इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र
इंदिरा गाँधी नहर कों पहले
राजस्थान के नाम से जाना जाता था | यह परियोजना मरुभूमि कों हरी-भरी और समृद्ध
भूमि में बदलने के लिए मानवीय प्रयास का ज्वलंत उदाहरण है | यह नहर तंत्र भारत के सबसे
बड़े नहर तंत्रों में से एक है |
इंदिरा गाँधी नहर की स्थिति तथा विस्तार
इंदिरा
गाँधी नहर परियोजना की संकल्पना कँवर सेन ने सन् 1948 में दी थी | इस परियोजना की शुरूआत 31 मार्च 1958 यह नहर पंजाब के फिरोजपुर जिले में सतलुज
तथा व्यास नदी के संगम पर स्थित हरिके बाँध (बैराज) से निकाली गई है | पंजाब में
यह नहर कोई सिंचाई नहीं करती | यहाँ इसे राजस्थान फीडर के नाम से जाना जाता है |
राजस्थान में थार के मरुस्थल में पाकिस्तान की सीमा के समानांतर 40 किलोमीटर की
औसत दूरी पर बहती है | इस नहर की कुल नियोजित लम्बाई 9060 किलोमीटर है |
इंदिरा गाँधी नहर की सिंचाई क्षेत्र और नहर
तंत्र
यह नहर परियोजना 19.63
लाख हेक्टेयर कृषि योग्य कमान क्षेत्र में सिंचाई सुविधा प्रदान
करेगी | इस परियोजना में दो प्रकार के नहर तंत्र है | प्रवाह नहर तंत्र तथा लिफ्ट
नहर तंत्र |
1
प्रवाह नहर तंत्र
इस परियोजना के कुल कमान
क्षेत्र में से 70 प्रतिशत क्षेत्र प्रवाह नहर तंत्रों से सिंचाई सुविधा प्रदान करता
है | प्रवाह नहर में जल ढाल के साथ साथ बहता है | इंदिरा गाँधी नहर तंत्र में सभी
प्रवाह नहरें मुख्य नहर के दाएँ किनारे से निकलती हैं |
2
लिफ्ट नहर तंत्र
नहर के कुल कमान क्षेत्र का 30 प्रतिशत क्षेत्र लिफ्ट तंत्र द्वारा सिंचाई सुविधा प्रदान करता है |
लिफ्ट नहर में ढाल के विपरीत प्रवाह के लिए जल कों बार-बार मशीनों से ऊपर उठाया
जाता है | इंदिरा गाँधी नहर तंत्र में सभी लिफ्ट नहरें मुख्य नहर के बाएँ किनारे
से निकलती हैं |
नहर निर्माण के चरण और उनके कमान क्षेत्र
इंदिरा गाँधी नहर का निर्माण कार्य दो चरणों में
पूरा किया गया है |
1
चरण -1 का कमान क्षेत्र
इंदिरा गाँधी नहर के चरण -1 का
कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिले के उत्तरी भाग में पड़ता है | इस
चरण के कमान क्षेत्र का भूतल थोडा उबड़-खाबड है है | इसका कृषि योग्य कमान क्षेत्र 5.53
लाख हेक्टेयर है | इस कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1960 के
दशक के मध्य में हुई |
2
चरण -2 का कमान क्षेत्र
इंदिरा गाँधी नहर के चरण -2 का कमान क्षेत्र बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर और चुरू जिलों
में पड़ता है | इसका कृषि योग्य कमान क्षेत्र 14.10 लाख
हेक्टेयर है | इसमें स्थानांतरित बालू टिब्बों वाला मरुस्थल भी शामिल है | यहाँ
स्थानान्तरित बालू के टिब्बे पाए जाते हैं | इस क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु में
तापमान 500सेल्सियस तक पहुँच जाता है | इस कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1980 के दशक के आरम्भ में हुई |
इंदिरा गाँधी नहर सिंचाई का पर्यावरण पर
प्रभाव
इंदिरा गाँधी नहर द्वारा
सिंचाई करने से पर्यावरणीय परिस्थितियों पर साकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों ही
प्रकार के प्रभाव पड़े है | जो निम्नलिखित है |
1
साकारात्मक प्रभाव
इंदिरा गाँधी नहर द्वारा
सिंचाई करने से पर्यावरणीय पर साकारात्मक निम्नलिखित है |
क).
लंबी अवधि तक मृदा में नमी
उपलब्ध होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत शुरू किए गए वनीकरण और चरागाह विकास
कार्यक्रमों के कारण यहाँ भूमि हरी-भरी
हो गई है |
ख).
इससे वायु अपरदन और नहरी
तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ
धीमी पड़ गई है |
2
नकारात्मक प्रभाव
इस
नहर द्वारा सिंचाई करने से पर्यावरणीय पर नकारात्मक भी पड़े है जो निम्नलिखित है |
क).
सघन सिंचाई और जल के अत्यधिक
प्रयोग से जल भराव और मृदा लवणता जैसी दोहरी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई है
|
ख).
चरण -1के अधिकाँश भागों में
भौम जल स्तर 0.8 मीटर प्रति वर्ष की तीव्र गति से ऊपर उठ
रहा है |
ग).
जल भराव तथा मृदा लवणता से
मृदा की उपजाऊ शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | जिससे कृषि उत्पादन में भी कमी
आ रही है |
इंदिरा गाँधी नहर सिंचाई का कृषि पर प्रभाव
इंदिरा गाँधी नहर द्वारा
सिंचाई करने से इस क्षेत्र की कृषि पर कई प्रभाव पड़े है जो निम्नलिखित है |
1
नहरी सिंचाई के प्रसार से इस
प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में रूपांतरित हो गई है | इस क्षेत्र
में सफलतापूर्वक फसलें उगाने के लिए मृदा नमी सबसे महत्वपूर्ण सीमकारी कारक रहा है
| परन्तु नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र के विस्तार से बोये गए क्षेत्र में विस्तार
हुआ है | परिणाम स्वरूप परती भूमि में कमी आई है | इससे फसलों की सघनता में भी
वृद्धि हुई है |
2
यहाँ की पारम्परिक फसलें
चना, बाजरा और ग्वार थे | सघन सिंचाई की सुविधा के बाद पारम्परिक फसलों के स्थान
पर गेहूँ, कपास. मूँगफली और चावल ने ले लिया है |
3
सघन सिंचाई से आरम्भ में
कृषि और पशुधन उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि हुई |
4
सघन सिंचाई के कारण इस
क्षेत्र में जल भराव तथा मृदा लवणता की समस्याएँ उत्पन्न हुई परिणाम स्वरूप लंबी
अवधि के दौरान कृषि की सतत पोषणीयता पर प्रश्न उठ गए है |
इंदिरा गाँधी नहर कमान
क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने वाले उपाय
पिछले चार दशकों में जिस तरह
से इस क्षेत्र में विकास हुआ और उससे साथ
साथ इस क्षेत्र में भौतिक पर्यावरण का निम्नीकरण हुआ है | क्योंकि इस नहर परियोजना
के द्वारा इस क्षेत्र में जल भराव तथा मृदा लवणता की समस्याएँ उत्पन्न होने से सतत
पोषणीय विकास में बाधा उत्पन्न हुई है | इसे देखते हुए बहुत से विद्वानों ने
इंदिरा गाँधी नहर परियोजना की पारिस्थितिकीय पोषणता पर प्रश्न उठाये हैं |
यह एक मान्य तथ्य है कि इस कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय
विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से पारिस्थितिकीय सतत पोषणीय विकास
कों बल देना होगा | अत: इस कमान क्षेत्र
में सतत पोषणीय विकास कों बढ़ावा देने वाले सात प्रस्तावित उपायों में से पाँच उपाय पारिस्थितिकीय संतुलन कों पुन:
स्थापित करने पर बल देते है | ये सात उपाय निम्नलिखित है |
1
पहली और सबसे महत्वपूर्ण
आवश्यकता है जल प्रबंधन नीति का कठोरता से लागू करना | इस नहर परियोजना के चरण -1में
कमान क्षेत्र में फसल रक्षण सिंचाई और चरण -2 में फसल
उगाने और चरागाह विकास के लिए विस्तारित सिंचाई का प्रावधान करना |
2
इस क्षेत्र में शस्य प्रतिरूप
में सामान्यत: जल सघन फसलों कों नहीं बोया जाना चाहिए | इसका पालन करते हुए
किसानों का बागवानी कृषि के अंतर्गत खट्टे फलों की खेती करनी चाहिए |
3
कमान क्षेत्र जैसे नालों का
पक्का करना, भूमि विकास तथा समतलन और वारबंदी (ओसरा) पद्धति (नहर के कमान क्षेत्र
में नहर के जल का समान वितरण) प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जानी चाहिए ताकि बहते
जल की क्षति मार्ग में कम हो सके |
4
अति सिंचाई के कारण जलाक्रांत
तथा लवणता से प्रभावित भूमि का पुनरुद्धार किया जाए |
5
इस क्षेत्र में पारिस्थितिकीय तंत्र के विकास के
लिए वनीकरण, वृक्षों की रक्षक मेखला (Shelterbelt)
का निर्माण और चरागाह का विकास बहुत आवश्यक है | विशेषकर चरण -2 में भंगुर (Fragile) पर्यावरण में पारितंत्र विकास (Eco-Development
) के लिए अति आवश्यक है |
6
इस प्रदेश में सामाजिक सतत
पोषणीता का लक्ष्य हासिल करने के लिए निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भू-आवंटियों कों कृषि
के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध करावाई जाए |
7
केवल कृषि और पशुपालन के
विकास से इन क्षेत्रों में आर्थिक सतत पोषणीय विकास की अवधारणा कों साकार नहीं
किया जा सकता | अत: कृषि तथा इससे संबंधित क्रियाकलापों कों अर्थव्यवस्था के अन्य
सेक्टरों के साथ विकसित करना होगा | इससे इस क्षेत्र में आर्थिक विविधीकरण होगा
तथा मूल आबादी गाँवों, कृषि-सेवा केन्द्रों (सुविधा गाँवों) और विपणन केन्द्रों (मंडी
कस्बों) के बीच प्रकार्यात्मक संबंध स्थापित होगा |