Tuesday, July 27, 2021

Demographic Transition Theory

जनांकिकीय चक्र

जनसंख्या का विकास एक चक्र के रूप में होता है | ऐसा चक्र जिसमें किसी क्षेत्र का समाज ग्रामीण, खेतिहर और अशिक्षित अवस्थाओं से उन्नति करता हुआ नगरीय, औद्योगिक और शिक्षित बनता है तो उस क्षेत्र की जनसंख्या में भी उच्च जन्म दर से निम्न जन्म दर  और उच्च मृत्यु दर से निम्न मृत्यु दर में परिवर्तन  हो जाता है | यह चक्र इन परिवर्तनों के दौरान अनेक अवस्थाओं से गुजरता है | इन अवस्थाओं कों ही सामूहिक रूप से जनांकिकीय चक्र कहते हैं |

जनसंख्या का जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत

जनांकिकीय संक्रमण अथवा जनसांख्यकीय संक्रमण सिद्धांत एक जनसंख्या संबंधी सिद्धांत है | जो किसी स्थान की जनसंख्या के आँकड़ों के वर्णन के साथ-साथ उस स्थान की भविष्य की जनसंख्या के पूर्व अनुमान एक लिए प्रयोग किया ज सकता है |

            इस सिद्धांत का प्रतिपादन डब्ल्यू० एम० थाम्पसन ने सन् 1929 में किया और  एल० डब्ल्यू० नेटोस्टीन  ने सन् 1945  में किया | इन्होने यूरोप,ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में प्रजनन दर (जन्म दर ) और मृत्यु दर की प्रवृति के अनुभवों के आधार पर यह सिद्धांत दिया था |

यह सिद्धांत उच्च प्रजनन दर  (जन्म दर) तथा मृत्यु दर से  न्यून जन्म दर (प्रजनन दर ) से न्यून मृत्यु दर के जनसंख्या परिवर्तन कों दर्शाता है | विद्वान इस सिद्धांत के चक्र कों जनसंख्या चक्र, जनांकिकीय चक्र या जनसंख्या संक्रमण भी कहते है | इस सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या संक्रमण के चक्र की विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए कोई समाज ग्रामीण, खेतिहर और अशिक्षित अवस्थाओं से उन्नति करता हुआ नगरीय, औद्योगिक और शिक्षित (साक्षर) बनता है |

 

जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या के संक्रमण की अवस्थायें

जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या के संक्रमण की तीन अवस्थायें हैं |  जिनका वर्णन निम्नलिखित है |

1)      प्रथम अवस्था

इस अवस्था में उच्च प्रजननशीलता (जन्म दर) तथा उच्च मृत्यता (मृत्यु दर ) होती है | इसका कारण यह है कि लोग महामारियों तथा भोजन की अनिश्चित आपूर्ति से होने वाली मृत्युओं की क्षति पूर्ति अधिक सन्तान पैदा करके करते हैं | जनसंख्या वृद्धि धीमी गति से होती है | अधिकांश लोग खेती में कार्यरत रहते है | इस अवस्था में बड़े परिवारों कों परिसम्पति माना जाता है | जीवन प्रत्याशा निम्न होती है | अधिकांश लोग अशिक्षित होते हैं | प्रौद्योगिकी का स्तर निम्न होता है | 200 वर्ष पूर्व विश्व के सभी देश इसी अवस्था में थे |  

2)      द्वितीय अवस्था

इस अवस्था के प्रारम्भ में प्रजननशीलता ऊँची बनी रहती है | परन्तु जैसे - जैसे समय बीतता है यह घटती जाती है | इस अवस्था में  मृत्यु दर कम रहती है | स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं तथा स्वच्छता में सुधार के कारण मृत्यु दर में कमी आने लगती है | उच्च जन्म दर तथा निम्न मृत्यु दर के कारण जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होने लगती है | यह स्थिति जनसंख्या विस्फोट कहलाती है |

3)      तृतीय अवस्था (अंतिम अवस्था)

यह जनसंख्या संक्रमण की अंतिम अवस्था कहलाती है | इस अवस्था में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत अधिक कम हो जाते हैं | फलस्वरूप या तो जनसंख्या स्थिर हो जाती है या मंद गति से बढती है | लोगों का तकनीकी ज्ञान (प्रौद्योगिकी स्तर) उच्च स्तर का होता है | ऐसी अवस्था में जनसंख्या विचार पूर्वक परिवार के आकार कों नियंत्रित करती है |

इन तीनों अवस्थाओं कों निम्न चित्र द्वारा समझा ज सकता है |

 


World Population (Trends in Growth, trends in double the population, problems related to population growth

 विश्व में जनसंख्या वृद्धि की प्रवर्तियाँ  (आदि काल से लेकर अब तक विश्व की जनसंख्या की प्रवर्तियाँ)

पृथ्वी पर 700 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं | विश्व की जनसंख्या कों इस विशाल आकार में पहुँचने में शताब्दियाँ लगी हैं | आरम्भिक कालों में विश्व की जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ी है | पिछले कुछ वर्षों के दौरान ही जनसंख्या आश्चर्यजनक ररूप से बढ़ी है | आदिकाल से लेकर अब तक विश्व की जनसंख्या वृद्धि की प्रवर्तियों कों निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा ज सकता है |

1.       लगभग 8000 से 12000 वर्ष पूर्व कृषि के उद्गम व आरम्भ के बाद जनसंख्या का आकार बहुत छोटा था | मौते तौर पर जनसंख्या 800 लाख के आस पास थी |

2.       ईसा की पहली शताब्दी में जनसंख्या करोड़ से कम थी |

3.       16वीं और 17वीं शताब्दी में बदले विश्व व्यापार ने जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के लिए मंच तैयार किया |  

4.       औद्योगिक क्रान्ति केन उदय के समय 1600 ईस्वीं के आस पास जनसंख्या लगभग 50 करोड़ थी |

5.       औद्योगिक क्रान्ति के बाद विश्व जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि हुई | सन् 1830 में  जनसंख्या 1  अरब के आसपास होंगे थी |जो सन् 1930 अर्थात सौ वर्षों  में दोगुनी हो गई |

6.       केवल बीसवीं शताब्दी में यह 4 गुनी बढ़ गई | अब एक अनुमान के अनुसार  8 करोड़ लोग पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बढ़ जाते है | 

विश्व में जनसंख्या के दोगुणा होने की अवधि की प्रवर्तियाँ

मानव जनसंख्या को शुरू में एक करोड़ होने में 10 लाख से भी अधिक वर्ष लग गए थे | लेकिन वर्तमान समय में यह  8 अरब के आस-पास हो गई है | जो दर्शाता है कि विश्व जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है | अपनी पिछली जनसंख्या के मुकाबले दोगुनी होने का समय तेजी से घटता ज रहा है | विश्व की जनसंख्या के दोगुणा होने की प्रवर्तियों को निम्न तथ्यों से समझा ज सकता है |

A.     प्रारम्भिक काल में जनसंख्या बहुत धीमी गति से बढ़ी | प्रारम्भिक एक करोड़ होने में  10 लाख से भी अधिक वर्ष लग गए |

B.     सन् 1650 के आस - पास जनसंख्या 50 करोड़ थी | जो सन् 1850 में 100 करोड़ हो गई | 50 करोड़ जनसंख्या बढ़ने में लगभग 150 वर्ष लग गए |

C.     सन् 1850 में जनसंख्या 100 करोड़ (एक अरब)  से बढ़कर सन् 1930 में यह 200 करोड़ (दो अरब)  जनसंख्या हो गई |  केवल 80 वर्षों में जनसंख्या दोगुनी हो गई |

D.     अगली बार दोगुनी होने में केवल 45 वर्ष ही लगे | 1930 मेंजनसंख्या 200 करोड़ थी जो 1975 में बढ़कर 400 करोड़ हो गई |  यह स्थिति जनसंख्या विस्फोट की स्थिति कों दर्शाती है |

E.      विद्वानों के अनुमान के अनुसार विश्व की जनसंख्या जो 1975 में 400 करोड़ थी केवल 37 वर्षों में ही सन् 2012 के आस पास  800 करोड़ (8 अरब ) हो गई है |

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विश्व में जनसंख्या के दोगुने होने की अवधि तेजी से कम हो रही है | 

जनसंख्या वृद्धि के स्थानिक प्रारूप

विश्व के विभिन्न महाद्वीपों और प्रदेशों में जनसंख्या वृद्धि की दर में अत्यधिक असमानता देखने कों मिलती है | विकसित देशों में वृद्धि की दर विकासशील देशों की तुलना में कम है | सन् 2015 के विश्व की जनसंख्या के आकडों के अनुसार विश्व में जनसंख्या परिवर्तन की दर 1.2 प्रतिशत वार्षिक है | जो निम्न प्रतीत होती है | लेकिन इस वृद्धि दर से भी विशाल जनसंख्या में बहुत अधिक वृद्धि होती है | विश्व में जनसंख्या के स्थानिक प्रारूप कों निम्न प्रकार से समझ सकते हैं |

1)      उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले क्षेत्र

इस वर्ग में वे राष्ट्र शामिल हैं जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर 2 से  2.9 प्रतिशत वार्षिक होती है | इस वर्ग में अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश देश शामिल है | अफ्रीका महाद्वीप की औसत वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत है |

2)      मध्यम जनसंख्या वृद्धि वाले क्षेत्र

इस वर्ग में 1से 1.9 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि वाले देश शामिल किए जाते है | इन देशों में दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप व  केरेबियन द्वीप समूह के देश, तथा एशिया के अधिकांश देश आते है |  

3)      निम्न जनसंख्या वृद्धि वाले क्षेत्र

जिन देशों की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1 प्रतिशत से भी कम रहती है | वे निम्न जनसंख्या वृद्धि वाले देश कहलाते हैं | इन देशों में यूरोप के अधिकांश देश तथा उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा शामिल हैं |  

जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास में संबंध

किसी भी देश की जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ वहाँ प्राकृतिक संसाधनों की माँग भी बढ़ने लगती है | साथ ही रोजगार के अवसरों की भी आवश्यकता होती है | यदि जनसंख्या के बढ़ने से लोगों की आय कम होने लगती है तो देश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | देश का विकास अवरूध हो जाता है | जीवन स्तर गिरने लगता है |

            इसके विपरीत जनसंख्या वृद्धि होने के कारण संसाधनों का सही उपयोग होता है | तो जनसंख्या वृद्धि अनुकूल प्रभाव प्रदान करती है | क्योंकि जनसंख्या के द्वारा संसाधनों का सही उपयोग होने पर रोजगार के साधन बढते हैं | लोगों की आर्थिक उन्नति होने लगती है | देश का विकास तेज गति से होने लगता है | लोगों के जीवन स्तर में बढोतरी होती है |

जनसंख्या वृद्धि के कारण उत्पन्न समस्याएँ

जनसंख्या वृद्धि के कारण निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो सकती है |

1)      संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है |

2)      जनसंख्या के भरण-पोषण में कठिनाई उत्पन्न होने लगती है |

3)      विकास की गति धीरे हो जाती है |

4)      रोजगार के अवसरों की कमी होती है | इससे आश्रित जनसंख्या बढ़ने लगती है |

जनसंख्या ह्रास (कमी) से उत्पन्न समस्याएँ

जनसंख्या में कमी (ह्रास) के कारण निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो सकती है |

1)      संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाता है |

2)      समाज की आधारभूत संरचना अस्थिर होने लगती है |

3)      देश का भविष्य चिंता और निराशा में डूबने लगता है |

                4)    हमेशा असुक्षा की भावना बनी रहती है |

Sunday, July 25, 2021

The _Origin_and_Evolution_of_the_Earth_lesson_2_11th_geography

 

कक्षा 11वीं

पुस्तक : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत

अध्याय 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

 

पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित आरम्भिक सिद्धांत या परिकल्पनाएँ

पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न दार्शनिकों व वैज्ञानिकों ने अनेक परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की | पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित प्रारम्भिक परिकल्पनाओं कों मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है |

1.    अद्वैतवादी परिकल्पनाएँ

2.    द्वैतवादी परिकल्पनाएँ

इन आधारों पर प्रमुख परिकल्पनाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्लिखित है |

अद्वैतवादी परिकल्पनाएँ

 क).            इमैनुअल कांट की गैसीय राशि (वायव्य राशि)परिकल्पना

इमैनुएअल कांट जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक थे | उन्होंने सन 1755 में पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित गैसीय परिकल्पना प्रस्तुत की थी | उनके अनुसार प्रारम्भ में आद्य पदार्थ गैसीय, ठंडा तथा समान से कणों के  रूप में बिखरा हुआ था | कांट के अनुसार यह गैसीय पदार्थ संगठित  होने लगा | कांट के अनुसार इसी संगठित गैसीय पदार्थ से पृथ्वी तथा सौर मंडल के अन्य ग्रहों की उत्पत्ति हुई है |

ख).            लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास फ्रांस के एक महान गणितज्ञ थे | उन्होंने इमैनुएअल कांट की परिकल्पना कों संशोधित करके प्रस्तुत किया | इस परिकल्पना के अनुसार आद्य पदार्थ बहुत ही गर्म था और मंद गति से बादल के रूप में घूर्णन कर रहा था इसी से ही ग्रहों का निर्माण हुआ | इस गर्म और मंद गति से घूमते हुए बादल कों लाप्लास ने निहारिका कहा था | इसलिए इस परिकल्पना कों निहारिका परिकल्पना के रूप जाना जाता है |

द्वैतवादी परिकल्पनाएँ

 क).            चेम्बरलिन तथा मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना

1900 ई॰ में चेम्बरलिन तथा मोल्टन ने ग्रहाणु परिकल्पना प्रस्तुत की |इस परिकल्पना के अनुसार ब्रहमांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के निकट से गुजरा |इस भ्रमणशील तारे के गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य के तल से सिगार के आकार के रूप में कुछ पदार्थ बाहर निकल कर अलग हो गया | जब भ्रमणशीलतारा सूर्य से दूर चला गया तो सूर्य सतह से बहार निकला हुआ यह पदार्थ सूर्य के चारों ओर घूमने लगा और यही धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया | इस परिकल्पना का समर्थन जेम्स जींस और सर हैराल्ड जैफरी ने भी किया है |

ख).            जेम्स जींस और सर हैराल्ड जैफरी  की ज्वारीय परिकल्पना 

पहले तो इन विद्वानों ने चेम्बरलिन तथा मोल्टन की ग्राहाणु परिकल्पना का समर्थन किया लेकिन बाद में एक तर्क देते हुए कहा की सूर्य के साथ एक भ्रमणशील तारे की बात हम मानते है | इस परिकल्पना के अनुसार सूर्य एक गैस का पिंड तथा एक अन्य भ्रमणशील तारा किसी कारण सूर्य के पास आया और अपनी गुरुत्वाकर्षण बाल के द्वारा सूर्य के निकट आया और सूर्य के गैसीय पदार्थ कों अपनी ओर आकृषित करने लगा | यह पदार्थ फिलामेंट के रूप में बहार निकला और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने लगा |यही फिलामेंट या पदार्थ सौरमंडल के ग्रहों का कारण बना | सभी ग्रहों कि तरह पृथ्वी की उत्पत्ति हुई |

कुछ समय बाद इस सिद्धांत के अंतर्गत सूर्य के साथ-साथी तारे की बात कही थी दो तारे होने के कारण ही  लोग इसे दैतारक सिद्धांत (Binary theory) कहते है |

 ग).            ऑटो शिमिड और कार्ल वाइजास्कर की निहारिका परिकल्पना

1950 ई॰ में रूस के ऑटो शिमिड (Otto Shimid) और जर्मनी के कार्ल वाइजास्कर (Carl Weizaskar) ने अपने –अपने तरीके से निहारिका परिकल्पना में सुधार किए | ऑटो शिमिड ने अपनी धूल और गैसीय परिकल्पना में ब्रह्माण्ड में भुत अधिक धूल और गैस होने की बात कही जबकि कार्ल वाइजास्कर (Carl Weizaskar) ने सूर्य की उत्पत्ति कॉस्मिक धूल (अंतरिक्ष की धूल) से मानी है |

धूल और गैस के कणों में घर्षण तथा टकराव (collision) के कारण एक चपटी तश्तरी के रूप में बादल का निर्माण हुआ और अभिवृद्धि (Accretion) प्रक्रम द्वारा ही ग्रहों का निर्माण हुआ | इसी परिकल्पना के द्वारा ग्रहों या पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधी समस्याएँ सुलझने लगी | जैसे सूर्य और ग्रहों के बिच कोणीय संवेग, विभिन्न ग्रहों की संरचना में अन्तर के कारण, ग्रहों की गति में अन्तर सूर्य और ग्रहों की वर्मान दूरी आदि सभी समस्याओं का हल निकाल सकते है |

ब्रह्मांड की से उत्पत्ति सम्बन्धित आधुनिक सिद्धांत (बिग बैंग सिद्धांत)

ब्रह्मांड की से उत्पत्ति सम्बन्धित आधुनिक सिद्धांतों में से सर्वमान्य सिद्धांत बिग बैंग सिद्धांत(Big Bang Theory) है | इस सिद्धांत कों विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना (Expanding Universe Hypothesis) भी कहते है | ब्रह्माण्ड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी बढ़ना | इस परिकल्पना कों 1920 ई॰ में एडविन हब्बल (Edwin Hubble) ने दिया था |उन्होंने प्रमाण दिए थे की ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है | उनके अनुसार आकाशगंगाओं के बीच की दूरी बढ़ रही है |

ब्रह्माण्ड के विस्तारित होने की प्रक्रिया कों हम एक गुब्बारे की सहायता से समझ सकते है | यदि एक गुब्बारे पर कुछ निशान कर दिए जाए और फिर उसमें हवा भरी जाए | जैसे जैसे गुब्बारा फुलता जायेगा तो गुब्बारे पर लगाए गए निशान एक दूसरे से दूर होते जायेंगे | ठीक इसी तरह हमारा ब्रह्माण्ड में आकाशगंगाओं के बीच की दूरी बढ़ रही है | जो बताता है की ब्रह्माण्ड भी लगातार बढ़ रहा है |

बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्नलिखित तीन अवस्थाओं में हुआ है |

1.    आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्माण्ड बना है वे बहुत ही छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे | जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था |

2.    दूसरी अवस्था के अंतर्गत इस एकाकी परमाणु में भीषण विस्फोट हुआ जिसे हम बिग बैंग (महा विस्फोट) कहते है | वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की यह घटना आज से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी | इस विस्फोट की प्रक्रिया से एकाकी परमाणु में वृहत विस्तार हुआ | इस विस्तार के कारण कुछ उर्जा पदार्थ में बदल गयी | विस्फोट के बाद एक सेकेंड बहुत छोटे हिस्से के अंतर्गत ही उस एकाकी परमाणु का वृहत विस्तार हुआ | इसके बाद इस विस्तार की गति धीमी पड़ गयी | वैज्ञानिकों के अनुसार बिग बैंग (महा विस्फोट) होने के तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ | ये विस्फोट इतना विशाल था कि आज भी ब्रह्माण्ड का विस्तार जारी है |

3.    बिग बैंग (महा विस्फोट) से तीन लाख वर्षों के दौरान तापमान 45000 केल्विन कम हो गया | जिससे और अधिक परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ | इस अवस्था में ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया |

ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड की से उत्पत्ति सम्बन्धित आधुनिक सिद्धांतों में से सर्वमान्य सिद्धांत बिग बैंग सिद्धांत(Big Bang Theory) या विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना (Expanding Universe Hypothesis) के पक्ष में है |

ब्रह्माण्ड से सम्बन्धित स्थिर अवस्था संकल्पना

          ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बन्धित बिग बैंग सिद्धांत से होयल  (Hoyle) नामक  वैज्ञानिक सहमत नहीं थे इसलिए उन्होंने ब्रह्मांड से सम्बन्धित स्थिर अवस्था संकल्पना(Steady State Concept) प्रस्तुत की | इस परिकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा है |

आकाशगंगा का अर्थ तथा निर्माण

प्राम्भिक ब्रह्मांड में ऊर्जा और पदार्थ का वितरण समान नहीं था |इसी कारण पदार्थों का घनत्व भी भिन्न–भिन्न हो गया | घनत्व में आरम्भिक भिन्नता के कारण गुरुत्वाकर्षण बल में भिन्नता आई | इसके परिणाम स्वरूप अधिक गुरुत्वाकर्षण वाले पदार्थों के आस पास  एकत्रण होता गया | इस एकत्रण के कारण ही आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ | एक आकाशगंगा असंख्य तारों का समूह होता है | आकाशगंगा के निर्माण की शुरूआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादल के संचयन से हुई | आकाशगंगाओं का विस्तार बहुत अधिक होता है| आकाशगंगाओं की दूरी हजार प्रकाशवर्षों  में मापी जाती है | एक अकेली आकाशगंगा का व्यास 80 हजार से 1 लाख 50 हजार प्रकाशवर्ष होता है | 

प्रकाशवर्ष

एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है उस दूरी कों प्रकाश वर्ष कहते है | प्रकाश वर्ष दूरी का मात्रक है |

प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सैकेंड है | इस हिसाब से गणना करे तो हम देखते है की प्रकाश एक वर्ष में 9.461 x1012  किलोमीटर के बराबर होती है |  पृथ्वी तथा सूर्य के बीच की दूरी 14 करोड 95लाख 98 हजार किलोमीटर (14 करोड 96 लाख किलोमीटर) | प्रकाश इस दूरी कों केवल 8.311 मिनट में तय कर लेता है|

तारों का निर्माण

अधिकतर वैज्ञानिक ये मानते है कि प्राम्भिक ब्रह्मांड में ऊर्जा और पदार्थ का वितरण समान नहीं था |इसी कारण पदार्थों का घनत्व भी भिन्न–भिन्न हो गया | घनत्व में आरम्भिक भिन्नता के कारण गुरुत्वाकर्षण बल में भिन्नता आई | इसके परिणाम स्वरूप अधिक गुरुत्वाकर्षण वाले पदार्थों के आस पास  एकत्रण होता गया | इस एकत्रण के कारण ही आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ | एक आकाशगंगा असंख्य तारों का समूह होता है | आकाशगंगा के निर्माण की शुरूआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादल के संचयन से हुई | हाइड्रोजन गैस के इस बादल कों निहारिका (नेबुला)  कहते है |   हाइड्रोजन गैस के लगातार संचयन से निहारिका बढती चली गयी और बढती हुई निहारिका में गैस के अलग –अलग झुण्ड बन गए | ये झुण्ड बढते-बढते घने गैसीय पिंड बने, ये गैस के पिंड सिकुड़ते चले गए और इनका घनत्व इतना अधिक हो गया कि इनमें संयलन प्रक्रिया होने लगी | जिनसे तारों का निर्माण प्रारम्भ हुआ | वैज्ञानिक मानते है की तारों का निर्माण लगभग 5 से 6 अरब वर्षों पहले होना शुरू हुआ था |

ग्रहों का निर्माण

ग्रहों का निर्माण भी उन्हीं निहारिकाओं से हुआ जिनसे तारों का निर्माण हुआ है | ग्रहों का निर्माण की वैज्ञानिकों ने तीन अवस्थाएँ मानी है| जो निम्नलिखित है |

1.    प्रथम अवस्था में निहारिका के अंदर तारे गैस के गुच्छित झुण्ड के रूप में होते है | इन गुच्छित झुण्डों में गुरुत्वाकर्षण होने के कारण निहारिका में क्रोड का निर्माण हुआ | इस क्रोड के चारों ओर गैस और धूल कणों की घूमती हुई तश्तरी विकसित हुई |

2.    दूसरी अवस्था में गैसीय बादल का संघनन आरम्भ हुआ और क्रोड कों चारों ओर से ढकने वाले पदार्थ छोटे गोले के रूप में विकसित हुए | पदार्थों के अणुओं में होने वाली संसंजन प्रक्रिया हुई |जिसमें अणुओं में पारस्परिक आकर्षण होने लगता है  | इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप ये छोटे गोले ग्रहाणुओं के रूप में विकसित हुए | छोटे पिंडों की अधिक संख्या ही ग्रहाणु कहलाते है | ग्रहाणुओं में संघट्टन (collision)  की प्रक्रिया के द्वारा ग्रहाणु बड़े-बड़े पिंड बन गए और गुरुत्वाकर्षण के कारण आपस में जुड गए |

3.    तृतीय तथा अंतिम अवस्था में ग्रहाणुओं  के सहवर्धित होने पर कुछ बड़े पिंडों का निर्माण हुआ जिन्हें ग्रह कहते है |

चंद्रमा (पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह) की उत्पत्ति संबंधी विचार

पृथ्वी का एक ही प्राकृतिक उपग्रह है जिसे हम चंद्रमा के नाम से जानते है | पृथ्वी की उत्पत्ति की तरह ही चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी कई विचार प्रस्तुत किए गए है |

  सर जार्ज डार्विन ने सन्1838 में चंद्रमा की उत्पत्ति से सम्बन्धित मत प्रस्तुत किया कि प्रारम्भ में पृथ्वी और चंद्रमा एक ही पिंड के रूप में तेजी से घूम रहे थे | यह पूरा पिंड डंबल (ऐसी वस्तु जो किनारों से मोटी तथा बीच से पतली होती है ) की आकृति में बदल गया और अंत में टूट गया |  उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा का मिर्माण उसी पदार्थ से हुआ है जो प्रशांत महासागर की जगह से निकला है | अर्थात चंद्रमा के बनने से जो गर्त बना आज वह प्रशांत महासागर के रूप में मौजूद है |

वैज्ञानिकों में इसकी उत्पत्ति के संबंध में दिए गए विचारों में मतभेद है | अर्थात आधुनिक समय के वैज्ञानिक किसी भी विचारधारा कों नहीं मानते |

            आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है की चंद्रमा की उत्पत्ति एक बड़े टकराव (Giant impact)  से हुई जिसे द बिग स्प्लैट (The Big Splat) कहा जाता है | वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि पृथ्वी के बनने के कुछ समय बाद ही मंगल ग्रह के 1 से 3 गुना आकार का पिंड पृथ्वी से टकराया | इस टकराव से अलग हुआ पृथ्वी का यह पदार्थ पृथ्वी की कक्षा में ही घूमने लगा | यही वर्तमान समय में चंद्रमा है | एक अनुमान के अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति आज से लगभग4.44 अरब वर्षों पहले हुई | 

सौरमंडल

 सौर मंडल के सदस्य

सूर्य एक तारा है इसके परिवार में स्वयं सूर्य, उसके आठ ग्रह , इन ग्रहों के 63 उपग्रह तथा लाखों छोटे पिंड जिन्हें क्षुद्र ग्रह कहते शामिल है |  इस सौर परिवार कों ही सौर मंडल कहते है |

सौर मंडल का निर्माण

सौर मंडल का निर्माण निहारिका से माना जाता है | निहारिका के ध्वस्त होने और क्रोड बनने की शुरुआत लगभग 5 से  5.6 अरब वर्षों पहले हुई जिससे एक तारे का निर्माण हुआ जिसे हम सूर्य कहते है | इसके बाद आज से लगभग 4.6 से  4.56 अरब वर्षों पहले ग्रहों का निर्माण हुआ | ये माना जाता है की सभी ग्रहों का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्षों पहले एक ही समय में हुआ है | जो छोटे पिंड स्वतंत्र रह गए वे क्षुद्र ग्रहों के रूप में जाने जाते है |

सूर्य से दूरी, आकार तथा संगठन करने वाले पदार्थ के आधार पर ग्रहों के प्रकार   

या

आतंरिक (भीतरी) ग्रह और बाह्य ग्रह में अन्तर    

या    

पार्थिव और जोवियन ग्रह में अन्तर

 सूर्य से दूरी, आकार तथा संगठन करने वाले पदार्थ के आधार पर ग्रहों के प्रकार हम ग्रहों कों विभाजित कर सकते है |

इन आधारों पर ग्रह दो हिस्सों में बाँटे गए है | आतंरिक (भीतरी) ग्रह तथा बाह्य ग्रह

 क).            आतंरिक (भीतरी) ग्रह

सूर्य और क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच  स्थित चार ग्रह आंतरिक या भीतरी ग्रह कहलाते है | ये बुध, शुक्र, पृथ्वी तथा मंगल है | इन ग्रहों कों पार्थिव ग्रह भी कहते है | क्योंकि ये ग्रह पृथ्वी की ही  तरह की शैलों और धातुओं से बने है | इन ग्रहों का घनत्व अधिक है | ये आकार में छोटे है |

ख).            बाह्य ग्रह

क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बाद सूर्य से दूर स्थित चार ग्रह बाह्य ग्रह कहलाते है | ये बृहस्पति, शनि, यूरेनस (अरुण) तथा नेप्च्यून (वरुण) है | इन ग्रहों कों जोवियन ग्रह भी कहते है | जोवियन का अर्थ है बृहस्पति की तरह | अत: ये ग्रह बृहस्पति की तरह ही विशाल आकार वाले है | क्योंकि ये ग्रह हाइड्रोजन तथा हीलियम जैसी गैसों के बने हुए है इसलिए इनका घनत्व कम है | इनमें से अधिकतर ग्रह पार्थिव ग्रहों से विशाल है | 

भीतरी ग्रह पार्थिव होने के कारण  या  पार्थिव ग्रह चट्टानी होने के कारण

भीतरी ग्रह पार्थिव या चट्टानी है जिसके निम्न लिखित कारण है |

A.   भीतरी ग्रह सूर्य के निकट स्थित है | अधिक तापमान के कारण  गैसें इन ग्रहों पर घनीभूत और संगठित नहीं हो सकी | 

B.   सौर वायु सूर्य के अधिक निकट ज्यादा शक्तिशाली थी | जिससे यह सौर वायु  इन ग्रहों  से अधिक मात्रा में कारण इन ग्रहों का घनत्व अधिक है |

C.   ये आकार में छोटे है | अत: इन ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम होने के कारण गैसें इन ग्रहों पर रुक ना सकी |

प्लूटों एक बौना ग्रह

पहले सौरमंडल के नौ ग्रह थे | क्योंकि प्लूटो भी इनमें शामिल था | लेकिन 29 जुलाई 2005कों एक नए ग्रह की खोज की गई जिसे 2003UIB313 नाम दिया गया | यह आकार में प्लूटो के समान था | इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी संगठन ने एक नई परिभाषा 24 अगस्त 2006 कों दी | इस नई परिभाषा के कारण प्लूटो और 2003UIB313  कों बौने ग्रह की संज्ञा दी गयी | इसके बाद से सौर मंडल में आठ ही ग्रह है |  जो बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस (अरुण) तथा नेप्च्यून (वरुण) है |

 पृथ्वी का उद्भव तथा विकास 

पृथ्वी का निर्माण उसी निहारिका से हुआ जिनसे सूर्य तथा अन्य ग्रहों का निर्माण हुआ है |  प्रारम्भिक काल में पृथ्वी का स्वरूप किस तरह का था और पिछले लगभग 460 करोड वर्षों (4.6 अरब वर्षों) के दौरान उसके स्वरूप में परिवर्तन कों हम पृथ्वी के विकास के रूप में देखते है |

                                   पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं कों समझने के लिए हमें प्रारम्भिक काल में पृथ्वी का स्वरूप से लेकर स्थल मंडल का विकास , वायुमंडल व जल मंडल का विकास और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कों समझना होगा | जो निम्न प्रकार से है |

प्रारम्भिक काल में पृथ्वी का स्वरूप

                                   प्रारम्भ में पृथ्वी एक चट्टानी, गर्म और वीरान ग्रह के रूप में थी | इसका वायुमंडल हाइड्रोजन और हीलियम गैसों से बना था | जिसके कारण वायुमंडल बहुत विरल था | यह आज के वायुमंडल से बहुत भिन्न था |

पृथ्वी पर स्थल मंडल का विकास (पृथ्वी की परतदार संरचना का विकास)

                                   उल्काओं के अध्ययन से पता चलता है कि ग्रहाणु व दूसरे  खगोलीय पिंड घने तथा हल्के दोनों ही प्रकार के पदार्थों के मिश्रण से बने है और बहुत से ग्रहाणुओं के इकट्ठा होने पर उनका निर्माण हुआ है इसी प्रकार    पृथ्वी का निर्माण भी हुआ है |

                                   पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान या उत्पत्ति के तुरंत बाद पृथ्वी पिंड के रूप में बनी थी | वह पिंड गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इकट्ठा हो रहा था | इस इकट्ठा होने की प्रक्रिया से विबिन्न प्रकार के पदार्थ प्रभावित हुए | जिससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न हुई | ऊष्मा निकलने की प्रक्रिया के कारण तापमान बढने लगा | तापमान बढने के कारण विभिन्न पदार्थ पिघलने लगे | पदार्थों के पिघलने से पृथ्वीआंशिक रूप से द्रव अवस्था में आ गई |

                                   द्रव अवस्था में हुई पृथ्वी के अंदर तापमान की अधिकता से हल्के (कम घनत्व वाले पदार्थ) और भारी (अधिक घनत्व वाले पदार्थ) के पदार्थ अलग-अलग होने लगे और भारी पदार्थ जैसे लोहा पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ ऊपर की ओर या पृथ्वी की सतह पर आ गए | जैसे जैसे पृथ्वी ठंडी होने लगी ये अलग हुए पदार्थ भी ठंडे होने लगे और ठोस रूप में परिवर्तित हो गए |  सबसे ऊपर भू-पृष्ठ या पृथ्वी की ऊपरी सतह का निर्माण हुआ |

                                   चंद्रमा की उत्पत्ति के दौरान भीषण संघट्ट (बड़ा टकराव) होने के कारण पृथ्वी का तापमान फिर से बढ़ने लगा और बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई | यह पृथ्वी का परतों के रूप में विभेदन का दूसरा चरण था | इस चरण में हुए विभेदन से पृथ्वी के पदार्थ अनेक परतों में अलग हो गए |  वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के धरातल से  क्रोड तक कई परतें पाई जाती है |

1)    पर्पटी या क्रस्ट (Crust)

2)    प्रावार या मेंटल (Mental),

3)    बाह्य क्रोड (Outer Core)

4)    आंतरिक क्रोड( Inner Core)  

पृथ्वी के ऊपरी भाग से आंतरिक भाग तक जाने पर पदार्थों का घनत्व, तापमान और दबाव  बढता जाता है |

विभेदन प्रक्रिया

अधिक तापमान के कारण पृथ्वी का द्रव अवस्था में होने पर हल्के (कम घनत्व वाले) और भारी (अधिक घनत्व वाले) के पदार्थों के अलग-अलग होने की प्रक्रिया कों विभेदन (Differentiation)  प्रक्रिया कहते है |

वायुमंडल और जल मंडल का विकास

पृथ्वी के वायुमंडल और जल मंडल के विकास  कों निम्न प्रकार से समझ सकते है |

पृथ्वी के वायुमंडल का विकास

पृथ्वी के वर्तमान वायुमंडल के  विकास की तीन अवस्थाएँ मानी जाती है |

1.    पहली अवस्था में आदिकालिक वायुमंडलीय गैसों का ह्रास

                                   प्राम्भिक वायुमंडल में हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों की अधिकता थी | सौर पवन के कारण यह वायुमंडल पृथ्वी से दूर हो गया | ये आदिकालिक वायुमंडल पृथ्वी के साथ-साथ दूसरे पार्थिव ग्रहों से भी इसी कारण दूर हुआ | आदिकालिक वायुमंडल इस तरह सौर पवन के कारण दूर धकेलना या समाप्त हो गया | वायुमंडल के विकास की यह पहली अवस्था थी |

2.    द्वितीय अवस्था में पृथ्वी के भीतर से  गैसें, भाप तथा जलवाष्प निकलना और वायुमंडल का  विकास

                                   द्वितीय अवस्था में पृथ्वी के ठंडा होने और विभेदन प्रक्रिया के दौरान पृथ्वी के अंदरूनी भाग से बहुत सी गैसें, भाप तथा जलवाष्प निकली जिसने वायुमंडल के विकास में सहयोग किया | वह प्रक्रिया जिससे पृथ्वी के भीतरी भाग से गैसें धरती पर आई उसे गैस उत्सर्जन (Degassing) कहते है | इसी गैस उत्सर्जन की प्रक्रिया से वर्तमान वायुमंडल का निर्माण शुरू हुआ|  आरम्भ में जलवाष्प, नाइट्रोजन, कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन और अमोनिया जैसी गैसें अधिक मात्रा में थी और स्वतंत्र रूप में ऑक्सीजन बहुत कम थी |

3.    तीसरी एवं अंतिम अवस्था में जैवमंडल में होने वाली प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल में संशोधन

                                   इस अवस्था में जैवमंडल में जीवों के द्वारा प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया होने लगी |  प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से ऑक्सीजन की बढोतरी होने लगी | पहले क्योंकि महासागरों में ही जीवन था इसलिए ऑक्सीजन की बढोतरी महासागरों की देन है | धीरे- धीरे महासागर ऑक्सीजन से संतृप्त हो गए और ऑक्सीजन वायुमंडल में फैलने लगी | यह अनुमान लगाया जाता है की वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा 200 करोड़ वर्ष पूर्व आज के समय हे ज हिसाब से पूर्ण हो गयी थी अर्थात वायुमंडल में लगभग 21 प्रतिशत हो गयी थी |

पृथ्वी के जलमंडल का विकास

                            पृथ्वी में ज्वालामुखी विस्फोट के कारण जलवाष्प और गैसें बहार निकलने लगी जिससे वायुमंडल में जलवाष्प और गैसें बढ़ने लगी | पृथ्वी के ठंडा होने के साथ-साथ वायुमंडल भी ठंडा होने लगा और इससे जलवाष्प का संघनन शुरू हो गया | वर्षा के होने पर वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड पानी में घुल गयी | जिससे वायुमंडल के तापमान में गिरावट आई |  तापमान में गिरावट आने से संघनन प्रक्रिया में अधिकता हुई जिससे अत्यधिक वर्षा हुई | पृथ्वी के धरातल पर बने गर्तों (गड्डों) में वर्षा का जल  इकट्ठा होने लगा | इन गड्डों के भरने से महासागर बने | माना जाता है कि महासागर पृथ्वी की उत्पत्ति से लगभग 50 करोड़ सालों के दौरान बने | इससे पता चलता है कि महासागर आज से लगभग 400 करोड़ साल पहले बने है |

                                   महासागरों में ही लगभग 380 करोड़ वर्षों पहले जीवन की शुरुआत हुई | प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगभग 250 से 300 करोड़ वर्षों पहले विकसित हुई | जिससे महासागर में ऑक्सीजन की बढोतरी होने लगी | यही ऑक्सीजन धीरे धीरे वायुमंडल में फ़ैल गयी और वायुमंडल में पूर्ण रूप से व्याप्त हो गयी |

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी के निर्माण के अंतिम चरण में हुई | इसका कारण यह है कि पृथ्वी का आदिकालिक वायुमंडल जीवन के विकास के लिए अनुकूल नहीं था | वायुमंडल और जल मंडल के विकास के बाद ही पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ है |

                                   आधुनिक वैज्ञानिक मानते है कि जीवन की उत्पत्ति एक रासायनिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुई |  इस रासायनिक प्रतिक्रिया में सबसे पहले   जटिल जैव (कार्बनिक) अणु बने |उसके बाद इन अणुओं का समूहन हुआ | यह समूहन ऐसा था जो अपने आप का दोहराता था अर्थात बार बार होता था | इस समूहन की विशेषता यह थी कि यह निर्जीव तत्व कों जीवित पदार्थों में परिवर्तित कर सका | पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के प्रमाण पृथ्वी पर पायी जाने वाले अलग-अलग समय की चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्मों के रूप में मिलते है | माना जाता है कि महासागरों में आज से लगभग 380 करोड़ वर्षों पहले जीवन की शुरुआत हुई | 300 करोड़ साल पुरानी भूगर्भिक शैलों में पाई जाने वाली सूक्ष्मदर्शी संरचना  आज की शैवाल (Blue Green Algae) से मिलती जुलती है | जिससे अनुमान लगाया जाता है कि पृथ्वी पर सबसे पहला  जीव शैवाल ही थे | यह एक कोशिकीय जीव था | समय के साथ-साथ एक कोशिकीय शैवाल से आज के मनुष्य का विकास विभिन्न कालों में हुआ |