Sunday, July 25, 2021

lesson 1 GEOGRAPHY AS A DISCIPLINE (CLASS -11TH FUNDAMENTAL OF PHYSICAL GEOGRAPHY )

 

कक्षा -11वीं

भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय 1 भूगोल एक विषय के रूप में

भूगोल का अर्थ

भूगोल कों अंग्रेजी भाषा में ज्योग्राफी (Geography) कहा जाता है | जो दो शब्दों Geo + graphy से मिलकर बना है | यह ग्रीक भाषा के शब्द “Geographos” का रूपान्तरण है | जिसमें “Geo” का अर्थ है पृथ्वी और “Graphos” का अर्थ है वर्णन | अत: Geography का अर्थ है पृथ्वी का वर्णन | इस प्रकार भूगोल के विद्वान भूगोल कों मानव निवास के रूप में पृथ्वी का अध्ययन मानते है |

ज्योग्राफी (Geography) शब्द का सबसे पहले प्रयोग ग्रीक विद्वान इरेटोस्थेनीज ने किया था |

भूगोल की परिभाषा

भूगोल का अध्ययन एक विस्तृत अध्ययन है | इसे कुछ शब्दों के द्वारा और सीमाओं में रखकर परिभाषित नहीं किया जा सकता | फिर भी भूगोल के विभिन्न विद्वानों ने भूगोल कों अनेक प्रकार से परिभाषित किया है | उनमें से कुछ की परिभाषाएँ निम्नलिखित है |

अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

मोंकहाउस के अनुसार, “ भूगोल मानव के आवास के रूप में पृथ्वी का विज्ञान है |”

फिन्च और ट्रिवार्था के अनुसार, “ भूगोल भू-पृष्ठ का विज्ञान है | इसमें भूतल पर विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिमानों तथा प्रादेशिक संबंधों के वर्णन एवं व्याख्या करने का प्रयास किया जाता है |”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि एक विषय के रूप में भूगोल मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है |  यह पृत्वी पर पायी जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन भी करता है |  साथ ही वह उन कारकों का भी अध्ययन करता है जिनके प्रभाव से मानव तथा पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों में  ये भिन्नताएँ  पायी जाती है |

स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत किस प्रकार की  जानकारी प्राप्त होती है

            स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल के अंतर्गत तीन मुख्य कारकों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ये निम्नलिखित है |

1.       भौतिक पर्यावरण

2.       मानवीय क्रियाएँ

3.       भौतिक पर्यावरण और मानवीय क्रियाओं के बीच अंतरप्रक्रियात्मक सम्बन्ध  

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल क्यों पढ़ना चहिये

एक छात्र के रूप में हमें भूगोल निम्नलिखित कारणों से पढ़ना चाहिए |

1.       पृथ्वी हमारा घर है | अत: पृथ्वी के विभिन्न घटकों, उसके पर्यावरण और उसके विभिन्न संसाधनों के कारण हमारा जीवन प्रभावित होता है | इन घटकों, हमारे आसपास के पर्यावरण और हमारे लिए उपयोगी संसाधनों का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

2.       विभिन्न संसाधनों  जैसे भूमि, जल, खनिज, मृदा आदि का उपयोग करते हुए हम भोजन प्राप्त करतें है और विभिन्न क्रियाकलाप करते हुए जीवन यापन करते है |  विभिन्न क्षेत्रों में कौन –कौन से संसाधन है और कितनी मात्रा में है उनके क्या उपयोग है इन सभी का अध्ययन हम भूगोल में करते है | इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है |

3.       हम विभिन्न प्रकार  की जलवायु में रहते है और इसी तरह विभिन्न मौसम हमारे जीवन कों प्रभावित करते है | जलवायु और मौसम के तत्वों, उनको प्रभावित करने वाले कारकों  का अध्ययन हम भूगोल के अध्ययन के रूप में करते है और जलवायु और मौसम के मानव जीवन के प्रभावों और उसके कारण उत्त्पन्न भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत ही करते है अत: हमें भूगोल पढ़ना चाहिए |

4.       मानव द्वारा किए जाने वाले  विभिन्न क्रियाकलाप और उनके पर्यावरण पर प्रभावों का अध्ययन हम भूगोल के अंतर्गत करते है इसलिए भी भूगोल का अध्ययन जरुरी है |

5.       विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं के कारण, प्रभाव और उनका क्षेत्रीय अध्ययन हम भूगोल में मुख्य रूप से करते है | साथ ही उनसे निपटने के उपायों का भी अध्ययन इस विषय में प्रमुखता से किया जाता है |

6.       भूगोल विविधता कों समझने और ऐसी विविधताओं कों उत्त्पन्न करने वाले कारकों का अध्ययन करता है  अत: इसका अध्ययन आवश्यक है |

7.        समय और स्थान के साथ होने वाले परिवर्तनों का  अध्ययन भूगोल के अंतर्गत किया जाता है | जिससे इन्हें समझने में आसानी होती है |

8.       भूगोल के द्वारा हम मानचित्र में परिवर्तित ग्लोब कों समझने में सहायता मिलती है |

9.       इस विषय के अध्यन्न से मानचित्र में दिए गए दृश्य कों समझने की क्षमता विकसित होती है |

10.   भूगोल में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों जैसे भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS), कंप्यूटर आधारित मानचित्र कला आदि में आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है जिससे आप राष्ट्रीय स्तर पर अपना योगदान दे सकते है |

भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है          या        

भूगोल बहु-आयामी पृथ्वी का अध्ययन

भूगोल वास्तविकता या यथार्थता का अध्ययन करता है | पृथ्वी की वास्तविकता भी बहु-आयामी है | क्योंकि हम पृथ्वी के विभिन्न भौतिक पक्षों जैसे भौमिकी, मृदा, जलवायु समुद्रों और वनों  के साथ-साथ मानवीय पक्षों जैसे जनसँख्या संबंधी विशेषताएँ जैसे घनत्व, लिंग अनुपात, आर्थिक क्रियाकलाप आदि का अध्ययन करते है जो बहु आयामी हो जाता है | अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्रों विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी की वास्तविक और बहु-आयामी प्रकृति का अध्यन्न भूगोल का मुख्य कार्य है इसलिए ही भूगोल की प्रकृति बहु-आयामी है |

भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन  

भूगोल पृथ्वी का अध्ययन है | भू-तल पर बहुत भिन्नताएँ देखने कों मिलती है | ये भिन्नताएँ प्राकृतिक और सांस्कृतिक वातावरण से सम्बन्धित होती है |  अनेक तत्वों में समानताओं के साथ-साथ असमानताएँ भी होती है इन्ही असमानताओं कों क्षेत्रीय विभिन्नता का नाम दिया जाता है |  इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन हम भूगोल में करते है | अत: भूगोल कों भूगोल क्षेत्रीय विभिन्नता का अध्ययन भी कहते है | क्षेत्रीय विभिन्न्ताओं का अध्ययन करना भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इस प्रकार भूगोल उन सभी तथ्यों का अध्ययन करता है जो क्षेत्रीय संदर्भ में भिन्नता लिए हुए है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए  रिचार्ड हार्टशोर्न  महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

 रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार, “भूगोल का उद्देश्य धरातल की प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन तथा व्याख्या करना है |”

            भूगोल में हम केवल धरातल में विभिन्नता का अध्ययन नहीं करते बल्कि उन कारकों का भी अध्ययन करते है जो इन विभिन्नताओं के कारण है | उदाहरण के लिए फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन्न होता है  किन्तु यह भिन्नता मिट्टी, जलवायु, बाज़ार कि माँग, किसानों की व्यय क्षमता और तकनीकी निवेश कि उपलब्धता  आदि में भिन्नता से प्रभावित होती है | अत: भूगोल किन्ही दो तत्वों के बिच कार्य-कारण सम्बन्ध भी ज्ञात करता है | इस तथ्य कों ध्यान में रखते हुए अल्फेर्ड हेटनर महोदय ने भूगोल कों निम्न प्रकार से परिभाषित किया है |

  अल्फेर्ड हेटनर के अनुसार, “भूगोल धरातल के विभिन्न भागों में कारणात्मक रूप से सम्बन्धित तथ्यों में भिन्नता का अध्ययन करता है |”

भूगोल एक गत्यात्मक अध्ययन       या   

भूगोल एक परिवर्तनशील अध्ययन

भूगोल में हम भौतिक और मानवीय तथ्यों का अध्ययन करते है |  भौतिक और मानवीय  दोनों ही प्रकार के तथ्य स्थैतिक नहीं है बल्कि गत्यात्मक है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी और अथक एवं निरंतर प्रयत्नशील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है |  परिवर्तनशील अथवा गत्यात्मक तथ्यों का अध्ययन भूगोल के मुख्य उद्देश्यों में से एक है | इसी कारण ही भूगोल गत्यात्मक या परिवर्तनशील अध्ययन कहलाता है |

भूगोल एक समाकलनात्म्क और संश्लेषित विज्ञान       या 

भूगोल समाकलन और संश्लेषण का अध्ययन

 प्राकृतिक और सामाजिक  दोनों ही प्रकार के विज्ञानों का मूल उद्देश्य  वास्तविकता (यथार्थता) कों ज्ञात करना | इसलिए प्रत्येक विज्ञान सभी अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध स्थापित करता हुआ  वास्तविकता (यथार्थता) कों प्राप्त करना चाहता है | भूगोल भी अनेक प्राकृतिक विज्ञानों जैसे जैसे भौमिकी, मृदा विज्ञान, जलवायु विज्ञान, समुद्रों विज्ञान और वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान आदि और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और नृ-विज्ञान आदि की सहायता से पृथ्वी तल पर चल रही प्रत्येक घटना की वास्तविकता कों जानता है |  इनके सहयोग से भौगोलिक अध्ययन सरल हो जाता है | विभिन्न विज्ञानों के साथ मिलकर अध्ययन करने कों ही समाकलन कहते है अत: स्पष्ट है कि भूगोल एक समाकलनात्म्क विज्ञान है |

भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध स्थापित है | इन विज्ञानों के विभिन्न घटकों से प्राप्त ज्ञान कों स्नाश्लेषित करके भूगोल में इनका संश्लेषित अध्ययन होता है इसलिए ही भूगोल कों संश्लेषित विज्ञान कहा जाता है |

भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के संश्लेषण का समर्थन प्रसिद्ध भूगोलवेता एच॰ जे॰ मैकिण्डर ने किया था | उनके अनुसार भौतिक भूगोल के बिना मानव भूगोल का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है |

भूगोल प्रकृति तथा मानव के बीच अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन

भौगोलिक तथा मानवीय दोनों ही प्रकार के कारक स्थैतिक (स्थाई) ना होकर हमेशा गतिशील (गत्यात्मक) रहते है | ये तथ्य या कारक परिवर्तित होते रहते है चाहे मंद हो या तीव्र चाहे दिखाई दे या नहीं लेकिन लगातार बदलते रहते है | हम ये कह सकते है कि ये तथ्य सतत परिवर्तनशील पृथ्वी अथक एवं निरंतर प्रयत्न शील मानव के बीच होने वाली अंतर्प्रक्रियाओं के कारण समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रहते है | आदिमानव समाज अपने पर्यावरण पर ही निर्भर रहता था और उसी के अनुसार व्यवहार करता था | समय के साथ-साथ तकनीक उपलब्ध होने पर अब ऐसा नहीं है वह अपने अनुसार वातावरण कों ढालने लगा है | इस तरह आदिम समाज से लेकर वर्तमान तक प्रकृति और मानव के बीच के विभिन्न अंत: प्रक्रियाएं होती रही |  इन अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन  हम भूगोल में करते है इसलिए भूगोल कों अंतर्प्रक्रियाओं का अध्ययन कहा जाता है |

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है

एक वैज्ञानिक विषय के रूप में भूगोल तीन वर्गों के प्रश्नों से सम्बन्धित है | ये निम्नलिखित है |

1.       क्या- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के प्रतिरूप की पहचान से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  ये क्या है ? अत: ये प्रश्न “क्या” से सम्बन्धित होते  है |

2.       कहाँ- कुछ प्रश्न ऐसे होते है जो भूतल पर पाई जाने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेताओं के वितरण  से जुड़े होते है | जिसका मतलब होता है,  कोई वस्तु या तत्व कहाँ पर स्थित है ? अत: ये प्रश्न “कहाँ ” से सम्बन्धित होते  है |

3.       क्यों- तीसरे प्रकार के प्रश्न व्याख्या से सम्बन्धित होते है जो तत्वों और तथ्यों के किसी स्थान पर होने या ना होने के कारण से जुड़े होते है | ये  तत्वों और तथ्यों के बीच कार्य –कारण सम्बन्ध से जुड़े होते है | जिसका मतलब है कोई वस्तु या तत्व किसी स्थान पर “क्यों” है? अत: ये प्रश्न “क्यों ” से सम्बन्धित होते  है |

भूगोल का प्राकृतिक (भौतिक) विज्ञानों और  सामाजिक विज्ञानों के साथ संबंध 

भूगोल भौतिक और सामाजिक विज्ञानों कों आपस में जोड़ने का काम करता है | इसका कारण यह है कि अपनी अंतर्वस्तु या विषय सामग्री के कारण भूगोल भौतिक और सामाजिक विज्ञानों पर बहुत अधिक निर्भर हो जाता है | साथ ही यह इन भौतिक और सामाजिक विज्ञानों का विकास में भी योगदान देता है |अत: भूगोल की प्रकृति अंतर्विषयक है |

            भूगोल के साथ इन भौतिक और सामाजिक विज्ञानों का संबंध हम दो हिस्सों में बाँट सकते है जिसमें भूगोल की शाखा भौतिक भूगोल का संबंध भौतिक या प्राकृतिक विज्ञानों से है तथा दूसरी प्रमुख शाखा मानव भूगोल का संबंध सामाजिक विज्ञानों से है | भूगोल के साथ विभिन्न भौतिक और सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्धों के बारे में चर्चा की जा रही है |

a)      भूगोल तथा भूगर्भ विज्ञान

पृथ्वी की उत्पत्ति, पृथ्वी पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की स्थ्लाकृतियों के बनने,  चट्टानों का निर्माण और प्रकार, भूकंप तथा ज्वालामुखी संबंधी क्रियाएँ इन सभी का अध्ययन करने के लिए भूगोल कों भूगर्भ विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है |

b)      भूगोल तथा खगोल विज्ञान

ब्रहमांड की उत्पत्ति, ब्रहमांड में पाए जाने वाले विभिन्न आकाशगंगायें, सौरमंडल, तारे, ग्रह उपग्रह तथा अन्य तत्वों के निर्माण, इनके बीच की दूरी, गतियों, सूर्य की किरणों का उतरायण तथा दक्षिणायन होना, ऋतु परिवर्तन होना आदि | इन सभी का अध्ययन करने के लिए  भूगोल कों खगोल विज्ञान पर निर्भर होना पड़ता है | 

c)      भूगोल तथा भौतिकी

भौतिकी के नियमों की सहायता से पृथ्वी तथा  अंतरिक्ष में पाए जाने वाले अन्य पिण्डों की गतियों के अध्ययन के लिए भूगोल वेता कों भौतिकी की आवश्यकता पडती है | इसके अलावा पवनों की गति तथा दिशा, वायुदाब, भूकंप, ज्वार-भाटा अपक्षय तथा अपरदन जैसी प्रक्रियाओं कों समझने के लिए भी भौतिकी का सहारा लेना पड़ता है | अत: भूगोल का संबंध भौतिकी से भी है |  

d)      भूगोल तथा गणित

पृथ्वी की आकृति भू आभ है |  इसकों भूगोलवेता मानचित्र के द्वारा प्रदर्शित करता है | इसके निर्माण के लिए गणित तथा कला में निपुणता होनी चाहिए | इसके अलावा अक्षांश तथा देशांतर के निर्धारण, समय के निर्धारण और दो स्थानों के बीच समय अंतराल का पता लगाने के लिए गणितीय तथा सांख्यिकी  की आवश्यकता पडती है | अत : भूगोल का गणित से भी गहरा संबंध है |

e)      भूगोल तथा रसायन विज्ञान

वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न गैसों, विभिन्न प्रकार के खनिजों, मृदा के गुणों चट्टानों के गुण आदि के बारे में जानकारी के लिए हम रसायन विज्ञान की सहायता लेते है |

f)       भूगोल तथा वनस्पति विज्ञान

भूगोल में हम विश्व के विभिन्न प्रदेशों में पाई जाने वाली वनस्पति के प्रकारों के उगने के लिए अनुकूल वातावरण, भूमि, मृदा आदि के साथ –साथ उनके आर्थिक और सामाजिक महत्व के बारे में अध्ययन करते हैं | वनस्पति विज्ञान में पेड़ –पौधों के प्रकार, उनके लिए अनुकूल वातावरण और उनकी जातियों के जानकारी मिलती है | अत : वनस्पति से संबंधित आधारभूत जानकारी लेने के लिए  भूगोल का संबंध वनस्पति विज्ञान से है |

g)      भूगोल तथा प्राणी विज्ञान

प्राणी विज्ञान जंतुओं के जातियों तथा उपजातियों के जीवन के बारे में अध्ययन करता है | भूगोल में भी हम हमारे पर्यावरण में पाए जाने वाले विभिन्न प्राणियों के प्रकार, उनके जीवन पर भौगोलिक तत्वों के प्रभाव, पर्यावरण के अन्य तत्वों से उनके संबंध इन सभी का अध्ययन करते हैं | इसके साथ ही विभिन्न प्राणियों का विश्व वितरण का भी हम भूगोल में अध्ययन करते हैं | इस सभी जानकारियों के लिए भूगोल का वनस्पति विज्ञान के साथ संबंध स्थापित किए गए है |

इन विज्ञानों के अतिरिक्त जलविज्ञान तथा मृदा विज्ञान आदि प्राकृतिक विज्ञानों का भी भूगोल के साथ निकटता का संबंध है |

Saturday, July 24, 2021

Migration (Meaning, process, type and factors of migration) 12th geography

 प्रवास का अर्थ

किसी विशेष उद्देश्य से लोगों का एक स्थान कों छोकर दूसरे स्थान पर जाकर रहना प्रवास कहलाता है |

प्रवास की प्रक्रिया

प्रवास की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति का अपने स्थान कों छोड़कर जाने और दूसरे स्थान पर आकर रहना दोनों ही प्रकार की प्रक्रिया कों शामिल किया जाता है | ये निम्नलिखित दो प्रकार की होती है |

A.     आप्रवास (In-Migration)

 

जब लोग किसी नए स्थान पर आकर रहने लगते है | तो इस प्रक्रिया कों आप्रवास कहते है |

B.     उत्प्रवास  आप्रवास (Out- Migration)

 

जब लोग एक स्थान कों छोडकर चले जाते हैं | तो इस प्रक्रिया कों उत्प्रवास कहते है |

समय के  अवधि अनुसार प्रवास के प्रकार

प्रवास के समय के अवधि अनुसार प्रवास तीन प्रकार का होता है |  स्थाई, अस्थाई तथा मौसमी प्रवास | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

A.     स्थाई प्रवास

जब व्यक्ति किसी स्थान कों छोड़कर चला जाए और दूसरे स्थान पर स्थाई रूप से रहने लगे तो इस प्रकार के प्रवास कों स्थाई प्रवास कहते है | महिलाओं अधिकतर विवाह के बाद इसी तरह का प्रवास करती हैं |

B.     अस्थाई प्रवास

जब व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने स्थान कों छोड़कर रहने लगता है | तो इस तरह के प्रवास कों अस्थाई प्रवास कहते है | जैसे विद्यार्थी द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने जन्म स्थान कों छोड़कर जाना और शिक्षा ग्रहण करने पर वापस लौट आना |

C.     मौसमी प्रवास

जब प्रवास एक विशेष समय (मौसम) में किया जाता है तो यह मौसमी प्रवास कहलाता है | इस प्रवास का मुख्य रूप से कृषि क्रिया में होता है | लोग कृषि कार्य करने के लिए जैसे कटाई या बुआई के मौसम में प्रवास करते हैं और काम समाप्त हो जाने पर अपने घर लौट आते है |  इसी तरह जम्मू कश्मीर से चरवाहे सर्दी के समय मैदानी क्षेत्रों में आ जाते है और गर्मियों की शुरुआत में वापस  पहाड़ी क्षेत्रों में जाने लगते है |  

गंतव्य स्थान के आधार पर प्रवास के प्रकार

गंतव्य स्थान के आधार पर प्रवास दो प्रकार का होता है | आंतरिक प्रवास तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रवास |

आंतरिक प्रवास (Inland Migration)

प्रवास देश की सीमा में हो तो आंतरिक प्रवास कहलाता है |

अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration)

प्रवास जब देश की सीमा के बाहर  (एक देश से दूसरे देश में ) हो तो अंतर्राष्ट्रीय होता है |

प्रवास की धाराएँ

प्रवास की चार मुख्य धाराएँ हैं |

(a)    गांव से गांव    (b)   गांव से नगर      (c)   नगर से नगर      (d)  नगर से गांव

आप्रवासी और उत्प्रवासी में अन्तर

आप्रवासी (in-migrant )

वे लोग जो किसी नए स्थान पर आकर बस जाते हैं, आप्रवासी कहलाते हैं |

उत्प्रवासी (out- migrant)

वे लोग जो अपने स्थान कों छोड़कर  बाहर चले जाते है, उत्प्रवासी कहलाते हैं |

उद्गम स्थान और गंतव्य स्थान में अन्तर

उद्गम स्थान

वह स्थान जहाँ से लोग चले जाते हैं या गमन कर जाते है | उस स्थान कों उद्गम  स्थान कहते है | उत्प्रवास के प्रवास के कारण  यहाँ उद्गम स्थान की जनसंख्या में कमी होती है |

गंतव्य स्थान

वह स्थान जहाँ पर लोग आकार बीएस जाते हैं | उस स्थान कों गंतव्य स्थान कहते है | आप्रवास के कारण गंतव्य स्थान की जनसंख्या में वृद्धि होती है |

प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारक

लोग अपने जन्म स्थान से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं | लेकिन बेहतर आर्थिक और सामाजिक जीवन जीने के लिए या सामाजिक और राजनैतिक कारणों से अपने जन्म स्थान कों छोड़कर प्रवास करते है |  इसी तरह बहुत से ऐसे कारक होते है जो लोगों कों प्रवास करने लिए प्रोत्साहित करते हैं या उन्हें बाध्य करते है | प्रवास कों प्रभावित करने वाले कारकों कों हम दो भागों में बाँट सकते हैं |  ये प्रतिकर्ष कारक तथा अपकर्ष कारक  कहलाते है |  इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है |

प्रतिकर्ष कारक (Push Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों उनके निवास स्थान या उद्गम स्थान कों छोड़कर जाने का कारण बनते है उन्हें प्रवास के प्रतिकर्ष कारक कहते हैं | इन कारकों के अंतर्गत बेरोजगारी, रहन-सहन की निम्न दशाएँ, राजनैतिक उपद्रव, प्रतिकूल जलवायु, बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं का बार बार आना, महामारियाँ तथा सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन आदि शामिल हैं | जिनके कारण लोग अपना स्थान छोड़कर चले जाते है |

अपकर्ष कारक  (Pull Factors of Migration)

वे कारक जो लोगों कों विभिन्न स्थानों से आकार रहने के लिए आकर्षित करते हैं उन्हें प्रवास के अपकर्ष कारक कहते है | इन कारकों में रोजगार के अच्छे अवसर, रहन-सहन की उच्च दशाएँ, राजनैतिक शांति और स्थायित्व, जीवन और सम्पति की सुरक्षा, अनुकूल जलवायु, तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत समाज आदि शामिल हैं | ये ऐसे कारक है जो किसी स्थान (गंतव्य स्थान ) कों उद्गम स्थान की अपेक्षा अपनी ओर आकर्षित करते हैं |   

Friday, July 23, 2021

POPULATION GROWTH (Meaning, type, and components )

 

जनसंख्या वृद्धि का अर्थ

जनसंख्या वृद्धि अथवा जनसंख्या परिवर्तन का अभिप्राय किसी क्षेत्र में समय की किसी निश्चित अवधि के दौरान बसे हुए लोगों की संख्या में परिवर्तन से है |

दूसरे शब्दों में समय के दो अंतरालों के बीच एक क्षेत्र विशेष में जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन कों जनसंख्या वृद्धि कहते हैं |

उदाहरण के लिए, भारत की जनसंख्या सन् 2001 की जनगणना के अनुसार 102.70 करोड़  थी | जो 2011 की जनगणना के अनुसार 121.02 करोड़ हो गई | इन दोनों समय अंतरालों के दौरान भारत में 18.30 करोड़ लोगों की संख्या में वृद्धि हुई | भारत की जनसंख्या में इस वृद्धि कों ही जनसंख्या वृद्धि कहते है |

जनसंख्या वृद्धि के अध्ययन का महत्व

जनसंख्या वृद्धि या परिवर्तन के अध्ययन के द्वारा हम किसी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति, सामाजिक उत्थान, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आदि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करते है |

जनसंख्या वृद्धि के प्रकार

जनसंख्या वृद्धि या परिवर्तन कों हम धनात्मक तथा ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि, प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि  और वास्तविक जनसंख्या वृद्धि  के रूप में बाँट सकते हैं | इनका वर्णन इस प्रकार है |

A.     जनसंख्या की धनात्मक वृद्धि

जब दो समय अंतरालों के बीच जन्म दर मृत्यु दर से अधिक हो और अन्य देशों से लोग आकर बस जाते है तो लोगों की कुल संख्या में वृद्धि हो जाए तो इस बढोतरी कों जनसंख्या की धनात्मक वृद्धि कहते है |

B.     जनसंख्या की ऋणात्मक वृद्धि

यदि दो समय अंतरालों के बीच जनसंख्या में कमी आये तो उसे जनसंख्या की ऋणात्मक वृद्धि कहते हैं | यह तब होती है जब जन्म दर मृत्यु दर से कम हो  और लोग अधिक संख्या में दूसरे देशों में जाकर रहने लगे |

C.     प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि 

किसी क्षेत्र विशेष में दो समय अंतरालों में जन्म और मृत्यु के अन्तर से जनसंख्या में होने वाली वृद्धि कों उस क्षेत्र की प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि कहते है | इसे निम्न सूत्र द्वारा परिकलित किया जा सकता है |

प्राकृतिक वृद्धि = जन्म लेने वाले लोगों की संख्या –मरने वाले लोगों की संख्या   

या   प्राकृतिक वृद्धि  = जन्म–मृत्यु

D.     वास्तविक जनसंख्या वृद्धि

किसी क्षेत्र विशेष में दो समय अंतरालों के बीच जन्म और मृत्यु के अन्तर तथा आप्रवास व उत्प्रवास करने वाले लोगों के अन्तर से जनसंख्या में होने वाली वृद्धि (परिवर्तन) कों उस क्षेत्र की वास्तविक जनसंख्या वृद्धि कहते है | इसे निम्न सूत्र के द्वारा परिकलित किया जाता है |

वास्तविक जनसंख्या वृद्धि = (जन्म लेने वाले लोगों की संख्या –मरने वाले लोगों की संख्या) + (आप्रवास करने वाले लोगों की

संख्या – उत्प्रवास करने वाले लोगों की संख्या) 

या  (जन्म–मृत्यु ) + (आप्रवास – उत्प्रवास) 

 

जनसंख्या वृद्धि कों व्यक्त करने के तरीके

किसी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि कों हम निरपेक्ष संख्या या वास्तविक संख्या के रूप में और प्रतिशत या वृद्धि दर के रूप में व्यक्त कर सकते हैं | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

 

A.     निरपेक्ष संख्या द्वारा जनसंख्या वृद्धि दर्शाना

इस तरीके के अंतर्गत किसी क्षेत्र की जनसंख्या के परिवर्तन कों वास्तविक संख्या के रूप में दर्शाते हैं | जैसे भारत की जनसंख्या सन् 2001 की जनगणना के अनुसार 102.70 करोड़  थी | जो 2011 की जनगणना के अनुसार 121.02 करोड़ हो गई | इन दोनों समय अंतरालों के दौरान भारत में 18.30 करोड़ लोगों की संख्या में वृद्धि हुई |

B.     प्रतिशत द्वारा जनसंख्या वृद्धि दर्शाना या जनसंख्या की वृद्धि दर

इस तरीके के अंतर्गत जनसंख्या में हुए परिवर्तन कों प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है | जैसे भारत में 2001  की जनगणना के अनुसार 2011 में 17.64 प्रतिशत जनसंख्या की वृद्धि हुई |  

जनसंख्या  परिवर्तन (वृद्धि)  के घटक (कारक)

जनसंख्या वृद्धि के कारक जनसंख्या के वे तत्व हैं जिनसे किसी स्थान की जनसंख्या वृद्धि प्रभावित होती है | जन्म, मृत्यु तथा प्रवास ये जनसंख्या वृद्धि के  तीन मुख्य घटक हैं | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

1)      जन्म दर  (अशोधित जन्म दर ) Curd Birth Rate (CBR)

अशोधित जन्म दर कों प्रति हजार स्त्रियों द्वारा जन्म दिए गए  जीवित बच्चों के रूप में व्यक्त किया जाता है | इसकी गणना इस प्रकार की जाती है |

                                  

अशोधित जन्म दर  (CBR) =    

क्षेत्र में किसी वर्ष विशेष में जीवित जन्म लेने वाले बच्चे x 1000

________________

क्षेत्र में वर्ष विशेष के मध्य में जनसंख्या

 

जन्म दर के उच्च होने या निम्न होने का जनसंख्या वृद्धि से सीधा संबंध होता है |

 

2)      मृत्यु दर  (अशोधित मृत्यु दर ) Curd Death Rate (CDR)

अशोधित मृत्यु दर कों किसी क्षेत्र में किसी वर्ष के दौरान प्रति हजार जनसंख्या के पीछे मरने वालों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है |  अशोधित मृत्यु दर की गणना इस प्रकार की जाती है |

                                        

  अशोधित मृत्यु दर (CDR) =      

क्षेत्र में किसी वर्ष विशेष में मृतकों की संख्या x 1000

___________________

   क्षेत्र में वर्ष विशेष के मध्य में जनसंख्या


मृत्यु दर जनसंख्या परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाती है |क्योंकि जनसंख्या वृद्धि केवल बढती हुई जन्म दर से ही नहीं होती बल्कि घटती हुई मृत्यु दर से भी होती है |

3)      प्रवास

लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रहना प्रवास कहलाता है |जन्म दर और मृत्यु दर के अतिरिक्त यह कारक जनसंख्या वृद्धि कों प्रभावित करता है | प्रवास के अंतर्गत व्यक्ति का एपने स्थान कों छोड़कर जाना व दूसरे स्थान पर जाकर रहना दोनों ही प्रक्रियाएँ शामिल की जाती है | प्रवास स्थाई , अस्थाई तथा मौसमी हो सकता है | यह गांव से गांव, गांव से नगर नगर से नगर, नगर से गांव की ओर हो सकता है | प्रवास देश की सीमा में हो तो आंतरिक और देश की सीमा के बाहर हो तो अंतर्राष्ट्रीय होता है |

Tuesday, July 20, 2021

Link for reduce syllabus of 9th and 10th all subjects

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जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS INFLUENCING THE DISTRIBUTION OF POPULATION)

 

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले कारक

विष की जनसंख्या के वितरण प्रारूप से पता चलता है कि विश्व में जनसंख्या का वितरण असमान है | इस असमान वितरण का मुख्य कारण वे विभिन्न कारक हैं जो लोगों कों किसी क्षेत्र में रहने या वहाँ से चले जाने के लिए प्रेरित करते हैं | इन कारकों कों भौतिक (प्राकृतिक ), कारक तथा मानवीय कारकों में वर्गीकृत किया जाता है | मानवीय कारकों कों पुन: आर्थिक, सामजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक कारकों में विभाजित किया जाता है | इन कारकों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले भौतिक कारक

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले जो कारक प्राकृतिक कारणों होते हैं उन्हें भौतिक या प्राकृतिक कारक कहते है | इन कारकों में जल की उपलब्धता, भू-आकृति, जलवायु तथा मृदा कों शामिल किया जाता है | इनका वर्णन निम्नलिखित है |

1.       जल की उपलब्धता

जल जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है | जल का उपयोग पीने, नहाने, भोजन बनाने, पशुओं के लिए, फसलों में सिंचाई के लिए , उद्योगों में तथा नौका चालन आदि कार्यों में किया जाता है | अत: लोग उन् क्षेत्रों में बसना अधिक पसंद करते हैं, जहाँ जल आसानी से उपलब्ध हो सके | यही कारण है कि नदी घाटियाँ विश्व के सबसे सघन बसे क्षेत्र हैं |

2.       भू-आकृति (उच्चावच )

उच्चावच जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है |ऊँचे पर्वत, उबड-खाबड क्षेत्र तथा पठारी क्षेत्र विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र होते हैं | पर्वतीय प्रदेशों में ढाल अधिक होने के कारण जनसंख्या की वृद्धि के लिए अवरोध उत्पन्न करते है | क्योंकि समतल भू भाग नहीं होने से इन क्षेत्रों में बसाव स्थानों की समस्या होती है | अधिक ढाल के कारण भूमि के कम उपलब्ध होने तथा  मृदा अपरदन से मिट्टी की पतली परत हो जाने से कृषि का विकास भी नहीं हो पाता | परिवहन के साधनों का विकास इन क्षेत्रों में कम होता है | पर्वतीय क्षेत्रों में ये सुविधाएँ मैदानोंकी अपेक्षा कम विकसित हो पाती है | इसलिए लोग पहाड़ी क्षेत्रों में  कम रहना पसंद करते है |

जबकि जनसंख्या का बड़ा हिस्सा समतल मैदानों और मंद ढाल वाले क्षेत्रों में रहता है | इसके निम्नलिखित कारण है | इन क्षेत्रों में कृषि करना आसान है | परिवहन के साधनों का विकास इन क्षेत्रों में तेजी से हो सकता है | उद्योगों के विकास के लिए समतल भूमि का होना आवश्यक है |

3.       जलवायु

जलवायु जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले कारकों में दूसरा महत्वपूर्ण कारक है | क्योंकि मनुष्य तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता की कुछ अनुकूल परिस्थितियों में ही रह सकता है | प्राय: वह सम जलवायु की दशाएँ ही  जनसंख्या कों किसी क्षेत्र में अर्हें के लिए आकृषित करती है |

            अति उष्ण तथा अति शीत मरुस्थलीय क्षेत्र ऐसे क्षेत्र है जहाँ विषम जलवायु पाई जाती है | प्रतिकूल जलवायु के कारण  इन क्षेत्रों में विरल जनसंख्या पाई जाती है |  जैसे सहारा मरुस्थल, उत्तरी ध्रुव का साइबेरिया क्षेत्र तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेश, अत्यधिक विषम जलवायु के कारण विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र है |

अधिकतापमान के साथ अधिक आर्द्रता भी स्वाथ्य के लिए अनुकूल नहीं होती | इस तरह की जलवायु में पेचिश, मलेरिया तथा पीलिया जैसी बीमारियाँ अधिक होती है | इसी कारण से अफ्रीका के जायरे बेसिन तथा दक्षिणी अमेरिका में अमेजन बेसिन क्षेत्र जो भूमध्यरेखीय प्रदेशों में आते है विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र है |

जबकि वे क्षेत्र जहाँ सम जलवायु मिलती है | अनुकूल और आराम दायक होने के कारण मानव बसाव कों प्रोत्साहित करती है |  जिससे यहाँ सघन जनसंख्या मिलती है | जैसे मानसून एशिया, उतरी पश्चिमी यूरोप  का भूमध्य सागरीय प्रदेश तथा उत्तरी अमेरिका उत्तरी पूर्वी भाग सम जलवायु होने के कारण सघन बसे क्षेत्र है |

4.       मृदा

जिन क्षेत्रों में उपजाऊ मृदा मिलती है | उन् क्षेत्रों में कृषि तथा उससे संबंधित क्रियाएँ अधिक विकसित होती हैं | इसलिए अधिक उपजाऊ मृदा वाले क्षेत्रों में अधिक जनसंख्या मिलती है | भारत में नदी घाटी क्षेत्र में आत्याधिक जनसंख्या रहती है | जबकि मरुस्थलीय भाग मैं अनुपजाऊ मृदा के कारण कम जनसंख्या निवास करती है |

जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले आर्थिक कारक

जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करने वाले आर्थिक कारणों में खनिजों की उपलब्धता, नगरीकरण तथा औद्योगिकीकरण कों शामिल किया जाता है | जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है |

1.       खनिजों की उपलब्धता

खनिजों के निक्षेप से युक्त क्षेत्र उद्योग कों अपनी ओर आकृषित करते हैं | परिणाम स्वरूप खनन कार्य और उद्योगों में उत्पन्न रोजगार लोगों कों अपनी ओर आकृषित करते है | लोग रोजगार की तलाश में इन क्षेत्रों में आकार बसने लगते है | इन क्षेत्रों में कुशल तथा अर्द्धकुशल  श्रमिकों के आने ये क्षेत्र अत्यधिक जनसंख्या वाले बन जाते है |

उदाहरण के लिए अफ्रीका महाद्वीप में कटंगा - जाम्बिया तांबा पेटी खनिजों की उपलब्धता के कारण सघन जनसंख्या वाला क्षेत्र है | इसी तरह भारत का छोटा नागपुर का पठारी क्षेत्र भी खनिजों की बहुलता के कारण सघन बसा हुआ है |

2.       नगरीकरण

नगरीय क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध होते हैं | इसके अलावा यहाँ शिक्षा व चिकित्सा संबंधी सुविधाएँ भी बेहतर होती है | परिवहन और संचार के साधन विकसित होते है | इसके अतिरिक्त नगरीय जीवन में ग्रामीण सामजिक व्यवस्था से राहत मिलती है | इसलिए अच्छी सुविधाओं और नगरीय जीवन की स्वतंत्रता के आकर्षण के कारण लोग नगरों में आकार बसने लगते है | ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर प्रवास इन्हीं कारणों से करती है | जिससे ये क्षेत्र सघन जनसंख्या वाले हो जाते है | विश्व के सभी महानगर जैसे लन्दन, पेरिस, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, न्यूयार्क, सिडनी, बीजिंग, शंघाई  मास्को आदि सभी नगर अत्यधिक सघन बसे है और इनमें अब भी तेजी से जनसंख्या बढ़ रही रही है |

3.       औद्योगिकीकरण

औद्योगिक क्षेत्र रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हैं | यहाँ कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के अलावा परिवहन परिचालक, दुकानदार, बैंककर्मी, डॉक्टर, अध्यापक तथा अन्य विभिन्न प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध कराने वाले लोग बड़ी संख्या में आकर्षित होकर यहाँ बसने लगते है | जिससे इन क्षेत्रों में सघन जनसंख्या निवास करती है | उदाहरण के लिए जापान का कोबे ओसाका प्रदेश अनके प्रकार के उद्योगों के कारण सघन बसा है | इसी प्रकार भारत में भी दिल्ली, मुम्बई कोलकाता, गुरुग्राम कानपुर तथा मद्रास आदि सघन औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण सघन बसे है |    

 जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले सामाजिक कारक

जिन क्षेत्रों में धर्म, भाषा  जाति आदि के कारण सामजिक एकरूपता पाई रहती है | उन क्षेत्रों में सामाजिक संबंध अच्छे रहते है | लोग अपनी भाषा, धर्म, जाति आदि के लोगों के बीच रहना पसंद करते है | जिससे ऐसे क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने लगती है | 

इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में सामाजिक आधार पर दंगे जैसे जाति, धर्म या भाषा के आधार पर होने वाले दंगें  उन क्षेत्रों से लोगों के पलायन कों बढ़ावा देते है | इस तरह के क्षेत्र कम बसे क्षेत्र हो जाते है |

जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक कारक

कुछ स्थान धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण अधिक लोगों कों आकृषित करते हैं  और सघन जनसंख्या के केन्द्र बन जाते हैं | जैसे जेस्र्सलम और मक्का-मदीना अपने धार्मिक महत्व के कारण सघन बसे है |इसी भारत में हरिद्वार, मथुरा, वाराणसी, अमृतसर, इलाहाबाद, मदुरै, उज्जैन आदि नगर अपने धार्मिक महत्व के कारण सघन बसे है |

जनसंख्या कों प्रभावित करने वाले राजनैतिक कारक

किसी भी देश की राजनैतिक व्यवस्था वहाँ के लोगों आकृषित भी कर सकती है और वहाँ से जाने ले लिए मजबूर भी कर सकती है | अगर देश या क्षेत्र में राजनैतिक कारणों से अशांति उत्पन्न होती है तो लोग वहाँ से चले जाते है |  क्योंकि उन क्षेत्रों में राजनैतिक अस्थिरता आ जाता है | इसके विपरीत किसी प्रदेश राजनैतिक की स्थिरता लोगों कों उस प्रदेश में रहने के लिए प्रोत्साहित करती है |

इसके अलावा जब सरकार  की नीतियाँ भी जनसंख्या के वितरण कों प्रभावित करती है | जैसे सरकार किसी क्षेत्र विशेष में लोगों कों बसाने के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधायें देती है तो लोग उन क्षेत्रों में जाकर बसने लगते हैं | सरकारें कई बार लोगों कों भीड़ -भाड़ वाले स्थानों से चले जाने ले लिए वहाँ कर अधिक लगा देती है और वहाँ से विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहित करती है | जैसे भारत की राजधानी दिल्ली के भीड़ भाड इलाकों से लोगों कों चले जाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था | साथ ही यहाँ पर उद्योगों के लिए कम सुविधाएँ  तथा अधिक सख्त नियम बना दिए गए|जिससे लोग दिल्ली से बहार की ओर बसने लगे |