Wednesday, January 26, 2022

Agencies engaged in exploration of minerals in India and Distribution of Minerals in India Mineral belts in India

 

भारत में खनिजों के अन्वेषण में संलग्न अभिकरण (Agencies engaged in exploration of minerals in India)

भारत में खनिजों के व्यवस्थित सर्वेक्षण, पूर्वेक्षण (Prospecting)  तथा अन्वेषण (खोज) के कार्य निम्नलिखित अभिकरण (संस्थाएँ) कर रही है |

1)      भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) (GSI)

2)      तेल और प्राकृतिक गैस आयोग (Oil and Natural Gas Commission) (ONGC)

3)      खनिज अन्वेषण निगम लिमिटिड (Mineral Exploration Corporation Ltd.) (MECL)

4)      राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (National Mineral Development Corporation) (NMDC)

5)      इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस (Indian Bureau of Mines) (IBM)

6)      भारत गोल्ड माइंस लिमिटिड (Bharat Gold Mines Ltd.) (BGML)

7)      हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटिड (Hindustan Copper Ltd.) (HCL)

8)      राष्ट्रीय एल्युमिनियम कंपनी लिमिटिड (National Aluminium Company Ltd.) (NALCO)

 

इनके अलावा विभिन्न राज्यों के खादान एवं भू विज्ञान विभाग भी इस कार्य के शामिल है |

 

भारत में  खनिजों का वितरण

भारत में खनिजों के वितरण से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य है  जो निम्नलिखित हैं |  

1.       भारत में अधिकाँश धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र की प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों में पाए जाते हैं |

2.       कोयले का लगभग 97 प्रतिशत भाग दामोदर, सोन, महानदी और गोदावरी नदियों की घाटियों में पाया जाता है |

3.       पेट्रोलियम के आरक्षित भंडार असम, गुजरात तथा मुंबई हाई अर्थात अरब सागर के अतटीय क्षेत्र में पाए जाते है | नए आरक्षित क्षेत्र कृष्णा-गोदावरी तथा कावेरी बेसिनों में पाए गए हैं |

4.       अधिकाँश प्रमुख खनिज मंगलौर से कानपुर कों जोड़ने वाली कल्पित रेखा के पूर्व में पाए जाते हैं |

भारत में खनिज पट्टियाँ

भारत में खनिज मुख्यतः तीन विस्तृत पट्टियों में सांद्रित है | उत्तरी – पूर्वी पठारी प्रदेश, दक्षिण-पश्चिम पठारी प्रदेश तथा उत्तर-पश्चिमी प्रदेश | इनके अलावा कुछ भंडार यत्र-तत्र  एकाकी खंडों में भी पाए जाते है | भारत में खनिजों की पट्टियों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है |

               क).            उत्तरी – पूर्वी पठारी प्रदेश

इस पट्टी के अंतर्गत छोटानागपुर (झारखंड), ओडिशा के पठार, पश्चिम बंगाल तथा छतीसगढ़ के कुछ भाग आते हैं | प्रमुख लौह और  इस्पात उद्योग  इस क्षेत्र में अवस्थित है | इस क्षेत्र में लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, बॉक्साइट तथा अभ्रक के भंडार अधिक मिलते है |

              ख).            दक्षिण-पश्चिम पठारी प्रदेश

यह पट्टी कर्नाटक, गोवा कर्नाटक के साथ लगती तमिलनाडु की उच्च भूमि और केरल पर विस्तृत है | यह पट्टी लौह धातुओं तथा  बॉक्साइट से समृद्ध है | इस पेटी में उच्च कोटि का लौह-अयस्क,मैंगनीज तथा चूना-पत्थर मिलता है | लिगनाइट कोयले कों छोड़कर इस पेटी में कोयले का अभाव है |  केरल में मोनाजाइट रेत में थोरियम तथा बॉक्साइट क्ले के निक्षेप हैं | गोवा में लौह अयस्क के निक्षेप पाए जाते है | इस पट्टी में उत्तरी पूर्वी पट्टी की तरह खनिजों के निक्षेप विविधता पूर्ण नहीं है |

                ग).            उत्तर-पश्चिमी प्रदेश

यह पट्टी राजस्थान तथा गुजरात के कुछ भाग पर विस्तृत है | इस पेटी के खनिज धारवाड़ क्रम की चट्टानों से संबंधित है | ताँबा तथा जिंक यहाँ के प्रमुख खनिज हैं | राजस्थान का क्षेत्र बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर तथा जिप्सम जैसे भवन निर्माण वाले पत्थरों से समृद्ध है | इनके अलावा यहाँ मुल्तानी मिट्टी के विस्तृत निक्षेप पाए जाते है | डोलामाइट तथा चूना पत्थर सीमेंट के लिए कच्चा माल उपलब्ध करवाते हैं | गुजरात अपने पट्रोलियम निक्षेपों के लिए प्रसिद्ध है | इनके अलावा राजस्थान तथा गुजरात दोनों ही राज्यों में नमक के समृद्ध स्त्रोत है |   

               घ).            अन्य क्षेत्र

इन तीन पट्टियों के अलावा एक अन्य खनिज पट्टी भी है | यह पेटी हिमालय पट्टी कहलाती है | यहाँ ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट तथा रंगरत्न पाया जाता है | ये खनिज हिमालय के पूर्वी और पश्चिमी दोनों भागों में पाए जाते है | असम घाटी में खनिज तेलों (पट्रोलियम) के निक्षेप है |

इनके अतिरिक्त मुंबई के अपतटीय क्षेत्रों में भी खनिज तेलों के निक्षेप पाए जाते हैं |

Sunday, January 2, 2022

Meaning, characteristics, importance and types of Minerals

 

खनिज का अर्थ

एक खनिज निश्चित रासायनिक एवं भौतिक गुणधर्मों (विशिष्टताओं) के साथ कार्बनिक या अकार्बनिक उत्पत्ति का एक प्राकृतिक पदार्थ है |

खनिजों की सामान्य विशेताएँ

सभी प्रकार के खनिजों में निम्नलिखित तीन सामान्य विशेषताएँ होती हैं |

1)      खनिज विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से वितरित होते हैं |

2)      खनिजों की मात्रा और गुणवत्ता के बीच प्रतिलोमी (विलोम) संबंध पाया जाता है अर्थात अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम मात्रा में मिलते है और कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाए जाते है | 

3)      सभी खनिज समय के साथ-साथ समाप्त होते जाते है अर्थात समाप्य है | भूगार्भिक दृष्टि से इन्हें बनने में लंबा समय लगता है | आवश्यकता के समय इनका पुनर्भरण नहीं किया जा सकता | अत : इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए | इनका दुरूपयोग नहीं करना चाहिए  क्योंकि इन्हें दुबारा उत्पन्न करने में समय लगता है इन्हें तुरंत उत्पन्न नहीं किया जा सकता | 

खनिजों का आर्थिक महत्व

खनिज किसी भी देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं | जो निम्नप्रकार से स्पष्ट है |

1)      खनिज उद्योगों कों आधार प्रदान करते है |

2)      अनेक प्रकार के उद्योग कच्चे माल के लिए खनिजों पर आधारित है |

3)      कोयला, पट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैसे जैसे खनिज ऊर्जा प्रदान करते है |

खनिजों के प्रकार

रासायनिक एवं भौतिक गुणधर्मों के आधार पर खनिजों कों दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है |

1.       धात्विक खनिज

2.       अधात्विक खनिज

इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नप्रकार से है |

धात्विक खनिज

वे खनिज जिसमें धातुओं का अंश पाया जाता है | उन्हें धात्विक खनिज कहते है | खनिजों की उत्पत्ति अकार्बनिक तत्वों से हुई है | जैसे लौहा, मैगनीज, टंगस्टन, ताँबा,सीसा, सोना, चाँदी, तथा निकिल आदि |

धात्विक खनिजों में निम्नलिखित विशेषताएँ होती है |

1)      ये खनिज सख्त और चमकीले होते हैं |

2)      ये प्राय: आग्नेय चट्टानों में पाए जाते है |

3)      ये लचीले होते है | इन्हें पीटकर कोई भी रूप दिया जा सकता है | इन्हें खींच कर लम्बा किया जा सकता है |

4)      ये चोट मारने पर टूट कर बिखरते नहीं है |

धात्विक खनिजों के प्रकार

धात्विक खनिजों कों पुनः दो प्रकारों लौहयुक्त धात्विक खनिज तथा अलौहयुक्त धात्विक खनिज में बाँटा जाता है |

अ.     लौहयुक्त धात्विक खनिज

वे खनिज जिनमें लौह धातु का अंश पाया जाता है उन्हें लौहयुक्त धात्विक खनिज कहते हैं | जैसे लौहा, मैगनीज, टंगस्टन तथा निकिल आदि | ये मैटमैले,स्लेटी तथा घूसर रंग के होते है |

आ.   अलौहयुक्त धात्विक खनिज

वे खनिज जिनमें लौह धातु का अंश नहीं पाया जाता है उन्हें अलौहयुक्त धात्विक खनिज कहते हैं | जैसे ताँबा,सीसा, सोना, चाँदी, टिन,  बॉक्साईट  तथा मैंगनीशियम आदि | ये अनेक रंगों में मिलते है |

अधात्विक खनिज

वे खनिज जिसमें धातुओं का अंश नहीं पाया जाता है | उन्हें अधात्विक खनिज कहते है | इन खनिजों की उत्पत्ति कार्बनिक तथा अकार्बनिक दोनों ही प्रकार के तत्वों से हुई है | जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, अभ्रक (माइका), स्लेट, चूना पत्थर, ग्रेफाईट, डोलोमाईट, जिप्सम तथा फ़ॉस्फेट आदि |

अधात्विक खनिजों में निम्नलिखित विशेषताएँ होती है |

1)      ये खनिज कम चमकदार होते हैं |

2)      ये प्राय: परतदार चट्टानों में पाए जाते है |

3)      ये कम लचीले होते है | इन्हें पीटकर कोई भी रूप नहीं दिया जा सकता है | इन्हें खींच कर लम्बा भी नहीं किया जा सकता है |

4)      ये चोट मारने पर टूट कर बिखर जाते है |

अधात्विक खनिजों के प्रकार

अधात्विक खनिजों कों पुनः दो प्रकारों कार्बनिक अधात्विक खनिज तथा अकार्बनिक अधात्विक खनिज में बाँटा जाता है |

अ.     कार्बनिक अधात्विक खनिज

वे खनिज जिनकी उत्पत्ति कार्बनिक तत्वों से हुई है | इनमें जीवाश्म होते है | इन्हें ईंधन खनिज भी कहते हैं |  जैसे कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस आदि |

आ.   अकार्बनिक अधात्विक खनिज

वे खनिज जिनकी उत्पत्ति अकार्बनिक तत्वों से हुई है | इनमें जीवाश्म नहीं होते  | जैसे अभ्रक (माइका), स्लेट, चूना पत्थर, ग्रेफाईट, डोलोमाईट, जिप्सम तथा फ़ॉस्फेट आदि |

Friday, December 3, 2021

Lesson 4 Climate class 9th

  

कक्षा 9वीं

समकालीन भारत (भूगोल)

अध्याय : 4  (जलवायु)

प्रश्न: नीचे दिए गए स्थानों में से किस स्थान पर विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है ?                                   

   क).            सिलचर

  ख).            चेरापूंजी

    ग).            मासिनराम

   घ).            गुवाहाटी

उत्तर: मासिनराम

प्रश्न: ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी मैदानों में बहने वाली पवन कों निम्नलिखित में से क्या कहा जाता है ?

   क).            काल बैसाखी  

  ख).            व्यापारिक पवने

    ग).            लू

   घ).            इनमें से कोई नहीं  

उत्तर: लू

प्रश्न: : निम्नलिखित में सेकौन-सा कारण भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में शीत ऋतु में होने वाली वर्षा के लिए उत्तरदायी है ?

   क).            चक्रवातीय अवदाब   

  ख).            पश्चिमी विक्षोभ  

    ग).            मानसून की वापसी

   घ).            दक्षिणी पश्चिमी मानसून   

उत्तर: पश्चिमी विक्षोभ 

प्रश्न: भारत में मानसून का आगमन निम्नलिखित में से कब होता है ?

   क).            मई के प्रारम्भ में    

  ख).            जून के प्रारम्भ में    

    ग).            जुलाई  के प्रारम्भ में    

   घ).            अगस्त के प्रारम्भ में    

उत्तर: जून के प्रारम्भ में   

प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-सी भारत में शीत ऋतु की विशेषता है ?

   क).            गर्म दिन व गर्म रातें     

  ख).            गर्म दिन व ठण्डी रातें     

    ग).            ठंडा दिन व ठण्डी रातें   

   घ).            ठंडा दिन व गर्म रातें     

उत्तर: गर्म दिन व ठण्डी रातें

प्रश्न: भारत की जलवायु कों प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से है ?

उतर: भारत की जलवायु कों प्रभावित करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित है |

1.       अक्षांश (भूमध्य रेखा से दूरी)

2.       ऊँचाई (समुद्र तल से ऊँचाई)

3.       वायुदाब एवं पवन तंत्र

4.       समुद्र से दूरी

5.       उच्चावच लक्षण (भौतिक संरचना)

 

प्रश्न: भारत में मानसूनी प्रकार की जलवायु क्यों है ?

उतर: मानसून का अर्थ है एक वर्ष के दौरान ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा में परिवर्तन होना | भारत में भी ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा बदल जाती है | ग्रीष्म ऋतु में यहाँ पर पवने दक्षिण-पश्चिम दिशा से उत्तर पूर्व दिशा की ओर चलती है जबकि शीत ऋतु में पवनों की दिशा ठीक इसके विपरीत हो जाती है | शीत ऋतु में भारत में पवनों की दिशा उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर हो जाती है |  इसलिए ही भारत की जलवायु मानसूनी प्रकार की है |

प्रश्न: भारत में किस भाग में दैनिक तापमान अधिक होता है और क्यों ?

उतर: भारत के थार के मरुस्थल में दैनिक तापमान अधिक होता है | इसका कारण यह है कि यहाँ के विशाल क्षेत्र में रेत फैली हुई है | रेत जल्दी गर्म   होती है इसलिए इस क्षेत्र में तापमान जल्दी बढने लगता है |  

 

प्रश्न: किन पवनों के कारण मालाबार तट पर वर्षा होती है ?

उत्तर: मालाबार तट पर वर्षा दक्षिणी –पश्चिमी मानसूनी पवनों के द्वारा होती है |

प्रश्न: जेट धाराएँ क्या है ? तथा वे किस प्रकार भारत की जलवायु कों प्रभावित करती है ?

उत्तर: जेट धारा का अर्थ

            जेट धाराएँ क्षोभमंडल में अत्यधिक ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी में स्थित पश्चिमी हवाएं होती है | ये वायु धाराएँ  क्षोभमंडल में 12000 मीटर (12 किलोमीटर) की ऊँचाई पर चलती है | इनकी गति गर्मियों में 110 किलोमीटर प्रति घंटा तथा सर्दियों में 184किलोमीटर प्रति घंटा होती है |

जेट धाराओं का भारत की जलवायु पर प्रभाव  

जेट धाराएँ 270 उत्तरी अक्षांश से 300 उत्तरी अक्षांश के बीच पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती है | इसलिए इन्हें उपोष्ण कटिबन्धीय पश्चिमी जेट धारा कहते है |  ये भारतीय क्षेत्र के ऊपर प्रवाहित होती है | ये धाराएँ ग्रीष्म ऋतु कों छोडकर पूरे वर्ष हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होती है | जबकि ग्रीष्म ऋतु में विशेषकर जून के महीने में ये धाराएँ हिमालय कों पार करके हिमालय के उत्तर में प्रवाहित होने लगती है | परिणाम स्वरूप एक और जेट धारा इसका स्थान ले लेती है | जो पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है | इस जेट धारा कों उष्ण कटिबन्धीय पूर्वी जेट धारा कहते है | यह  धारा गर्मियों के महीने में 140 उत्तरी अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर बहने लगती है | इसी के कारण पूरे देश में मानसून का आगमन और प्रसार होता है |  

प्रश्न: मानसून कों परिभाषित करें ? मानसून में विराम से आप क्या समझते है ?

उत्तर:   मानसून

‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है | जिसका अर्थ है वर्ष के दौरान ऋतु के बदलने पर पवनों की दिशा का उलट जाना | अर्थात मानसून का अर्थ एक ऐसी ऋतु से है जिसमें पवनों की दिशा बिल्कुल उलट जाती है |

मानसून  में विराम

मानसूनी वर्षा लगातार नहीं होती | यह एक समय में कुछ दिनों तक होती है और फिर रुक जाती है| इस तरह बिना वर्षा का समय आता है जिसे शुष्क अंतराल कहा जाता है | मानसूनी वर्षा के समय इस शुष्क अंतराल कों ही मानसून में  विराम कहते है |

        मानसून में विराम का कारण मानसूनी गर्त की स्थिति में परिवर्तन होना है | यह मानसूनी गर्त कभी उत्तर तो कभी दक्षिण भारत की ओर खिसकता है | जब यह मानसूनी गर्त उत्तर की ओर खिसक जाता है तो उत्तरी भारत में वर्षा होती है और दक्षिण में मानसून विराम की स्थिति होती है |  जब यह गर्त दक्षिण की ओर खिसकता है तो वर्षा दक्षिण भारत के राज्यों में होती है और उत्तर भारत के मैदानों में मानसून में विराम की स्थिति होती है |

प्रश्न: मानसून कों एक सूत्र में बांधने वाला क्यों समझा जाता है ?

उत्तर: भारत एक विशाल देश है | इस विशालता के परिणाम स्वरूप  भारत के धरातल, जलवायु , वनस्पति तथा लोगों के जीवन में भी विविधताएँ पाया जाना स्वभाविक है | लेकिन मानसून एक ऐसा कारक है जो इन विविधताओं कों एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य करता है |  जैसे

1)      पवन की दिशाओं का ऋतु के अनुसार परिवर्तन होता है | इसी के कारण वर्षा के आगमन की ऋतु में पूरे भारत में वर्षा प्राप्त होती है | इसी प्रकार अन्य ऋतुओं की दशाएँ भी इसी के कारण बनती है और ऋतु चक्र कों गति मिलती है |

2)      मानसूनी वर्षा की अनिश्चितताएँ और उसका असमान वितरण पूरे भारत में अपनी एक ही विशेषता लिए हुए है |

3)      संपूर्ण भारत के भूदृश्य , इसके जीव –जंतु , वनस्पति का विकास , कृषि चक्र,  मानव का जीवन तथा उनके त्योंहार उत्सव सभी मानसून से प्रभावित होते है |

4)      उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक सभी भारतीय प्रतिवर्ष मानसून के आगमन की प्रतीक्षा करते है |

5)      मानसूनी वर्षा के द्वारा हमें जल प्राप्त होता है | जिससे कृषि कार्य में तेजी आती है |

6)      भारतीय नदियाँ भी मानसून के समय अपने वेग से बहती है |

इसलिए मानसून कों एकता के सूत्र में बाँधने वाला कहा जाता है | 

प्रश्न : उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा क्यों घटती जाती है ?

उत्तर : भारत में मानसूनी पवनें बंगाल की खाड़ी और अरब सागर  से  चलती है | बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून पवनें सबसे पहले ब्रह्मपुत्र तथा असम की घाटी में पहुँचती है और भारी वर्षा करती है | हिमालय से टकरा कर ये पवनें पूर्व से पश्चिम की ओर चलने लगती है | पश्चिम की ओर जाते - जाते  इन पवनों में जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है | परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है |

प्रश्न : कारण बताएँ कि भारतीय उपमहाद्वीप में वायु की दिशा में मौसमी परिवर्तन क्यों होता है ?

उत्तर :  जल और स्थल पर तापमान की भिन्नता के कारण वायुदाब में भी भिन्नता आती है | इसी के परिणाम स्वरूप वायु की दिशा में मौसमी परिवर्तन होता है |हम जानते है कि जल स्थल कि अपेक्षा देरी से गर्म होता है और देरी से ठंडा होता है | भारत का मैदानी क्षेत्र ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्म हो जाता है | जबकि अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी कि वायु का तापमान अपेक्षाकृत कम है | इसी कारण से मैदानी क्षेत्रों में निम्न वायुदाब का क्षेत्र का बन जाता है और सागरीय क्षेत्र में अधिक वायुदाब के कारण पवनें समुद्र से भारत के आंतरिक भाग कि ओर चलने लगती है | सर्दियों में स्थिति बिल्कुल उल्ट जाती है |  मैदानी क्षेत्र शीत ऋतु में अधिक ठंडा  हो जाता है | जबकि अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी कि वायु का तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है | इसी कारण से मैदानी क्षेत्रों में उच्च वायुदाब का क्षेत्र का बन जाता है और सागरीय क्षेत्र में निम्न  वायुदाब के कारण पवनें भारत के आंतरिक भाग से  समुद्र कि ओर चलने लगती है | यही कारण है कि भारतीय उपमहाद्वीप में वायु की दिशा में मौसमी परिवर्तन होता है |

प्रश्न : कारण बताएँ  कि भारत की अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में  होती है |

उत्तर : भारत में अधिकांश वर्षा जून से सितम्बर के बीच होती है | जिसका प्रमुख कारण यह है कि ग्रीष्म ऋतु के दौरान मैदानी क्षेत्रों में निम्न वायुदाब का क्षेत्र का बन जाता है और सागरीय क्षेत्र में अधिक वायुदाब के कारण पवनें समुद्र से भारत के आंतरिक भाग कि ओर चलने लगती है | ये मानसूनी पवनों के रूप में भारत में आती है | ये पवनें जलवाष्प से भरी होती है और भारत के अधिकाँश स्थानों पर वर्षा करती है | ये मानसून पवनें जून से सितम्बर तक चलती है | इसके बाद तापमान तथा वायुदाब  संबंधी परिस्थितियाँ बिल्कुल उल्ट जाती है ओर पवनें स्थल से समुद्र कि ओर चलने लगती है | इस पवनों में जलवाष्प नहीं होती जिससे ये वर्षा भी नहीं करती है | यही कारण है कि भारत की अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में  होती है |

प्रश्न: कारण बताएँ कि तमिलनाडु के तट पर शीत ऋतु में वर्षा होती है |

उत्तर : ग्रीष्म ऋतु में तमिलनाडु के तट पर आगे बढते हुए मानसून की ऋतु में वर्षा नहीं होती यह क्षेत्र शुष्क रह जाता है | लेकिन शीत ऋतु में पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु के समय बंगाल की खाड़ी में उच्च वायुदाब की स्थिति होती है और तमिलनाडु के तट पर निम्न वायुदाब की स्थिति होती है | परिणाम स्वरुप पवनें बंगाल की खाड़ी से तमिलनाडु के तट की ओर चलने लगती है ये पवनें अपने साथ पर्याप्त मात्रा में जलवाष्प लेकर आती है और तमिलनाडु के तट से टकरा कर यहाँ वर्षा करती है |यही कारण है की  तमिलनाडु के तट पर शीत ऋतु में वर्षा होती है |

प्रश्न: कारण बताएँ कि पूर्वी तट के डेल्टा वाले क्षेत्र में प्राय: चक्रवात आते है |

उत्तर : पीछे हटते  हुए मानसून की ऋतु में नवम्बर के महीने में उत्तरी भारत में उच्च वायुदाब बन जाता है जो ग्रीष्म ऋतु में निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है | यह निम्न वायुदाब का क्षेत्र यहाँ से खिसक कर बंगाल की खाड़ी में चला जाता है |  निम्न वायुदाब होने के कारण इस क्षेत्र में पवनें चारों ओंर से आने लगती है और बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बन जाता है |  पूर्वी तट पर गोदवरी, कावेरी तथा कृष्ण नदी के डेल्टाई भागों में निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है जिससे ये चक्रवात पूर्वी तट पर टकराते है और अत्यधिक हानि पहुँचातें है |  

प्रश्न: कारण बताएँ कि राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग तथा पश्चिमी घाट का वृष्टि –छाया क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र है |

उत्तर :  राजस्थान में अरावली प्रमुख पर्वत श्रृंखला है | यह  पर्वत श्रृंखला मानसूनी पवनों  की दिशा के समानांतर रहती है | परिणाम स्वरुप यह पर्वत श्रृंखला मानसूनी पवनों कों नहीं रोक पाती और ये पवनें बिना वर्षा के ही आघे निकल जाती है | जिससे राजस्थान में बहुत कम वर्षा होती है | यही कारण है कि यह क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र है |  

            गुजरात कुछ भाग तथा पश्चिमी घाट का वृष्टि –छाया क्षेत्र है अर्थात यहाँ पर मानसूनी पवनों का पवनविमुखी ढलान होता है जिससे मानसूनी पवनों के द्वारा यहाँ पर वर्षा बहुत कम होती है | पर्याप्त वर्षा नहीं मिलने के कारण ये क्षेत्र भी  सूखा प्रभावित क्षेत्र है |