Thursday, July 25, 2024

NATIONALISM IN INDIA LESSON 2 (INDIA AND CONTEMPORARY WORLD-II) CLASS 10TH HISTORY BOOK QUESTION ANSWER

 

अध्याय  (LESSON) 2

भारत में राष्ट्रवाद (NATIONALISM IN INDIA )

भारत और समकालीन विश्व (INDIA AND CONTEMPORARY WORLD-II)

कक्षा 10 वीं

प्रश्न  1                    सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है ?

उत्तर :           सत्याग्रह के विचार में सत्य के आग्रह पर और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता है  इसका अर्थ यह है कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीडक से मुकाबला करने के लिए आपको शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है

प्रतिशोध की भावना आक्रमकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है | इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए | उत्पीडक शत्रु को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को हिंसा के द्वारा सत्य को स्वीकार करने पर की बजाय सच्चाई को देखने और सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है | इस संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है |

प्रश्न  2                    जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर संक्षिप्त  नोट लिखो |

उत्तर :     सन् 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल ने जल्दबाजी में रॉल्ट एक्ट कानून पास किया | पूरे देश में लोग इस कानून का विरोध करने लगे | लोगों के विरोध को देखते हुए 10 अप्रैल को अमृतसर में मार्शल लॉ लगा दिया था | अमृतसर में जनरल डायर ने कमान संभाल ली थी |  13 अप्रैल  सन् 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बैसाखी के वार्षिक मेले में लोग शामिल होने आए थे | कुछ लोग रॉल्ट एक्ट कानून का विरोध करने के लिए शामिल हुए थे | शहर के बाहर के लोगों को यह नहीं पता था कि अमृतसर में मार्शल लॉ लगाया जा चुका  है | जनरल डायर हथियार बंद सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और जाते ही उसने मैदान से बाहर जाने के सारे रास्ते बंद कर दिए  और सिपाहियों को गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया | सिपाहियों ने अंधाधुंध गोलियाँ चला दी  जिससे सकड़ों लोग मारे गए |

प्रश्न  3                    सत्याग्रह पर महात्मा गाँधी के विचार क्या थे ?

उत्तर :           गाँधी जी के अनुसार सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है | सत्याग्रही अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुँचाता | सत्याग्रह के प्रयोग में दुर्भावना के  लिए कोई स्थान नहीं होता | सत्याग्रह तो शुद्ध आत्म बल है | सत्य ही आत्मा का आधार होता है | इसलिए इस बल को सत्याग्रह का नाम दिया गया है | महात्मा गाँधी जी को विश्वास था कि अहिंसा का धर्म सभी भारतियों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है |

प्रश्न  4                    उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई क्यों थी ? व्याख्या करें |

उत्तर :           दूसरे उपनिवेशों की तरह भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी | औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे | उत्पीडन और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक –दूसरे से बाँध दिया था | लोग समझने लगे थे कि एकजुट होकर ही औपनिवेशी ताकतों को देश से बाहर निकला जा सकता है | उपनिवेश विरोधी इसी भावना ने राष्ट्रवाद के उदय में सहायता पहुँचाई |

प्रश्न  5                    प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया ? व्याख्या करें |

अथवा

प्रथम विश्व युद्ध ने एक नयी आर्थिक और  राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी | व्याख्या करें |

उत्तर :           पहले विश्व युद्ध ने एक नयी आर्थिक और  राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी | जिसके कारण भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का विकास तेजी से हुआ | प्रथम विश्व युद्ध के कारण उत्पन्न निम्नलिखित परिस्थितयों के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को बढ़ावा मिला | 

i)        प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा व्यय में काफी इज़ाफ़ा हुआ |  इस खर्च की भरपाई करने के लिए युद्ध के नाम पर कर्जे लिए गए  और करों में वृद्धि की गई | सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया | आयकर के रूप में नया कर शुरू कर दिया गया |

ii)      युद्ध के कारण कीमतें तेजी से बढ़ रही थी | सन् 1913 से 1918 बीच कीमतें दोगुनी हो चुकी थी | जिसके कारण आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई |

iii)    गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया जाने लगा जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में उपनिवेशिक सरकार के प्रति व्यापक गुस्सा था |  

iv)    1918 -19 और 1920-21 में देश में बहुत सारे हिस्सों में फसल खराब हो गई | जिसके कारण खाद्य पदार्थों का भारी अभाव हो गया | उसी समय फ्लू की बिमारी फ़ैल गई |  1921 की जनगणना के अनुसार दुर्भिक्ष (आकाल) के कारण और महामारी के कारण 120 -130 लोग मारे गए |

लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध खत्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जायेगी मगर ऐसा नहीं हुआ | इन सभी कारणों ने  राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में अपना योगदान दिया |

प्रश्न  6                    रॉल्ट एक्ट कानून पर नोट लिखो ?

अथवा

भारतीय लोग रॉल्ट एक्ट के विरोध में क्यों थे ? व्याख्या करें |

उत्तर :           भारतीय लोग रॉल्ट एक्ट के विरोध में थे | इसके निम्नलिखित कारण थे|

i)        सन् 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल ने जल्दबाजी में रॉल्ट एक्ट  नाम का कानून पास किया |

ii)      भारतीय सदस्यों के  भारी विरोध के बावजूद इस कानून को पास किया गया था |

iii)    इस कानून के द्वारा सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रखने का अधिकार मिल गया था |  

iv)    भारतीय लोग किसी भी वक्त बंदी बनाए जाने के भय से चिंतित रहने लगे थे |

 

प्रश्न  7                    गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला क्यों लिया ? व्याख्या करें |

उत्तर :           फरवरी 1922 गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला कर लिया | जिनके निम्नलिखित कारण थे |

i)        उन्हें लगता था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की जरूरत है | 

ii)      गोरखपुर के चौरी –चौरा में हिंसक घटना भड़क उठी |यहाँ बाज़ार में शांतिपूर्ण जुलुस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया | इस घटना में बीस से अधिक पुलिसकर्मी मारे गए | इस घटना के बारे में सुनते ही महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया |

iii)    कांग्रेस के कुछ नेता इस तरह के जनसंघर्षों से थक चुके थे | साथ ही वे 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत गठित की गई प्रांतीय परिषद के चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे |

प्रश्न  8                    अध्याय  2 (भारत में  राष्ट्रवाद का उदय)  में दी गई भारत माता की छवि और अध्याय  1 (यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय) में दी गई  जर्मेनिया   की छवि की तुलना कीजिए |

उत्तर :           राष्ट्र की पहचान सबसे ज्यादा किसी तस्वीर में अंकित की जाती है  | इससे लोगों को ऐसी छवि गढ़ने में मदद मिलती है जिसके द्वारा वे राष्ट्र को पहचान सके | जर्मनी में राष्ट्रवाद के उदय के समय जर्मेनिया जर्मनी का राष्ट्र प्रतीक और भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन के समय भारत माता की छवि भारतीय राष्ट्र का प्रतीक बन गई | इन दोनों की छवियों में को हम निम्नप्रकार से देखते हैं |

भारत माता की छवि

भारत माता की छवि स्वदेशी आंदोलन के परिणाम स्वरूप अबनिन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा चित्रित की गई | उनके द्वारा बनाई गई छवि में भारत माता को सन्यासिनी के रूप में दिखाया गया है | वह शांत, गंभीर दैवी और अध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है | बाद में इस छवि को बड़े पैमाने पर तस्वीरों में उतारा जाने लगा | विभिन्न कलाकार यह तस्वीर बनाने लगे तो भारत माता की छवि को विविध रूपों में चित्रित किया जाने लगा | तस्वीरों में भारत माता को हाथ में त्रिशूल लिए दिखाया गया है | वह हाथी और शेर के बीच खड़ी है जो दोनों शक्ति और सत्ता के प्रतीक है |

जर्मेनिया की छवि

जर्मन राष्ट्र की प्रतीक जर्मेनिया की छवि को चित्रकार फिलिप वेट ने सन् 1848 में चित्रित किया है | जर्मेनिया की यह तस्वीर उस समय जर्मन राष्ट्र का रूपक बन गई थी | इस तस्वीर में जर्मेनिया को बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दिखाया गया है | क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक माना जाता है | एक अन्य छवि में जर्मेनिया को हाथ में तलवार लिए हुए राइन नदी की सुरक्षा करते हुए दर्शाया गया है |

           

प्रश्न  9                    1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए | इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुन कर उनकी आशाओं और संघर्षों के बारे में लिखते हुए यह दर्शाइए कि वे आंदोलन में शामिल क्यों हुए?

उत्तर :           1921 के असहयोग आंदोलन में कई सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया | जिनमें शहरों में विद्यार्थी, शिक्षक, वकील तथा उद्योगपति और व्यापारी शामिल हुए जबकि ग्रामीण क्षेत्रों से अवध के किसान, आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी किसान और असम के बागान मजदूर शामिल हुए | असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों की अपनी-अपनी आशाएं थी | इन समूहों के संघर्ष के तरीके भी उनकी आशाओं के अनुरूप थे | उनमें से कुछ की आशाओं और संघर्षों को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है |

                  अवध के किसान

                  अवध में सन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे | बाबा रामचन्द्र इससे पहले फिजी में गिरमिटिया मजदूर के तौर पर काम कर चुके थे | उनका आंदोलन तालुकदारों और जमींदारों का खिलाफ था | जो किसानों से भारी भरकम लगान और तरह-तरह के कर वसूल करते थे | किसानों को बेगार करनी पड़ती थी | किसानों की माँग थी कि लगान कम किया जाए और बेगार खत्म हो | साथ ही दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए |  

                              1921 में जब असहयोग आंदोलन फैला तो  किसानों कि ओर से तालुकदारों और व्यापारियों के मकानों पर हमले होने लगे | बाजारों में लूटपाट होने लगी और किसानों के द्वारा अनाज के गोदामों पर कब्जा कर लिया गया | बहुत सारे स्थानीय नेताओं ने किसानों को समझाया कि  गाँधी जी ऐलान कर दिया है कि अब कोई लगान नहीं भरेगा और जमीन गरीबों में बाँट दी जायेगी | महात्मा गाँधी का नाम लेकर सभी लोग अपनी कार्यवाहियों और आकांक्षाओं को सही ठहरा रहे थे |

आदिवासी किसान

आदिवासी किसानों ने महात्मा गाँधी के संदेश और स्वराज के विचार का कुछ और ही मतलब निकाला | इसके परिमाण स्वरूप आंध्रप्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक की शुरुआत में एक अत्यंत गुरिल्ला आंदोलन फ़ैल गया | इस गुरिल्ला आंदोलन का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू कर रहे थे | क्योंकि अन्य वन क्षेत्रों की तरह यहाँ भी अंग्रेजों ने बड़े –बड़े जंगलों में लोगों के दाखिल होने पर पाबंदी लगा दी | लोग इन जंगलों में न तो मवेशियों को चरा सकते थे न ही जलावन के लिए लकड़ी और फल इक्कट्ठा कर सकते थे | न केवल उनकी रोजी –रोटी पर असर पड़ रहा था बल्कि उन्हें लगता था कि उनके परम्परागत अधिकार भी उनसे छीने जा रहे हैं | सरकार ने जब इन आदिवासी लोगों को सड़क निर्माण के इये बेगार करने पर मजबूर कर दिया तो लोगों ने बगावत कर दी |

इन समस्याओं के समाधान के लिए गुडेम पहाड़ियों के आदिवासियों ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया | उनके नेता अल्लूरी सीताराम राजू का मानना था कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं बल्कि केवल बल प्रयोग द्वारा ही आजाद हो सकता है | इसलिए गुडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने की कोशिश की और स्वराज की प्राप्ति के लिए गुरिल्ला युद्ध चलाते रहे |

                  असम के बागान मजदूर

                  महात्मा गाँधी के विचारों और स्वराज की अवधारणा के बारे में असम के बागान मजदूरों कि अपनी समझ  थी  |            असम के बागान मजदूरों के लिए आजादी का मतलब यह था कि वे उन चार दीवारियों से जब चाहे जा सकते है जिनमें उनको बंद करके रखा गया था | उनके लिए आजादी का मतलब था कि वे अपने गाँवों से सम्पर्क रख पाएँगें और स्वतंत्र रूप से अपने गाँव और बागान आ सकेगें | क्योंकि 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत काम करने वाले मजदूरों को बिना इजाजत बागान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी और यह इजाजत उन्हें कभी कभार ही मिलती थी |

                              जब बागान मजदूरों ने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना तो हजारों मजदूर अपने अधिकारियों की अवहेलना करने लगे | उन्होंने बागान छोड़ दिए और अपने घरों को चल दिए | उनको लगता था कि अब गाँधी राज आ रहा है इसलिए हर व्यक्ति को गाँव में जमीन मिल जाएगी | रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण ए लोग अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सके और रास्ते में ही फँसे रह गए | उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और उनकी बुरी तरह पिटाई हुई |

प्रश्न  10                नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करे कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था ?

उत्तर :           देश को एक जुट करने के लिए महात्मा गाँधी को नमक एक शक्तिशाली प्रतीक दिखाई दिया | 31 जनवरी 1930 को उन्होंने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा | इस पत्र में उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया | इनमें से एक महत्वपूर्ण माँग नमक पर लगे कर (टैक्स) को खत्म करने के बारे में थी | नमक अमीर – गरीब सभी इस्तेमाल करते थे | यह भोजन का अभिन्न हिस्सा था इसलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार का सबसे दमनकारी  पहलू बताया था |

                              महात्मा गाँधी का यह पत्र एक चेतावनी की तरह था | उन्होंने लिखा था कि अगर 11 मार्च तक उनकी माँगें न मानी गई तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी | जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी माँगे नहीं मानी तो गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरम्भ कर दिया | महात्मा गाँधी ने अपने अपने 78 विश्वनीय वॉलेंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी |  12 मार्च 1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से चलकर  6 अप्रैल को 240 किलोमीटर दूर दांडी  नामक कस्बे में पहुँचकर खत्म हुई वहाँ गाँधी जी ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा |

यह यात्रा और नमक कानून तोडना उपनिवेशवाद के खिलाफ विरोध का प्रतीक बन गई | पूरे देश में लोगों ने सरकारी कानूनों को भंग करना शुरू दिया गया | हजारों स्थानों पर नमक कानून तोडा गया | सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए गए | विदेही कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा | शराब की दुकानों की पिकेटिंग की जाने लगी | गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफे देने लगे | किसानों ने लगान चुकाने और चौकीदारी कर देने से मना कर दिया | बहुत सारे स्थानों पर जंगलों में रहने वाले लोग वन कानूनों का उल्लंघन करने लगे |

प्रश्न  11                कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिला है | बताइए कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता ?

उत्तर :                       सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा)  आंदोलन 1930 में चलाया गया | यह सत्य और अहिंसा पर आधारित एक विशाल जन आंदोलन था |  सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक महिला के रूप में भागीदार बनना एक गौरव की बात थी | मैं गाँधी जी से बहुत प्रभावित हुई थी | मेरे जैसे हजारों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों भी उनसे अत्यधिक प्रभावित थे | बहुत सारी महिलाओं की तरह इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और जेल भी गई | गाँधी जी के आह्वान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना दायित्व समझ लिया था मैं भी राष्ट्र सेवा में इस दायित्व को निभाने में अपना योगदान दिया |

पहली बार मैंने अपने घर का एकांत छोड़ा, सत्याग्रह किया, विरोध मार्च में पुरुषों के साथ चली | शराब और विदेशी कपड़े बेचने वाली दुकानों के सामने पिकेटिंग की | इस आंदोलन के अनुभव ने मुझे स्वतंत्र भारत में भी सत्य के लिए और किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरणा दी |

प्रश्न  12                राजनीतिक नेता पृथक (अलग) निर्वाचिका के सवाल पर क्यों बँटें हुए थे ?

उत्तर :           राजनीतिक नेता पृथक निर्वाचिका के सवाल पर बँटें  हुए थे | जिसके निम्नलिखित कारण थे |

कांग्रेस ने लम्बे समय तक दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि कांग्रेस रूढ़िवादी स्वर्ण हिंदू सनातनियों से डरी हुई थी | महात्मा गाँधी के द्वारा अस्पर्श्यता को खत्म करने के लिए ऐलान किया गया | उनको अछूत कहने की बजाय हरिजन कहना शुरू किया |  मंदिरों,  सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार दिलाने के बहुत से कार्य किए | लेकिन बहुत सारे दलितों नेता अपने समुदाय की समस्याओं का अलग समाधान चाहते थे | वे खुद को संगठित करने लगे | उन्होंने शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के लिए आवाज उठाई  और अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात कही ताकि वहाँ से विधायी परिषदों के लिए दलितों को ही चुनकर भेजा जा सके | उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तिकरण से ही दूर हो सकती है |

डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने 1930 में दलितों को दमित वर्ग  एसोसिएशन (Depressed Classes Association) में संगठित किया | दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सवाल पर दूसरे गोलमेज सम्मलेन में महात्मा गाँधी के साथ उनका काफी विवाद हुआ | अंग्रेजों ने अम्बेडकर की बात मान ली तो गाँधी जी  अनशन पर बैठ गए |  क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा होने पर भारत में सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी | आखिरकार सितम्बर 1932 में अम्बेडर ने गाँधी जी की राय मान ली और पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए | इस समझौते के अनुसात दमित वर्गों (अनुसूचित जातियों )  को प्रांतीय और केन्द्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गई | हालाँकि उनके लिए मतदान समान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था |

असहयोग और खिलाफत आंदोलन के शांत होने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस से कटने लगा था |कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक संगठनों के करीब आने लगी थी | इससे हिंदू मुसलमानों के बीच संबंध खराब होते चले गए | उनके बीच दूरियाँ बढ़ती चली गई | कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एकता स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन महत्वपूर्ण मतभेद भावी विधान सभाओं में प्रतिनिधि के सवाल पर थे | मुस्लिम लीग के नेताओं में से एक, मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि अगर मुसलमानों को केन्द्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रान्तों (पंजाब और बंगाल) में  मुसलमानों की आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं |

मुस्लिम लीग के अध्यक्ष  मोहम्मद इकबाल ने मुसलमानों के लिए अल्पसंख्यक राजनीति के हितों, संस्कृति और परम्परा की  रक्षा के उद्देश्य से पृथक निर्वाचिका की जरूरत पर जोर दिया | उन्हें डर था कि हिंदू  बहुमत के प्रभाव में मुसलमानों की संस्कृति और पहचान डूब जाएगी |

प्रश्न  13                आर्थिक स्तर पर असहयोग आंदोलन के प्रभावों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर :           आर्थिक मोर्चे पर असहयोग आंदोलन का असर और भी ज्यादा नाटकीय रहा जिसे हम निम्न प्रकार से समझ सकते है |

1         विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया |

2         शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई |

3         विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई |

4         1921से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया था | उसकी कीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गई थी |

5         बहुत सारे स्थानों पर  व्यापारियों ने विदेशी वस्तुओं का व्यापार करने और विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया |

6         लोग आयातित विदेशी कपड़े को छोड़कर भारतीय कपड़ा पहनने लगे तो भारतीय कपड़ा मिलो और हथकरघों का उत्पादन भी बढ़ने लगा | 

प्रश्न  1                    पहला विश्व युद्ध कब शुरू हुआ ?

उत्तर :           सन् 1914

प्रश्न  2                    1921 की जनगणना के अनुसार दुर्भिक्ष (आकाल) और महामारी के कारण कितने लोग मारे गए?

उत्तर :           120-130 लाख लोग

प्रश्न  3                    जबरन भर्ती से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर :           ऐसी प्रक्रिया जिसमें अंग्रेज भारत के लोगों को जबदस्ती सेना में भर्ती कर लेते थे |

प्रश्न  4                    महात्मा गाँधी दक्षिणी अफ्रीका भारत कब लौटे ?

उत्तर :           जनवरी 1915 ई०

प्रश्न  5                    महात्मा गाँधी ने दक्षिणी अफ्रीका की नस्लभेदी सरकार से किस प्रकार लोहा किस पद्दति से लिया था ?

उत्तर :           सत्याग्रह के द्वारा   

प्रश्न  6                    महात्मा गाँधी के अनुसार सत्याग्रह के विचार में  किस विचार पर जोर दिया जाता है ?

उत्तर :           महात्मा गाँधी के अनुसार सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता है |

प्रश्न  7                    सन् 1917 में गाँधी जी ने दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को प्रेरित किया और सत्याग्रह आदोलन कहाँ चलाया ?

उत्तर :           चम्पारण (बिहार)

प्रश्न  8                    गाँधी जी ने गुजरात खेडा जिले के किसानों के की मदद के लिए सत्याग्रह क्यों किया था ?

उत्तर :           सन् 1917 में फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे | इसलिए गाँधी जी ने गुजरात खेडा जिले के किसानों के की मदद के लिए सत्याग्रह  किया था |

प्रश्न  9                    सन् 1918  में गाँधी जी सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के  साथ सत्याग्रह  करने के लिए कहाँ गए ?

उत्तर :           अहमदाबाद

प्रश्न  10                सन् 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल ने जल्दबाजी में किस कानून को पास किया था ?

उत्तर :           रॉल्ट एक्ट

प्रश्न  11                जलियाँवाला बाग  हत्याकांड की घटना कब और कहाँ हुई ?

उत्तर :           13 अप्रैल  सन् 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में हुई |

प्रश्न  12                जलियाँवाला बाग  में एकत्रित लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाने का आदेश किसने दिया था ?

उत्तर :           जनरल डायर ने

प्रश्न  13                प्रथम विश्व युद्ध कब से कब तक चला ?

उत्तर:            सन् 1914 से 1919 तक

प्रश्न  14                प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंद स्वराज' के लेखक कौन हैं

उत्तर:            महात्मा गाँधी 

प्रश्न  15                प्रथम विश्व युद्ध के समय इस्लामिक विश्व का आध्यात्मिक नेता (खलीफा) कौन था?

उत्तर:            ऑटोमन सम्राट 

प्रश्न  16                बम्बई में खिलाफत समिति का उत्तर गठन किसने किया था

उत्तर:            मोहमद अली और शौकत अली नाम के अली बंधुओं ने।

प्रश्न  17                खिलाफत समिति का गठन क्यों किया गया ?

उत्तर :           प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की की हार के कारण ऑटोमन सम्राट (खलिफा) की शक्तियों को कम किया जा रहा था। जिसे बचाने के लिए मार्च 1919 में बम्बई में खिलाफत समिति का गठन किया गया।

प्रश्न  18                सितम्बर 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन कहां हुआ?

उत्तर :           कलकत्ता

प्रश्न  19                सितम्बर 1920 का कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर :           इस अधिवेशन में गांधी जी ने कांग्रेस के नेताओं को खिलाफत आंदोलन के समर्थन और असहयोग आन्दोलन शुरू करने के लिए राजी कर लिया था। 

प्रश्न  20                दिसम्बर  1920 में कांग्रेस का अधिवेशन कहां हुआ?

उत्तर :           नागपुर(महाराष्ट्र )

प्रश्न  21                गाँधी जी की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौन सी है ?

उत्तर ;     हिंद स्वराज (1909 में प्रकाशित हुई)

प्रश्न  22                असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ ?

उत्तर :           सन 1921 में

प्रश्न  23                गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस कब लिया ?

उत्तर :           फरवरी 1922

प्रश्न  24                इनलैंड इमिग्रेशनएक्ट कब पास किया गया ?

उत्तर :           1859 ईस्वी में

प्रश्न  25                गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय क्यों लिया ?

उत्तर :           उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में चौरी –चौरा नामक स्थान पर हुई हिंसक घटना के कारण गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला लिया था |

प्रश्न  26                अल्लुरी सीताराम राजू को फाँसी कब दी गई ?

उत्तर :           सन् 1924  में

प्रश्न  27                भारत में  उपनिवेशी शासन के दौरान प्रांतीय परिषदों का गठन किस एक्ट के तहत किया गया ?

उत्तर :           1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत

प्रश्न  28                विश्व व्यापी आर्थिक मंदी किस दशक में रही ?

उत्तर : 1930 के दशक में (1926 से 1930 के बीच इसका सबसे अधिक प्रभाव रहा )

प्रश्न  29                साइमन कमीशन भारत का आया ?

उत्तर :           सन् 1928

प्रश्न  30                भारत में साइमन कमीशन का विरोध क्यों हुआ ?

उत्तर :           क्योंकि उसमें सात सदस्य थे जिनमें से कोई भी भारतीय नहीं था |

प्रश्न  31                साइमन कमीशन के अध्यक्ष कौन थे ?

उत्तर :           सर जॉन साइमन

प्रश्न  32                डोमीनियन स्टेट का दर्जा कब किसने और क्यों दिया दिया ?

उत्तर :           साइमन कमीशन के प्रति लोगों के विरोध को शांत करने के लिए 1929 ई० में भारत के वायसराय लार्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत को डोमीनियन स्टेट का दर्जा देने का ऐलान किया था 

प्रश्न  33                लाहौर में हुए दिसम्बर 1929 के कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे ?

उत्तर :           जवाहर लाल नेहरु

प्रश्न  34                पूर्ण स्वराज की माँग कब और कहाँ की गई ?

उत्तर :           लाहौर में हुए दिसम्बर 1929 के कांग्रेस के अधिवेशन में

प्रश्न  35                भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम्ब कब फेंका ?

उत्तर :           अप्रैल 1929

प्रश्न  36             कांग्रेस के किस  अधिवेशन में यह तय किया गया कि 26 जनवरी 930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे |

उत्तर :           लाहौर में हुए दिसम्बर 1929 के कांग्रेस के अधिवेशन में

प्रश्न  37                सविनय अवज्ञा आंदोलन गाँधी जी के द्वारा कब शुरू किया गया ?

उत्तर :           6 अप्रैल 1930 गाँधी जी ने दांडी पहुँचकर नमक कानून तोडा और इसी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया |

प्रश्न  38                महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन पहली बार कब वापस लिया ?

उत्तर :           5  मार्च  1931 को

प्रश्न  39                दूसरा गोलमेज सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित किया गया 

उत्तर :           दिसम्बर  1931 को लंदन में 

Wednesday, July 10, 2024

QUESTION ANSWERS LESSON 1 HISTORY CLASS 10TH

 अध्याय 1 

यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय 

भारत और समकालीन विश्व -2 (इतिहास )

कक्षा -10व वीं 

प्रश्न : ज्युसेपे मेत्सिनी पर टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : ज्युसेपे मेत्सिनी इटली का एक क्रांतिकारी था | वह इटली को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहता था |

उसका जन्म सन् 1807 में जेनोआ में हुआ था |

वह “कार्बोनारी” के गुप्त संगठन का सदस्य था | 24 वर्ष की युवावस्था में लिगुरिया में क्रान्ति करने के लिए उसे बहिष्कृत कर दिया गया था |

मेत्सिनी ने दो भूमिगत संगठनों की स्थापना की | मार्सेई में ‘यंग इटली’ और बर्न में ‘यंग यूरोप’  |

मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्य की प्राकृतिक इकाई थी |अत: इटली छोटे राज्यों और प्रदेशों के पैबन्दों की तरह नहीं रह सकता था | उसे जोड़ कर राष्ट्रों के के व्यापक गठबंधन के द्वारा एक व्यापक राष्ट्र और गणतंत्र बनना ही होगा | उसके अनुसार केवल एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता है |

मेत्सिनी के द्वारा राजतन्त्र का घोर विरोध किया गया और उसने प्रजातांत्रिक गणतंत्रों के अपने स्वप्न से रूढिवादियों को हरा दिया |

ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटरनिख ने उसे “हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन” बताया है |

प्रश्न : काउंट कैमिलो दे कावूर पर टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : सार्डिनिया पीडमांट के शासक विक्टर इमेनुअल द्वितीय का प्रधानमंत्री  था | जिसने इटली के प्रदेशों कों एकीकृत करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया था | वह न तो क्रांतिकारी कारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखता था | इटली के अभिजात्य वर्ग के सभी अमीरों और शिक्षित सदस्यों की तरह इतालवी भाषा की से अच्छी फ्रेंच भाषा बोलता था | फ्रांस से सार्डीनिया पीडमॉण्ट की एक चतुर कूटनीति संधि के पीछे कावूर का ही हाथ था | इसी संधि के परिणाम स्वरूप  सार्डीनिया पीडमॉण्ट 1859 ई॰ में ऑस्ट्रियाई  शक्तियों को हराने में कामयाब हुआ था | 

प्रश्न : यूनानी स्वतंत्रता युद्ध पर टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : पंद्रहवी शताब्दी में यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था | यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों का आजादी के लिए संघर्ष 1821 में आरम्भ हो गया | यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियीं के साथ पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला | ये लोग यूनान की प्राचीन संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे |

            कवियों और कलाकारों नें यूनान को यूरोपीय सभ्यता का पालना बताकर देश की प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के  विरूद्ध यूनान के संघर्ष के लिए जनमत भी जुटाया | अंग्रेज कवि लार्ड बॉयरन ने यूनानी स्वतंत्रता के युद्ध के लिए धन एकत्रित किया और युद्ध भी लड़ा | अंततः 1832  की कुस्तुनतुनिया की संधि के बाद यूनान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा प्राप्त हो गया |

प्रश्न : फ्रैंकफर्ट संसद पर टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : फ्रैंकफर्ट संसद जर्मनी को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने से संबंधित थी | जर्मन इलाकों में बड़ी संख्या में राजनैतिक संगठनों नें फ्रैंकफर्ट में मिल कर एक सर्व जर्मन नेशनल एसेम्बली के पक्ष में मतदान करने फैसला लिया | 18 मई 1848  को  831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजे धजे जुलूस में जा कर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया | यह संसद सेंट पाल चर्च में आयोजित हुई | इस संसद ने जर्मन राष्ट्र के लिए संविधान का प्रारूप तैयार किया |

            इस संसद के प्रतिनिधियों के द्वारा जर्मन राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी जानी थी | जो संसद के अधीन रहना था | जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने कि पेशकश कि तो उसने उसे अस्वीकार कर दिया| उसने उन् राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे |

            जहाँ कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ा , वहीं संसद का सामाजिक आधार कमजोर हो गया | संसद में मध्य वर्ग का प्रभाव अधिक था जिन्होंने मजदूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे | अंत में सैनिकों को बुलाया गया और संसद (एसेंबली) भंग होने को मजबूर हो गई |

इस संसद में महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक दीर्घा में खड़ा होने दिया गया था |

प्रश्न : राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए |

उत्तर : राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका को हम निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं |

उदारवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने का मुद्दा विवादास्पद था | हाँलाकि, आंदोलन के वर्षों बड़ी संख्या में महिलाओं सक्रिय रूप से भाग लिया था |

महिलाओं ने अपने रणनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में भाग लिया | इसके बावजूद उन्हें एसेम्बली (संसद) के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया था |

फ्रैंकफर्ट संसद  की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक-दीर्घा में खड़ा होने दिया गया था |

प्रश्न : फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए ?

अथवा

फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा प्रारम्भ किए गए उपायों और कार्यों का विश्लेषण कीजिए ?

अथवा

“राष्ट्रवाद की पहली पूर्ण अभिव्यक्ति में फ्रांसीसी क्रांति के साथ आई |” कथन को स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर : राष्ट्रवाद की पहली पूर्ण अभिव्यक्ति में फ्रांसीसी क्रांति के साथ आई | क्योंकि फ्रांसीसी क्रांति के समय क्रांतिकारियों ने फ्रांस के लोगों के बीच सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए अनेक कदम उठाए जिनमें से कुछ निम्नलिखित है |

i)           क्रान्तिकारियों ने पितृभूमि  (La Patrie) तथा नागरिक (Le Citoyen) जैसे विचारों को लोगों तक पहुँचाया |इन विचारों ने एक संयुक्त समुदाय पर बल दिया जिसे जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त थे |

ii)         एक नया फ्रांसीसी तिरंगा झंडा (The Tricolour ) चुना गया | जिसने पहले के राष्ट्रीय ध्वज की जगह ले ली |

iii)       इस्टेट जेनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के एक समूह द्वारा किया जाने लगा और इसका नाम बदलकर नेशनल एसेम्बली कर दिया गया |

iv)       क्रांतिकारियों के द्वारा नई स्तुतियाँ रची गई, शपथें ली गई , शहीदों का गुणगान किया गया ये सब कार्य लोगों में राष्ट्रीय भावना को बढाने के लिए किया गया |

v)         एक केन्द्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई जिसमें अपने भू भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए |

vi)       आंतरिक आयात –निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एक समान व्यवस्था लागू की गई |

vii)     क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और पेरिस में फ्रेंच जैसी बोली और लिखी जाती थी उसे ही राष्ट्र की साझा भाषा बन गई |

प्रश्न : मारिआन और जर्मेनिया कौन थे ? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया उसका क्या महत्व था ?

उत्तर : : मारिआन और जर्मेनिया दो नारियों के चित्र हैं | उन्हें राष्ट्रों के रूप में चित्रित किया गया है | : मारिआन फ्रांसीसी गणराज्य का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र का रूपक है |

वास्तव में अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी में इन देशों के कलाकारों ने  राष्ट्रों  को मानवीय रूप प्रदान किया और उनकी अभिव्यक्ति एक साधारण नारी के रूप में की |

फ़्रांस ने सन् 1850  में एक डाक टिकट और सिक्कों पर मारिआन की छवि छापी गई | उसकी प्रतिमाओं को सार्वजनिक स्थानों पर लगाया गया ताकि लोगों में राष्ट्रीय भावना जागती रहे |

चाक्षुष अभिव्यक्तियों में जर्मेनिया को बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दिखाया गया, क्योंकि जर्मन बलूत को वीरता का प्रतीक माना जाता है |

मारिआन और जर्मेनिया को इस तरह चित्रित करने का महत्व :

           इनसे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को प्रबल हुई | इससे भी बढ़कर मारिआन ने फ़्रांस और जर्मेनिया ने जर्मनी को एक अलग राष्ट्र के रूप में पहचान प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |

प्रश्न :      जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ |

अथवा

जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए |

उत्तर : जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |

 

1815 में नेपोलियन की पराजय के बाद नेपोलियन ने 39 राज्यों का जो जर्मन महासंघ स्थापित किया था उसे बरकरार रखा गया | जिससे जर्मनी के देश –भक्तों में इस संघ को मजबूत बनाकर इसे एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के विचार जोर पकड़ने लगे |

राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्यवर्गीय जर्मन लोगों में काफी व्यापत होने लगी थी |

 

इन मध्यवर्गीय राष्ट्रवादी लोगों ने 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न इलाकों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र –राज्य बनाने का प्रयास किया था |  प्रशा के राजा फ्रेडरिख विल्हेम चतुर्थ को इन क्रांतिकारियों ने जर्मन महासंघ का अध्यक्ष बनाने की पेशकश की | मगर उसने इसे अस्वीकार कर दिया | राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज की ताकतों ने मिलकर दबा दी | प्रशा के बड़े भूस्वामियों ने भी उनका समर्थन किया |

उसके बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया | उसका प्रमुख मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क इसक प्रक्रिया का जनक था | जिसने प्रशा की सेना और नौकर शाही की मदद से जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को पूरा किया |

 

सात वर्षों के दौरान तीन युद्ध 1866 में ऑस्ट्रिया के साथ, 1867 में डेनमार्क के साथ और 1871फ्रांस साथ  हुए जिसमें प्रशा की जीत हुई | और जर्मनी के एकीकरण की प्रकिया पूरी हुई |

 

जनवरी 1871में वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित कर दिया गया |

 

18 जनवरी 1871को जर्मन राज्यों के राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों और प्रमुख मंत्री (प्रधान मंत्री) ऑटो वॉन बिस्मार्क समेत प्रशा के महत्वपूर्ण मंत्रियों की बैठक वर्साय के महल के बेहद ठंडे शीशमहल (हॉल ऑफ मिरर्स) में हुई इस सभा ने प्रशा के राजा काइज़र विलियम प्रथम के नेतृत्व में नए जर्मन का साम्राज्य की घोषणा की |

 

प्रश्न : अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन-व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या –क्या बदलाव किए ?

अथवा

“फ़्रांस में नेपोलियन ने प्रजातंत्र को नष्ट किया था | परन्तु प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों का समावेश किया जिससे पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत और कुशल बन सके |” तर्कों सहित इस कथन का विश्लेषण कीजिए |

अथवा

नेपोलियन कि सहिंता को फ्रांसीसी नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में किस प्रकार लागू किया गया ? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए |

अथवा

एक अधिक तर्कसंगत और कुशल प्रणाली बनाने वाले शासक के रूप में आप नेपोलियन का मूल्याकंन कैसे करेंगे ? उपयुक्त उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए |

उत्तर : 1804 की नागरिक सहिंता जिसे आमतौर पर नेपोलियन की सहिंता कहा जाता है | नेपोलियन ने अपने अधीन शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को कुशल बनाने के लिए अपनी इस  सहिंता में निम्नलिखित प्रावधान किए  थे |

1         इस सहिंता ने जन्म पर आधारित विशेष अधिकार समाप्त कर दिए थे |

2         उसने कानून के समक्ष बराबरी और सम्पति के अधिकार को सुरक्षित बनाया |

3         इस सहिंता को फ़्रांस के अधीन क्षेत्रों में लागू किया गया |

4         डच गणतंत्र, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया |

5         सामंती व्यवस्था को समाप्त किया |

6         किसानों को भू दासत्व और जमींदारी शुल्कों से मुक्ति दिलवाई |

7         शहरों में भी कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रण को हटा दिया गया |

8         यातायात और संचार व्यवस्था को सुधारा गया |

9         एक समान कानून व्यवस्था तथा माप-तौल के एक समान पैमानों ने व्यापार को सुविधा जनक बनाया |

10     पूरे देश में एक ही राष्ट्रीय मुद्रा प्रचलित की गई | जिससे व्यापार को बढ़ावा मिला |

प्रश्न : यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के लिए उदाहरण दें |

अथवा

“यूरोप में राष्ट्रवाद की वृद्धि में संस्कृति बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | ” इस कथन को उदाहरणों सहित स्पष्ट करें |

अथवा

“राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्ध द्वारा ही नहीं होता | संस्कृति भी राष्ट्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |” उदाहरणों सहित स्पष्ट करें |

अथवा

19 वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रवादी भावनाओं के विकास में रुमानीवाद की भूमिका का वर्णन कीजिए |

 

उत्तर :     राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ | राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | कला काव्य कहानियों- किस्सों और संगीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को गढ़ने और व्यक्त करने में सहयोग दिया है |  राष्ट्रवादी भावनाओं के विकास में संस्कृति के योगदान को हम  निम्नलिखित तीन उदाहरणों से समझ सकते हैं |

 

राष्ट्रवाद के विकास में रुमानीवाद की भूमिका :

रुमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन था जो एक खास तरह की राष्ट्र भावना का विकास करण चाहता था | रूमानी कलाकारों तथा कवियों नें तर्क –वितर्क के महिमामंडन की आलोचना की और उसकी जगह भावनाओं, अंतर्दृष्टि और रहस्यवादी भावनाओं पर जोर दिया | उनका प्रयास था कि एक साझा-सामूहिक विरासत की अनुभूति और एक साझा सांस्कृतिक अतीत को राष्ट्र का आधार बनाया जाए |

जर्मन दार्शनिक योहान गॉट फ्रीड जैसे रूमानी दार्शनिकों नें दावा किया कि सच्ची जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों में निहित थी | उनका विश्वास था कि राष्ट्र की सच्ची आत्मा उसके आम लोकगीतों, जन काव्यों और लोकनृत्यों से प्रकट होती है | इसलिए लोक संस्कृति के इन स्वरूपों को एकत्रित करना राष्ट्र के निर्माण की परियोजना के लिए आवश्यक है | 

 

राष्ट्रवाद के विकास में स्थानीय बोलियों तथा लोक साहित्य की भूमिका :

 राष्ट्रवाद के विकास के लिए स्थानीय बोलियों पर बल दिया गया और स्थानीय लोक साहित्य को इक्कट्ठा किया गया | ऐसा करने का उद्देश्य केवल प्राचीन राष्ट्रीय भावना को वापस लाना नहीं था बल्कि आधुनिक राष्ट्रीय संदेश को  अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना था | जिनमें अधिकाँश लोग अनपढ़ थे |

पोलैंड पर यह बात विशेष रूपसे लागू होती थी | इस देश का अठारहवीं शताब्दी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी बड़ी शक्तियों ने विभाजन कर दिया था | यद्यपि पोलैंड अब स्वतंत्र भू क्षेत्र नहीं था, तो भी संगीत और भाषा के माध्यम से वहाँ राष्ट्रीय भावना जीवित रखी गई | उदाहरण के रूप में कैरोल कुर्पिस्की ने राष्ट्रीय संघर्ष का अपने ऑपेरा और संगीत से गुणगान   किया और पोलेनेस और माजुरका जैसे लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया |

राष्ट्रवाद के विकास में भाषा की भूमिका :

भाषा ने भी राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | रूस के अधीन पोलैंड में पोलिस भाषा को स्कूलों से बलपूर्वक हटा कर रूसी भाषा को हर जगह जबरन लादा जाने लगा |  इसके परिणाम स्वरूप 1831 में रूस के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह हुआ जिसे आखिरकार कुचल दिया गया | इसके बावजूद अनेक सदस्यों ने राष्ट्रवादी विरोध के लिए  भाषा को एक हथियार बनाया | चर्च के आयोजनों और संपूर्ण धार्मिक शिक्षा में पोलिश भाषा का इस्तेमाल किया जाने लगा | इसके परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में पादरियों और बिशपों को जेल में डाल दिया गया | रुसी अधिकारियों ने उन्हें सजा देते हुए साइबेरिया भेज दिया क्योंकि उन्होंने रूसी भाषा का प्रचार करने से मना कर दिया था | इस तरह पोलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गई |

                                               

प्रश्न : 1830 दशक यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया | उदाहरण देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए |

उत्तर : 1830 दशक वास्तव में यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया | इस दशक में यूरोप की मुख्य कठिनाइयाँ निम्नलिखित थी |

i)        उन्नीसवीं सदी के प्रथम भाग में यूरोप में जनसंख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई | जिससे बेरोजगारी बढ़ी | ज्यादातर देशों में नौकरी ढूंढने वालों की संख्या (तादाद ) उपलब्ध रोगार से अधिक थी |

ii)      ग्रामीण क्षेत्रों की अतिरिक्त आबादी शहरों में जाकर भीड़ भरी गरीब बस्तियों में रहने लगी |

iii)    नगरों के लघु (छोटे) उत्पादकों को अक्सर इंग्लैंड से  आयातित मशीन से बने सस्ते कपड़े से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था |

iv)    इंग्लैंड में औद्योगीकरण का स्तर पूरे यूरोप महाद्वीप के मुकाबले ऊँचा था | पूरे यूरोप को यह प्रतिस्पर्धा कपड़ा –उद्योग में झेलनी पड़ रही थी | क्योंकि उसका उत्पादन मुख्यतः घरों और छोटे कारखानों में होता था और केवल आंशिक रूप से मशीनीकृत था |

v)      यूरोप के उन् इलाकों में जहाँ कुलीन वर्ग अभी भी सत्ता में था | वहाँ कृषक सामंती शुल्कों और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे थे |

vi)    खाने –पीने की चीजों के मूल्य बढने या किसी वर्ष फसल के खराब हो जाने के कारण शहर और गावों में व्यापक गरीबी फैले जाती थी |

 

प्रश्न :      उदारवादियों की 1848 की क्रांति का क्या अर्थ जाता है ? उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक  विचारों को बढ़ावा दिया ?

अथवा

उदारवादियों ने किन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक  विचारों को बढ़ावा दिया ?

 

उत्तर : 1848 की उदारवादियों की क्रान्ति का अर्थ

1848  में जब अनेक यूरोपीय देशों में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से ग्रस्त किसान –मजदूर विद्रोह कर रहे थे तब उसके समानांतर पढ़े लिखे मध्य्वर्गों की एक क्रान्ति भी हो रही थी | जिसे 1848 की उदारवादियों की क्रान्ति कहा जाता है | 1848 की उदारवादियों की क्रान्ति का अर्थ राष्ट्र वाद की विजय से था | जो राष्ट्र- राज्यों के निर्माण का आधार था | जिन्हें निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है |

i)        फरवरी 1848 की घटनाओं से राजा को गद्दी छोडनी  पड़ी थी | 

ii)      एक गणतंत्र की घोषणा की गई जो सभी पुरुषों के सार्विक मताअधिकार पा आधारित था |

iii)    यूरोप के अन्य भागों में जहाँ अभी तक स्वतंत्र राष्ट्र –राज्य अस्तित्व में नहीं आए थे जैसे जर्मनी,इटली पोलैंड, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य –वहाँ के उदारवादी मध्य्वर्गों के स्त्री –पुरूषों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया |

iv)    उदारवादियों ने बढ़ते जन असंतोष का फायदा उठाया और एक राष्ट्र –राज्य के निर्माण की माँग को आगे बढ़ाया | यह राष्ट्र –राज्य संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी जैसे संसदीय सिद्धांतों पर आधारित था |

  

 उदारवादियों नें निम्नलिखित राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया |

राजनीतिक विचार :

i)        नए मध्य वर्ग के लिए उदारवाद का मतलब था व्यक्ति के लिए आजादी और कानून के समक्ष बराबरी |

ii)      राजनीतिक रूप से उदारवाद एक ऐसी सरकार पर जोर देता था जो सहमति से बनी हो \

iii)    फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद उदारवादी निरंकुश शासक और पादरी वर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति का पक्षधर थे |

iv)    उदारवादी संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार का पक्षधर था |

सामाजिक विचार :

i)        उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व की अनिवार्यता पर बल देते थे |

ii)      उदारवादी कानून के समक्ष बराबरी का विचार के पक्ष थे | लेकिन उनके विचार सबके लिए मताधिकार के पक्ष में नहीं था |

iii)    उदारवादियों ने प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में थे |

iv)    उदारवादी लोग महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे |

 आर्थिक विचार :

i)        आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद, बाजारों की मुक्ति और चीजों तथा वस्तुओं के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को खत्म करने के पक्ष में था |

ii)      नया वाणिज्यिक वर्ग कई आर्थिक परिस्थितियों  जैसे सभी क्षेत्रों के सीमाशुल्क और अलग-अलग नाप –तौल व्यवस्था, को आर्थिक विकास में बाधक मानते हुए एक एकीकृत आर्थिक क्षेत्र के निर्माण के पक्ष में तर्क दे रहा था जहाँ वस्तुओं, लोगों और पूँजी का आवागमन बाधा रहित हो |