भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय
विकास कार्यक्रम
भरमौर
जनजातीय क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसे भारत सरकार के द्वारा 21नवम्बर 1975 में अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र घोषित
किया था | इस क्षेत्र में ‘गद्दी’ जनजातीय समुदाय के लोग रहते है | इस समुदाय की
हिमालय क्षेत्र में अपनी अलग पहचान है | क्योंकि गद्दी लोग ऋतु प्रवास करते है |
ये गद्दीयाली भाषा बोलते हैं |
भौगोलिक स्थिति तथा क्षेत्रफल
इस जनजातीय क्षेत्र में
हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले की दो तहसीलें भरमौर और होली शामिल है | यह क्षेत्र
320
11’ उत्तर से 320 41’ उत्तरी अक्षांशों तथा 760 22’ पूर्व से 760 53’ पूर्व देशान्तरों के
बीच स्थित है | यह प्रदेश लगभग 1888 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र का धरातल
इस जनजातीय क्षेत्र का
अधिकतर भाग 1500 मीटर से 3700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच
स्थित है | गद्दी जनजाति की आवास भूमि कहलाया जाने वाला यह प्रदेश चारों दिशाओं
में ऊँचे पर्वतों से घिरा हुआ है | इसके उत्तर में पीरपंजाल तथा दक्षिण में
धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ है | पूर्व में धौलाधार श्रेणी का फैलाव रोहतांग दर्रे के
पास पीरपंजाल श्रेणी से मिलता है |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ
इस
क्षेत्र में रावी प्रमुख नदी है | इसकी सहायक नदियाँ बुढील और टुंडेन है | ये
नदियाँ इस क्षेत्र में गहरे महाखड्डों का निर्माण करती हैं | ये नदियाँ इस पहाड़ी
क्षेत्र कों होली, खणी, कुगती तथा दुहान्ड
(तुन्दाह) नामक चार भूखंडों में विभाजित
करती हैं |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र की जलवायु
इस क्षेत्र की जलवायु कठोर
है | शरद ऋतु में जमा देने वाली कडाके की सर्दी और बर्फ पड़ती है | यहाँ का औसत
मासिक तापमान जनवरी में 40 सेल्सियस
और जुलाई में 260 सेल्सियस होता है |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित करने
वाले कारक
निम्नलिखित कारकों ने भरमौर
जनजातीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और समाज
कों प्रभावित किया है |
1
इस क्षेत्र की जलवायु कठोर
है |
2
यहाँ आधारभूत संसाधन कम हैं
|
3
यहाँ का पर्यावरण क्षण भंगुर
है |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र की जनसंख्या संबंधी विशेषताएँ
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या 39113थी | यहाँ का
जनसंख्या घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश
के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े
इलाकों में से एक है | ऐतिहासिक रूप से गद्दी जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव
का अनुभव किया है | इसलिए सामाजिक और आर्थिक विकास से वंचित रही है | यहाँ के
लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं इससे संबंधी क्रियाएँ जैसे भेड़ और बकरी पालना है
|
भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया
भरमौर जनजातीय क्षेत्र में
विकास की प्रक्रिया 1970 के दशक में शुरू हुई | जब गद्दी लोगों कों अनुसूचित
जनजातियों में शामिल किया गया | सन् 1974 में पाँचवीं
पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जनजातीय उपयोजना शुरू की गई | हिमाचल प्रदेश में पाँच
क्षेत्रों कों समन्वित जनजातीय विकास परियोजना के तहत चुना गया | जिनमें से भरमौर
क्षेत्र कों भी समन्वित जनजातीय विकास परियोजना (Integrated Tribal Development
Programme) का दर्जा मिला |
इस योजना का उद्देश्य गद्दियों के जीवन
स्तर में सुधार करना और भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के बीच में विकास
के अन्तर कों कम करना है | इस योजना के अंतर्गत परिवहन तथा संचार, कृषि और इससे
संबंधित क्रियाओं तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं के विकास कों प्राथमिकता दी गई |
भरमौर जनजातीय क्षेत्र में
समन्वित जनजातीय विकास परियोजना का योगदान
भरमौर जनजातीय
क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना से निम्नलिखित महत्वपूर्ण योगदान दिए है |
1
इस क्षेत्र में जनजातीय
समन्वित विकास उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान विद्यालयों, जन - स्वास्थ्य
सुविधाओं, पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना का विकास है | होली
तथा खणी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ बसे गाँव अवसंरचना विकास से सबसे अधिक लाभान्वित हुए है | इकुगती तथा दुहान्ड (तुन्दाह) क्षेत्रों
के दूरदराज के गाँव अभी भी इस विकास की परिधि से बाहर है |
2
इस क्षेत्र में समन्वित
जनजातीय विकास उपयोजना लागू होने से कई सामाजिक लाभ हुए है | जिनमें साक्षरता दर
में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात में सुधार और बाल विवाह में कमी आना आदि शामिल है
|
3
इस क्षेत्र में स्त्री
साक्षरता दर जो सन् 1971 में 1.88 प्रतिशत थी वह सन् 2011 में बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई |
4
गद्दियों की परम्परागत
अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह कृषि व पशुचारण पर आधारित थी जिनमें खाद्यान्नों के
उत्पादन और पशुपालन पर बल दिया जाता था | परन्तु 20वीं शताब्दी के अंतिम तीन दशकों के दौरान, भरमौर क्षेत्र में
दालों और अन्य नकदी फसलों की खेती में बढोतरी हुई है |
5
इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था
में पशुचारण का महत्व कम हुआ है | पशुचारण के घटते महत्व कों इस बात से आँका जा
सकता है कि आज कुल पारिवारिक इकाइयों का दसवाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है | परन्तु
गद्दी जनजाति आज भी बहुत गतिशील है | क्योंकि इनकी एक बड़ी संख्या शरद ऋतु में कृषि
और मजदूरी करके आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करती
है |
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