कक्षा 12वीं
मानव भूगोल के मूल सिद्धांत
अध्याय 6 द्वितीयक क्रियाकलाप
द्वितीयक क्रियाकलाप
वे
क्रियाकलाप जिनसे प्राथमिक उत्पादों को अधिक उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया
जाता है द्वितीयक क्रियाकलाप कहलाते हैं | अत: सभी प्रकार के उद्योग-धंधे द्वितीयक
क्रियाकलाप में शामिल किए जाते है | द्वितीयक क्रियाकलाप में
विनिर्माण, प्रसंस्करण और निर्माण (अवसंरचना) उद्योग शामिल
किए जाते है |
द्वितीयक क्रियाकलापों का महत्व या
द्वितीयक
क्रियाकलापों के द्वारा प्रकृतिक उत्पादों का मूल्य बढ़ना
द्वितीयक
क्रियाकलापों के द्वारा प्रकृतिक उत्पादों का मूल्य बढ़ जाता है | क्योंकि ये
क्रियाकलाप प्रकृति में पाये जाने वाले पदार्थों का कच्चे माल के रूप में प्रयोग
करके उनका रूप बदलकर उन्हे मूल्यवान बनाती है | उदाहरण के
लिए प्रकृति से प्राप्त कपास का मूल्य कम होता है और उपयोग भी सीमित रहता है | लेकिन द्वितीयक क्रियाकलापों के द्वारा पहले इससे तन्तु (धागा) और उसके बाद कपड़ा बनाया जाता है जो इसे मूल्यवान बनाते है | इसी प्रकार लौह अयस्क जो सीधा हमारे किसी काम का नहीं होता उद्योगों में
द्वितीयक क्रियाओं के द्वारा ही इस्पात बनने के बाद मूल्यवान हो जाता है और इससे
कई प्रकार की वस्तुएं बनती है जो हमारे लिए उपयोगी है |
उद्योग और विनिर्माण में अन्तर
उद्योग
श्रम
विभाजन और मशीनों के व्यापक प्रयोग से अभिलक्षित क्रमिक उत्पादन कों उद्योग कहते
है | उद्योग एक निर्माण इकाई होती है जिसकी भौगोलिक स्थिति अलग
होती है | उद्योगों में प्रबंध
तंत्र के अंतर्गत लेखा–बही एवं रिकॉर्ड का रख रखाव भी किया जाता है | उद्योग एक व्यापक नाम है इसमें विनिर्माण की प्रक्रिया जो कारखानों में
की जाती है उसके साथ-साथ कुछ गौण क्रियाएँ भी होती है जो कारखानो में नहीं की जाती
जैसे पर्यटन उद्योग, फिल्म उद्योग,
मत्स्य उद्योग आदि |
विनिर्माण
विनिर्माण
का आशय किसी भी वस्तु का उत्पादन है | विनिर्माण का शाब्दिक अर्थ है ‘हाथ से बनाना’ परंतु वर्तमान समय में मशीनों या
यंत्रों द्वारा बनाया गया सामान भी इसमें शामिल किया जाता है | इसके अंतर्गत हस्तशिल्प कार्यों से लेकर लौहे और इस्पात को गढ़ना, प्लास्टिक के खिलौने बनाना, कम्प्युटर का सामान
बनाना तथा अन्तरिक्ष यान आदि सभी का निर्माण शामिल किया जाता है | यह एक परमावश्यक प्रक्रिया है जिसमें कच्चे माल को स्थानीय बाज़ार या दूरस्थ
बाज़ार में बेचने के लिए उसे ऊँचे मूल्य के
तैयार माल में परिवर्तित किया जाता है |
विनिर्माण उद्योग की सामान्य विशेषताएँ
कृषि, वानिकी, मत्स्य ग्रहण
तथा खनन से प्राप्त प्राथमिक उत्पादों (कच्चे माल) को हाथों या मशीनों की सहायता
से प्रसंस्करण और निर्मित वस्तुओं में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को विनिर्माण
उद्योग या निर्माण उद्योग कहते है |
विनिर्माण
की सभी प्रक्रियाओं में कुछ सामान्य विशेषताएँ होती है जो निम्नलिखित है |
1. सभी विनिर्माण उद्योगों में शक्ति
(ऊर्जा) का प्रयोग किया जाता है |
2. विनिर्माण उद्योगों में एक ही प्रकार
की वस्तु का विशाल स्तर उत्पादन होता है |
3. विनिर्माण उद्योगों में विशिष्ट
श्रमिक होते है जो मानक वस्तुओं का उत्पादन करते है |
आधुनिक बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण की विशेषताएँ
वर्तमान
समय में बड़े पैमाने पर होने वाले
विनिर्माण की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती है |
1. कौशल का विशिष्टीकरण या उत्पादन की
विधियों का विशिष्टीकरण
2. मशीनीकरण या यंत्रीकरण
3. प्रौद्योगिक नवाचार
4. संगठनात्मक ढांचा एवं स्तरीकरण
5. अनियमित भौगोलिक वितरण
इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
प्रकार से है|
1. कौशल का विशिष्टीकरण या उत्पादन की
विधियों का विशिष्टीकरण
शिल्प विधि से कारखानों में थोड़ा ही सामान उत्पादित किया जाता
है| जो आदेश अनुसार
बनाया जाता है| जिसके कारण इसकी लागत अधिक होती है| जबकि दूसरी ओर अधिक उत्पादन का संबंध बड़े पैमाने पर बनाए जाने वाले सामान
से है| जिसमें प्रत्येक कारीगर निरंतर एक ही प्रकार का कार्य
करता है| क्योंकि उसे उसमें कुशलता प्राप्त होती है|
2. मशीनीकरण या यंत्रीकरण
यंत्रीकरण से अभिप्राय किसी कार्य को पूरा करने के लिए मशीनों
का प्रयोग करना है| स्वचालित मशीनें या स्वचालित यंत्रीकरण इसकी विकसित अवस्था है जिसमें
निर्माण प्रक्रिया में मानव की सोच को शामिल किए बिना सारा काम मशीनों से किया
जाता है| आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों में पुनर्निवेशन एवं
संवृत-पाश कम्प्युटर नियंत्रण प्रणाली के द्वारा चलने वाले कारखाने जिनमें मशीनों
को सोचने के लिए विकसित किया गया है पूरे विश्व में नज़र आने लगे है |
3. प्रौद्योगिक नवाचार
प्रौद्योगिक नवाचार से अभिप्राय उद्योगों में नई प्रौद्योगिकी
के नये नये तरीकों के द्वारा विकसित करना है | प्रौद्योगिक नवाचार के अंतर्गत निम्नलिखित
पहलुओं को शामिल किया जाता है|
a)
शोध एवं विकासमान युक्तियों के द्वारा विनिर्माण की गुणवत्ता
को नियंत्रित करना |
b)
अपशिष्टों का निस्तारण करना |
c)
अदक्षता या अकुशलता को समाप्त करना |
d)
प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष करना |
4. संगठनात्मक ढांचा एवं स्तरीकरण
आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों के संगठनात्मक ढांचे एवं
स्तरीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ है|
a)
एक जटिल नई प्रौद्योगिकी यंत्र
b)
अत्यधिक विशिष्टीकरण एवं श्रम विभाजन के द्वारा कम प्रयास और
अल्प लागत से अधिक माल का उत्पादन करना
c)
अधिक पूंजी
d)
बड़े संगठन
e)
प्रशासकीय अधिकारी वर्ग
5. अनियमित भौगोलिक वितरण
आधुनिक उद्योगों का सबसे महत्व पहलू यह है की विश्व स्तर पर
इनका वितरण बहुत ही अनियमित और असमान है| आधुनिक निर्माण के मुख्य सकेन्द्र्ण कुछ ही
स्थानों में सीमित है| विश्व के कुल स्थलीय भाग के 10
प्रतिशत भाग पर ही इन उद्योगों का विस्तार है| बहुत से
क्षेत्र औद्योगिक विकास से वंचित ही है| जिन देशों में
औद्योगिक विकास हुआ है वे देश आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से शक्ति के केंद्र बन गए|
कुल क्षेत्र को आच्छादित की दृष्टि से विनिर्माण स्थल, प्रक्रियाओं की
अत्यधिक गहनता के कारण बहुत कम स्पष्ट है| उद्योगों का
क्षेत्र कृषि के क्षेत्र की तुलना में बहुत कम है| इसी कारण
से औद्योगिक क्षेत्रों में कृषि क्षेत्रों से अधिक गहनता होती है| यहाँ कृषि की अपेक्षा बहुत अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया जाता है|
उदाहरण के तौर पर अमेरिका के मक्के की पेटी के 2.5 वर्ग किलोमीटर में
साधारणतया चार बड़े फार्म है जिसमें 10 से 20 श्रमिक ही कार्य करते है जिनसे 50 से
100 लोगों का भरण-पोषण होता है| परंतु इतने ही क्षेत्र में वृहद समाकलित
कारखानों को समाविष्ट किया जा सकता है और हजारों श्रमिकों को रोजगार दिया जा सकता
है|
उद्योगों की अवस्थिति
(स्थिति ) को
प्रभावित करने वाले कारक ( Factors Influencing Industrial
Locations)
उद्योग लगाने का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है| अत: कोई
भी हो अपने उद्योग की लागत घटाकर अधिकतम लाभ कमाना चाहता है किसी उद्योग की
अवस्थिति उस उद्योग की उत्पादन लागत कों बहुत प्रभावित करती है| अत: उद्योग उन
स्थानों पर लगाये जाते है जहाँ पर उत्पादन लागत कम से कम हो|
किसी स्थान पर उद्योगों की अवस्थिति कों अनेक प्रकार के
प्राकृतिक (भौगोलिक) तथा मानवीय कारक प्रभावित करतें है| जैसे
1. जलवायु
2. जल
3. बाजार तक अभिगम्यता (बाजार की
उपलब्धता)
4. कच्चे माल की प्राप्ति तक अभिगम्यता
(कच्चे माल की उपलब्धता)
5. श्रम आपूर्ति तक अभिगम्यता (श्रम
आपूर्ति की उपलब्धता/कुशल श्रमिक)
6. शक्ति के साधनों तक अभिगम्यता (ऊर्जा
के साधनों की उपलब्धता)
7. परिवहन एवं संचार सेवाओं तक
अभिगम्यता
8. सरकारी नीतियां
9. समूहन अर्थव्यवस्था तक अभिगम्यत या
उद्योगों के मध्य संबंध
10. पूंजी की उपलब्धता
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है|
1.
जलवायु
उत्तम जलवायु मानव की कार्य प्रणाली
पर अत्यधिक प्रभाव डालती है| उसकी क्रियाशीलता कों बढाती है| इसके अलावा कुछ
उद्योगों के लिए जलवायु एक महत्वपूर्ण कारक होता है | जैसे सूती वस्त्र उद्योग के
लिए आद्र जलवायु अनुकूल अवस्थिति पैदा करती है क्योंकि इसमें धागा कम टूटता है| इसी
प्रकार वायुयान उद्योग के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है| इसलिए ये उद्योग
उन्ही स्थानों पर लगाए जाते है जहाँ इनके लिए अनुकूल जलवायु उपलब्ध हो|
2.
जल
पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध होनाउद्योगों की अवस्थिति और विकास के
लिए अनिवार्य कारक है | सूती वस्त्र उद्योग में कपड़ों की धुलाई और रंगाई के लिए जल
उपलब्ध होना अति आवश्यक है इसी प्रकार लोहा-इस्पात उद्योग में वातभट्टी के ठंडा
करने के लिए जल उपलब्ध होना अति आवश्यक है| इसलिए ये उद्योग उन्ही स्थानों पर लगाए
जाते है जहाँ पर्याप्त मात्रा में जल की उलब्धता हो|
3.
कच्चे माल की प्राप्ति तक अभिगम्यता (कच्चे माल की उपलब्धता)
उद्योगों के लिए कच्चा माल
अपेक्षाकृत सस्ता और सरलता से परिवहन योग्य होना चाहिए| सामान्यतः उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए
जाते है जहाँ कच्चा माल सरलता से उपलब्ध हो सके| यही कारण है की अधिकतर उद्योग
कच्चे माल के स्त्रोत के पास ही स्थापित किए जाते है| वैसे उद्योगों की स्थापना
कच्चे माल की प्रकृति पर बहुत अधिक निर्भर करती है | जो निम्न प्रकार से स्पष्ट है
|
यदि कच्चा माल भार ह्रासमान है
अर्थात ऐसा कच्चा माल जिसका भार (वजन) उत्पादन की प्रक्रिया में कम होता है तो इस
तरह के कच्चे माल पर आधारित उद्योग कच्चे माल के स्त्रोत के निकट ही स्थापित किए
जाते है| यही कारण है की भारी वजन, सस्ते मूल्य एवं वजन घटने वाले पदार्थों पर
आधारित उद्योग कच्चे माल के स्त्रोत के निकट ही स्थित है| जैसे लोहा-इस्पात
उद्योग, चीनी उद्योग और सीमेंट उद्योग आदि|
यदि कच्चा माल शुद्ध है अर्थात उसका
वजन निर्माण प्रक्रिया के दौरान नहीं घटता तो ऐसे उद्योग कों कच्चे माल के स्त्रोत
और बाजार के मध्य किसी भी अनुकुल स्थान पर लगाया जा सकता है जहाँ पर अन्य लागतें
कम होती है|
वे उद्योग जिनका कच्चा माल जल्दी
नष्ट होने वाला हो वे भी कच्चे माल के स्त्रोत के पास ही लगाए जाते है जैसे डेरी
उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग आदि|
4.
बाजार तक अभिगम्यता (बाजार की उपलब्धता)
उद्योगों की स्थापना के लिए सबसे
प्रमुख कारक उद्योगों द्वारा तैयार माल कों बेचने के लिए बाजार का होना है | बाजार
से तात्पर्य उस क्षेत्र से है जिसमें किसी उद्योग के तैयार वस्तुओं की माँग हो और
वहाँ रहने वाले लोगों में उसे खरीदने की क्षमता ( क्रय शक्ति)हो|
बाजार
या माँग क्षेत्र उद्योग के जितना निकट होगा उद्योग की परिवहन लागत उतनी ही कम होती
जायेगी साथ ही माल की खपत भी जल्दी होगी| इसके अलावा ऐसे उद्योग जिनका सामान शीघ्र
नाशवान होता है वे बाजार के निकट ही लगाये जाते है जैसे डेयरी उद्योग, खाद्य
प्रसंस्करण उद्योग आदि|
विश्व
के बाजार क्षेत्रों पर दृष्टि डाले तो हम देखतें है की दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ
पर कम जनसँख्या निवास करती है वहाँ छोटे बाजार होते है| जिससे यहाँ उद्योगों का
विकास कम हुआ है|
यूरोप, उत्तरी अमेरिका,जापान और
ऑस्ट्रेलिया के क्षत्रों में लोगों की क्रयशक्ति अधिक होने के कारण यहाँ वृहद वैश्विक
बाजार उपलब्ध है जिससे यहाँ उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ है|
दक्षिणी तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया
घनी जनसँख्या वाले क्षेत्र है इसलिए यहाँ भी वृहद वैश्विक बाजार उपलब्ध है जिससे
यहाँ उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ है|
इन सभी के अलावा कुछ ऐसे उद्योग भी
है जिनका बाजार व्यापक होता है जैसे वायुयान निर्माण तथा शस्त्र निर्माण उद्योग
जिनके लिए बाजार की निकट अधिक महत्वपूर्ण नहीं होती|
5.
श्रम आपूर्ति तक अभिगम्यता (श्रम आपूर्ति की उपलब्धता/कुशल
श्रमिक)
सस्ते और कुशल श्रमिक किसी भी उद्योग
के लिए अति अनिवार्य शर्त है| अत: श्रमिक बाजार की उपलब्धता या शर्मिकों की
आपूर्ति जिन स्थानों पर आसानी से हो जाती है वे भी उद्योगों की अवस्थिति कों
प्रभावित करतें है| बढते हुए यंत्रीकरण के कारण स्वचालित मशीनों और कंप्यूटर के
प्रयोग ने उद्योगों में श्रमिकों पर निर्भरता कों कम कर दिया है फिर भी कुछ उद्योग
ऐसे है जिनमें आज भी कुशल और सस्ते
श्रमिकों की आवश्यकता होती है जैसे सूरत में हीरे की कटाई और पॉलिश का उद्योग अधिक
विकसित इसलिए है क्योंकि वहाँ इस कार्य के लिए
कुशल और सस्ते श्रमिक उपलब्ध है|
6.
शक्ति के साधनों तक अभिगम्यता (ऊर्जा के साधनों की उपलब्धता)
उद्योगों में मशीनें चलाने के लिए
शक्ति (ऊर्जा) की आवश्यकता रहती है अत: उद्योग उन स्थानों पर स्थापित किए जाते है
| विशेष रूप से वे उद्योग जिन्हें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है वे ऊर्जा
स्त्रोतों के समीप ही ही लगाये जाते है जैसे लौहा –इस्पात उद्योग कोयला खदानों के
पास लगाया जाता है क्योंकि इस उद्योग में लोहे कों गलाने के लिए अधिक मात्रा में
कोयले की आवश्यकता पडती है| इसी प्रकार एल्यूमिनियम उद्योग उन स्थानों पर स्थापित किए जाते है जहाँ पर
पर्याप्त मात्रा में जलविद्युत उपलब्ध हो |
प्राचीन
काल में कोयला ऊर्जा का प्रमुख साधन था इसलिए अधिकतर उद्योग इस की खदानों के पास
लगाये जाते थे | लेकिन आजकल जल विद्युत एवं खनिज तेल(पट्रोलियम) का उपयोग भी कई
उद्योगों में होने लगा है जिससे कोयले पर उद्योगों की निर्भरता कम हुई है|
7.
परिवहन एवं संचार सेवाओं तक अभिगम्यता
उद्योगों में कच्चेमाल कों कारखाने
तक लाने के लिए तैयार माल कों बाजार तक पहुँचाने के लिए तीव्र और सक्षम परिवहन
सुविधाएँ उद्योगों की अवस्थिति तथा विकास के लिए अनिवार्य शर्त है | यही कारण है
की परिवहन लागत किसी औद्योगिक इकाई की अवस्थिति कों प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण
कारक है | परिवहन में सुधार समाकलित आर्थिक विकास और विनिर्माण की प्रादेशिक
विशिष्टता कों बढाता है| आधुनिक उद्योग अपृथक्करणीय तरीके से जुड़े हुए है अर्थात
ये आपस में बहुत ही अच्छी तरह से एक दूसरे से जुड़े है |
उदाहरण
के लिए पश्चिमी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भागों में परिवहन तंत्र
अत्यधिक विकिसित है जिसके कारण इन क्षेत्रों में
सदैव उद्योगों का सकेन्द्रण हुआ है |
परिवहन के साधनों की तरह ही संचार के
साधनों का भी औद्योगिक विकास में अत्यधिक महत्व है| क्योंकि उद्योगों में
सूचनाओं के आदान प्रदान एवं प्रबंधन के लिए अच्छे संचार तंत्र की आवश्यकता होती है
|
8.
सरकारी नीतियां
किसी देश की सरकार की औद्योगिक
नीतियाँ भी औद्योगिक विकास कों प्रभावित करती है | जैसे किसी देश की सरकार वहाँ के
उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर रही है तो कोई भी विदेशी कंपनी आकर वहाँ उद्योग नहीं
लगायेगी | इसके विपरीत अगर सरकार टैक्स में छुट या अन्य सुविधाए जैसे सस्ती भूमि,
सस्ती विद्युत आदि देती है तो उस क्षेत्र में उद्योगों कतेजी से विकास होता है |
कई
देशों में सरकार संतुलित आर्थिक विकास कों ध्यान में रखकर प्रादेशिक नीतियाँ
अपनाती है और उन क्षेत्रों में उद्योग लगाने की लिए प्रोत्साहन देती है जो औद्योगिक
दृष्टि से पिछड़े हुए है जिससे उन विशेष क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना होने
लगती है और यदि कहीं से उद्योग हटाने है
तो वहाँ पर अत्यधिक टैक्स लगाने लगती है| जिससे उद्योग वहाँ से कहीं ओर अपना
कारखाना स्थापित करतें है|
9.
समूहन अर्थव्यवस्था तक अभिगम्यत या उद्योगों के मध्य संबंध
प्रधान उद्योग की समीपता से अन्य
उद्योग लाभ उठाते है | क्योंकि उस प्रधान उद्योग का तैयार माल उन उद्योगों के लिए
कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है
| जिससे उद्योगों के मध्य संबंध स्थापित होते है और एक समूहन अर्थव्यवस्था के रूप
में बदल जाता है | इस समूहन से उद्योगों कों की श्रृंखला बन जाती है और उन्हें कई
प्रकार के लाभ प्राप्त होते है | उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग के आसपास कई ऐसे
छोटे उद्योग लग जाते है जो लौह इस्पात का प्रयोग कच्चे माल के रूप में करतें है
जैसे कल-पुर्जे उद्योग, इंजीनियरिग उद्योग, मोटर गाड़ी उद्योग आदि |
10.
पूंजी की उपलब्धता
किसी भी उद्योग के सफल विकास के लिए
पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है| कारखाना लगाने, मशीनों तथा कच्चे माल खरीदने
और श्रमिकों कों वेतन देने की लिए पर्याप्त पूंजी उपलब्ध होनी चाहिए| उदाहरण के
लिए यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के पूर्वी क्षेत्रों में पूंजी पर्याप्त मात्रा में
उपलब्ध हो जाती है इसलिए वहाँ उद्योग अधिक है जबकि अफ्रीका और एशिया के देशों में
पूंजी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो
पाती जिससे ये देश औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए है | पूंजी की उपलब्धता तभी संभव
है जब बैंकिंग व्यवस्था अच्छी हो | अत: उद्योग के लिए बैंकिंग व्यवस्था का विकसित
होना भी जरुरी है |
स्वछंद उद्योग या फूटलूज
इंडस्ट्रीज (Foot Loose Industries)
वे उद्योग जो इस बात पर निर्भर नहीं है कि उनके कच्चे माल के
भार में कमी होगी या नहीं स्वछंद उद्योग
(फूटलूज इंडस्ट्रीज) कहलातें है | दूसरे शब्दों में हम ये कह सकतें है की इन
उद्योगों की स्थापना में कच्चे माल का महत्व ना के बराबर होता है| ये उद्योग संघटक
पुर्जों पर निर्भर रहते है जो कहीं से भी प्राप्त किए जा सकते है |इन उद्योगों में
उत्पादन कम होता है एवं श्रमिकों की आवश्यकता भी कम होती है| ये उद्योग
सामान्यत:प्रदूषण नहीं फैलाते है |इन उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण कारक
सड़कों के जाल द्वारा अभिगम्यता होती है| जिससे सामान आसानी से बाजार तक पहुँच जाए|
उदाहरण के लिए स्विट्जरलैंड का घड़ी उद्योग एक स्वछंद उद्योग तथा भारत के हरियाणा
में स्थित गुरुग्राम का मोटर गाडी उद्योग आदि |
विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण (Classification of
Manufacturing Industries)
विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित
आधारों पर किया जा सकता है |
1.
आकार के आधार पर
2.
कच्चेमाल के आधार पर
3.
कार्य के आकार के आधार पर या
उत्पादों की प्रकृति के आधार पर
4.
उद्योगों के उत्पाद या उत्पादन की वस्तु के आधार पर
5.
उद्योगों के स्वामित्व के आधार पर
इन आधारों पर उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित है |
1. आकार के आधार पर उद्योगों का
वर्गीकरण
आकार
के आधार पर के पर उद्योगों कों तीन प्रकारों में बाँटा जाता है|
a)
घरेलू अथवा कुटीर उद्योग
b)
छोटे पैमाने के उद्योग
c)
बड़े पैमाने के उद्योग
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a)
घरेलू अथवा कुटीर उद्योग (Cottage or
Household Industries)
विनिर्माण की सबसे छोटी इकाई घरेलू
अथवा कुटीर उद्योग कहलाते है| इन उद्योगों की निम्नलिखित विशेषताएँ है|
1)
इसमें शिल्पकार स्थानीय कच्चे माल का ही प्रयोग करते है|
2)
इन उद्योगों में साधारण औजारों का प्रयोग किया जाता है|
3)
इन उद्योगों में परिवार के सदस्य मिलकर दैनिक जीवन के उपयोग
की वस्तुओं का निर्माण करते है|
4)
इन उद्योगों में बनाए गए सामान का या परिवार के लोग खुद
प्रयोग करते है या फिर इसे स्थानीय गांव के बाजार में बेचते है |
5)
इन उद्योगों में बने सामान की उत्पादनकर्ता कभी-कभी अदला-बदली
भी कर लेते है|
6)
इन उद्योगों में पूँजी और परिवहन की अधिक आवश्यकता नहीं होती
इसलिए ये कारक इन उद्योगों कों अधिक प्रभावित नहीं करते|
7)
इन उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं का व्यापारिक महत्व कम
होता है| क्योंकि अधिकतर उपकरण या वस्तुएँ स्थानीय लोगों द्वारा भी निर्मित होती
है |
8)
इन उद्योगों में दैनिक जीवन में प्रयोग में लाये जाने वाली
वस्तुएँ जैसे खाद्य पदार्थ, कपडा, चटाइयाँ, बर्तन, साधारण औजार, फर्नीचर, जुतें
एवं लघु मूर्तियाँ आदि निर्मित की जाती है| इनके अलावा पत्थर एवं मिट्टी के बर्तन,
इटें तथा चमड़े के कई प्रकार के सामान भी बनाए जाते है| सुनार (आभूषण बनाने वाला)
सोने, चांदी और तांबे के आभूषण बनाता है जो इसी उद्योग में शामिल है| कुछ लोग बाँस
और स्थानीय वनों से प्राप्त लकडियों से शिल्पकारी के द्वारा वस्तुओं कों बनाकर
बेचते है |
b)
छोटे पैमाने के उद्योग
( Small scale
industries)
ये उद्योग कुटीर उद्योगों का ही विस्तृत रूप है| इनकी निम्नलिखित विशेताएँ है |
1)
इनके उत्पादन की तकनीक कुटीर उद्योगों से भिन्न होती है|
2)
इन उद्योगों के कार्य स्थल या कारखाना घर से बहार होता है|
3)
इन उद्योगों में भी स्थानीय कच्चेमाल का इस्तेमाल किया जाता
है|
4)
इन उद्योगों में शक्ति के साधनों की सहायता सेचलने वाले
यंत्रो का प्रयोग किया जाता है| इनमें कुशल तथा अर्धकुशल श्रमिक उत्पादन कार्य में
लगे रहते है|
5)
इन उद्योगों के संचालन के लिए कम पूँजी, कम व हल्की मशीनों
तथा कम श्रमिकों की आवश्यकता रहती है|
6)
ये उद्योग रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराते है| जिससे
स्थानीय लोगों की आय और क्रय शक्ति भी बढती |
7)
रोजगार अधिक देने के कारण भारत,चीन, इंडोनेशिया एवं ब्राजील
जैसे देशों में अपनी अधिक जनसँख्या कों रोजगार प्रदान करने के लिए इस तरह के
उद्योग शुरू किए है |
c)
बड़े पैमाने के उद्योग
(Large scale
industries)
इन उद्योगों में उत्पादन कार्य बड़ी
मशीनों के द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है | इन उद्योगों का विकास पिछले 200 वर्षों में हुआ है
| पहले ये उद्योग ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी भाग और यूरोप
में लगाये गए थे परन्तु वर्तमान में इनका विस्तार विश्व के सभी भागों में हो गया
है |
इनकी निम्नलिखित विशेषताएँ है|
1)
इनके लिए विशाल बाजार की आवश्यकता होती है |
2)
,विभिन्न प्रकार का कच्चामाल इन उद्योगों में प्रयोग में लाया
जाता है |
3)
इन उद्योगों के संचालन के लिए अधिक मात्रा में शक्ति की
आवश्यकता होती है|
4)
इन उद्योगों में सस्ते और कुशल श्रमिकों की अधिक संख्या में
की आवश्यकता होती है |
5)
इनमें विकसित प्रौद्योगिकि प्रयोग की जाती है |
6)
ये उद्योग भारी तथा पूँजी-प्रधान उद्योग होते है | क्योंकि
इनमें अधिक उत्पादन किया जाता है और अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है |
7)
इन उद्योगों में अच्छी किस्म की वस्तुओं का निर्माण किया जाता
है और उनकी गुणवत्ता का ध्यान रखा जाता है |
2. कच्चेमाल के आधार पर उद्योगों का
वर्गीकरण
कच्चे
माल के आधार पर उद्योग निम्नलिखित उप वर्गों में बाँटें जाते है |
a)
कृषि आधारित उद्योग
b)
खनिज आधारित उद्योग
c)
रसायन आधारित उद्योग
d)
वनों पर आधारित उद्योग
e)
पशु आधारित उद्योग
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a)
कृषि आधारित उद्योग (Agro based Industries)
वे उद्योग जो कृषि उपजों कों
कच्चेमाल के रूप में प्रयोग करते हैं|उन्हें कृषि आधारित उद्योग कहते है |जैसे भोजन
तैयार करने वाले उद्योग, आचार उद्योग, फलों के रस से सम्बन्धित उद्योग, मसालों के
उद्योग सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, रबड़ उद्योग,वनस्पति घी उद्योग और चाय
उद्योग आदि कृषि आधारित उद्योग है |
b)
खनिज आधारित उद्योग (Mineral based
Industries)
वे उद्योग जो खनिजों कों कच्चेमाल के
रूप में प्रयोग करते है खनिज आधारित उद्योग कहलाते है| ये उद्योग दो प्रकार के
होते है |
1.
धात्विक खनिज आधारित उद्योग
वे उद्योग जिनमें धात्विक खनिजों का
उपयोग कच्चेमाल के रूप में किया जाता है उन्हें धात्विक खनिज आधारित उद्योग है| इन
उद्योगों के भी दो उप प्रकार है|
क).
लौह धातु उद्योग
वे धातु उद्योग जिनमें लोहे के अंश
वाले खनिजों का उपयोग कच्चे माल के लिए होता है उन्हें लौह धातु उद्योग कहते है|
जैसे लौह-इस्पात उद्योग |
ख).
अलौह धातु उद्योग
वे धातु उद्योग जिनमें उन खनिजों का
उपयोग कच्चे माल के लिए होता जिनमें लौहे के अंश नहीं पाए जाते उन्हें अलौह धातु
उद्योग कहते है| जैसे एल्युमिनियम उद्योग,तांबा प्रगलन उद्योग, हीरे जवाहरात के
उद्योग आदि |
2.
अधात्विक खनिज आधारित उद्योग
वे धातु उद्योग जिनमें अधात्विक
खनिजों का उपयोग कच्चे माल के लिए होता है उन्हें अधात्विक खनिज आधारित उद्योग
कहते है| जैसे सीमेंट उद्योग, मिट्टी के बर्तनों के उद्योग आदि |
c)
रसायन आधारित उद्योग(Chemical based
Industries)
वे उद्योग जिनमें प्राकृतिक रूप में
पाए जाने वाले रासायनिक खनिजों का प्रयोग होता है उन्हें रासायन आधारित उद्योग
कहते है| जैसे पेट्रो रासायन उद्योग में खनिज तेल का उपयोग होता है | नमक,गंधक एवं
पोटाश उद्योग भी प्राकृतिक खनिजों का प्रयोग रासायन बनाने में करते है| कुछ उद्योग
लकड़ी तथा कोयले कों भी रासायन बनाने में प्रयोग में लाते है| पेंट, वार्निश,
प्लास्टिक, कृत्रिम रेशे,काँच, चीनी मिट्टी के बर्तन आदि इस प्रकार के उद्योग है |
d)
वनों पर आधारित उद्योग (Forest based Raw
Material using Industries)
वे उद्योग जिनमें वनों से प्राप्त
मुख्य एवं गौण वस्तुओं का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है उन्हें वनों पर आधारित उद्योग कहते है | जैसे फर्नीचर
उद्योग,कागज उद्योग,इमारती लकड़ी के उद्योग,बाँस और घास पर आधारित उद्योग तथा लाख
उद्योग |
e)
पशु आधारित उद्योग (Animal based Industries)
वे उद्योग जो अपना कच्चा माल पशुओं
से प्राप्त करते है उन्हें पशु आधारित उद्योग कहता है| जैसे चमड़ा उद्योग, ऊनी
वस्त्र उद्योग, हाथी दाँत उद्योग आदि|
3. कार्य के आकार के आधार पर या उत्पादों की प्रकृति के आधार पर उद्योगों का
वर्गीकरण
कार्य
के आकार के आधार पर या उत्पादों की
प्रकृति के आधार पर उद्योग दो प्रकार के होतें है|
a)
भारी उद्योग
b)
हल्के उद्योग
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a)
भारी उद्योग (Heavy Industries)
वे उद्योग जिनका कच्चामाल और तैयार
माल दोनों ही भारी होते भारी उद्योग कहलाते है | इन उद्योगों में श्रमिक भी अधिक
होते है| इनमें पूंजी अधिक लगाई जाती है| ये कच्चेमाल के स्त्रोत के पास स्थापित
किए जाते है| जैसे लौह-इस्पात उद्योग|
b)
हल्के उद्योग(Light Industries)
वे उद्योग जिनका कच्चामाल और तैयार
माल दोनों ही हल्के होते हल्के उद्योग कहलाते है | इन उद्योगों में श्रमिक कम
संख्या में पाए जाते है| इनमें पूंजी कम लगाई जाती है|ये बाजार के पास स्थापित किए जाते है| जैसे इलेक्ट्रॉनिक
उद्योग|
4. उद्योगों के उत्पाद या उत्पादन की
वस्तु के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण
उद्योगों
के उत्पाद या उत्पादन की वस्तु के आधार पर उद्योग दो प्रकार के होते है |
a)
आधारभूत उद्योग
b)
उपभोक्ता उद्योग
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a)
आधारभूत उद्योग (Basic industries)
वे उद्योग जिनके तैयार माल या उत्पादित
पदार्थ का उपयोग अन्य उद्योग अपने कच्चे माल के रूप में करते है है उन्हें आधारभूत
उद्योग कहा जाता है | जैसे लौह-इस्पात उद्योग| क्योंकि इसका उपादित सामान अन्य
उद्योगों में मशीन बनाने, कल पुर्जे बनाने, मोटर गाडी बनाने आदि में किया जाता है|
इसी प्रकार वस्त्र उद्योग में बना कपडा रेडीमेड कपडे के उपभोक्ता उद्योगों में
प्रयोग किया जाता है|
b)
उपभोक्त वस्तु उद्योग (Consumer Goods
industries)
वे उद्योग जो ऐसे सामान का उत्पादन
करते है जिनका उपयोग प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है उन्हें
उपभोक्ता उद्योग या उपभोक्ता वस्तु उद्योग कहते है | उदाहरण के लिए रोटी (ब्रेड)
और बिस्कुट उद्योग, चाय, साबुन,लिखने के लिए कागज,टेलीविजन, मोबाइल फोन तथा
श्रृंगार के सामान का उद्योग आदि |
5. उद्योगों के स्वामित्व के आधार पर उद्योगों
का वर्गीकरण
उद्योगों
के स्वामित्व के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते है |
a)
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग
b)
निजी क्षेत्र के उद्योग
c)
संयुक्त क्षेत्र के उद्योग
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
a)
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग (Public
Sector Industries)
वे उद्योग जिनका स्वामित्व तथा
प्रबंधन सरकार के अधीन हो उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कहते है| भारत में
अधिकाँश उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के है | इन उद्योगों पर केन्द्रीय तथा राज्य
सरकारों का स्वामित्व है | समाजवादी शासन व्यवस्था वाले देशों में अनेक उद्योग
सार्वजनिक क्षेत्र के होते है| जबकि मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देशों में
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के उद्योग भी होते है|
जैसे भारतीय रेलवे, स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल/SAIL) आदि |
b)
निजी क्षेत्र के उद्योग (Private Sector
Industries)
वे उद्योग जिनका स्वामित्व तथा
प्रबंधन एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के समूह (निगम/संघठन) के अधीन होता है
उन्हें निजी क्षेत्र के उद्योग कहते है| इसमें निवेश व्यक्तिगत होता है | जैसे
रिलाइंस इण्डिया लिमिटेड, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी, हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड
आदि|
c)
संयुक्त क्षेत्र के उद्योग (Joint Sector
Industries)
वे उद्योग जिनका संचालन किसी संयुक्त
कंपनी के द्वारा या किसी निजी एवं सरकारी क्षेत्र की कंपनी के संयुक्त प्रयासों से किया जाता है उन्हें
संयुक्त क्षेत्र के उद्योग कहते है| जैसे
NTPC,
बृहत पैमाने पर किए गए निर्माण के आधार पर औद्योगिक प्रदेश
विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों
कों उनके बृहत पैमाने पर किए गए निर्माण के आधार पर दो बड़े समूहों में बाँटा जाता
है |
1. परम्परागत बृहत औद्योगिक प्रदेश
इन औद्योगिक प्रदेशों के समूह कुछ
अधिक विकसित प्रदेशों में है|
2. उच्च प्रौद्योगिकी वाले बृहत
औद्योगिक प्रदेश
जिनका विस्तार कम विकसित देशों में हुआ है
परम्परागत बड़े पैमाने के उद्योग तथा उनके औद्योगिक प्रदेश
परम्परागत बड़े पैमाने के उद्योग
भारी उद्योगों कों परम्परागत बड़े
पैमाने के उद्योग कहा जाता है | इन उद्योगों कों धुएं की चिमनी वाले उद्योग भी कहा
जाता है | इन उद्योगों में कोयला खदानों के समीप धातु पिघलाने वाले उद्योग, भारी
इंजिनयरिंग उद्योग, रसायन निर्माण उद्योग, वस्त्र उद्योग आदि उद्योगों कों शामिल
किया जाता है |
परम्परागत बड़े पैमाने के औद्योगिक
प्रदेश
वे क्षेत्र जिनमें भारी उद्योग या धुएं की चिमनी
वाले उद्योग जैसे कोयला खदानों के समीप धातु पिघलाने वाले उद्योग, भारी इंजिनयरिंग
उद्योग, रसायन निर्माण उद्योग, वस्त्र उद्योग आदि उद्योग लगे होते है परम्परागत
बड़े पैमाने के औद्योगिक प्रदेश कहलाते है |
परम्परागत बड़े पैमाने के उद्योगों के
औद्योगिक प्रदेशों के निम्नलिखित पहचान बिंदु या विशेषताएँ है|
1. निर्माण उद्योगों में रोजगार का
अनुपात ऊँचा होता है |
2. इन प्रदेशों में उच्च गृह घनत्व पाया
जाता है |
3. इन प्रदेशों में घर घटिया प्रकार के
होते है और सेवाएँ अपर्याप्त होती है |
4. इन प्रदेशों में वातावरण अनाकर्षक
होता है जिसमें गंदगी के ढेर व प्रदूषण होता है |
5. विश्वव्यापी माँग कम होने पर कारखाने
बंद होने के कारण इन प्रदेशों में बेरोजगारी की समस्या पायी जाती है | इसके साथ
उत्प्रवास की समस्या भी देखने कों मिलती है |
जर्मनी का रूहर कोयला क्षेत्र एक परम्परागत बड़े पैमाने का
औद्योगिक प्रदेश
जर्मनी का रूहर कोयला क्षेत्र काफी
समय तक यूरोप महाद्वीप का एक महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रदेश रहा है | कोयले के
विस्तृत भण्डार तथा लौहा-इस्पात उद्योग इस औद्योगिक प्रदेश की अर्थव्यवस्था के
प्रमुख आधार थे| परन्तु कोयले की माँग में कमी आने के कारण यहाँ उद्योग संकुचित
होने लगा |
इस
क्षेत्र के लौह-अयस्क के भण्डार समाप्त हो जाने पर रुहर नदी के जल मार्गों के
द्वारा आयातित लौह अयस्क का प्रयोग करके यहाँ उद्योग कार्यशील रहा है|
रुहर
क्षेत्र के महत्व का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है की जर्मनी का 80 प्रतिशत
लौहा-इस्पात का उत्पादन ये क्षेत्र ही करता है |
औद्योगिक
ढाचें में परिवर्तन होने के कारण इस प्रदेश के कुछ उद्योगों के उत्पादन में गिरावट
आई है साथ ही इस क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या होने लगी है| औद्योगिक अपशिष्ट का
निपटान भी यहाँ के समस्या बन गयी है |
इस
रुहर प्रदेश के भविष्य की सम्पन्नता कोयले व इस्पात के स्थान पर नए उद्योग जैसे
ओपेल कार बनाने का विशाल कारखाना, नए रसायनिक संयत्र तथा विश्वविद्यालय आदि पर
आधारित है|यहाँ खरीदारी के बड़े बाजार बन गए है जिससे एक ‘नया रुहर’ भू दृश्य विकसित
हो रहा है|
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग की संकल्पना
निर्माण
क्रियाओं में उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग नवीनतम पीढ़ी के उद्योग है | इन उद्योगों ने पिछले कुछ दशकों से बहुत तेजी
से उन्नति की है | इन उद्योगों के लिए उच्च कोटि की प्रौद्योगिकी की
आवश्यकता होती है | जिनमें निरंतर शोध और विकास किया जाता है| इन निरंतर शोध और
विकसित की गयी प्रौद्योगिकी का प्रयोग के द्वारा उन्नत वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग
उत्पादों का निर्माण किया जाता है|
इन
उद्योगों में उत्पादन उन्नत प्रकार का होता है इसलिए इन उद्योगों में अति कुशल
श्रमिकों से काम लिया जाता है| संपूर्ण श्रमिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यवसायिक
श्रमिकों का होता है| इन्हें सफ़ेद कॉलर श्रमिक भी कहा जाता है| ये व्यवसायिक
श्रमिक उच्च, दक्ष एवं विशिष्ट होते है| इनकी संख्या नीली कॉलर वाले या वास्तविक
उत्पादक श्रमिकों से अधिक होती है|
उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों में यंत्रमानव (रोबोट), कंप्यूटर आधारित डिजाइन (Computer-Aided-Design
- CAD) तथा कंप्यूटर आधारित निर्माण, धातु पिघलाने एवं धातु
शोधन के इलेक्ट्रोनिक नियंत्रण के उत्पाद और नए रासायनिक एवं औषधीय उत्पादों कों
प्रमुख स्थान प्राप्त है|
उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों के भूदृश्य में विशाल भवनों, कारखानों एवं भंडार क्षेत्रों
के स्थान पर आधुनिक साफ़ सुथरे कार्यालय और प्रयोगशालाएँ देखने कों मिलती है| इस
समय जो भी विकास योजनाएँ बन रही है उनमें इन उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों के महत्व
कों देखते हुए नियोजित व्यवसाय पार्क का निर्माण किया जा रहा है|
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों का
प्रमुख महानगरों के परिधि क्षेत्रों में ही विकसित होने के कारण
उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों का प्रमुख महानगरों के परिधि क्षेत्रों में ही विकसित होने
के निम्नलिखित कारण है|
1. उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों के
अधिकांश उत्पादों के लिए बाजार महानगरों में ही उपलब्ध होते है|
2. उच्च प्रौद्यिगिकी के युक्त विशिष्ट
और कुशल श्रमिक जो इन उद्योगों के विकास लिए महत्वपूर्ण है निकट के क्षेत्रों से
आसानी से मिल जाते है |
3. आधुनिक परिवहन एवं संचार सेवाएं भी
महानगरों में ही उपलब्ध होतें है|
4. महानगरों के परिधि क्षेत्रों में
भूमि सस्ती उपलब्ध हो जाती है|
5. महानगरों के परिधि क्षेत्रों के पास
सुखद वातावरण उपलब्ध हो जाता है |
6. कारखानों कों बहुमंजिला बनाने और
उनके विस्तार के लिए महानगरों के परिधि क्षेत्रों में स्थान उपलब्ध होता है|
प्रौद्योगिक ध्रुव
वे
प्रदेश जहाँ उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग का
संकुल या समूह सकेंद्रित है प्रौद्योगिक ध्रुव कहलाते है | दूसरे शब्दों में हम कह
सकतें है कि एक सकेंद्रित प्रदेश के भीतर नियोजन के द्वारा विकसित उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों का क्षेत्र ही प्रौद्योगिक ध्रुव है| ये क्षेत्र आत्मनिर्भर होते है और अपनी विशिष्टता
लिए होते है|
प्रौद्योगिक ध्रुव में विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी
(टेक्नोलोजी) पार्क, विज्ञान नगर (science city) तथा उच्च तकनीक से सम्बन्धित उद्योगों
का समूह या संकुल होता है | जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को के
पास सिलिकन घाटी एवं सियटल के पास सिलिकन वन प्रौद्योगिक ध्रुव के अच्छे उदाहरण
है|
विश्व के प्रमुख उद्योग
विश्व अर्थव्यवस्था में निर्माण
उद्योगों का बहुत अधिक योगदान है | विश्व के कुछ प्रमुख निर्माण उद्योगों में
लौह-इस्पात उद्योग, वस्त्र उद्योग, मोटर गाड़ी निर्माण उद्योग, पेट्रो रसायन एवं
इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग आदि कों शामिल किया जाता है |
लौह-इस्पात उद्योग
लौह-इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग
लौह-इस्पात उद्योग आधुनिक सभ्यता की
आधारशिला है | यह उद्योग अन्य सभी उद्योगों का आधार है | यह उद्योग अनेक छोटे बड़े
उद्योगों की आधारभूत सामाग्री जैसे मशीन और औजार आदि के लिए कच्चामाल प्रदान करता
है | इसलिए इस उद्योग कों आधारभूत उद्योग भी कहते है |
लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग
इस
उद्योग कों भारी उद्योग भी कहते है क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में भारी भरकम कच्चा
माल उपयोग में लाया जाता है और इसका तैयार माल भी भारी होता है |
लौह-अयस्क से लौह इस्पात बनाने की
प्रक्रिया
लोहा
प्रकृति में शुद्ध रूप में नहीं पाया जाता | इसे खादानों से अयस्क के रूप में
प्राप्त किया जाता है | लोहा प्राप्त करने
के लिए लौह-अयस्क कों झोंका भट्टी में कोक
(कार्बन) एवं चूना पत्थर के साथ प्रगलन
(पिघलाया) किया जाता है | यह पिघला हुआ लौह बाहर निकालकर ठंडा हो जाता है
तो इसे कच्चा लोहा (पिग आयरन) कहते है | यह मुलायम होता है
और अभियान्त्रिक (इंजिनियरिंग) के कार्यों के लिए उपयोगी नहीं होता है |
कच्चे
लोहे में मैंगनीज मिलाकर इस्पात तैयार किया जाता है | यह मजबूत होता है | इसे
पीटकर या खींचकर विभिन्न आकारों में ढाला जा सकता है | यह अधिक उपयोगी होता है |
लौह-इस्पात उद्योग की अवस्थिति
परम्परागत
रूप से लौह-इस्पात उद्योग की स्थिति कच्चे माल के स्त्रोत के निकट ही रही है | ये
उद्योग उन स्थानों पर केंद्रित रहे है जहाँ लौह-अयस्क, कोयला, मैंगनीज एवं चूना
पत्थर आसानी से उपलब्ध हो जाये या फिर उन स्थानों पर अवस्थित होते है जहाँ पर
कच्चा माल कम लागत पर आसानी से पहुँचाया जा सके | जैसे पतन (बंदरगाह) के समीप |
छोटे
लौह-इस्पात उद्योग जो कच्चेमाल के रूप में रद्दी लौह धातु का प्रयोग करते है और
जिनका निर्माण और प्रचालन कम महँगा है उनकी अवस्थिति बाजार के पास होना अधिक
महत्वपूर्ण होती है | क्योंकि कच्चे माल के रूप में रद्दी लौह धातु आसानी से
उपलब्ध हो जाती है |
परम्परागत
रूप से अधिकतर इस्पात का उत्पादन विशाल संघटित संयंत्रों द्वारा ही किया जाता है |
लेकिन अब छोटे इस्पात संयंत्र भी अधिक लगने लगे है | इन संयंत्रों में केवल एक
प्रक्रिया ही की जाती है जिनमें केवल
इस्पात निर्माण का ही कार्य होता है |
लौह-इस्पात उद्योग का विश्व वितरण
यह उद्योग मुख्य रूप से उत्तर
अमेरिका यूरोप तथा एशिया महाद्वीप के विकसित देशों में ही केंद्रित है | विश्व के प्रमुख
लौह- इस्पात उत्पादक प्रदेश निम्न प्रकार से है |
1. उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में
लौह-इस्पात उद्योग
इस
महाद्वीप में संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख देश है | इस देश में लौह- इस्पात का
उत्पादन करने वाले प्रमुख क्षेत्र निम्न
है |
क).
उत्तर अप्लेशियन प्रदेश में
पिट्सबर्ग प्रमुख है लेकिन इसका महत्व अब घटता जा रहा है | अब पिट्सबर्ग
कों जंग का कटोरा के नाम से पुकारा जाता है |
ख).
महान झील क्षेत्र में शिकागो, गैरी, इरी, क्लीवलैंड, लोरेन,
बफैलो तथा ड्युलूथ
ग).
एटलांटिक तटीय प्रदेश में स्पैरोज पॉइंट तथा मोरिसविले
घ).
संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी राज्य अलबामा में भी इस
उद्योग का विस्तार हुआ है |
2. यूरोप महाद्वीप में लौह-इस्पात
उद्योग
इस
महाद्वीप में लौह- इस्पात का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी,
बेल्जियम, लक्समबर्ग (लक्जेमबर्ग), नीदरलैंड और सोवियत रूस है | इन देशों में
प्रमुख लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्र निम्न
है |
क).
ग्रेट ब्रिटेन - बरमिंघम और शैफील्ड
ख).
जर्मनी - डूइसबर्ग, डोरटमुंड, डूसूलडोरफ एवं ऐसेन
ग).
फ्रांस - ली
क्रियुसोट एवं सेंट इटीनी
घ).
सोवियत रूस – मास्को, सेंट पिट्सबर्ग, लीपेस्टक और तुला
ङ).
यूक्रेन – क्रिबोईरॉग, एवं दोनेत्सक
3. एशिया महाद्वीप में लौह-इस्पात
उद्योग
इस महाद्वीप में लौह- इस्पात का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश
जापान, चीन तथा भारत है | इन देशों में प्रमुख लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्र निम्न है |
क).
जापान – नागासाकी, टोक्यो और याकोहामा
ख).
चीन – शंघाई , तियनस्तिन और वूहान
ग).
भारत – जमशेदपुर, कुल्टी, बुरहानपुर, दुर्गापुर, राउरकेला,
भिलाई , बोकारो, सेलम.विशाखापट्टनम, और भद्रावती
सूती वस्त्र उद्योग
सूती वस्त्र उद्योग एक प्रमुख
निर्माण उद्योग है | इस उद्योग में सूती वस्त्रों का उत्पादन तीन प्रकार से किया
जाता है | इन्हें सूती वस्त्र उद्योग के उपक्षेत्र भी कहते हैं |
क).
हथकरघा (Handloom)
ख).
बिजली करघा (Powerloom)
ग).
कारखानों (Mill
Sectors)
इनका
संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |
हथकरघा
(Handloom)
यह श्रम पर आधारित सूती वस्त्र
उद्योग का उपक्षेत्र है |अत: इस उपक्षेत्र में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है | यह कुशल एवं अर्धकुशल
श्रमिकों कों रोजगार प्रदान करता है| इस प्रकार के सूती वस्त्र उद्योग में पूँजी
की आवश्यकता कम होती है | इसके अंतर्गत सूत की कताई, बुनाई आदि का कार्य किया जाता
है |
अधिक रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता और कम पूँजी निवेश के
कारण ही स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गाँघी ने हथकरघा उद्योग कों बढ़ावा देने
के लिए खादी के उपयोग पर बल दिया था |
बिजली
करघा (Powerloom)
इसमें करघों
कों बिजली कि सहायता से चलाया जाता है| इन उद्योगों में कपड़ा बनाने में यंत्रो का
प्रयोग होता है इसलिए इसमें श्रमिकों की आवश्यकता कम पडती है |इनमें उत्पादन अधिक
होता है |
कारखाना (Mill Sectors)
यह बड़ी इकाइयों वाला उपक्षेत्र
है| इसमें वस्त्र निर्माण का काम बड़ी-बड़ी मशीनों के द्वारा कारखानों में किया जाता
है | कारखानों में कपडा बनाने के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है | इन
कारखानों में उच्चकोटि के कपड़ों का बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन किया जाता है |
सूती कपडा उद्योग का विश्व वितरण
किसी भी उद्योग का विकास में उसके
कच्चे माल कि उपलब्धता पर काफी निर्भर करता है | सूती कपड़ा उद्योग में भी सूती
कपडा निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में अच्छी किस्म की कपास चाहिए | विश्व की 50 प्रतिशत से अधिक
कपास का उत्पादन भारत, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और
मिस्त्र में किया जाता है | इसलिए यहाँ पर इस उद्योग का अत्यधिक विकास हुआ है |
ब्रिटेन,
उत्तरी पश्चिमी यूरोप के देश तथा जापान जैसे देशों ने आयातित कपास और धागे पर
आधारित सूती वस्त्र उद्योग का विकास किया
है | अकेला यूरोप महाद्वीप विश्व का आधा
कपास आयात करता है |
सूती कपडा उद्योग की समस्याएँ या
कृत्रिम रेशों से प्रतिस्पर्धा के
कारण सूती कपडा उद्योग की नाकारात्मक प्रवृति
वर्तमान
में या पिछले कुछ दशकों में इस उद्योग कों कृत्रिम रेशों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़
रही है | जिसके कारण विश्व के कई देशों में इस उद्योग में नाकारात्मक प्रवृति देखी
जा रही है | वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी सुधरों से इस उद्योग की संरचना में
परिवर्तन होता है साथ ही श्रम लागत बढ़ रही है | उदाहरण के तौर पर द्वितीय विश्व
युद्ध से लेकर सत्तर के दशक तक जर्मनी ने इस उद्योग में काफी प्रगति की लेकिन अब
इसके उत्पादन में कमी आ रही है | यह उद्योग उन कम विकसित देशों में स्थानान्तरित
हो गया है जहाँ श्रम लागत कम है |
प्रश्न उत्तर
अध्याय 6 द्वितीयक क्रियाकलाप
प्रश्न: निम्न में से कौन सा कथन असत्य है ?
क).
हुगली नदी के सहारे जूट के कारखाने सस्ती जल
यातायात कि सुविधा के कारण स्थापित हुए |
ख).
चीनी, सूती वस्त्र एवं वनस्पति तेल उद्योग स्वछंद
उद्योग है |
ग).
खनिज तेल एवं जल विद्युत शक्ति के विकास ने
उद्योगों की अवस्थिति कारक के रूप में कोयला शक्ति के महत्व को कम किया है |
घ).
पत्तन नगरों ने भारत में उद्योगों को आकृषित किया
है |
उत्तर: उत्तर चीनी, सूती वस्त्र एवं वनस्पति तेल
उद्योग स्वछंद उद्योग है |
प्रश्न: निम्न में से कौन
सी एक अर्थव्यवस्था में उत्पादन का स्वामित्व व्यक्तिगत होता है ?
क).
पूंजीवाद |
ख).
मिश्रित |
ग).
समाजवाद |
घ).
इनमें से कोई भी नहीं |
उत्तर: पूँजीवाद
प्रश्न: निम्न में से
कौन-सा एक प्रकार का उद्योग अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करता है ?
क).
कुटीर उद्योग |
ख).
छोटे पैमाने के उद्योग |
ग).
आधारभूत उद्योग |
घ).
स्वछंद उद्योग |
उत्तर: आधारभूत उद्योग
प्रश्न: निम्न में से
कौन-सा एक जोड़ा सही मेल खाता है ?
1) स्वचालित वाहन उद्योग - लॉस
एंजिल्स
2) पोत निर्माण उद्योग - लूसाका
3) वायुयान निर्माण उद्योग - फलोरेंस
4) लौह इस्पात उद्योग - पिट्सबर्ग
उत्तर: लौह इस्पात उद्योग - पिट्सबर्ग
प्रश्न: उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग क्या है ?
उत्तर: निर्माण क्रियाओं में उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योग नवीनतम पीढ़ी के उद्योग है |
इन उद्योगों के लिए उच्च कोटि की प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है |
जिनमें निरंतर शोध और विकास किया जाता है| इन निरंतर शोध और विकसित की गयी प्रौद्योगिकी
का प्रयोग के द्वारा उन्नत वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्माण किया
जाता है|
इन
उद्योगों में उत्पादन उन्नत प्रकार का होता है इसलिए इन उद्योगों में अति कुशल
श्रमिकों से काम लिया जाता है| संपूर्ण श्रमिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यवसायिक
श्रमिकों का होता है| इन्हें सफ़ेद कॉलर श्रमिक भी कहा जाता है| ये व्यवसायिक
श्रमिक उच्च, दक्ष एवं विशिष्ट होते है| इनकी संख्या नीली कॉलर वाले या वास्तविक
उत्पादक श्रमिकों से अधिक होती है|
उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों में यंत्रमानव (रोबोट), कंप्यूटर आधारित डिजाइन (Computer-Aided-Design
- CAD) तथा कंप्यूटर आधारित निर्माण, धातु पिघलाने एवं धातु
शोधन के इलेक्ट्रोनिक नियंत्रण के उत्पाद और नए रासायनिक एवं औषधीय उत्पादों कों
प्रमुख स्थान प्राप्त है|
प्रश्न: विनिर्माण से क्या अभिप्राय है ? या
विनिर्माण किसे कहते है ?
उत्तर: विनिर्माण का आशय किसी भी
वस्तु का उत्पादन है | विनिर्माण का शाब्दिक अर्थ है ‘हाथ से बनाना’ परंतु वर्तमान समय में मशीनों या यंत्रों द्वारा बनाया गया सामान भी
इसमें शामिल किया जाता है | इसके अंतर्गत हस्तशिल्प कार्यों
से लेकर लौहे और इस्पात को गढ़ना, प्लास्टिक के खिलौने बनाना, कम्प्युटर का सामान बनाना तथा अन्तरिक्ष यान आदि सभी का निर्माण शामिल
किया जाता है | यह एक परमावश्यक प्रक्रिया है जिसमें कच्चे
माल को स्थानीय बाज़ार या दूरस्थ बाज़ार में
बेचने के लिए उसे ऊँचे मूल्य के तैयार माल में परिवर्तित किया जाता है |
प्रश्न: स्वछंद उद्योग या फूटलूज इंडस्ट्रीज (Foot Loose Industries) किसे कहते है ?
उत्तर
: वे उद्योग जो इस बात पर निर्भर नहीं है कि उनके कच्चे माल के भार में कमी होगी
या नहीं स्वछंद उद्योग (फूटलूज
इंडस्ट्रीज) कहलातें है | दूसरे शब्दों में हम ये कह सकतें है की इन उद्योगों की
स्थापना में कच्चे माल का महत्व ना के बराबर होता है| ये उद्योग संघटक पुर्जों पर
निर्भर रहते है जो कहीं से भी प्राप्त किए जा सकते है |इन उद्योगों में उत्पादन कम
होता है एवं श्रमिकों की आवश्यकता भी कम होती है| ये उद्योग सामान्यत:प्रदूषण नहीं
फैलाते है |इन उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण कारक सड़कों के जाल द्वारा
अभिगम्यता होती है| जिससे सामान आसानी से बाजार तक पहुँच जाए| उदाहरण के लिए
स्विट्जरलैंड का घड़ी उद्योग एक स्वछंद उद्योग तथा भारत के हरियाणा में स्थित
गुरुग्राम का मोटर गाडी उद्योग आदि |
प्रश्न: प्राथमिक एवं द्वितीयक
क्रियाओं में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
प्राथमिक एवं
द्वितीयक क्रियाओं में निम्नलिखित अन्तर है |
प्राथमिक क्रियाएँ |
द्वितीयक क्रियाएँ |
1) जिन
क्रियाओं में मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त संसाधनों का सीधा प्रयोग करके अपनी
आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की पूर्ति करता है | उन्हे
प्राथमिक क्रियाएँ कहते है | 2) इस
प्रकार की क्रियाओं में प्रकृति से प्राप्त पदार्थों का सीधा उपयोग किया जाता है
| उन्हे साफ, परिष्कृत तथा परिवर्तित नहीं किया
जाता है | 3) इस
प्रकार की क्रियाओं में प्रकृति से प्राप्त पदार्थों का उपयोग करके नयी वस्तुओं
का निर्माण नहीं किया जाता है | 4) इन
आर्थिक क्रियाओं के अंतर्गत आखेट (शिकार करना),
भोजन संग्रह, पशुचारण, मछ्ली पकड़ना
(मत्स्य पालन), वनों से लकड़ी काटना ,
कृषि तथा खनन कार्य शामिल किए जाते है | |
1) वे
क्रियाएँ जिनमें मनुष्य प्रकृति द्वारा
प्राप्त संसाधनों का सीधा प्रयोग न करके
उन्हे साफ, परिष्कृत तथा परिवर्तित किया जाता है | उन्हे द्वितीयक क्रियाएँ कहते है | 2) ये
वे क्रियाएँ जिनमें मनुष्य प्रकृति
द्वारा प्राप्त संसाधनों का सीधा प्रयोग
न करके उन्हे साफ, परिष्कृत तथा परिवर्तित
किया जाता है | 3) इस
प्रकार की क्रियाओं में प्रकृति से प्राप्त पदार्थों का उपयोग करके नयी वस्तुओं
का निर्माण किया जाता है | 4) इन
आर्थिक क्रियाओं में सभीप्रकार के निर्माण उद्योग के कार्य जैसे लौह अयस्क से
लौह इस्पात बनाना, कपास से सूती वस्त्र बनाना, गन्ने से चीनी तथा गुड़ बनाना आदि शामिल किए जाते है | |
प्रश्न: विश्व के विकसित
देशों के उद्योगों के संदर्भ में आधुनिक औद्योगिक क्रियाओं की मुख्य प्रवृतियों की
विवेचना कीजिये ?
या
आधुनिक बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण की विशेषताएँ बताओ |
उत्तर: विश्व के विकसित देशों के
उद्योगों के संदर्भ में वर्तमान समय में आधुनिक औद्योगिक क्रियाओं के अंतर्गत बड़े
पैमाने पर होने वाले विनिर्माण की निम्नलिखित
विशेषताएँ पाई जाती है |
1) कौशल का विशिष्टीकरण या उत्पादन की
विधियों का विशिष्टीकरण
2) मशीनीकरण या यंत्रीकरण
3) प्रौद्योगिक नवाचार
4) संगठनात्मक ढांचा एवं स्तरीकरण
5) अनियमित भौगोलिक वितरण
इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
प्रकार से है|
1) कौशल का विशिष्टीकरण या उत्पादन की
विधियों का विशिष्टीकरण
शिल्प विधि से कारखानों में थोड़ा ही सामान उत्पादित किया जाता
है| जो आदेश अनुसार
बनाया जाता है| जिसके कारण इसकी लागत अधिक होती है| जबकि दूसरी ओर अधिक उत्पादन का संबंध बड़े पैमाने पर बनाए जाने वाले सामान
से है| जिसमें प्रत्येक कारीगर निरंतर एक ही प्रकार का कार्य
करता है| क्योंकि उसे उसमें कुशलता प्राप्त होती है|
2) मशीनीकरण या यंत्रीकरण
यंत्रीकरण से अभिप्राय किसी कार्य को पूरा करने के लिए मशीनों
का प्रयोग करना है| स्वचालित मशीनें या स्वचालित यंत्रीकरण इसकी विकसित अवस्था है जिसमें
निर्माण प्रक्रिया में मानव की सोच को शामिल किए बिना सारा काम मशीनों से किया
जाता है| आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों में पुनर्निवेशन एवं
संवृत-पाश कम्प्युटर नियंत्रण प्रणाली के द्वारा चलने वाले कारखाने जिनमें मशीनों
को सोचने के लिए विकसित किया गया है पूरे विश्व में नज़र आने लगे है |
3) प्रौद्योगिक नवाचार
प्रौद्योगिक नवाचार से अभिप्राय उद्योगों में नई प्रौद्योगिकी
के नये नये तरीकों के द्वारा विकसित करना है | प्रौद्योगिक नवाचार के अंतर्गत निम्नलिखित
पहलुओं को शामिल किया जाता है|
e)
शोध एवं विकासमान युक्तियों के द्वारा विनिर्माण की गुणवत्ता
को नियंत्रित करना |
f)
अपशिष्टों का निस्तारण करना |
g)
अदक्षता या अकुशलता को समाप्त करना |
h)
प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष करना |
4) संगठनात्मक ढांचा एवं स्तरीकरण
आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों के संगठनात्मक ढांचे एवं
स्तरीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ है|
f)
एक जटिल नई प्रौद्योगिकी यंत्र
g)
अत्यधिक विशिष्टीकरण एवं श्रम विभाजन के द्वारा कम प्रयास और
अल्प लागत से अधिक माल का उत्पादन करना
h)
अधिक पूंजी
i)
बड़े संगठन
j)
प्रशासकीय अधिकारी वर्ग
5) अनियमित भौगोलिक वितरण
आधुनिक उद्योगों का सबसे महत्व पहलू यह है की विश्व स्तर पर
इनका वितरण बहुत ही अनियमित और असमान है| आधुनिक निर्माण के मुख्य सकेन्द्र्ण कुछ ही
स्थानों में सीमित है| विश्व के कुल स्थलीय भाग के 10
प्रतिशत भाग पर ही इन उद्योगों का विस्तार है| बहुत से
क्षेत्र औद्योगिक विकास से वंचित ही है| जिन देशों में
औद्योगिक विकास हुआ है वे देश आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से शक्ति के केंद्र बन गए|
कुल क्षेत्र को आच्छादित की दृष्टि से विनिर्माण स्थल, प्रक्रियाओं की
अत्यधिक गहनता के कारण बहुत कम स्पष्ट है| उद्योगों का
क्षेत्र कृषि के क्षेत्र की तुलना में बहुत कम है| इसी कारण
से औद्योगिक क्षेत्रों में कृषि क्षेत्रों से अधिक गहनता होती है| यहाँ कृषि की अपेक्षा बहुत अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया जाता है|
उदाहरण के तौर पर अमेरिका के मक्के की पेटी के 2.5 वर्ग किलोमीटर में
साधारणतया चार बड़े फार्म है जिसमें 10 से 20 श्रमिक ही कार्य करते है जिनसे 50 से
100 लोगों का भरण-पोषण होता है| परंतु इतने ही क्षेत्र में वृहद समाकलित
कारखानों को समाविष्ट किया जा सकता है और हजारों श्रमिकों को रोजगार दिया जा सकता
है|
प्रश्न: अधिकतर देशों में उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योगों का प्रमुख महानगरों के परिधि क्षेत्रों में ही क्यों विकसित
हो रहे है ? व्याख्या कीजिये |
उत्तर: निर्माण क्रियाओं में उच्च
प्रौद्योगिकी उद्योग नवीनतम पीढ़ी के उद्योग है |
इन उद्योगों के लिए उच्च कोटि की प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है |
जिनमें निरंतर शोध और विकास किया जाता है| इन निरंतर शोध और विकसित की गयी
प्रौद्योगिकी का प्रयोग के द्वारा उन्नत वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग उत्पादों का
निर्माण किया जाता है|
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों का प्रमुख महानगरों
के परिधि क्षेत्रों में ही विकसित होने के निम्नलिखित कारण है|
1) उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों के
अधिकांश उत्पादों के लिए बाजार महानगरों में ही उपलब्ध होते है|
2) उच्च प्रौद्यिगिकी के युक्त विशिष्ट
और कुशल श्रमिक जो इन उद्योगों के विकास लिए महत्वपूर्ण है निकट के क्षेत्रों से
आसानी से मिल जाते है |
3) आधुनिक परिवहन एवं संचार सेवाएं भी
महानगरों में ही उपलब्ध होतें है|
4) महानगरों के परिधि क्षेत्रों में
भूमि सस्ती उपलब्ध हो जाती है|
5) महानगरों के परिधि क्षेत्रों के पास
सुखद वातावरण उपलब्ध हो जाता है |
6) कारखानों कों बहुमंजिला बनाने और
उनके विस्तार के लिए महानगरों के परिधि क्षेत्रों में स्थान उपलब्ध होता है|
प्रश्न: अफ्रीका में
अपरिमित प्राकृतिक संसाधन है, फिर भी औद्योगिक दृष्टि से यह बहुत पिछड़ा महाद्वीप
है | समीक्षा कीजिये |
उत्तर: अफ्रीका महाद्वीप प्राकृतिक
संसाधनों की दृष्टि से बहुत अधिक धनी है | इस महाद्वीप के विशाल क्षेत्र पर उष्ण
कटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते है | यहाँ के पठारी क्षेत्र खनिज सम्पदा के अपार
भण्डार है | यहाँ अनेक प्रकार के खनिज जैसे खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, लौह-अयस्क,
कोयला, यूरेनियम, तांबा, बॉक्साईट, सोना, हीरे, कोबाल्ट तथा जस्ता आदि महत्वपूर्ण
खनिज पाए जाते है | एक अनुमान के अनुसार यहाँ की नदियों में विश्व की 40 प्रतिशत जलविद्युत उत्पन्न करने की अपार संभावनाएँ है
| फिर भी औद्योगिक दृष्टि से यह बहुत
पिछड़ा महाद्वीप है जिसके निम्नलिखित कारण
है |
1) अफ्रीका के अधिकांश देश यूरोपीय
शक्तियों के अधीन रहे जिन्होंने यहाँ की प्राकृतिक संपदा का अत्यधिक दोहन किया और यहाँ पर उद्योगों का
विकास नहीं किया | यूरोपीय शक्तियों के अधीन रहने के कारण यहाँ के अधिकतर देश अब
भी आर्थिक विकास के प्रथम चरण में ही है |
2) यहाँ पर आधारभूत अवसंरचना जैसे
परिवहन और संचार का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है |
3) इन देशों में प्रौद्योगिकी की कमी है
जिससे भी यहाँ जिससे खनिजों का सही उपयोग करने के उद्योगों का विकास नहीं हुआ है |
4) इस महाद्वीप के अधिकतर देशों
में कुशल श्रम की कमी है |
5) यहाँ उद्योगों के विकास के लिए
पर्याप्त पूँजी का अभाव है |
प्रश्न: द्वितीयक
क्रियाकलाप किसे कहते है ?
उत्तर: वे क्रियाकलाप जिनसे प्राथमिक
उत्पादों को अधिक उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है द्वितीयक क्रियाकलाप
कहलाते हैं |
प्रश्न: विनिर्माण का
शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर: विनिर्माण का शाब्दिक अर्थ है
‘हाथ से बनाना’
प्रश्न: यंत्रीकरण से
अभिप्राय किसे कहते है?
उत्तर: यंत्रीकरण से अभिप्राय किसी
कार्य को पूरा करने के लिए मशीनों का प्रयोग करना है|
प्रश्न: यंत्रीकरण की
विकसित अवस्था क्या है ?
उत्तर: स्वचालित मशीनें या स्वचालित
यंत्रीकरण इसकी विकसित अवस्था है जिसमें निर्माण प्रक्रिया में मानव की सोच को
शामिल किए बिना सारा काम मशीनों से किया जाता है|
प्रश्न: प्रौद्योगिक
नवाचार से क्या अभिप्राय है |
उत्तर: प्रौद्योगिक नवाचार से
अभिप्राय उद्योगों में नई प्रौद्योगिकी के नये नये तरीकों के द्वारा विकसित करना
है |
प्रश्न: विश्व के कुल
स्थलीय भाग के कितने प्रतिशत भाग पर ही इन उद्योगों का विस्तार है?
उत्तर: 10 प्रतिशत भाग पर
प्रश्न: विनिर्माण की सबसे
छोटी इकाई क्या कहलाती है?
उत्तर: विनिर्माण की सबसे छोटी इकाई
घरेलू अथवा कुटीर उद्योग कहलाते है|
प्रश्न: वे उद्योग जो इस
बात पर निर्भर नहीं है कि उनके कच्चे माल के भार में कमी होगी या नहीं किस प्रकार
के उद्योग है |
उत्तर: स्वछंद उद्योग (फूटलूज इंडस्ट्रीज)
प्रश्न: दो कृषि आधारित
उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: चीनी तथा सूती वस्त्र उद्योग
प्रश्न: दो वन आधारित उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: फर्नीचर, कागज उद्योग और इमारती
लकड़ी के उद्योग आदि |
प्रश्न: दो रसायन आधारित
उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: पेंट, वार्निश, प्लास्टिक, कृत्रिम
रेशे,काँच आदि चीनी मिट्टी के बर्तन उद्योग आदि |
प्रश्न: दो खनिज आधारित
उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: लौह-इस्पात उद्योग, एल्युमिनियम
उद्योग,तांबा प्रगलन उद्योग, हीरे जवाहरात के उद्योग आदि |
प्रश्न: दो पशु आधारित
उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: चमड़ा उद्योग तथा ऊनी वस्त्र
उद्योग आदि
प्रश्न: दो निजी(व्यक्तिगत)
या प्राइवेट स्वामित्व के उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: रिलाइंस इण्डिया लिमिटेड,
टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी, पतंजलि इंडिया लिमिटेड तथा भारती एयरटेल आदि |
प्रश्न: दो सार्वजनिक
(सरकारी) स्वामित्व के उद्योगों के नाम
बताओ |
उत्तर:भारतीय रेलवे, भारत हैवी
इलेक्ट्रोनिक लिमिटेड, स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) तथा इंडियन एअरलाइंस
आदि |
प्रश्न: दो उपभोक्ता के उद्योगों के नाम बताओ |
उत्तर: साबुन उद्योग, चाय उद्योग, टेलीविजन
उद्योग और साईकिल उद्योग आदि |
प्रश्न 26. प्राथमिक क्रियाकलाप करने वाले लोगों कों किस प्रकार की कॉलर के श्रमिक
कहा जाता है और क्यों ?
उत्तर: प्राथमिक क्रियाकलाप करने वाले लोगों कों
लाल कॉलर श्रमिक कहते है क्योंकि इनका कार्य क्षेत्र इनके घरों से बहार होता है |
प्रश्न: सफ़ेद कॉलर श्रमिक कौन
से श्रमिक होते है ?
उत्तर: वे व्यवसायिक श्रमिक उच्च,
दक्ष एवं विशिष्ट होते है| उन्हें सफ़ेद कॉलर श्रमिक भी कहा जाता है|
प्रश्न: नीली कॉलर वाले कौन
से श्रमिक होते है ?
उत्तर: वास्तविक उत्पादक श्रमिकों कों नीली कॉलर वाले कहते है|
प्रश्न: जर्मनी का रूहर
क्षेत्र किस खनिज के लिए जाना जाता है?
उत्तर: कोयला |
प्रश्न: जर्मनी का रूहर
क्षेत्र किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है?
उत्तर: लौह-इस्पात
प्रश्न: कच्चा लोहा (पिग आयरन) किसे कहते है ?
उत्तर: लोहा प्राप्त करने के
लिए लौह-अयस्क कों झोंका भट्टी में कोक
(कार्बन) एवं चूना पत्थर के साथ प्रगलन
(पिघलाया) किया जाता है | यह पिघला हुआ लौह बाहर निकालकर ठंडा हो जाता है
तो इसे कच्चा लोहा (पिग आयरन) कहते है |
प्रश्न: संयुक्त राज्य
अमेरिका के किस क्षेत्र कों जंग का कटोरा के
नाम से पुकारा जाता है ?
उत्तर: पिट्सबर्ग कों जंग का कटोरा
के नाम से पुकारा जाता है |
प्रश्न: उद्योग किसे कहते
है ?
उत्तर:: श्रम विभाजन और मशीनों के
व्यापक प्रयोग से अभिलक्षित क्रमिक उत्पादन कों उद्योग कहते है |
प्रश्न: औद्योगिक क्रान्ति
कों परिभाषित करे |
विनिर्माण प्रक्रिया में परिवर्तन का
समय जिसमें हाथ के द्वारा चलने वाली मशीनों (हस्तचालित यंत्रों) के स्थान पर उर्जा
(शक्ति ) से चलने वाली मशीनों का उपयोग शुरू हुआ औद्योगिक क्रान्ति के नाम से जाना
गया | इस क्रान्ति की शुरूआत इंग्लैंड में हुई |
प्रश्न: लौह-इस्पात उद्योग
कों आधारभूत उद्योग क्यों कहते है ?
उत्तर: लौह-इस्पात उद्योग आधुनिक
सभ्यता की आधारशिला है | यह उद्योग अन्य सभी उद्योगों का आधार है | यह उद्योग अनेक
छोटे बड़े उद्योगों की आधारभूत सामाग्री जैसे मशीन और औजार आदि के लिए कच्चामाल
प्रदान करता है | इसलिए इस उद्योग कों आधारभूत उद्योग भी कहते है |
प्रश्न: लौह-इस्पात उद्योग
कों भारी उद्योग क्यों कहते है ?
उत्तर: इस उद्योग कों भारी उद्योग भी
कहते है क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में भारी भरकम कच्चा माल उपयोग में लाया जाता है
और इसका तैयार माल भी भारी होता है |
प्रश्न: भारी उद्योग और
कृषि उद्योग में अन्तर स्पष्ट करो |
उत्तर: भारी उद्योग और कृषि उद्योग
में निम्नलिखित अन्तर है |
कृषि
उद्योग |
भारी
उद्योग |
1)
ये
प्राय: प्राथमिक उद्योग होते है | 2)
ये
उद्योग खनिजों पर आधारित होते है | 3)
इन
उद्योगों में मानवीय श्रम के साथ-साथ मशीनों का प्रयोग होता है | 4)
ये
श्रम प्रधान उद्योग है | 5)
इसमें
प्राय: छोटे तथा मध्यम पैमाने के उद्योग लगाए जाते है | 6)
पटसन
उद्योग, चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग आदि कृषि आधारित उद्योग है | |
1)
ये
प्राय: आधारभूत उद्योग होते है | 2)
ये
उद्योग कृषि पर आधारित होते है | 3)
इन
उद्योगों में शक्ति चालित बड़ी और भारी मशीनों का प्रयोग होता है | 4)
ये
पूँजी प्रधान उद्योग है | 5)
इसमें
प्राय: बड़े पैमाने के उद्योग लगाए जाते है | 6)
लौह-इस्पात
उद्योग, वायुयान उद्योग, तांबा प्रगलन उद्योग आदि भारी उद्योग है | |