Sunday, February 27, 2022

Bhaurmur Integrated Tribal Development Programme LESSON 9 CLASS 12TH GEOGRAPHY

भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम

            भरमौर जनजातीय क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसे भारत सरकार के द्वारा 21नवम्बर 1975 में अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र घोषित किया था | इस क्षेत्र में ‘गद्दी’ जनजातीय समुदाय के लोग रहते है | इस समुदाय की हिमालय क्षेत्र में अपनी अलग पहचान है | क्योंकि गद्दी लोग ऋतु प्रवास करते है | ये गद्दीयाली भाषा बोलते हैं |

भौगोलिक स्थिति तथा क्षेत्रफल

इस जनजातीय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले की दो तहसीलें भरमौर और होली शामिल है | यह क्षेत्र 320 11’ उत्तर से  320 41’ उत्तरी अक्षांशों तथा 760 22’ पूर्व से 760  53’ पूर्व देशान्तरों के बीच स्थित है | यह प्रदेश लगभग 1888 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  का धरातल

इस जनजातीय क्षेत्र का अधिकतर भाग 1500 मीटर से 3700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच स्थित है | गद्दी जनजाति की आवास भूमि कहलाया जाने वाला यह प्रदेश चारों दिशाओं में ऊँचे पर्वतों से घिरा हुआ है | इसके उत्तर में पीरपंजाल तथा दक्षिण में धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ है | पूर्व में धौलाधार श्रेणी का फैलाव रोहतांग दर्रे के पास पीरपंजाल श्रेणी से मिलता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की प्रमुख नदियाँ

            इस क्षेत्र में रावी प्रमुख नदी है | इसकी सहायक नदियाँ बुढील और टुंडेन है | ये नदियाँ इस क्षेत्र में गहरे महाखड्डों का निर्माण करती हैं | ये नदियाँ इस पहाड़ी क्षेत्र कों होली, खणी, कुगती  तथा दुहान्ड (तुन्दाह)  नामक चार भूखंडों में विभाजित करती हैं |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जलवायु

इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है | शरद ऋतु में जमा देने वाली कडाके की सर्दी और बर्फ पड़ती है | यहाँ का औसत मासिक तापमान जनवरी में 40 सेल्सियस और जुलाई में 260  सेल्सियस होता है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित करने वाले कारक

निम्नलिखित कारकों ने भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की अर्थव्यवस्था और समाज कों प्रभावित किया है |

1         इस क्षेत्र की जलवायु कठोर है |

2         यहाँ आधारभूत संसाधन कम हैं |

3         यहाँ का पर्यावरण क्षण भंगुर है |

 

भरमौर जनजातीय क्षेत्र  की जनसंख्या संबंधी विशेषताएँ

 

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, भरमौर उपमंडल की जनसंख्या  39113थी | यहाँ का जनसंख्या घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है | यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के  आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है | ऐतिहासिक रूप से गद्दी जनजाति ने भौगोलिक और आर्थिक अलगाव का अनुभव किया है | इसलिए सामाजिक और आर्थिक विकास से वंचित रही है | यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं इससे संबंधी क्रियाएँ जैसे भेड़ और बकरी पालना है |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया 1970 के दशक में शुरू हुई | जब गद्दी लोगों कों अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया गया | सन् 1974 में पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जनजातीय उपयोजना शुरू की गई | हिमाचल प्रदेश में पाँच क्षेत्रों कों समन्वित जनजातीय विकास परियोजना के तहत चुना गया | जिनमें से भरमौर क्षेत्र कों भी समन्वित जनजातीय विकास परियोजना  (Integrated Tribal Development Programme) का दर्जा मिला |  

            इस योजना का उद्देश्य गद्दियों के जीवन स्तर में सुधार करना और भरमौर तथा हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के बीच में विकास के अन्तर कों कम करना है | इस योजना के अंतर्गत परिवहन तथा संचार, कृषि और इससे संबंधित क्रियाओं तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं के विकास कों प्राथमिकता दी गई |

भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना का योगदान  

 भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना से निम्नलिखित महत्वपूर्ण  योगदान दिए है |

1         इस क्षेत्र में जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान विद्यालयों, जन - स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना का विकास है | होली तथा खणी क्षेत्रों में रावी नदी के साथ बसे गाँव अवसंरचना विकास से  सबसे अधिक लाभान्वित हुए है | इकुगती  तथा दुहान्ड (तुन्दाह)   क्षेत्रों के दूरदराज के गाँव अभी भी इस विकास की परिधि से बाहर है |

2         इस क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास उपयोजना लागू होने से कई सामाजिक लाभ हुए है | जिनमें साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात में सुधार और बाल विवाह में कमी आना आदि शामिल है |

3         इस क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर जो  सन् 1971 में  1.88 प्रतिशत थी वह सन् 2011 में बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई |

4         गद्दियों की परम्परागत अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह कृषि व पशुचारण पर आधारित थी जिनमें खाद्यान्नों के उत्पादन और पशुपालन पर बल दिया जाता था | परन्तु 20वीं शताब्दी  के अंतिम तीन दशकों के दौरान, भरमौर क्षेत्र में दालों और अन्य नकदी फसलों की खेती में बढोतरी हुई है |

5         इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में पशुचारण का महत्व कम हुआ है | पशुचारण के घटते महत्व कों इस बात से आँका जा सकता है कि आज कुल पारिवारिक इकाइयों का दसवाँ भाग ही ऋतु प्रवास करता है | परन्तु गद्दी जनजाति आज भी बहुत गतिशील है | क्योंकि इनकी एक बड़ी संख्या शरद ऋतु में कृषि और मजदूरी करके आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करती है |      

Wednesday, February 23, 2022

Planning : Meaning and Types, Hill Area Development Programme and Drought Prone Area Development Programme

 

नियोजन: नियोजन एक ऐसी प्रकिया है जिसके अंतर्गत  सोच विचार की प्रकिया, कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करना तथा उद्देश्यों कों प्राप्त करने हेतु गतिविधियों का क्रियान्वयन शामिल किया जाता है |

नियोजन की प्रकिया में  शामिल तत्व :

नियोजन की प्रकिया में निम्नलिखित कों  शामिल किया जाता है |

1)      सोच विचार की प्रकिया,

2)      कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करना

3)      उद्देश्यों कों प्राप्त करने हेतु गतिविधियों का क्रियान्वयन

 नियोजन के उपागम: सामान्यतः नियोजन के दो उपागमन होते है |

1.       खण्डीय (Sectoral) नियोजन

2.       प्रादेशिक उपागम नियोजन

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

             1.       खण्डीय (Sectoral) नियोजन

खण्डीय (Sectoral) नियोजन का अर्थ है अर्थव्यवस्था के विभिन्न खण्डों (क्षेत्रों ) जैसे कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा,  निर्माण, परिवहन, संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना तथा उनको लागू करना |

 2.       प्रादेशिक  नियोजन

किसी भी देश में सभी क्षेत्रों में एक समान आर्थिक विकास नहीं हुआ है | परिणाम स्वरूप कुछ क्षेत्र बहुत अधिक विकसित हो गए है और कुछ पिछड़े हुए है | जो बताता है कि विकास समान रूप से नहीं हुआ है | जब पिछड़े क्षेत्रों कों विकसित करने के लिए स्थानिक परिपेक्ष्य कों ध्यान में रखकर नियोजन किया जाता है | तो इस प्रकार के नियोजन कों प्रादेशिक नियोजन कहते है | इस प्रकार के नियोजन से प्रादेशिक असंतुलन भी कम होता है |

लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह नियोजन के उपागमों  कों प्रस्तुत करने के कारण

या

लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह नियोजन की आवश्यकता

हम जानते हैं कि एक क्षेत्र का आर्थिक विकास उसके संसाधनों पर निर्भर करता है | लेकिन कभी- कभी संसाधनों से भरपूर क्षेत्र भी पिछड़े रह जाते है | क्योंकि संसाधनों के साथ-साथ तकनीक और निवेश की भी आर्थिक विकास के लिए बहुत अधिक आवश्यकता होती है |

            भारत में भी लगभग डेढ़ दशक के नियोजन अनुभवों से नियोजकों ने यह महसूस किया कि आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन प्रबलित होता जा रहा है | क्षेत्रीय और सामाजिक आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने विशेष उपागमों के द्वारा नियोजन करने की सोची | इसलिए नियोजन के लिए  लक्ष्य क्षेत्र तथा लक्ष्य समूह उपागमों कों प्रस्तुत किया गया |

लक्ष्य क्षेत्र विकास  कार्यक्रम (Target Area Development Programme)

 क्षेत्रीय आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने कुछ क्षेत्रों कों चिन्हित करके उन्हें लक्ष्य क्षेत्र मानकर उनके विकास हेतु विभिन्न कार्यक्रम शुरू किए गए |

जैसे- कमान नियंत्रित क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम तथा पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम

 लक्ष्य समूह विकास  कार्यक्रम (Target Group Development Programme)

सामाजिक आधार पर आई विषमताओं की प्रबलताओं कों काबू में रखने के लिए भारत के योजना आयोग ने कुछ सामाजिक समूहों कों चिन्हित करके उन्हें लक्ष्य समूह  मानकर उनके विकास हेतु विभिन्न कार्यक्रम शुरू किए गए |

जैसे - लघु कृषक विकास संस्था (SFDA), सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA) आदि |

 पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme )

पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम कों पाँचवी पंचवर्षीय योजना (1974 -79) में प्रारम्भ किया गया था | इस कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश से सभी पर्वतीय जिले जो वर्तमान में उत्तराखंड में शामिल है, असम की मिकरी पहाड़ी, और उत्तरी कछार पहाडियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला और तमिलनाडु के नीलगिरी आदि कों मिलाकर कुल 15 जिले शामिल किए गए है |

            सन् 1981 पिछड़े क्षेत्रों पर बनी राष्ट्रीय समिति ने उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों कों पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल करने की सिफ़ारिश की थी जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उप-योजना शामिल नहीं है |

पहाड़ी क्षेत्रों में विकास के लिए सुझाव

पिछड़े क्षेत्रों पर बनी राष्ट्रीय समिति ने निम्नलिखित बातों कों ध्यान में रख कर पहाड़ी क्षेत्रों में विकास के लिए सुझाव दिए थे |

1.       सभी लोग लाभान्वित हो, केवल प्रभावशाली व्यक्ति ही नहीं |

2.       स्थानीय संसाधनों और प्रतिभाओं का विकास करना |

3.       जीविका निर्वाह अर्थव्यवस्था कों निवेश मुखी अर्थव्यवस्था बनाना |

4.       अंत: प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े क्षेत्रों का शोषण ना हो |

5.       पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में सुधार करके श्रमिकों कों लाभ पहुँचना |

6.       पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखना |

पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम के उद्देश्य

 पहाड़ी क्षेत्र के विकास कों विस्तृत योजनाएँ इनके स्थलाकृतिक, पारिस्थितिकीय, सामाजिक तथा आर्थिक दशाओं कों ध्यान में रखकर बनाई गई | इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था | इसलिए संसाधनों के विकास तथा दोहन के लिए योजनाएँ बनाई गई | ये कार्यर्क्रम पहाड़ी क्षेत्रों में बागवानी का विकास, रोपण कृषि, पशुपालन. मुर्गी पालन, वानिकी, लघु तथा ग्रामीण उद्योगों का विकास करने के लिए स्थानीय संसाधनों कों उपयोग में लाने के उद्देश्य से बनाए गए |  

 सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम

इस कार्यक्रम की शुरुआत चौथी पंचवर्षीय योजना में हुई | इस कार्यक्रम का उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों कों रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव कों कम करने के लिए उत्पादन के साधनों कों विकसित कारण था |

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में इसके कार्यक्षेत्र कों और विकसित किया गया | प्रारम्भ में इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है | परन्तु बाद में इन कार्यक्रम के अंर्तगत सूखा प्रभावी क्षेत्रों में समन्वित विकास पर बल दिया गया | जिसके लिए सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह विकास और आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना जैसे विद्युत, सड़कों बाजार, ऋण सुविधाओं और सेवाओं पर जोर दिया गया | इस कार्यक्रम में राज्य के सामान्य प्रयत्नों के अतिरिक्त केन्द्र सरकार के द्वारा भी सहायता उपलब्ध कराई गई थी |

पिछड़े क्षेत्रों के विकास की समिति ने इस कार्यक्रम की समीक्षा की जिसमें यह पाया गया कि यह कार्यक्रम मुख्यतः कृषि तथा इससे संबंधित सेक्टरों (क्षेत्रों ) के विकास तक ही सीमित है और पर्यावरण संतुलन पुनःस्थापना पर इस कार्यक्रम में विशेष बल दिया गया है |

यह भी महसूस किया गया कि जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार लगातार बढ़ रहा है | जिससे कृषक अधिक कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए सीमांत भूमि का उपयोग करने के लिए बाध्य हो रहे हैं | इससे पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड रहा है |

फलस्वरूप सूखा संभावी क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करना अति आवश्यक हो गया है | ऐसे क्षेत्रों का विकास करने की रणनीतियों में सूक्ष्म – स्तर पर समन्वित जल –संभर विकास कार्यक्रम अपनाना शामिल है |

अत: सूखा संभावी क्षेत्रों के विकास की रणनीति में जल, मिट्टी, पौधों , मानव तथा पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन, पुनःस्थापन पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए |

भारत में सूखा संभावी क्षेत्र

सन् 1967 में योजना आयोग ने देश में 67 जिलों (पूर्ण या आंशिक) की पहचान सूखा संभावी जिलों के रूप में की थी | सन् 1972 में सिंचाई आयोग ने 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र का मापदण्ड लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया |

भारत में सूखा संभावी क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के मराठावाडा क्षेत्र, आंध्रप्रदेश के रायलसीमा तथा तेलगांना पठार, कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि तथा आंतरिक भाग के शुष्क तथा अर्धशुष्क भागों में फैलें हुए हैं | पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते है |   

Monday, February 14, 2022

SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS CLASS 10TH LESSON 1 POWER SHARING

 

अध्याय-1

सत्ता की साझेदारी

(लोकतांत्रिक राजनीति -2)

कक्षा -10

 

प्रश्न 1: बेल्जियम किस महाद्वीप में स्थित है ?

उत्तर: यूरोप

प्रश्न 2 : बेल्जियम की सीमाएँ किन देशों से लगती है ? (बेल्जियम के पडोसी देश कौन से हैं ?)

उत्तर : नीदरलैंड, यूक्रेन तथा जर्मनी

प्रश्न 3:  बेल्जियम का क्षेत्रफल भारत के किस राज्य के क्षेत्रफल से भी कम है ?

उत्तर: हरियाणा

प्रश्न 4: बेल्जियम की आबादी कितनी है ?

उत्तर: एक करोड़ से थोड़ी अधिक

प्रश्न 5: बेल्जियम की आबादी भारत के किस राज्य की आबादी से लगभग आधी है ?

उत्तर: हरियाणा

प्रश्न 6: बेल्जियम की कुल आबादी कितना प्रतिशत हिस्सा फ्लेमिश इलाके में रहता है ?

उत्तर: 59 प्रतिशत

प्रश्न 7: बेल्जियम में फ्लेमिश इलाके रहने वाले लोग कौन-सी भाषा बोलते है ?

उत्तर: डच

प्रश्न 8: बेल्जियम की कुल आबादी कितना प्रतिशत हिस्सा वेलोनिया इलाके में रहता है ?

उत्तर : 40 प्रतिशत

प्रश्न 9: बेल्जियम में वेलोनिया इलाके रहने वाले लोग कौन-सी भाषा बोलते है ?

उत्तर : फ्रेंच

प्रश्न 10: बेल्जियम की राजधानी का नाम बताओ ?

उत्तर : ब्रुसेल्स

प्रश्न 11: बेल्जियम में कितने प्रतिशत लोग जर्मन भाषा बोलते है ?

उत्तर : एक प्रतिशत

प्रश्न 12: बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में कितने प्रतिशत लोग डच भाषा बोलते हैं ?

उत्तर : 20 प्रतिशत

प्रश्न 13: बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में कितने प्रतिशत लोग फ्रेंच भाषा बोलते हैं ?

उत्तर : 80 प्रतिशत

प्रश्न 14: बेल्जियम में किस भाषा के लोग तुलनात्मक रूप से ज्यादा समृद्ध और ताकतवर रहे है ?

उत्तर : फ्रेंच

प्रश्न 15: बेल्जियम में फ्रेंच और डच और भाषा बोलने वाले समुदायों के लोगों के बीच तनाव कब बढ़ने लगा ?

उत्तर : सन् 1950 और 1960 के दशक में

प्रश्न 16: बेल्जियम के नेताओं ने क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधताओं को ध्यान में रखकर सभी समुदायों के लिए चार संशोधन कब किए ?

उत्तर : सन् 1970 से 1993 के बीच

प्रश्न 17: श्रीलंका कब स्वतंत्र हुआ ?

उत्तर : सन् 1948

प्रश्न 18: श्रीलंका कहाँ स्थित है ? (श्रीलंका की स्थिति बताओ ?)

उत्तर : श्रीलंका एशिया महाद्वीप का देश है |  एक द्वीपीय देश है | यह भारत के तमिलनाडू राज्य के दक्षिणी तट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है |

प्रश्न 19: श्रीलंका की आबादी कितनी है ?

उत्तर : लगभग दो करोड़

प्रश्न 20: श्रीलंका की आबादी भारत के किस राज्य की आबादी से बराबर है ?

उत्तर: हरियाणा

प्रश्न 21: श्रीलंका की आबादी में कितने प्रतिशत लोगों का समूह सिंहली भाषा बोलते है ?

उत्तर : 74 प्रतिशत

प्रश्न 22: श्रीलंका की आबादी में कितने प्रतिशत लोगों का समूह तमिल भाषा बोलता है ?

उत्तर : 18 प्रतिशत

प्रश्न 23: श्रीलंका में तमिल लोगों के दो समूह कौन से है और उनका श्रीलंका की आबादी में कितनेप्रतिशत हिस्सा हैं ?

उत्तर : श्रीलंका में कुल 18 प्रतिशत तमिल है | जिनके दो समूह है |

श्रीलंकाई तमिल – ये 13 प्रतिशत है | हिन्दुस्तानी तमिल – ये 5 प्रतिशत है |

प्रश्न 24: श्रीलंका में अधिकतर सिंहली भाषी लोग किस धर्म के अनुयायी है ?

उत्तर : बौद्ध धर्म

प्रश्न 25: श्रीलंका में अधिकतर तमिल भाषी लोग किन धर्मों के अनुयायी है ?

उत्तर : हिंदू तथा मुस्लिम धर्म

प्रश्न 26: श्री लंका की आबादी में कितने प्रतिशत ईसाई है?

उत्तर : लगभग 7 प्रतिशत

प्रश्न 27: श्रीलंकाई के ईसाई कौन सी भाषा बोलते हैं ?

उत्तर : तमिल तथा सिंहली दोनों भाषाएँ

प्रश्न 28: स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका में किस समुदाय के नेताओं ने अपनी बहुसंख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व जमाना चाहा था ?

उत्तर : सिंहली समुदाय के नेताओं ने

प्रश्न 29: श्री लंका में किस समूह की सरकार बनी ?

उत्तर : सिंहली भाषा बोलने वाले समूह की |

प्रश्न 30: श्रीलंका के नए सविंधान में किस भाषा कों राजभाषा कों दर्जा दिया गया ?

उत्तर : सिंहली भाषा

प्रश्न 31: श्री लंका में विश्वविद्यालयों में प्रवेश तथा नौकरियों में किन कों प्राथमिकता देने की नीति बनाई गई ?

उत्तर : सिंहलियों कों

प्रश्न 32: श्रीलंका के नए सविंधान में किस धर्म कों संरक्षण और बढ़ावा दिया गया ?

उत्तर : बौद्ध धर्म  

प्रश्न 33: 1980 के दशक में उत्तरी –पूर्वी श्रीलंका में किस माँग कों लेकर राजनितिक संगठन बने ?

उत्तर : स्वतंत्र तमिल ईलम (सरकार) बनाने की माँग कों लेकर |

प्रश्न 34:यूरोपीय संघ का मुख्यालय कहाँ स्थित है ?

उत्तर : ब्रुसेल्स

प्रश्न 35: बेल्जियम में किस प्रकार की सरकार है ?

उत्तर : संघीय सरकार

प्रश्न 36: श्रीलंका में किस प्रकार की सरकार है ?

उत्तर : एकात्मक सरकार

प्रश्न 37 : संघीय सरकार किसे कहते है ?

उत्तर : सरकार का वह प्रकार जिसमें शक्तियाँ केन्द्रीय सत्ता और उसको बनाने वाले हिस्सों में बाँटी जाती है उसे संघीय सरकार कहते है |

प्रश्न 38: संघीय सरकार में अधिक शक्तिशाली कौन होता है ?

उत्तर : केन्द्र सरकार

प्रश्न 39:बेल्जियम कब स्वतंत्र हुआ ?

उत्तर : सन् 1830

प्रश्न 40: बेल्जियम की जातीय बनावट कैसी है ?

उत्तर : बेल्जियम में  59 प्रतिशत डच भाषाई, 40 प्रतिशत फ्रेंच भाषी तथा एक प्रतिशत जर्मन भाषा कों बोलने वाले लोग रहते है |

प्रश्न 41: श्रीलंका की जातीय बनावट कैसी है ?

उत्तर : श्रीलंका में 74 प्रतिशत सिंहली भाषी जिनमें अधिकतर बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, 18 प्रतिशत तमिल भाषी है जिनमें हिंदू और  मुस्लिम धर्म के लोग शामिल हैं |   इनके अलावा लगभग 7 प्रतिशत ईसाई धर्म के अनुयायी हैं जो तमिल और सिंहली दोनों भाषाएँ बोलते हैं |  |

प्रश्न 42: खलील कहाँ रहता था ?

उत्तर : लेबनान के बेरुत शहर में

प्रश्न 43: लेबनान की राजधानी का नाम बताओ |

उत्तर : बेरुत

प्रश्न 44: लेबनान में किस धर्म का व्यक्ति राष्ट्रपति बन सकता है ?

उत्तर : मैरोनाईट पंथ का कोई कैथोलिक ईसाई

प्रश्न 45: लेबनान में किस धर्म का व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है ?

उत्तर : सुन्नी मुसलमान

प्रश्न 46: लेबनान में किस धर्म का व्यक्ति उपप्रधानमंत्री बन सकता है ?

उत्तर : आर्थोडॉक्स ईसाई

प्रश्न 47: लेबनान में किस धर्म का व्यक्ति संसद का अध्यक्ष बन सकता है ?

उत्तर : शिया मुसलमान

प्रश्न 48: शासन के विभिन्न अंग कौन से है जिनमें सत्ता का बँटवारा होता है ?

उत्तर : विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका

प्रश्न 49: नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था में सत्ता का बँटवारा किनके बीच होता है ?

उत्तर : नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था में सत्ता का बँटवारा शासन के विभिन्न अंगों विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका  के बीच होता है |

प्रश्न 50: शासन या सरकार के विभिन्न स्तर कौन से हैं जिनमें सत्ता का बँटवारा होता है ?

उत्तर : केन्द्रीय सरकार , राज्य या प्रांतीय (क्षेत्रीय) सरकार तथा स्थानीय सरकार |

प्रश्न 51: सत्ता का क्षैतिज बँटवारा किस तरह होता है ?

उत्तर : जब सत्ता का बँटवारा शासन के विभिन्न अंगों विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका  के बीच होता है | तो उसे सत्ता का क्षैतिज बँटवारा कहते है |

प्रश्न 52: सत्ता का उर्ध्वाधर बँटवारा किस तरह होता है ?

उत्तर : जब सत्ता का बँटवारा शासन के विभिन्न स्तरों पर होता है तो उसे सत्ता का उर्ध्वाधर बँटवारा कहते हैं | जैसे केन्द्रीय स्तर की सरकार , राज्य या प्रांतीय (क्षेत्रीय) स्तर की सरकार तथा स्थानीय स्तर सरकार

प्रश्न 53: नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर की सरकार कों क्या कहते है ?

उत्तर : छोटे शहरों में नगरपालिका या नगर परिषद तथा बड़े नगरों में नगरनिगम

प्रश्न 54: ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय सरकार कों क्या कहते हैं ?

उत्तर : ग्राम पंचायत

प्रश्न 55: गृहयुद्ध किसे कहते है ?

उत्तर : किसी देश (मुल्क) में सरकार विरोधी समूहों की हिंसक लड़ाई ऐसा रूप धारण कर ले  कि वह युद्ध सा लगने लगे तो उस स्थिति कों गृहयुद्ध कहते है |

प्रश्न 56: युक्तिपरक तर्क  या समझदारी का तर्क किस बात पर बल देता है ?

उत्तर : युक्तिपरक तर्क किसी कार्य के लाभकारी परिणामों पर बल देता है | इस प्रकार के तर्क में लाभ-हानि का ध्यान रखकर फैसलें किए जाते है |

प्रश्न 57: नैतिक तर्क किस बात पर बल देता है ?

उत्तर : नैतिक तर्क सत्ता के बँटवारे के अंतर्भूत महत्व कों बताता है | यह नैतिकता पर बल देता है | इस प्रकार के तर्क में लाभ-हानि का ध्यान रखकर फैसलें नहीं किए जाते है |

प्रश्न 58: श्रीलंका की राजधानी का नाम बताओ ?

उत्तर : कोलम्बो

प्रश्न 59: जर्मनी के राजनैतिक दलों के नाम बताओ |

उत्तर : (अ) क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी तथा  (ब) सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी

प्रश्न 60:एथेनिक या जातीय से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : ऐसा समाजिक विभाजन जिसमें हर समूह अपनी-अपनी संस्कृति कों अलग मानता है | यानि साँझी संस्कृति पर आधारित सामाजिक विभाजन है | जिसमें लोग मानते है कि उनकी उत्पत्ति समान पूर्वजों से हुई है लेकिन अब वे अलग धर्म कों मानते है |

Wednesday, January 26, 2022

IRON ORE (Production and distribution in India )

 

लौह अयस्क

लौह अयस्क प्रमुख लौह युक्त धात्विक खनिज है | यह उद्योगों के विकास के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करता है | लौहे कों आज की सभ्यता की रीढ़ भी कहा जाता है | किसी भी प्रदेश के आर्थिक विकास और जीवन स्तर का अनुमान इस बात से भी लगाया जाता है कि वहाँ कितनी मात्रा में लौहे का प्रयोग किया जाता है |  

भारत में लौह अयस्क के भंडार

भारत में लौह अयस्क के प्रचुर संसाधन है | यहाँ एशिया के विशालतम लौह अयस्क के भंडार आरक्षित है | हमारे देश में लौह अयस्क के दो प्रमुख प्रकार हेमेटाइट तथा मैग्नेटाइट पाए जाते है |  ये अयस्क सर्वोतम गुणवत्ता के है इसलिए विश्व के विभिन्न देशों में भारी माँग है  |

      लौह अयस्क की खदानें देश के उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश में कोयला क्षेत्रों के निकट स्थित है जो इसके लिए लाभदायक है |

हमारे देश में 2004-05 में लौह अयस्क के आरक्षित भंडार लगभग 200 करोड़ टन थे  | लौह अयस्क के कुल आरक्षित भंडारों का लगभग 95 प्रतिशत भाग ओडिशा, झारखंड, छतीसगढ़, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में स्थित हैं |

भारत में लौह का उत्पादन तथा वितरण

भारत में सन् 1950-51 में 42 लाख टन लौह-अयस्क का उत्पादन हुआ था जो बढ़कर सन् 2010-11 में  2080 लाख टन हो गया | अत : लौहे के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है | भारत के विभिन्न राज्यों में लौह अयस्क के  वितरण कों निम्न प्रकार से समझा जा सकता है |

कर्नाटक

कर्नाटक भारत के कुल लौह अयस्क उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत (एक चौथाई ) लौह अयस्क पैदा करके प्रथम स्थान पर है | यहाँ लौह अयस्क के निक्षेप वल्लारी जिले के बेलारी, संदूरतथा हासपेट क्षेत्र में लौह अयस्क की खानें है | चिकमंगलूर जिले बाबा बूदन पहाडियों, कालाहांडी तथा केमानगुडी प्रमुख खानें है | इनके अलावा कुद्रेमुख तथा शिवमोगा, चित्रदुर्ग और तुमकुरु जिलों के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं |     

छतीसगढ़

यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक राज्य है | यह राज्य भारत के कुल लौह अयस्क उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत  लौह अयस्क पैदा करता है | इस राज्य में लौह अयस्क की पट्टी दुर्ग, दांतेवाड़ा और बैलाडीला तक विस्तृत है | दांतेवाड़ा जिले का बैलाडीला तथा दुर्ग जिले के डल्ली और राजहरा में देश की महत्वपूर्ण लौह अयस्क की खदानें हैं | इनके अलावा रायगढ़, बिलासपुर तथा सरगुजा अन्य उत्पादक जिले है | यहाँ का अधिकाँश लौहा अयस्क विशाखापट्टनम पत्तन के द्वारा जापान कों निर्यात कर दिया जाता है |

ओडिशा

यहाँ भारत का 19 प्रतिशत से अधिक लौह अयस्क पैदा किया जाता है | इस राज्य में लौह अयस्क सुंदरगढ़, मयूरभंज, झार स्थित पहाड़ी श्रंखलाओं में पाया जाता है | यहाँ की महत्वपूर्ण खदानें गुरुमहिसानी, सुलाएपत, बदामपहाड़ (मयूरभंज), किरुबुरु (केन्दुझर) तथा बोनाई (सुंदरगढ़) है |  

गोवा

पिछले कुछ दशकों से गोवा तेजी से महत्वपूर्ण उत्पादक के रूप में उभरा है | यह राज्य भारत के कुल लौह अयस्क उत्पादन का लगभग 16 प्रतिशत  लौह अयस्क पैदा करके चौथे स्थान पर है |यहाँ का लौहा अयस्क घटिया किस्म का है जिसमें 40 से 60 प्रतिशत तक ही शुद्ध लौहा प्राप्त होता है | यहाँ के लौह अयस्क कों मारमागाओ (मारमागोवा) पत्तन से निर्यात कर दिया जाता है |  

झारखंड

इस राज्य में भारत का 15 प्रतिशत लौह अयस्क का उत्पादन करता है | झारखंड में भी ओडिशा की तरह पहाड़ी श्रंखलाओं में कुछ सबसे पुरानी लौह अयस्क की खदानें है | इस राज्य में लौह अयस्क की अधिकतर खादानें लौह एवं इस्पात संयंत्र के आस पास ही है | नोआमंडी और गुआ जैसी महत्वपूर्ण खदानें इस राज्य के पूर्वी और पश्चिमी जिलों में स्थित है | सिंहभूम, पलामू धनबाद, हजारीबाग, संथाल परगना तथा राँची मुख्य उत्पादक जिले है |

महाराष्ट्र

इस राज्य की प्रमुख खदानें चंद्रपुर, भंडारा और रत्नागिरी जिलों में पाइ जाती है |

तेलंगाना

इस राज्य की मुख्य खदानें करीमनगर , वारांगल जिले में स्थित है |

आन्ध्रप्रदेश

यहाँ के कुरुनूल, कुडप्पा तथा अनंतपुर जिलों में लौह अयस्क के भंडार है |

तमिलनाडु

इस राज्य के सेलम तथा नीलगिरी जिले लौह अयस्क के मुख्य क्षेत्र है |

 हरियाणा

इस राज्य के महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल क्षेत्र में लौह अयस्क के भंडार हैं |