप, तारे के आकार तथा अर्ध चंद्राकार (चापाकार)  हो सकती है |  

नगरों का प्रकार्यात्मक वर्गीकरण  (कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण )

नगरों में विभिन्न प्रकार के कार्य चलते रहते है | ये कार्य इतने विविध प्रकार के है कि किसी एक नगर कों किसी विशेष प्रकार के कार्य से जोड़ना कठिन हो जाता है |  अत: नगर एक प्रकार्यात्मक ना होकर बहु प्रकार्यात्मक होते है | लेकिन नगरों में कुछ कार्य अधिक महत्व रखते है | जैसे  कुछ नगरों सामाजिक आर्थिक महत्व के कार्य होते है | कुछ सैनिक महत्व के लिए बसाये जाते है | कुछ नगर औद्योगिक कार्य करते है | कुछ  नगरों में प्रशासनिक कार्य अधिक किए जाते है | अत: उनके महत्वपूर्ण कार्यों के आधार पर नगरों कों  निम्नलिखित प्रकारों बाँटा जा सकता है |  

1.       प्रशासनिक नगर

वे नगर जिनका संबंध जन साधारण के प्रशासन संबंधी कार्यों से होता है उन्हें प्रशासनिक नगर कहते है | इस प्रकार के नगर, देशों तथा राज्यों की राजधानियों , जिला एवं अन्य प्रशासनिक इकाइयों के मुख्यालय होते है | इन नगरों में सरकारी विभागों के मुख्यालय तथा विभिन्न विभागों के सरकारी कार्यालय होते है |

देश की राजधानी के रूप में प्रशासनिक नगरों के उदाहरण इंग्लैंड में लन्दन, भारत में नई दिल्ली, फ्रांस में पेरिस, कनाडा में ओटावा, ऑस्ट्रेलिया में कैनबरा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में वाशिंग्टन डी. सी. आदि है | जबकि राज्यों के प्रशासनिक नगरों में हरियाणा का चंडीगढ, राजस्थान का जयपुर, मध्य प्रदेश का भोपाल, उत्तर प्रदेश का लखनऊ, गुजरात का गांधीनगर आदि है | 

2.       प्रतिरक्षा नगर

इन नगरों कों गैरीसन या छावनी नगर या कैंटोनमेंट या कैंट आदि नामों से जाना जाता है |  ये नगर सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते है | इन नगरों में सेना, नौ सेना तथा वायु सेना के रहने की व्यवस्था के साथ-साथ,  उनके अभ्यास तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होती है |  अम्बाला, पुणे, मेरठ , जोधपुर, जालंधर, देहरादून आदि प्रतिरक्षा नगरों के उदाहरण है |

3.       सांस्कृतिक नगर

वे नगर जिनमें शिक्षा, कला धार्मिक (सांस्कृतिक) महत्व के कार्य मुख्य रूप से किए जाते है | उन्हें सांस्कृतिक नगर कहते है | ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है | शैक्षिक नगर (शिक्षा नगर) शिक्षा नगर तथा धार्मिक नगर  | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

a)      शैक्षिक नगर (शिक्षा नगर)

कई नगरों का विकास उनमें शिक्षा संबंधी सुविधाओं की उपस्थिति के कारण होता है | विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटी), महाविद्यालय (कॉलेज), विद्यालय, छात्रावास आदि की सुविधाएँ इन नगरों में प्रचुरता मिलती है | ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, रुड़की, आगरा अलीगढ, बनारस , खड़गपुर, पिलानी, कोटा तथा शांति निकेतन आदि शैक्षिक नगरोंके प्रमुख उदाहरण है |

b)      धार्मिक नगर

कई नगर विभिन्न धर्मों या सांस्कृतियों के लोगों के तीर्थ स्थानों के रूप में विकसित हो जाते है | इन नगरों का धार्मिक महत्व होता है | रोम में वेटिकन सिटी पोप के कारण, तिब्बत में ल्हासा दलाई लामा के कारण, मक्का पैगाम्बर मोहम्मद के कारण, जेरूसलम ईसा मसीह के कारण, अमृतसर सिखों के गुरु स्थान के कारण, वाराणसी, हरिद्वार, मथुरा, द्वारका, पुष्कर तथा उज्जैन आदि हिंदू धर्म के पूज्य स्थलों के रूप में धार्मिक महत्व के नगर है |

4.       खनन नगर

जिन स्थानों पर खनिज पाए जाते है | उन क्षेत्रों के आस पास नगरों का  विकास हो जाता है | जिन्हें खनन नगर या खनन केन्द्र कहते हैं | जैसे दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग, ऑस्ट्रेलिया में कूलगार्डी, भारत में डिगबोई, झरिया, रानीगंज, कोलार तथा खेतडी आदि खनन नगर है |

5.       औद्योगिक नगर

निर्माण उद्योगों के विकास के साथ-साथ नए नगरों का भी उद्भव होता है | जिन्हें औद्योगिक नगर कहते है | इन नगरों का विकास औद्योगिक उन्नति पर ही निर्भर होता है | इंग्लैंड में मानचेस्टर,जापान में टोकियो, जर्मनी में पिट्सबर्ग, भारत में जमशेदपुर, कानपुर, अहमदाबाद, सूरत, राउरकेला, भिलाई, फरीदाबाद, बडौदा आदि प्रमुख औद्योगिक नगरों के उदाहरण है |

6.       बाजार नगर

इन नगरों कों मंडियां भी कहते हैं | इन नगरों में व्यापारी तथा व्यापारी संगठनों से संबंधित कार्यालय जैसे बैंक,स्टॉक एक्सचेंज, बीमा कम्पनियों के कार्यालय तथा अन्य वितीय संगठन होते है | भारत में हापुड, मुज्जफरनगर तथा मेरठ आदि बाजार नगरों के उदाहरण है |  

7.       पतन नगर

समुद्र तटीय भागों में पत्तनों के पास बड़े-बड़े नगर विकसित हो जाते है | ये नगर व्यापारिक केन्द्र तथा वितरण केन्द्र के रूप में यहाँ विकसित हो जाते है | इन नगरों कों ही पत्तन नगर कहते है | इन नगरों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के द्वारा किए जाने वाले आयात-निर्यात संबंधी कार्य अधिक होते है | विभिन्न देशों में टोकियो, सिंगापुर, हांगकांग, लन्दन न्यूयार्क लिवरपूल आदि तथा भारत में मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, सूरत, कांडला, विशाखापट्टनम तथा तिरुवनंतपुरम प्रमुख पत्तन नगर है |

8.       विनोद प्रिय नगर

        वे नगर जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, आकर्षक, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु वाले  तथा मनोरंजक  होते है, विनोदप्रिय नगर कहलाते है |  इस तरह के नगर पर्यटकों कों अपनी ओर आकर्षित करते है | श्रीनगर, शिमला, दार्जिलिंग, मसूरी, जयपुर आदि विनोदप्रिय नगर के उदाहरण हैं |

Thursday, September 16, 2021

Human Settlements lesson 10 class 12th Geography Meaning, Classification Types and Patterns of Rural Settlements

 

कक्षा 12वीं
मानव भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय 10 मानव बस्ती

मानव भूगोल में मानव बस्तियों के अध्ययन का औचित्य (उद्देश्य)

या

मानव बस्ती का अध्ययन मानव भूगोल का मूल

किसी भी क्षेत्र में बस्तियों का रूप उस क्षेत्र के वातावरण से मानव का संबंध दर्शाता है | इन सम्बन्धों का अध्ययन ही मानव भूगोल का उद्देश्य है | इसलिए मानव बस्ती का अध्ययन मानव भूगोल का मूल है |

मानव बस्ती का अर्थ

आवास मानव की मूलभूत आवश्यकता है | आवास के रूप में लोग जहाँ पर रहते है | वह निवास स्थान एक झोपडी, एक या दो कमरों का मकान या एक बड़ी हवेली हो सकती है |  मनुष्य के आवासों के संगठित रूप कों  ही ‘बस्ती’ कहते हैं |   साधारण शब्दों में एक स्थान जिसमें अनेक मकान स्थाई रूप से बसे हुए हो उसे मानव बस्ती कहते है |  गांव , नगर या शहर आदि मानव बस्ती के ही रूप है |

स्थान  (site) तथा स्थिति (situation) में अन्तर

स्थान (साइट) या स्थल

स्थान से हमारा अभिप्राय: उस वास्तविक भूमि से है जिस पर बस्ती बनी हुई है |

स्थिति (सिचुएशन)  

बस्ती की स्थिति से अभिप्राय: उसके आस-पास के क्षेत्र (गाँवों) के संबंध में उसकी अवस्थिति से होता है |

बस्तियों का वर्गीकरण के आधार  (ग्रामीण –नगरीय द्विभाजन के मापदंड)

हम बस्तियों का वर्गीकरण करते समय इन्हें ग्रामीण – नगरीय बस्तियों के रूप में बाँटते है | बस्तियों कों ग्रामीण कहे या नगरीय इसके लिए विद्वानों के मत एक जैसे नहीं है फिर भी  बस्ती ग्रामीण है या नगरीय इसके लिए दो मुख्य आधार माने जाते है |

1.       जनसँख्या

जनसंख्या बस्तियों कों गांवों और नगरों में वर्गीकृत करने का महत्वपूर्ण आधार है | जनसंख्या के आधार पर ग्राम नगरों से छोटे होते है | जनसंख्या घनत्व गांव में कम तथा नगरों में अधिक होता है | लेकिन जनसंख्या के आधार पर वर्गीकरण एकरूपता नहीं दिखाता है | क्योंकि विभिन्न देशों ने अपनी सुविधा के अनुसार बस्तियों कों नगरीय तथा ग्रामीण बस्ती के रूप में परिभाषित किया है | उदाहरण के लिए चीन तथा भारत के कई गांव ऐसे है जिनकी जनसंख्या पश्चिमी यूरोप के देशों के नगरों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के नगरों की जनसंख्या से भी अधिक है |

2.       आर्थिक क्रियाकलाप (व्यवसाय )

यह कारक भी बस्तियों कों ग्रामीण तथा नगरीय बस्तियों में बांटने का मूल आधार लोगों के द्वारा किए जाने वाले आर्थिक क्रियाकलाप है | नगरों में लोग द्वितीयक तृतीयक तथा चतुर्थक व्यवसायों जैसे विनिर्माण उद्योग, व्यापार, परिवहन सेवाएँ, शोध एवं विकास से संबंधित कार्यों से जुड़े होते है | इसके विपरीत गाँवों में अधिकतर लोग प्राथमिक क्रियाओं  जैसे कृषि, मत्स्य पालन तथा वानिकी आदि में संलग्न रहते है |

ग्रामीण –नगरीय बस्तियों का अन्तर

ग्रामीण तथा नगरीय बस्तियों में निम्नलिखित अन्तर है |

ग्रामीण बस्ती :  इन बस्तियों का आकार छोटा होता है | ग्रामीण बस्तियों में रहने वाले निवासियों का मुख्य व्यवसाय प्राथमिक गतिविधियाँ जैसे कृषि, मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, खनन कार्य तथा पशुपालन से संबंधित होता है | इन बस्तियों में आधुनिक सुविधाओं का अभाव होता है | इन बस्तियों में जनसंख्या घनत्व कम होता है | ये बस्तियाँ कृषि प्रधान होने के कारण नगरों कों कृषि तथा पशु उत्पाद उपलब्ध करवाती हैं |

शहरी बस्ती : इन बस्तियों काआकार बड़ा होता है | शहरी बस्ती के निवासियों का मुख्य व्यवसाय द्वितीयक तथा तृतीयक गतिविधियों जैसे  विनिर्माण उद्योग,व्यापार, परिवहन ,शिक्षा व चिकित्सा आदि सेवाओं से संबंधित होता है | इन बस्तियों में आधुनिक सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में होती है | इन बस्तियों में जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है | ये बस्तियाँ उद्योग प्रधान होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कारखानों में बनी हुई वस्तुओं कों उपलब्ध करवाती है |

बस्तियों कों प्रभावित करने वाले कारक

ग्रामीण बस्तियों कों प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण तत्व (कारक) निम्नलिखित है |

जल आपूर्ति

जल मानव जीवन के लिए अनिवार्य है | इसलिए बस्तियाँ नदियों, झीलों, झरनों जैसे जल के स्त्रोतों या जलराशियों के समीप स्थित होती थी | ताकि इन बस्तियों के निवासियों कों जल आसानी से उपलब्ध हो सके | कभी – कभी पानी की आवश्यकता लोगों कों असुविधाजनक स्थानों जैसे दलदल से घिरे द्वीपों अथवा नदी के किनारों के निचले  हिस्सों में बसने के लिए प्रेरित करती है |

            अधिकांश नम बिंदु (वे स्थान जहाँ जल उपलब्ध होता है |) से बस्तियों में पीने के लिए, खाना बनाने, वस्त्र धोने आदि के लिए जल कों उपलब्ध कराते है | सिंचाई, मत्स्य पालन आदि के लिए भी नदियों तथा झीलों का उपयोग किया जाता है | नाव चलाने योग्य नदियों तथा झीलें यातायात के लिए भी प्रयोग की ज सकती है |

भूमि

किसी भी क्षेत्र में प्रारम्भ अधिवासी समतल तथा उपजाऊ क्षेत्र में ही बसना पसंद करते है | मनुष्य बसने के लिए उस जगह का चुनाव करता है | जहाँ की भूमि कृषि कार्य के लिए उपयुक्त और उपजाऊ हो | क्योंकि उपजाऊ भूमि कृषि कों बढ़ावा देती है | प्राचीन काल में  अधिकाँश बस्तियाँ नदी घाटियों  की उपजाऊ भूमि पर ही स्थापित की गई थी | यूरोप में दलदली क्षेत्र और नदी घाटी के निचले भागों में बस्तियाँ नहीं बसाई जाती बल्कि उनके पास के ढलवाँ और उपजाऊ भागों में बसाई जाती है | जबकि दक्षिणी-पूर्वी एशिया में लोग नदी घाटियों के निम्न (निचले) भागों एवं तटवर्ती मैदानों के निकट बस्तियाँ बसाते हैं | क्योंकि ये भाग चावल की कृषि के लिए बहुत उपयोगी होते है |  

उच्च भूमि के क्षेत्र

मानव अपने निवास के लिए ऊँचे क्षेत्रों कों इसलिए चुना कि वहाँ पर बाढ़ के समय होने वाली क्षति से बचा सके  ताकि मकान और लोगों का जीवन सुरक्षित रह सके | इसलिए नदी बेसिन (नदी घाटी ) के निचले क्षेत्रों में बस्तियाँ नदी वेदिकाओं तथा तटबंधो जैसी ऊँची भूमियों पर बसाई जाती है | क्योंकि ये शुष्क बिंदु क्षेत्र होते है | उदाहरण के लिए उष्णकटिबंधीय देशों के दलदली क्षेत्रों के निकट के लोग अपने मकान स्तम्भों पर बनाते है जिससे कि बाढ़ व कीड़े-मकोडों से बचा जा सके |

गृह निर्माण सामग्री

मानव बस्तियों के विकसित होने में गृह निर्माण सामग्री की उपलब्धता भी एक बड़ा कारक होती है |  गृह निर्माण के लिए सामान्यत: स्थानीय रूप में मिलने वाली सामग्री का प्रयोग किया जाता है | जहाँ आसानी से पत्थर, लकड़ी, मिट्टी, सरकंडे आदि मिल जाते है वहीँ पर मनुष्य अपनी बस्ती बसाता है | वन क्षेत्रों में लकड़ी प्रचुर मात्रा में मिलती है और गृह निर्माण के लिए मुख्य रूप से लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है | प्राचीन गाव वनों से लकड़ी काटकर ही बसाए गए थे |

            उदाहरण के लिए चीन के लोयस क्षेत्र के निवासी कन्दाराओं में ही अपने मकान बनाते थे | क्योंकि यहाँ ये कन्दराएँ आसानी से उपलब्ध हो जाती थी | अफ्रीका के सवाना प्रदेश में कच्ची ईंटों के मकान बनते थे | जबकि ध्रुवीय क्षेत्र में एस्किमो लोग हिम खंडों से अपने लिए इग्लू का निर्माण करते है | 

सुरक्षा

बस्ती का निर्माण करते समय सुरक्षा का विशेष ध्यान  रखा जाता है इसलिए बस्तियाँ सुरक्षित स्थानों पर ही बनाई जाती है | राजनीतिक  अस्थिरता, युद्ध, पडोसी समूहों के उपद्रवी होने की स्थिति में गाँवों कों सुरक्षित पहाड़ियों एवं द्वीपों पर बसाया जाता था | भारत में अधिकांश दुर्ग (किले) उच्च स्थानों एवं पहाड़ियों पर ही स्थित हैं | नाईजीरिया में खड़े इन्सेलबर्ग  वहाँ के गाँवों के लिए सुरक्षा की दृष्टि से अच्छी सुरक्षित स्थिति प्रदान करते है |  

सरकारी हस्तक्षेप के द्वारा बसाई गई नियोजित बस्तियां

कई बार सरकार द्वारा नियोजित ढंग से किया जाता है |  इन बस्तियों कों नियोजित बस्तियाँ कहते है | ग्रामवासियों के द्वारा इस तरह की बस्तियों का निर्माण नहीं किया जाता | सरकार द्वारा का भूमि अधिग्रहण किया जाता है और बस्ती स्थापित की जाती है और निवासियों कों सभी प्रकार की सुविधाएँ जैसे आवास, जल तथा अन्य अवसंरचना आदि उपलब्ध कराकर बस्तियों कों विकसित किया जाता है |  उदाहरण के लिए इथोपिया में सरकार द्वारा ग्रामीणीकरण योजना के द्वारा नियोजित बस्तियों का निर्माण किया गया | भारत में भी इंदरा गाँधी नहर के क्षेत्र में नहरी बस्तियों का विकास किया गया |  

ग्रामीण बस्तियों का वर्गीकरण

ग्रामीण बस्तियों का वर्गीकरण कई मापदंडो के आधार पर किया जा सकता है |

1)      आकार के आधार पर बस्तियों के प्रकार

आकार  (बसाव की सघनता ) के आधार पर बस्तियाँ दो प्रकार की होती है | सहंत बस्तियाँ और प्रकीर्ण बस्तियाँ | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

a)      सहंत (सघन) बस्तियाँ

वे बस्तियाँ जिनके मकान एक दूसरे से सटे हुए होते हैं उन्हें सहंत या सघन बस्तियाँ कहते है | इस तरह की बस्तियों कों विकास नदी घाटियों के सहारे तथा उपजाऊ मैदानों में होता है | इन बस्तियों में रहने वाले समुदाय के लोग मिलजुल कर रहते हैं | इन लोगों के व्यवसाय भी एक जैसे होते हैं | इन बस्तियों में गलियाँ संकरी (कम चौड़ी) होती है | पानी की निकासी सही नहीं होने के कारण इन बस्तियों की नालियाँ गंदी होती है |


                                                                            चित्र:- सघन बस्तियाँ

b)      प्रकीर्ण (बिखरी हुई ) बस्तियाँ

वे बस्तियाँ जिनमें मकान एक दूसरे से दूर-दूर होते हैं उन्हें प्रकीर्ण या बिखरी हुई बस्तियाँ कहते है | इन बस्तियों के घर प्राय; खेतों के द्वारा एक दूसरे से अलग होते है | इस तरह की बस्तियों का विकास पर्वतीय क्षेत्रों, ऊँची भूमि के क्षेत्रों और मरुस्थलीय क्षेत्रों में होता है | इन बस्तियों कों एक सांस्कृतिक आकृति जैसे कोई धार्मिक स्थल अथवा बाजार एक सूत्र में बाँधता है | ये बस्तियाँ साफ़ सुथरी होती है | इन बस्तियों के लोग एकाकी जीवन बिताते हैं | इन बस्तियों के लोगों के व्यवसाय भी अलग-अलग होते है |


                                                            चित्र :-  प्रकीर्ण (बिखरी हुई ) बस्तियाँ

 

2)      विन्यास के आधार पर बस्तियों के प्रकार

विन्यास के आधार पर बस्तियाँ निम्नलिखित प्रकार की होती है |

मैदानी ग्राम, तटीय ग्राम, वन ग्राम, पर्वतीय ग्राम एवं मरुस्थलीय ग्राम आदि |

3)      कार्य के आधार पर बस्तियों के प्रकार

लोगों के कार्य के आधार पर ग्रामीण बस्तियों निम्नलिखित प्रकार हो सकते हैं |

कृषि ग्राम, मछुआरों के ग्राम, लकडहारों के ग्राम तथा पशुपालक ग्राम आदि | 

4)      बस्तियों की ज्यामितिक आकृति के आधार पर बस्तियों के प्रकार

ज्यामितिक आकृति के आधार पर बस्तियाँ कई प्रकार की होती है | जैसे रैखिक , चौक पट्टी प्रतिरूप, तारक प्रतिरूप, टी आकार प्रतिरूप, गोलाकार प्रतिरूप, वाई आकार प्रतिरूप तथा युग्म आकृति प्रतिरूप आदि | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

   क).            लम्बवत (रैखिक) प्रतिरूप

इस प्रकार की ग्रामीण बस्तियों में मकान सड़कों, रेल लाइनों, नदियों, नहरों , घाटी के किनारे अथवा तटबंधों  पर स्थित होते है | जो एक रेखा के  रूप में दिखाई देते है | ऐसे गाँवों में मुख्य गलियाँ सड़क, रेल लाइन, नदी, नहर आदि के समानान्तर होती है |


                                                                          चित्र :- रैखिक प्रतिरूप

  ख).            क्रास या चौक पट्टी प्रतिरूप

इस प्रकार के प्रतिरूप कों आयताकार प्रतिरूप भी कहते है | इस प्रकार के गांव उस स्थानों पर बसते हैं | जहाँ सड़कें आयताकार होती है | ये सड़कें चारों ओर से आकार एक दूसरे कों समकोण पर काटती है | इन गाँवों में सड़कों के साथ-साथ चारों दिशाओं में घर बन जाते हैं | ग्रामीण बस्तियों का यह प्रतिरूप समतल क्षेत्रों अथवा चौड़ी अंतरा पर्वतीय घाटियों में पाया जाता है |


                                                                   चित्र :-  क्रास या चौक पट्टी प्रतिरूप

     ग).            तारक प्रतिरूप

कई बार एक गांव के मध्य से कई सड़कें विभिन्न दिशाओं से आकर एक स्थान पर मिलती है | उन सड़कों के सहारे मकान बन जाते है | इस प्रकार एक गांव तारे के आकार की बस्ती में विकसित  हो जाता है | इस प्रकार की बस्ती कों तारक प्रतिरूप वाली बस्ती कहते है |


                                                        चित्र :-   तारक प्रतिरूप

 

   घ).            टी (T)  आकार प्रतिरूप

टी के आकार की बस्तियाँ सड़क से तिराहे पर विकसित होती है | जब मुख्य सड़क से एक कम महत्वपूर्ण सड़क समकोण पर  मिलती है तो उन सड़कों के द्वारा  टी (T) की आकृति बनायी जाती है |इन सड़कों के साथ-साथ मकान बन जाने से  बस्ती का प्रतिरूप भी  टी (T) के आकार का हो जाता है |


                                                                   चित्र :-  टी (T) आकार प्रतिरूप

    ङ).            वाई (Y) आकार प्रतिरूप

वाई (Y) के आकार की बस्तियाँ सड़क से तिराहे पर विकसित होती है | जब दो अलग-अलग सड़के तीसरी सड़क इस तरह मिलती है कि उनके द्वारा  वाई (Y) की आकृति बनायी जाती है | इन सड़कों के साथ-साथ मकान बन जाने से  बस्ती का प्रतिरूप भी  वाई (Y) के आकार का हो जाता है |


                                                                        चित्र:- वाई (Y) आकार प्रतिरूप

    च).            गोलाकार  (वृताकार)प्रतिरूप

इस प्रकार के गांव झीलों व तालाबों किसी धार्मिक स्थल आदि के चारों ओर बस्ती के बस जाने से विकसित होते है | कभी-कभी गाँवों कों इस योजना से बसाया जाता है कि उसका मध्य भाग खुला रहे जिसमें पशुओं कों रखा जा सके ताकि पशुओं कों जंगली जानवरों से बचाया जा सके | 


                                                                      चित्र:- गोलाकार  प्रतिरूप

    छ).            युग्म आकृति प्रतिरूप

जब कोई सड़क नदी या नहर कों पुल के द्वारा पार करती है तो सड़क तथा नदी के दोनों ओर बस्तियों का निर्माण हो जाता है  तो इस प्रकार की बस्ती कों युग्म आकृति वाली बस्ती या दोहरे ग्राम कहते है |  

  

                                             चित्र:- युग्म आकृति प्रतिरूप या दोहरे ग्राम  

ग्रामीण बस्तियों की समस्याएं

ग्रामीण बस्तियों के निवासियों कों कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है | विकासशील देशों में ग्रामीण बस्तियों की संख्या अधिक है | इसके अलावा इन देशों में ग्रामीण बस्तियों का आधारभूत विकास भी नहीं हुआ है | इसलिए इन देशों की ग्रामीण बस्तियों में समस्याएँ अधिक गम्भीर है |  ये समस्याएँ चुनौती और सुअवसर दोनों ही प्रदान करती है | ग्रामीण बस्तियों की मुख्य समस्याएँ जल, सामान्य जनसुविधाएँ, संतोषजनक आवासीय घरों  की कमी तथा सडकों के अभाव के कारण उत्पन्न होती है | कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित है |

  क).             जल आपूर्ति की समस्या

ग्रामीण इलाकों में सवच्छ जल की आपूर्ति की व्यवस्था संतोषजनक नहीं है | पर्वतीय एवं शुष्क क्षेत्रों में ग्रामवासियों कों पेय जल लाने के लिए लंबी दूरियाँ तय करनी पडती है | जल में कई प्रकार की अशुद्धियाँ होती है | जिसके कारण हैजा, पीलिया तथा पाचन संबंधी कई जल के होने वाली बीमारियाँ फ़ैल जाती है |  दक्षिणी एशिया में प्राय: बाढ़ तथा सूखे का प्रकोप बना रहता है | जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है |

 ख).            समान्य जनसुविधाओं की कमी

विकासशील देशों की ग्रामीण बस्तियों में शौचघर एवं कूड़ा-कर्कट के निस्तारण की सुविधाएँ नगण्य होती है | जिसमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है | ग्रामीण इलाकों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी सेवाएँ भी पर्याप्त नहीं होती है | इन सेवाओं कों प्राप्त करने के लिए ग्रामीण लोगों कों  नगरों की ओर जाना पड़ता है |

   ग).            असंतोष जनक आवासीय व्यवस्था

मकानों की रूप रेखा तथा उनके निर्माण में प्रयुक्त होने वाली गृह निर्माण सामग्री हर पारिस्थितिक क्षेत्र में अलग – अलग होती है | आधिकांश गाँवों में मकानों का निर्माण स्थानीय रूप से प्राप्त होने वाली सामग्री से किया जाता है | ये मकान मिट्टी, गारा, लकड़ी तथा सरकंडे(छप्पर) आदि के बनाए जाते है | इस तरह के मकानों कों भारी वर्षा तथा बाढ़ के समय काफी नुकसान पहुँचता है | हर वर्ष उनके रख-रखाव की उचित व्यवस्था करनी पडती है | अधिकाँश मकानों की रूपरेखा भी इस तरह की होती हैं कि उनमें उपयुक्त संवातन नहीं होता अर्थात ये कम हवादार होते है |

इसके अलावा गाँवों में एक ही मकान में पशु भी रहते है | इसी मकान में पशु शेड तथा उनके चारे कों रखने की जगह भी होती है | इस तरह की व्यवस्था जंगली जानवरों से पालतू पशुओं और उनके चारे कों सुरक्षित के लिए की जाती है | अत : स्पष्ट है कि विकास शील देशों में उचित आवासीय व्यवस्था की कमी जैसी समस्या देखने कों मिलती है |

   घ).            परिवहन तथा संचार की समस्या

कच्ची सड़कें तथा आधुनिक संचार के साधनों की कमी ग्रामीण बस्तियों की प्रमुख समस्या है | अधिकांश गाँवों में सडकें तंग तथा कच्ची होती है | वर्षा ऋतु में ये परिवहन के लायक नहीं रहती | जिस कारण से इन बस्तियों का संपर्क आसपास के क्षेत्रों से टूट जाता है | इसके कारण आपातकालीन सेवाएँ प्राप्त करने में भी बहुत आधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | इसके आधुनिक संचार व्यवस्था इन क्षेत्रों में लगभग नगण्य रहती है | इनकी कमी से स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबंधी सुविधाएँ प्राप्त करना भी कठिन हो जाता है |