https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-8100526939421437 SCHOOL OF GEOGRAPHY : Direct and Indirect sources of Information of Interior of Earth (Chapter 3, 11th Geography)

Monday, July 25, 2022

Direct and Indirect sources of Information of Interior of Earth (Chapter 3, 11th Geography)

 

पृथ्वी के आंतरिक भाग  (भू गर्भ )की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर अधिक निर्भर होने के कारण

पृथ्वी की सतह से केन्द्र की दूरी 6370 किलोमीटर है | पृथ्वी की आंतरिक परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं है की पृथ्वी के केन्द्र तक जाकर उसके आंतरिक भाग का निरीक्षण कर सके | अभी तक ज्ञात प्रमाणों से पता चलता है कि अभी तक सतह से 4 किलोमीटर तक ही खादाने खोदी गयी है जो दक्षिणी अफ्रीका में स्थित है | प्रवेधन परियोजनाओं के द्वारा भी अधिकतम 12 किलोमीटर तक ही खुदाई की गई है | जो केन्द्र की गहराई के अनुपात में बहुत ही कम है | ज्वालामुखी उद्गारों से प्राप्त पदार्थ से हम यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि यह मैग्मा पृथ्वी के अंदर कितनी गहराई से निकला है | अत: पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर ही अधिक निर्भर है |

भूगर्भ की जानकारी के स्त्रोत

पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्त्रोतों पर निर्भर है | फिर भी कुछ जानकारी प्रत्यक्ष प्रेक्षणों से भी प्राप्त होती है | जानकारी के इन स्त्रोतों कों हम दो मुख्य भागों में बाँटते है |

1.        प्रत्यक्ष स्त्रोतों

2.        अप्रत्यक्ष स्त्रोतों

भूगर्भ की जानकारी के प्रत्यक्ष स्त्रोत

पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्न लिखित स्त्रोत शामिल किए जाते है |

1.       धरातलीय चट्टानें

2.       खनन ,

3.       प्रवेधन परियोजनायें

4.       ज्वालामुखी उदगार

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

धरातलीय चट्टानें

धरातलीय चट्टानें पृथ्वी के भूगर्भ की जानकारी के लिए  सबसे आसानी से प्राप्त होने वाले स्रोतों में है | जिनसे हमें पृथ्वी के अंदर पाए आने वाले खनिजों की रासायनिक तथा भौतिक विशेषताओं का पता चलता है |

खनन

खनन के द्वारा पृथ्वी की सतह पर कुछ गहराई में मौजूद चट्टानों के बारे में हम उनकी संरचना तथा उस स्थान  के  तापमान आदि का पता लगा सकते है | उदाहरण के लिए दक्षिणी अफ्रीका की सोने की खाने 3 से 4 किलोमीटर गहरी है | इससे अधिक गहराई में जाना असंभव है क्योंकि इससे अधिक गहराई में  तापमान बहुत अधिक होता है  |

प्रवेधन परियोजनायें

खनन के अतिरिक्त वैज्ञानिक पृथ्वी की आंतरिक स्थिति कों जानने के लिए दो मुख्य परियोजनायों पर कार्य कर रहे है | जिनमें गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना (Deep Ocean Drilling Project) तथा समन्वित महासागरीय प्रवेधन परियोजना (Integrated Ocean Drilling Project) मुख्य हैं | उदाहरण के लिए आजतक का सबसे गहरा प्रवेधन (Drill) आर्कटिक महासागर में कोला (Kola) नामक क्षेत्र में किया गया है | इन परियोजनाओं के अतिरिक्त बहुत सी अन्य गहरी परियोजनाओं के अंर्तगत गहराई तक खुदाई करके पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में असाधारण जानकारी प्राप्त हुई है |

ज्वालामुखी उद्गार

ज्वालामुखी उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी के महत्वपूर्ण स्त्रोत है | जब कभी पर ज्वालामुखी विस्फोट होता है तो उससे निकलने वाले लावा कों प्रयोगशाला में अन्वेषण  के लिए ले जाया जाता है | लेकिन हम यह स्पष्ट नहीं कर पाते कि यह मैग्मा पृथ्वी के अंदर कितनी गहराई से निकला है |

भूगर्भ की जानकारी के अप्रत्यक्ष स्त्रोत

पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के लिए अप्रत्यक्ष स्त्रोतों में निम्नलिखित स्त्रोत शामिल किए जाते है |

   क).            तापमान

  ख).            दबाव

    ग).            घनत्व

   घ).            उल्काएँ

   ङ).            गुरुत्वाकर्षण बल

   च).            चुम्बकीय क्षेत्र

   छ).            भूकम्प संबंधी क्रियाएँ

 

 

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

घनत्व

पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है |   लेकिन हम परतों के अनुसार देखतें है तो पाते है कि भू पर्पटी का घनत्व केवल  2.7 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है | ये परत अवसादी चट्टानों से बनी है | इसके नीचे की परत आग्नेय शैलों से बनी है लेकिन इस परत का घनत्व भी 3 से 3.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर तक ही है | इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी के आंतरिक भाग अर्थात क्रोड का घनत्व अधिक होना चाहिए |वैज्ञानिक मानते है कि पृथ्वी के बाह्य क्रोड पर घनत्व 5 से बढकर 10 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर हो जाता है  और आंतरिक क्रोड पर यह 11 से 12 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर तक पहुँच जाता है |  जिससे यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग भारी तथा अधिक घनत्व वाली चट्टानों से बना है |

तापमान

पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर खानें खोदने पर हम देखते है कि जैसे- जैसे हम पृथ्वी के धरातल से केन्द्र की ओर जाते है  वैसे-वैसे तापमान में वृद्धि होती जाती है | वैज्ञानिक मानते है कि सामान्य रूप से प्रत्येक  32 मीटर की गहराई पर 10 C तापमान बढ़ जाता है | इस हिसाब से 50 किलोमीटर की गहराई पर तापमान 1200 0 C से 18000 C होना चाहिए और पृथ्वी के क्रोड में लगभग 2000000C (2 लाख डिग्री सेल्सियस) होना चाहिए | लेकिन जब हम भूकम्पीय तंरगों के व्यवहार कों समझते है तो पता चलता है कि यह सत्य नहीं है |

वैज्ञानिक मानते है कि गहराई बढ़ने के साथ-साथ  तापमान के बढ़ने की दर कम होने लगती है | उनके  अनुसार पहले 100 किलोमीटर की गहराई तक प्रत्येक एक किलोमीटर पर लगभग 12 0 C की वृद्धि होती है | उसके बाद प्रत्येक 300 मीटर की गहराई पर 2 0 C तापमान बढ़ता है | उसके बाद अधिक गहराई में 1 0 C प्रति किलोमीटर के हिसाब से तापमान बढता है | एक गणना के अनुसार वैज्ञानिक मानते है कि आंतरिक क्रोड का तापमान 60000 C होना चाहिए | इतने अधिक तापमान पर पदार्थ का ठोस अवस्था में पाया जाना मुश्किल है | अत : इस भाग में पदार्थ द्रव या गैसीय अवस्था में होना चाहिए | लेकिन अत्यधिक दबाव के कारण वस्तुओं का गलनांक अधिक हो जाता है | जिससे ठोस वस्तुएँ द्रव अवस्था में नहीं होती | अत: पृथ्वी के केन्द्र के निकट क्रोड की चट्टानें अधिक तामपान के रहते हुए भी अधिक दबाव के कारण ठोस होने का गुण रखती है |

 

दबाव

वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के आंतरिक भागों में तामपान तथा घनत्व की तरह दबाव में भी वृद्धि होती है | स्पष्ट है कि पृथ्वी कि भू पर्पटी पर दबाव बहुत ही कम है लेकिन जैसे-जैसे गहराई में जाते है दबाव में वृद्धि होती जाती है | वैज्ञानिकों के अनुसार दबाव बढ़ने पर घनत्व भी बढता है  लेकिन एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ सकता | प्रत्येक चट्टान में दबाव के कारण घनत्व में वृद्धि एक सीमा तक ही हो सकती है चाहे दबाव कितना ही बढा दिया जाए | पृथ्वी के क्रोड का घनत्व 11 से 12 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है |  यहाँ से पता चलता है कि पृथ्वी के क्रोड का घनत्व अधिक होने का कारण दबाव ही नहीं है बल्कि इस भाग में पाए जाने वाली चट्टाने अधिक घनत्व वाले पदार्थों से बनी हैं |

उल्काएँ

पृथ्वी के आंतरिक संरचना के बारे में जानने का एक और महत्वपूर्ण स्त्रोत  उल्काएँ है | इसका कारण यह है कि उल्काओं के अध्ययन से पता चला है कि उल्काओं से प्राप्त पदार्थ और उनकी संरचना भी पृथ्वी से  मिलती जुलती है | ये उल्काएँ वैसे ही ठोस पिंड है जिस प्रकार हमारी पृथ्वी है |

गुरुत्वाकर्षण बल

पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं है | यह बल धुर्वों पर अधिक तथा भूमध्य रेखा पर कम होता है | पृथ्वी के केन्द्र से धुर्वों की दूरी भूमध्य रेखा की अपेक्षा कम होने के कारण ऐसा है | लेकिन हम जानते है कि गुरुत्व बल का मान पदार्थ के द्रव्यमान (भार) के अनुसार भी बदलता है | पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस विभिन्नता कों प्रभावित करता है | इसके अलावा अन्य कारण से भी पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल में भिन्नता पायी जाती है |

            पृथ्वी पर पायी जाने वाली गुरुत्वाकर्षण बल की भिन्नता कों गुरुत्व विसंगति कहते है | इसी गुरुत्व विसंगति के करण हमें भू पर्पटी में पदार्थ के द्रव्यमान के वितरण की जानकारी प्राप्त होती है |

चुम्बकीय क्षेत्र

चुम्बकीय सर्वेक्षण से हमें भू पर्पटी में चुम्बकीय पदार्थों के वितरण की जानकारी प्राप्त होती है |  इससे हमें चुम्बकीय गुणों वाले पदार्थों के वितरण  पता चलता है |

भूकम्प संबंधी क्रियाएँ  (भूकम्पीय गतिविधियाँ)

            भूकम्पीय गतिविधियाँ भी पृथ्वी की आंतरिक भाग की जानकारी का मुख्य स्त्रोत है | भूकंप के दौरान विभिन्न प्रकार की भूकम्पीय तरंगें उत्पन्न होतीं है | इन तरंगों के व्यवहार के द्वारा हम पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में अत्यधिक जानकारी प्राप्त कर सकते है | इन तरंगों के प्रकार तथा विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है |

   क).            प्राथमिक तरंगे  (P-WAVES)

ये तरंगे ध्वनि तरंगों की तरह  होती है | इन्हें अनुदैर्ध्य तरंगें भी कहते है | क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक ही दिशा में होती है | ये सबसे तेज होती है जिसके कारण ये पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती है | ये सभी तरह ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती हैं |

  ख).            गौण तरंगे (S- WAVES)

ये जल तरंगों की तरह होती है |इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें भी कहते है | क्योंकि इन तरंगों में संचरण की दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक दूसरे समकोण पर होती है | इनकी औसत गति 4 किलोमीटर प्रति सैकेंड होती है | ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती है और तरल माध्यम में आने पर लुप्त हो जाती है |

    ग).            धरातलीय तरंगे (L-WAVES)

ये तरंगें लंबी तरंगों के नाम से भी जानी जाती है | ये धरातल तक ही सीमित रहती हैं | इनकी औसत गति 3 किलोमीटर प्रति सैकेंड होती है | ये भी प्राथमिक तरंगों की तरह ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती हैं |

भूकम्पीय तरंगों का व्यहवार

इन तीनों प्रकार की भूकम्पीय तरंगों  कों भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) के द्वारा रेखांकित किया जाता है | इन तरंगों के व्यवहार की मुख्य बातें निम्न लिखित है |

a.       सभी भूकम्पीय तरंगों का वेग (गति ) अधिक घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर बढ़ जाता है और कम घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर कम हो जाता है |

b.       केवल प्राथमिक तरंगें ही पृथ्वी के केन्द्रीय भाग से गुजर सकती है | लेकिन इस भाग से गुजरने पर इन तरंगों के वेग में काफी कमी आ जाती है |

c.       गौण तरंगे द्रव पदार्थों में से नहीं गुजर सकती |  केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती है |

d.       धरातलीय तरंगे (L-WAVES)  धरातल पर ही चलती हैं |

e.       विभिन्न माध्यमों में से गुजरते हुए सभी प्रकार की तरंगें परावर्तित तथा आवर्तित होती है |

भूकम्पीय तरंगों का व्यहवार से हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में जानकारी मिलती है | जो निम्नलिखित है |

A.     भूकंप के केन्द्र के निकट ये तीनों ही तरंगे पहुँचती है |

B.     पृथ्वी के आंतरिक भागों में ये तरंगें अपना मार्ग बदल लेती है और अवतल मार्ग आपनाती  है | इससे इस बात की पुष्टि होती है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में चट्टानों का घनत्व अधिक है |

C.     प्राथमिक तथा गौण तरंगों कि गति भूकंप के केन्द्र से धरालत के साथ पृथ्वी के क्रोड की सीमा  तक (2900 किलोमीटर तक)  गहराई में तक जाते समय बढती जाती है | लेकिन इसके बाद बाद गौण तरंगें लुप्त हो जाती है और प्राथमिक तरंगों की गति में काफी कमी आती है | इससे यह पता चलता है कि 2900 किलोमीटर तक क्रोड की बाह्य सीमा तक पृथ्वी ठोस अवस्था में होने का अनुमान है | क्रोड का आंतरिक भाग जो 2900 किलोमीटर  से केन्द्र तक जाता है ठोस अवस्था में नहीं बल्कि तरल अवस्था में है |

D.     भूकंप  के केन्द्र से 1050 तक भूकम्पीय तरंगे जाती है | लेकिन उसके बाद  1050  किलोमीटर से 1450 के बीच कोई भी तरंग नहीं जाती | इस क्षेत्र कों भूकम्पीय छाया क्षेत्र कहते है | इस क्षेत्र होना यह बताता है कि भूकम्पीय तरंगे आवर्तित हो जाती है और यह आवर्तन अधिक घनत्व वाले पदार्थों के कारण होता है | जिससे पता पता चलता है कि पृथ्वी का केन्द्रीय भाग अधिक घनत्व वाले पदार्थों का बना है | इस भाग में लोहा तथा निकिल जैसे भारी पदार्थों की अधिकता है |

1 comment:

Anonymous said...

I think you are doing your best work for students.

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