Sunday, February 27, 2022

Bhaurmur Integrated Tribal Development Programme LESSON 9 CLASS 12TH GEOGRAPHY

भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम

            भरमौर जनजातीय क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसे भारत सरकार के द्वारा 21नवम्बर 1975 में अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र घोषित किया था | इस क्षेत्र में ‘गद्दी’ जनजातीय समुदाय के लोग रहते है | इस समुदाय की हिमालय क्षेत्र में अपनी अलग पहचान है | क्योंकि गद्दी लोग ऋतु प्रवास करते है | ये गद्दीयाली भाषा बोलते हैं |

भौगोलिक स्थिति तथा क्षेत्रफल

इस जनजातीय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले की दो तहसीलें भरमौर और होली शामिल है | यह क्षेत्र 320 11’ उत्तर से  320 41’ उत्तरी अक्षांशों तथा 760 22’ पूर्व से 760  53’ पूर्व देशान्तरों के बीच स्थित है | यह प्रदेश लगभग 1888 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  का धरातल

इस जनजातीय क्षेत्र का अधिकतर भाग 1500 मीटर से 3700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच स्थित है | गद्दी जनजाति की आवास भूमि कहलाया जाने वाला यह प्रदेश चारों दिशाओं में ऊँचे पर्वतों से घिरा हुआ है | इसके उत्तर में पीरपंजाल तथा दक्षिण में धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ है | पूर्व में धौलाधार श्रेणी का फैलाव रोहतांग दर्रे के पास पीरपंजाल श्रेणी से मिलता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की प्रमुख नदियाँ

            इस क्षेत्र में रावी प्रमुख नदी है | इसकी सहायक नदियाँ बुढील और टुंडेन है | ये नदियाँ इस क्षेत्र में गहरे महाखड्डों का निर्माण करती हैं | ये नदियाँ इस पहाड़ी क्षेत्र कों होली, खणी, कुगती  तथा दुहान्ड (तुन्दाह)  नामक चार भूखंडों में विभाजित करती हैं |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जलवायु

इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है | शरद ऋतु में जमा देने वाली कडाके की सर्दी और बर्फ पड़ती है | यहाँ का औसत मासिक तापमान जनवरी में 40 सेल्सियस और जुलाई में 260  सेल्सियस होता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित करने वाले कारक

निम्नलिखित कारकों ने भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित किया है |

1         इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है |

2         यहाँ आधारभूत संसाधन कम हैं |

3         यहाँ का पर्यावरण क्षण भंगुर है |

 

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जनसंख्या संबंधी विशेषताएँ

 

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या  39113थी | यहाँ का जनसंख्या घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के  आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है | ऐतिहासिक रूप से गद्दी जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव का अनुभव किया है | इसलिए सामाजिक और आर्थिक विकास से वंचित रही है | यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं इससे संबंधी क्रियाएँ जैसे भेड़ और बकरी पालना है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया 1970 के दशक में शुरू हुई | जब गद्दी लोगों कों अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया गया | सन् 1974 में पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जनजातीय उपयोजना शुरू की गई | हिमाचल प्रदेश में पाँच क्षेत्रों कों समन्वित जनजातीय विकास परियोजना के तहत चुना गया | जिनमें से भरमौर क्षेत्र कों भी समन्वित जनजातीय विकास परियोजना  (Integrated Tribal Development Programme) का दर्जा मिला |  

            इस योजना का उद्देश्य गद्दियों के जीवन स्तर में सुधार करना और भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के बीच में विकास के अन्तर कों कम करना है | इस योजना के अंतर्गत परिवहन तथा संचार, कृषि और इससे संबंधित क्रियाओं तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं के विकास कों प्राथमिकता दी गई |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना का योगदान  

 भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना से निम्नलिखित महत्वपूर्ण  योगदान दिए है |

1         इस क्षेत्र में जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान विद्यालयों, जन - स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना का विकास है | होली तथा खणी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ बसे गाँव अवसंरचना विकास से  सबसे अधिक लाभान्वित हुए है | इकुगती  तथा दुहान्ड (तुन्दाह)   क्षेत्रों के दूरदराज के गाँव अभी भी इस विकास की परिधि से बाहर है |

2         इस क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास उपयोजना लागू होने से कई सामाजिक लाभ हुए है | जिनमें साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात में सुधार और बाल विवाह में कमी आना आदि शामिल है |

3         इस क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर जो  सन् 1971 में  1.88 प्रतिशत थी वह सन् 2011 में बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई |

4         गद्दियों की परम्परागत अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह कृषि व पशुचारण पर आधारित थी जिनमें खाद्यान्नों के उत्पादन और पशुपालन पर बल दिया जाता था | परन्तु 20वीं शताब्दी  के अंतिम तीन दशकों के दौरान, भरमौर क्षेत्र में दालों और अन्य नकदी फसलों की खेती में बढोतरी हुई है |

5         इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में पशुचारण का महत्व कम हुआ है | पशुचारण के घटते महत्व कों इस बात से आँका जा सकता है कि आज कुल पारिवारिक इकाइयों का दसवाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है | परन्तु गद्दी जनजाति आज भी बहुत गतिशील है | क्योंकि इनकी एक बड़ी संख्या शरद ऋतु में कृषि और मजदूरी करके आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करती है |      

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