अध्याय 4
जलवायु
भारत –भौतिक पर्यावरण
कक्षा 11वीं
प्रश्न: मौसम से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर: मौसम
वायुमंडल की क्षणिक अवस्था है | मौसम जल्दी जल्दी बदलता है जैसे कि एक दिन में या
एक सप्ताह में |
प्रश्न: जलवायु से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर : जलवायु
का तात्पर्य अपेक्षाकृत लंबे समय की मौसमी दशाओं के औसत से होता है | जलवायु में
बदलाव 50 अथवा इससे भी अधिक वर्षों में आता है |
प्रश्न : मौसम और जलवायु में अन्तर बताओ |
उत्तर: मौसम
वायुमंडल की क्षणिक अवस्था है | जबकि जलवायु का तात्पर्य अपेक्षाकृत लंबे समय की
मौसमी दशाओं के औसत से होता है | मौसम जल्दी जल्दी बदलता है जैसे कि एक दिन में या
एक सप्ताह में, परन्तु जलवायु में बदलाव 50 अथवा
इससे भी अधिक वर्षों में आता है |
प्रश्न : मानसून कों परिभाषित कीजिए |
उत्तर: ‘मानसून’
से अभिप्राय ऐसी जलवायु से है, जिसमें ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा में उत्क्रमण
हो जाता है |
प्रश्न : भारत की जलवायु कैसी है ? इस प्रकार की जलवायु कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर: भारत की
जलवायु उष्ण मानसूनी है | इस प्रकार की जलवायु दक्षिणी एवं दक्षिणी –पूर्वी में
पायी जाती है |
प्रश्न: मानसून जलवायु में एकता एवं विविधता कों तापमान तथा वर्षण संबंधी
विविधताओं का उदाहरण देते हुए समझायें |
उत्तर: मानसून
पवनों की व्यवस्था भारत और दक्षिण –पूर्व एशिया के बीच एकता कों बल प्रदान करती है
| मानसून जलवायु की व्यापक एकता के इस दृष्टिकोण से किसी कों भी जलवायु की
प्रादेशिक भिन्नताओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए | यही भिन्नता भारत के विभिन्न
प्रदेशों के मौसम और जलवायु कों एक –दूसरे से अलग करती है |
उदाहरण के लिए
दक्षिण में केरल तथा तमिलनाडु की जलवायु उत्तर में उत्तरप्रदेश तथा बिहार की
जलवायु से अलग है | फिर भी इन सभी राज्यों की जलवायु मानसून प्रकार की है |
भारत की जलवायु
में अनेक प्रादेशिक भिन्नताएँ हैं, जिन्हें पवनों के प्रतिरूप, तापक्रम और वर्षा,
ऋतुओं की लय तथा आर्द्रता एवं शुष्कता की मात्रा में भिन्नता के रूप में देखा जा
सकता है | इन प्रादेशिक विविधताओं का जलवायु के उपवर्गों के रूप में वर्णन किया जा
सकता है | तापमान, पवनों तथा वर्षा की इन प्रादेशिक विविधताओं का गौर से अवलोकन
करें तो निम्न लिखित तथ्य सामने आते है |
तापमान संबंधी प्रादेशिक विविधताएँ
गर्मियों में
पश्चिमी मरुस्थल में तापक्रम कई बार 55O सेल्सियस कों स्पर्श कर लेता है | जबकि सर्दियों में लेह के आसपास तापमान
-45O सेल्सियस तक गिर जाता है | राजस्थान के चुरू जिले में जून के महीने के किसी एक
दिन का तापमान 50O सेल्सियस अथवा इससे अधिक हो
जाता है | जबकी उसी दिन अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में तापमान मुश्किल से 19O
सेल्सियस तक पहुँचता है | दिसम्बर की किसी रात में लद्दाख के द्रास में
रात का तापमान 45O सेल्सियस तक गिर जाता है |
जबकी उसी रात कों थिरुवनंथपुरम अथवा चेन्नई में तापमान 20O सेल्सियस या 22O सेल्सियस रहता है | उपर्युक्त
उदाहरण पुष्टि करते हैं कि भारत में एक स्थान से दूसरे स्थान पर तथा एक क्षेत्र से
दूसरे क्षेत्र के तापमान में ऋतुवत अन्तर पाया जाता है |
इतना ही नहीं, यदि हम किसी एक स्थान के 24 घंटो
का तापमान दर्ज करें, तो उसमें भी विभिन्ताएँ कम प्रभावशाली प्रतीत नहीं होती |
उदाहरण के लिए केरलऔर अंडमान निकोबार द्वीप समूह में दिन और रात के तापमान में
मुश्किल से 7O और 8O सेल्सियस का अन्तर पाया जाता है, किन्तु थार मरुस्थल में, यदि दिन का
तापमान 50O सेल्सियस हो जाता है, तो वहाँ रात का
तापमान 15O से 20O सेल्सियस के बीच आ पहुँचता है |
वर्षण संबंधी प्रादेशिक विविधताएँ
हिमालय में वर्षण
मुख्यत: हिमपात के रूप में होता है, जबकि देश के अन्य भागों में वर्षण जल की
बूँदों के रूप में होता है | केवल वर्षण के प्रकारों में हीं अन्तर नहीं है, बल्कि
वर्षण की मात्रा में भी अन्तर है | मेघालय की खासी पहाड़ियों में स्थित चेरापूँजी
और मासिनराम में औसत वार्षिक वर्षा 1,080
सेंटीमीटर से ज्यादा होता है | इसके विपरीत राजस्थान के जैसलमेर में औसत वार्षिक
वर्षा शायद ही 9 सेंटीमीटर
से अधिक होती है | मेघालय की गारो पहाड़ियों में स्थित तुरा में एक ही दिन में उतनी
वर्षा होती है जितनी जैसलमेर में दस वर्षों में होती है | उत्तरी –पश्चिमी हिमालय
तथा पश्चिमी मरुस्थल में वार्षिक वर्षा 10 सेंटीमीटर से कम
होती है, जबकि उत्तर –पूर्व में स्थित मेघालय में वार्षिक वर्षा 400 सेंटीमीटर से भी ज्यादा होती है |
जुलाई या अगस्त में, गंगा के डेल्टा तथा ओडिशा के तटीय भागों में हर तीसरे या
पाँचवें दिन प्रचंड तूफ़ान मूसलाधार वर्षा करते हैं | जबकि इन्हीं महीनों में मात्र
एक हजार किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित तमिलनाडु का कोरोमंडल तट शांत एवं शुष्क
रहता है | देश के अधिकाँश भागों में, वर्षा जून और सितम्बर के बीच होती है,किन्तु
तमिलनाडु के तटीय प्रदेशों में वर्षा शरद ऋतु अथवा जाड़ों के आरम्भ में होती है |
इन सभी भिन्नताओं और विविधताओं के बावजूद भारत की जलवायु अपनी ले और विशिष्टता
में मानसूनी है |
प्रश्न: भारत की जलवायु कों प्रभावित करने वाले कारकों का
संक्षिप्त वर्णन करें ?
उत्तर: भारत की जलवायु कों नियंत्रित करने वाले अनेक कारक है | जैसे अक्षांश,
हिमालय पर्वत, जल और स्थल का वितरण, समुद्र तट से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई,
उच्चावच आदि | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित हैं |
अक्षांश (भूमध्य रेखा से दूरी) :
हम जानते है कि कर्क रेखा पूर्व से पश्चिम दिशा में भारत के मध्य से गुजरती है
| इस प्रकार भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण कटिबन्ध में और कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है
| उष्ण कटिबन्ध भूमध्य रेखा के अधिक निकट होने के कारण सारा साल ऊँचें तापमान तथा
कम दैनिक और वार्षिक तापान्तर का अनुभव करता है | कर्क रेखा से उत्तर में स्थित
भाग में भूमध्य रेखा से दूर स्थित होने के कारण उच्च दैनिक तथा वार्षिक तापान्तर
के साथ विषम जलवायु पायी जाती है |
हिमालय पर्वत:
उत्तर में ऊँचा हिमालय अपने सभी विस्तारों के साथ एक प्रभावी विभाजक की भूमिका
निभाता है | यह ऊँची पर्वत श्रंखला भारतीय उपमहाद्वीप कों उत्तरी पवनों से अभेद्य
सुरक्षा प्रदान करती है | जमा देने वाली ये ठंडी पवनें उत्तरी धुरव रेखा के निकट
पैदा होती हैं और मध्य तथा पूर्वी एशिया में आर –पार बहती है | इसी प्रकार हिमालय
पर्वत मानसून पवनों कों रोककर भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा का कारण बनता है |
जल और स्थल का वितरण :
भारत के दक्षिण में तीन ओर हिंद महासागर व उत्तर की ओर ऊँची व अविच्छिन्न
पर्वत श्रेणी है | स्थल की अपेक्षा जल देर से गर्म होता है और देर से ठंडा होता है
| जल और स्थल के इस विभेदी तापन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न ऋतुओं में
विभिन्न वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाते हैं | वायुदाब में भिन्नता मानसून पवनों
के उत्क्रमण का कारण बनती है |
समुद्र तट से दूरी:
लम्बी तटीय रेखा के कारण भारत के विस्तृत तटीय प्रदेशों में समकारी जलवायु
पायी जाती है | भारत के आंतरिक भाग समुद्र के समकारी प्रभाव से वंचित रह जाते हैं
| ऐसे क्षेत्रों में विषम जलवायु पायी जाती है | यही कारण है कि मुम्बई तथा कोंकण
तट के निवासी तापमान की विषमता और ऋतु परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पाते | दूसरी ओर
समुद्र तट से दूर देश के आंतरिक भागों में स्थित दिल्ली, कानपुर और अमृतसर में
मौसमी परिवर्तन पूरे जीवन कों प्रभावित करते हैं |
समुद्र तल से ऊँचाई:
ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता है | विरल वायु के कारण पर्वतीय प्रदेश
मैदानों की तुलना में अधिक ठंडे होते हैं | उदाहरणत: आगरा और दार्जिलिंग एक ही
अक्षांश पर स्थित हैं किन्तु जनवरी में आगरा का तापमान 160 सेल्सियस होता है जबकि दार्जिलिंग में इसी समय
का तापमान 40 सेल्सियस होता है |
उच्चावच:
भारत का भौतिक स्वरूप अथवा उच्चावच तापमान, वायुदाब, पवनों की गति एवं दिशा
तथा वर्षा की मात्रा और वितरण कों प्रभावित करता है | उदाहरणत: जून और जुलाई के
बीच पश्चिमी घाट तथा असम के पवनाभिमुखी ढाल अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं | जबकि
इसी दौरान पश्चिमी घाट के साथ लगा दक्षिणी
पठार पवन विमुखी स्थिति के कारण कम वर्षा प्राप्त करता है |
प्रश्न : भारतीय मानसून की प्रकृति कों समझाते हुए मानसून
के आरम्भ, मानसून का भारत में प्रवेश, मानसून विच्छेद और मानसून के निवर्तन का
वर्णन कीजिए |
उत्तर: मानसून एक सुपरिचित जलवायवी घटक है | परन्तु उसके बारे में बहुत कम
जानकारी उपलब्ध है | सदियों से होते आ रहे प्रेक्षणों के बावजूद मानसून आज भी
वैज्ञानिकों के लिए पहेली बनी हुई है | मानसून की सही –सही प्रकृति व उसके कारणों
कों जानने के अनेक प्रयास किए गए , किन्तु अब टक कोई भी सिद्धांत इसे पूरी तरह से
स्पष्ट नहीं कर पाया है | पिछले कुछ दिनों में इसका ‘तोड़’ तब सामने आया जब मानसून
का अध्ययन क्षेत्रीय स्तर की बजाय भूमंडलीय स्तर पर किया गया | दक्षिणी एशियाई
क्षेत्र में वर्षा के कारणों का व्यवस्थित अध्ययन मानसून के कारणों कों समझने में
सहायता करता है | इसके कुछ विशेष पक्ष इस प्रकार है |
(i)
मानसून का आरम्भ तथा
उसका स्थल की ओर बढ़ना
(ii)
भारत में मानसून का
प्रवेश
(iii)
मानसून का विच्छेद
(iv)
मानसून का निवर्तन
मानसून का आरम्भ
19वीं सदी
के अंत में यह व्याख्या की गई थी कि गर्मीं के महीनों में स्थल और समुद्र का
विभेदी तापन ही मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है |
अप्रैल और मई के महीनों में, जब सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है, तो हिंद
महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखंड अत्यधिक गर्म हो जाता है | इसके परिणाम
स्वरूप उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी भाग पर एक गहन न्यून दाब क्षेत्र विकसित हो
जाता है, क्योंकि भूखंड के दक्षिण में हिंद महासागर अपेक्षतया धीरे-धीरे गर्म होता
है, निम्न वायुदाब केन्द्र विषुवत रेखा के उस पार से दक्षिण –पूर्वी सन्मार्गी
पवनों कों आकृषित कर लेता है | इन दशाओं में अंत:उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र
उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है |
इस प्रकार दक्षिण –पश्चिमी मानसूनी पवनों कों दक्षिण –पूर्वी सन्मार्गी पवनों
के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है, जो भूमध्यरेखा कों पार करके भारतीय
उपमहाद्वीप की ओर विक्षेपित हो जाती है | ये पवनें भूमध्यरेखा कों 40O पूर्वी तथा 60O पूर्वी देशान्तर रेखाओं के बीच पार करती हैं |
अंत:उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन का संबंध हिमालय के
दक्षिण में उत्तरी मैदान के ऊपर से पश्चिमी जेट –प्रवाह द्वारा अपनी स्थिति के
प्रत्यावर्तन से भी है | क्योंकि पश्चिमी जेट-प्रवाह के इस क्षेत्र से खिसकते ही
दक्षिणी भारत में 15O उत्तर अक्षांश पर पूर्वी जेट –प्रवाह विकसित हो
जाता है | इसी पूर्वी जेट –प्रवाह कों भारत में मानसून के प्रस्फोट (Burst) के लिए जिम्मेदार माना जाता है |
मानसून का भारत में प्रवेश
भारत में दक्षिणी
–पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून कों पहुँचता है
और शीघ्र ही 10 और 13 जून के बीच ये
पवनें मुंबई व कोलकाता तक पहुँच जाती है | मध्य जुलाई तक संपूर्ण उपमहाद्वीप
दक्षिण –पश्चिमी मानसून के प्रभावाधीन हो जाता है |
मानसून में विच्छेद
दक्षिण –पश्चिमी
मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक –दो या कई सप्ताह तक
वर्षा न हो तो इसे मानसून विच्छेद कहा जाता है | ये विच्छेद विभिन्न क्षेत्रों में
विभिन्न कारणों से होते हैं, जो निम्नलिखित हैं |
(i)
उत्तरी भारत के विशाल
मैदान में मानसून का विच्छेद उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की संख्या कम हो जाने से और
अंत:उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में बदलाव आने से होता है |
(ii)
पश्चिमी तट पर मानसून
विच्छेद तब होता है, आर्द्र पवनें तट के समानांतर बहने लगे |
(iii)
राजस्थान में मानसून
विच्छेद तब होता है,जब वायुमंडल के निम्न स्तरों पर तापमान की विलोमता वर्षा करने
वाली आर्द्र पवनों कों ऊपर उठने से रोक देती है |
मानसून का निवर्तन
मानसून के पीछे
हटने या लौट जाने कों मानसून का निवर्तन कहा जाता है | सितम्बर के आरम्भ से उत्तर –पश्चिमी
भारत से मानसून पीछे हटने लगती है और मध्य
अक्टूबर तक यह दक्षिणी भारत को छोड़कर समस्त भारत से निवर्तित हो जाती है | लौटती
हुई मानसून पवनें बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करके उत्तर –पूर्वी मानसून के
रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती हैं |
प्रश्न : भारतीय मौसम –वैज्ञानिक वर्ष कों किन चार ऋतुओं में बाँटते हैं ?
उत्तर: भारत की
जलवायवी दशाओं कों उसके वार्षिक ऋतु चक्र के माध्यम से सर्वश्रेष्ठ ढंग से व्यक्त
किया जा सकता है | मौसम –वैज्ञानिक वर्ष कों निम्नलिखित चार ऋतुओं में बाँटते हैं
|
(i)
शीत ऋतु
(ii)
ग्रीष्म ऋतु
(iii)
दक्षिण-पश्चिमी मानसून
की ऋतु
(iv)
मानसून के निवर्तन की
ऋतु
प्रश्न: भारत में शीत ऋतु की तापमान, वायुदाब तथा पवनों के साथ साथ वर्षा
संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए |
भारत में शीत ऋतु की तापमान संबंधी विशेषताएँ
तापमान: आम तौर पर
उत्तरी भारत में शीत ऋतु नवम्बर के मध्य से आरम्भ होती है | उत्तरी मैदान में
जनवरी और फरवरी सर्वाधिक ठंडे महीने होते हैं | इसी समय भारत के अधिकाँश भागों में
औसत दैनिक तापमान 21O सेल्सियस से कम रहता
है | रात्री का तापमान काफी कम हो जाता है, जो पंजाब और राजस्थान में हिमांक (0O
सेल्सियस) से भी नीचे चला जाता है | इस ऋतु में, उत्तरी भारत में अधिक
ठण्ड पड़ने के मुख्य रूप से तीन कारण हैं |
(i)
पंजाब, हरियाणा और
राजस्थान जैसे राज्य समुद्र के समकारी प्रभाव से दूर स्थित होने के कारण
महाद्वीपीय जलवायु का अनुभव करते हैं |
(ii)
निकटवर्ती हिमालय की
श्रेणियों में हिमपात के कारण शीत लहर की स्थिति उत्पन्न हो जाती है |\
(iii)
फरवरी के आस - पास
कैस्पियनसागर और तुर्कमेनिस्तान की ठंडी पवनें उत्तरी भारत में शीत लहर ला देती
हैं | ऐसे अवसरों पर देश के उत्तर –पश्चिम भागों में पाला व कोहरा भी पड़ता है |
प्रायद्वीपीय
भारत में कोई निश्चित शीत ऋतु नहीं होती | तटीय भागों में भी समुद्र के समकारी
प्रभाव तथा भूमध्यरेखा की निकटता के कारण ऋतु के अनुसार तापमान के वितरण प्रतिरूप
में शायद ही कोई बदलाव आता हो | उदाहरण के लिए तिरुवनंतपुरम में जनवरी का माध्य
अधिकतम तापमान 31O सेल्सियस रहता है, जबकि जून में यह 29.5O सेल्सियस पाया जाता है | पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर तापमान अपेक्षाकृत कम
पाया जाता है |
भारत में शीत ऋतु की वायुदाब तथा पवनें संबंधी विशेषताएँ:
दिसम्बर के अंत तक (22दिसम्बर) सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर
रेखा पर सीधा चमकता है | इस ऋतु में मौसम की विशेषता उत्तरी मैदान में एक क्षीण
उच्च वायुदाब का विकसित होना है | दक्षिणी भारत में वायुदाब उतना अधिक नहीं होता |
1.019 मिलीबार तथा 1013 मिलीबार की
समभार रेखाएँ उत्तर –पश्चिमी भारत तथा सुदूर दक्षिण से होकर गुजरती हैं | परिणाम
स्वरूप उत्तर –पश्चिमी उच्च वायुदाब क्षेत्र से दक्षिण में हिंद महासागर पर स्थित
निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर पवनें चलना आरम्भ कर देती हैं | कम दाब प्रवणता के कारण 3 से 5 किलोमीटर प्रति घंटा की दर से
मंद गति की पवनें चलने लगती हैं | मौटे तौर पर
क्षेत्र की भू आकृति भी पवनों की दिशा कों प्रभावित करती है | गंगा घाटी
में इनकी दिशा पश्चिमी और उत्तर पश्चिमी होती है | गंगा ब्रह्मपुत्र डेल्टा
क्षेत्र में इनकी दिशा उत्तरी हो जाती है | भू आकृति के प्रभाव से मुक्त इन पवनों
की दिशा बंगाल की खाड़ी में स्पष्ट तौर पर उत्तरी पूर्वी होती है |
शीत ऋतु में आने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात या पश्चिमी विक्षोभ
सर्दियों में भारत का मौसम सुहावना होता है | फिर भी यह सुहावना मौसम कभी –कभार
हल्के चक्रवातीय अवदाबों से बाधित होता रहता है | पश्चिमी विक्षोभ कहे जाने वाले
ये चक्रवात पूर्वी भूमध्य सागर पर उत्पन्न होते हैं और पूर्व की ओर चलते हुए
पश्चिमी एशिया, ईरान,अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान को पार करके भारत के उत्तर –पश्चिमी
भागों में पहुँचते हैं | मार्ग में उत्तर में कैस्पियन सागर तथा दक्षिण में ईरान
की खाड़ी से गुजरते समय इन चक्रवातों की आर्द्रता में संवर्धन हो जाता है |
पश्चिमी जेट –प्रवाह
इन अवदाबों कों भारत की ओर उन्मुख करने में क्या भूमिका निभाते हैं ?
भारत में शीत ऋतु की वर्षा संबंधी विशेषताएँ
शीतकालीन मानसून
पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलने के कारण वर्षा नहीं करती, क्योंकि एक तो इनमें
नमी केवल नाममात्र की होती है | | दूसरे, स्थल पर घर्षण के कारण इन पवनों का
तापमान बढ़ जाता है , जिससे वर्षा होने की संभावना निरस्त हो जाती है | अत: शीत ऋतु
में अधिकाँश भारत में वर्षा नहीं होती | अपवादस्वरूप कुछ क्षेत्रों में शीत ऋतु
में वर्षा होती है | जिनका वर्णन
निम्नलिखित है |
(i)
उत्तर –पश्चिमी भारत में
भूमध्यसागर से आने वाले कुछ क्षीण शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पंजाब हरियाणा तथा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ वर्षा करते हैं | कम मात्रा में होते हुए भी यह शीतकालीन वर्षा
भारत में रबी की फसल के लिए उपयोगी होती है | लघु हिमालय में वर्षा हिमपात के रूप
में होती है | यह वही हिम है, जो गर्मियों के महीनों में हिमालय से निकलने वाली
नदियों में जल के प्रवाह कों निरंतर बनाए रखती है | वर्षा की मात्रा मैदानों में
पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है | दिल्ली में सर्दियों की औसत वर्षा 53 मिलीमीटर होती है | पंजाब और बिहार के बीच में यह वर्षा 18 से 25 मिलीमीटर के बीच रहती है |
(ii)
कभी –कभी देश के मध्य
भागों एवं दक्षिणी प्रायद्वीप के उत्तरी भागों में भी कुछ शीतकालीन वर्षा हो जाती
है |
(iii)
जाड़े के महीनों में भारत
के उत्तरी –पूर्वी भाग में स्थित अरुणाचल प्रदेश तथा असम में भी 25 से 50 मिलीमीटर तक वर्षा हो जाती है |
(iv)
उत्तर –पूर्वी मानसून
पवनें अक्टूबर से नवम्बर के बीच बंगाल की खाड़ी कों पार करते समय नमी ग्रहण कर लेती
है और तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, दक्षिणी –पूर्वी कर्नाटक तथा दक्षिणी –पूर्वी केरल
में झंझावाती वर्षा करती हैं |
प्रश्न: भारत में ग्रीष्म ऋतु की तापमान, वायुदाब तथा पवनों के साथ साथ वर्षा
संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए |
उत्तर: ग्रीष्म
ऋतु
ग्रीष्म ऋतु में तापमान संबंधी विशेषताएँ
मार्च में सूर्य
के कर्क रेखा की ओर आभासी बढ़त के साथ ही उत्तरी भारत में तापमान बढ़ने लगता है |
अप्रैल, मई व जून में उत्तरी भारत में स्पष्ट रूप से ग्रीष्म ऋतु होती है | भारत
के अधिकाँश भागों में तापमान 30O से 32O
सेल्सियस तक पाया
जाता है | मार्च में दक्कन के पठार पर दिन का अधिकतम तापमान 38O सेल्सियस
हो जाता है | जबकि अप्रैल में गुजरात और
मध्य प्रदेश में यह तापमान 38O
सेल्सियस से 43O सेल्सियस के बीच
पाया जाता है | मई में ताप की यह पेटी और अधिक उत्तर में खिसक जाती है | जिससे देश
के उत्तर –पश्चिमी भागों में 48O
सेल्सियस के आसपास तापमान का होना असामान्य बात नहीं है |
दक्षिणी भारत में ग्रीष्म ऋतु मृदु
होती है तथा उत्तरी भारत जैसी प्रखर नहीं होती | दक्षिणी भारत की प्रायद्वीपीय
स्थिति समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण यहाँ के तापमान कों उत्तरी भारत में
प्रचलित तापमानों से नीचे रखती है | अत: दक्षिण में तापमान 26O से 32O सेल्सियस के बीच रहता है |
पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के कुछ क्षेत्रों में ऊँचाई के कारण तापमान 25O
सेल्सियस से कम रहता
है | तटीय भागों में समताप रेखाएँ तट के समानांतर उत्तर –दक्षिण दिशा में फैली
हैं, जो प्रमाणित करती हैं कि तापमान उत्तरी भारत से दक्षिणी भारत की ओर न बढ़कर
तटों से भीतर की ओर बढ़ता है | गर्मी के महीनों में औसत न्यूनतम दैनिक तापमान भी
काफी ऊँचा रहता है यह 26O सेल्सियस से शायद ही कभी नीचे
जाता हो |
वायुदाब और पवनों संबंधी विशेषताएँ
देश के आधे
उत्तरी भाग में ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी और गिरता हुआ वायुदाब पाया जाता है |
उपमहाद्वीप के गर्म हो जाने के कारण जुलाई में अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र
उत्तर की ओर खिसककर लगभग 25O उत्तरी अक्षांश रेखा पर स्थित
हो जाता है | मोटे तौर पर यह निम्न दाब की लंबायमान मानसून द्रोणी उत्तर –पश्चिम में
थार मरुस्थल से पूर्व में पटना और छतीसगढ़ पठार तक विस्तृत होती है | अंत: उष्णकटिबंधीय
अभिसरण क्षेत्र की स्थिति पवनों के धरातलीय संचरण कों आकर्षित करती है, जिनकी दिशा
पश्चिमी तट, पश्चिमी बंगाल के तट तथा बांग्लादेश के साथ दक्षिणी –पश्चिमी होती है
| उत्तरी बंगाल और बिहार में इन पवनों की दिशा पूर्वी और दक्षिणी –पूर्वी होती है
| यह बात पहले से ही स्पष्ट है कि दक्षिण-पश्चिमी मानसून की ये धाराएँ वास्तव में
विस्थापित भू मध्य रेखीय पुरवा पवनें हैं | मध्य जून तक इन पवनों का अंत: प्रवेश
मौसम का वर्षा ऋतु की ओर बदलाव करता है |
उत्तर –पश्चिम में अंत:उष्णकटिबंधीय
अभिसरण क्षेत्र के केन्द्र में दोपहर के बाद ‘लू’ के नाम से विख्यात शुष्क एवं
तप्त हवाएँ चलती हैं, जो कई बार आधी रात तक चलती रहती है | मई में शाम के समय
पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में धूल भरी आँधियों का चलना एक
आम बात है | ये अस्थायी तूफ़ान पीडादायक गर्मी से कुछ राहत दिलाते हैं, क्योंकि ये
अपने साथ हल्की बारिश और सुखद व शीतल हवाएँ लाते हैं | कई बार ये आर्द्रता भरी
पवनें द्रोणी की परिधि की ओर आकर्षित होती हैं | शुष्क एवं आर्द्र वायु संहतियों
के अचानक संपर्क से स्थानीय स्तर पर तेज तूफ़ान पैदा होते हैं | इन स्थानीय तूफानों
के साथ तेज हवाएँ मूसलाधार वर्षा तक कि ओले भी आते हैं |
प्रश्न: ग्रीष्म ऋतु में आने वाले कुछ प्रसिद्ध स्थानीय तूफ़ानों का उल्लेख
कीजिए |
उत्तर: ग्रीष्म
ऋतु में आने वाले कुछ प्रसिद्ध स्थानीय तूफ़ान निम्नलिखित हैं |
(i)
आम्र वर्षा (आम्र वृष्टि)
: ग्रीष्म ऋतु के खत्म होते –होते पूर्व मानसून बौछारें पड़ती हैं | जो ककेरल व
तटीय कर्नाटक में यह एक आम बात है | स्थानीय तौर पर इस तूफानी वर्षा कों आम्र
वृष्टि कहा जाता है क्योंकि यह आमों कों
जल्दी पकने में सहायता देती है |
(ii)
फूलों वाली बौछार : इस वर्षा से केरल व निकटवर्ती कहवा उत्पादक क्षेत्रों में कहवा के फूल खिलने
लगते हैं |
(iii)
काल बैशाखी : असम और पश्चिम बंगाल में बैसाख के
महीने में शाम कों चलने वाली ये भयंकर व विनाशकारी वर्षा युक्त पवनें हैं | इनकी
कुख्यात प्रकृति का अंदाजा इनके स्थानीय नाम बैसाखी से लगाया जा सकता है | जिसका
अर्थ है – बैसाख के महीने में आने वाली तबाही | चाय, पटसन व चावल के लिए ये पवनें
अच्छी हैं | असम में इन तूफानों कों ‘बारदोली छीड़ा’ कहा जाता है |
(iv)
लू: उत्तरी मैदान में पंजाब से बिहार तक चलने वाली ये शुष्क, गर्म व पीड़ादायक
पवनें हैं | दिल्ली और पटना के बीच इनकी तीव्रता अधिक होती है |
प्रश्न : भारत में दक्षिणी पश्चिमी मानसून की ऋतु (वर्षा ऋतु ) की विभन्न
दशाओं का वर्णन कीजिए |
उत्तर: दक्षिणी
–पश्चिमी मानसून की ऋतु (वर्षा ऋतु)
मई के महीने में
उत्तर –पश्चिमी मैदानों में तापमान अधिक तेजी से बढ़ने के कारण निम्न वायुदाब की
दशाएँ और अधिक गहराने लगती है |
जून के आरम्भ में ये दशाएँ इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे हिंद महासागर से
आने वाली दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनों कों आकृषित कर लेती हैं | ये
दक्षिणी –पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा कों पार करके बंगाल की खाड़ी और अरब
सागर में प्रवेश कर जाती हैं | भूमध्यरेखीय गर्म समुद्री धाराओं के ऊपर से गुजरने
के कारण ये पवनें अपने साथ पर्याप्त मात्रा में आर्द्रता लाती हैं | भूमध्यरेखा
कों पार करके इनकी दिशा दक्षिण –पश्चिमी हो जाती है | इसी कारण इन्हें दक्षिणी –पश्चिमी
मानसून भी कहा जाता है |
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की ऋतु में वर्षा अचानक आरम्भ हो जाती है | पहली बारिश
का असर यह होता है कि तापमान में काफी गिरावट आ जाती है | प्रचण्ड गर्जन और बिजली
की कड़क के साथ इन आर्द्रता भरी पवनों का अचानक चलना प्राय: मानसून का प्रस्फोट
कहलाता है |
जून के पहले सप्ताह में केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के तटीय भागों में
मानसून फट पड़ता है | जबकि देश के आंतरिक भागों में यह जुलाई के पहले सप्ताह तक हो
पाता है | मध्य जून से मध्य जुलाई के बीच दिन के तापमान में 5O से 8O सेल्सियस की गिरावट
आ जाती है | ज्योंही ये पवनें स्थल पर पहुँचती हैं | उच्चावच और उत्तर –पश्चिमी
भारत पर स्थित तापीय निम्न वायुदाब इनकी दक्षिणी –पश्चिमी दिशा कों संशोधित कर
देते हैं | भूखंड पर मानसूनी पवनें दो शाखाओं में पहुँचती
है |
(i)
अरब सागर की शाखा
(ii)
बंगाल की खाड़ी की शाखा
|
अरब सागर की मानसून पवनें
अरब सागर से
उत्पन्न होने वाली मानसून पवनें आगे तीन शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं | जो
निम्नलिखित हैं |
(i)
इसकी एक शाखा कों
पश्चिमी घाट पर्वत रोकते हैं | ये पवनें पश्चिमी घाट की ढलानों पर 900 से 1200 मीटर की ऊँचाई तक चढ़ती हैं |
अत: ये पवनें तत्काल ठंडी होकर सह्याद्री की पवनाभिमुखी ढाल तथा पश्चिमी तटीय
मैदान पर 250 से 400 सेंटीमीटर के बीच भारी वर्षा करती है | पश्चिमी घाट कों पार करने के बाद
ये पवनें नीचे उतरती हैं और गर्म होने लगती हैं | इससे इन पवनों की आर्द्रता में
कमी आ जाती है | परिणाम स्वरूप पश्चिमी घाट के पूर्व में इन पवनों से नाममात्र की
वर्षा होती है | कम वर्षा का यह क्षेत्र वृष्टि –छाया क्षेत्र कहलाता है |
(ii)
अरब सागर से उठने वाली
मानसून की दूसरी शाखा मुंबई के उत्तर में नर्मदा और तापी नदियों की घाटियों से
होकर गुजरती है और मध्य भारत में दूर तक वर्षा करती है | छोटा नागपुर पठार में इस
शाखा से 15 सेंटीमीटर वर्षा होती हैं | यहाँ यह गंगा के
मैदान में प्रवेश कर जाती है और बंगाल की
खाड़ी से आने वाली मानसून की शाखा से मिल जाती है |
(iii)
इस मानसून की तीसरी शाखा
सौराष्ट्र प्रायद्वीप और कच्छ से टकराती है | वहाँ से अरावली के साथ –साथ पश्चिमी
राजस्थान कों लाँघती है | इस क्षेत्र में ये बहुत ही कम वर्षा करती है | पंजाब,
हरियाणा में भी यह बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून की शाखा से मिल जाती है | ये
दोनों शाखाएँ एक दूसरे के सहारे प्रबलित होकर पश्चिमी हिमालय विशेष रूप से
धर्मशाला में वर्षा करती हैं |
बंगाल की खाड़ी की मानसून पवनें
बंगाल की खाड़ी की
मानसून पवनों की शाखा म्यांमार के तट तथा दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के एक थोड़े से
भाग से टकराती है | किन्तु म्यांमार के तट पर स्थित अराकान पहाड़ियाँ इस शाखा के एक
बड़े हिस्से कों भारतीय उपमहाद्वीप की ओर विक्षेपित कर देती है | इस प्रकार मानसून
पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में दक्षिण –पश्चिमी दिशा की अपेक्षा दक्षिणी व
दक्षिण-पूर्वी दिशा से प्रवेश करती है | यहाँ से यह शाखा हिमालय पर्वत तथा भारत के
उत्तर –पश्चिम में स्थित तापीय निम्नदाब के प्रभावाधीन दो भागों में बँट जाति है,
इसकी एक शाखा गंगा के मैदान के साथ –साथ पश्चिम की ओर बढ़ती है और पंजाब के मैदान
तक पहुँचती है | इसकी दूसरी शाखा उत्तर व उत्तर-पूर्व में ब्रह्मपुत्र घाटी में
बढ़ती है | यह शाखा वहाँ विस्तृत क्षेत्रों में वर्षा करती है | इसकी एक उपशाखा मेघालय
में स्थित गारो और खासी की पहाड़ियों से टकराती है | खासी पहाड़ियों के शिखर पर
स्थित मॉसिनराम विश्व की सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा प्राप्त करता है |
प्रश्न: तमिलनाडु तट वर्षा ऋतु में शुष्क क्यों रह जाता है ?
उत्तर: तमिलनाडु
तट वर्षा ऋतु में शुष्क रह जाता है | इसके लिए दो कारक उत्तरदायी हैं |
(i)
तमिलनाडु तट बंगाल की
खाड़ी की मानसून पवनों के समानांतर पड़ता है |
(ii)
यह क्षेत्र
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की अरब सागर की शाखा के वृष्टि छाया क्षेत्र में स्थित है |
प्रश्न: मानसून के निवर्तन की ऋतु का संक्षिप्त वर्णन करें |
उत्तर: अक्टूबर
और नवम्बर के महीनों कोम मानसून के निवर्तन की ऋतु कहा जाता है | सितम्बर के अंत
में सूर्य के दक्षिणायन होने की स्थिति में गंगा के मैदान पर निम्न वायुदाब की
द्रोणी भी दक्षिण की ओर खिसकना आरम्भ कर देती है | इससे दक्षिणी पश्चिमी मानसून
कमजोर पड़ने लगता है | मानसून सितम्बर के पहले सप्ताह में पश्चिमी राजस्थान से
लौटता है | इस महीने के अंत तक मानसून राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी गंगा मैदान तथा
मध्यवर्ती उच्च भूमियों से लौट चुकी होती है | अक्टूबर के आरम्भ में मानसून बंगाल की खाड़ी के उत्तरी भागों में स्थित हो
जाता है तथा नवम्बर के शुरू में यह कर्नाटक और तमिलनाडु की ओर बढ़ जाता है | दिसम्बर
के मध्य तक निम्न वायुदाब का केन्द्र प्रायद्वीप से पूरी तरह से हट चुका होता है |
मानसून के निवर्तन की ऋतु में आकाश स्वच्छ हो जाता है और तापमान बढ़ने लगता है
| जमींन में अभी भी नमी होती है | उच्च तापमान और आर्द्रता की दशाओं से मौसम
कष्टकारी हो जाता है | आमतौर पर इसे ‘कार्तिक मास की ऊष्मा’ (क्वार की उमस) कहा
जाता है | अक्टूबर माह के उत्तरार्ध में तापमान तेजी से गिरने लगता है | तापमान
में यह गिरावट उत्तरी भारत में विशेष तौर पर देखी जाती है | मानसून के निवर्तन की
ऋतु में मौसम उत्तरी भारत में सूखा होता है | जबकि प्रायद्वीप के पूर्वी भागों में
वर्षा होती है | यहाँ अक्टूबर और नवम्बर वर्ष के सबसे अधिक वर्षा वाले महीनें होते
हैं |
इस ऋतु की व्यापक वर्षा का संबंध चक्रवातीय अवदाबों के मार्ग से है, जो अंडमान
समुद्र में पैदा होते हैं और दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी तट कों पार करते हैं |
ये उष्ण कटिबंधीय चक्रवात अत्यंत विनाशकारी होते हैं | गोदावरी, कृष्णा तथा अन्य
नदियों के घने बसे डेल्टाई प्रदेश इन तूफानों के शिकार बनते हैं | हर साल
चक्रवातों से यहाँ आपदा आती है | कुछ चक्रवातीय तूफ़ान पश्चिम बंगाल, बंगाल और
म्यांमार के तट से भी टकराते हैं | कोरोमंडल तट पर होने वाली अधिकाँश वर्षा इन्हीं
अवदाबों और चक्रवातों से प्राप्त होती है | ऐसे चक्रवातीय तूफ़ान अरब सागर में कम
उठते हैं |
प्रश्न : भारत की परम्परागत ऋतुएँ पर नोट लिखें |
उत्तर: भारतीय
परम्परा के अनुसार वर्ष कों द्विमासिक छ: ऋतुओं में बाँटा जाता है | उत्तरी और
मध्य भारत में लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले इस ऋतु चक्र का आधार उनका अपना अनुभव
और मौसम के घटक का प्राचीन काल से चला आया ज्ञान है | लेकिन ऋतुओं की यह व्यवस्था
दक्षिण भारत की ऋतुओं से मेल नहीं खाती, जहाँ ऋतुओं में थोड़ी भिन्नता पाई जाती है
| भारतीय परम्परा के अनुसार वर्ष कों द्विमासिक छ: ऋतुओं में बाँटा जाता है | जो
निम्न तालिका में दी गई हैं |
तालिका : भारत की परम्परागत ऋतुएँ
|
क्रम संख्या |
ऋतु |
भारतीय कैलेंडर के अनुसार महीने |
ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार महीने |
|
1 |
बसंत |
चैत्र – बैशाख |
मार्च –अप्रैल |
|
2 |
ग्रीष्म |
ज्येष्ठ –आषाढ़ |
मई –जून |
|
3 |
वर्षा |
श्रावण –भाद्र |
जुलाई –अगस्त |
|
4 |
शरद |
अश्विन –कार्तिक |
सितम्बर –अक्टूबर |
|
5 |
हेमंत |
मार्गशीष –पौष |
नवम्बर –दिसम्बर |
|
6 |
शिशिर |
माघ –फाल्गुन |
जनवरी –फरवरी |
प्रश्न : भारत में वर्षा का वितरण का उल्लेख कीजिए |
उत्तर: भारत में
औसत वार्षिक वर्षा लगभग 125 सेंटीमीटर है | लेकिन वर्षा के वितरण में
भारत में क्षेत्रीय विभिन्नताएँ पाई जाती है |
अधिक वर्षा वाले क्षेत्र :
भारत में अधिक
अधिक वर्षा पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट, उत्तर –पूर्व के उप –हिमालयी क्षेत्र तथा
मेघालय की पहाड़ियों पर होती है | यहाँ वर्षा 200
सेंटीमीटर से अधिक होती है | खासी और जयंतिया पहाड़ियों के कुछ भागों में वर्षा 1000 सेंटीमीटर से भी अधिक होती है | ब्रह्मपुत्र घाटी तथा निकटवर्ती पहाड़ियों
पर वर्षा 200 सेंटीमीटर से कम होती है |
मध्यम वर्षा के क्षेत्र:
गुजरात के
दक्षिणी भाग, पूर्वी तमिलनाडु, ओडिशा सहित उत्तर –पूर्वी प्रायद्वीप, झारखण्ड,
बिहार, पूर्वी मध्यप्रदेश, उपहिमालय के साथ संलग्न गंगा का उत्तरी मैदान, कछार
घाटी और मणिपुर में वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर के बीच
होती है |
न्यून वर्षा के क्षेत्र:
पश्चिमी उत्तर
प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू व कश्मीर, पूर्वी राजस्थान, गुजरात तथा
दक्कन के पठार पर वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर के
बीच होती है |
अपर्याप्त वर्षा के क्षेत्र:
प्रायद्वीप के
कुछ भागों विशेष रूप से आंध्रप्रदेश , कर्नाटक और महाराष्ट्र में, लद्दाख और
पश्चिमी राजस्थान के अधिकतर भागों में 50
सेंटीमीटर से कम वर्षा होती है |
हिमपात केवल
हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित रहता है |
प्रश्न: मानसून भारत के आर्थिक जीवन कों किस प्रकार प्रभावित करता है ?
उत्तर: मानसून भारत के आर्थिक जीवन कों निम्नलिखित प्रकार प्रभावित
करता है |
(i)
मानसून वह धुरी है जिसे
पर समस्त भारत का जीवन चक्र घूमता है | क्योंकि भारत की 64 प्रतिशत जनसंख्या भरण –पोषण के लिए खेती पर निर्भर है, जो
मुख्यत: दक्षिण –पश्चिमी मानसून पर आधारित है |
(ii)
हिमालयी प्रदेशों के
अतिरिक्त शेष भारत में वर्ष भर यथेष्ट गर्मी रहती है , जिससे सारा साल खेती की जा
सकती है |
(iii)
मानसून जलवायु की
क्षेत्रीय विभिन्नता विभिन्न प्रकार की फसलों कों उगाने में सहायक है |
(iv)
वर्षा की परिवर्तनशीलता
देश के कुछ भागों में सूखा अथवा बाढ़ का कारण बनती है |
(v)
भारत में कृषि की समृधि
वर्षा के सही समय पर आने तथा उसके पर्याप्त वितरित होने पर निर्भर करती है | यदि
वर्षा नहीं होती तो कृषि पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में
जहाँ सिंचाई के साधन विकसित नहीं हैं |
(vi)
मानसून का अचानक
प्रस्फोट देश के व्यापक क्षेत्रों में मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न कर देता है |
(vii)
उत्तर भारत में शीतोष्ण
कटिबंधीय चक्रवातों द्वारा होने वाली शीतकालीन वर्षा रबी की फसलों के लिए अत्यंत
लाभकारी सिद्ध होती है |
(viii)
भारत की जलवायु
क्षेत्रीय विभिन्नता भोजन, वस्त्र और आवासों की विविधता में उजागर होती है |
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